<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491</id><updated>2011-12-07T20:59:33.024-08:00</updated><category term='आज के हालात पर एक कविता'/><category term='नई पीढ़ी के कहानीकारों से'/><category term='लोकसभा चुनावों में'/><category term='नई पीढ़ी और नवलेखन के बारे में'/><category term='सिविल सोसाइटी'/><category term='राष्ट्रीय साहित्य'/><category term='डायरी का एक पन्ना (24 मई'/><category term='साहित्य में संबोधन'/><category term='कहानी'/><category term='एक कविता'/><category term='सोशल नेटवर्किंग'/><category term='इंटनरेट और साहित्य'/><category term='2010)'/><category term='सरोकार'/><category term='एक ताज़ा कविता'/><category 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upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>49</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-8428381023468864595</id><published>2011-11-23T07:26:00.000-08:00</published><updated>2011-11-23T07:53:24.184-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य और समाज'/><title type='text'>भूमंडलीय यथार्थ और साहित्यकार की प्रतिबद्धता</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;15 &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;नवम्बर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;, 2011 &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;अलीगढ़&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;दिया&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;गया&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कुंवरपाल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;सिंह&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;स्मृति&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;व्याख्यान&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदरणीय अध्यक्ष जी जनाब क़ाज़ी अब्दुल सत्तार साहब, आदरणीया नमिता सिंह जी, भाई अजय तिवारी जी, वेदप्रकाश अमिताभ जी, अमरीक गिल साहब, अजय बिसारिया जी और सभागार में उपस्थित सभी मित्रो! मेरे लिए यह बड़े सम्मान की बात है कि मुझे कुंवरपाल सिंह स्मृति व्याख्यान देने के लिए यहाँ बुलाया गया है। कुंवरपाल सिंह मेरे आदरणीय मित्र और साथी थे। सुयोग्य शिक्षक, अच्छे लेखक और आलोचक, जन-आंदोलनों से जुड़े कर्मठ कार्यकर्ता कुंवरपाल सिंह को याद करते हुए मुझे याद आ रहा है कि पहले मैं उनके बुलाने पर अलीगढ़ आया करता था। कार्यक्रम कुछ भी हो, मुख्या उद्देश्य होता था उनसे, नमिता जी से और इनके प्यारे बच्चों से मिलना। आज कुंवरपाल सिंह नहीं हैं, पर मैं उन्हीं के लिए आया हूँ। आप लोगों के साथ उन्हें याद करने के लिए आया हूँ। आज का मेरा व्याख्यान उन्हीं की स्मृति को समर्पित है। मेरे व्याख्यान का विषय है 'भूमंडलीय यथार्त और साहित्यकार की प्रतिबद्धता'।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मित्रो,  मेरा मानना है कि भारत के लिए भूमंडलीकरण कोई नयी चीज नहीं है। हमारे यहाँ बड़े पुराने जमाने से दुनिया को एक मानकर चलने की विचार-परंपरा रही है, जिसकी अभिव्यक्ति ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘सबै भूमि गोपाल की’ जैसी सूक्तियों में होती रही है। ‘भूमंडलीय यथार्थ’ और ‘भूमंडलीय यथार्थवाद’ की शब्दावली अवश्य नयी है, लेकिन ये अवधारणाएँ हमारे आधुनिक चिंतन में मौजूद रही हैं। उदाहरण के लिए, हम आधुनिक युग के अपने दो महापुरुषों--रवींद्रनाथ ठाकुर और महात्मा गांधी--को याद करें, तो पायेंगे कि ये दोनों ही एक प्रकार के भूमंडलीय यथार्थवादी थे। रवींद्रनाथ ने विश्वभारती की स्थापना की, तो उसका आदर्श-वाक्य लिखा ‘यत्र विश्वंभवत्येकनीडम्’ और महात्मा गांधी ने 1 जून, 1921 के ‘यंग इंडिया’ में लिखा--‘‘मैं नहीं चाहता कि मेरा मकान चारों ओर दीवारों से घिरा हो और मेरी खिड़कियाँ बंद हों। मैं तो चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियों की हवाएँ मेरे घर में जितनी भी आजादी से बह सकें, बहें। लेकिन मैं यह नहीं चाहता कि उनमें से कोई हवा मुझे मेरी जड़ों से ही उखाड़ दे।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास को देखें, तो हमारा देश बाकी दुनिया से कटा हुआ कोई अलग-थलग भूखंड कभी नहीं रहा है। हम दूसरे देशों में जाते रहे हैं और दूसरे देशों के लोग हमारे यहाँ आते रहे हैं। व्यापारिक लेन-देन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी हम हमेशा करते रहे हैं। पूँजीवाद के आने पर तो हमारा भूमंडलीकरण होना ही था, क्योंकि पूँजीवाद शुरू से ही एक विश्व-व्यवस्था है। मार्क्स ने जब यह कहा था कि पूँजीपति अपने मुनाफे के लिए दुनिया के किसी भी कोने-अंतरे में जा सकता है, तो एक प्रकार से भूमंडलीय यथार्थ को ही व्यक्त किया था। भारतीय मार्क्सवादी भी अंतरराष्ट्रीयतावाद में विश्वास करते हुए हमेशा भारतीय यथार्थ को भूमंडलीय यथार्थ के संदर्भ में समझते रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन पूँजीवादी भूमंडलीकरण हमेशा एक-सा नहीं रहा है। उसके कई रूप और अलग-अलग दौर रहे हैं। मसलन, साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद के दौर का भूमंडलीकरण एक तरह का था, तो समाजवाद और पूँजीवाद के बीच चले शीतयुद्ध के दौर का भूमंडलीकरण दूसरी तरह का। सोवियत संघ के विघटन और शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद पूँजीवादी भूमंडलीकरण का एक नया दौर शुरू हुआ है। उससे भूमंडलीय यथार्थ बदल गया है और इसी कारण साहित्य में एक नये यथार्थवाद की जरूरत महसूस की जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह साहित्यकार की प्रतिबद्धता भी कोई नयी चीज नहीं है, लेकिन वह भी विभिन्न प्रकार की होती है। उसके भी विभिन्न रूप इतिहास में और आज भी पाये जाते हैं। मैं तो यह मानता हूँ कि साहित्यकार होना ही प्रतिबद्ध होना है, क्योंकि साहित्यकार--किसी भी युग का और किसी भी देश का साहित्यकार--सत्य, न्याय, नैतिकता, सुंदरता, प्रेम, समता, स्वतंत्रता जैसी सकारात्मक चीजों का पक्षधर और असत्य, अन्याय, अनैतिकता, कुरूपता, घृणा, विषमता, पराधीनता जैसी नकारात्मक चीजों का विरोधी होता है। यदि ऐसा नहीं है, तो वह साहित्यकार कहलाने का अधिकारी ही नहीं है। सच्चा साहित्यकार वह है, जिसे बड़े से बड़ा दमन या प्रलोभन भी ऐसी पक्षधरता और प्रतिबद्धता से विचलित न कर सके। किसी भी देश-काल और किसी भी भाषा के महान साहित्यकारों को देखें, सबमें ऐसी पक्षधरता और प्रतिबद्धता दिखायी पड़ेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ तक वैचारिक प्रतिबद्धता का सवाल है, वह भी कोई नयी अथवा प्रगतिशील और जनवादी साहित्य की ही विशेषता नहीं है। यह विशेषता भी प्रत्येक देश-काल के महान साहित्य में मौजूद रही है। उदाहरण के लिए, भक्तिकाल के हिंदी साहित्य को देखें। उसमें सगुण भक्ति वाले कवि हों या निर्गुण भक्ति वाले कवि, रामभक्त कवि हों या कृष्णभक्त कवि, संत कवि हों या सूफी कवि--सब में वैचारिक प्रतिबद्धता देखी जा सकती है। सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, मीरा आदि में से किसी को भी देख लीजिए। सभी में यह चीज मिलेगी। मीराबाई जब कहती हैं कि ‘‘मेरे तो गिरधर गुपाल दूसरो न कोई’’, तो अपनी प्रतिबद्धता ही व्यक्त करती हैं। इसी प्रकार तुलसीदास जब कहते हैं कि ‘‘जाके प्रिय न राम-वैदेही, तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही’’, तो अपनी प्रतिबद्धता ही प्रकट करते हैं। यह और बात है कि मैं व्यक्तिगत रूप से मीराबाई की-सी प्रतिबद्धता पसंद करता हूँ, जिसमें अपनी प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति तो है, उसके लिए लोकलाज की परवाह न करने से लेकर विष का प्याला तक पी लेने की बात भी है, लेकिन तुलसीदास की तरह दूसरों को यह उपदेश या आदेश देने वाली बात नहीं है कि जो हमारे राम-वैदेही से प्रेम नहीं करते--अथवा हमारी विचारधारा से सहमत नहीं हैं--उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान मानकर त्याग देना चाहिए। आज के साहित्य में भी, प्रगतिशील और जनवादी साहित्य में भी, मीराबाई की-सी और तुलसीदास की-सी प्रतिबद्धताओं के उदाहरण मिल जायेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1970-80 के दशकों में हिंदी के प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकारों के बीच प्रतिबद्धता एक बड़ा मूल्य मानी जाती थी। लेखक का प्रतिबद्ध होना जरूरी माना जाता था, क्योंकि साहित्य और साहित्यकारों को दो खेमों या शिविरों में बँटा माना जाता था, जैसे प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी, समाजवादी और पूँजीवादी, जनवादी और जन-विरोधी, जनपक्षीय और शासकवर्गीय इत्यादि। मगर यह विभाजन प्रगतिशील और जनवादी लेखक ही किया करते थे। वे जिन लेखकों को दूसरे खेमे का कहते थे, वे तो ऐसे नामकरणों को सिरे से नकारते थे। वे लेखकों को खेमों या शिविरों में बाँटना पसंद नहीं करते थे, इसलिए ‘खेमेबाजी’ या ‘शिविरबद्धता’ को साहित्य के लिए हानिकारक समझते हुए प्रतिबद्धता को हिकारत की नजर से देखते थे। वे प्रतिबद्धता को वैचारिक गुलामी कहते थे और लेखक के विचार-स्वातंत्रय को बहुत बड़ा मूल्य मानते थे। वे जनवाद और समाजवाद की जगह व्यक्तिवाद और व्यक्ति-स्वातंत्रय की बात करते थे और साहित्य को राजनीति से अलग तथा ऊपर की कोई चीज मानते थे। दूसरी तरफ प्रगतिशील और जनवादी लेखक यह कहते थे कि साहित्य को राजनीति से अलग या ऊपर की कोई चीज मानना भी एक विचारधारा है, यह भी एक राजनीति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों प्रगतिशील और जनवादी लेखकों के बीच मुक्तिबोध के दो कथन बहुत प्रचलित थे। एक  यह कि ‘‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’’ और दूसरा यह कि ‘‘बशर्ते तय करो किस ओर हो तुम’’। मुक्तिबोध ऐसी बातें पूँजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं के बीच चलने वाले उस शीतयुद्ध के संदर्भ में कहा करते थे, जो विचारधारात्मक और प्रचारात्मक हथियारों से लड़ा जाता था। साहित्यकार भी, चाहे वे प्रतिबद्ध साहित्यकार हों या अप्रतिबद्ध साहित्यकार, अपनी वर्गीय स्थितियों अथवा सामाजिक परिस्थितियों के चलते अनजाने ही या सचेत रूप से उस युद्ध में शामिल रहते थे। जो सचेत रूप से समाजवाद के पक्ष में और पूँजीवाद के विरुद्ध लड़ते थे, वे अपनी पक्षधरता को छिपाते नहीं थे, क्योंकि वे स्वयं को देश और दुनिया के तमाम शोषित-उत्पीड़ित जनों की मुक्ति के लिए लड़ने वाला सिपाही मानते थे। प्रेमचंद की तरह ‘कलम का सिपाही’। वे शोषण, दमन, अन्याय और अत्याचार पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक शोषणमुक्त समतामूलक और न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए लड़ने वाले लेखक के रूप में अपने पक्ष को नैतिक आधार पर उचित समझते थे, इसलिए अपनी राजनीति को दूसरे पक्ष के साहित्यकारों की तरह छिपाते नहीं थे। जो लेखक अपनी राजनीति को छिपाते थे, उनसे वे पूछते थे कि ‘‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’’ और उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय, सही-गलत आदि में फर्क न कर पाने के कारण दुविधा में पड़े साहित्यकारों को बताते थे कि लड़ाई तो तुम्हें लड़नी ही पड़ेगी, चाहे इस पक्ष में रहकर लड़ो या उस पक्ष में रहकर, इसलिए तय करो कि तुम किस पक्ष में हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुक्तिबोध जिस यथार्थ के संदर्भ में ऐसे प्रश्न उठा रहे थे, वह उनके समय का भूमंडलीय यथार्थ था। उस समय दुनिया तीन दुनियाओं में बँटी हुई थी--पूँजीवादी देशों वाली पहली दुनिया, समाजवादी देशों वाली दूसरी दुनिया और औपनिवेशिक गुलामी से नये-नये आजाद हुए देशों वाली तीसरी दुनिया। पहली और दूसरी दुनियाओं के बीच शीतयुद्ध चल रहा था, जिसके एक पक्ष का नेतृत्व अमरीका कर रहा था और दूसरे पक्ष का नेतृत्व सोवियत संघ। तीसरी दुनिया के देशों के सामने एक विकल्प यह था कि वे पूँजीवादी खेमे में रहें, दूसरा विकल्प यह था कि समाजवादी खेमे में चले जायें और तीसरा विकल्प यह कि वे दोनों गुटों से अलग गुटनिरपेक्ष देशों के रूप में अपनी खिचड़ी अलग ही पकायें। भारत ने तीसरा विकल्प अपनाया और गुटनिरपेक्ष देशों का आंदोलन ही नहीं चलाया, उसका नेतृत्व भी किया। भारत ने वैश्विक राजनीति में ही नहीं, अपनी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी एक मध्यम मार्ग अपनाया। उसमें थोड़ा पूँजीवाद और थोड़ा समाजवाद मिलाकर मिश्रित अर्थव्यवस्था चलायी। यह एक अच्छी विदेशनीति और अच्छी अर्थनीति थी, जो चलती रहती, तो हमारे देश का इतिहास आज कुछ और ही होता। बेहतर ही होता। लेकिन दुर्भाग्य से पूँजीवाद और समाजवाद दोनों के समर्थक इन नीतियों को गलत समझते थे। पूँजीवाद के समर्थक चाहते थे कि भारत अमरीका को अपना आदर्श माने और पूँजीवादी ढंग से अपना विकास करते हुए अमरीका जैसा देश बनने का प्रयास करे। इसलिए उन्हें नेहरू का समाजवादी रुझान, गुट-निरपेक्षता की विदेशनीति और मिश्रित अर्थव्यवस्था वाली आर्थिक नीति पसंद नहीं थी। दूसरी तरफ समाजवाद के समर्थक, जो सोवियत संघ को अपना आदर्श मानते थे, गुट-निरपेक्षता और मिश्रित अर्थव्यवस्था को राजनीतिक अवसरवाद या ढुलमुलपन समझते थे। उन्हें भारत का यह ढुलमुल रवैया पसंद नहीं था। वे चाहते थे कि भारत वैश्विक राजनीति में खुल्लमखुल्ला पूँजीवाद के विरुद्ध समाजवाद के पक्ष में खड़ा हो। यही अपेक्षा वे साहित्यकारों से करते थे। इसीलिए वे मुक्तिबोध के उपर्युक्त कथनों को बार-बार दोहराते थे। इसमें कहीं न कहीं यह भाव भी शामिल होता था कि जो हमारे साथ नहीं है, या तटस्थता की बात करता है, वह निश्चय ही दूसरे खेमे का है और हमारा शत्रु है। यदि ऐसा नहीं है, तो वह समाजवादी खेमे के पक्ष में खुलकर खड़ा हो और अपनी प्रतिबद्धता को स्पष्ट करे। अर्थात्  हमारे साथ आकर अपनी प्रतिबद्धता का प्रमाण दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे चलकर जब समाजवादी शिविर के अंदर आपसी मतभेद उभरे और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में यह सवाल उठा कि भारत में क्रांति रूसी रास्ते पर चलकर होगी या चीनी रास्ते पर चलकर, और इस सवाल पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन तथा पुनर्विभाजन होने से एक की जगह तीन-तीन कम्युनिस्ट पार्टियाँ बन गयीं, और बाद में तीनों के अपने अलग-अलग लेखक संगठन भी बन गये, तो साहित्यकार की प्रतिबद्धता का प्रश्न एक जटिल समस्या बन गया। लेखकों के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया कि वे किससे प्रतिबद्ध हों। नेताओं ने इस समस्या का एक सरल समाधान यह बताया कि साहित्यकार उस दल और संगठन से जुड़ें, जो सबसे सही हो। लेकिन इससे हुआ यह कि वामपंथी दलों और उनसे जुड़े लेखक संगठनों में स्वयं को सही और दूसरों को गलत साबित करने की होड़ मच गयी। संकीर्णता और कट्टरता बढ़ी और इस विचार ने जोर पकड़ा कि जो लेखक हमारे दल और संगठन को सबसे सही नहीं मानता, वह हमारा शत्रु है। हमारा शत्रु, यानी जन-शत्रु, वर्ग-शत्रु, क्रांति का शत्रु, क्रांतिकारी विचारधारा का शत्रु। प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकार अपनी प्रतिबद्धता पर ध्यान देने की जगह दूसरों की प्रतिबद्धता को सही-गलत ठहराने लगे और इसी आधार पर उन्हें मित्र या शत्रु समझने लगे। कहने को वे सभी मार्क्सवादी, प्रगतिशील और जनवादी थे, लेकिन उनमें वर्ण, जाति और संप्रदाय जैसे भेद, ऊँच-नीच तथा वैमनस्य के भाव दिखायी पड़ने लगे। इसकी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति गुलाबी, लाल और गाढ़े लाल रंगों वाले लेखकों के भेद के रूप में हुई। 1973 में रणजीत और केदारनाथ अग्रवाल ने बाँदा में प्रगतिशील लेखकों का जो सम्मेलन आयोजित किया था, उसे ‘‘विभिन्न रंगतों वाले प्रगतिशील लेखकों का सम्मेलन’’ कहा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार साहित्यकार की प्रतिबद्धता का निर्णय उसकी दलगत संबद्धता को देखकर किया जाने लगा। कौन कितना अधिक प्रतिबद्ध है, इसका निर्णय उसकी ‘रंगत’ यानी दलगत संबद्धता को देखकर किया जाता था, जिसको प्रमाणित करने का काम उस दल के नेता अथवा उससे जुड़े लेखक संगठन के नेता करते थे। फिर दल और लेखक संगठन के भीतर भी अलग-अलग गुट होते थे, उन गुटों के अलग-अलग नेता होते थे, इसलिए लेखक को अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित कराने के लिए उनमें से किसी न किसी गुट में शामिल होना पड़ता था और उस गुट के नेता के प्रति निष्ठावान रहना पड़ता था। लेखक संगठनों में पार्टी के सदस्यों और समर्थकों की प्रतिबद्धता में तो भेद किया ही जाता था, पार्टी के सदस्य लेखकों को भी उनकी पार्टी पोजीशन के मुताबिक कम या ज्यादा प्रतिबद्ध माना जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होना तो यह चाहिए था कि प्रतिबद्धता को लेखक के निजी निर्णय पर आधारित और उसके नैतिक आचरण से संबंधित उसका एक आंतरिक गुण माना जाता, लेकिन हुआ यह कि साहित्यकार की प्रतिबद्धता को उसकी दलगत प्रतिबद्धता में रिड्यूस करके देखा जाने लगा। इससे लेखकों में एक तरफ यह डर पैदा हुआ कि पार्टी की रीति-नीति से अलग कुछ लिखने पर कहीं उन्हें पार्टी-विरोधी न समझ लिया जाये, तो दूसरी तरफ तुलसीदास की-सी कट्टरता पैदा हुई कि ‘‘जाके प्रिय न राम-वैदेही, तजिए ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही’’! स्वयं को सही और दूसरों को गलत ठहराने की ऐसी होड़ मची कि प्रलेस (प्रगतिशील लेखक संघ) से जुड़े लेखक जलेस (जनवादी लेखक संघ) और जसम (जन संस्कृति मंच) से जुड़े लेखकों को गलत ठहराने लगे, जलेस से जुड़े लेखक प्रलेस और जसम से जुड़े लेखकों को गलत ठहराने लगे और जसम से जुड़े लेखक प्रलेस और जलेस से जुड़े लेखकों को गलत ठहराने लगे। दूसरी पार्टियों को गलत और अपनी पार्टियों को सही सिद्ध करते-करते वे अपनी पार्टी को इतनी ज्यादा सही मानने लगे कि जैसे वह तो गलती कर ही नहीं सकती और उन्हें हर हाल में उसे सही साबित करना ही है। यही कारण था कि ‘‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन’’ का नारा देने वाली पार्टी हो या आपातकाल का समर्थन करने वाली पार्टी या ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने की ‘‘हिमालयन ब्लंडर’’ करने वाली पार्टी, लेखकों ने अपनी-अपनी पार्टी को सही ही सिद्ध किया। इससे यह भी हुआ कि पार्टियों से प्रतिबद्ध लेखकों की रचनाओं में यथार्थ की जगह पार्टी द्वारा की गयी उसकी राजनीतिक व्याख्या लिखी जाने लगी। यहाँ तक कि मार्क्सवाद भी अपने-आप पढ़ने-समझने की चीज नहीं रहा, पार्टी उसकी जो व्याख्या करती, उसी को मार्क्सवाद मान लिया जाता। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक ही था कि स्वतंत्र रूप से सोचने-समझने वाले लेखक पार्टी-विरोधी मान लिये जायें और अंधभक्तों की तरह व्यवहार करने वाले लेखक प्रतिबद्ध लेखक माने जायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे विचार से प्रतिबद्धता का मतलब दलगत राजनीति की रस्सी गले में डालकर पार्टी के खूँटे से बँध जाना नहीं है। मार्क्सवाद से लेखक की प्रतिबद्धता का मतलब है मार्क्सवाद को स्वयं पढ़ना-समझना, उसके आधार पर यथार्थ को अपने ढंग से विश्लेषित और व्याख्यायित करना, और अपनी व्याख्या पार्टी की व्याख्या से भिन्न होने पर अपनी समझ पर भरोसा करते हुए उसी के अनुसार यथार्थ का चित्रण करना, यथार्थवादी रहते हुए अपनी प्रतिबद्धता को कायम रखना, उसे विस्तार और गहराई देना, अपनी कथनी और करनी की एकता पर आधारित सच्चा प्रतिबद्ध आचरण करना और सोद्देश्य, सार्थक, कलात्मक तथा पाठकों को प्रेरित करने वाला लेखन करना। प्रतिबद्ध लेखक को यह मानकर चलना चाहिए कि उसके लेखन के अच्छे-बुरे परिणामों के लिए कोई दल या संगठन नहीं, वह स्वयं जिम्मेदार है। अतः उसे अपनी प्रतिबद्धता को दल या संगठन से प्रमाणित कराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन 1970-80 के दशकों में हिंदी के प्रगतिशील-जनवादी लेखकों की प्रतिबद्धता दलगत आधारों पर जाँची-परखी जाती थी और पार्टियों के साहित्यिक कमिसार लेखकों को उनकी प्रतिबद्धता के प्रमाणपत्र दिया करते थे। लेकिन जब प्रतिबद्धता को प्रमाणित कराना पड़े, इसके लिए समझौते करने पड़ें, तो प्रतिबद्धता एक मजाक बनकर रह जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन दिनों हिंदी साहित्य में प्रतिबद्धता का यह हाल हो रहा था, ऐसी प्रतिबद्धता से परेशान प्रगतिशील और जनवादी लेखकों के बीच एक चुटकुला चला करता था कि एक लीडर कॉमरेड अपने काडर कॉमरेड से कहता है--‘‘आओ, साथी, तुम्हारी आत्मालोचना करें।’’ इस पर काडर कॉमरेड लीडर कॉमरेड से कहता है--‘‘साथी, इससे तो अच्छा, मैं आत्महत्या कर लूँ।’’ यह सुनकर लीडर कॉमरेड कहता है--‘‘तो ठीक है, आओ, तुम्हारी आत्महत्या करते हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस चुटकुले का ‘आत्मालोचना’ वाला पूर्वार्ध पहले से चला आ रहा था, ‘आत्महत्या’ वाला उत्तरार्ध मैंने गढ़ा था, क्योंकि मैं प्रतिबद्धता को किसी अन्य से प्राप्त प्रमाणपत्र या मैडल नहीं, लेखक का अपना आंतरिक गुण मानता था और मानता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं साहित्यकार की प्रतिबद्धता को एक नैतिक निर्णय और उस पर आधारित नैतिक आचरण मानता हूँ। मेरी यह मान्यता मार्क्सवाद और साम्यवादी आंदोलन के इतिहास के मेरे अध्ययन पर आधारित है। उसी अध्ययन के आधार पर मैंने 1974 में ‘कम्युनिस्ट नैतिकता’ नामक पुस्तिका लिखी थी, जिसे एक तरफ व्यापक स्वीकृति और सराहना प्राप्त हुई थी, तो दूसरी तरफ जिसकी तीखी आलोचना भी हुई थी। तीखी आलोचना करने वालों में मेरे आदरणीय मित्र सव्यसाची भी थे, लेकिन बाद में जब वैश्विक परिस्थिति बदल गयी थी, उन्होंने अपनी भूल मानते हुए लिखा था कि मैंने उस पुस्तिका में जो सवाल उठाये थे, वे सही और जरूरी थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1973 के बाँदा सम्मेलन में मुझे किस रंगत के प्रगतिशील लेखक के रूप में बुलाया गया था, मुझे मालूम नहीं; क्योंकि मैं अपने लेखन के आधार पर प्रगतिशील माना जाता था, किसी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता के आधार पर नहीं। बाद में जब मैं जनवादी लेखक संघ के निर्माण में सक्रिय हुआ और उसके निर्माण के बाद पहले उसकी केंद्रीय कार्यकारिणी में तथा बाद में उसके राष्ट्रीय सचिव मंडल में मुझे शामिल किया गया, तब भी मैं किसी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य नहीं था। जनवादी लेखक संघ के मेरे कई साथी--जिनमें चंद्रबली सिंह, भैरव प्रसाद गुप्त, शिव कुमार मिश्र, ओमप्रकाश ग्रेवाल, सव्यसाची, इसराइल और कुँवरपाल सिंह जैसे मेरे कई अग्रज मित्र शामिल थे--मुझसे कहा करते थे कि अब तो तुम्हें पार्टी की सदस्यता ले ही लेनी चाहिए। लेकिन यह जानते हुए भी कि बहुत-से लोग मुझे सी.पी.एम. का कट्टर कार्ड होल्डर कार्यकर्ता समझते हैं--बहुधा मेरे बारे में ऐसा कहा और लिखा भी जाता रहा है--मैंने अपनी प्रतिबद्धता पर किसी पार्टी का ठप्पा लगवाना उचित नहीं समझा। मुझे याद है कि एक बार शिव कुमार मिश्र और अजय तिवारी मुझे पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर लेने का सुझाव देने के लिए मेरे घर आये थे। दोनों मेरे आदर और स्नेह के पात्र हैं, लेकिन मैंने उनके सुझाव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए अध्यापक पूर्णसिंह के निबंध ‘आचरण की सभ्यता’ का एक वाक्य उद्धृत किया था कि ‘‘सच्चा साधु धर्म को गौरव देता है, धर्म किसी को गौरवान्वित नहीं करता’’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, वह दौर गुजर चुका है और ऐसा लगता है कि साहित्यकार की प्रतिबद्धता की बात करना  ‘आउट ऑफ फैशन’ हो गया है। आज के साहित्यकारों के लिए, खास तौर से नयी पीढ़ी के साहित्यकारों के लिए, उसका कोई मतलब नहीं रह गया है। जब उनके लिए समाजवाद ही समाप्त हो गया, मार्क्सवाद ही अप्रासंगिक हो गया, प्रगतिशीलता और जनवाद का ही कोई मतलब नहीं रहा, तो प्रतिबद्धता का क्या मतलब? किसी हद तक उनकी बात ठीक भी है, क्योंकि 1970-80 के दशकों की बहुत-सी बातें अब अपना अर्थ खो चुकी हैं। बर्लिन की दीवार के ढहने के बाद से दुनिया का यथार्थ बहुत बदल गया है। सोवियत संघ तो रहा ही नहीं, रूस और पूर्वी यूरोप के देशों में भी समाजवाद की जगह पूँजीवाद आ गया है। चीन में कहने को अब भी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है, लेकिन वहाँ ठाठ से पूँजीवाद चल रहा है। वह जमाना ही हवा हो गया है, जब एक दुनिया पूँजीवादी थी, दूसरी समाजवादी, और तीसरी दुनिया के हमारे जैसे देशों के पास यह विकल्प था कि हम पहली और दूसरी दुनिया के बीच जारी शीतयुद्ध में किसके पक्ष में खड़े हों या दोनों गुटों से अलग अपना गुटनिरपेक्ष आंदोलन चलायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदले हुए यथार्थ में कुछ विकल्प तो वास्तव में नहीं बचे हैं, लेकिन कई विकल्प अब भी बचे हुए हैं और कई नये विकल्प पैदा हो गये हैं। उदाहरण के लिए, यह पुराना विकल्प बचा हुआ है कि निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था को अब भी जारी रखा जा सकता है और नया विकल्प यह पैदा हुआ है कि अब ‘‘एक देश में समाजवाद’’ की जगह ‘‘पूरी दुनिया में समाजवाद’’ लाया जा सकता है। आज का पूँजीवाद इसी डर से दुनिया को विकल्पहीन बनाने की कोशिश कर रहा है। वह ऐसा करने में समर्थ तो नहीं है, लेकिन अपने विश्वव्यापी प्रचार तंत्र के जरिये बहुत-से लोगों के मन में यह बात भरने में जरूर सफल हो रहा है कि पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं है। वह अपने असंख्य मुखों से कह रहा है कि शीतयुद्ध समाप्त हो गया है, उस युद्ध में समाजवाद हार गया है, पूँजीवाद जीत गया है, और इस प्रकार दुनिया दो ध्रुवों वाली न रहकर एकध्रुवीय हो गयी है। भूमंडलीकरण ने पहली, दूसरी और तीसरी दुनिया के भेद मिटा दिये हैं। दुनिया एक ग्लोबल गाँव बन गयी है। अब उस ग्लोबल गाँव के चौधरी जी-7 वाले सात देश हों या जी-20 वाले बीस देश, उन सबका मुखिया एक अमरीका ही है, जो ईश्वर की इच्छा से अखिल भूमंडल का स्वाभाविक शासक है। अब सारी दुनिया में और हमेशा पूँजीवाद ही चलेगा--निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों वाला नव-उदार पूँजीवाद--जिसका कोई विकल्प नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पूँजीवादी प्रचार का प्रतिवाद भी हो रहा है। समाजवादी विचारक किशन पटनायक ने एक पुस्तक लिखी है ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’। मुझ जैसे बहुत-से हिंदी लेखक भी यह मानते हैं कि दुनिया विकल्पहीन नहीं है। फिर भी, विकल्पहीनता के इस प्रचार से आज के बहुत-से साहित्यकार प्रभावित हैं। आपको याद होगा कि ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के मुँह से बार-बार ‘‘देयर इज नो ऑल्टरनेटिव’’ सुनकर वहाँ के लोगों ने इस कथन के प्रथमाक्षरों को जोड़कर उनका नाम ‘टीना’ रख दिया था। मैंने जब हिंदी के कई साहित्यकारों को बार-बार ‘‘कोई विकल्प नहीं’’ कहते सुना, तो उसी तर्ज पर इस पद के प्रथमाक्षरों को जोड़कर उनका नाम ‘कोविन’ रख दिया और एक निबंध लिखा ‘हिंदी साहित्य के कोविन’। उसमें मैंने लिखा कि हिंदी के कई लेखक पहले हर चीज के विकल्प की जरूरत बताते थे--वैकल्पिक व्यवस्था, वैकल्पिक सरकार, वैकल्पिक राजनीति, वैकल्पिक मीडिया, वैकल्पिक शिक्षा, वैकल्पिक साहित्य, वैकल्पिक संस्कृति आदि--लेकिन अब उन्हें अपनी ही बातें गलत या झूठी लगती हैं। अब उनका नारा है: कोई विकल्प नहीं है। वे यह मानते हैं, और खुल्लमखुल्ला कहते भी हैं, कि पहले वे नासमझ थे, अब समझदार हो गये हैं। दुनिया बदल गयी है, एक सर्वथा नयी परिस्थिति पैदा हो गयी है, इसलिए साहित्य, साहित्यकारों, साहित्यिक संस्थाओं, साहित्यिक संगठनों, साहित्यिक पत्रिकाओं आदि को भी बदल जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उस निबंध में यह भी लिखा था कि हिंदी साहित्य के कोविन लेखक की पक्षधरता और प्रतिबद्धता तथा साहित्य की सार्थकता और सोद्देश्यता को भुलाकर यह मानने लगे हैं कि साहित्य स्वायत्त है। समाज से उसका कोई लेना-देना नहीं है। उसका कोई प्रयोजन नहीं होता। वह भाषा का खेल या खिलवाड़ है। वह मीडिया के जरिये बाजार में बिकने वाला माल है। उसे बेचकर अधिक से अधिक लाभ कमाना ही लेखक का उद्देश्य है। जो जितना ज्यादा बिके, उतना ही बड़ा लेखक है। समाज वगैरह की चिंता छोड़कर लेखक को अपना बाजार बनाना चाहिए। हिंदी का या भारत का बाजार बहुत छोटा है, इसलिए उसे विश्व बाजार में अपनी जगह बनानी चाहिए!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के नये लेखकों पर कोविनों का काफी असर है। बात यह है कि साहित्य के शिक्षक, आलोचक, साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक, साहित्यिक संस्थाओं के नियामक, पुरस्कारों के निर्णायक आदि यथार्थ को जिस रूप में देखते-दिखाते हैं, नयी पीढ़ी के लेखक अक्सर उसी को यथार्थ मानने लगते हैं। आज के वे नये लेखक, जो विकल्पहीनता को ही यथार्थ मानते हुए साहित्य की दुनिया में आये हैं, बाजार और बाजारवाद में फर्क नहीं कर पाते हैं। उन्हें शायद किसी ने बताया ही नहीं कि बाजार तो पूँजीवाद के आने के पहले भी था और शायद पूँजीवाद के जाने के बाद भी रहेगा, लेकिन बाजारवाद एक विशेष प्रकार का पूँजीवाद है, जिसे नव-उदार पूँजीवाद कहते हैं और जिसमें यह माना जाता है कि अर्थव्यवस्था में राज्य का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, क्योंकि बाजार की ताकतें अर्थव्यवस्था को ज्यादा अच्छी तरह चला सकती हैं। बाजारवाद पूँजीवाद का एक प्रकार है और वह शाश्वत या निर्विकल्प नहीं है। इसका विकल्प है समाजवाद। और आज का भूमंडलीय यथार्थ यह है कि दुनिया पूँजीवाद से तंग आ चुकी है और इसके विकल्प समाजवाद की ओर जा रही है। भूमंडलीय पूँजीवाद की जगह भूमंडलीय समाजवाद का विचार आज की दुनिया का सबसे नया और प्रेरक विचार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का पूँजीवाद अपनी कब्र खोदने वाले इस विचार से आतंकित है। वह इसे दबाने, गलत ठहराने और खत्म करने के तमाम हथकंडे अपना रहा है, लेकिन इसमें सफल नहीं हो पा रहा है। यह आज का भूमंडलीय यथार्थ है। नयी पीढ़ी को इस यथार्थ से परिचित कराने का काम प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकारों को, उनके लेखक संगठनों को, वामपंथी दलों को और उनसे संबद्ध सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को करना चाहिए। लेकिन जब उनमें से अधिकांश कोविन बन गये हों, विकल्पहीनता को ही यथार्थ मानने लगे हों, सोवियत संघ के विघटन से हताश और लस्त-पस्त होकर बैठ गये हों, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को अपना आदर्श मानकर समाजवाद की जगह पूँजीवाद को ही भूमंडलीय यथार्थ मानने लगे हों, उसी के अनुसार अपनी रीति-नीति निर्धारित करने लगे हों, तो नये साहित्यकारों को भूमंडलीय समाजवाद के विचार से प्रतिबद्ध होने के लिए कौन प्रेरित करेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोविनों द्वारा इस प्रश्न का जो उत्तर आम तौर पर दिया जाता है, वह विकल्पहीनता के निराशाजनक विचार में से निकलता है और निराशा ही फैलाता है। यह उत्तर कुछ इस प्रकार का होता है: क्या किया जाये, प्रगतिशील और जनवादी साहित्य का वह आंदोलन ही समाप्त हो गया है, जो लेखकों को प्रतिबद्ध होने के लिए प्रेरित करता था। वामपंथी दल और उनके लेखक संगठन ऐसा कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर पा रहे, जो नये लेखकों को वामपंथ की ओर आकर्षित करे। वामपंथी राजनीतिक नेताओं को तो साहित्य-वाहित्य की तरफ ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं है, लेखक संगठनों के नेता भी नये लेखकों से कोई जीवंत संबंध, संपर्क और संवाद नहीं बना पा रहे हैं। नतीजा यह है कि नये लेखक प्रगतिशीलता, जनवाद, समाजवाद और मार्क्सवाद की ओर आकर्षित होने के बजाय बाजारवादी और अवसरवादी बन रहे हैं। समाज, देश, दुनिया और मानवता की बेहतरी के लिए प्रतिबद्ध लेखन करने के बजाय व्यक्तिगत सफलता और निजी उपलब्धियों के लिए अप्रतिबद्ध लेखन करते हैं। फिर, नये लेखक यह भी देखते हैं कि प्रगतिशील और जनवादी लेखक भी तो प्रतिबद्धता का कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं--वे या तो अपने दल या संगठन के कार्यकर्ता बनकर रह गये हैं और लिखना बंद कर बैठे हैं, या ऐसा खराब लेखन करते हैं, जिससे नये लेखक प्रेरित होना तो दूर, प्रभावित भी नहीं होते। ऐसे में नये लेखक किससे प्रभावित और प्रेरित होकर प्रतिबद्ध लेखन करें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि यह प्रश्न का उत्तर या समस्या का समाधान नहीं, बल्कि विकल्पहीनता से चलकर विकल्पहीनता तक ही पहुँचने वाली निराशाजनक बातें या शिकायतें हैं। ये बातें या शिकायतें निराधार तो नहीं हैं, लेकिन एक बंद दायरे की सोच को सामने लाती हैं। होना यह चाहिए कि हम ‘कला के लिए कला’ वालों की तरह प्रश्न उठाने के लिए प्रश्न न उठायें, बल्कि उनके उत्तर खोजें। समस्याओं की ही बात न करें, उनके समाधान भी सोचें। माना कि आज का साहित्यिक वातावरण निराशाजनक है, लेकिन सवाल यह है कि इसे बदलने और बेहतर बनाने का काम कौन करेगा? क्या इस काम को करने के लिए वामपंथी दलों के नेता और राजनीतिक कार्यकर्ता आयेंगे? क्या इस काम को लेखक संगठनों के नेता करेंगे? उन्हें यह काम करना होता, या वे कर सकते, तो क्या वे इस काम को कर न रहे होते? तो फिर, क्या इस काम को करने के लिए आसमान से कोई फरिश्ते आयेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा कहना यह है कि यह काम प्रतिबद्ध लेखकों का है और उन्हीं को करना है। यहाँ मुझे अपना ही उदाहरण देने के लिए क्षमा किया जाये, लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मैं किस तरह सोचता हूँ। मैं अपने-आप से कहता हूँ--क्या तुमसे किसी डॉक्टर ने कहा था कि तुम्हें लेखक बनना है और प्रतिबद्ध लेखक ही बनना है? तुम स्वेच्छा से लेखक बने थे और प्रतिबद्ध लेखन करने का निर्णय तुम्हारा अपना निर्णय था। तुम जब चाहो, अपने इस निर्णय को बदल भी सकते हो। अगर तुम लिखना बंद कर दो, अथवा यह घोषणा कर दो कि अब तुम प्रतिबद्ध लेखक नहीं हो, तो तुम पर, समाज पर और साहित्य पर कोई कहर नहीं टूट पड़ेगा। उलटे, हो सकता है, तुम्हें इससे कुछ फायदा ही हो जाये। लेकिन जब तक तुम अपने निर्णय पर कायम हो, अपनी प्रतिबद्धता में कमी या शिथिलता आ जाने के लिए दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकते। प्रतिबद्ध लेखक बने रहने के लिए जो भी करना जरूरी है, तुमको ही करना है। परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं, तो उनको अनुकूल बनाने का काम किसी और का नहीं, तुम्हारा ही है। माना कि तुम्हारी सीमाएँ हैं, तुम अकेले सब कुछ नहीं कर सकते, लेकिन उस काम को तो ढंग से करो, जिसे करने का निर्णय तुमने लिया है। तुम वही करो, जो कर सकते हो; मगर उसे बेहतरीन ढंग से करना तुम्हारी जिम्मेदारी है। उसको न कर पाने के लिए वातावरण और परिस्थितियों को दोष देकर तुम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। तुम लेखक हो और नहीं लिख पा रहे हो, या अच्छा नहीं लिख पा रहे हो, तो लिखना बंद कर देने का विकल्प तुम्हारे सामने हमेशा खुला है। यदि तुम प्रतिबद्ध लेखक नहीं बने रहना चाहते, तो अप्रतिबद्ध लेखक बन जाने का विकल्प भी तुम्हारे सामने हमेशा खुला है। मगर जब तक तुम लेखक हो, बेहतरीन ढंग से लिखने की कोशिश करना तुम्हारा काम है। जब तक तुम प्रतिबद्ध लेखक हो, प्रतिबद्ध लेखन के लिए अनुकूल वातावरण बनाना भी तुम्हारा काम है। प्रतिबद्ध लेखक का काम यथार्थ को केवल देखना-दिखाना ही नहीं, उसे बदलना भी है। मौजूदा परिस्थितियाँ वास्तव में प्रतिकूल हैं और उनसे जो निराशा पैदा होती है, वह भी एक यथार्थ है। लेकिन यथार्थ कभी इकहरा नहीं होता। वह द्वंद्वात्मक होता है। कोई भी स्थिति या परिस्थिति सर्वथा और सदा-सर्वदा के लिए निराशाजनक नहीं होती। घना अँधेरा, जिसमें रास्ता नहीं सूझता, एक यथार्थ है। उसमें भटकते हुए लोगों को यदि ऐसा लगता है कि कहीं कोई रास्ता नहीं है, तो उनका यह अनुभव भी यथार्थ है। इस अनुभव से उत्पन्न होने वाली उनकी निराशा भी यथार्थ है। लेकिन यथार्थ यही और इतना ही नहीं है। यथार्थ यह भी है कि प्रत्येक अंधकार में प्रकाश की संभावना मौजूद रहती है। उदाहरण के लिए, घने अँधेरे में माचिस की एक नन्ही-सी तीली या एक छोटी-सी टॉर्च भी प्रकाश पैदा कर सकती है। यह संभावना भी यथार्थ है। इसलिए केवल अंधकार को देखना और उसमें प्रकाश की संभावना को न देखना यथार्थवाद नहीं है। यथार्थ को उसके द्वंद्वात्मक रूप में देखना ही यथार्थवाद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने-आप से इस तरह का संवाद करते रहने के कारण ही मैं यह समझ पाया हूँ कि आज के लेखक के लिए यथार्थवादी होना पहले के किसी भी समय से ज्यादा जरूरी है। मैं देख रहा हूँ कि आज के यथार्थ को केवल अपने देश के अथवा स्थानीय यथार्थ के रूप में नहीं समझा जा सकता। उसे भूमंडलीय यथार्थ के रूप में ही समझा जा सकता है। इसलिए आज का यथार्थवाद पहले के सभी यथार्थवादों से भिन्न एक नया यथार्थवाद है। मैं इसे भूमंडलीय यथार्थवाद कहता हूँ। और मुझे लगता है कि आज का लेखक इसी यथार्थवाद को अपनाकर विकल्पहीनता के निराशावादी विचार से बच सकता है और आशावादी होकर आगे बढ़ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहूँ, तो मैं भी निराशा के एक दौर से गुजरा हूँ। सोवियत संघ का विघटन मेरे लिए निजी तौर पर एक बहुत बड़ा धक्का था। हालाँकि मैं सोवियत संघ कभी नहीं गया, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार का उम्मीदवार भी कभी नहीं रहा, सोवियत संघ की समर्थक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य भी कभी नहीं रहा; फिर भी, सोवियत संघ के विघटन से मुझे धक्का लगा। विश्वास ही नहीं हुआ कि समाजवाद का इतना बड़ा और मजबूत किला अपने ही आप कैसे ढह गया। दुनिया की दूसरी महाशक्ति माना जाने वाला देश इतना शक्तिहीन क्यों साबित हुआ? वहाँ की समाजवादी व्यवस्था ने पूँजीवादी व्यवस्था के आगे क्यों और कैसे घुटने टेक दिये? मेरे कुछ दिन गहरी निराशा में बीते। लेकिन मेरे यथार्थवाद ने मुझे उस निराशा से उबार लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस समय उत्तर-आधुनिकतावाद का बोलबाला था, जिसे हिंदी में प्रचारित-प्रसारित करने वाले लोग हर चीज के अंत की बातें कर रहे थे--इतिहास का अंत, विचारधारा का अंत, मार्क्सवाद का अंत, राष्ट्रवाद और समाजवाद जैसे महाआख्यानों का अंत, यहाँ तक कि कविता का अंत, कहानी का अंत, साहित्य का अंत और साहित्यकार का भी अंत! इससे जो निराशा फैल रही थी, उससे अपने-आप को उबारने के लिए मैंने भूमंडलीय यथार्थ को सामने लाने वाली एक किताब लिखी। मैं उसका शीर्षक रखना चाहता था ‘यह सब कुछ का अंत नहीं है’। लेकिन ग्रंथशिल्पी  प्रकाशन वाले मेरे मित्र श्याम बिहारी राय ने कहा कि यह तो किसी कविता की किताब का नाम लगता है, इस किताब का नाम कुछ और होना चाहिए। मुझे उनकी बात ठीक लगी और मैंने उस किताब का नाम रखा ‘आज का पूँजीवाद और उसका उत्तर-आधुनिकतावाद’। इस किताब का पहला अध्याय था ‘भविष्य-स्वप्न का लोप और उसकी पुनर्प्राप्ति’। (पहले यह अध्याय ज्ञानरंजन ने एक लेख के रूप में ‘पहल’ में छापा था। मराठी लेखक सूर्यनारायण रणसुभे को यह लेख इतना अच्छा और जरूरी लगा कि उन्होंने इसका अनुवाद मराठी में किया और ‘मार्क्सवाद्यांचे स्वप्न आणि नवी फेरमांडणी’ के नाम से स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराया।) उसमें मैंने स्वयं को ही संबोधित करते हुए लिखा था :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘तुम कैसे मार्क्सवादी हो कि द्वंद्ववाद को भूलकर तस्वीर का एक ही पहलू देखते हो और निराश हो जाते हो? कल तक तुम्हें भविष्य उज्ज्वल ही उज्ज्वल क्यों नजर आता था? आज वही भविष्य अँधेरा ही अँधेरा क्यों दिखायी देता है? ऐसा कौन-सा प्रकाश होता है, जिसमें अंधकार की आशंका न हो? और, ऐसा कौन-सा अंधकार होता है, जिसमें प्रकाश की संभावना न हो? कल तक पूर्ण आशावादी बनकर तुम एक प्रकार की गलती कर रहे थे, आज पूर्ण निराशावादी बनकर दूसरे प्रकार की गलती कर रहे हो। बेहतर हो कि पहले प्रकार की गलती के लिए आत्मालोचना करो और दूसरे प्रकार की गलती न करने का निश्चय करो।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मालोचना करते हुए मैंने पाया कि प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकारों में फैली निराशा का कारण सोवियत संघ का बिखर जाना नहीं, बल्कि दुनिया में हो रहे परिवर्तनों को समझकर अपनी दशा और दिशा का सही आकलन न कर पाना है। दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है और हम पुराने ढंग से ही सोच रहे हैं, पुराने ढंग से ही काम कर रहे हैं। नयी परिस्थितियों में नये ढंग से काम करने की कोई परिकल्पना ही हमारे पास नहीं है--न प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकारों के पास, न वामपंथी दलों और उनसे संबद्ध लेखक संगठनों के पास। मैं उन्हें तो बदल नहीं सकता था, लेकिन मैंने सोचा, मैं स्वयं को तो बदल सकता हूँ; अपने काम करने के पुराने तौर-तरीकों को तो बदल सकता हूँ। सबसे पहले तो मुझे अपने तईं इस नयी वैश्विक परिस्थिति को समझना है और फिर हो सके, तो अपने पाठकों को समझाना है। और इस प्रयास में भूमंडलीकरण का अध्ययन करते हुए यह यथार्थ मेरी समझ में आया कि पूँजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था है, तो समाजवाद भी एक वैश्विक व्यवस्था ही है। जब पूँजी का भूमंडलीकरण हो सकता है, तो श्रम का क्यों नहीं? जब पूँजीवाद का भूमंडलीकरण हो सकता है, तो समाजवाद का क्यों नहीं? और मुझे लगा कि इस बदली हुई परिस्थिति में पूँजीवाद और समाजवाद के बारे में ही नहीं, यथार्थ और यथार्थवाद के बारे में भी नये सिरे से सोचना होगा; नये यथार्थवादी लेखक के रूप में सक्रिय होना होगा। मैंने सोचा, राजनीतिक दल और उनके लेखक संगठन कब इस तरह सोचेंगे और कब इस तरह सक्रिय होंगे, पता नहीं, लेकिन मैं स्वयं तो एक लेखक के रूप में नये ढंग से सक्रिय हो ही सकता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आसपास के लेखकों और साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों से मैंने इस बारे में बात की, तो पता चला कि वे अभी ऐसा कुछ सोचने और करने की स्थिति या मनःस्थिति में नहीं हैं। हिंदी साहित्य पर उस समय एक तरफ उत्तर-आधुनिकतावाद और जादुई यथार्थवाद के नये फैशन छाये हुए थे, तो दूसरी तरफ वे अनुभववादी और कलावादी प्रवृत्तियाँ पुनः हावी हो रही थीं, जिन्हें 1970-80 के दशकों में प्रगतिशील-जनवादी साहित्य ने काफी पीछे धकेल दिया था। कई प्रगतिशील और जनवादी लेखक-संपादक भी भूमंडलीय यथार्थ को समझने और उसके बारे में कुछ करने की सोचने के बजाय बहती गंगा में हाथ धोते हुए उत्तर-उत्तर कर रहे थे--उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-समाजवाद, उत्तर-मार्क्सवाद! यथार्थ और यथार्थवाद पर नये सिरे से विचार करने की उन्हें फुर्सत ही नहीं थी। उलटे, मुझे ऐसी बातें करते देख उन्होंने मुझे पुरानी लकीर का फकीर समझा और मुँह फेरकर अपने काम में लग गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब मैंने अपनी बेटी संज्ञा, कुछ पुराने मित्रों तथा कुछ नये उत्साही लेखकों को साथ लेकर अपनी पत्रिका ‘कथन’ को फिर से निकालना शुरू किया, जो पिछले पंद्रह साल से बंद पड़ी थी। और मुझे देखकर अत्यंत सुखद आश्चर्य हुआ कि बदलते हुए भूमंडलीय यथार्थ की चिंता करने वालों, उसका गंभीर अध्ययन करने वालों, उस पर चिंतन-मनन और लेखन करने वालों की कमी नहीं है। हिंदी में अभी ऐसे लोग कम हैं, लेकिन अंग्रेजी में कई लोग इससे संबंधित विषयों पर खूब लिख-बोल रहे हैं। विभिन्न देशों में पूँजीवादी भूमंडलीकरण के विरुद्ध अनेक प्रकार के आंदोलन चल रहे हैं। उनके बारे में लिखा जा रहा है और भूमंडलीय यथार्थ को सामने लाने वाली ढेरों पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे आश्चर्य हुआ कि जब हिंदी के लेखकों को लिखने के लिए नये विषय नहीं मिल रहे हैं और वे अपने पुराने अनुभवों को ही नये रूपों में लिखते हुए अथवा अपने लेखन में कुछ नयापन लाने के लिए विदेशी लेखकों की नकल करते हुए एक ही जगह खड़े कदमताल कर रहे हैं, तब आज का भूमंडलीय यथार्थ सोचने-समझने और लिखने के लिए नित्य नये विषय प्रस्तुत कर रहा है। अतः ‘कथन’ में हमने भूमंडलीय यथार्थ के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया और हर अंक में एक नया विषय उठाकर उस पर विशेष सामग्री देने लगे। ‘कथन’ के लेखकों और पाठकों ने इस नयेपन का स्वागत किया और हमने नहीं, उन्हीं ने ‘कथन’ के लिए ‘‘हर बार कुछ नया: हर अंक एक विशेषांक’’ का नारा दिया। इस प्रकार अत्यंत सीमित निजी संसाधनों के बावजूद ‘कथन’ के अंक निरंतर नियत समय पर तथा उत्तरोत्तर बेहतर रूप में निकलने लगे। ‘कथन’ को हिंदी के बड़े से बड़े और नये से नये लेखकों का सहयोग मिलने लगा। नये विषयों पर अंग्रेजी में लिखने वाले लेखकों, विशेषज्ञों तथा चिंतकों-विचारकों को भी हमने ‘कथन’ से जोड़ा। हमने उन्हें यह सुविधा दी कि वे हमारे लिए अंग्रेजी में लिख दें, हम अनुवाद कर लेंगे; या उन्हें लिखने की फुर्सत नहीं है, तो बोल ही दें, हम रिकॉर्ड कर लेंगे और उनके विचारों को हिंदी में लिखकर प्रकाशित कर देंगे। नतीजा यह हुआ कि हमें ऐसे लोगों का भी भरपूर सहयोग मिला। इस प्रकार ‘कथन’ में ऐसे नये से नये विषयों पर केंद्रित अंकों का सिलसिला शुरू हुआ, जो हिंदी में पहली बार उठाये गये थे। उदाहरण के लिए, कुछ विषय हैं--‘यूटोपिया की जरूरत’, ‘आशा के स्रोतों की तलाश’, ‘विकल्प की अवधारणा’, ‘श्रम का भूमंडलीकरण’, ‘नयी विश्व व्यवस्था की परिकल्पना’, ‘नयी संस्थाओं की जरूरत’, ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’, ‘भाषा और भूमंडलीकरण’, ‘शिक्षा और भूमंडलीकरण’, ‘दुनिया की बहुध्रुवीयता’, ‘बाजारवाद और नयी सृजनशीलता’, ‘उत्पादक श्रम और आवारा पूँजी’, ‘भूमंडलीय यथार्थवाद’, ‘वर्तमान संकट और दुनिया का भविष्य’ इत्यादि। और आज, जब ‘कथन’ के साठ अंक निकालने के बाद मैं उसका संपादन पूरी तरह संज्ञा को सौंप चुका हूँ और वह स्वतंत्र रूप से अपने संपादन में बारह अंक और निकाल चुकी है, तब मुझे लगता है कि इस काम को करते हुए एक लेखक के रूप में मेरा जो विकास हुआ है, अन्यथा कभी न हो पाता। मैं यह काम न करता, तो ‘आज के सवाल’ शृंखला की अब तक प्रकाशित पच्चीस पुस्तकें कैसे संपादित कर पाता? ‘बेहतर दुनिया की तलाश में’ तथा ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ जैसी पुस्तकें कैसे लिख पाता? ‘डॉक्यूड्रामा’, ‘प्रजा का तंत्र’, ‘ग्लोबल गाँव के अकेले’, ‘त्रासदी...माइ फुट!’ और ‘प्राइवेट पब्लिक’ जैसी कहानियाँ कैसे लिख पाता? और सबसे बड़ी बात यह कि नितांत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी निरंतर उत्साही और आशावादी कैसे बना रह पाता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दौरान मैंने यह भी देखा कि आजकल हिंदी लेखकों पर विकल्पहीनता के विचार और उससे पैदा होने वाली निराशा के हावी हो जाने का एक बहुत बड़ा कारण यह है कि उन्होंने अनुभववाद को ही यथार्थवाद समझते हुए, और उसी से संतुष्ट रहते हुए, अपने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा को आत्मसात करने, उसे आगे बढ़ाने और इसके लिए आज के यथार्थ को समझकर यथार्थवाद का विकास करने का जरूरी काम करना छोड़ दिया है। इसके लिए बहुत हद तक आज का पूँजीवाद जिम्मेदार है, जो अपने विश्वव्यापी प्रचारतंत्र के जरिये लोगों का ध्यान यथार्थ से हटाने का काम करता है, ताकि लोग यथार्थ को देखें ही नहीं, जानें ही नहीं, समझें ही नहीं; क्योंकि यथार्थ को देखने, जानने और समझने से लोग उसे बदलने और बेहतर बनाने की जरूरत महसूस करने लगते हैं तथा इसके लिए संगठित होकर सक्रिय होने लगते हैं। अतः वह अपने मीडिया के जरिये, शिक्षा संस्थानों और प्रकाशन संस्थानों के जरिये, मनोरंजन उद्योग के जरिये और नये-नये वैचारिक तथा साहित्यिक फैशनों के जरिये आम लोगों को ही नहीं, साहित्यकारों को भी यथार्थ से विमुख करता है। इसलिए आज के साहित्यकार के लिए जरूरी हो गया है कि वह केवल उसी को यथार्थ न समझे, जो उसके सामने आ रहा है या लाया जा रहा है; बल्कि स्वयं उसे उसके व्यापक रूप में जानने, समझने, आत्मसात करने और अपनी रचना में रूपायित करने का प्रयास करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि साहित्यकार स्वयं बाहर निकलकर दुनिया के यथार्थ को प्रत्यक्ष देखे और उसमें जीकर उसे जाने। लेकिन यह वांछित होते हुए भी संभव नहीं है। अतः आज के भूमंडलीय यथार्थ को जानने और उसके आधार पर यथार्थवादी रचना करने का एक ही तरीका है कि वह ज्ञान के वैकल्पिक माध्यमों से जुड़े। हालाँकि ऐसे वैकल्पिक माध्यमों में आज इंटरनेट एक मुख्य माध्यम बनकर उभर रहा है, फिर भी इसका सर्वोत्तम माध्यम आज भी किताबें ही हैं। अतः मुझे लगा कि ऐसी किताबें पढ़ना मेरे लिए तो जरूरी है ही, दूसरे लेखकों-पाठकों को उनकी जानकारी देना भी जरूरी है। यह सोचकर मैंने ‘कथन’ में ‘जरूरी किताबें’ नामक एक स्तंभ नियमित रूप से लिखना शुरू किया। उत्पल कुमार के नाम से यह स्तंभ मैं ही लिखता हूँ और ‘कथन’ का संपादन संज्ञा को सौंपने के बाद भी मैं इसे लिखना जारी रखे हुए हूँ। इस स्तंभ में मैं हर बार अंग्रेजी की एक किताब का विस्तार से, लगभग चार पृष्ठों में, परिचय देता हूँ और बताता हूँ कि इस किताब में क्या है और इसे पढ़ना क्यों जरूरी है। ‘कथन’ का प्रत्येक अंक किसी विशेष विषय पर केंद्रित होता है और मैं उसी विषय से संबंधित एक किताब चुनकर उसके बारे में लिखता हूँ। अब तक जिन किताबों का परिचय मैंने दिया है, उनमें से कुछ के नाम हैं--अंर्स्ट ब्लॉख की ‘दि प्रिंसिपल ऑफ होप’, माइकेल लोवी की ‘ऑन चेंजिंग दि वर्ल्ड’, मिशेल बॉड की ‘अ हिस्टरी ऑफ कैपिटलिज्म’, समीर अमीन की ‘कैपिटलिज्म इन दि एज ऑफ ग्लोबलाइजेशन’, फ्रांसिस मुलहेर्न की ‘कल्चर/मेटाकल्चर’, जॉन टॉमलिंसन की ‘कल्चरल इंपीरियलिज्म’, रॉबर्ट फिलिपसन की ‘लिंग्विस्टिक इंपीरियलिज्म’, मार्था नुसबॉम की ‘सेक्स एंड सोशल जस्टिस’, रोमी क्लार्क तथा रॉस इवानिच की ‘दि पॉलिटिक्स ऑफ राइटिंग’, रोनाल्डो मुंक की ‘ग्लोबलाइजेशन एंड लेबर’ इत्यादि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी किताबों से पता चलता है कि आज की दुनिया में ऐसे असंख्य सामाजिक तथा राजनीतिक आंदोलन चल रहे हैं, जिनसे दुनिया भविष्य में तो बदलेगी ही, आज भी बदल रही है। इन आंदोलनों के जरिये आज का भूमंडलीय यथार्थ तो सामने आ ही रहा है, दुनिया के लोगों में व्याप्त आशावादिता, दुनिया को बेहतर बनाने की मजबूत इच्छाशक्ति और समाजवादी प्रतिबद्धता भी सामने आ रही है। पिछले दिनों ऐसी एक किताब मेरे पढ़ने में आयी ‘ग्लोबल रिवोल्ट : अ गाइड टु दि मूवमेंट्स अगेंस्ट ग्लोबलाइजेशन’। अमोरी स्टार द्वारा लिखी गयी यह किताब वर्ल्ड सोशल फोरम के नारे ‘‘एक और दुनिया संभव है’’ को सच साबित करती है। इस किताब में दुनिया भर में चल रहे आंदोलनों के उदाहरण सामने रखकर बताया गया है कि आज भूमंडलीकरण के दो रूप सामने आ रहे हैं--एक वह, जो पूँजीवादी शक्तियों द्वारा ‘‘ऊपर से किया जा रहा भूमंडलीकरण’’ है और दूसरा वह, जो दुनिया के तमाम लोगों द्वारा ‘‘नीचे से किया जा रहा भूमंडलीकरण’’ है। शायद यह नीचे से किया जा रहा भूमंडलीकरण भूमंडलीय पूँजीवाद की जगह भूमंडलीय समाजवाद के निर्माण की शुरूआत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर जब से पूँजीवादी व्यवस्था विश्वव्यापी मंदी की चपेट में आकर अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट में फँसी है, उसके विरुद्ध दुनिया में जगह-जगह जन-असंतोष भड़क रहा है। उसके विरुद्ध जन-आंदोलनों और जन-विद्रोहों का सिलसिला अमरीका से लेकर यूरोप के उन देशों तक में चल पड़ा है, जो पूँजीवाद के सबसे मजबूत गढ़ रहे हैं। शातिर पूँजीवाद अपनी रक्षा के लिए इस स्थिति का भी लाभ उठा रहा है। वह विभिन्न देशों में ऐसे आंदोलन चलवा रहा है, जो होते तो जन-असंतोष से उत्पन्न तथा स्थानीय शासकों के विरुद्ध ही हैं, लेकिन फायदा भूमंडलीय पूँजीवाद को पहुँचाते हैं। पिछले दिनों अरब-अफ्रीकी देशों में वहाँ के तानाशाहों के विरुद्ध जो आंदोलन चले, कुछ इसी तरह के आंदोलन थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन पूँजीवाद की यह चाल ज्यादा चलने वाली नहीं है। पूँजीवाद द्वारा चलवाये जाने वाले तथाकथित जन-आंदोलनों और असली जन-आंदोलनों का फर्क अब स्पष्ट होने लगा है। खुद अमरीका में, जो दुनिया में जगह-जगह नकली जन-आंदोलन चलवाता है, पिछले दिनों यह फर्क स्पष्ट हो गया है। अमरीकी अर्थव्यवस्था के संकट में आने पर जब वहाँ की जनता की दुर्दशा हद से ज्यादा बढ़ गयी, तो यह माँग होने लगी कि गरीबों को राहत देने के लिए अमीरों पर टैक्स बढ़ाये जायें। यह माँग पूरी हो जाती, तो अमीरों को नुकसान होता। उससे बचने के लिए उन्होंने गरीबों को खरीदने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया और उनसे एक आंदोलन चलवाया--‘टी-पार्टी’ नाम का आंदोलन--जिसमें गरीब लोग खुद अपने हितों के खिलाफ जाकर यह माँग करते थे कि अमीरों पर टैक्स न बढ़ाये जायें। लेकिन कुछ ही समय बाद अमरीकी जनता ने ‘ऑकुपाई वॉल स्ट्रीट’ (वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो) नामक एक असली जन-आंदोलन शुरू कर दिया, जो देखते-देखते दुनिया के कई देशों में फैल गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तो सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसे न जाने कितने असली जन-आंदोलन आज दुनिया भर में चल रहे हैं। भारत में मीडिया चूँकि पूँजीवादी मीडिया है, इसलिए वह पूँजीवाद को बनाये रखने के लिए चलवाये जाने वाले नकली जन-आंदोलनों को तो खूब दिखाता है, जैसे पिछले दिनों उसने भारत के अण्णा हजारे के आंदोलन को दिखाया, लेकिन पूँजीवाद को खत्म करके समाजवाद को लाने के लिए चलाये जाने वाले किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों आदि के असली आंदोलनों के बारे में बिलकुल खामोश रहता है। लेकिन मीडिया के न दिखाने से उनका अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। वे चल रहे हैं, चलेंगे और मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन सफल भी जरूर होंगे। यह आज का भूमंडलीय यथार्थ है और आज के प्रतिबद्ध साहित्यकारों का कर्तव्य है कि वे इस यथार्थ को सामने लायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रमेश&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-8428381023468864595?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/8428381023468864595/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/11/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/8428381023468864595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/8428381023468864595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='भूमंडलीय यथार्थ और साहित्यकार की प्रतिबद्धता'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-3490239975701362454</id><published>2011-10-08T08:23:00.000-07:00</published><updated>2011-10-08T08:46:33.936-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिविल सोसाइटी'/><title type='text'>सभ्यासभ्य संवाद</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(51, 51, 255);font-size:180%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;रामलीला&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;मैदान&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;बहस&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; :&lt;/span&gt; हे बाबू साहब, यह क्या तमाशा हो रहा है यहाँ?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तमाशा? यह तमाशा है? तू यहाँ इस ऐतिहासिक रामलीला मैदान में खड़ा है। उधर मंच पर बैठे अण्णा हजारे अनशन कर रहे हैं। उनके समर्थन में बाबा रामदेव भाषण दे रहे हैं। मंच के सामने ‘मैं अण्णा हूँ’ लिखी टोपियाँ पहने और तिरंगे लहराती  पूरे देश की जनता अण्णा को देख और बाबा को सुन रही है। इधर मीडिया का अब तक के अपने इतिहास का सबसे बड़ा जत्था सातों दिन गुणा चौबीसों घंटे के हिसाब से इस अनशन का लाइव शो सारी दुनिया को दिखा रहा है। उधर दिल्ली पुलिस आदर्श भूमिका में शांति और अहिंसा की मूर्ति बनकर खड़ी है। और तू इसे तमाशा कह रहा है? तू टी.वी. नहीं देखता? अखबार नहीं पढ़ता? देश में इतनी महान क्रांति हो रही है और तू...  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; असभ्य हूँ न, बाबू साहब! देखता-सुनता सब हूँ, पर समझता नहीं। क्रांतियों के बारे में मैंने पढ़ा-सुना ही है। अपनी आँखों से कोई क्रांति नहीं देखी। टी।वी. वालों को चीख-चीखकर यह कहते सुना कि देश में क्रांति हो रही है, तो मैं उसे देखने निकल पड़ा। शहर में दूर-दूर तक जाकर देख आया। कहीं नहीं दिखी। तब सोचा कि शायद रामलीला मैदान में ही हो रही होगी, इसलिए यहाँ आने के लिए चल पड़ा। सुना था कि देश की जनता भ्रष्टाचार का विरोध करने सड़कों पर उतर आयी है। पर मैं दिल्ली की कई सड़कें पार करता यहाँ तक पहुँचा हूँ। देश की तो क्या, मुझे तो दिल्ली शहर की जनता भी कहीं भ्रष्टाचार का विरोध करती नजर नहीं आयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; यहाँ तो नजर आ रही है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;:&lt;/span&gt; यह जनता है? मुझे तो यहाँ सब शहरी और शिक्षित लोग दिख रहे हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; अरे, तू इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर लेता है! तूने तो कहा कि तू असभ्य है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; क्या करूँ, बाबू साहब! लगता है कि देश में एक नयी जात-बिरादरी पैदा हो गयी है, जिसका नाम है सिविल सोसाइटी। एक दिन मैंने आप सरीखे एक बाबू साहब से उनकी जात पूछी, तो कहने लगे, हम सिविल सोसाइटी हैं। मैंने कहा कि सोसाइटी माने समाज, और समाज में तो मैं भी रहता हूँ, तो मैं कौन सोसाइटी हूँ? बाबू साहब बोले कि तू अनसिविल सोसाइटी है। अब सिविल माने सभ्य, तो अनसिविल माने असभ्य ही हुआ न, बाबू साहब? तब से मैं अपने-आप को असभ्य कहने लगा। पर सिविल सोसाइटी क्या है, अभी तक नहीं समझा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; अरे, तू कैसा घामड़ है! इस आंदोलन में शामिल होने आ गया और यह नहीं जानता कि सिविल सोसाइटी क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; आप जानते हैं? मुझे भी बताइए न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; बताना क्या है। तू खुद अपनी आँखों से देख ले। उधर मंच पर जो अण्णा के अगल-बगल बैठी उनके कान में कुछ कह रही है, वही है सिविल सोसाइटी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; अण्णा के अगल-बगल? इन दोनों को तो मैं पहचानता हूँ, बाबू साहब! एक तरफ हैं किरन बेदी और दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल। अण्णा के कान में जो फुसफुसा रहे हैं, वे तो केजरीवाल हैं। सिविल सोसाइटी कहाँ है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; अरे, बेवकूफ! वे ही सिविल सोसाइटी हैं। अच्छा, तू एन.जी।ओ. तो समझता है न? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; एन.जी.ओ.  कौन नहीं समझता, बाबू साहब! हिंदी में कहते हैं गैर-सरकारी संगठन। आजकल देश पर उनका ही राज है। लेकिन मैं कहता हूँ कि इनको गैर-सरकारी क्यों कहते हो? सरकारी ही कहो न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; क्यों, सरकारी क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; देखिए, पहले जो काम सरकार करती थी, अब ये करते हैं। आउट-सोर्सिंग का जमाना है न! सरकारी काम ठेकेदारों से कराने का जमाना। सरकार इनसे अपने काम कराती है और इसके लिए इनको पैसा देती है, तो ये एक तरह से सरकारी ही हुए न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तू इतना जानता है, तो यह भी जानता होगा कि कई एन.जी.ओ. सरकार से कोई पैसा नहीं लेते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य&lt;/span&gt; &lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;: &lt;/span&gt;लेकिन एन।जी.ओ. चलाने के लिए पैसा तो चाहिए। भारत की सरकार से नहीं, तो अमरीका-यूरोप की सरकारों से लेते होंगे। नहीं तो फिर जो सरकारों के भी सरकार हैं, यानी कारपोरेटिए, उनसे। मैंने सुना है, आजकल कारपोरेटिए, चाहे देशी हों या विदेशी, गैर-सरकारी संगठनों पर बड़े मेहरबान हैं। ‘हिंदू’ अखबार में अरुंधती राय के एक लेख में मैंने पढ़ा था कि ये जो केजरीवाल हैं, ये एक भ्रष्टाचार-विरोधी एन.जी.ओ. चलाते हैं और उसे फोर्ड फाउंडेशन से लाखों डॉलर मिले हैं।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तू यह सब भी जानता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; आप जैसे सभ्य लोगों की कृपा से हम असभ्यों को भी कुछ ज्ञान मिल जाता है। लेकिन एक बात बताइए, यह जो आंदोलन यहाँ हो रहा है, भारत सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ है न?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; हाँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; तो भारत सरकार इसकी मदद क्यों कर रही है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; मदद? सरकार अपने ही खिलाफ चलाये जा रहे आंदोलन की मदद क्यों करेगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; आप तो सभ्य हैं, बाबू साहब, यह तो जानते ही होंगे कि सब आंदोलन एक जैसे नहीं होते। आंदोलन आंदोलन में फर्क होता है और सरकार यह फर्क करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; वह कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; देखिए, यह जो अण्णा जी का अनशन है, कोई पहला या अनोखा अनशन नहीं है। मैं उन अनशनों की बात नहीं कर रहा हूँ, जो देश के करोड़ों लोग गरीबी और बेरोजगारी की वजह से भुखमरी के रूप में करने को मजबूर होते हैं। मैं अन्याय और अत्याचार के मामलों के खिलाफ आंदोलन करने वालों के अनशनों की बात भी नहीं कर रहा हूँ, जो किसानों, मजदूरों और इसी तरह के और लोगों के नेता भूख हड़तालों के रूप में आये दिन करते रहते हैं और मीडिया में जिनकी खबर तक नहीं आती...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तो फिर तू किस तरह के अनशनों की बात कर रहा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाने वालों के अनशनों की। अच्छा, यह तो आप मानेंगे कि भ्रष्टाचार का मतलब सिर्फ घूसखोरी या पैसे की हेराफेरी नहीं होता? विद्वान लोग बताते हैं कि नीति-नियम और कायदे-कानून के खिलाफ जो किया जाये, वह भ्रष्ट आचरण या भ्रष्टाचार है। तो, खुद कानून का दुरुपयोग करना और अपराधियों को कानून के खिलाफ काम करने देना भी तो भ्रष्टाचार है न?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; हाँ, है, तो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; तो मैं आपको भ्रष्टाचार विरोधी दो आंदोलनों और उनमें किये जाने वाले दो आमरण अनशनों की बात बताता हूँ। शायद आपने पढ़ा या सुना होगा कि मणिपुर की एक लड़की है इरोम शर्मिला। उसने जब देखा कि सरकार ने मणिपुर और पूर्वोत्तर के ज्यादातर इलाकों पर सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम थोप दिया है और उसकी आड़ में सुरक्षा बलों ने वहाँ के हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया है, तो वह इसके विरोध में आमरण अनशन पर बैठ गयी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; हाँ-हाँ, सुना है उसके बारे में। वह कुछ दिन यहाँ दिल्ली में भी जंतर-मंतर पर पड़ी रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; हाँ, लेकिन जानते हैं, उसे दिल्ली क्यों आना पड़ा? उसने अनशन शुरू किया था मणिपुर में ही। लेकिन जब देखा कि सरकार तक उसकी खबर पहुँचाने वाला मीडिया उसके पास आ ही नहीं रहा है, तो वह दिल्ली चली आयी कि शायद यहाँ आमरण अनशन करने पर उसकी बात सुनी जाये। मगर यहाँ भी नहीं सुनी गयी। उसे आत्महत्या का प्रयास करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और अस्पताल में डाल दिया गया। दस साल से ऊपर हो गये हैं। वह इंफाल के अस्पताल के एक गंदे कमरे में अपराधी की तरह बंद है। सरकार उसकी नाक में नली डालकर जबर्दस्ती खाना उसके अंदर पहुँचाती है और चाहती है कि इससे तंग आकर वह अपना अनशन तोड़ दे। लेकिन वह अपने अनशन पर डटी है और सरकार उसकी उपेक्षा करते रहने पर तुली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; वह भी कोई अनशन है! मुँह से न खाया, नाक से खाया! खाना तो मिल रहा है न! भूखी तो नहीं मर रही है न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; लेकिन स्वामी निगमानंद के अनशन को तो अनशन मानेंगे आप, जिनको सरकार ने भूखा मार दिया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; निगमानंद? कौन निगमानंद?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; मुझे पता था कि आप उन्हें नहीं जानते होंगे, क्योंकि मीडिया ने उनकी उतनी भी सुध नहीं ली, जितनी इरोम शर्मिला की। आप सभ्य हैं, इतना तो जानते ही होंगे कि गंगा नदी प्रदूषित हो गयी है और इससे भारत सरकार ही नहीं, विश्व बैंक भी चिंतित है। सरकार ने कोई बीस साल पहले एक गंगा एक्शन प्लान बनाकर गंगा को साफ करने और रखने की सोची थी। उस प्लान पर नौ सौ साठ करोड़ रुपये खर्च किये गये। पर गंगा साफ न हुई। अब उसकी सफाई की जिम्मेदारी नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी को सौंपी गयी है और विश्व बैंक ने नये क्लीन गंगा प्रोजेक्ट के लिए एक बिलियन डॉलर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; अबे, तू यह सब क्या बता रहा है? निगमानंद के बारे में बता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; स्वामी निगमानंद उसी उत्तराखंड के थे, जिसके बाबा रामदेव हैं। लेकिन वे रामदेव की तरह कॉरपोरेट संत नहीं थे, जिनका हजारों करोड़ का व्यापार देश और विदेशों में फैला हुआ है। निगमानंद सचमुच संत थे। उन्होंने सरकारी भ्रष्टाचार के कारण माफियाओं द्वारा अवैध तरीके से चलाये जाने वाले और गंगा को प्रदूषित करने वाले स्टोन क्रशरों को बंद कराने का अभियान चलाया। लेकिन उनकी बात न तो उत्तराखंड की राज्य सरकार ने सुनी और न ही दिल्ली की केंद्रीय सरकार ने। तब स्वामी निगमानंद आमरण अनशन पर बैठ गये। दो बार बैठे। पिछली बार पिचहत्तर दिनों का अनशन किया था। इस बार उनके अड़सठ दिन के अनशन के बाद सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अस्पताल में डाल दिया, जहाँ वे मर गये। यह उन्हीं दिनों की बात है, जब देहरादून के जौली ग्रांट अस्पताल में बाबा रामदेव का अनशन तुड़वाने के लिए मुख्यमंत्री निशंक और बड़े-बड़े संत जूस के गिलास लेकर हाजिर हो गये थे। लेकिन उसी अस्पताल में भरती रहे स्वामी निगमानंद को देखने न कोई नेता गया और न कोई संत। और तो और, मीडिया को भी जीते जी निगमानंद खबर बनने लायक नहीं लगे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; सबकी अपनी-अपनी हस्ती और हैसियत होती है। कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; मैं भी तो यही कह रहा था, बाबू साहब, कि सब आंदोलन एक जैसे नहीं होते और सरकार उनमें फर्क करती है। जो आंदोलन उसे वाकई अपने खिलाफ लगता है, उसको वह या तो उपेक्षा से मार डालती है या दमन का बुलडोजर चलाकर। लेकिन जो आंदोलन उसे अपने फायदे का लगता है, उसे वह खुद चलवाती है और उसकी खूब मदद करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; कैसे? मैंने यही तो पूछा था तुझसे! तू इधर-उधर की हाँकने लगा। अब बता, सरकार खुद अपने खिलाफ आंदोलन क्यों चलवायेगी? या अपने खिलाफ हो रहे किसी आंदोलन की मदद क्यों करेगी? और हवाई बात मत कर। ठोस उदाहरण देकर बात कर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; नाराज क्यों होते हैं, बाबू साहब, बता रहा हूँ। एक उदाहरण है बाबा रामदेव का आंदोलन और दूसरा है यह जो हो रहा है--सिविल सोसाइटी का आंदोलन!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तेरा दिमाग तो ठीक है? बाबा रामदेव का आंदोलन भी सरकार के खिलाफ था और यह सिविल सोसाइटी का आंदोलन भी सरकार के खिलाफ है। ऐसे आंदोलन सरकार खुद अपने खिलाफ क्यों चलवायेगी? या खुद उनकी मदद क्यों करेगी? क्या तुझे याद नहीं कि सरकार ने बाबा रामदेव का आंदोलन खत्म करने के लिए इसी रामलीला मैदान में कैसा दमनचक्र चलाया था? क्या तुझे यह भी याद नहीं कि इस समय यहाँ जो आंदोलन चल रहा है, इसे न चलने देने के लिए सरकार ने सिविल सोसाइटी को कितना परेशान किया था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; याद है, बाबू साहब, खूब याद है! भला कोई भूल सकता है कि जो बाबा रामदेव सरकार को उखाड़ फेंक सकने की ताकत अपने अंदर होने की बात कर रहे थे, वे किस तरह जनाने कपड़े पहनकर यहाँ से भागे थे! टी.वी। पर उनको वह जनाना सूट पहने देख मेरा तो हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तो क्या इससे यह साबित नहीं होता कि बाबा रामदेव का आंदोलन सरकार के खिलाफ था और इसीलिए सरकार ने उसका दमन किया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; तनिक अपनी याददाश्त पर जोर डालिए, बाबू साहब! बाबा रामदेव जब इस रामलीला मैदान पर अनशन करने आये थे, तब क्या हुआ था? सरकार के चार-चार मंत्री हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने गये थे। सरकार और बाबा रामदेव के बीच बाकायदा लिखित समझौता हुआ था कि बाबा को किस तरह अनशन करना है और कब खत्म कर देना है। लेकिन मंच पर बैठे बाबा ने जब देखा कि उनका समर्थन करने उनके भक्त ही नहीं आ रहे, बल्कि प्रमुख विपक्षी दल के लोग भी आ रहे हैं, तो शायद उनको लगा कि वे सरकार से किये गये समझौते को तोड़ सकते हैं और प्रमुख विपक्षी दल की राजनीति को आगे बढ़ाकर खुद आगे बढ़ सकते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तो इसमें क्या है! राजनीति में तो ऐसे दाँव-पेंच चलते ही हैं। शास्त्रों में भी लिखा है--शठे शाठ्यं समाचरेत्!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; ठीक! सरकार ने भी रामदेव के साथ यही किया--शठे शाठ्यं समाचरेत्! जब रामदेव तयशुदा हद से बाहर जाकर समझौता तोड़ने लगे, तो सरकार के एक मंत्री ने मीडिया के सामने आकर वह लिखित समझौता जग-जाहिर कर दिया। आखिर कोई सत्ताधारी दल अपने फायदे के लिए चलवाये गये आंदोलन को अपने खिलाफ चलने देकर अपना नुकसान कैसे होने दे सकता है? इसीलिए सरकार ने बाबा और उनके भक्तों को मार भगाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; अच्छा, रामदेव को छोड़, यह बता कि यह जो सिविल सोसाइटी का आंदोलन है, यह तो सचमुच सरकार के खिलाफ है न! अगर है, तो तूने यह कैसे कहा कि सरकार इसकी मदद कर रही है? सरकार ने तो पूरी कोशिश की थी कि यह अनशन दिल्ली में होने ही न पाये!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; आप तो विद्वान हैं, बाबू साहब, जानते ही होंगे कि नूरा कुश्ती क्या होती है। तो यहाँ रामलीला मैदान में इस आंदोलन के शुरू होने के पहले सिविल सोसाइटी और सरकार के बीच जो हुआ, नूरा कुश्ती का नायाब नमूना था। जो इस बात को नहीं समझे, वे यही समझते रहे कि सरकार सिविल सोसाइटी से डर गयी है। शायद उसे डर है कि अण्णा जी ने दिल्ली में अनशन किया, तो उसका तख्ता पलट जायेगा। शायद इसी डर के मारे वह एक पर एक बेवकूफी किये जा रही है। पहले दिल्ली में अनशन करने की इजाजत न देना। फिर अण्णा जी की मनचाही जगह पर अनशन करने की इजाजत न देना। फिर दुनिया भर की ऐसी शर्तें लगाकर, जिनका पालन कोई कर ही न सके, एक जगह अनशन करने की इजाजत देना। और फिर उस जगह पर धारा एक सौ चवालीस लगाना और अण्णा के वहाँ पहुँचने के पहले ही उनको गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल भेज देना। यह सरकार की कमजोरी और बेवकूफी थी या इन दोनों की मिली-भगत?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; मिलीभगत? क्या बकवास करता है! दोनों पक्षों के बीच का तनाव और टकराव मीडिया में साफ दिख रहा था। मीडिया पल-पल की खबर दे रहा था कि सरकार और सिविल सोसाइटी के बीच कैसा घमासान युद्ध चल रहा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; यही तो मीडिया का कमाल है, बाबू साहब! नूरा कुश्ती को असली कुश्ती की तरह दिखाओ और जैसा कि हिंदी फिल्मों में होता है, दोनों पहलवानों में से एक को नायक और दूसरे को खलनायक बनाकर लड़ाओ। पहले खलनायक को नायक पर भारी पड़ता दिखाओ, और फिर नायक को उसके हाथों पिटवाकर दर्शकों की सहानुभूति नायक के पक्ष में करके खलनायक को बेवकूफियाँ करते दिखाओ, ताकि दर्शक सस्पेंस में रहते हुए भी समझ जायें कि अंत में जीत नायक की ही होगी और वे खलनायक पर हँसते हुए इंतजार करने लगें कि वह कब और कैसे हारता है! इस तरह मीडिया ने सिविल सोसाइटी को नायक और सरकार को खलनायक बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; अबे, मीडिया को यह सब करने की क्या पड़ी थी? और वह कब से इतना ताकतवर हो गया कि सरकार और सिविल सोसाइटी जैसे दो बड़े पहलवानों में नूरा कुश्ती करा सके? मीडिया तो, जैसा कि सब कह रहे हैं, इस आंदोलन को माल की तरह बेचकर मुनाफा कमा रहा है; अपनी टी.आर।पी. बढ़ा रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; आप उन ताकतों को भूल रहे हैं, बाबू साहब, जो मीडिया और सरकार दोनों की मालिक हैं। यह सारा तमाशा उनका ही कराया हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तूने फिर इस आंदोलन को तमाशा कहा! यह अगस्त क्रांति, यह आजादी की दूसरी लड़ाई, यह आजादी के बाद का सबसे बड़ा जन-आंदोलन तमाशा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; जन-आंदोलन? यह एक नकली, गढ़ा हुआ और प्रायोजित आंदोलन है, बाबू साहब!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; नकली?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; हाँ, नकली। नकल परीक्षाओं में या फैशन, फिल्म और साहित्य में ही नहीं होती। यहाँ भी हो रही है। गांधीजी की नकल। ‘गांधीगीरी’ की नकल। पुराने जन-आंदोलनों के नारों की नकल। यहाँ तक कि इमरजेंसी के समय के नारे ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ तक की नकल!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; और तूने इसे प्रायोजित भी कहा। वह कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; वह ऐसे कि उधर तिहाड़ जेल में अण्णा जी हीरो बनाये जा रहे थे और इधर भीड़ के भव्य दृश्य दिखाने की पूरी तैयारियाँ कर ली गयी थीं। ‘मैं अण्णा हूँ’ लिखी हजारों-लाखों टोपियाँ, महँगी-महँगी डिजायनर मोमबत्तियाँ और छोटी-बड़ी असंख्य तिरंगी झंडियाँ न जाने कब और कैसे तैयार करा ली गयीं कि ज्यों ही टी.वी. के हाइप के मारे लोग अण्णा जी के समर्थन में अपने घरों से निकलकर आये, फौरन से पेश्तर  उनको उपलब्ध करा दी गयीं। और प्रायोजित नाटक के अंत में सरकार ने अपनी हार मानकर यह रामलीला मैदान सिविल सोसाइटी को अपने खिलाफ आंदोलन करने के लिए सौंप दिया।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; अबे, तू यह कैसी कहानी गढ़ रहा है? जिस वास्तविकता को सारी दुनिया ने देखा है, उसे तू एक फिल्मी सस्पेंस वाली झूठी स्टोरी बनाकर पेश कर रहा है? अच्छा, अगर तेरी इस मनगढ़ंत कहानी पर मैं यकीन कर भी लूँ, तो यह बता कि सरकार को सिविल सोसाइटी से यह नूरा कुश्ती लड़ने की क्या पड़ी थी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; सरकार बड़े संकट में फँसी हुई थी, बाबू साहब! उसके घोटाले-दर-घोटाले सामने आते जा रहे थे और घोटाले भी इतनी बड़ी-बड़ी रकमों के थे कि सरकारों और घोटालों का चोली-दामन का साथ मानकर चलने वालों का भी ध्यान उन पर जा रहा था। सरकार के मंत्री-वंत्री तो फँस ही रहे थे, आँच कारपोरेटियों तक भी पहुँच रही थी। सरकार किसकी है, कैसे बनती है और किसके लिए काम करती है, ऐसी बातें भी खुलकर सामने आने लगी थीं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; जैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; जैसे नीरा राडिया वाला कांड ही लीजिए। उससे सारी दुनिया को पता चल गया कि सरकार में अपने लोगों को घुसाने या अपने मन की सरकार बनवाने के लिए कारपोरेटिए किस तरह की लॉबीइंग कराते हैं और उसके लिए किस तरह मीडिया के दिग्गज बिकते और खरीदे जाते हैं! फिर, जो घोटाले हुए, उनसे यह सवाल उठने ही वाला था कि घोटाला करने वाले मंत्रियों और अफसरों की ही क्यों, उनकी भी गर्दन पकड़ी जाये, जिनको उन घोटालों से फायदा पहुँचा है। मामला आगे बढ़ता, तो कारपोरेटिए फँसते, जैसे कि दो-चार के नाम सामने आ भी गये। अब जमाना है भूमंडलीकरण का, सो कंपनियाँ फँसतीं, तो देशी ही नहीं, विदेशी कंपनियाँ भी फँसतीं और निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों का भी परदाफाश होता। इसलिए सरकार और उसके देशी-विदेशी आकाओं ने सोचा कि इस मामले को कुछ इस तरह घुमा देना चाहिए कि लोगों का ध्यान बँट जाये, घोटालों पर से हटकर कहीं और लग जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लोगों का ध्यान भ्रष्टाचार पर से कैसे हटेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; यही तो है लोहे को लोहे से काटने का कमाल!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; मतलब?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; मान लीजिए, चार चोर पकड़े गये हैं और बाकी डरे हुए हैं कि कहीं वे भी न पकड़े जायें। सो वे सब मिलकर चोर-चोर का शोर मचाते हैं और कहने लगते हैं कि दुनिया में सब चोर हैं। फिर सवाल उठाते हैं कि दुनिया भर के सब चोरों को कैसे पकड़ा जाये? और जवाब देते हैं कि कोई ईश्वर, देवता, साधु, महात्मा ही किसी चमत्कार से इस समस्या को हल कर सकता है। और अपने देश में ऐसे चमत्कारी महापुरुषों की क्या कमी! सो झटपट एक मिनी महात्मा गांधी खोज निकाले गये, जो एक गाँव के नेता थे। उनको मीडिया की मदद से राष्ट्रीय नेता बनाया गया, जन-लोकपाल की माँग करने का आंदोलन चलाया गया और उसमें पैसा तो पानी की तरह बहाया ही गया, मीडिया को भी दिन-रात प्रचार के काम पर लगाया गया। और मीडिया ने ऐसा माहौल बना दिया कि जो इस आंदोलन का समर्थन करे, वह मानो दूध का धुला और जो विरोध या आलोचना करे, वह भ्रष्टाचारी और भ्रष्ट सरकार का हिमायती ही नहीं, देशद्रोही भी! तर्क और विवेक की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गयी। आप नायक के साथ नहीं हैं, तो जरूर खलनायक के साथ हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; यह तू अण्णा जैसे संत महात्मा पर ही नहीं, सिविल सोसाइटी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर ही नहीं, इस आंदोलन में शामिल सारे देश की जनता पर भी कीचड़ उछाल रहा है। मैं तेरी इस मनगढ़ंत कहानी पर कभी यकीन नहीं करूँगा। जा, भाग यहाँ से!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; असभ्य हूँ न, बाबू साहब, सभ्य समाज से भगाया ही जाऊँगा! खैर, चलिए, इसको मेरी मनगढ़ंत कहानी ही मान लीजिए। लेकिन यह बताइए कि अब जबकि सरकार ने सिविल सोसाइटी की शर्तें मान ली हैं और अण्णा जी कल जब अपना अनशन समाप्त कर देंगे, तब क्या होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; जन-लोकपाल बनेगा, और क्या!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; उससे क्या होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; भ्रष्टाचार खत्म होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; लेकिन यह बताइए कि जब सारे नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, तमाम छोटे-बड़े अफसर और तमाम छोटे-बड़े न्यायाधीश भ्रष्ट हो सकते हैं, तो क्या इन सबके भ्रष्टाचार का फैसला करने वाला लोकपाल भ्रष्ट नहीं हो सकता? जनता अपने प्रतिनिधि चुनने में गलती कर सकती है, सरकार अपने अधिकारी और न्यायाधीश नियुक्त करने में गलती कर सकती है, तो क्या सिविल सोसाइटी लोकपाल नियुक्त करने में गलती नहीं कर सकती? और वे देशी-विदेशी कारपोरेटिए, जो पूरी की पूरी सरकारें खरीद सकते हैं, क्या एक लोकपाल को नहीं खरीद सकते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तू तो बड़ी डरावनी बातें करता है, रे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; क्या, बाबू साहब, आप भी! मैं और डरावनी बातें! मैं तो खुद ही डरा हुआ हूँ। मैं तो यह सोचकर ही काँप जाता हूँ कि लोकपाल भी भ्रष्ट निकला या भ्रष्ट बना दिया गया, तब क्या होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; तो क्या यह इतना बड़ा भ्रष्टाचार विरोधी जन-आंदोलन बेकार चला जायेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; नहीं, मैं इस आंदोलन के दो हिस्से मानता हूँ। एक हिस्सा वह, जो एक प्रायोजित कार्यक्रम है और दूसरा वह, जो भ्रष्टाचार से पीड़ित जनता के इसमें शामिल हो जाने से कुछ हद तक सच्चा जन-आंदोलन बन गया है। यह दूसरा हिस्सा बेकार नहीं जायेगा। इससे लोगों में एक नयी समझ और चेतना पैदा हो सकती है। लेकिन प्रायोजित कार्यक्रम जन-आंदोलन नहीं होते, बाबू साहब! कल जब अण्णा जी अपना अनशन खत्म कर देंगे और यहाँ हो रहा यह तमाशा बंद हो जायेगा, तो सब लोग फिल्म देखकर हॉल से निकले दर्शकों की तरह अपने-अपने घर चले जायेंगे और फिर उन्हीं काम-धंधों में लग जायेंगे, जिनमें दूसरों का काम करने पर चाहे वे पूरी ईमानदारी से एक पैसा भी न लें, पर अपना जायज काम कराने के लिए भी उन्हें बेईमानों को पैसा देना पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; यानी भ्रष्टाचार बना रहेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; बना ही रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; कभी दूर नहीं होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; दूर हो सकता है, लेकिन एक शर्त पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;सभ्य :&lt;/span&gt; वह क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;असभ्य :&lt;/span&gt; सिविल-अनसिविल का चक्कर छोड़ एक ऐसी सोसाइटी बनायी जाये, जिसमें जीने के लिए भ्रष्ट होना जरूरी न हो और भ्रष्टाचार गैर-जरूरी होकर खुद-ब-खुद खत्म हो जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रमेश&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-3490239975701362454?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/3490239975701362454/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/3490239975701362454'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/3490239975701362454'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='सभ्यासभ्य संवाद'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-8807861703107526431</id><published>2011-07-13T08:27:00.000-07:00</published><updated>2011-07-13T08:31:16.657-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>याद रहेगी वह लाल मुस्कान</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-jph4CZrkrYU/Th26IuPuXlI/AAAAAAAAAEk/sogcXgro0jA/s1600/chandrabaliji.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 142px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-jph4CZrkrYU/Th26IuPuXlI/AAAAAAAAAEk/sogcXgro0jA/s200/chandrabaliji.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5628859768298692178" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;चंद्रबली जी के साथ बातचीत करने, घूमने-फिरने, यात्रा करने और काम करने का अपना एक अलग ही सुख होता था। पान खाते हुए अपनी लाल मुस्कान के साथ बातचीत करने और गंभीर से गंभीर विषय पर चर्चा करते समय भी उन्मुक्त भाव से हँसने का उनका एक खास आत्मीय अंदाज था, जिसके कारण वे मुझे अपने बुजुर्ग साथी कम और हमदम दोस्त ज्यादा लगते थे। किसी भी विषय पर और किसी भी अवसर पर उनके साथ दिल खोलकर बातें की जा सकती थीं। आज वे नहीं हैं, लेकिन मुझे हमेशा याद रहेगी वह लाल मुस्कान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनसे मेरा परिचय 1980 में ‘कथन’ का प्रकाशन प्रारंभ होने के समय हुआ था, जो जनवादी लेखक संघ (जलेस) की निर्माण प्रक्रिया के दौरान उनके साथ की गयी साहित्यिक यात्राओं में गाढ़ा हुआ और जल्दी ही एक आत्मीय पारिवारिक संबंध में बदल गया। शिमला में हुए जलेस के एक सम्मेलन में मेरी दोनों बेटियाँ प्रज्ञा और संज्ञा भी मेरे साथ गयी थीं, जो तब बच्चियाँ ही थीं। उन्हें सबसे अधिक प्यार चंद्रबली जी से ही मिला। वे कई बार दिल्ली में मेरे घर आये--एक बार तो कई दिन हमारे साथ रहे--और मैं जब भी बनारस गया, उन्हीं के यहाँ ठहरा। वे ‘कथन’ के सलाहकार मंडल में भी थे। हम जलेस के संस्थापक सदस्य थे तथा बाद में उसकी केंद्रीय कार्यकारिणी में भी साथ-साथ सक्रिय रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रबली जी को लोग प्रायः आलोचक तथा अनुवादक के रूप में जानते हैं। वे कैसे आलोचक थे, इसका कुछ अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने आलोचना लिखना बंद कर दिया, तो उनसे पुनः लिखना शुरू करने का आग्रह करने वालों में अन्य अनेक साहित्यकारों के अलावा उनके घनिष्ठ मित्र रामविलास शर्मा भी थे। एक बार रामविलास जी ने अपनी एक पुस्तक उन्हें भेंट करते हुए उन्हें उत्तेजित-उत्प्रेरित करने के लिए उस पर लिखा, ‘‘भूतपूर्व आलोचक चंद्रबली सिंह के लिए’’ और पुस्तक उन्हें देते हुए कहा, ‘‘जब तुम फिर से लिखना शुरू कर दोगे, तो लिखूँगा--अभूतपूर्व आलोचक चंद्रबली सिंह के लिए।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि चंद्रबली जी मूलतः कवि थे। एक बार उन्होंने मुझे बताया था कि उन्होंने 1947 के आसपास कविताएँ लिखना शुरू किया था। वैसे साहित्य में उनकी रुचि विद्यार्थी जीवन से ही थी और यशपाल, राहुल सांकृत्यायन आदि की किताबें पढ़कर समाजवादी विचारों की तरफ उनका झुकाव भी हो गया था, लेकिन सर्वप्रथम वे कवि थे, कवि के नाते ही प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) से जुड़े और फिर कम्युनिस्ट पार्टी से। उन्होंने मुझे बताया, ‘‘वह बड़ा भयानक दौर था। खास तौर से 1948 के बाद। भारत का विभाजन, कश्मीर पर हमला, कम्युनिस्टों का दमन--इन सब घटनाओं का असर आदमी के दिल और दिमाग पर उस वक्त बहुत पड़ता था। उस जमाने में मैंने इन्हीं विषयों पर कविताएँ लिखीं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पूछा, ‘‘उस समय आपकी उम्र क्या थी?’’ तो हँसकर बोले, ‘‘अपने बाप की लिखायी हुई उम्र बताऊँ या असली उम्र बताऊँ? असली उम्र का पता नहीं, पिता के द्वारा लिखायी गयी उम्र के अनुसार मैं उस समय तेईस बरस का था। तो उस समय की परिस्थितियाँ मुझे बहुत उद्वेलित करती थीं और मैं हर सप्ताह कई कविताएँ लिख लेता था। रतलाम से ‘जनमत’ नाम की साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी। शायद ही कोई सप्ताह जाता हो कि उसके कवर पर मेरी कविता न जाती हो।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अपने लेखन को पुस्तकाकार प्रकाशित कराने में उनकी बहुत रुचि नहीं थी। मैंने पूछा, ‘‘कोई संकलन निकला आपका?’’ तो बोले, ‘‘कोई संकलन नहीं। अब तो शायद लोग मेरी कविताओं को भूल भी गये होंगे। जो मेरे उस जमाने के दोस्त हैं, वे ही जानते हैं। डॉक्टर रामविलास शर्मा मजाक करते हैं कि एक बार वे भोपाल या कहीं गये, तो वहाँ एक मजदूर उनसे पूछता है कि चंद्रबली सिंह की कविताएँ आजकल देखने को नहीं मिल रही हैं। बाद में प्रगतिशील आंदोलन में जो बिखराव आया, उसमें मेरा कविता लिखना छूटा और अपनी शक्ति का इस्तेमाल मैंने आलोचना लिखने में करना शुरू किया। लेकिन कविता से मेरा प्रेम समाप्त नहीं हुआ। उस जमाने में मैंने वॉल्ट व्हिटमैन की बहुत-सी कविताओं का अनुवाद किया, जो पत्र-पत्रिकाओं में छपीं। बाद में दूसरे कवियों की भी बहुत-सी कविताओं के अनुवाद किये।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अपने आलोचनात्मक लेखन को संकलित करने के प्रति वे उदासीन रहे। उनसे जब मेरा परिचय हुआ, तब तक उनकी एक ही पुस्तक छपी थी ‘लोक दृष्टि और हिंदी साहित्य’। बाद में एक और छपी ‘साहित्य का जनपक्ष’। उनके अनुवादों के संकलन और भी बाद में छपे।&lt;br /&gt;एक बार देवकीनंदन खत्री के बारे में बात हो रही थी। चंद्रबली जी ने बताया कि देवकीनंदन खत्री पर पहला गंभीर आलोचनात्मक लेख उन्होंने ही लिखा था। उन्होंने कहा, ‘‘उसमें मैंने बताया था कि खत्री के लेखन में सामंतवाद-विरोधी प्रगतिशील दृष्टि है। उसमें सामंती समाज में नारी की स्थिति के प्रति विरोध का भाव है। उद्यम के महत्त्व को बताया गया है। तर्क और युक्ति पर जोर दिया गया है। अंग्रेजों द्वारा पैदा की जा रही हिंदू-मुस्लिम फूट की नीति का विरोध है। इन सब चीजों का उल्लेख पहले किसी ने नहीं किया था। शुक्ल जी ने भी अपने इतिहास में यह काम नहीं किया था।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रबली जी प्रलेस से जुड़ने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। इसके बारे में उन्होंने मुझे बताया, ‘‘आगरे में रहते समय मैं जिन लोगों के संपर्क में आया, वे मुझे बहुत अच्छे और लगन वाले आदमी मालूम हुए। इसका मुझ पर बड़ा अच्छा असर पड़ा। लेकिन जुलाई, 1950 तक--जब तक मैं आगरे में रहा--मैं कम्युनिस्ट पार्टी का मेंबर नहीं था। मेंबर बना उसके बाद बनारस जाने पर। आगरे से बनारस पहुँचकर मैंने वहाँ प्रलेस की स्थापना की। लेकिन उस समय तक पार्टी की नीति को लेकर उसके अंदर मतभेद शुरू हो गये थे और इस चीज का असर प्रलेस पर भी पड़ रहा था। नामवर सिंह उस समय बनारस में ही थे और पंत को लेकर मुझसे बहुत बहस किया करते थे। उन्होंने उसी समय लिखना शुरू किया था। प्रकाशचंद्र गुप्त वगैरह मुझसे और डॉक्टर शर्मा से उस समय बहुत कुपित थे और हम लोगों को संकीर्णतावादी कहा करते थे।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रबली जी मानते थे कि प्रलेस में एक विसर्जनवादी प्रवृत्ति मौजूद थी--कि आजादी के बाद उसकी कोई जरूरत नहीं रह गयी है, उसे विसर्जित कर देना चाहिए। इस प्रवृत्ति के बारे में उनका कहना था, ‘‘उसमें विसर्जनवादी प्रवृत्ति पहले से मौजूद थी, लेकिन बड़े पैमाने पर वह सामने आयी 1953 में, जब दिल्ली में प्रलेस का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। कुछ लोगों को ऐसा महसूस हुआ था कि इस संगठन को खत्म करके एक नया संगठन बनाया जाये। यानी लेखकों के कार्यभार नये दौर में क्या हो सकते हैं, इसको फिर से डिफाइन किया जाये और पिछली गलतियों की आलोचना करते हुए एक नये घोषणापत्र के साथ एक नया संगठन बनाया जाये। लेकिन पुरानी चीज के साथ लोगों का एक भावनात्मक रिश्ता भी होता है। फिर, उस जमाने में प्रगतिशील लेखकों का काफी दमन हुआ था। इसलिए यह तय हुआ कि प्रलेस चलेगा। लेकिन जो नया नेतृत्व आया, वह अति-उदारतावादी था। डॉक्टर रामविलास शर्मा की जगह पर कृश्नचंदर महासचिव चुने गये और इन लोगों की समझ यह थी कि बहुत ज्यादा मिर्चा खा लिया है, अब चीनी फाँक लो!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहते हुए चंद्रबली जी जोर से हँसे। लेकिन तुरंत ही गंभीर होकर बोले, ‘‘अफसोस की बात यह है कि पुरानी गलतियों को सुधारने के नाम पर यह जो अति-उदारतावाद अपनाया गया, इसका विश्लेषण कभी नहीं किया गया। आप कह सकते हैं कि यह और भी बड़ी गलती थी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इन गलतियों के कारण प्रलेस डूबा। मैं समझता हूँ कि गलतियाँ किसी से भी हो सकती हैं। और यदि कोई संगठन अपनी गलतियों का सही विश्लेषण करके उन्हें सुधारता चलता है, तो वह जिंदा रह सकता है। लेकिन प्रलेस के नये नेतृत्व ने अपनी गलती को सुधारना तो दूर, उसको समझने तक की कोशिश नहीं की।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पूछा, ‘‘आप लोगों ने इस चीज के खिलाफ संघर्ष नहीं चलाया?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर में चंद्रबली जी ने कहा, ‘‘संघर्ष तो हमने चलाया। ‘स्वाधीनता’ वगैरह में उस समय हमारे जो लेख निकले, वे उन लोगों की समझ के खिलाफ थे। और उनमें उस समझ के कुछ संकेत आपको मिल सकते हैं, जो अब आकर हमारे जनवादी लेखक संघ के घोषणापत्र में व्यक्त हुई है। लेकिन वह संघर्ष संगठित रूप से नहीं चल पाया। आजादी के बाद जो परिवर्तन हुआ था, शासक वर्ग ने जो भ्रम फैलाये थे, साम्राज्यवादी संस्कृति का जो आक्रमण हमारी संस्कृति पर हो रहा था, साहित्य में ‘नयी कविता’ और प्रयोगवाद के नाम पर जो घातक प्रवृत्तियाँ आ रही थीं, उनके खिलाफ प्रगतिशील लेखकों को वैचारिक संघर्ष करना चाहिए था। कुछ लोगों ने किया भी। जैसे मैंने ‘नयी कविता’ के वैचारिक आधार अस्तित्ववाद पर आक्रमण किया। ‘नयी कविता’ और अस्तित्ववाद का यह संबंध मैंने ही पहली बार दिखाया था। लेकिन यह संघर्ष संगठित नहीं था।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1982 में जब जलेस की स्थापना हुई, लेखक और संगठन तथा साहित्य और विचारधारा से संबंधित प्रश्नों पर तीखी बहसें हुईं, जिनमें विभिन्न लेखक संगठनों में शामिल तथा उनसे बाहर के लेखकों ने भी भाग लिया। उस समय मैंने चंद्रबली जी का एक लंबा इंटरव्यू लिया और ‘कथन’ के मार्च-अप्रैल, 1983 के अंक में ‘साहित्य और जनवाद’ शीर्षक से प्रकाशित किया। उसमें मेरा एक प्रश्न था, ‘‘कुछ लेखक, चंद्रबली जी, ऐसे भी हैं, जो संगठन की आवश्यकता को ही नकारते हैं। वे मानते हैं कि लेखन एक व्यक्तिगत कर्म है, संगठन उसमें कोई मदद नहीं कर सकता। ऐसे लेखकों के बारे में आप क्या कहते हैं?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रबली जी ने उत्तर दिया, ‘‘वही कहता हूँ, जो मैंने जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन में श्रीमती मन्नू भंडारी का वक्तव्य सुनने के बाद कहा था। ऐसे लेखकों से यह पूछना चाहिए कि क्या आज प्रतिक्रियावादी ताकतें बड़े ही योजनाबद्ध और संगठित तरीके से हमारे ऊपर तरह-तरह के आक्रमण नहीं कर रही हैं? क्या आज कलम की आजादी पर शासक वर्ग की ओर से संगठित आक्रमण नहीं हो रहा है? क्या इस आक्रमण का मुकाबला लेखक अलग-थलग और अकेला रहकर कर सकता है? हम इस सचाई से इनकार नहीं करते कि रचना-कर्म एक वैयक्तिक कर्म है, लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वह एक सामाजिक कार्य भी है। रचना को दूसरों तक पहुँचना है और समाज की संपूर्ण व्यवस्था में से गुजरकर पहुँचना है। और मौजूदा व्यवस्था में लेखक के आर्थिक हित ही खतरे में नहीं पड़ते, उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी खतरे में है। फिर, जनवादी लेखक एक खास तरह के लेखक हैं। वे सामाजिक परिवर्तन के लिए लड़ने वाले लेखक हैं और वे संगठित होकर ही सामाजिक परिवर्तन में अपनी भूमिका निभा सकते हैं, ताकि साहित्य के माध्यम से समाज को बदलने की लड़ाई जनता के हित में लड़ सकें।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘एक बात और: लेखकों को अपनी शक्ति को कम करके नहीं आँकना चाहिए। यह उनकी शक्ति का ही प्रमाण है कि व्यवस्था तरह-तरह के प्रलोभन देकर या भय दिखाकर उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश करती है। इसीलिए जो लेखक उसके पक्ष में नहीं हैं, उन्हें वह संगठित होने से रोकने के प्रयास करती है, ताकि उन्हें अलग-अलग पीट सके। इसलिए हमें उन लेखकों को, जो जनवाद की लड़ाई लड़ने के लिए तो तैयार हैं, लेकिन संगठन के महत्त्व को नहीं समझते, बड़ी सहिष्णुता के साथ यह समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि अलग-थलग रहने और संगठन का विरोध करने के लिए प्रेरित करने वाली उनकी व्यक्तिवादी विचारधारा दरअसल शासक वर्ग की विचारधारा है, जिसके विरुद्ध उन्हें संघर्ष करना है। इसके लिए हमें ऐसे लेखकों से वैचारिक संघर्ष चलाना चाहिए और उनके मन में बैठे हुए या बिठाये गये ऐसे भ्रमों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए कि संगठन सब लेखकों से एक तरह का लिखने की माँग करता है या उन्हें निर्देशों पर लिखने के लिए मजबूर करता है। हमने तो अपने घोषणापत्र में लेखकों के लिए विषय, वस्तु, रूप और शिल्प संबंधी तमाम विविधताओं को स्वीकार किया है और लेखकों को कलात्मक अभिव्यक्ति के मामले में पूरी स्वतंत्रता देने की बात कही है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक संगठनों के संदर्भ में विचारधारा का प्रश्न हमेशा एक मुख्य प्रश्न रहा है। इस पर चली बहसों, उनके दौरान सामने आये वैचारिक मतभेदों और उन्हें दूर करने के लिए किये गये प्रयासों के बावजूद इस प्रश्न पर अस्पष्टता बनी रही है। चंद्रबली जी मार्क्सवादी थे, लेकिन व्यक्तिगत रूप से तो क्या, जनवादी लेखक संघ का नेतृत्व करते हुए भी किसी पर अपनी विचारधारा थोपने की कोशिश नहीं करते थे। उनका मानना था कि लेखक संगठन एक संयुक्त मोर्चा होता है और संयुक्त मोर्चे में नेतृत्व कौन-सी विचारधारा करे, इस सवाल पर यांत्रिक तरीके से विचार नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका कहना था, ‘‘हम न तो किसी लेखक पर अपनी विचारधारा थोप सकते हैं, न उसको मानने की शर्त लगा सकते हैं। शर्त तो केवल जनवाद की रक्षा और विस्तार की लड़ाई में साथ आने की है। इसके बाद किस विचारधारा का नेतृत्व लोग मानेंगे, यह इस पर निर्भर करेगा कि कौन-सी विचारधारा उन्हें सबसे ज्यादा सही और अच्छी लगती है। मार्क्सवादी विचारधारा का नेतृत्व लेखक कब मानेंगे? जब मार्क्सवादी लेखक हमारी जनता के जीवन के यथार्थ-चित्रण के सर्वोत्कृष्ट नमूने प्रस्तुत करेंगे। यानी सबसे ज्यादा सुंदर, कलात्मक, उत्कृष्ट रचनाएँ मार्क्सवादी लेखकों की होंगी, और जनता के संघर्षों को आगे बढ़ाने में मार्क्सवादी लेखक सबसे ज्यादा आगे बढ़कर काम करेंगे, सबसे ज्यादा त्याग करेंगे। तब दूसरे लोग अपने-आप यह महसूस करेंगे कि नेतृत्व मार्क्सवादी विचारधारा कर रही है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश, निरे नेतृत्वकामी ‘मार्क्सवादियों’ ने इस सच्चे मार्क्सवादी को सुना और गुना होता!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-8807861703107526431?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/8807861703107526431/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/8807861703107526431'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/8807861703107526431'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='याद रहेगी वह लाल मुस्कान'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-jph4CZrkrYU/Th26IuPuXlI/AAAAAAAAAEk/sogcXgro0jA/s72-c/chandrabaliji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-7029563740673790738</id><published>2011-06-17T09:12:00.000-07:00</published><updated>2011-06-17T09:18:49.403-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>भविष्योन्मुखी कहानी का मतलब</title><content type='html'>‘परिकथा’ के तीन ‘युवा कहानी अंक’ मेरे सामने हैं। यद्यपि मैं ‘युवा कहानी’ को एक ‘मिसनोमर’ मानता हूँ और चाहता हूँ कि आज की कहानी को रचनाकारों की उम्र से जोड़कर देखने के बजाय उनकी रचनाशीलता को आज के यथार्थ से जोड़कर कोई सार्थक नाम दिया जाये, तथापि मैं ‘परिकथा’ के संपादक शंकर को इस विशाल एवं भव्य आयोजन के लिए और इसे संभव बनाने के लिए इसमें शामिल रचनाकारों को बधाई देता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इसे एक विशाल एवं भव्य आयोजन केवल इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि इन तीनों बृहदाकार अंकों की कुल पृष्ठ संख्या लगभग साढे़ चार सौ है, इनमें नये कहानीकारों की इक्यावन कहानियाँ हैं, अठारह नये कहानीकारों के आज की कहानी से संबंधित प्रश्नों पर व्यक्त किये गये विचार हैं और पाँच वरिष्ठ कथाकारों के नये कथाकारों द्वारा लिये गये साक्षात्कार हैं; यह आयोजन इस दृष्टि से भी विशाल एवं भव्य है कि इसके जरिये आज की हिंदी कहानी को रचनात्मक एवं वैचारिक दोनों धरातलों पर समझने में सहायक विपुल सामग्री पाठकों को उपलब्ध करायी गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘युवा कहानी’ और ‘युवा कहानीकारों’ का जिक्र होने पर पहले ‘वागर्थ’ और फिर ‘नया ज्ञानोदय’ के जरिये कहानीकारों की एक नयी पीढ़ी को सामने ले आने का श्रेय स्वयं ही लेने को आतुर रहने वाले रवींद्र कालिया का ध्यान आता है। लेकिन वे नयी पीढ़ी को एक नये उत्पाद की तरह बाजार में ले आने का उत्सव-सा मनाते और उसका विज्ञापन तथा प्रचार करते हुए उसकी मार्केटिंग-सी करते नजर आते हैं, जबकि शंकर पहले ‘अब’ के और अब ‘परिकथा’ के संपादक के रूप में अपने ‘नवलेखन’ तथा ‘युवा कहानी’ विशेषांकों के जरिये रवींद्र कालिया की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में नये रचनाकारों को सामने लाने के बावजूद इसका श्रेय लेने या इसका डंका पीटने की कोशिश नहीं करते। उनकी कोशिश नये रचनाकारों को बाजारोन्मुख बनाने के बजाय समाजोन्मुख बनाने की रहती है। इसके लिए वे नये रचनाकारों के प्रति परम आत्मीयता रखते हुए भी उनकी सख्त आलोचना करने से नहीं चूकते। उदाहरण के लिए, युवा कहानी अंक-1 के संपादकीय में उन्होंने उल्लेख किया है कि 1974 में जब उन्होंने ‘अब’ का तीसरा अंक बिलकुल नये लेखकों पर केंद्रित किया था, तब अपने समय के महत्त्वपूर्ण कथा-समीक्षक सुरेंद्र चौधरी ने उन्हें एक पत्र में लिखा था कि नये लेखकों की कहानियाँ आसपास मौजूद स्थितियों के रोजमर्रापन को रेखांकित करें, यह तो ठीक है, किंतु यदि वे उसी में बँधी रहें और स्थितियों के पार न जायें, तो यह उनकी नाकामी है। शंकर ने इसी के आधार पर अपने संपादकीय को शीर्षक दिया है ‘स्थितियों के पार’ और उसमें लिखा है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘युवा कथाकार से हमेशा यह अपेक्षा रहती है कि वह आसपास मौजूद स्थितियों में चाहे जितनी भी तन्मयता और तल्लीनता से डूबे और उनमें रमे, लेकिन उसकी सोच का एक हिस्सा उन स्थितियों के पार भी जाये। जब कोई कहानी स्थितियों के पार की तरफ भी कुछ सूत्रों के सहारे, कुछ कल्पना-परिकल्पना के सहारे, कुछ संवादों के सहारे, पात्रों की मानसिक हलचलों के सहारे या किसी पात्र की सोच के सहारे जाती है, तभी मौजूद परिस्थितियों के समानांतर कोई विकल्प भी झिलमिलाता है, कोई स्वप्न आहिस्ता से उठ खड़ा होता है, कोई रोशनी की लकीर अनायास फूट पड़ती है। इधर की अधिकांश चर्चित युवा कहानियाँ आसपास मौजूद स्थितियों की गहराई में बहुत तन्मयता के साथ डूबकर लिखी गयी कहानियाँ हैं, लेकिन उनमें स्थितियों के पार देख पाने की स्थितियाँ शायद ही कहीं दिखायी पड़ती हैं। ये चेतना और बोध के स्तर पर सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त रहकर किये गये लेखन कार्य के दृष्टांत हैं, यह विलक्षण रचनाशीलता के दौर के शोक-कथाओं के दौर में बदल जाने का सिलसिला भी है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नये कहानीकारों को बाजार से परहेज नहीं है, बल्कि बाजार में प्रतिष्ठित और सफल होने के लिए जो भी साधन उपलब्ध हों, उनका इस्तेमाल कर लेना वे उचित और आवश्यक समझते हैं, लेकिन रचनाकार होने के नाते वे अपने और अपनी रचना के, साहित्य और समाज के तथा समूची दुनिया के भविष्य के बारे में भी सजग हैं। दो शब्दों में कहूँ, तो कहानीकारों की यह नयी पीढ़ी निरी बाजारोन्मुखी नहीं, भविष्योन्मुखी भी है। शायद इसीलिए वह ‘नया ज्ञानोदय’ में छपने के साथ-साथ ‘परिकथा’ में भी छपना चाहती है, जिसके संपादक उन्हें पूरा महत्त्व देकर प्रकाशित करने के साथ-साथ उनकी सख्त आलोचना करके उन्हें सही दिशा दिखाने से नहीं चूकते। युवा कहानी अंक-3 के संपादकीय में शंकर ने लिखा है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जिस तरह कोई भी सभ्यता अपनी अधिरचना भी पैदा करती है, उसी तरह बाजार भी अपनी अधिरचना खड़ी करने में लगा हुआ है। इसी अधिरचना से (साहित्य, संस्कृति, कला जिसके अनिवार्य हिस्से हैं), वे जो साहित्य की लोकोन्मुखता की परंपरा से जुड़े हैं, सीधे रू-ब-रू हैं। दृष्टियों और मूल्यों की टकराहट साहित्य, संस्कृति, कला की दुनिया में बहुत स्वाभाविक रूप से शुरू हो गयी है। विचारधारा का अंत, इतिहास का अंत, यथार्थ से निरपेक्षता और उसका इनकार, अंतर्वस्तु से परहेज, अंतर्वस्तु की जगह भाषा-शिल्प या कला विन्यास की सर्वोच्चता, समाज के मुद्दों की जगह हल्के-फुल्के विषयों की स्थापना, वैचारिक रुझानों की जगह मनोरंजन के पक्ष, चुटकुलों और लतीफों का साहित्यिक रूपांतरण, गहरी और समझदारी भरी पाठकीयता की जगह रोचकता का पक्ष, वैयक्तिकता का ग्लैमराइजेशन, दूसरों की चिंता से परहेज, मनुष्य-समुदाय और समाज से निरपेक्षता--ये स्थापनाएँ, प्रवृत्तियाँ और अपेक्षाएँ साहित्य में बाजार की संस्कृति और उसके मूल्यों के ही प्रतिबिंबन हैं। कहना न होगा कि साहित्य जिस हद तक मनुष्यता और समाज का पक्षधर है, उस हद तक वह बाजार का प्रतिपक्ष है। ये टकराहटें अलग-अलग रूपों में युवा कहानी में भी मौजूद हैं। हमें यह विश्वास है कि युवा कहानी अंततः लोकोन्मुखता की धारा से ही जुड़ेगी और समाज के पक्ष में ही खड़ी होगी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नये कहानीकारों से ऐसी बातें इतनी बेबाकी से वही संपादक कह सकता है, जो स्वयं तो विवेकवान है ही, अपने रचनाकारों को भी विवेकवान बनाने का इच्छुक है। इन तीन विशेषांकों के जरिये जितना बड़ा काम शंकर ने किया है, उसका अहसास उन्हें है, लेकिन उसका श्रेय लेने तथा रचनाकारों पर अहसान जताने के बजाय वे कहानी के पाठकों तथा समीक्षकों से कहते हैं कि ‘‘तीन अंकों में प्रकाशित ये पचास-इक्यावन कहानियाँ एक नया कारवाँ रचती हैं। ये नये बोध, नये संज्ञान की कहानियाँ हैं। इनसे युवा कहानी की एक नयी पहचान अन्वेषित होती है और एक नया चेहरा उभरकर सामने आता है। इनमें कम से कम पचीस कहानियाँ जरूर ऐसी हैं, जिनकी चर्चा के बगैर युवा कहानी की चर्चा अधूरी रहेगी। इनकी चर्चा न हो, तो यह इनके साथ नाइंसाफी भी होगी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने इन तीनों अंकों की सभी कहानियाँ पढ़ी हैं और मुझे शंकर का यह दावा गलत नहीं लगता। मैं इन कहानियों में से अपनी पसंद की कहानियों की एक सूची बनाऊँ, तो वह कुछ इस प्रकार की होगी--प्रियदर्शन की ‘शेफाली चली गयी’, संजय कुंदन की ‘डार्क रूम’, हरिओम की ‘जिंदगी मेल’, अरुण कुमार ‘असफल’ की ‘तरबूज का बीज’, रवींद्र स्वप्निल प्रजापति की ‘टीन टप्पर’, आनंद वर्धन की ‘सिवइयाँ’, प्रेम रंजन अनिमेष की ‘सात सहेलियाँ खड़ी-खड़ी...’, राकेश बिहारी की ‘बिसात’, सत्यनारायण पटेल की ‘गम्मत’, वसंत त्रिपाठी की ‘घुन’, अशोक कुमार पांडेय की ‘पागल है साला’, चरण सिंह पथिक की ‘परछाइयों में गुलाब’, घनश्याम कुमार ‘देवांश’ की ‘दुनिया खतरे में है’, पंकज मित्र की ‘बिजुरी महतो की अजब दास्तान’, अजय नावरिया की ‘गंगासागर’, विमल चंद्र पांडेय की ‘हाइवे पर कुत्ते’, प्रत्यक्षा की ‘दिल, दो लड़कियाँ और एक इतना-सा नश्तर’, सुभाष चंद्र कुशवाहा की ‘रात के अँधियारे में’, एम. हनीफ मदार की ‘सपने जैसा सपना’, विवेक मिश्र की ‘घड़ा’, मजकूर आलम की  ‘पानीदार...’, इंदिरा दांगी की ‘हमें मुस्कराना आता है’, प्रमोद कुमार बर्णवाल की ‘थूक से सना हुआ चेहरा’ और विपिन चौधरी की ‘हुक्का-पानी’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कहानियाँ (और बाकी जो छूट गयी हैं, शायद वे भी) अपने-अपने ढंग की ‘अच्छी’ कहानियाँ हैं। मगर इनको पढ़ते हुए मुझे एक अजीब-सी बेचैनी महसूस होती रही और मैं सोचता रहा: क्या इन कहानियों में आज का यथार्थ आ रहा है? नहीं आ रहा है, तो क्यों नहीं आ रहा है? ये कहानियाँ निरे वर्तमान और उसके रोजमर्रापन तक ही सीमित क्यों रहती हैं? उसके पार क्यों नहीं जातीं? इनमें से ज्यादातर शहरी और शिक्षित मध्यवर्ग तक ही और उसमें भी प्रायः लेखकों के अपने आसपास के ‘‘जिये-भोगे यथार्थ’’ तक ही सीमित अनुभववादी या प्रकृतवादी कहानियाँ ही क्यों हैं? इनमें गरीब, अशिक्षित, ग्रामीण, दलित, आदिवासी, किसान, मजदूर और उनके संगठनों, आंदोलनों तथा संघर्षों का यथार्थ, जो वर्तमान परिस्थितियों में एक देश का स्थानीय यथार्थ न रहकर भूमंडलीय यथार्थ बन चुका है, क्यों नजर नहीं आता? इनमें से ज्यादातर कहानियाँ (पुरुषों द्वारा लिखी गयी कहानियाँ भी) स्त्रियों पर और उनके माध्यम से व्यक्त सेक्स और हिंसा पर केंद्रित क्यों हैं? इक्यावन में से बमुश्किल चार कहानियाँ ही जन-संगठन तथा जन-आंदोलन से संबंधित हैं। पंकज मित्र की ‘बिजुरी महतो की अजब दास्तान’, विमल चंद्र पांडेय की ‘हाइवे पर कुत्ते’, सुभाष चंद्र कुशवाहा की ‘रात के अँधियारे में’ और अशोक कुमार पांडेय की ‘पागल है साला’। मगर इनमें भी जन-संगठन तथा जन-आंदोलन नेपथ्य में सांकेतिक रूप में और प्रायः पस्त या पराजित रूप में ही दिखते हैं। आखिर क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर पाने के लिए मैंने तीनों अंकों में आयोजित परिचर्चा ‘युवा कहानी और उसका समय’ में कहानीकारों द्वारा व्यक्त विचार पढ़े। पत्रिका की ओर से पूछा गया एक प्रश्न है--‘‘हिंदी कहानी की लगभग सौ वर्षों की जो परंपरा है, आपके अपने रचनाकर्म के लिए उसकी क्या प्रासंगिकता है?’’ मैं इस प्रश्न के उत्तर में कहानीकारों द्वारा गिनाये गये नामों को देखकर चकित रह गया। उनमें प्रेमचंद, यशपाल, भैरव प्रसाद गुप्त, अमरकांत, मार्कंडेय, शेखर जोशी, नागार्जुन, मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई, भीष्म साहनी, रमाकांत, रमेश उपाध्याय, विजयकांत, इसराइल, नमिता सिंह, विजेंद्र अनिल, असगर वजाहत, अरुण प्रकाश, सतीश जमाली, सुरेश कांटक, शंकर, अभय, नर्मदेश्वर आदि प्रगतिशील-जनवादी कथाकारों का नामोल्लेख तक नहीं है! इतना ही नहीं, हिंदी कहानी के विभिन्न आंदोलनों का भी, विशेष रूप से प्रगतिशील-जनवादी कहानी के आंदोलन का भी कोई जिक्र नहीं है। अथवा जिक्र है, तो नकारात्मक रूप में, जैसे अंक-2 में प्रेम भारद्वाज का वक्तव्य है कि ‘‘एक दौर में जब विचारधारा के फ्रेम में रचने का प्रचलन जोरों पर था, कई सतही और उपदेशात्मक रचनाएँ सामने आयीं, खासकर कथा आंदोलन के दौर में। आज उन कहानियों और कहानीकारों का नामलेवा भी नहीं बचा है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी साहित्य में ‘विचारधारा’ का मतलब मार्क्सवादी या प्रगतिशील-जनवादी विचारधारा होता है (जैसे और कोई विचारधारा तो विचारधारा होती ही नहीं) और ‘युवा कहानीकार’ लगभग सर्वसम्मति से यह मानते प्रतीत होते हैं कि इस विचारधारा और इस कथा-परंपरा से उनका कोई लेना-देना नहीं है! शायद इन ‘युवा कहानीकारों’ ने सोवियत संघ के विघटन के बाद पूँजीवाद की ओर से किये गये इस धुआँधार प्रचार को सच मानकर आत्मसात कर लिया है कि समाजवाद समाप्त हो गया, मार्क्सवाद अप्रासंगिक हो गया, प्रगतिशील-जनवादी साहित्य बेकार हो गया, साहित्यिक आंदोलन गैर-जरूरी हो गये...इत्यादि। कहना न होगा कि यह भी एक विचारधारा है। आज के पूँजीवाद और साम्राज्यवाद को बहुत रास आने वाली विचारधारा। जन-विरोधी और जनतंत्र-विरोधी विचारधारा। समाज-विरोधी और समाजवाद-विरोधी विचारधारा। यह विचारधारा रचनाकार को वर्तमान स्थितियों के पार नहीं देखने देती, अतः उसे भविष्योन्मुखी नहीं बनने देती, बल्कि बाजारोन्मुखी बना देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विचारधारा से प्रेरित रचनाकार न तो आज के यथार्थ को उसकी पूरी व्यापकता में देख पाता है और न अपने रचनाकर्म से आज की परिस्थितियों के अनुरूप यथार्थवाद का विकास करते हुए अपने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा से जुड़कर उसे आगे बढ़ा पाता है। वह यथार्थवादी बनने की जगह यथास्थितिवादी बन जाता है। इसीलिए वह दुनिया को सुधारने, सँवारने, बदलने और बेहतर बनाने में सक्षम शक्तियों तथा उनके संगठनों और आंदोलनों से जुड़ने की जगह उनका विरोधी बन जाता है। सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से ही नहीं, वह साहित्यिक आंदोलनों से भी नफरत करता है और उनसे दूर रहना ही उचित समझता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं शिद्दत से एक साहित्यिक आंदोलन की जरूरत महसूस करता हूँ, क्योंकि आज का समय आंदोलनों का समय है। आज दुनिया भर में तरह-तरह के आंदोलन चल रहे हैं। अमोरी स्टार अपनी किताब ‘ग्लोबल रिवोल्ट’ में ठीक ही कहती हैं कि आज की दुनिया में एक महासंघर्ष चल रहा है। पूँजीवादी भूमंडलीकरण के विरुद्ध एक गैर-पूँजीवादी भूमंडलीकरण के लिए किया जाने वाला संघर्ष। ‘‘ऊपर से किये जा रहे भूमंडलीकरण’’ के विरुद्ध ‘‘नीचे से हो रहे भूमंडलीकरण’’ का संघर्ष। यह संघर्ष विभिन्न प्रकार के आंदोलनों के रूप में चल रहा है और दुनिया भर के ये आंदोलन ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ जैसे मंचों पर एकत्र भी हो रहे हैं। इनमें से कई आंदोलन सफल भी हो रहे हैं। जैसे अरब देशों के तानाशाहों के विरुद्ध जारी आंदोलन। या हमारे यहाँ भ्रष्टाचार के विरुद्ध चला अण्णा हजारे का आंदोलन। इन आंदोलनों की सफलता पूरी है या अधूरी, वास्तविक है या अवास्तविक, स्थायी है या क्षणिक, यह बात अलग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे समय में किसी भी आंदोलन की बात से जनगण उत्साहित हो जाते हैं और स्थापित सत्ताएँ, चाहे वे साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र की सत्ताएँ ही क्यों न हों, चिंतित और भयभीत हो जाती हैं। अतः वे एक तरफ तो यह प्रयत्न करती हैं कि कोई आंदोलन शुरू ही न हो पाये और दूसरी तरफ यह कि भ्रामक प्रचार के जरिये समस्त आंदोलनों को गलत, गैर-जरूरी, अवांछित और खतरनाक बताकर बदनाम किया जाये, ताकि लोग उनसे दूर ही रहें और जब स्थापित सत्ताएँ नितांत अमानवीय, गैर-जनतांत्रिक या तानाशाही तरीकों से उनका दमन करें, तो लोग खामोश रहें। आज साहित्य के क्षेत्र में भी यही स्थिति दिखायी दे रही है। साहित्यिक आंदोलनों को बदनाम किया जाता है, उनका दमन किया जाता है और बहुत-से नये रचनाकार इसका विरोध करने के बजाय आंदोलनों के ही विरोधी बन जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए ‘परिकथा’ के युवा कहानी अंक-1 में प्रकाशित अशोक कुमार पांडेय से हुई अपनी बातचीत में मैंने कहा था कि नये कहानीकारों को एक नया आंदोलन चलाना चाहिए। बहुत-से नये कहानीकारों ने इस विचार का स्वागत और समर्थन किया। ‘परिकथा’ के अगले अंकों में इस आशय के कई पत्र प्रकाशित हुए। व्यक्तिगत रूप से मुझे जो प्रतिक्रियाएँ मिलीं, उनमें बार-बार एक सुझाव मिला कि इस पर आगे बात होनी चाहिए। अतः ‘कथन’ के जनवरी-मार्च, 2011 के अंक में उस बातचीत को पुनः प्रकाशित करते हुए उस पर एक परिचर्चा आयोजित की गयी, जिसमें छह नये कहानीकारों--योगेंद्र आहूजा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मनोज कुलकर्णी, प्रियदर्शन, प्रभात रंजन और राकेश बिहारी--ने भाग लिया। इस पर भी मुझे बड़ी उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अप्रैल, 2011 के ‘नया ज्ञानोदय’ में मैंने देखा कि वहाँ एक और ही तरह की प्रतिक्रिया हो रही है। संपादक रवींद्र कालिया ने किसी का नाम लिये बिना कहानी आंदोलनों को गलत और अवांछित बताते हुए नये कहानीकारों से मानो यह कहने की कोशिश की है कि वे किसी नये आंदोलन के चक्कर में न पड़ें। इसके लिए उन्होंने फिर वही दशक और पीढ़ी वाला पुराना राग छेड़ा है, जो कहानी आंदोलनों के विरोधी लंबे समय से गाते आ रहे हैं। मैंने अपने साक्षात्कार में (और अन्यत्र भी) यह कहा है कि ‘‘कहानी को किसी दशक या पीढ़ी की छतरी के नीचे ले आने से कहानी की किसी प्रवृत्ति का पता नहीं चलता। हिंदी कहानी के दशक उसके विकास के सूचक नहीं हैं। विकास की गति सदा इकसार और काल-क्रमानुसार नहीं होती, क्योंकि विकास हमेशा अंतर्विरोधों के बीच होता है। साहित्य में ये अंतर्विरोध दशकों और पीढ़ियों के बीच न होकर सामाजिक यथार्थ के प्रति अपनाये जाने वाले दृष्टिकोणों के बीच और रचना में अपनाये जाने वाले कला-सिद्धांतों के बीच होते हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रवींद्र कालिया इन अंतर्विरोधों की बात कभी नहीं करते। वे पीढ़ियों के आपसी झगड़ों की बात करते हुए लिखते हैं--‘‘जब-जब हिंदी में किसी नयी पीढ़ी का उदय हुआ है, उसे पहले की पीढ़ियों ने प्रायः नकारने की ही कोशिशें की हैं। यह कोई नयी प्रवृत्ति नहीं है, दशकों से चली आ रही है। जब सन् साठ के बाद की पीढ़ी ने लिखना शुरू किया था, तो अग्रज पीढ़ियों का भी यही नजरिया था।...ठीक इसी तरह आज कुछ बुजुर्ग आलोचक नितांत नयी पीढ़ी के प्रति सशंकित दिखायी देते हैं।...आलोचकों में विजयमोहन सिंह का दृष्टिकोण इस पीढ़ी के प्रति अवश्य सकारात्मक है। इस अंक से वे युवा पीढ़ी की रचनाशीलता को रेखांकित भी कर रहे हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजयमोहन सिंह ने क्या किया है, इसकी चर्चा बाद में, पहले रवींद्र कालिया के संपादकीय को थोड़ा और देख लें। उन्होंने वर्तमान युवा पीढ़ी के कहानीकारों द्वारा कोई आंदोलन न चलाये जाने की सराहना करते हुए लिखा है--‘‘हिंदी में ‘नयी कहानी’ पहला कथा-आंदोलन था। उसके बाद आंदोलनों की झड़ी लग गयी। सब अपनी-अपनी डफली और अपना-अपना राग बजाने लगे। कमलेश्वर ने ‘नयी कहानी’ आंदोलन के अंतिम दौर में अपना नया आंदोलन ‘समांतर कहानी’ के नाम से आरंभ कर दिया। सैद्धांतिकी तैयार की गयी और कहानियों को उस सैद्धांतिकी में फिट किया जाने लगा या सैद्धांतिकी के अनुरूप कहानियाँ गढ़ी जाने लगीं। इस सब के विपरीत आज की युवा पीढ़ी कोई गिरोह बनाकर अवतरित नहीं हुई। एक दौर में बहुत-से कथाकार उभरकर सामने आये। सबका अपना नजरिया था और अपना तेवर।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वक्तव्य में साहित्यिक आंदोलनों के प्रति अपनाया गया हिकारत और भर्त्सना का भाव तो स्पष्ट ही है, इसमें ‘ओमिशन’ तथा ‘ऐलिगेशन’ के जरिये किया गया एक मिथ्या प्रचार भी अंतर्निहित है। ‘ओमिशन’ इस प्रकार कि इस वक्तव्य में हिंदी कहानी के दो ही आंदोलनों की बात की गयी है--‘नयी कहानी’ और ‘समांतर कहानी’ की--जबकि अन्य कहानी आंदोलनों का, खास तौर से ‘समांतर कहानी’ के बाद चले प्रगतिशील-जनवादी कहानी के आंदोलन का पूरा विलोपन कर दिया गया है, जिससे लगे कि उसमें शामिल कहानीकारों तथा उनकी कहानियों का कभी कोई अस्तित्व ही नहीं था। और ‘ऐलिगेशन’ यह कि साहित्यिक आंदोलन चलाने के लिए पहले एक ‘सैद्धांतिकी’ तैयार की जाती है और फिर या तो कहानियों को उसमें फिट किया जाता है या उसके अनुरूप कहानियाँ गढ़ी जाती हैं। रवींद्र कालिया शायद यह समझते हैं कि वे आज के लेखकों और पाठकों को जैसे चाहेंगे, भरमा लेंगे और अपनी गलत-सलत बातें भी उनसे मनवा लेंगे। मगर आज के लेखक और पाठक साहित्य के इतिहास को जानते हैं और आंदोलन की प्रक्रिया को समझते हैं। वे जानते हैं कि प्रगतिशील-जनवादी कहानी एक ऐतिहासिक वास्तविकता है और साहित्यिक आंदोलन या तो ऐतिहासिक परिस्थिति के दबाव में स्वतःस्फूर्त रूप में उभरते हैं, या अन्यत्र चल रहे आंदोलनों से प्रेरित होकर पैदा होते हैं। पहले रचना होती है, फिर आलोचना। पहले आंदोलन चलते हैं, फिर उनके सिद्धांत बनते हैं। ऐसा कभी नहीं होता कि पहले सिद्धांत बना लिये जायें और फिर उनके अनुसार रचनाएँ गढ़ी जायें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है, रवींद्र कालिया को भय है कि नये कहानीकारों ने कोई नया आंदोलन चलाया, तो कहानीकारों की ‘युवा पीढ़ी’ तथा उसके द्वारा लिखी जा रही ‘युवा कहानी’ को सामने लाने और साहित्य में प्रतिष्ठित करने का जो श्रेय उन्होंने हासिल किया है, शायद उनसे छिन जायेगा। अतः वे हिंदी कहानी को दशकों और पीढ़ियों में बाँटकर दिखा रहे हैं और जहाँ कोई संघर्ष नहीं है, वहाँ भी ‘‘पीढ़ियों के संघर्ष’’ की बात कर रहे हैं, जबकि आज नयी तथा अग्रज पीढ़ी के कथाकारों में खासा सद्भाव है और वे एक-दूसरे से बातचीत करते हुए और एक-दूसरे को समझते-समझाते नजर आते हैं। उदाहरण के लिए, ‘परिकथा’ के युवा कहानी अंक-1 में अग्रज पीढ़ी के कथाकारों से नयी पीढ़ी के कथाकारों ने जो बातचीत की है, उसमें न तो कहीं ‘‘पीढ़ियों का संघर्ष’’ है और न कहीं ‘‘नयी पीढ़ी को नकारने’’ की कोशिश!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन रवींद्र कालिया ने एक नये कहानी आंदोलन की संभावना से भयभीत होकर दशकवाद और पीढ़ीवाद का चक्कर चलाना शुरू कर दिया है। इसका शुभारंभ उन्होंने ‘नया ज्ञानोदय’ के उक्त अंक में विजयमोहन सिंह के लेख ‘नयी कहानी, साठोत्तरी कहानी और आज की कहानी’ से किया है। कहानी आंदोलनों को खारिज करना है और दशकवाद-पीढ़ीवाद के कंकाल को कब्र से निकालकर पुनः खड़ा करना है, यह पहले से तय है। अतः विजयमोहन सिंह के लेख का पहला वाक्य है--‘‘ ‘नयी कहानी’ एक छद्म नाम था।’’ संपादक जी अपने संपादकीय में कह चुके हैं कि ‘‘हिंदी में ‘नयी कहानी’ पहला कथा-आंदोलन था।’’ और आलोचक जी बता रहे हैं कि ‘नयी कहानी’ कोई नयी कहानी नहीं थी, वास्तव में नयी कहानी तो ‘साठोत्तरी कहानी’ थी। उनके लेख की सबसे प्रमुख स्थापना है--‘‘साठोत्तरी कहानी...ने हिंदी कहानी को एक ऐसा आलोकवृत्त दिया, जिसका प्रभाव आज की कहानी पर स्पष्ट देखा जा सकता है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के नये कहानीकारों में से ज्यादातर ने शायद ‘साठोत्तरी कहानी’ का नाम भी नहीं सुना होगा। अतः इसका थोड़ा इतिहास सामने लाना जरूरी है। हिंदी कहानी में ‘नयी कहानी’ का आंदोलन जब पुराना पड़ने लगा, तो उसकी जगह लेने के लिए अनेक आंदोलन उठ खड़े हुए। उनमें से तत्काल उभरने वाले दो मुख्य आंदोलन थे--‘अकहानी’ और ‘सचेतन कहानी’। यह समय था 1960 के आसपास का। अतः जो नये कहानीकार ‘नयी कहानी’ के विरोधी थे, किंतु साहित्यिक आंदोलनों के भी विरोधी थे, और जिन्होंने 1960 के बाद लिखना शुरू किया था, उन्होंने अपना कोई आंदोलन चलाने या किसी दूसरे आंदोलन में शामिल होने के बजाय अलग रहना पसंद किया। उन्होंने स्वयं को साठोत्तरी पीढ़ी का घोषित करते हुए अपनी कहानी को ‘साठोत्तरी कहानी’ का नाम दिया। इसे ‘सन् साठ के बाद की कहानी’ और ‘सातवें दशक की कहानी’ भी कहा गया। यहीं से हिंदी कहानी को दशकों और पीढ़ियों में बाँटकर देखने का सिलसिला शुरू हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कहानी आंदोलनधर्मी रही है। वह आंदोलनों से ही विकसित हुई है। ‘नयी कहानी’, ‘अकहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘समांतर कहानी’, ‘प्रगतिशील कहानी’, ‘जनवादी कहानी’, ‘स्त्रीवादी कहानी’, ‘दलितवादी कहानी’ आदि के रूप में उसके विकास का पूरा इतिहास लिखा जा सकता है। लेकिन इसके साथ-साथ एक आंदोलन-विरोधी प्रवृत्ति भी मौजूद रही है, जो आंदोलनों में शामिल लेखकों को ‘गुट’ और ‘गिरोह’ जैसे हिकारत भरे शब्दों से पुकारती है। (रवींद्र कालिया ने अपने उक्त संपादकीय में लिखा है--‘‘आज की युवा पीढ़ी कोई गिरोह बनाकर अवतरित नहीं हुई।’’) इस प्रवृत्ति के लोग कहानी में आने वाले बदलावों को समय, समाज, यथार्थ, लेखकीय दृष्टिकोण और कला-मूल्यों आदि में मौजूद अंतर्विरोधों के आधार पर नहीं, बल्कि पीढ़ियों के अंतर या अंतराल के आधार पर देखते हैं और यह मानकर चलते हैं कि पुरानी पीढ़ी हमेशा नयी पीढ़ी को नकारती है, अतः नयी पीढ़ी को उसके विरुद्ध संघर्ष करके आगे बढ़ना होता है। इसी को ‘‘पीढ़ियों का संघर्ष’’ कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजेदार बात यह है कि इस प्रवृत्ति के लोग जहाँ ऐसा कोई संघर्ष नहीं हो रहा होता, वहाँ भी उसे देखने-दिखाने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के लिए, वर्तमान नयी पीढ़ी के कहानीकारों को उनसे पहले की किसी पीढ़ी के लेखकों ने नहीं नकारा। उलटे, सबने उनकी नयी रचनाशीलता का स्वागत-सत्कार ही किया। रवींद्र कालिया द्वारा संपादित ‘वागर्थ’ और ‘नया ज्ञानोदय’ ने ही नहीं, हिंदी की लगभग सभी पत्रिकाओं ने उनकी कहानियाँ तथा उनकी पुस्तकों की समीक्षाएँ छापी हैं। लगभग सभी आलोचकों ने उनकी कहानियाँ पढ़ी और सराही हैं। ये सभी संपादक और आलोचक अग्रज पीढ़ियों के हैं। फिर भी उन पर नयी पीढ़ी को नकारने का आरोप लगाया जाता है। इसीलिए ‘परिकथा’ के सितंबर-अक्टूबर, 2010 के अंक में जब राकेश बिहारी दूधनाथ सिंह से पीढ़ियों की टकराहट के बारे में पूछते हैं, तो दूधनाथ सिंह सही कहते हैं--‘‘पीढ़ियों की टकराहट कब और कहाँ हुई, मुझे नहीं मालूम।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की हिंदी कहानी में कहानीकारों की अनेक पीढ़ियाँ सक्रिय हैं और ऐसे बहुत-से कथाकार तथा कथा-समीक्षक, जो विभिन्न कहानी आंदोलनों में शामिल रहे हैं, आज लेखक, आलोचक और संपादक के रूप में नये कहानीकारों के नयेपन को पसंद और रेखांकित भी करते हैं। (‘परिकथा’ ने तो यह काम सबसे आगे बढ़-चढ़कर किया है।) लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि नयी पीढ़ी हमसे प्रभावित है; जबकि नयी पीढ़ी के प्रति ‘‘सकारात्मक दृष्टिकोण’’ रखने की घोषणा करने वाले ‘साठोत्तरी’ आलोचक विजयमोहन सिंह ‘साठोत्तरी’ संपादक रवींद्र कालिया द्वारा संपादित पत्रिका में लिख रहे हैं कि आज की कहानी पर ‘साठोत्तरी कहानी’ का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन प्रभावित होना तो दूर की बात है, जैसा मैंने पहले कहा, आज के नये कहानीकारों में से ज्यादातर ने शायद ‘साठोत्तरी कहानी’ का नाम भी नहीं सुना होगा। विजयमोहन सिंह और रवींद्र कालिया जिस ‘साठोत्तरी पीढ़ी’ के हैं, उस पीढ़ी का शायद ही कोई कहानीकार आज स्वयं को ‘साठोत्तरी कहानीकार’ कहता या मानता हो, क्योंकि इस नाम की कहानी की कोई पहचान कभी बनी ही नहीं। अलबत्ता ‘नयी कहानी’ आंदोलन के बाद हिंदी में जो कहानी आंदोलन चले, उनसे संबद्ध-असंबद्ध कहानीकारों की अपनी पहचानें हैं और उनके प्रभाव आज की कहानी पर खोजे जा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, ‘नयी कहानी’ आंदोलन के बाद ‘अकहानी’ नाम का जो आंदोलन चला था, उसमें ज्यादातर लेखक उसी पीढ़ी के थे, जिसे 1960 के बाद की पीढ़ी कहा जाता है। लेकिन चूँकि आंदोलन कहानीकारों की उम्र के आधार पर नहीं चलते, इसलिए उसमें कुछ अग्रज पीढ़ियों के कहानीकार भी शामिल थे। बाद में उस आंदोलन के समाप्त हो जाने पर उनमें से कई कहानीकार अन्य कहानी आंदोलनों में शामिल हो गये या पूर्ववर्ती ‘नयी कहानी’ के आंदोलन में ही शामिल माने जाते रहे। मैंने भी 1960 के बाद लिखना शुरू किया था और मैं भी कुछ समय तक ‘अकहानी’ के आंदोलन में शामिल था, जैसे कि आगे चलकर ‘समांतर कहानी’ और फिर ‘प्रगतिशील-जनवादी कहानी’ के आंदोलन में शामिल रहा। ‘अकहानी’ एक अत्यंत अल्पजीवी आंदोलन था, लेकिन यह कैसा रहा होगा, इसका कुछ अंदाजा आज के कहानीकार इस बात से लगा सकते हैं कि 1967 में प्रकाशित ‘अकहानी’ नामक संकलन में शामिल कहानीकार विभिन्न पीढ़ियों के, विभिन्न विचारधाराओं वाले, विभिन्न राजनीतिक दलों तथा संगठनों से संबंध रखने वाले और विभिन्न प्रकार की कहानियाँ लिखने वाले कहानीकार थे। उनके नाम हैं--निर्मल वर्मा, योगेश गुप्त, ममता कालिया, श्याम मोहन श्रीवास्तव, सुरेंद्र अरोड़ा, श्रीकांत वर्मा, कुलभूषण, रवींद्र कालिया, राजकमल चौधरी, सुधा अरोड़ा, रघुवीर सहाय, हिमांशु जोशी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, ज्ञानप्रकाश, रमेश उपाध्याय, जगदीश चतुर्वेदी, सुरेश सिनहा और कामतानाथ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज इनमें से किस कहानीकार को ‘साठोत्तरी कहानीकार’ के रूप में जाना या पहचाना जाता है? सबकी अपनी अलग पहचान है, चाहे वह किसी कहानी आंदोलन से संबंधित हो या नहीं। शायद रवींद्र कालिया एकमात्र ऐसे कहानीकार हैं, जो आज भी स्वयं को ‘साठोत्तरी कहानीकार’ मानते हैं। मगर यदि वे यह सोचते हैं कि दशकवाद और पीढ़ीवाद का चक्कर चलाकर किसी नये कहानी आंदोलन का होना असंभव बना देंगे, तो वे भारी मुगालते में हैं। विगत दो दशकों में कोई नया साहित्यिक आंदोलन नहीं चला, तो इसके विशेष ऐतिहासिक कारण रहे हैं। यहाँ मैं उन कारणों में नहीं जाऊँगा, लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ कि यह दो दशकों की शांति तूफान के पहले की शांति थी। आज दुनिया के हर हिस्से में और जीवन के हर क्षेत्र में नित्य नये आंदोलन उभर रहे हैं। यह असंभव है कि हिंदी साहित्य में नये आंदोलन न उभरें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी में प्रगतिशील-जनवादी कहानी के आंदोलन के बाद कोई आंदोलन नहीं चला। लेकिन विगत दो दशकों में समय बदल गया है, ऐतिहासिक परिस्थिति बदल गयी है, भौगोलिक परिप्रेक्ष्य बदल गया है, इसलिए अब वह या उसी तरह का कोई आंदोलन उसी पुराने तरीके से नहीं चल सकता। एक नये आंदोलन की जरूरत है और वह नये ही ढंग से चलेगा। मैंने अशोक कुमार पांडेय से की गयी अपनी बातचीत में भविष्योन्मुखी कहानी का नाम सुझाया था। उसके पीछे भविष्य की एक बेहतर दुनिया की परिकल्पना थी। उसे अपने शब्दों में बताने के बजाय मैं ‘दि वर्ल्ड वी विश टु सी’ नामक पुस्तक के लेखक समीर अमीन के शब्दों में बताना चाहूँगा। उनके अनुसार ‘‘वह दुनिया समस्त मनुष्यों तथा जनगणों की एकजुटता के आधार पर बनेगी। वह पूरी तरह और समूचे तौर पर नागरिक तथा लैंगिक समानता पर आधारित होगी। उसमें एक ऐसी सार्वभौम सभ्यता होगी, जो जीवन के सभी क्षेत्रों में सर्जनात्मक विकास की पूरी संभावनाएँ प्रस्तुत करेगी। उसमें प्रकृति, पृथ्वी के संसाधन तथा कृषि-भूमि विक्रय की वस्तु नहीं होंगे। उसमें कला, साहित्य, संस्कृति, विज्ञान, शिक्षा और स्वास्थ्य भी क्रय-विक्रय की वस्तु नहीं होंगे। उसमें जीवन की समस्त गतिविधियाँ पूरी तरह जनतांत्रिक होंगी और उसकी नीतियाँ सभी समाजों, राष्ट्रों तथा जनगणों की स्वायत्तता की रक्षा करते हुए उनकी प्रगति को सुनिश्चित करेंगी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जानता हूँ कि ऐसी दुनिया साहित्य से और उसकी एक विधा कहानी से नहीं बनेगी। फिर भी मैं यह मानता हूँ कि कहानीकार ऐसा स्वप्न लेकर चलेंगे, तो उनकी कहानी ऐसी दुनिया के निर्माण में अपना यत्किंचित् योगदान अवश्य करेगी। अतः भविष्योन्मुखी कहानी का उद्देश्य आज की दुनिया को बदलकर एक बेहतर दुनिया बनाना होगा। इस बड़े उद्देश्य के लिए उसे अन्य बड़े और व्यापक आंदोलनों से जुड़कर चलना होगा और वे बड़े आंदोलन भी अब तक चले आंदोलनों से भिन्न नये ढंग के आंदोलन होंगे। मसलन, हो सकता है कि हिंदी कहानी के अब तक अलग-अलग चले प्रगतिशील-जनवादी, स्त्रीवादी, दलितवादी इत्यादि विभिन्न आंदोलन सब मिलकर एक साथ, एक ही आंदोलन के रूप में, या किसी एक बड़े और व्यापक आंदोलन के विभिन्न अंगों के रूप में चलें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि ये तमाम आंदोलन जिस बेहतर दुनिया को बनाने के लिए चलेंगे, वह पूँजीवादी दुनिया नहीं हो सकती। इसलिए वह पूँजीवादी व्यवस्था को बदलकर ही बनेगी। और पूँजीवादी व्यवस्था पुनः समीर अमीन के ही शब्दों में ‘‘एक विश्व-व्यवस्था है, अतः इसके शिकार लोग इसकी चुनौतियों का सामना भूमंडलीय स्तर पर संगठित होकर ही कर सकते हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतः अब जो आंदोलन चलेंगे, उनकी प्रकृति और संस्कृति अब तक के आंदोलनों से भिन्न होगी। मसलन, भविष्योन्मुखी कहानी यथार्थवादी कहानी की परंपरा से अपना नाता तो जोड़ेगी, उस परंपरा को आगे भी बढ़ायेगी, लेकिन वह यथार्थवाद के अब तक के तमाम रूपों से भिन्न एक नया यथार्थवाद होगा। मैं उसे भूमंडलीय यथार्थवाद कहता हूँ। आज की कहानी जाने-अनजाने इसी यथार्थवाद की दिशा में जा रही है, जिसके कुछ संकेत ‘परिकथा’ के युवा कहानी अंकों में प्रकाशित कहानियों में भी पाये जा सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः मैं ‘परिकथा’ के संपादक शंकर और उनकी पूरी टीम को ‘युवा कहानी’ अंकों की शृंखला के लिए बधाई देते हुए एक दोस्ताना सलाह देना चाहता हूँ कि ‘युवा कहानी’ की जगह आज की कहानी के लिए कोई बेहतर नाम अपनायें और इस नाम को ‘साठोत्तरी’ लोगों के लिए छोड़ दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-7029563740673790738?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/7029563740673790738/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/7029563740673790738'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/7029563740673790738'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='भविष्योन्मुखी कहानी का मतलब'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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साथ सुंदर ढंग से छपी लगभग तीन सौ पृष्ठों की भारी-भरकम और प्रभावशाली पत्रिका है। प्रवेशांक आतंकित करता-सा लगता है। आतंकित करने के लिए एक ही ‘महानायक’ पर्याप्त होता है, पर यहाँ तो एक नहीं, एक शताब्दी के अनेक ‘महानायक’ उपस्थित हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आवरण पर छपे चेहरे देखकर तसल्ली हो जाती है कि अरे, ये सब तो अपने ही लोग हैं! भुवनेश्वर, शमशेर, अज्ञेय, केदार, नागार्जुन, अश्क, नेपाली इत्यादि। थोड़ा गौर से देखने पर पता चलता है कि सब साहित्य वाले और हिंदी साहित्य वाले ही नहीं हैं। अकीरा कुरोसावा और अशोक कुमार जैसे सिनेमा वाले भी हैं। विष्णु नारायण भातखंडे और मल्लिकार्जुन मंसूर जैसे संगीत वाले भी हैं। उर्दू के उस्ताद फैज, मजाज और नून मीम राशिद भी हैं। अंग्रेजी के अग्रज अहमद अली भी हैं। राजस्थानी के कन्हैया लाल सहल, गुजराती के उमाशंकर जोशी, तेलुगु के श्रीश्री, बांग्ला के रवींद्रनाथ ठाकुर (अपने उपन्यास ‘गोरा’ के रूप में), पोलिश के जेस्लो मिलोज इत्यादि भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना विशाल, व्यापक और भव्य आयोजन शायद मासिक या त्रैमासिक नहीं हो सकता, अतः साल में दो बार होगा। तदनुसार प्रवेशांक मार्च, 2011 से अगस्त, 2011 तक का है और आवरण पर ‘प्रवेशांक: मार्च-अगस्त, 2011’ छपा भी है। लेकिन अंदर वाले पृष्ठ पर शायद कुछ नया करने या ‘‘भीड़ से अलग नजर आने’’ के लिए तारीखें भी दे दी गयी हैं--1 मार्च, 2011 से 31 अगस्त, 2011 तक। संपादक प्रेमचंद गांधी प्रस्तुत लेखक के मित्र हैं, अतः उसने तुरंत फोन मिलाया और चुटकी लेने से नहीं चूका--‘‘मेरे जन्मदिन पर नयी पत्रिका को जन्म देने के लिए बधाई!’’ वैसे संपादक और उनकी टीम के सभी सदस्य (संपादकीय सलाहकार ईशमधु तलवार, संपादन सहयोगी फारुख आफरीदी और ओमेंद्र तथा कार्यालय सहायक कालूराम) बधाई के हकदार हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपादकीय में अन्य पत्रिकाओं में जो नहीं है, उसे ‘कुरजां संदेश’ के माध्यम से करने का संकल्प किया जाता दिखायी देता है। अन्य पत्रिकाओं में जो ‘अभाव’ गिनाये गये हैं, उन्हें सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाये, तो ‘कुरजां संदेश’ का संपादकीय संकल्प कुछ इस प्रकार होगा :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पत्रिका में समूचे हिंदी प्रदेश की तस्वीर के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं तथा दुनिया के अन्य देशों के साहित्य और समाज की तस्वीर भी दिखायी देगी। खंड-खंड परिदृश्य के अमूर्त चित्र की जगह इस विशाल महादेश की विभिन्न भाषाओं तथा बोलियों वाली अनंत वैविध्यपूर्ण संस्कृति की मुकम्मल तस्वीर पेश करने की कोशिश की जायेगी। पूर्वग्रह, गुटबाजी और ‘‘मतानुकूलित पारस्परिक सद्भावना और सहयोग वृत्ति’’ से बचते हुए ‘‘समस्त भारतीय भाषाओं का वास्तविक प्रतिनिधित्व’’ किया जायेगा। ‘‘जड़ता और कुहासे को दूर करने की ईमानदार कोशिश’’ की जायेगी। दुनिया के अन्य देशों में क्या रचा जा रहा है और कौन-सी विचार-सरणियाँ किस प्रकार काम कर रही हैं, इसकी जानकारी दी जायेगी। अच्छे अनुवादकों से कराये गये अच्छे अनुवाद प्रस्तुत किये जायेंगे। इंटरनेट का उपयोग करते हुए पाठकों को दुनिया की अन्य भाषाओं के साहित्य से जोड़ा जायेगा। कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप के, मलेशिया, थाईलैंड, श्रीलंका, भूटान, नेपाल के तथा सार्क देशों के साहित्य के बारे में तो ठीक-ठीक जानकारी दी ही जायेगी। दुनिया के जिन अन्य देशों में ‘‘वैश्वीकरण से उपजे नव-साम्राज्यवाद ने भारत जैसी ही परिस्थितियाँ पैदा कर दी हैं’’, उन देशों की भाषाओं में ‘‘हिंदी समाज जैसी चिंताओं को लेकर जो रचनाएँ लिखी जा रही हैं’’, उनकी जानकारी दी जायेगी। ‘‘विश्वग्राम में ऐसी साझी चिंताओं के लिए भी तो स्थान होना चाहिए’’, अतः ‘कुरजां संदेश’ द्वारा ऐसा स्थान बनाने का काम किया जायेगा। और अंततः पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा गया है कि ‘‘यह काम मुश्किल जरूर है, नामुमकिन नहीं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चित रूप से यह संकल्प स्वागतयोग्य है और यह आत्मविश्वास प्रशंसनीय। लेकिन लगता है कि यह किंचित् अत्युत्साह में बनायी गयी कुछ अधिक ही महत्त्वाकांक्षी परियोजना है, जो प्रवेशांक के पाठक के मन में आशाओं के साथ-साथ कुछ आशंकाएँ भी पैदा करती है। प्रवेशांक स्वयं उन आशंकाओं को जन्म देता प्रतीत होता है। बेहतर होता कि प्रवेशांक संपादकीय संकल्प को व्यावहारिक रूप में सामने लाने वाली सामग्री के साथ आता। ऐसी सामग्री के साथ, जो नयी तो होती ही, जिसके कारण पत्रिका अन्य पत्रिकाओं की भीड़ से अलग भी नजर आती। किंतु न जाने क्यों, प्रवेशांक को कतिपय साहित्यकारों की संयोग से एक साथ आ पड़ी जन्मशतियों से जोड़कर निकालने का निर्णय लिया गया, जबकि यह विषय पिछले दिनों जगह-जगह हुए जन्मशती समारोहों तथा इसी उपलक्ष्य में विभिन्न पत्रिकाओं द्वारा निकाले गये विशेषांकों के कारण पहले ही घिस-पिट चुका था। ‘कुरजां संदेश’ के इस आयोजन के पक्ष में अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि यह केवल अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, केदार आदि कुछ ही साहित्यकारों की नहीं, बल्कि बहुत-से अन्य साहित्यकारों की जन्मशतियाँ मनाने वाला एक सर्वसमावेशी प्रयास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस प्रयास में कई पुरानी और बार-बार पढ़ी जा चुकी चीजों का पुनर्प्रकाशन संपादकीय विवशता जैसा बन गया है, जिसका एहसास संपादक को भी है। उन्होंने संपादकीय में इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए कहा है--‘‘इस अंक में बहुत-से पाठकों को लग सकता है कि कई लेख और रचनाएँ पुरानी हैं। उन्हें यहाँ शामिल इसलिए किया गया कि आज के नये पाठकों को बहुत संभव है, इन पुरानी रचनाओं की जानकारी ना हो।’’&lt;br /&gt;एक नयी पत्रिका के प्रवेशांक में पुरानी सामग्री देने को उचित ठहराने के लिए दी गयी यह दलील बहुत आश्वस्त नहीं करती। बेहतर यही होता कि प्रवेशांक ऐसी नयी सामग्री लेकर आता, जो संपादकीय में व्यक्त किये गये संकल्प को चरितार्थ करती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशा है, यह काम अगले अंक से शुरू होगा और विश्वास है कि सफलतापूर्वक संपन्न भी होगा। प्रवेशांक के आकार-प्रकार से स्पष्ट है कि ‘कुरजां संदेश’ एक साधन-संपन्न पत्रिका है। इसके पास आर्थिक संसाधन तो पर्याप्त हैं ही, मानवीय संसाधनों की भी कमी नहीं है। प्रवेशांक में शामिल रचनाकारों के अलावा इसके देशी-विदेशी सहयोगियों की सूची देखकर लगता है कि अगले अंकों में यह पत्रिका वह सब कर पायेगी, जिसे करने का इरादा प्रवेशांक के संपादकीय में व्यक्त हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतः अगले अंक की उत्सुक प्रतीक्षा के साथ हार्दिक शुभकामनाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रमेश&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-294942725671712311?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/294942725671712311/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/05/blog-post_30.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/294942725671712311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/294942725671712311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/05/blog-post_30.html' title='स्वागतयोग्य ‘कुरजां संदेश’'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-3473078903356322228</id><published>2011-05-27T08:59:00.000-07:00</published><updated>2011-05-27T09:01:03.017-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>कैसे बनेगा साहित्य का बाज़ार?</title><content type='html'>जो लेखक यह समझते हैं कि हिंदी साहित्य का बाजार है और उसमें उन्हें अपनी जगह बनानी है, उन्हें सबसे पहले यह देखना चाहिए कि क्या सचमुच हिंदी साहित्य का कोई बाजार है। पुस्तकों के प्रकाशक तो बड़े और छोटे असंख्य हैं, लेकिन पुस्तकों का बाजार कहाँ है? क्या आपके शहर में कोई ऐसी दुकान है, जहाँ आपकी मनचाही नयी  साहित्यिक पुस्तकें मिल जायें? या कोई ऐसा पुस्तकालय, जो नवीनतम साहित्यिक पुस्तकें साहित्यिक गुणवत्ता के आधार पर और निरंतर खरीदता हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी के अखबारों की संख्या और उनकी प्रसार-संख्या को देखें, तो लगता है कि हिंदी के पाठक बढ़ रहे हैं&lt;br /&gt;और वे करोड़ों की संख्या में हैं, लेकिन सोचें कि हिंदी का बेस्ट सेलर उपन्यास भी कितना छपता है? कितना बिकता है? हो सकता है, खूब बिकता हो, लेकिन क्या उसकी बिक्री के आधार पर मिलने वाले मेहनताने से लेखक अपने परिवार के साथ आराम से जी सकता है? हो सकता है, हों कुछ ऐसे भाग्यशाली, मगर वे कितने होंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन असंख्य लेखकों की सोचिए, जो साहित्य के इस बाजार में, जिसे बाजार कहना भी बाजार की तौहीन है, अपनी पुस्तक छपवाने के लिए प्रकाशक को मुँहमाँगी रकम देते हैं! प्रकाशक पैसा लेकर तीन सौ प्रतियाँ छापता है और पैसे के बदले सौ या पचास प्रतियाँ लेखक को देकर कहता है कि हिसाब बराबर! अब यह लेखक पर है कि वह उन प्रतियों को बेचे या बाँटे। लेखक उन प्रतियों को कहाँ और कैसे बेचे? किसी तरह बेच भी ले, तो उसे क्या मिलेगा? उसकी लागत भी नहीं निकलेगी। मगर वह जानता है कि हिंदी लेखकों को दिये जाने वाले असंख्य सरकारी और गैर-सरकारी पुरस्कार मौजूद हैं और उनमें से कोई ऐसा पुरस्कार भी मिल जाये तो गनीमत, जिससे प्रकाशक को दी हुई रकम वापस मिल जाये। रकम न मिले, गम नहीं; ऐसी साहित्यिक प्रतिष्ठा तो मिल ही जाये, जो भविष्य में उसे साहित्य के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के योग्य बना सके! तब हो सकता है कि वह हिंदी साहित्य के बाजार में न सही, अनुवाद के जरिये अखिल भारतीय और फिर अखिल भूमंडलीय बाजार में बिकने लायक बन जाये!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार हिंदी का वह लेखक, जो आज बड़े ठसके से कहता है कि वह बाजार में बिकने और अपने लेखन की ऊँची कीमत पाने में कोई बुराई नहीं समझता (‘‘जब चित्रकार हुसैन बाजार में बिक सकते हैं, तो हम क्यों नहीं?), दरअसल उस बाजार में बिकने की बात कर रहा होता है, जो वास्तव में कोई बाजार है ही नहीं! अगर उसे बाजार कहा ही जाना हो, तो वह ऐसा बाजार है, जिसमें लेखक पाठक या ग्राहक के लिए नहीं, पुरस्कारदाताओं के लिए लिखता है; प्रकाशक पाठक या ग्राहक के लिए नहीं, थोक सरकारी खरीद के लिए किताब छापता है; सरकारी खरीद करने वाला अफसर किताब की क्वालिटी और कीमत नहीं, अपना कमीशन देखता है और उसे इससे कोई मतलब नहीं होता कि किताब पाठकों तक पहुँचे। यही वजह है कि हिंदी में क्या छपता है, कहाँ बिकता है और पाठक तक न पहुँचकर कहाँ ‘डंप’ हो जाता है, कोई नहीं जानता!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इसे साहित्य का बाजार कहा जा सकता है? यदि नहीं, तो हम हिंदी लेखकों को गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए कि बाजार के समर्थक के रूप में ही नहीं, बाजार के विरोधी के रूप में भी हम क्या कर रहे हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे बाजार-विरोधी समझा जाता है, लेकिन मैं बाजार का नहीं, बाजारवाद का विरोधी हूँ। इसीलिए मैंने 17 मई, 2011 को यहीं पर ‘साहित्य में जगह बनानी है या बाजार में?’ शीर्षक टिप्पणी में कहा था कि ‘‘मैं बाज़ार का विरोधी नहीं हूँ। मैं तो दिल से चाहता हूँ कि साहित्य का बाज़ार बढ़े। साहित्य खूब छपे, खूब बिके, ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचे। प्रकाशक और मीडिया के मालिक शौक से उसे बेच कर मुनाफा कमायें और लेखकों को भी इतना मेहनताना दें कि वे अपने लेखन के दम पर आराम से जी सकें। किसी भी लेखक को, चाहे वह नया हो या पुराना, स्त्री हो या पुरुष, दलित हो या सवर्ण, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक, व्यवस्था और शासक वर्ग का समर्थक हो या विरोधी, उसके लेखन की गुणवत्ता के आधार पर प्रकाशित किया जाये। उसे किसी साहित्येतर कारण से भेदभाव या पक्षपात का शिकार न होना पड़े। यदि ऐसा बाज़ार बन जाये, तो लेखकों को यह भरोसा हो सकेगा कि उनके लेखन की परख साहित्यिक गुणवत्ता के आधार पर होगी और बाज़ार में उसका उचित मूल्य उन्हें मिलेगा।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि साहित्य के लिए ऐसा बाजार हमारे देश में तो क्या, दुनिया भर में कहीं भी उपलब्ध नहीं है। साहित्य के प्रकाशन, विपणन, विज्ञापन, मूल्यांकन, पुरस्करण, प्रतिष्ठापन (कैननाइजेशन) आदि की समस्त प्रक्रियाएँ उस बाजार में चलती हैं, जो बुनियादी तौर पर साहित्येतर कारणों से नियंत्रित-निर्देशित बाजार है। ऐसे बाजार में लेखक स्वेच्छा से बिके या मजबूरी में, तमीज से बिके या फूहड़पन के साथ, उसकी सफलता-असफलता का निर्णय उसके साहित्य की गुणवत्ता के आधार पर नहीं, बल्कि साहित्येतर कारणों के आधार पर ही होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतः प्रश्न उठता है : ऐसा बाजार कैसे बन सकता है, जो वास्तव में साहित्य का बाजार हो? इस प्रश्न का कोई बना-बनाया उत्तर मेरे पास नहीं है। अतः मैं चाहता हूँ कि मेरे लेखक और पाठक मित्र इस प्रश्न पर विचार करें और इसका उत्तर खोजें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-3473078903356322228?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/3473078903356322228/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/3473078903356322228'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/3473078903356322228'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html' title='कैसे बनेगा साहित्य का बाज़ार?'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-1595250517115488193</id><published>2011-05-17T08:55:00.000-07:00</published><updated>2011-05-17T09:26:42.428-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>साहित्य में जगह बनानी है या बाज़ार में?</title><content type='html'>मैं बाज़ार का विरोधी नहीं हूँ। मैं तो दिल से चाहता हूँ कि साहित्य का बाज़ार बढ़े। साहित्य खूब छपे, खूब बिके, ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचे। प्रकाशक और मीडिया के मालिक शौक से उसे बेच कर मुनाफा कमायें और लेखकों को भी इतना मेहनताना दें कि वे अपने लेखन के दम पर आराम से जी सकें। किसी भी लेखक को, चाहे वह नया हो या पुराना, स्त्री हो या पुरुष, दलित हो या सवर्ण, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक, व्यवस्था और शासक वर्ग का समर्थक हो या विरोधी, उसके लेखन की गुणवत्ता के आधार पर प्रकाशित किया जाये। उसे किसी साहित्येतर कारण से भेदभाव या पक्षपात का शिकार न होना पड़े। यदि ऐसा बाज़ार बन जाये, तो लेखकों को यह भरोसा हो सकेगा कि उनके लेखन की परख साहित्यिक गुणवत्ता के अधर पर होगी और बाज़ार में उसका उचित मूल्य उन्हें मिलेगा। तब वे बाज़ार में अपनी जगह बनाने के बजाय साहित्य में अपनी जगह बनाने का प्रयास करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य में अपनी जगह बनाना बाज़ार में अपनी जगह बनाने से नितांत भिन्न प्रक्रिया है। साहित्य में अपनी जगह बनाने के लिए आप अपनी भाषा और साहित्य के इतिहास को जानेंगे, उसकी विभिन्न परम्पराओं को समझेंगे, उनमें से किसी एक परंपरा से जुड़कर उसे आगे बढ़ाएंगे और इसमें जो दिक्कतें आयेंगी, उनका साहस और दृढ़तापूर्वक सामना करेंगे। इसके लिए आप अपने समानधर्माओं से जुड़ेंगे और ज़रुरत पड़ने पर मिल-जुलकर कोई साहित्यिक आन्दोलन चलाएंगे। यदि सत्ता और व्यवस्था की ओर से विरोध या दमन होगा, तो डटकर उसका सामना करेंगे और असफल या शहीद हो जाने की कीमत पर भी साहित्य में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ बाज़ार में अपनी जगह बनाने के लिए आप यह देखेंगे कि साहित्य के नाम पर आजकल बाज़ार में क्या चल रहा है या क्या बिक रहा है। तब, भाषा और साहित्य का इतिहास जाये भाड़ में, उसकी परम्पराएँ जाएँ भट्ठी में, आप वही और वैसा ही लिखेंगे, जो बाज़ार में चल रहा है या बिक रहा है। फिर आप यह भी अवश्य देखेंगे कि बाज़ार के लिए जो 'माल' अपने तैयार किया है, वह कहाँ, कैसे, किन तरकीबों से और किन व्यापारियों, एजेंटों, विज्ञापनकर्ताओं आदि की मदद से ऊंची कीमत पर बिक सकता है। उनसे आप तरह-तरह के समझौते करेंगे और उनके इशारों पर अपने लेखन को ही नहीं, अपने-आप को भी बाज़ार में आसानी से और ऊंची कीमत पर बिक सकने वाला लेखक बनायेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के बाजारवादी समय में कई लेखकों को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती कि उनका लेखन ही नहीं, वे खुद भी एक बिकाऊ माल बन रहे हैं। मान लीजिये, कोई संपादक या प्रकाशक, जो साहित्य नामक माल को बेचकर मुनाफा कमाना चाहता है, जिसे भाषा और साहित्य के इतिहास और विकास से कोई लेना-देना नहीं है, जो इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहता कि आज की दुनिया में चल रहा स्त्री आन्दोलन क्या है, उसका इतिहास-भूगोल तथा उद्देश्य क्या है, उससे सम्बंधित स्त्री लेखन का मूल्य और महत्त्व क्या है, वह स्त्री लेखन को महज़ एक उत्पाद मानकर बेचना चाहता है, तो उसके प्रति लेखिकाओं का क्या रवैया होना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने साहित्य के दम पर साहित्य में अपनी जगह बनाने वाली लेखिका ऐसे संपादक-प्रकाशक से कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहेगी, जबकि बाज़ार में अपनी जगह बनाना चाहने वाली लेखिका उसकी इस बेहूदगी को यह सोचकर बर्दाश्त कर जाएगी कि यह बेहूदा है तो क्या, मुझे लेखिका तो बना रहा है। वह शायद यह भी नहीं समझ पायेगी कि यह मुझे एक बाजारू वस्तु की तरह बेच रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-1595250517115488193?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/1595250517115488193/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/1595250517115488193'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/1595250517115488193'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='साहित्य में जगह बनानी है या बाज़ार में?'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-5884801567603555848</id><published>2011-04-09T09:31:00.000-07:00</published><updated>2011-04-09T09:32:59.287-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>छँटाई</title><content type='html'>एक आदमी ज़िंदगी भर जूते गाँठता है या उन पर करता है पॉलिश&lt;br /&gt;एक आदमी ज़िंदगी भर कपड़े धोता है या उन पर करता है प्रेस&lt;br /&gt;एक आदमी सिर पर बोझा ढोता है या ढोता है रिक्शे पर सवारियाँ&lt;br /&gt;एक आदमी सड़क बुहारता है या कूड़े के ढेर में ढूँढ़ता है बिक सकने वाली कोई चीज़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये और इन जैसे तमाम आदमी&lt;br /&gt;और वे तमाम औरतें जो इन्हीं की तरह करती हैं ऐसे तमाम तरह के काम&lt;br /&gt;कभी कलाकार नहीं माने जाते जबकि होते हैं वे अपने-अपने ढंग के कलाकार ही&lt;br /&gt;उनका भी एक शिल्प होता है और होती है उनकी भी एक शैली&lt;br /&gt;उनकी भी होती है एक भाषा जिसमें बनता है उनका काम एक रचना&lt;br /&gt;उस रचना का भी होता है एक कथ्य और एक रूप&lt;br /&gt;उसमें भी होती है सोद्देश्यता, सार्थकता और प्रासंगिकता भरपूर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कोई उनकी कला की चर्चा नहीं करता&lt;br /&gt;कोई नहीं आँकता उनका मूल्य&lt;br /&gt;कोई नहीं लिखता उनका इतिहास और कोई नहीं होता उनका नामलेवा&lt;br /&gt;क्योंकि उन्हें कलाकार ही नहीं माना जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए कि वे तो बहुत हैं&lt;br /&gt;इतनों की कला कौन देखे कौन परखे?&lt;br /&gt;इसलिए देखने-परखने वाले करते हैं छँटाई और बनाते हैं सिद्धांत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला सिद्धांत :&lt;br /&gt;कलाकार तो लाखों में कोई एक ही होता है (मतलब, लाखों छाँट दिये!)&lt;br /&gt;दूसरा सिद्धांत :&lt;br /&gt;कारीगर कलाकार नहीं होते (मतलब, करोड़ों छाँट दिये!)&lt;br /&gt;तीसरा सिद्धांत :&lt;br /&gt;कलाकारों में भी सब श्रेष्ठ नहीं होते (मतलब, अरबों छाँट दिये!)&lt;br /&gt;चौथा सिद्धांत :&lt;br /&gt;श्रेष्ठ कलाकारों में भी सब महान नहीं होते (मतलब, खरबों छाँट दिये!)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह वे छँटाई करते जाते हैं&lt;br /&gt;जब तक कि कलाकारों की संख्या उनके लिए मैनेजेबल न हो जाये&lt;br /&gt;और इस तरह जो दो-चार या चार-पाँच या पाँच-सात नाम बचते हैं&lt;br /&gt;उनमें से भी वे छाँटना चाहते हैं सर्वश्रेष्ठ&lt;br /&gt;और सर्वश्रेष्ठ होता है वह जो उनकी अपनी कसौटी पर खरा उतरे&lt;br /&gt;और कसौटी होती है उनकी अपनी-अपनी अलग&lt;br /&gt;जिससे आगे भी छँटाई की गुंजाइश बनी रहती है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-5884801567603555848?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/5884801567603555848/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/5884801567603555848'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/5884801567603555848'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='छँटाई'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-2354810894855732430</id><published>2011-03-23T06:12:00.000-07:00</published><updated>2011-03-23T06:15:26.318-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>अनुभववादी समीक्षा से क्षुब्ध हैं कथाकार</title><content type='html'>क्या हिंदी का उपन्यास वर्तमान परिदृश्य में अपनी सार्थक भूमिका निभा रहा है? क्या वह आजादी के बाद के यथार्थ को अभिव्यक्ति प्रदान करने में सक्षम रहा है? क्या वह अनुभूति और अभिव्यक्ति से आगे जाकर अपने पाठकों को मुक्ति की ओर--राजनीतिक अर्थों में ही नहीं, चेतना और दृष्टि के अर्थों में भी मुक्ति की ओर--अग्रसर कर सका है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये और इन जैसे अनेक प्रश्न कृष्ण किशोर द्वारा संपादित पत्रिका ‘अन्यथा’ के पंद्रहवें अंक में उठाये गये हैं तथा उन पर विस्तृत विचार किया गया है। ‘अन्यथा’ का यह अंक उपन्यास विधा पर केंद्रित महत्त्वपूर्ण सामग्री से युक्त 344 पृष्ठों का एक बृहदाकार विशेषांक है, जिसमें कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं के उपन्यासों के अंश, उनकी रचना-प्रक्रिया से संबंधित लेखकीय वक्तव्य, अन्य लेखकों के आत्मकथ्य, डायरी, लेख, समीक्षाएँ, साक्षात्कार आदि प्रकाशित किये गये हैं। इस विपुल सामग्री में हिंदी उपन्यास लेखन पर एक परिचर्चा भी है, जिसका शीर्षक है ‘हिंदी उपन्यास साहित्य में स्वातंत्र्योत्तर भारत की उपस्थिति’। ऊपर जिन प्रश्नों का उल्लेख किया गया है, वे इस परिचर्चा के संयोजक जवरीमल्ल पारख ने अपने आरंभिक वक्तव्य में उठाये हैं। परिचर्चा के सहभागी हैं--रामशरण जोशी, मृदुला गर्ग, पंकज बिष्ट, अब्दुल बिस्मिल्लाह, भगवानदास मोरवाल, ज्योतिष जोशी और विभूति नारायण राय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह परिचर्चा यद्यपि उपन्यास विधा पर केंद्रित है, लेकिन इसमें जो प्रश्न और मुद्दे उठाये गये हैं, उनका संबंध जितना उपन्यास की रचना और आलोचना से है, उतना ही कहानी की रचना और आलोचना से भी। अतः इसे केवल उपन्यास तक सीमित करके देखने के बजाय आज के समूचे हिंदी कथासााहित्य के संदर्भ में देखा जा सकता है--खासकर कथा-समीक्षा के संदर्भ में, क्योंकि इस परिचर्चा में कई कथाकारों के वक्तव्यों में कथा-समीक्षा के वर्तमान रूप से एक असंतोष प्रकट किया जाता दिखायी पड़ता है, जो यदि सीधे-सीधे नहीं, तो परोक्षतः कथा-समीक्षा की एक नयी दृष्टि और पद्धति की माँग करता प्रतीत होता है। यों इस परिचर्चा में बहुत-से और बहुत तरह के प्रश्न उठाये गये हैं, लेकिन इसका मुख्य प्रश्न है: कथासाहित्य की रचना और आलोचना किस दृष्टि से की जाये?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिचर्चा से पहले उसका उद्देश्य स्पष्ट करने के लिए रामशरण जोशी ने कहा है--‘‘इस परिचर्चा के आयोजन का एकमात्र उद्देश्य यह पड़ताल करना है कि आजादी के बाद के इस छह दशक के काल में हिंदी उपन्यास की यात्रा कैसी रही है। क्या इस यात्रा में देश के सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक यथार्थ की अनुगूँजें सुनायी देती हैं?’’&lt;br /&gt;और उस यथार्थ को मिनिएचर रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने हिंदी उपन्यासों में उठाये जाने वाले कुछ मुद्दे गिनाये हैं, जैसे--ग्रामीण और शहरी यथार्थ, परंपरा और आधुनिकता, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता, स्त्री और दलित अस्मिता, जनजातीय अभिकथन, विस्थापन और पलायन, सीमांतीकरण, तकनोलॉजी क्रांति और मिलिटेंट धार्मिकता, स्थानीयकरण और भूमंडलीकरण, आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता आदि। इसके बाद उन्होंने प्रश्न उठाया है--‘‘इन मुद्दों को रचनात्मक अभिव्यक्ति देने में हिंदी उपन्यास कितने सफल या विफल रहे हैं?’’&lt;br /&gt;परिचर्चा में शामिल कथाकारों में से किसी ने भी जोशी द्वारा प्रस्तुत यथार्थ तथा उससे संबंधित मुद्दों से अपनी असहमति व्यक्त नहीं की है। लेकिन इन मुद्दों को उपन्यास में कैसे उठाया जाये, अथवा इस यथार्थ का चित्रण उसमें किस प्रकार किया जाये, इस पर उनके बीच खासे मतभेद हैं। उदाहरण के लिए, जवरीमल्ल पारख द्वारा उठाये गये अनुभूति, अभिव्यक्ति और मुक्ति संबंधी प्रश्न पर मृदुला गर्ग कहती हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मुझे खुशी है कि आपकी चिंता केवल यह नहीं है कि क्या हिंदी उपन्यास आजादी के बाद के यथार्थ को अभिव्यक्ति दे सका है? यह भी है कि क्या यह अभिव्यक्ति या अनुभूति पाठकों को चेतना और दृष्टि के स्तर पर मुक्ति की ओर अग्रसर कर सकी है? आपकी दूसरी चिंता मुझे ज्यादा सार्थक लगती है।’’&lt;br /&gt;मृदुला गर्ग मानती हैं कि ‘‘हिंदी में यथार्थवादी उपन्यास का वर्चस्व रहा है’’...‘‘उपन्यास ऐसी विधा है, जिसमें यथार्थ हर हाल में रहता ही है’’...और ‘‘उपन्यास का स्वरूप फंतासी का हो, तब भी उसमें यथार्थ ही व्यंजित होता है’’, लेकिन वे यथार्थ-चित्रण के विभिन्न रूपों में फर्क करती हैं। यथार्थ-चित्रण का एक रूप प्रकृतवादी है, जिसमें स्थितियों के यथावत चित्रण को ही पर्याप्त माना जाता है। इसके बारे में वे कहती हैं--‘‘आज के युग में जब विवरणात्मक जानकारियाँ टी.वी. और इंटरनेट पर ही नहीं, प्रादेशिक समाचारपत्रों में भी सुलभ हैं, मात्र स्थूल विवरण का शैक्षिक महत्त्व तक नगण्य हो चला है।’’ इसी तरह यथार्थ-चित्रण का एक रूप अनुभववादी है, जिसमें लेखक के अपने जिये-भोगे को ही यथार्थ माना जाता है। हिंदी के स्त्री और दलित लेखन में यथार्थ प्रायः इसी रूप में चित्रित होता है। इस पर मृदुला गर्ग का कहना है: ‘‘पिछले छह दशकों में हिंदी के यथार्थवादी उपन्यास में उन क्षेत्रों, अंचलों, जातियों और वर्गों को स्थान मिला है, जिन्हें अब तक नहीं मिला था। और अधिकतर भुक्तभोगियों के लेखन द्वारा। स्त्री और दलित इसी श्रेणी में आते हैं। जब भुक्तभोगी अपना अनुभव स्वयं लिखता है, तो निश्चय ही उसका स्वरूप उससे भिन्न होता है, जो संवेदनशील दर्शक या चिंतक उसके बारे में लिखता है। पर समग्र सत्य या यथार्थ को ग्रहणशील बनाने में दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। बल्कि मैं कहूँगी कि उनमें से जिसकी सामाजिक चेतना, संवेदन-शक्ति तथा ऐतिहासिक स्मृति अधिक गहन और सूक्ष्म होगी, वही उस यथार्थ का बेहतर निरूपण करेगा।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार मृदुला गर्ग लेखक के अपने जिये-भोगे को ही यथार्थ मानकर चलने वाली अनुभववादी कथा-समीक्षा से असंतोष और असहमति व्यक्त करते हुए कहती हैं कि ‘‘असल महत्त्व दृष्टि, चिंतन और प्रतिरोध का है।’’ क्योंकि ‘‘पाठकों की चेतना को विवेकसंपन्न बनाने में अहम भूमिका कृति में व्यंजित जीवन-दृष्टि की होती है; इसकी नहीं कि उसके केंद्रीय पात्र पुरुष हैं या स्त्री। महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि पात्र कहाँ से उठाये गये हैं या वे क्या कहते हैं, बल्कि यह है कि वे विभिन्न जीवन-स्थितियों में क्या करते हैं। उनके किये को पढ़कर ही पाठक रूढ़िगत मान्यताओं और अन्याय से प्रतिरोध करने की प्रेरणा पा सकता है। इसलिए यह सहज संभव है कि कोई स्त्री-केंद्रित उपन्यास इतिहास, राजनीति, समाज और व्यवस्था के विद्रूप की सक्षम और सूक्ष्म व्यंजना करे...।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुभववादी कथा-समीक्षा कथाकारों में कैसे असंतोष उत्पन्न करती है, इसका उदाहरण भी मृदुला गर्ग ने प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा है--‘‘समय आ गया है कि हम स्त्री लेखन की अलग से बात करना छोड़ दें। अपने संदर्भ में कहूँ, तो 1970 के दशक में जब मैंने लेखन शुरू किया था, तो स्त्री(वादी) विमर्श के व्यावसायिक पैरोकार पैदा नहीं हुए थे। इसलिए तब सबसे ज्यादा अनुशीलन-आकलन 1980 में लिखे मेरे उपन्यास ‘अनित्य’ का हुआ, जिसका मूल विषय ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में राजनीतिक एवं चारित्रिक विघटन था। दुख की बात यह हुई कि स्त्री(वादी) विमर्श के फैशन में आने पर संपादकों-आलोचकों ने अपनी सुविधा के लिए मुझे स्त्री-केंद्रित उपन्यासों का लेखक घोषित कर दिया और मेरी लेखन-सूची से ‘अनित्य’ का नाम ही निकाल दिया। इससे नुकसान मेरा ही नहीं, साहित्य के मूल्यांकन की स्वस्थ परंपरा का भी हुआ।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘विमर्शों’ पर आधारित अनुभववादी कथा-समीक्षा से अब्दुल बिस्मिल्लाह ने भी अपना असंतोष व्यक्त किया है। उनका कहना है--‘‘दलित विमर्श या स्त्री विमर्श का मामला भले ही सार्थक हो, पर इसके साथ मुस्लिम लेखन या अल्पसंख्यक विमर्श को नहीं जोड़ा जाना चाहिए। दलित विमर्श या स्त्री विमर्श का मुद्दा कुछ वर्गों द्वारा उठाया जा रहा है। मगर मुसलमान लेखक तो यह मुद्दा नहीं उठा रहे हैं। फिर यह कहाँ से आ गया?’’&lt;br /&gt;उन्होंने अपना ही उदाहरण देते हुए कहा है--‘‘जब मेरा उपन्यास ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ आया, तो प्रायः यही कहा गया कि यह मुस्लिम जीवन को चित्रित करने वाला उपन्यास है। मगर मैं कहता हूँ कि यह मूलतः दस्तकारों के जीवन को चित्रित करने वाला उपन्यास है। बनारस में जो साड़ी-बुनकर हैं, वे मुसलमान भी हैं और हिंदू भी। गिरस्त लोग भले ही मुसलमान हों, पर उनके कारीगरों में हिंदू भी होते हैं। फिर बनारस के आसपास के गाँवों में जाकर देखिए, वहाँ के अधिकांश बुनकर हिंदू मिलेंगे।...जो लोग मुझे मुस्लिम जीवन का कथाकार मानते हैं, उनसे मैं कहता हूँ कि वे मेरा उपन्यास ‘मुखड़ा क्या देखे’ पढ़ें। उसका तो आरंभ ही पंडित रामबृक्ष पांडेय की कन्या के विवाह से होता है...तो ऐसा नहीं है कि हिंदू लेखक मुस्लिम जीवन के बारे में नहीं लिख सकता या मुसलमान लेखक हिंदू जीवन के बारे में। यहाँ बात अनुभव-संसार की है। जिसका अनुभव-संसार जितना व्यापक होगा, उसके उपन्यास में उतनी ही व्यापकता चित्रित होगी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्योतिष जोशी ने मृदुला गर्ग और अब्दुल बिस्मिल्लाह से सहमत होते हुए कहा है--‘‘सचमुच एक मुस्लिम द्वारा लिखे गये उपन्यास को ‘मुस्लिम उपन्यास’ और स्त्री द्वारा लिखे गये उपन्यास को ‘स्त्री उपन्यास’ के तहत देखना अनुचित है। उपन्यास में वैयक्तिक, क्षेत्रीय तथा जातीय अस्मिताओं के लिए जगह तो है, पर उन्हें समग्र लेखन के तौर पर देखे जाने की जरूरत है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज बिष्ट यथार्थ-चित्रण के मामले में एक जगह अनुभववादी रुख अपनाते हैं, तो दूसरी जगह यथार्थवादी। मसलन, एक जगह वे जाति, लिंग, क्षेत्र और धर्म से संबंधित विमर्शों वाले लेखन को उचित ठहराते हुए कहते हैं--‘‘अगर मैं पहाड़ी हूँ, तो पहाड़ों में खास तरह की भौगोलिक-सांस्कृतिक स्थितियाँ हैं, जिनमें मैं पला, बढ़ा, पनपा हूँ। पहाड़ी परिवेश के तत्त्व मेरी रचनाओं को व्याख्यायित करते हैं। इसलिए अगर एक मुस्लिम लेखक की रचनाओं को यह कहा जाता है कि वह एक मुस्लिम समाज को अभिव्यक्त कर रहा है, तो मेरे खयाल से इसमें कोई बहुत गलत बात नहीं है, क्योंकि उसके बहाने हमंे उस समाज की जटिलताओं को ज्यादा सूक्ष्म स्तर पर समझने में मदद मिलती है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह वे ‘स्त्री-लेखन’ का समर्थन करते हुए कहते हैं--‘‘स्त्रियों को इस पितृसत्तात्मक समाज में सीमित किया जाता है; उनको घर में रहने को कहा जाता है; उनकी यौनिकता, उनकी शारीरिक सीमाएँ, उनकी सामाजिक सीमाएँ, उनके ऊपर थोपे गये मूल्य, पुरुषवादी वर्चस्व; वे सारी बातें हैं, जिन्हें वे एक अलग तरीके से देख रही हैं। उस तरीके से मैं या फिर अब्दुल बिस्मिल्लाह या और कोई नहीं देख सकता, क्योंकि उनकी बारीकियाँ हमारी समझ में कभी भी नहीं आयेंगी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ भगवानदास मोरवाल पंकज बिष्ट से असहमति और अब्दुल बिस्मिल्लाह से सहमति व्यक्त करते हुए कहते हैं कि स्त्रियाँ स्त्रियों के ही बारे में, दलित दलितों के ही बारे में और मुसलमान मुसलमानों के ही बारे में लिखें, यह गलत है, क्योंकि ‘‘भारतीय समाज की एक बड़ी भारी विशेषता है कि ये सारे समुदाय, सारे समूह इस तरह से गड्डमड्ड हैं, घुले हुए हैं कि आप उनको एक-दूसरे से अलग करके नहीं देख सकते हैं।’’&lt;br /&gt;परिचर्चा के संयोजक जवरीमल्ल पारख मोरवाल से सहमत होते हुए कहते हैं कि भारतीय समाज ‘‘काफी जटिल किस्म का समाज है। उस जटिल समाज के अंदर हम केवल कुछ खास तरह के रूपों को ही यथार्थ मानकर पेश नहीं कर सकते।’’ और फिर पंकज बिष्ट से पूछते हैं कि हमारा साहित्य हमारे उस समग्र यथार्थ से अछूता क्यों है, जो पूरे भारत को प्रभावित कर रहा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रश्न के उत्तर में पंकज बिष्ट पहले कही गयी स्थानीय यथार्थ की अपनी बात से अलग हटकर भूमंडलीय यथार्थ की बात करते हुए कहते हैं कि भूमंडलीकरण से बड़ा संकट पैदा हो गया है, जो लगातार कई रूपों में सामने आ रहा है, जैसे बेरोजगारी, दमन, विस्थापन आदि। उस संकट के ये विभिन्न रूप तात्कालिक रूप से हमारे समाज को प्रभावित कर रहे हैं और अंततः पूरी मानव सभ्यता को प्रभावित करेंगे। लेकिन यह भूमंडलीय यथार्थ हिंदी कथासाहित्य में नहीं आ पा रहा है, क्योंकि हिंदी का लेखक अभी तक इस यथार्थ की चेतना से संपन्न नहीं हो पाया है--‘‘वह लगातार छोटे दायरे में उसको देख रहा है’’, जैसे जातिगत सवाल के रूप में, स्त्री की समस्याओं के सवाल के रूप में या अल्पसंख्यकों के सवाल के रूप में और ‘‘इनसे बड़े सवालों को वह नहीं देख पा रहा है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवरीमल्ल पारख अब्दुल बिस्मिल्लाह से पूछते हैं कि भूमंडलीकरण की पूरी प्रक्रिया हमारे साहित्य में क्यों नहीं दिखायी देती, तो अब्दुल बिस्मिल्लाह कहते हैं कि हमारे यहाँ भारत-विभाजन जैसी बड़ी घटना पर कोई महान कृति नहीं लिखी गयी, जैसे कि विश्व युद्ध पर ‘‘यूरोप के लगभग हर देश में कोई न कोई महान कृति रची गयी।’’ इसका कारण उनके विचार से यह है कि हमारे यहाँ राष्ट्र की वह अवधारणा नहीं है, जो यूरोप में है। यूरोप में जो घटित हुआ, उससे पूरे के पूरे राष्ट्र प्रभावित हुए, केवल कोई जाति विशेष या कोई धर्म विशेष नहीं। जब पूरा राष्ट्र प्रभावित होता है, तो उसकी प्रतिक्रिया भी राष्ट्रीय होती है। अतः वहाँ के लेखक राष्ट्रीय लेखक हैं, वहाँ का लेखन राष्ट्रीय लेखन है। हमारे यहाँ यह अवधारणा विकसित नहीं हो पायी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभूति नारायण राय कहते हैं कि हमारे यहाँ देश का विभाजन होने से लेकर बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने और गुजरात में हुए नरसंहार तक अनेक बड़ी घटनाएँ घटित हुईं, लेकिन ऐसी बड़ी घटनाओं पर भी कोई बड़ी कृति नहीं लिखी गयी, क्योंकि हम अभी तक स्वयं को वर्ण, जाति, क्षेत्र आदि के छोटे दायरों में ही देखते रहे हैं। हम स्वयं को एक राष्ट्र के रूप में नहीं देख पा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे अब्दुल बिस्मिल्लाह से सहमति व्यक्त करते हुए कहते हैं--‘‘नेशन-स्टेट बनने की हमारी प्रक्रिया तो शुरू हो गयी 19वीं शताब्दी के आखिर तक और 1947 के बाद हम लगभग एक नेशन-स्टेट बन गये हैं। लेकिन अभी भी हम नेशन नहीं बन पाये हैं। और  वर्ण-व्यवस्था उसमें सबसे बड़ी बाधा है, जो हमको नेशन बनने से रोकती है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभूति नारायण राय ने यह स्पष्ट नहीं किया कि राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य में क्या फर्क है और उसका साहित्य की रचना तथा आलोचना से क्या संबंध है। यदि करते, तो शायद यह परिचर्चा पुनः उस प्रश्न पर लौटती और उसका उत्तर पाने का प्रयत्न करती, जो इसके आरंभ में उठाया गया था। वह प्रश्न था मुक्ति का प्रश्न--‘‘राजनीतिक अर्थों में ही नहीं, चेतना और दृष्टि के अर्थों में भी मुक्ति’’ का प्रश्न। कारण यह कि जब हम राष्ट्र के संदर्भ में मुक्ति की बात करेंगे, तो राष्ट्र को राष्ट्रवाद से तथा राष्ट्रवाद को साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष से जोड़ेंगे। और तब यह देखना आसान होगा कि अपने राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से तथा उससे निकले समता, स्वतंत्रता और भाईचारे के जनतांत्रिक मूल्यों से हमारे साहित्य का क्या संबंध है। यदि हम ‘हिंदी उपन्यास साहित्य में स्वातंत्र्योत्तर भारत की उपस्थिति’ पर विचार कर रहे हैं, तो हमें यह तो देखना ही होगा कि क्या हम ‘स्वातंत्र्योत्तर भारत’ को वास्तव में एक स्वतंत्र देश मानकर चल रहे हैं? या कि वह आज भी अपनी वास्तविक मुक्ति के लिए संघर्ष करता हुआ देश है? यदि हाँ, तो यह संघर्ष किसके विरुद्ध है? क्या उस नये साम्राज्यवाद के विरुद्ध ही नहीं, जो आज पूँजीवादी भूमंडलीकरण के रूप में अखिल भूमंडल में अपने पाँव पसार रहा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि ये प्रश्न उठाये गये होते, तो यह समझना भी आसान होता कि पूँजीवादी भूमंडलीकरण के रूप में जो एक नया साम्राज्यवाद हमारे सामने है--आर्थिक स्तर पर सर्वत्र नव-उदार पूँजीवाद के थोपे जाने के रूप में, राजनीतिक स्तर पर एकध्रुवीय विश्व-व्यवस्था बनाने के प्रयास के रूप में, सांस्कृतिक स्तर पर विभिन्न प्रकार की अस्मिताओं को उभारकर आपस में लड़ाये जाने के रूप में और सामाजिक स्तर पर वर्ण, लिंग, जाति, क्षेत्र, धर्म, संप्रदाय आदि विभिन्न आधारों पर लोगों को बाँटकर उन पर राज करने के रूप में--उससे मुक्ति पाने के लिए हम क्या कर सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नया साम्राज्यवाद हमारी साहित्यिक रचना और आलोचना के स्तर पर भी हमें प्रभावित कर रहा है। अतः इस स्तर पर भी उससे मुक्ति पाने के लिए प्रतिरोध और संघर्ष करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, हम देखें कि हमारे साहित्य में भक्ति आंदोलन से आज तक विभिन्न प्रकार के आंदोलनों की जो परंपरा रही है, उसका क्या हुआ? ध्यान से देखें, तो 1970 और 1980 के दशकों में स्त्रियों और दलितों ने हिंदी साहित्य में अपनी उपस्थिति ‘स्त्री आंदोलन’ और ‘दलित आंदोलन’ के ही रूप में दर्ज करायी थी। फिर क्या हुआ कि ये ‘आंदोलन’, जो साहित्यिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक आंदोलन भी थे, और एक नया यथार्थ सामने लाकर साहित्य में एक नये यथार्थवाद की माँग कर रहे थे, कब और क्यों ‘विमर्शों’ में बदल गये? यह तब हुआ, जब सोवियत संघ के विघटन और पूँजीवादी भूमंडलीकरण के नये दौर के आगमन के साथ ही एक नयी विचारधारा भी सारी दुनिया में फैलायी गयी थी, जिसका नाम था उत्तर-आधुनिकतावाद। ‘आंदोलनों’ को विस्थापित करके उनकी जगह ‘विमर्शों’ को स्थापित करने का काम इसी विचारधारा ने किया था। मैंने अपनी पुस्तक ‘आज का पूँजीवाद और उसका उत्तर-आधुनिकतावाद’ में बताया था कि उत्तर-आधुनिकतावाद आज के पूँजीवाद की विचारधारा है, जिसे उस समय ‘लेट कैपिटलिज्म’ कहा जाता था और आज ‘निओ-लिबरल कैपिटलिज्म’ के नाम से जाना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अन्यथा’ की परिचर्चा पढ़ते हुए मुझे याद आया कि 1999 में साहित्य अकादेमी ने एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था, जिसका विषय था ‘राष्ट्र की तलाश में उपन्यास’। उसके संदर्भ में मैंने एक निबंध उसी साल लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘साहित्य को राष्ट्र की तलाश?’। यह निबंध मेरे साहित्यिक निबंधों के संग्रह ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ में संकलित है। उसमें मैंने पूँजीवादी भूमंडलीकरण को एक नये साम्राज्यवादी आक्रमण के रूप में देखते हुए लिखा था कि ऐसी स्थिति में साहित्य को यदि राष्ट्र और राष्ट्रवाद की चिंता होती है, तो यह स्वाभाविक ही है। आज राष्ट्रवाद हमारी एक वस्तुगत आवश्यकता बन गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस निबंध में मैंने यह भी लिखा था कि हमारे देश में राष्ट्रवाद के दो रूप रहे हैं। एक वह, जो देश को जोड़ता है और दूसरा वह, जो तोड़ता है। आज की परिस्थिति में साहित्य का कर्तव्य है कि वह जोड़ने वाले राष्ट्रवाद को अपनाये और तोड़ने वाले राष्ट्रवाद से सचेत रहे। तोड़ने वाले राष्ट्रवाद को आज के पूँजीवादी भूमंडलीकरण के संदर्भ में देखना चाहिए, जो यह भ्रम फैला रहा है कि दुनिया एक हो गयी है और दुनिया को अब अलग-अलग राष्ट्रों की कोई जरूरत नहीं रह गयी है। वास्तविकता यह है कि भूमंडलीकरण राष्ट्र-राज्यों के आधार पर ही हो रहा है और राष्ट्र-राज्यों के खत्म हो जाने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है। इसलिए भारतीय साहित्य देश को जोड़ने वाले राष्ट्रवाद को अपनाये, तो उसमें एक नयी जान आ सकती है और इसके सुंदर परिणाम महान कृतियों के रूप में प्राप्त हो सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर इसके लिए हमें आज की दुनिया को एक व्यापक विश्व-दृष्टि से देखना होगा और भूमंडलीय यथार्थ के संदर्भ में अपने देश के यथार्थ को अपनी रचनाओं में चित्रित करना होगा। आलोचना के स्तर पर भी हमें भूमंडलीय यथार्थवाद को अपनाकर अनुभववाद की सीमाओं से मुक्त होना होगा। इस प्रकार हम अपने कथासाहित्य को तो अधिक सुंदर, सार्थक और सोद्देश्य बनायेंगे ही, कथा-समीक्षा की एक नयी दृष्टि और पद्धति के विकास की दिशा में भी आगे बढ़ेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;--&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;रमेश&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);"&gt;उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-2354810894855732430?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/2354810894855732430/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/03/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/2354810894855732430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/2354810894855732430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='अनुभववादी समीक्षा से क्षुब्ध हैं कथाकार'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-3693445972937275050</id><published>2011-02-15T08:12:00.000-08:00</published><updated>2011-02-15T08:13:53.997-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरोकार'/><title type='text'>मेरा ‘गोल्ड’ कहाँ गया?</title><content type='html'>आकाशवाणी का एक चैनल था एफएम गोल्ड, जिस पर बड़े अच्छे-अच्छे कार्यक्रम आते थे। पुराने फिल्मी गीतों के या उन पर आधारित कार्यक्रम। मैं अपने रेडियो पर स्थायी रूप से उसी को लगाये रखता था। जब भी थोड़ा खाली वक्त मिलता, रेडियो ऑन कर देता और उसे सुनने लगता। उस पर समाचार सुनता। पुराने फिल्मी गीत सुनता। ‘तस्वीर’ जैसे कार्यक्रम सुनता। क्रिकेट की कमेंटरी सुनता। ऐसा लगता था, जैसे आपाधापी से भरी इस दुनिया में कोई एक जगह है, जहाँ चैन से बैठा जा सकता है और नये जमाने के साथ चलते हुए भी अपने अतीत से जुड़े रहा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं, यह कोई अतीत-मोह नहीं था, बल्कि उत्कृष्ट प्रसारण शांतिपूर्वक सुनकर आनंदित होना था। एफएम गोल्ड पर फिल्मी गीतों के अलावा शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत भी सुनाये जाते थे, देश-विदेश के दर्शनीय और ऐतिहासिक स्थलों की जानकारी दी जाती थी, कलाकारों और साहित्यकारों के बारे में बताया जाता था और इन कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने वाले स्त्री-पुरुष मनोरंजक बातें करते हुए भी इतने सुशिक्षित, सहृदय और शालीन लगते थे कि जैसे बिलकुल अपने हों और अपनी जैसी बातें करते हों, अपनी जैसी चीजें पसंद करते हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह इतना लोकप्रिय चैनल था कि इसके फोन-इन कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए श्रोता तैयार बैठे रहते थे, बातें करते थे, अपने मित्रों को जन्मदिन की बधाई जैसे संदेश भेजते थे, प्रश्न पूछते थे, अपनी राय भी देते थे। मैं और मुझ जैसे असंख्य लोग एफएम गोल्ड के साथ जीने के आदी हो गये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कुछ दिन पहले एक दिन मैंने रेडियो ऑन किया, तो गोल्ड की जगह कुछ और ही सुनायी पड़ा। ट्यूनिंग करने वाली सुई को मैंने खूब घुमाया-फिराया, कई-कई बार वापस उसी जगह पर लौटकर लगाया, लेकिन गोल्ड हाथ नहीं आया। धक्का-सा लगा। यह क्या हो गया? लगा, जैसे अपनी बहुत पुरानी बेशकीमती चीज खो गयी हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई बतायेगा कि यह क्या घोटाला है? किसने किसको क्या और कितना लाभ पहुँचाने के लिए इतने अच्छे कार्यक्रमों वाले चैनल की हत्या की है? क्या कोई तरीका है कि मैं अपने गोल्ड को वापस पा सकूँ, जो मुझसे जबर्दस्ती छीन लिया गया है? यह एक लेखक और पत्रकार के साथ-साथ एक वरिष्ठ नागरिक की भी पुकार है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-3693445972937275050?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/3693445972937275050/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/02/blog-post.html#comment-form' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/3693445972937275050'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/3693445972937275050'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='मेरा ‘गोल्ड’ कहाँ गया?'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-4837340285160587829</id><published>2011-01-24T06:44:00.000-08:00</published><updated>2011-01-24T06:54:07.853-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>नाम जो भी हो, आन्दोलन चलना चाहिए</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;br /&gt;('&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;कथन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;' &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;जनवरी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;मार्च&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;, 2011 &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;अंक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;प्रकाशित&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(255, 0, 0);"&gt;) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्यिक आंदोलन सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों से भिन्न होते हैं। उन्हें प्रायः नये लेखक चलाते हैं, या ऐसे स्थापित लेखक, जो साहित्य में कुछ नया करना चाहते हैं। आंदोलन में शामिल सब लेखक एक जैसे नहीं होते। उनमें से प्रत्येक अपने लेखन में दूसरों से भिन्न और विशिष्ट होता है। लेकिन वह प्रवृत्तिगत नयापन उन सबमें समान रूप से मौजूद रहता है, जिसके कारण वे पुराने लेखकों या अपने समकालीन अन्य लेखकों से भिन्न होते हैं। उस नयेपन को साहित्य में स्थापित और प्रतिष्ठित करना मुश्किल होता है, अतः इसके लिए एक सामूहिक प्रयास आवश्यक होता है। सामूहिक रूप से उठायी गयी आवाज का असर जल्दी और ज्यादा होता है। यही कारण है कि अपनी विलक्षणता या अद्वितीयता की बात करने वाले लेखक भी कई बार साहित्यिक आंदोलन चलाते पाये जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्यिक आंदोलन में अपने समय के साहित्य की किसी मुख्य प्रवृत्ति पर जोर दिया जाता है। चूँकि एक ही समय के साहित्य में विभिन्न प्रवृत्तियाँ मौजूद रहती हैं, इसलिए आंदोलन में शामिल लेखकों को अपने लेखन की मुख्य प्रवृत्ति की उस नवीनता, सार्थकता और प्रासंगिकता को स्पष्ट करना पड़ता है, जो उसे अन्य प्रवृत्तियों से भिन्न और विशिष्ट बनाती है। यह काम नकारात्मक ढंग से नहीं, सकारात्मक ढंग से किया जाता है। मसलन, आप ‘अकहानी’ जैसा कोई आंदोलन चलाना चाहेंगे, तो नहीं चलेगा; जबकि ‘नयी कहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘समांतर कहानी’, ‘जनवादी कहानी’, ‘स्त्रीवादी कहानी’ या ‘दलितवादी कहानी’ जैसे सकारात्मक नाम वाले आंदोलन चलेंगे; क्योंकि सकारात्मक ढंग से ही आप यह स्पष्ट कर पायेंगे कि आपकी कहानी में नया क्या है और वह पुरानी अथवा समकालीन दूसरी प्रवृत्तियों वाली कहानी की तुलना में क्यों अधिक सार्थक तथा प्रासंगिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी बात को ध्यान में रखकर मैंने ‘परिकथा’ वाले अपने साक्षात्कार में यह कहा था कि नये कहानीकारों को एक नया कहानी आंदोलन चलाना चाहिए। बातचीत के क्रम में यह बात सहज रूप से कह दी गयी थी। इसके पीछे किसी आंदोलन की सुविचारित योजना अथवा परिकल्पना नहीं थी। जब मुझसे पूछा गया कि ‘‘आपके विचार से उस नये आंदोलन का नाम और रूप?’’ तो मैंने कहा था कि ‘‘रूप तो आंदोलन चलाने वाले लेखक ही उसे देंगे, पर मैं एक नाम सुझा सकता हूँ। हमारी इस बातचीत में अभी-अभी दो शब्द आये--बाजारोन्मुखी और भविष्योन्मुखी। तो हम बाजारोन्मुखी कहानी के बरक्स भविष्योन्मुखी कहानी का आंदोलन ही क्यों न चलायें?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है, यह सिर्फ एक सुझाव था, कोई प्रस्ताव नहीं। लेकिन ‘कथन’ द्वारा मेरे उस साक्षात्कार पर आयोजित प्रस्तुत परिचर्चा में व्यक्त किये गये विचारों से लगता है, मानो मैंने खूब सोच-समझकर भविष्योन्मुखी कहानी के आंदोलन का प्रस्ताव किया हो। अतः यहाँ जोर देकर कहना जरूरी है कि आंदोलन यदि चलाना है, तो नये कहानीकारों को ही चलाना है और उसे जो भी नाम और रूप देना है, वह भी उन्हें ही देना है। मेरा ऐसा कोई आग्रह नहीं है कि वे आंदोलन चलायें ही और मेरे द्वारा सुझाये गये नाम से ही चलायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे, साहित्यिक आंदोलनों के नाम न तो बहुत सोच-समझकर रखे जाते हैं और न वे हमेशा बहुत तर्कसंगत ही होते हैं। उदाहरण के लिए, ‘नयी कहानी’, ‘सचेतन कहानी’ और ‘समांतर कहानी’। इनका इतिहास बताता है कि ये नाम अनायास ही रख लिये गये थे और जब चल पड़े, तब इनकी व्याख्याएँ हुईं; इनको उचित सिद्ध करने के प्रयास किये गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई नाम आंदोलन चलाना चाहने वाले, या अनायास चल पड़े आंदोलन में शामिल होने वाले सभी लेखकों को स्वीकार्य हो, यह असंभव है। जिन्होंने साहित्यिक आंदोलन चलाये हैं, या जो उनमें शामिल रहे हैं, जानते हैं कि आंदोलन के नाम से असहमति का कारण उस नाम का संगत या असंगत होना नहीं, बल्कि कुछ और ही होता है। मसलन, किसी एक मुख्य प्रवृत्ति के आधार पर किसी कालखंड या किसी पीढ़ी के लेखन को कोई नाम देना कुछ लोगों को इस कारण असंगत प्रतीत हो सकता है कि इससे उस कालखंड या पीढ़ी के लेखन की दूसरी या अमुख्य प्रवृत्तियाँ दबकर रह जा सकती हैं और कोई एक प्रवृत्ति मुख्य होकर अतिरिक्त, अनावश्यक या अनुचित महत्त्व प्राप्त कर सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा कारण यह है कि साहित्यिक आंदोलन में विचारधारात्मक मतभेदों के चलते विभिन्न प्रकार के लेखक अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार आंदोलन को चलाने के लिए अलग-अलग नाम प्रस्तावित करते हैं और अपने द्वारा प्रस्तावित नाम को ही सही सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ स्थापित हो चुके पुराने या स्थापित हो जाने की आशा रखने वाले नये लेखकों को लगता है कि आंदोलन चला, तो शायद उनकी स्थिति सुरक्षित नहीं रह पायेगी। ऐसे लेखक आंदोलन के नाम से भयभीत होकर आंदोलन के विचार का ही विरोध करने लगते हैं। लेकिन साहित्यिक आंदोलनों के इतिहास को देखकर समझा जा सकता है कि साहित्यिक आंदोलन विभिन्न प्रकार के लेखकों द्वारा अनुभव की जाने वाली किसी ऐतिहासिक आवश्यकता से पैदा होता है और वह एक तरह का संयुक्त मोर्चा होता है, जिसमें विभिन्न विचारधाराओं, विभिन्न कला-सिद्धांतों तथा विभिन्न लेखन-शैलियों वाले लेखक शामिल होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, ‘नयी कहानी’ का आंदोलन स्वतंत्रता के बाद की नयी ऐतिहासिक आवश्यकता से बना एक संयुक्त मोर्चा था, जिसमें विचारधारात्मक दृष्टि से देखें, तो प्रगतिशील, जनवादी, गांधीवादी, लोहियावादी आदि विभिन्न विचारधाराओं वाले कहानीकार शामिल थे। कला-सिद्धांतों की दृष्टि से देखें, तो उसमें यथार्थवादी, अनुभववादी, कलावादी आदि कई प्रकार के लेखक शामिल थे। लेखन-शैलियों की दृष्टि से देखें, तो उसमें आंचलिक या ग्रामीण कहानी लिखने वालों से लेकर कस्बाई, शहरी और महानगरीय परिवेश तक की कहानियाँ लिखने वाले; ठेठ यथार्थवादी, फैंटेसीपरक, हास्य-व्यंग्यमूलक तथा विभिन्न प्रकार के भाषा-प्रयोगों वाली कहानियाँ लिखने वाले भी शामिल थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह प्रगतिशील-जनवादी कहानी के आंदोलन में भी विभिन्न प्रवृत्तियों वाले लेखक अपनी भिन्नता और विशिष्टता को बरकरार रखते हुए शामिल रहे हैं। उदाहरण के लिए, ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, इसराइल, रमेश उपाध्याय, नमिता सिंह, स्वयं प्रकाश आदि एक ही आंदोलन में शामिल रहते हुए भी अपने कहानी-लेखन में एक-दूसरे से भिन्न और विशिष्ट हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी कुछ लोगों को लगता है कि कोई नया आंदोलन चला, तो अनर्थ हो जायेगा। इस भय से वे अपनी स्थिति-रक्षा के लिए सन्नद्ध होकर एक परिवर्तन-विरोधी और यथास्थितिवादी रुख अपना लेते हैं।  हिंदी कहानी में विभिन्न आंदोलनों के साथ-साथ यह आंदोलन-विरोधी प्रवृत्ति भी लगातार चलती रही है। इसके तहत कहानी को किसी मुख्य प्रवृत्ति के आधार पर पहचानने के बजाय दशकों और पीढ़ियों के आधार पर अलगाने की कोशिश की जाती रही है। इस कोशिश में लेखन की तमाम भिन्नताओं और विशिष्टताओं को दबाकर ‘सब धान बाईस पसेरी’ के हिसाब से तोलने वाला काम किया जाता है। मसलन, ‘साठोत्तरी कहानी’ या ‘युवा कहानी’ जैसे नामकरण इसीलिए किये जाते हैं कि एक कालखंड में मौजूद विभिन्न प्रवृत्तियों तथा लेखन की भिन्नताओं और लेखकों की विशिष्टताओं पर पाटा चलाकर ऐसी सपाट जमीन तैयार की जा सके, जिस पर शासकवर्गीय राजनीति के रथ और व्यावसायिकता (आज के संदर्भ में बाजारवाद) की मोटरगाड़ियाँ आराम से दौड़ सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह साहित्य की नयी प्रवृत्तियों को, जो मूलतः स्थापित सत्ता और व्यवस्था का प्रतिपक्ष बनकर उभरती हैं, ‘कोऑप्ट’ (सहयोजित) कर लेने का तरीका है। पुराना, चाहे वह समाज में हो या साहित्य में, आसानी से अपनी जगह नहीं छोड़ता, बल्कि नये को भी अपने साँचे में ढालने की कोशिश करता है और उसे कमजोर पाता है, तो ढाल भी लेता है। कोई भी स्थापित व्यवस्था व्यक्तियों से बड़ी और अधिक शक्तिशाली होती है। ज्यादातर व्यक्तियों को तो वह सहज ही अपने अनुकूल ढाल लेती है और शेष के व्यक्तिगत विद्रोह या विरोध को स्वयं में सहयोजित करके विफल बना देती है। आज के नये लेखकों को साहित्य की पुरानी प्रवृत्तियों से कोई संघर्ष किये बिना ही जो स्वीकृति और मान्यता सहज ही मिल गयी है, वह भी एक प्रकार का ‘सहयोजन’ ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्यिक आंदोलन एक सामूहिक प्रयास होने के कारण इस ‘सहयोजन’ के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वस्तुतः लेखन की स्वतंत्रता और लेखक की निजी विशिष्टता को बचाने का काम करते हैं। शायद इसी कारण सत्ता और व्यवस्था को साहित्यिक आंदोलन रास नहीं आते। आधुनिकतावाद के दौर तक इनको किसी प्रकार बर्दाश्त कर लिया जाता था, लेकिन उत्तर-आधुनिकतावाद के दौर में वह यत्किंचित् सहिष्णुता भी गायब हो गयी। साहित्यिक आंदोलनों का दमन चूँकि उस तरह नहीं किया जा सकता, जिस तरह जन-आंदोलनों का किया जाता है, इसलिए उन्हें एक तरफ कुछ अघोषित सेंसर लगाकर और दूसरी तरफ भाषाई छल-प्रपंचों के जरिये नाकाम किया जाता है। उदाहरण के लिए, हिंदी कहानी में ‘जनवादी कहानी’ के आंदोलन के बाद दो सशक्त आंदोलन उभरे--स्त्रीवादी कहानी और दलितवादी कहानी। लेकिन उत्तर-आधुनिकतावादी भाषाई छल ने उन्हें ‘आंदोलन’ की जगह ‘विमर्श’ बना दिया। नतीजा यह हुआ कि ये दोनों साहित्यिक प्रवृत्तियाँ, जो समाज में चल रहे स्त्रियों और दलितों के आंदोलनों में सहायक हो सकती थीं, समाज से कटकर सिर्फ भाषा का खेल बनकर रह गयीं। ‘विमर्श’ आखिर अंग्रेजी का ‘डिस्कोर्स’ ही है न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘युवा कहानी’ भी इसी प्रकार का एक भाषाई छल है। यह एक प्रकार का ‘मिसनोमर’ (मिथ्या नामकरण) है, जो आज की कहानी पर किन्हीं संपादकों और आलोचकों ने थोप दिया है। वे जानते हैं कि ‘युवा कहानी’ किसी साहित्यिक आंदोलन का नाम नहीं हो सकता। कारण यह कि ‘युवा कहानी’ कहने से कहानीकारों की उम्र का ही संकेत मिलता है, उनके द्वारा लिखी जा रही कहानी के बारे में कुछ पता नहीं चलता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘युवा कहानी’ पद एक भाषाई छल है, जिसकी काट तभी हो सकती है, जब आज के युवा लेखक अपनी कहानी के इस मिथ्या नामकरण को अस्वीकार करें और अपने कहानी लेखन की विभिन्न प्रवृत्तियों की पहचान करते हुए उस मुख्य प्रवृत्ति को--दूसरों के लिए ही नहीं, अपने लिए भी--स्पष्ट करें, जो उनके कहानी लेखन को नया, भिन्न और विशिष्ट बनाती है। अन्यथा यह होगा कि नये कहानीकार अपनी समझ-बूझ से अपना कोई नया कहानी आंदोलन चलाने और स्वयं उसे कोई नाम देने के बजाय ‘युवा कहानी’ जैसे मिथ्या नामकरण को ढोते हुए उनके इशारों पर चलते रहेंगे, जो ऐसे मिथ्या नामकरण किया करते हैं और यह अधिकार अपने पास रखते हैं कि वे किसे युवा कहानीकार मानें और किसे न मानें!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी कहानी में आजकल यही हो रहा है। विभिन्न पत्रिकाओं से सामने आये नये कहानीकारों की कुल संख्या बहुत बड़ी है, लेकिन चर्चा बार-बार उनमें से कुछ गिने-चुने कहानीकारों की ही होती है। जिनकी नहीं होती, वे उपेक्षित महसूस करते हैं और इस ‘अन्याय’ से क्षुब्ध भी रहते हैं। लेकिन उनकी समझ में नहीं आता कि यह क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। अपने साथ होने वाले ‘अन्याय’ की शिकायत करते हुए वे जहाँ-तहाँ थोड़ी भड़ास निकालते हैं, लेकिन सावधान भी रहते हैं कि ‘युवा कहानी’ के भाग्य- विधाता कहीं उनसे नाराज न हो जायें। उन्हें लगता है कि ‘युवा पीढ़ी’ को सामने लाने वाले और ‘युवा कहानी’ का भविष्य निर्धारित करने वाले तो वे ही हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी साहित्य में युवा पीढ़ियाँ पहले भी पैदा होती रही हैं, लेकिन उनसे संबंधित नये लेखक अपनी अलग पहचान के लिए किन्हीं भाग्य-विधाताओं पर निर्भर रहने के बजाय प्रायः साहित्यिक आंदोलन चलाते रहे हैं, जिनसे वे भी आगे बढ़े हैं और साहित्य भी आगे बढ़ा है। यह अवश्य है कि इसके लिए उन्होंने ‘‘एकला चलो’’ के बजाय ‘‘मिलकर चलो’’ की नीति अपनाकर, साथ बैठकर आपस में सघन और विस्तृत बहसें चलायी हैं, छोटी-छोटी पत्रिकाएँ निकाली हैं, छोटे-बड़े मंच बनाये हैं और रचना तथा आलोचना के जरिये अपने लेखन के नयेपन को, उसकी भिन्नता और विशिष्टता को प्रमाणित तथा स्थापित किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, जनवादी कहानी का आंदोलन जब चला, तब भी हिंदी कहानीकारों की लगभग चार पीढ़ियाँ एक साथ कहानी लिख रही थीं। उनमें ‘नयी कहानी’, ‘अकहानी’, ‘सचेतन कहानी’ और ‘समांतर कहानी’ नामक आंदोलनों से संबंधित कहानीकार भी थे। हालाँकि उस समय ‘समांतर’ को छोड़कर शेष आंदोलन समाप्त हो चुके थे, फिर भी उनसे संबंधित रहे लेखक उनकी कुछ प्रवृत्तियों को जीवित रखे हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘जनवादी कहानी’ के सामने एक समस्या यह भी थी कि वह स्वयं को ‘प्रगतिशील कहानी’ से कैसे अलगाये, क्योंकि दोनों की विचारधारा लगभग एक-सी थी। कुछ लोगों ने दलगत आधार पर उनका अंतर स्पष्ट करने का प्रयास किया कि ‘प्रगतिशील कहानी’ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) से जुड़े कहानीकार लिखते हैं, जबकि ‘जनवादी कहानी’ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और जनवादी लेखक संघ (जलेस) से जुड़े कहानीकार। यद्यपि ऐसा फर्क करना सरासर गलत था और कहानीकारों ने इसका प्रतिवाद भी किया था, फिर भी यह फर्क किया गया, क्योंकि प्रलेस से जुड़े लोग, जो जलेस के निर्माण से खुश नहीं थे, ‘जनवादी कहानी’ के आंदोलन से भी खुश नहीं थे। नामवर सिंह ने स्पष्ट रूप से इस नामकरण को असाहित्यिक बताते हुए इस नये आंदोलन को नकारने का प्रयास किया था। लेकिन अंततः जिस तरह प्रलेस और जलेस दोनों संगठन मौजूद रहे, उसी तरह प्रगतिशील और जनवादी कहानी के आंदोलन भी चलते रहे। कालांतर में मुझ जैसे कुछ कहानीकारों ने दोनों के सहअस्तित्व को पहचानते हुए, किंतु उस समय लिखी जा रही प्रगतिशील कहानी को पुराने प्रगतिशील आंदोलन के समय की कहानी से भिन्न मानते हुए, पूरे आंदोलन को प्रगतिशील-जनवादी कहानी का आंदोलन कहना शुरू किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज इस बात पर बहस हो सकती है कि प्रगतिशील-जनवादी कहानी का आंदोलन कैसा था, उसके अंतर्गत कैसी कहानियाँ लिखी गयीं, और अंततः उस आंदोलन ने हिंदी साहित्य को क्या दिया; लेकिन यह तो इस आंदोलन के विरोधी भी मानेंगे कि उसने अपने समय की दो प्रचलित प्रवृत्तियों-- फैशनपरस्ती और व्यावसायिकता--के विरुद्ध एक सफल संघर्ष चलाया और हिंदी कहानी को ही नहीं, बल्कि समूचे साहित्य को ही जनोन्मुख बनाने का प्रयास किया। इसी का परिणाम था कि हिंदी में नुक्कड़ नाटक जैसी एक नयी विधा अस्तित्व में आयी, जो साहित्य को सीधे जनता से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास थी। यह आकस्मिक नहीं था कि नुक्कड़ नाटक लिखने की शुरूआत असगर वजाहत, रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश आदि प्रगतिशील-जनवादी कहानीकारों ने की थी।&lt;br /&gt;लेकिन आज के युवा लेखकों को या तो अपने साहित्य की इस आंदोलनधर्मी परंपरा का पता नहीं है, या वे कुछ अजीब-से तर्कों के सहारे उससे पल्ला झाड़ लेने में यकीन रखते हैं। इसके कुछ उदाहरण ‘कथन’ की प्रस्तुत परिचर्चा में भी मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तर्क यह है कि जब समाज में ही कोई आंदोलन नहीं है, तो साहित्य में कहाँ से होगा। इसे सिद्ध करने के लिए प्रभात रंजन मेरी कहानी ‘प्राइवेट पब्लिक’ से एक वाक्य उद्धृत करते हुए लिखते हैं--‘‘कहानी में बुद्धिप्रकाश कहता है, ‘जनता लुट रही है, फिर भी कोई विरोध या प्रतिरोध नहीं हो रहा है।’ जब समाज में ही प्रतिरोध कम होता जा रहा है, तो क्या आंदोलन की जरूरत केवल कहानी को है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यहाँ कहानी के एक वाक्य को उसके संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया है। कहानी में बुद्धिप्रकाश के उक्त कथन का प्रतिवाद करते हुए शिवदत्त कहता है--‘‘क्या हमें जनता की लूट प्रत्यक्ष दिखायी देती है? हम स्वयं कहाँ-कहाँ और किस-किस तरह लुटते हैं, हमें पता चलता है? तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि लूट का विरोध या प्रतिरोध भी हमें प्रत्यक्ष न दिखायी देता हो?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राकेश बिहारी तो और भी कई कदम आगे बढ़कर कहानी की आंदोलनधर्मिता का विरोध करते हुए कहते हैं कि ‘‘जब गरीबी, महँगाई, गैर-बराबरी और भ्रष्टाचार जैसे आम जन के मुद्दों पर आंदोलन करने वाली शक्तियाँ प्रतिरोध के बदले प्रतिरोध का व्यापार चलाने में व्यस्त हों, कहानियों में सामूहिक प्रतिरोध की माँग करना कितना न्यायसंगत हो सकता है...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि मैंने पहले कहा, कुछ लेखक आंदोलन के नाम से ही भयभीत होकर परिवर्तन-विरोधी और यथास्थितिवादी रुख अपना लेते हैं। राकेश बिहारी इसी प्रवृत्ति का परिचय देते हुए कहते हैं--‘‘आज का लेखक दो मोर्चों पर लड़ रहा है। अपनी निजी और पारिवारिक जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करते हुए या कि उसके उपाय खोजने की जद्दोजहद करते हुए लिखना कोई खेल नहीं है। उसे साहित्य तो लिखना ही है, अपनी संततियों से यह भी नहीं सुनना है कि ‘लेखक होकर आपने समाज के लिए क्या किया, पता नहीं, लेकिन हमारे लिए क्या किया?’ विगत में देखे गये सपनों के टूटने और सामने से आकर्षित कर रही सुख-सुविधाओं की नयी दुनिया की अभिसंधि पर बैठा नया लेखक पूर्णकालिक और परंपरागत अर्थों में रूढ़ हो चला आंदोलनधर्मी लेखन नहीं कर सकता।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वे जिन दो मोर्चों पर लेखक के लड़ने की बात करते हैं, उन पर क्या आज का ही लेखक लड़ रहा है? पहले के लेखक नहीं लड़ते रहे हैं? क्या साहित्यिक आंदोलन चलाने वाले लेखक निजी या पारिवारिक स्तर पर गैर-जिम्मेदार होते हैं? क्या वे किसी पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता की तरह होते हैं, जो आंदोलनधर्मी लेखन के सिवा कुछ और नहीं करते? क्या नये लेखकों को साहित्यिक आंदोलन चलाने का सुझाव देना उनसे ‘‘कहानियों में सामूहिक प्रतिरोध की माँग करना’’ अथवा ‘‘रूढ़ हो चला आंदोलनधर्मी लेखन’’ करने के लिए कहना है? और सबसे बड़ा सवाल: क्या आज का समाज सचमुच आंदोलनरहित है? क्या किसानों, मजदूरों, विस्थापितों, स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों आदि के द्वारा किये जा रहे आंदोलन आंदोलन नहीं हैं? क्या ये तमाम आंदोलन ‘‘प्रतिरोध के बदले प्रतिरोध का व्यापार’’ हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर, जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा, साहित्यिक आंदोलन सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों से भिन्न होते हैं। वे सामाजिक- राजनीतिक आंदोलनों से प्रेरणा ले सकते हैं और किसी हद तक उनकी मदद भी कर सकते हैं, लेकिन उन पर निर्भर रहने वाले या उनका अनुसरण करने वाले नहीं होते। अपनी तमाम सामाजिक सोद्देश्यता और राजनीतिक प्रतिबद्धता के बावजूद साहित्य की अपनी कुछ स्वायत्तता और साहित्यकार की अपनी कुछ स्वतंत्रता होती है। उसी के आधार पर वह वर्तमान सामाजिक यथार्थ का अतिक्रमण कर भविष्य के स्वप्न देखने-दिखाने वाला और प्रेमचंद के शब्दों में राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने वाला बनता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसा साहित्य और साहित्यकार यथार्थवादी होता है, यथास्थितिवादी नहीं। फिर, जिस तरह यथार्थ निरंतर गतिशील और परिवर्तनशील होता है, उसी तरह यथार्थवाद भी सदा एक-सा नहीं रहता। इसीलिए उसके नाम और रूप बदलते रहते हैं। किंतु हिंदी कहानी पर अनुभववाद की--यानी अपने जिये-भोगे को ही यथार्थ मानकर चलने की--प्रवृत्ति इस कदर हावी है कि यथार्थवाद की बात सुनकर ही कई कहानीकार डर जाते हैं। शायद उन्हें लगता है कि अनुभववादी ढंग से कहानी लिखने का आसान, सुविधाजनक और सुरक्षित रास्ता छोड़ यथार्थवादी लेखन करना पड़ा, तो वे मुश्किल में पड़ जायेंगे। राकेश बिहारी इसी प्रवृत्ति का परिचय देते हुए भूमंडलीय यथार्थवाद के नाम से भयभीत हो जाते हैं। यहाँ तक कि वे ‘‘भूमंडलीय यथार्थ का हौवा और उसका भय खड़ा करने’’ की पुनरुक्ति के भी शिकार हो जाते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की दुनिया में ऊपर से थोपे जा रहे पूँजीवादी भूमंडलीकरण के विरुद्ध नीचे से हो रहे जनगण के भूमंडलीकरण की जो प्रक्रिया चल रही है, वह भूमंडलीय यथार्थ को बदलने के साथ-साथ यथार्थवाद का भी एक नया रूप सामने ला रही है। मैं उसी को भूमंडलीय यथार्थवाद कहता हूँ। जरूरत उससे डरने या बिदकने की नहीं, कहानी-लेखन में उसे साहसपूर्वक अपनाने की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छी बात यह है कि आज के नये कहानीकारों में से कुछ यदि आंदोलन चलाये जाने के खिलाफ हैं, तो बहुत-से उसके पक्ष में भी हैं। मसलन, प्रस्तुत परिचर्चा में मनीषा कुलश्रेष्ठ ने लिखा है कि अब युवा लेखकों को एक होना चाहिए और मिल-जुलकर एक आंदोलन चलाना चाहिए--‘‘साहित्य के भविष्योन्मुख होने का आंदोलन, बाजारवाद से बचकर बाजार में होने की कला का आंदोलन, अंतरराष्ट्रीय स्तर तक हिंदी कथा-साहित्य को पहुँचाने का आंदोलन...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनीषा कुलश्रेष्ठ अपनी टिप्पणी में आलोचना और आत्मालोचना करते हुए  एक नये आंदोलन के रूप का ही नहीं, उसकी अंतर्वस्तु का भी संकेत करती हैं। वे कहती हैं--‘‘बहुत पुराना हुआ जादुई यथार्थवाद, इसके बाद आया ‘इन्फ्रा-सर्रियलिज्म’ भी!...इस समय में ‘जादुई यथार्थवाद’ हमारी जरूरत नहीं, भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा को समझना हमारी जरूरत है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह मनोज कुलकर्णी भी एक नये साहित्यिक आंदोलन की जरूरत महसूस करते हुए एक ऐसी लामबंदी को संभव बनाने की बात करते हैं, ‘‘जो भूमंडलीकृत दुनिया की मायावी ताकत को सीधे सींगों से पकड़े। जाहिर है, यह काम मुश्किल है, चुनौतीपूर्ण और खतरनाक भी। पर जरूरी भी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं योगेंद्र आहूजा की इस बात से पूरी सहमति व्यक्त करना चाहता हूँ कि ‘‘हर दौर में नये कहानीकार कहानियों के लिए नये स्वरूप, संरचना, नये शिल्प और कथा विधियों की तलाश करते हैं, जो हमेशा स्वागतयोग्य है। इसी तरह विधाओं का विकास होता है।’’ लेकिन मैं इसमें अपने साक्षात्कार में कही गयी यह बात जोड़ना चाहता हूँ कि विकास की गति सदा इकसार और काल-क्रमानुसार नहीं होती, क्योंकि विकास हमेशा अंतर्विरोधों के बीच होता है। साहित्य में ये अंतर्विरोध दशकों और पीढ़ियों के बीच न होकर सामाजिक यथार्थ के प्रति अपनाये जाने वाले दृष्टिकोणों के बीच और रचना में अपनाये जाने वाले कला-सिद्धांतों के बीच होते हैं और इन पर नये कहानीकारों को सार्थक बहसें चलानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे प्रसन्नता है कि योगेंद्र आहूजा इसके लिए कहानी आंदोलन की जरूरत महसूस करते हुए लिखते हैं कि ‘‘ऐसा कोई आंदोलन शुरू होता है, तो उसका सबसे जरूरी हिस्सा होगा उन बौद्धिक, वैचारिक, अवधारणापरक बहसों को पुनर्जीवित कर पाना, जिनकी हिंदी में बहुत मजबूत रवायत रही है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंततः बाजार को मुक्तिदाता मानने वाले कहानीकारों से एक सवाल: बाजार जब पत्रकारों को ‘पेड न्यूज’ लिखने का पेशा करने वाला बना सकता है, तो क्या कहानीकारों को ‘पेड फिक्शन’ लिखने का पेशा करने वाला नहीं बना सकता? क्या इस नियति के विरुद्ध आंदोलन चलाना एक ऐतिहासिक जरूरत नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;रमेश&lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-4837340285160587829?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/4837340285160587829/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/4837340285160587829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/4837340285160587829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='नाम जो भी हो, आन्दोलन चलना चाहिए'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-5034051764834782626</id><published>2010-12-20T08:01:00.000-08:00</published><updated>2010-12-20T08:07:37.396-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>जब मैंने पहली बार प्रेमचंद को पढ़ा</title><content type='html'>जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की एक शोध छात्रा गुलशन बानो का संदेश आया कि वहाँ के शोध छात्र एक योजना के तहत ‘‘जब मैंने पहली बार प्रेमचंद को पढ़ा’’ विषय पर प्रतिष्ठित विद्वानों, लेखकों और आलोचकों के लेखों का एक संग्रह प्रकाशित करना चाहते हैं। उन्होंने लिखा--‘‘आलोचना और संस्मरण के इस समन्वित प्रयास के माध्यम से हम यह भी जानना चाहते हैं कि प्रेमचंद के साहित्य ने आपके व्यक्तित्व को किस तरह प्रभावित किया।’’ इसके उत्तर में मैंने यह लिखा :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1953 की बात है। मैं उत्तर प्रदेश के एटा जिले की तहसील कासगंज के एक हाई स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ता था। पढ़ता क्या था, छठी पास करने के बाद सातवीं में आया ही था। जुलाई का महीना था। गरमी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुल गया था। मेरे लिए नयी कक्षा की किताबें आ गयी थीं। नयी छपी हुई किताबों की गंध, जो पता नहीं, नये कागज की होती थी या उस पर की गयी छपाई में इस्तेमाल हुई सियाही की, या जिल्दसाजी में लगी चीजों की, या बरसात के मौसम में कागज में आयी हल्की-सी सीलन की, मुझे बहुत अच्छी लगती थी। ज्यों ही मेरे लिए नयी किताबें आतीं, मैं सबसे पहले अपनी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक पढ़ डालता। सो एक दिन स्कूल से लौटकर मैं अपनी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक पढ़ रहा था, जिसमें एक पाठ था ‘बड़े भाई साहब‘। पुस्तक में अवश्य ही लिखा रहा होगा कि यह कहानी है और इसके लेखक हैं प्रेमचंद। लेकिन इस सबसे मुझे क्या! मैं तो ‘बड़े भाई साहब’ शीर्षक देखकर ही उसे पढ़ने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसमें बड़े भाई साहब के बारे में मैंने पढ़ा :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘वह स्वभाव से बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिड़ियों, कुत्तों, बिल्लियों की तस्वीरें बनाया करते थे। कभी-कभी एक ही नाम या शब्द या वाक्य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुंदर अक्षरों से नकल करते। कभी ऐसी शब्द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैंने यह इबारत देखी--स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राधेश्याम, श्रीयुत राधेश्याम, एक घंटे तक--इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था।...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ते-पढ़ते मुझे इतनी जोर की हँसी छूटी कि रोके न रुके। घर के लोगों ने मेरी हँसी की आवाज सुनकर देखा कि मैं अकेला बैठा हँस रहा हूँ, तो उन्होंने कारण पूछा और मैं बता नहीं पाया। मैंने खुली हुई किताब उनके आगे कर दी और उँगली रखकर बताया कि जिस चीज को पढ़कर मैं हँस रहा हूँ, उसे वे भी पढ़ लें। उन्होंने भी पढ़ा और वे भी हँसे, हालाँकि मेरी तरह नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में, न जाने कब, मुझे पता चला कि ‘बड़े भाई साहब’ कहानी थी और वह प्रेमचंद की लिखी हुई थी। और उसके बाद तो मैं कहानियाँ और खास तौर से प्रेमचंद की कहानियाँ ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ने लगा। लेकिन प्रेमचंद की यह कहानी मुझे हमेशा के लिए अपनी एक मनपंसद कहानी के रूप में याद रह गयी। बाद में मैंने इसे कई बार पढ़ा है, पढ़ाया भी है, लेकिन आज भी उन पंक्तियों को पढ़कर मुझे हँसी आ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि यह प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का असर था या कुछ और, लेकिन मेरे साथ यह जरूर हुआ कि मैंने अपनी पढ़ाई को कभी उस कहानी के बड़े भाई साहब की तरह गंभीरता से नहीं लिया। हमेशा खेलता-कूदता रहा और अच्छे नंबरों से पास भी होता रहा। हो सकता है, यह उस कहानी का ही असर हो कि बाद में जब मैं लेखक बना, तो हल्का-सा यह अहसास मेरे मन में हमेशा रहा कि रचना पाठक को प्रभावित करती है--वह कभी उसे हँसाती है, कभी रुलाती है, कभी गुस्सा दिलाती है, कभी विपरीत परिस्थितियों से लड़ने का हौसला बँधाती है और लड़ाई में जीतने की उम्मीद भी जगाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-5034051764834782626?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/5034051764834782626/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2010/12/blog-post_20.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/5034051764834782626'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/5034051764834782626'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2010/12/blog-post_20.html' title='जब मैंने पहली बार प्रेमचंद को पढ़ा'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-1359252260970206087</id><published>2010-12-08T08:52:00.000-08:00</published><updated>2010-12-08T08:57:36.930-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>कथाकार इसराइल और उनकी कहानी ‘फर्क’</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/TP-42k80MvI/AAAAAAAAAEQ/5Vu-vmLw6AA/s1600/israil.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 248px; height: 320px;" 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योजना के तहत हिंदी कथा यात्रा की आधी सदी के मोड़ों का आकलन होगा। इसमें चर्चित कथाकारों द्वारा चुनी गयी ऐसी कहानियाँ प्रकाशित की जायेंगी, जो मील का पत्थर सिद्ध हुईं और यह भी बताया जायेगा कि क्यों हैं ये मील का पत्थर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘नवनीत’ के संपादक विश्वनाथ सचदेव मेरे पुराने मित्र हैं। जब उन्होंने मुझसे कहा कि मैं ऐसी किस मील पत्थर कहानी पर लिखना चाहूँगा, तो मैंने कहा--इसराइल की कहानी ‘फर्क’ पर। विश्वनाथ ने सहर्ष मेरे प्रस्ताव को स्वीकार किया और ‘फर्क’ पर टिप्पणी लिखने के साथ-साथ इसराइल का फोटो और परिचय भी भेजने को कहा। टिप्पणी के साथ परिचय तो मैंने आसानी से लिख दिया, लेकिन इसराइल का फोटो मेरे पास नहीं था। और उसे प्राप्त करना एक ऐसी समस्या बन गया कि उसे हल करने के लिए मैंने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक के अपने कई मित्रों को परेशान कर डाला। फिर भी जब यह समस्या हल न हुई, तो मैंने अपनी पुरानी तस्वीरों के जखीरे को खँगाला और एक ग्रुप फोटो में इसराइल को ढूँढ़ निकाला। वह फोटो यह है, जिसमें भैरवप्रसाद गुप्त, अमरकांत, मार्कंडेय, इसराइल, दूधनाथ सिंह, विमल वर्मा, सतीश जमाली, आनंद प्रकाश आदि के साथ मैं भी हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसराइल का जन्म बिहार के एक गाँव (महम्मदपुर, जिला छपरा) में हुआ था, इसलिए किसानों और खेतिहर मजदूरों के जीवन का यथार्थ तो उनका खूब जाना-पहचाना था ही, बाद में उनके जीवन का अधिकांश महानगर कलकत्ता में मजदूरी करते और फिर मजदूर वर्ग की राजनीति में सक्रिय रहते बीता। वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कुलवक्ती कार्यकर्ता, उसके मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ में काम करने वाले पत्रकार और जनवादी लेखक संघ के संस्थापक तथा सम्मानित सदस्य रहे। इस प्रकार वे सही मायनों में सर्वहारा वर्ग के लेखक थे। उन्होंने कम लिखा (उनकी कुल तीन ही पुस्तकें हैं--दो कहानी संग्रह ‘फर्क’ और ‘रोजनामचा’ तथा एक उपन्यास ‘रोशन’), लेकिन अच्छा लिखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने पहले कहानी संग्रह ‘फर्क’ (1978) की भूमिका में उन्होंने लिखा--‘‘एक मार्क्सवादी के रूप में मेरे कलाकार ने सीखा है कि सिर्फ वही सच नहीं है, जो सामने है, बल्कि वह भी सच है, जो कहीं दूर अनागत की कोख में जन्म लेने के लिए कसमसा रहा है। उस अनागत सच तक पहुँचने की प्रक्रिया को तीव्र करने के संघर्ष को समर्पित मेरे कलाकार की चेतना अगर तीसरी आँख की तरह अपने पात्रों में उपस्थित नजर आती हो, तो यह मेरी सफलता है। दूसरे इसे जो भी समझें।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसराइल के कथा-लेखन में उनकी यह ‘तीसरी आँख’ ही उन्हें अपने समकालीन कथाकारों से भिन्न और विशिष्ट बनाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1970 के आसपास जब इसराइल की कहानी ‘फर्क’ प्रकाशित हुई थी, मैं ‘सारिका’ में ‘परिक्रमा’ नामक स्तंभ लिखा करता था। उसमें मैं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों की चर्चा किया करता था। सबसे पहले मैंने ही ‘फर्क’ की ओर पाठकों का ध्यान खींचा था। उसके बाद, मेरी टिप्पणी का हवाला देते हुए, आरा (बिहार) से निकलने वाली पत्रिका ‘वाम’ के संपादक चंद्रभूषण तिवारी ने ‘फर्क’ पर पूरा संपादकीय लिखा और इस कहानी की धूम मच गयी। इसराइल का पहला कहानी संग्रह ‘फर्क’ नाम से ही छपा और अब यह हिंदी की श्रेष्ठ कहानियों में गिनी जाती है। ‘श्रेष्ठ हिंदी कहानियाँ: 1970-80’ नामक संकलन में इसे ‘‘हिंदी की एक मील पत्थर कहानी’’ बताते हुए संकलन के संपादक स्वयं प्रकाश ने इस कहानी और इसके लेखक इसराइल के बारे में लिखा है :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘इसराइल जीवन भर श्रमिक आंदोलन से जुड़े रहे, इसलिए वे अपने जीवनानुभव को बहुत आसानी, कुशलता और प्रामाणिकता के साथ कहानी में विन्यस्त कर सकते थे। उन्होंने ऐसा किया भी, और इसीलिए उनके विवरणों में चंचल आक्रोश या चपल उत्तेजना नहीं, एक प्रौढ़ ठंडापन दिखायी देता है। लेकिन ‘फर्क’ में वे एक महान रचनाकार की तरह भारत में भूमि सुधार न हो पाने और सामंतवाद के लगभग सही-सलामत बचे रह जाने के गहरे कारणों की ओर इशारा करते हैं। वे कृषि क्रांति के बरक्स सर्वोदय को रखकर दिखाते हैं और प्रसंगवश इसी में हिंसा-अहिंसा का प्रश्न उठ खड़ा होता है। सर्वोदय-भूदान-ग्रामदान आदि का पूरा अभियान सामंतों की उपजाऊ जमीनों को छिनने से बचाने का एक सत्तापोषित उपक्रम था। यह वह जमाना था, जब ‘कम्युनिस्ट’ एक गाली थी और कम्युनिस्टों से तर्क करने के बजाय उन्हें सिर्फ एक शब्द ‘हिंसा’ की लाठी से पीटकर एरीना से बाहर कर दिया जाता था। इस शानदार और यादगार कहानी को लिखते समय शायद इसराइल को भी अंदाजा नहीं होगा कि सर्वोदय को श्रमिकों के कटघरे में खड़ा करके दरअसल वे गांधीवादी अर्थशास्त्र का मर्सिया लिख रहे हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ ‘फर्क’ के विस्तृत समीक्षात्मक विश्लेषण का अवकाश नहीं है, अतः मैं अत्यंत संक्षेप में केवल तीन तथ्यों की ओर संकेत करना चाहता हूँ, जिन्होंने इसे हिंदी कहानी की विकास-यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ लाने वाली कहानी बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक : इस कहानी की चर्चा और प्रतिष्ठा से पहले हिंदी कहानी में ‘अकहानी’ की वह प्रवृत्ति हावी थी, जिसमें तत्कालीन सामाजिक यथार्थ की तथा हिंदी कहानी की यथार्थवादी परंपरा की उपेक्षा करते हुए ऊलजलूल किस्म की कहानियाँ लिखी जा रही थीं। ‘फर्क’ ने सामाजिक यथार्थ के सशक्त चित्रण से प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को पुनः प्रतिष्ठित किया और किसानों-मजदूरों के संघर्ष को कहानी के केंद्र में रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो : ‘अकहानी’ के दौर में हिंदी कहानी सामाजिक यथार्थ से तथा यथार्थवादी चित्रण से इतनी दूर जा चुकी थी कि उस दौर की ज्यादातर कहानियाँ ऊलजलूल ढंग से लिखी जाती थीं, जिनका कोई सिर-पैर समझना अक्सर मुश्किल होता था। कहानी में कोई सुसंबद्ध और तर्कसंगत घटनाक्रम नहीं होता था और जीते-जागते वास्तविक मनुष्यों जैसे चरित्रों की जगह हवाई किस्म के नाम-रूपहीन पात्र होते थे, जिन्हें केवल ‘मैं’ या ‘वह’ कहा जाता था। ऐसे निष्क्रिय और निर्जीव पात्रों की निरुद्देश्य और निरर्थक कहानियों के दौर में इसराइल की कहानी ‘फर्क’ ने एक ऐसा सर्जनात्मक हस्तक्षेप किया कि कहानियों में जीते-जागते, हाड़-मांस वाले, अपने नाम और काम से पहचाने जाने वाले सशक्त और संघर्षशील चरित्र (‘पात्र’ नहीं, ‘चरित्र’) आने लगे। ‘फर्क’ से पहले की बहुत-सी कहानियों का आदमी ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’ था, जबकि इसके बाद की कई कहानियों के शीर्षक अपने चरित्रों के नामों पर रखे गये, जैसे ‘सुधीर घोषाल’ (काशीनाथ सिंह), ‘देवीसिंह कौन?’ (रमेश उपाध्याय), ‘बलैत माखुन भगत’ (विजयकांत) इत्यादि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन : ‘अकहानी’ के दौर में हिंदी कहानी मुख्य रूप से महानगरीय मध्यवर्गीय जीवन की कहानी बनकर रह गयी थी, लेकिन ‘फर्क’ की चर्चा और प्रतिष्ठा के बाद हिंदी कहानी में गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों के लोगों के--मुख्य रूप से किसानों और मजदूरों के--जीवन तथा संघर्ष की कहानियाँ लिखी जाने लगीं, जिनसे हिंदी में जनवादी कहानी के आंदोलन की शुरूआत हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-1359252260970206087?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/1359252260970206087/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/1359252260970206087'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/1359252260970206087'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='कथाकार इसराइल और उनकी कहानी ‘फर्क’'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/TP-42k80MvI/AAAAAAAAAEQ/5Vu-vmLw6AA/s72-c/israil.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-6594772367269795446</id><published>2010-11-29T07:44:00.000-08:00</published><updated>2010-11-29T07:50:27.413-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>कहानी में भूमंडलीय यथार्थ ऐसे भी आ सकता है!</title><content type='html'>मनोज रूपड़ा को मैंने ज्यादा नहीं पढ़ा है। उसकी कुछ ही कहानियाँ पढ़ी हैं और उनमें से एक ही मुझे याद रह गयी है--‘साज-नासाज’। मैं इस कहानीकार को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता। कभी पत्र या फोन से भी संवाद नहीं हुआ। उसने मुझे पढ़ा है या नहीं, मुझे नहीं मालूम। लेकिन इससे क्या? जिस लेखक की कोई कहानी मुझे पसंद आ जाती है और याद रह जाती है, उसकी नयी कहानी सामने आ जाये, तो मैं जरूर पढ़ लेता हूँ, चाहे पढ़कर निराश ही क्यों न होना पड़े। सो मनोज रूपड़ा की नयी कहानी ‘आमाजगाह’ देखी, तो लंबी होने के बावजूद मैं उसे पढ़ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल हिंदी कहानियों के शीर्षक अक्सर अंग्रेजी या अरबी-फारसी के शब्दों से बनाये जाने लगे हैं। इसका गुनाहगार मैं खुद भी हूँ। मैंने भी अपनी कई कहानियों के नामकरण इसी तरह किये हैं। मसलन, ‘डॉक्यूड्रामा’, ‘प्राइवेट पब्लिक’ या ‘त्रासदी...माइ फुट!’ इसी तरह लक्ष्मी शर्मा ने अपनी एक कहानी का शीर्षक अरबी में रखा ‘खते मुतवाजी’, जिसका अर्थ होता है समानांतर रेखा और मनोज रूपड़ा ने अपनी नयी कहानी का शीर्षक फारसी में रखा है ‘आमाजगाह’, जिसका अर्थ है लक्ष्यस्थान या गंतव्य। मैं अरबी-फारसी नहीं जानता, अतः इन दोनों कहानियों को पढ़ने से पहले मुझे इनके शीर्षकों के अर्थ शब्दकोश में देखने पड़े। ‘आमाजगाह’ का अर्थ देखते समय मुझे यह शे’र भी पढ़ने को मिला:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस्मत मेरे सिवा तुझे कोई मिला नहीं&lt;br /&gt;आमाजगाहे-जौर बनाया किया मुझे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, मैं कहानी पढ़ गया। लंबी है, लेकिन उबाऊ नहीं। मनोज रूपड़ा पर शायद हिंदी फिल्मों का काफी असर है कि उसकी कहानियाँ सीन-दर-सीन कुछ इस तरह लिखी हुई होती हैं कि चाहे तो कोई आसानी से पटकथा लिखकर फिल्म बना ले। और इस कहानी में तो मुंबई और अरब सागर, इलाहाबाद और गंगा-यमुना का संगम तथा उदयपुर और थार का रेगिस्तान बड़े भव्य और प्रभावशाली फिल्मी दृश्यों के रूप में चित्रित किये गये हैं। खास तौर से रेगिस्तान के दृश्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी एक संगीतकार की है, बल्कि दो संगीतकारों की, जिनमें से एक पुरुष है, जो अपनी कहानी कह रहा है और दूसरी एक स्त्री, जिसका नाम जेसिका कोहली उर्फ जिप्सी कैट है और जो ‘‘सिक्ख बाप और कैनेडियन माँ की औलाद’’ है। कैट अंतररष्ट्रीय रूप से प्रसिद्ध एक शो-डिजायनर है और ‘मैं’ उसकी बहुराष्ट्रीय कंपनी में अनुबंधित एक म्यूजिक कंपोजर। (मनोज रूपड़ा को संगीत की अच्छी जानकारी है, जो उसकी कहानी ‘साज-नासाज’ में भी दिखी थी।) लेकिन वर्तमान के इन दोनों पात्रों के माध्यम से एक पुरानी दरबारी गायिका अस्मत जाँ और उसके साथ संगत करने वाले सारंगीवादक काले खाँ की कहानी कही गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी की संरचना कुछ इस तरह की है कि पाठक उसकी हिंदी-उर्दू या संस्कृत-फारसी मिश्रित भाषा के चमत्कार में उलझ जाये या फिल्मों जैसी दृश्यावली में खो जाये और इसे यथार्थवादी कहानी की जगह एक कल्पना या फैंटेसी की रचना मान ले। मैं भी इसे पढ़ते समय ऐसा ही कुछ मानकर चल रहा था, मगर कहानी का यह हिस्सा पढ़कर मैं चकित रह गया:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मैं कड़ी धूप, थकान और अपनी खराब तबियत के बावजूद बहुत मुस्तैदी से चलता रहा। मुझे लगा, अब मैं उस ‘चीज’ को अच्छी तरह समझने लगा हूँ, जिसे दुनिया की कोई पद्धति मुझे समझा नहीं सकी। जैसे-जैसे मेरे कदम आगे बढ़ते जा रहे हैं, मैं उतना ही भारहीन और स्फूर्त होता जा रहा हूँ। मैं नहीं जानता कि ऐसा सिर्फ मेरे साथ हो रहा है या उन सबके साथ भी हुआ होगा, जो वैश्वीकरण के हाथों मार दिये जाने के बाद दुबारा जन्म लेते हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ से मुझे कहानी को समझने का एक नया सूत्र हाथ लगा और मैंने कहानी को फिर से नये सिरे से पढ़ा और पाया कि यह तो बाकायदा भूमंडलीय यथार्थवादी कहानी है, जिसमें वर्तमान को इतिहास में और ‘लोकल’ को ‘ग्लोबल’ में बड़े ही कलात्मक और अर्थपूर्ण रूप में गूँथा गया है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-6594772367269795446?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/6594772367269795446/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2010/11/blog-post_29.html#comment-form' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/6594772367269795446'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/6594772367269795446'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2010/11/blog-post_29.html' title='कहानी में भूमंडलीय यथार्थ ऐसे भी आ सकता है!'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-5269080125428593568</id><published>2010-11-23T07:45:00.000-08:00</published><updated>2010-11-23T07:46:35.289-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>अचानक और अनायास</title><content type='html'>कभी-कभी मन अचानक और अकारण ही उदास हो जाता है। कारण तो अवश्य कुछ न कुछ रहता होगा, लेकिन समझ में नहीं आता। 20 नवंबर, 2010 की शाम कुछ ऐसा ही हुआ। मन भारी था और समझ में नहीं आ रहा था कि बात क्या है। कागज सामने था और कलम हाथ में, सो बिना कुछ सोचे-समझे कलम चलाने लगा। जो लिखा गया, उसे पढ़ा, तो लगा कि मैं स्वस्थ हो गया। जैसे आकाश पर जो बदली-सी छा गयी थी, हट गयी और धूप निकल आयी। जो लिखा गया, यह था:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानगर के उजले तन पर फूटे फोड़े-सी वह बस्ती&lt;br /&gt;बरसों-बरस पुरानी होकर भी अवैध थी जिसकी हस्ती&lt;br /&gt;गत चुनाव में सहसा वैध हो गयी घोषित&lt;br /&gt;नये घरों के नीले नक्शे किये गये सबको आवंटित&lt;br /&gt;लोग खुश हुए, लगा कि जैसे सब सपने साकार हो गये&lt;br /&gt;मानो मतदाता से बढ़कर वे खुद ही सरकार हो गये&lt;br /&gt;लेकिन यह क्या? वोट डालकर ज्यों ही लौटे, बस्ती गायब!&lt;br /&gt;बस्ती जलकर खाक हो गयी, सपने सारे खत्म हो गये&lt;br /&gt;नये घरों के नीले नक्शे सारे जलकर भस्म हो गये&lt;br /&gt;लेकिन तभी राख से उठती दिखी उसरती नयी झोंपड़ी&lt;br /&gt;जो कहती थी--‘‘नीले नक्शे भस्म हो गये, हो जाने दो।&lt;br /&gt;हम उन नक्शों के अनुसार नहीं बनती हैं।&lt;br /&gt;जैसे बनती रहीं हमेशा, वैसे ही अब भी बनती हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं नहीं जानता कि यह कविता है या कहानी या कुछ भी नहीं, पर इतना जानता हूँ कि जब बिना कुछ सोचे-विचारे ऐसा कुछ लिखा जाता है--अचानक और अनायास--तो उससे जो आनंद मिलता है, वह लिखने वाले के मन पर अचानक और अनजाने ही आ पड़े बोझ को हटाकर उसे स्वस्थ बनाने में बड़ा कारगर होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);"&gt;--रमेश उपाध्याय&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1496071818736613491-5269080125428593568?l=behtarduniyakitalaash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/feeds/5269080125428593568/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2010/11/blog-post_23.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/5269080125428593568'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1496071818736613491/posts/default/5269080125428593568'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/2010/11/blog-post_23.html' title='अचानक और अनायास'/><author><name>ramesh upadhyay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05054633574501788701</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/_gDTKvg7nQYM/SUT2-bcVmaI/AAAAAAAAAAM/txkVAwK9Oqc/S220/IMG_0733.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1496071818736613491.post-727108209821636431</id><published>2010-11-13T07:36:00.000-08:00</published><updated>2010-11-13T08:04:41.251-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>त्रासदी...माइ फुट!</title><content type='html'>नूर भोपाली का पूरा परिवार यूनियन कार्बाइड के कारखाने से निकली मिक गैस के जहरीले असर से मारा गया था। बूढ़ी माँ, भली-चंगी पत्नी, एक बेटा और दो बेटियाँ--सब उसी रात मारे गये थे, जिस रात दूसरे हजारों लोग या तो तत्काल मारे गये थे या घायल-अपाहिज होकर बाद में मरे थे और कई पिछले पंद्रह सालों में लगातार मरते रहे थे। नूर भोपाली बच गये थे, तो केवल इस कारण कि वे उस रात भोपाल में नहीं थे, किसी काम से इंदौर गये हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे मुझे अस्सी या इक्यासी के साल भोपाल में हुए एक साहित्यिक कार्यक्रम में मिले थे, जिसमें मैंने अपनी कहानी पढ़ी थी और उन्होंने अपनी गजलें। लंबे कद, छरहरे बदन, गोरे रंग, सुंदर चेहरे और हँसमुख स्वभाव वाले नूर भोपाली से मेरी दोस्ती पहली मुलाकात में ही हो गयी थी। कार्यक्रम के बाद वे मुझे आग्रहपूर्वक अपने घर ले गये थे, जो यूनियन कार्बाइड के कारखाने के पास की एक घनी बस्ती में था। उन्होंने अपनी माँ, पत्नी और बच्चों से मुझे मिलवाया था, अच्छी व्हिस्की पिलायी थी, उम्दा खाना खिलाया था, देश-दुनिया के बारे में बड़ी समझदारी की बातें की थीं और मेरे मन पर एक सुशिक्षित, विचारवान, उदार और प्रगतिशील व्यक्तित्व के साथ अपने अच्छे कवित्व की छाप छोड़ी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर भोपाली सिर्फ शायरी नहीं, एक बैंक में नौकरी भी करते थे। अच्छा वेतन पाते थे। अच्छा खाते-पीते थे। बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल में अच्छी शिक्षा दिला रहे थे। हमारी पहली मुलाकात के कुछ ही दिन पहले उन्होंने अपने लिए नयी मोटरसाइकिल खरीदी थी। अपने घर पर खाना खिलाकर वे उसी पर बिठाकर मुझे उस होटल तक पहुँचा गये थे, जहाँ मैं ठहरा हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गैस-कांड में अपने पूरे परिवार के मारे जाने के बाद वे उसके सदमे से विक्षिप्त हो गये थे। लेकिन कुछ महीने अस्पताल में रहकर ठीक भी हो गये थे। यूनियन कार्बाइड के कारखाने के पास वाली बस्ती में रहना छोड़कर बैंक अधिकारियों के लिए बनी एक नयी कॉलोनी में फ्लैट लेकर रहने लगे थे। अपने एक भतीजे को सपरिवार उन्होंने अपने पास रख लिया था और उसी के परिवार को अपना परिवार मानने लगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोपाल के साहित्यिक मित्रों से मुझे उनके बारे में ये सारी सूचनाएँ मिलती रही थीं। जब वे अस्पताल में थे, कई बार मेरे मन में आया कि भोपाल जाकर उन्हें देख आऊँ। लेकिन समझ में नहीं आया कि मैं वहाँ जाकर क्या करूँगा। विक्षिप्त नूर मुझे पहचानेंगे भी या नहीं? पहचान भी गये, तो मैं उनसे क्या कहूँगा? क्या कहकर उन्हें सांत्वना दूँगा? फिर जब पता चला कि वे ठीक हो गये हैं, नौकरी पर जाने लगे हैं, नयी जगह जाकर अपने फ्लैट में रहने लगे हैं और उनका भतीजा उनकी अच्छी देखभाल कर रहा है, तो मैं निश्ंिचत-सा हो गया था। मैंने उन्हें पत्र लिखा था, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था। मुझे मेरे मित्रों ने यह भी बताया था कि नूर ने अब साहित्य से संन्यास ले लिया है। पहले हिंदी या उर्दू साहित्य का कोई भी आयोजन हो, वे बिना बुलाये भी लोगों को सुनने पहुँच जाते थे, लेकिन अब गजल पढ़ने के लिए बुलाये जाने पर भी कहीं नहीं जाते। साहित्यिक मित्रों से मिलना-जुलना भी उन्होंने बंद कर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मुझे गैस-कांड, मुआवजों के लिए होने वाली मुकदमेबाजी, गैस-पीड़ितों की दुर्दशा और यूनियन कार्बाइड के खिलाफ किये जा रहे आंदोलनों से संबंधित लेख या समाचार पढ़ने-सुनने पर नूर की याद जरूर आती थी। इसलिए गैस-कांड के लगभग पंद्रह साल बाद एक साहित्यिक कार्यक्रम में फिर भोपाल जाना हुआ, तो मैंने निश्चय किया कि और किसी से मिलूँ या न मिलूँ, नूर से जरूर मिलूँगा। एक दिन के लिए ही सही, उन्होंने जो प्यार और अपनापन मुझे दिया था, उसे मैं भूला नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम में उपस्थित कुछ लोगों से मैंने नूर भोपाली के बारे में पूछताछ की, तो पाया कि नये लेखक तो उनके बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं, पुराने लेखक भी उनकी कोई खोज-खबर नहीं रखते हैं। मैंने बैंक में काम करने वाले एक लेखक से पूछा, तो पता चला कि वह अपने ब्रांच मैनेजर नूर मुहम्मद साहब को जानता है, जिनका पूरा परिवार गैस-कांड में मारा गया था। विजय प्रताप नामक उस लेखक ने नूर का हुलिया बताकर पूछा, ‘‘क्या वही नूर भोपाली हैं?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जी हाँ, वही।’’ मैंने कहा, ‘‘मुझे उनसे मिलना है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय उम्र में मुझसे छोटा था, पहली ही बार मुझे मिला था, लेकिन मुझे जानता था। शायद यह सोचकर कि मैं दिल्ली से आया हूँ, दिल्ली के संपादकों और प्रकाशकों को जानता हूँ और परिचय हो जाने पर किसी दिन उसके काम आ सकता हूँ, वह मेरे प्रति कुछ अधिक आदर और आत्मीयता प्रकट कर रहा था। मेरे कहे बिना ही वह शाम को मुझे नूर के पास ले जाने को तैयार हो गया। उसने कहा, ‘‘कार्यक्रम के बाद आप होटल जाकर थोड़ा आराम कर लें, मैं शाम को छह बजे गाड़ी लेकर आ जाऊँगा और आपको उनके घर ले चलूँगा।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को ठीक छह बजे विजय ने मेरे कमरे के दरवाजे पर दस्तक दी और मुझे साथ लेकर चल पड़ा। अपनी मारुति कार में बैठते-बैठते उसने यह भी बता दिया कि वह बैंक में सहायक शाखा प्रबंधक है और कार उसने कुछ महीने पहले ही खरीदी है। फिर वह अपनी साहित्यिक उपलब्धियाँ बताने लगा। मध्यप्रदेश सरकार से प्राप्त एक पुरस्कार का और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से तकरीबन हर महीने होने वाले अपनी कविताओं के प्रसारण का जिक्र उसने काफी जोरदार ढंग से किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हाँ-हूँ करता रहा, तो वह समझ गया कि मैं उससे प्रभावित नहीं हो रहा हूँ। तब उसने विषय बदलते हुए मुझसे पूछा, ‘‘आप नूर मुहम्मद साहब को कब से और कैसे जानते हैं?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपनी पिछली भोपाल यात्रा और नूर भोपाली से हुई भेंट के बारे में बताया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘लेकिन आप तो, सर, हिंदी के लेखक हैं और वे उर्दू के!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘तो क्या हुआ?’’ मैं उसकी बात का मतलब नहीं समझा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘वैसे मेरे भी कई दोस्त मुसलमान हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘ओह!’’ अब उसका अभिप्राय मेरी समझ में आया। मैंने जरा तेज-तुर्श आवाज में कहा, ‘‘हिंदी को हिंदुओं की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा समझना ठीक नहीं है, विजय जी! यह तो भाषा और साहित्य के बारे में बड़ा ही सांप्रदायिक दृष्टिकोण है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘सॉरी, सर, मेरा मतलब यह नहीं था।’’ विजय ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इस पर चुप रहा, तो वह दूसरी बातें करने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘नूर साहब से आप पहली भेंट के बाद फिर कभी नहीं मिले हैं न?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘सुना है, वे अच्छे शायर हुआ करते थे। उस हादसे के बाद उन्होंने लिखना-पढ़ना छोड़ दिया। मैंने यह भी सुना है कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग उनसे फिल्मों के लिए गाने लिखवाना चाहते थे। काफी बड़े ऑफर थे। नूर साहब ने सब ठुकरा दिये। आप क्या सोचते हैं? उनका ऐसा करना ठीक था?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मैं यह कैसे बता सकता हूँ? पता नहीं, उनकी क्या परिस्थिति या मनःस्थिति रही होगी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मैं मनःस्थिति की ही बात कर रहा हूँ, सर! सुना है, उस हादसे के बाद नूर साहब कुछ समय के लिए पागल हो गये थे।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के साथ ऐसा हो सकता है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘लेकिन, सर, नूर साहब को अगर फिल्मों में बढ़िया चांस मिल रहा था, तो उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए था। उससे उनको नाम और पैसा तो मिलता ही, उस हादसे को भुलाने में मदद भी मिलती। उस हादसे में कई लोगों के परिवार खत्म हो गये, लेकिन फिर से उन्होंने अपने घर बसा लिये। लोगों को जिंदा तो रहना ही होता है न, सर!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘हाँ, लेकिन सब लोग एक जैसे नहीं होते।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘आपको मालूम है, सर, नूर साहब ने मुआवजा भी नहीं माँगा! कह दिया कि मैं अपनी माँ और बीवी-बच्चों की जान के बदले चंद सिक्के नहीं लूँगा। सुना है, उनका यह बयान अखबारों में भी छपा था। लेकिन, सर, अपन को तो यह बात कुछ जमी नहीं। यूनियन कार्बाइड ने जो किया, उसकी कोई और सजा तो उसे मिलनी नहीं थी। मुआवजा लेकर इतनी-सी सजा भी आप उसको नहीं देना चाहते, इसका क्या मतलब हुआ?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे विजय की बातें अच्छी नहीं लग रही थीं। मैंने कहा, ‘‘आप तो उनके सहकर्मी हैं, उनसे ही पूछें तो बेहतर।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय शायद समझ गया कि मैं उससे बात करना नहीं चाहता। वह चुप हो गया और नूर भोपाली के घर पहुँचने तक चुपचाप गाड़ी चलाता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर का घर एक खुली-खुली और साफ-सुथरी कॉलोनी में था, जिसके मकानों के सामने सड़क के किनारे गुलमोहर के पेड़ लगे हुए थे और इस समय वे लाल फूलों से लदे हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर का फ्लैट पहली मंजिल पर था। सीढ़ियों से ऊपर जाकर मैंने घंटी बजायी, तो सोलह-सत्रह साल की एक लड़की ने दरवाजा खोला और यह जानकर कि मैं नूर साहब से मिलने आया हूँ, उसने मुझे अंदर आने के लिए कहा। एक कमरे के खुले दरवाजे के पास पहुँचकर उसने जरा ऊँची आवाज में कहा, ‘‘दादू, आपसे कोई मिलने आये हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने एक ही नजर में देख लिया कि कमरा काफी बड़ा है। एक तरफ सोफा-सेट है, दूसरी तरफ अलमारियाँ, तीसरी तरफ बाहर बालकनी में खुलने वाला दरवाजा और चौथी तरफ एक पलंग, जिस पर लेटे हुए नूर कोई किताब पढ़ रहे हैं। नजरों से ओझल किसी म्यूजिक सिस्टम पर बहुत मंद स्वर में सरोद बज रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर किताब एक तरफ रखकर उठ खड़े हुए। उन्होंने शायद मुझे नहीं पहचाना, इसलिए विजय से कहा, ‘‘आइए-आइए, विजय साहब!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘देखिए, सर, मैं अपने साथ किनको लाया हूँ!’’ विजय ने आगे बढ़कर कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर अचकचाकर मेरी ओर देखने लगे और पहचान जाने पर, ‘‘अरे, राजन जी, आप!’’ कहते हुए मुझसे लिपट गये। गले मिलने के बाद वे मेरा हालचाल पूछते हुए सोफे की ओर बढ़े और मुझे अपने सामने बिठाकर पूछने लगे कि मैं कब और किस सिलसिले में भोपाल आया। मैंने बताया, तो बोले, ‘‘आप सवेरे ही किसी से मुझे फोन करवा देते, मैं खुद आपसे मिलने आ जाता।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने देखा, बीच में बीते समय ने उन्हें खूब प्रभावित किया है। पहले जब मैं उनसे मिला था, वे अधेड़ होकर भी जवान लगते थे। अब एकदम बूढ़े दिखायी दे रहे थे। लगभग सफेद होते हुए लंबे और बिखरे-बिखरे बाल, कुछ कम सफेद दाढ़ी और आँखों पर मोटे काँच का चश्मा। पहले दाढ़ी नहीं रखते थे और चश्मा नहीं लगाते थे। अगर पहले से पता न होता, तो शायद मैं उन्हें पहचान न पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय को भी बैठने के लिए कहते हुए उन्होंने कहा, ‘‘बहुत-बहुत शुक्रिया, विजय साहब, कि आप इनको ले आये। हम दूसरी ही बार मिल रहे हैं, लेकिन पुराने प्रेमी हैं। लव एट फर्स्ट साइट वाले!’’ कहकर वे हँसे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने देखा, नीचे खड़ा गुलमोहर का पेड़ उनकी बालकनी तक बढ़ आया है और उसके लाल फूल बिलकुल नजदीक से दिखायी दे रहे हैं। शाम की हल्की धूप में खूब चटक चमकते हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘अकेले ही आये हैं या परिवार के साथ?’’ नूर ने मुझसे कहा, ‘‘पिछली बार जब आप आये थे, आपने कहा था कि भोपाल बहुत खूबसूरत शहर है, अगली बार आयेंगे तो परिवार के साथ आयेंगे।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे आश्चर्य हुआ कि उन्हें यह बात इतने साल बाद भी याद है। मैंने कहा, ‘‘अब परिवार के साथ निकलना मुश्किल है। पत्नी की नौकरी है और बच्चे बड़े हो गये हैं। सबकी अपनी व्यस्तताएँ हैं।’’ कहते-कहते मुझे नूर के परिवार की याद आ गयी। मैंने दुख प्रकट करने के लिए कहा, ‘‘आपके परिवार के साथ जो हादसा हुआ, उससे बड़ा...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘हादसा?’’ नूर जैसे एकदम तड़प उठे। उन्होंने मेरा वाक्य भी पूरा नहीं होने दिया। बोले, ‘‘आप उसे हादसा कहते हैं? वह तो हत्याकांड था! ब्लडी मैसेकर!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सहमकर खामोश हो गया और नीचे देखने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय ने नूर को शांत करने की गरज से कहा, ‘‘अब उन पुराने जख्मों को कुरेदने से क्या फायदा है, सर?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘मैं नहीं मानता। हमें उन जख्मों को तब तक कुरेदते रहना चाहिए, जब तक दुनिया में ऐसे हत्याकांड बंद नहीं हो जाते!’’ नूर ने विजय को झिड़क दिया और मुझसे पूछा, ‘‘क्या हादसे और हत्याकांड में कोई फर्क नहीं है? हादसे अचानक हो जाते हैं, जैसे दो रेलगाड़ियाँ टकरा जायें, लेकिन हत्याएँ तो की जाती हैं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी वह लड़की, जिसने दरवाजा खोला था, काँच के तीन गिलासों में पानी ले आयी। ट्रे को सलीके से मेज पर रखकर उसने नूर से पूछा, ‘‘दादू, चाय या शर्बत?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘पहले शर्बत, फिर चाय।’’ कहकर नूर ने मुस्कराते हुए मुझसे पूछा, ‘‘आपको शुगर-वुगर तो नहीं है न?’’&lt;br /&gt;मैंने हँसकर कहा, ‘‘अभी तक तो नहीं।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़की जाने लगी, तो नूर ने उसे वापस बुलाया, अपने पास बिठाया और उसके सिर पर हाथ रखकर परिचय कराया, ‘‘यह आयशा है। मेरे भतीजे की बेटी। यह अपने दादू का बहुत खयाल रखती है। बी.ए. में पढ़ती है। बहुत समझदार है। और, आयशा, ये हैं आपके दिल्ली वाले दादू राजन जी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आयशा ने मुझे सलाम किया और मैंने उसे आशीर्वाद दिया। लेकिन मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि न तो नूर ने विजय से उसका परिचय कराया और न उसने ही विजय को सलाम किया। उसने विजय की तरफ देखा भी नहीं। उठकर अंदर चली गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बातचीत शुरू करने के लिए मैंने नूर से पूछा, ‘‘सुना है, आपने साहित्यिक कार्यक्रमों में जाना बंद कर दिया है? ऐसा क्यों?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर ने एक नजर विजय पर डाली और मुझसे कहा, ‘‘वहाँ जो कुछ होता है, मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। अब वहाँ साहित्य नहीं होता, साहित्य से पैसा कमाने, पुरस्कार पाने और खुद को महान साहित्यकार मनवा लेने की तिकड़में होती हैं। किसी से कुछ फायदा हो सकता है, तो उसे खुश करने की और जिससे कुछ नुकसान हो सकता है, उसकी जड़ें खोदने की कोशिशें की जाती हैं। देश और दुनिया में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी तो सबको है, जो वहाँ बड़े जोर-शोर से उगली भी जाती है, लेकिन देश-दुनिया के हालात का आम लोगों पर क्या असर पड़ रहा है और उसके बारे में क्या किया जा सकता है, इसकी चिंता किसी को नहीं है। गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है। समाज में हिंसा बढ़ रही है। अपराध बढ़ रहे हैं। लोग मर रहे हैं और मारे जा रहे हैं। लोगों में जबर्दस्त निराशा फैल रही है। लेकिन साहित्यकार क्या कर रहे हैं? वे फूलों और चिड़ियों पर कविताएँ लिख रहे हैं। दलितवाद के नाम पर जातिवाद फैला रहे हैं। स्त्रीवाद के नाम पर सेक्स की कहानियाँ लिख रहे हैं। संप्रदायवाद के नाम पर हिंसा और बलात्कार के ब्यौरे दे रहे हैं। और समझ रहे हैं कि हम बहुत बड़े तीर मार रहे हैं। भोपाल तो साहित्यकारों का गढ़ है। लेकिन चौरासी में यूनियन कार्बाइड ने एक ही झटके में हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया, हजारों लोगों को अंधा और अपाहिज बना दिया, हजारों परिवारों से उनके मुँह का निवाला छीनकर उन्हें भूखा भिखारी बना दिया, मगर इसके खिलाफ यहाँ के साहित्यकारों ने क्या किया? कुछ बयान दिये, कुछ कविताएँ लिखीं और बस! दिन-रात भाषा के खेल खेलने वालों ने यह भी नहीं देखा कि उस बर्बर हत्याकांड को ‘भोपाल गैस त्रासदी’ जैसा भ्रामक नाम दे दिया गया है, जिससे लगे कि उस भयानक घटना का संबंध सिर्फ गैस से है। जैसे भोपाल के हजारों लोगों को गैस ने ही मार डाला हो। या जैसे गैस का फैलना भूचाल जैसी कोई प्राकृतिक घटना हो, जिसके लिए किसी को जिम्मेदार न ठहराया जा सकता हो! त्रासदी...माइ फुट!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर ने हिंदी में और धीरे-धीरे बोलना शुरू किया था, लेकिन दो-चार वाक्यों के बाद ही वे उत्तेजित होकर अंग्रेजी में, तेज-तेज और जोर-जोर से बोलने लगे थे। अंततः उनकी साँस फूल गयी और वे चुप हो गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे साथ आये विजय को शायद यह लगा कि नूर ने भोपाल के साहित्यकारों का और व्यक्तिगत रूप से उसका अपमान किया है। नूर के चुप होते ही उसने व्यंग्यपूर्वक कहा, ‘‘आपका तो यह जिया-भोगा सत्य था, आपने इस पर क्यों कुछ नहीं लिखा?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर ने जलती-सी आँखों से विजय की ओर देखा, लेकिन तत्काल ही स्वयं को संयत कर लिया। एक सिगरेट सुलगायी और गहरा कश लेकर ढेर-सा धुआँ छोड़ने के बाद शांत स्वर में विजय से कहा, ‘‘आप जानते हैं, मैं शायर हूँ, गद्य नहीं लिखता। मैंने गजल के सिवा और कुछ लिखना सीखा ही नहीं। लेकिन गजल में उस सबको बयान नहीं किया जा सकता, जो मैंने जिया और भोगा है। मैंने सिर्फ जिया और भोगा ही नहीं है, बहुत कुछ जाना और सोचा-समझा भी है। मैंने गजल में उस सबको कहने की कोशिश की और सैकड़ों शेर लिख डाले। मगर मुझे लगा, बेकार है। फिर मैंने गद्य में लिखने की कोशिश की। आत्मकथा के रूप में ढेरों कागज काले किये। लेकिन बात नहीं बनी। कहानी भी लिखने की कोशिश की, लेकिन लगा कि कहानी में वह सब नहीं कहा जा सकता, जो मैं कहना चाहता हूँ। तब लगा कि उपन्यास लिखूँ, तो शायद कुछ बात बने। मगर उपन्यास लिखना मुझे आता नहीं। कहीं वह निबंध जैसा हो जाता है, तो कहीं भाषण जैसा। लिखता हूँ और फाड़कर फेंक देता हूँ। कभी कागज-कलम लेकर बैठता हूँ और बैठा ही रह जाता हूँ। सामने रखा कोरा कागज मुझे चिढ़ाता रहता है, मेरी तरफ चुनौतियाँ फेंकता रहता है, लेकिन मैं उस पर एक शब्द भी लिख नहीं पाता। दिमाग में एक साथ इतनी सारी बातें आती हैं कि मैं समझ नहीं पाता, क्या लिखूँ और क्या न लिखूँ। फिर मुझे डर लगने लगता है कि मैं कहीं पागल न हो जाऊँ। पागलपन के एक दौर से गुजर चुका हूँ, फिर से गुजरना नहीं चाहता।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में आयशा शर्बत ले आयी। नींबू की कुछ बूँदें डालकर बनाया गया रूह-अफजा का लाल शर्बत। बिना कुछ बोले उसने शर्बत मेज पर रखा और चली गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘लीजिए, शर्बत लीजिए।’’ नूर ने कहा और उठकर एक अलमारी में से मोटी-मोटी फाइलों का एक ढेर उठा लाये। उसे मेज पर रखते हुए बोले, ‘‘लोग कहते हैं कि मैंने लिखना-पढ़ना बंद कर दिया है। लेकिन मैं बेकार नहीं बैठा हूँ। मैंने इन पंद्रह सालों में उस हत्याकांड के बारे में ढेरों तथ्य जुटाये हैं। इन फाइलों में वे तमाम तथ्य और प्रमाण हैं, जो बताते हैं कि भोपाल में गैस-कांड अचानक नहीं हो गया था।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने शर्बत का एक घूँट पीकर गिलास रख दिया और एक फाइल खोलकर दिखाते हुए बोले, ‘‘यह देखिए, ये कागज बताते हैं कि जब यूनियन कार्बाइड ने अपना कारखाना यहाँ लगाने का फैसला किया था, तब कई लोगों ने, हमारी सरकार के कुछ समझदार और जिम्मेदार अधिकारियों ने भी, इसका विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि ऐसी घनी आबादी के पास ऐसा खतरनाक कारखाना नहीं लगाया जाना चाहिए।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘क्या उन्हें पहले से ही मालूम था कि यह कारखाना खतरनाक होगा, सर?’’ विजय ने मजाक उड़ाती-सी आवाज में कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर ने विजय की तरफ देखा और पूछा, ‘‘क्या आप उस जहरीली गैस के बारे में कुछ जानते हैं, जिसने हजारों लोगों की जान ली और अभी तक ले रही है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जी, सर, मैंने उसके बारे में पढ़ा तो था, पर उसका नाम याद नहीं रहा।’’ विजय झेंप गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर व्यंग्यपूर्वक मुस्कराये, लेकिन तत्काल गंभीर होकर बताने लगे, ‘‘उसे मिक कहते हैं। एम आइ सी मिक। पूरा नाम मिथाइल आइसोसाइनेट। यह कोई प्राकृतिक गैस नहीं है। यह पिछली ही सदी में कारखानों से निकलकर पृथ्वी के पर्यावरण में शामिल हुई है। अब इसका व्यापारिक उत्पादन होता है और इसका इस्तेमाल पेस्टीसाइड्स यानी कीटनाशक बनाने में किया जाता है, जो कीड़े-मकोड़े मारने के काम आते हैं। मिक जिंदा चीजों पर, खास तौर से ऐसी चीजों पर, जिनमें पानी का अंश हो, ऐसी प्रतिक्रिया करती है कि वे तत्काल मर जाती हैं। समझे आप? तो जानकार जानते थे कि यूनियन कार्बाइड कीटनाशक बनाने में इस गैस का इस्तेमाल करने वाली है। यह गैस यहाँ बड़े-बड़े टैंकों में भरकर रखी जायेगी और अगर यह किसी भी तरह से टैंकों से निकलकर फैल गयी, तो आसपास की आबादी के लिए बहुत ही खतरनाक साबित होगी।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय तो नूर की बातों को मुँह बाये सुन ही रहा था, मैं भी चकित था कि एक आदमी, जो शौकिया तौर पर शायर और पेशे से बैंक मैनेजर है, वैज्ञानिक चीजों की इतनी जानकारी रखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर कह रहे थे, ‘‘आप जानते हैं कि वह गैस पूरे शहर में नहीं, कारखाने के आसपास के ही इलाके में क्यों फैली? इसलिए कि मिक अगर खुली छोड़ दी जाये, तो फैल तो जाती है, लेकिन वह हवा से ज्यादा घनी होती है, इसलिए ऊपर उठकर हवा में घुल-मिल नहीं पाती। इसीलिए वह उड़कर दूर तक नहीं जा पाती। नजदीक ही नीचे बैठ जाती है और पानीदार चीजों को जला देती है। इंसान के जिस्म के नाजुक हिस्सों पर, जैसे आँखों और फेफड़ों पर, वह बहुत जल्द और घातक असर करती है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते-कहते नूर ने फाइल में से एक कागज निकाला और पढ़कर सुनाने लगे, ‘‘बीइंग डेंसर दैन एयर, मिक वेपर डज नॉट डिस्सिपेट बट सैटल्स ऑन व्हाटएवर इज नियरबाइ। इफ एक्स्पोज्ड टु वॉटर-बियरिंग टिश्यूज, इट रिएक्ट्स वायोलेंटली, लीडिंग टु चेंजेज दैट कैन नॉट बी कंटेंड बाइ दि नॉर्मल प्रोटेक्टिव डिवाइसेज ऑफ दि अफेक्टेड ऑर्गैनिज्म। दि एमाउंट ऑफ एनर्जी रिलीज्ड बाइ दि एनसुइंग रिएक्शन स्विफ्टली एक्सीड्स दि हीट-बफरिंग कैपेबिलिटीज ऑफ दि बॉडी। सो दि बॉडी सफर्स सीवियर बर्न्स, इस्पेशली ऑफ एक्सपोज्ड टिश्यूज रिच इन वॉटर, सच एज लंग्स एंड आइज।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर ने कागज को पढ़ना बंद करके कहा, ‘‘यही वजह थी कि गैस ने कारखाने के आसपास की आबादी में इतनी तबाही मचायी। हजारों लोग मर गये, हजारों अंधे हो गये, हजारों के फेफड़े हमेशा के लिए खराब हो गये।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने आधी जल चुकी सिगरेट से फिर एक गहरा कश लिया, धुआँ छोड़ा और सिगरेट एश ट्रे में बुझा दी। उनकी बात शायद अभी पूरी नहीं हुई थी, इसलिए मैं चुप रहा। नूर फिर बोलने लगे, ‘‘तो मैं कह रहा था कि जब यूनियन कार्बाइड ने अपना कारखाना लगाने के लिए घनी आबादी के पास वाली जगह चुनी, तो कुछ समझदार और जिम्मेदार अधिकारियों ने इसका विरोध किया था। उनका कहना था कि यह कारखाना शहर के बाहर लगाया जाना चाहिए। लेकिन यूनियन कार्बाइड ने यह बात नहीं मानी। कहा कि शहर के बाहर कारखाना लगाना उसके लिए बहुत खर्चीला होगा। समझे आप? कंपनी को अपना खर्च बचाने की चिंता थी, लोगों की सुरक्षा की उसे कोई चिंता नहीं थी। इस तरह, अगर आप चौरासी के दिसंबर की उस रात यहाँ जो कुछ हुआ, उसे एक हादसा कहते हैं, तो उस हादसे की संभावना या आशंका शुरू से ही थी। यानी एक विदेशी कंपनी और देशी सरकार, दोनों को मालूम था कि वह हादसा कभी भी हो सकता है। फिर भी कंपनी ने उसी जगह कारखाना लगाया और सरकार ने लगाने दिया। इसको आप क्या कहेंगे? क्या यह जान-बूझकर हादसों को दावत देना नहीं? या कंपनी का खर्च बचाने के लिए जान-बूझकर लोगों को मौत के मुँह में धकेलना नहीं?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय ने मानो कंपनी और सरकार दोनों का बचाव करते हुए कहा, ‘‘माफ कीजिए, सर, आपकी बातों से तो ऐसा लगता है कि जैसे यह एक साजिश थी जान-बूझकर लोगों को मार डालने की। लेकिन क्या कोई विदेशी कंपनी किसी दूसरे देश में जाकर ऐसी साजिश कर सकती है? और, क्या उस देश की सरकार जानते-बूझते अपने लोगों के खिलाफ ऐसी साजिश उसे करने दे सकती है? जहाँ तक खर्च बचाने की बात है, तो वह तो हर उद्योग-व्यापार का नियम है। कंपनी का मकसद ही होता है कम से कम लागत में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इसमें साजिश जैसी क्या बात है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अब तक चुप था, लेकिन विजय की बात सुनकर मुझे बोलना पड़ा, ‘‘कंपनी के दृष्टिकोण से देखें, तो आपकी बात ठीक है, विजय जी! यूनियन कार्बाइड को अपना खर्च बचाना था, लेकिन सरकार तो सख्ती से कह सकती थी कि कारखाना शहर के बाहर लगाना पड़ेगा। उसे तो अपने लोगों की सुरक्षा की चिंता होनी चाहिए थी। उसने क्यों कंपनी की बात मान ली?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर दिया नूर ने, ‘‘सरकार को लोगों की क्या परवाह! उसे तो यह लगता है कि विदेशी कंपनियाँ आयेंगी, अपनी पूँजी यहाँ लगायेंगी, तभी हमारा विकास होगा। इसलिए वह तो हाथ-पाँव जोड़कर उन्हें बुलाती है--आइए हुजूर, हमारे देश में आकर अपने कारखाने लगाइए। हम आपको बेहद सस्ती जमीनें देंगे, बेहद सस्ते मजदूर और वैज्ञानिक-टेक्नीशियन वगैरह देंगे, कारखाना लगाने के लिए लोहा-लक्कड़, ईंट-सीमेंट, पानी-बिजली भी तकरीबन मुफ्त में मुहैया करायेंगे। सुरक्षा के नियम और श्रम-कानून आपके लिए ढीले कर देंगे। टैक्सों में भारी छूटें और रिआयतें देंगे। और तो और, हम आपको लेबर ट्रबल से भी बचायेंगे। आपकी तरफ कोई आँख भी उठायेगा, तो आँख फुड़वायेगा और अपना सिर तुड़वायेगा। इस काम के लिए हमारी पुलिस है न! आप हमारे जल, जंगल, जमीन और जनों के साथ चाहे जो करें, हमें कोई ऐतराज नहीं होगा। आप आइए तो! हमारे यहाँ आकर अपना कारखाना लगाइए तो!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘आप लिखिए, नूर भाई! आप बहुत अच्छा उपन्यास लिखेंगे। आपका व्यंग्य तो कमाल का है!’’ मैंने प्रशंसा और प्रोत्साहन के लहजे में कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन विजय को शायद यह अच्छा नहीं लगा। उसने नूर से कहा, ‘‘लेकिन, सर, उपन्यास लिखने के लिए तो कारखाने की पूरी वर्किंग आपको मालूम होनी चाहिए। फर्स्ट हैंड नॉलेज। उसके अंदर क्या बनता है, कैसे बनता है, लोग कैसे काम करते हैं, वगैरह...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर उसकी बात सुनकर मुस्कराये और बोले, ‘‘आप यह बताइए, क्या धरती गोल है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जी? जी, हाँ...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘और वह घूमती भी है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जी, हाँ...’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘क्या आपने उसकी गोलाई को देखा है? उसे घूमते हुए देखा है? यह आपकी फर्स्ट हैंड नॉलेज तो नहीं है न? फिर भी यह सत्य तो है न? इस सत्य को आपने पुस्तकों से, शिक्षकों से या कहीं से भी जाना हो, इससे क्या फर्क पड़ता है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक क्षण रुककर नूर ने अपने सामने रखी फाइलों की तरफ इशारा किया, ‘‘इस जानकारी को जमा करने में मैंने पंद्रह साल लगाये हैं। पंद्रह साल! आपको क्या मालूम कि इसके लिए मैंने कितनी लाइब्रेरियों की खाक छानी है, कितनी पुस्तकें और पत्रिकाएँ खरीदकर पढ़ी हैं, कितनी मेहनत से उनमें से नोट्स लिये हैं और कहाँ-कहाँ जाकर किन-किन लोगों से कितनी पूछताछ की है! मैं उन लोगों में से नहीं हूँ, जो भोपाल गैस त्रासदी पर लेख, कविताएँ और कहानियाँ लिखते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि यूनियन कार्बाइड के कारखाने में क्या बनता था। आपने सेविन का नाम सुना है?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘सेविन?’’ विजय सकपका गया, ‘‘आपका मतलब है हिंदी में सात?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘जी, नहीं! एस ई वी आइ एन सेविन। यह एक पेस्टीसाइड है। कीटनाशक। इसको बनाने में यूनियन कार्बाइड मिक गैस का इस्तेमाल करती थी। सेविन यूरोप और अमरीका में भी बनाया जाता है, मगर सीधे मिक से नहीं। वहाँ की सरकारें जानती हैं कि मिक कितनी खतरनाक गैस है। इसलिए वहाँ सीधे मिक से सेविन बनाने की इजाजत नहीं है। लेकिन यूनियन कार्बाइड ने भोपाल के अपने कारखाने में सीधे उसी से सेविन बनाना शुरू कर दिया, क्योंकि इस तरह सेविन बनाने में खर्च कम आता था। यह प्रक्रिया यहाँ के लोगों के लिए चाहे जितनी खतरनाक हो, पर कंपनी के लिए कम खर्चीली थी। दूसरी तरह से कहें, तो ज्यादा मुनाफा देने वाली।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विजय फँस गया था। उसने कुछ कहने के लिए कहा, ‘‘लेकिन, सर, विदेशी कंपनियों के पास तो इतनी पूँजी होती है कि वे सारी दुनिया में अपना कारोबार फैला सकें। फिर यूनियन कार्बाइड को अपना खर्च कम करने की इतनी चिंता क्यों थी?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘‘यही तो मुख्य बात है!’’ नूर ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखिए, कंपनी देशी हो या विदेशी, उसका एकमात्र उद्देश्य होता है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इसके लिए हर कंपनी अपना माल ऊँचे से ऊँचे दाम पर बेचना चाहती है। लेकिन इसमें आड़े आ जाती हैं दूसरी कंपनियाँ, जिनसे उसे बाजार में प्रतिस्पर्द्धा करनी होती है। उनसे मुकाबला करने के लिए जरूरी हो जाता है कि माल के दाम कम रखे जायें। लेकिन दाम कम रखने से कंपनी का मुनाफा कम हो जाता है। तब कंपनी के सामने मुनाफा बढ़ाने का एक ही रास्ता बचता है--खर्च घटाना। यानी लागत कम से कम लगाना। और यही वह चीज है, जो मल्टीनेशनल कंपनियों को जन्म देती है। मान लीजिए, एक अमरीकी कंपनी अमरीका में ही अपना माल बनाकर बेचना चाहे, तो उसे अमरीकी मानकों के मुताबिक अपना कारखाना बनाना पड़ेगा, वहीं के मानकों के मुताबिक सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ेंगे, कर्मचारियों को वहीं के मानकों के मुताबिक तनख्वाहें और दूसरी सुविधाएँ देनी पड़ेंगी और माल की क्वालिटी भी ऐसी रखनी पड़ेगी, जो वहाँ के मानकों पर खरी उतरे। यह सब उसके लिए बहुत खर्चीला होगा और उसका मुनाफा कम हो जायेगा। इसलिए वह कंपनी क्या करती है कि अपना माल अमरीका में न बनाकर किसी गरीब या पिछड़े देश में जाकर बनाती है, जहाँ कारखाना लगाना और चलाना बहुत सस्ता पड़ता है और जहाँ की सरकार पर दबाव डालकर या सरकारी लोगों को घूस देकर वह मनमानी कर सकती है। इस तरह उसका खर्च बहुत कम हो जाता है--यानी मुनाफा बहुत बढ़ जाता है।’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर अंग्रेजी में धाराप्र
