Saturday, July 8, 2017

माटीमिली

यह कहानी मैंने 1977 में लिखी थी और मेरे कहानी-संग्रह 'बदलाव से पहले' (1981) में संकलित है. इसका पंजाबी अनुवाद प्रसिद्ध पंजाबी कथाकार अमरजीत चन्दन ने 'खेह पैणी' नाम से किया था. वह अनुवाद पंजाबी में प्रकाशित मेरी कहानियों के संग्रह 'त्रासदी...माइ फुट!' में प्रकाशित है. 
इधर साहित्यिक पत्रिका 'परिकथा' के जुलाई-अगस्त, 2017 के अंक में इसे पुनः प्रकाशित किया गया है. 

कहानी

माटीमिली

‘‘इस तरह मुँह काला करायेेगी, रधिया, तो गाँव में तेरा टिकना मुश्किल हो जायेगा।’’

जाड़े की आधी रात है। चाँदनी में कोहरा घुला हुआ है। खेतों से गाँव की ओर जाने वाला दगड़ा धुँधलाये उजास में सुनसान और डरावना  लग रहा है। लेकिन यहाँ एक धर्मप्राण व्यक्ति एक गिरी हुई औरत को उपदेश दे रहा है। धर्मप्राण व्यक्ति हैं पंडित शिवदत्त और गिरी हुई औरत है रधिया कुम्हारिन।

‘‘अगर भली औरत की तरह नहीं रह सकती, तो कहीं और जा मर।’’ पंडित शिवदत्त कह रहे हैं और रधिया सुन रही है। 

जूते-मोजे और कोट-कंबल डाटे, सिर पर ऊनी टोपी और उसके ऊपर से कसकर मफलर बाँधे पंडित शिवदत्त रधिया पर गर्म हो रहे हैं और रधिया पैरों में सिर्फ दो रुपये वाली प्लास्टिक की चप्पलें पहने, धोती-कुर्ती पर बस एक सूती खेस लपेटे खड़ी काँप रही है।

खेत में सोबरन से मिलकर वह जल्दी-जल्दी अपने घर की ओर लपकी जा रही थी कि पीपल के नीचे से आते पंडित शिवदत्त अचानक हाथ में लोटा लिये प्रकट हो गये। इतनी रात और इतनी ठंड में तो कुत्ते-सियार भी कहीं दुबके रहते हैं, लेकिन पंडित शिवदत्त आ रहे थे। पहचानकर बोले, ‘‘रधिया, तू? इतनी रात को कहाँ से आ रही है?’’ और सहमी हुई रधिया चुप खड़ी रह गयी, तो सब कुछ जानते-बूझते भी कहने लगे, ‘‘तो सोबरन से तेरी यारी चल रही है, क्यों?’’ और फिर शायद भूल ही गये कि लोटा लेकर घर से किसलिए निकले हैं। 

न ठंड की परवाह है, न रात के सन्नाटे की। रधिया के चारित्रिक पतन की समस्या उनके लिए सर्वप्रमुख हो उठी है और वे उसे उपदेश दिये जा रहे हैं। उनके विचार से रधिया अपने दुराचार से गाँव की नाक कटवा रही है, गाँव में घोर कलियुग ले आयी है, बालकों को रात में अकेले छोड़कर यहाँ खेतों में रासलीला रचाने आती है, लोक-परलोक की कुछ भी चिंता नहीं...

रधिया यह सब न समझती हो, सो बात नहीं; लेकिन रधिया के अपने तर्क हैं। उसके हिसाब से जवान औरत को मर्द चाहिए और बिन बाप के बालकों को बाप। उसका आदमी जिंदा होता, तो वह भी किसी सती-सावित्री से कम नहीं थी। हालाँकि वह जानती है कि सोबरन वह मर्द-बाप नहीं है, लेकिन अकेली औरत को, जिसे सब चींथ खा जाना चाहते हों, सुरक्षा का कोई साधन तो चाहिए।

लेकिन गाँव रधिया के तर्क नहीं मानता। उसके लिए तो रधिया बस एक गिरी हुई औरत है। शुरू में जब रधिया अपनी बदनामी से डरती थी, कोई कुछ कहता तो सफाइयाँ देने लगती थी और झूठी कसमें खा जाती थी। फिर भी कहा-सुनी बंद न होती, तो लड़ने लगती। झूठी तोहमतें लगाकर सामने वाले की आबरू मिट्टी में मिला देती। कहती, ‘‘कौन दूध का धोया है, मैं भी तो जानूँ। मुझे तो सब समझाते हैं, कोई उन लोगों को क्यों नहीं समझाता, जो हमेशा मेरी मिट्टी खराब करने की ताक में रहते हैं?’’ रधिया की इतनी बात सच होती और इस सच के आधार पर वह किसी के भी बारे में बड़े से बड़ा झूठ बोल जाती। इसलिए लोग उससे डरने लगे थे। आज भी डरते हैं। मगर नफरत भी करते हैं, इसलिए चुप भी नहीं रह सकते। 

रधिया ने जब देखा कि गाँव वालों के मुँह किसी तरह बंद नहीं किये जा सकते, तो अपना ही मुँह बंद कर लिया। अब कोई कुछ कहता है, तो कहता रहे। वह किसी को जवाब नहीं देती। सारे लांछन, सारे उपदेश चुपचाप सुन लेती है। इस समय भी सुन रही है। सुन रही है, वरना ठेंगा दिखाकर चली गयी होती, तो पंडित शिवदत्त क्या कर लेते उसका?

पंडित शिवदत्त रधिया की चुप्पी से चिढ़ रहे हैं। कह रहे हैं, ‘‘कितनी ढीठ हो गयी है तू! कोई कुछ भी कहता रहे, तुझे किसी की परवाह नहीं।’’ उनकी चिढ़ स्वाभाविक है। जवाब न मिले, तो लांछन धरने वाले का मजा नहीं आता। गुस्सा और चढ़ता है, ‘‘नहीं मानती तो जा, मर, हमें क्या है! जैसा करेगी वैसा भुगतेगी। देखती जा, तेरी देह में नरक फूटेगा। बुढ़ापे में भीख माँगती डोलेगी।’’ लेकिन जानते हैं कि उपेक्षा से भी तो काम नहीं चलेगा, इसलिए फिर कहते हैं, ‘‘तू चाहती है कि हम इस अनर्थ को चुपचाप देखते रहें? सो नहीं होगा। इसका मतलब तो यह है कि तू जो पाप करती है, गाँव की रजामंदी से करती है। पर गाँव यह सब बर्दाश्त नहीं करेगा। पंच-प्रधान लोग तेरा बहिष्कार करने की सोच रहे हैं। खैर चाहती है, तो अब भी सँभल जा।’’

रधिया सुन रही है और चुप है। उसे गाँव से निकाल देने की कोशिश आज से नहीं, तभी से चल रही है, जब से वह विधवा हुई है।

सरूपा कुम्हार मरा था, तो लोगों ने अंदाजा लगाया था कि अकेली रधिया यहाँ नहीं रहेगी। गाँव में कोई दूसरा घर कुम्हारों का नहीं है। सरूपा भी सात-आठ साल पहले ही इस गाँव में आकर बसा था। पहले वह अपने गाँव से गधे पर बरतन लादकर यहाँ बेचने आता था, लेकिन शादी के बाद ही भाइयों में बँटवारा हो गया, तो सरूपा यहाँ के मुखिया ठाकुर नूरसिंह के सामने आकर रोया था, ‘‘ताल के किनारे एक झुपड़िया डाल लेने दो मुखिया, जिंदगी-भर तुम्हारे बासन बनाऊँगा।’’ मुखिया ने इजाजत दे दी थी और सरूपा अपनी नयी ब्याहुली रधिया के साथ गाँव में आ बसा था। कच्ची ईंटें पाथकर दोनें ने खुद ही ताल के किनारे अपना घर बना लिया था और गाँव ने उन्हें ऐसे अपना लिया था, जैसे वे सदा से यहीं रहते आये हों। लेकिन एक बेटी और एक बेटा पैदा करके सरूपा जब पिछले साल हैजे से मर गया, तो लोगों ने सोचा था, अकेली रधिया अब क्या रहेगी यहाँ? सरूपा के भाई उसे लेने आये थे। एक रँडुआ देवर तो रधिया से नाता करके यहीं रह जाने की बात भी करता था, लेकिन रधिया ने लड़कर सबको भगा दिया था। कहा था, ‘‘जब चार दिन की ब्याहुली को घर से निकाला था, तब कहाँ गयी थी तुम्हारी दया-माया? चले जाओ, मैं अकेली ही अपनी जिंदगी काट लूँगी।’’

कुम्हारों में सदा के लिए विधवा बनकर रहना जरूरी नहीं। रधिया चाहती, तो कहीं भी नाता कर लेती, लेकिन अपने हाथों बनाये घर और रोटी-कपड़ा दे सकने वाले जमे-जमाये चाक से उसे इतना मोह हो गया था कि न तो उसे छोड़कर कहीं जाना चाहती थी, न उसे यह पसंद था कि सरूपा का घर किसी और का घर कहलाये। डरती भी थी कि दूसरे आदमी ने अगर सौत लाकर छाती पर बिठा दी, तो वह अपने बालकों को लेकर कहाँ जायेगी?

गाँव वालों को रधिया का रह जाना अच्छा लगा था, लेकिन मुखिया को अखर गया था। रधिया के चले जाने की संभावना सामने आते ही उसके घर पर उनकी नजर गयी थी। भले ही वह उनकी अपनी सीर-पट््टी पर नहीं, गाँव की पंचायती जमीन पर बना था, लेकिन उनकी इजाजत से बना था, इसलिए खाली हो जाने पर वे उस पर कब्जा कर सकते थे। उन्होंने सोच लिया था कि पंच लोग न माने, तो वे उसे चैपाल बना देंगे, पर उसका इस्तेमाल तो कर ही सकंेगे। लेकिन रधिया जब कहीं नहीं गयी, तो उन्हें लगने लगा, जैसे वह उनके अपने घर पर कब्जा किये बैठी है। अहसान जताकर रधिया से कुछ और वसूल करना चाहा, तो वह भी नहीं कर सके। उलटे एक नुकसान और हो गया। सरूपा से उन्होंने चाहे जितने बरतन बनवाये, कभी दाम नहीं दिया था, लेकिन रधिया ने फोकट में बरतन देने से इनकार कर दिया। तब से मुखिया बहुत चिढ़े हुए हैं रधिया से। पंच-प्रधान लोगों को उकसाते रहते हैं कि रधिया को गाँव से निकाला जाये, लेकिन गाँव वाले रधिया का ही पक्ष लेते हैं--पड़ी रहने दो, मुखिया! विधवा है बेचारी, अपना कमाती-खाती है।

रधिया को नहीं मालूम, लेकिन गाँव के लड़कों को मुखिया ने ही रधिया के पीछे लगाया था। रधिया ने लड़कों को हाथ नहीं धरने दिया, तो उन्होंने ही गाँव के गुंडा पहलवान सोेबरन को उकसाया था, ‘‘कुम्हरिया बहुत इतराकर चलती है, सोबरन। लगता है, कोई उसके कस-बल ढीले करने वाला नहीं मिला।’’

नजर तो सोबरन की भी थी रधिया पर, लेकिन डरता था। मुखिया की शह पाकर उसकी झिझक जाती रही थी। उसी शाम उसके घर पानी का गगरा फूट गया था और नया गगरा लेने वह रधिया के घर जा पहुँचा था। लेकिन उसे आश्चर्य हुआ था कि रधिया ने उसकी छेड़खानी का विरोध नहीं किया। गालियाँ नहीं दीं। शोर नहीं मचाया। रोने लगी। रो-रोकर उसने सोबरन को बताया कि गाँव के बड़े लोगों के लड़के उसे तंग करते हैं और वह कई दिनों से खुद ही सोबरन से उनकी शिकायत करने की सोच रही थी। सोबरन ने आश्वासन दिया था, ‘‘फिकर मत करो, राधे, अब किसी की हिम्मत नहीं कि तुम्हारी तरफ आँख उठाकर भी देखे। सब सालों को देख लूँगा मैं।’’

रधिया जानती थी कि सोबरन बदमाश है। हनुमान के अखाड़े में पहलवानी करता है, लेकिन दारू पीता है, जुआ खेलता है, ठाकुर नूरसिंह की पाल्टी में होने के कारण उनके विरोधियों से लड़ाई-झगड़ा और मार-पीट करता रहता है, कोई और नहीं मिलता तो अपनी औरत को ही कसाइयों की तरह पीटता है। फिर भी उसने सोबरन का हाथ पकड़ा था और उसके बाद गाँव के लफंगे लड़कोें से सचमुच सुरक्षित हो गयी थी। 

मुखिया ने यह नहीं सोचा था कि सोबरन से रधिया की ऐसी यारी हो जायेगी। उन्हेें लगा, सोबरन को जिस काम पर उन्होंने लगाया था, सोबरन ने किया नहीं। वे सोबरन से नाराज रहने लगे थे और रधिया के कस-बल ढीले करने के लिए उन्होंने अपने लड़के मलखान सिंह को प्रेरित किया था। नतीजा यह हुआ कि सोबरन और मलनखान सिंह में लड़ाई हो गयी और सोबरन ने मलखान सिंह का सिर फोड़ दिया। खुंस में मुखिया ने सोबरन को झूठमूठ एक डकैती के केस में फँसा दिया। थानेदार को रुपया खिलाकर सोबरन छूट तो आया, लेकिन इसके लिए उसे मुखिया से ही कर्ज लेना पड़ा और अपने खेेत रेहन रख देने पड़े। तब से वह मुखिया की पाल्टी से अलग हो गया है और बदला लेने की सोच रहा है, लेकिन मौका नहीं पा रहा है। मुखिया रधिया और सोबरन दोनों से खफा हैं, लेकिन सोबरन से डरते हैं, इसलिए अब उन्होंने धरम-करम की बातें शुरू कर दी हैं। परसों उन्होंने पंडित शिवदत्त से कहा था, ‘‘रधिया ससुरी बड़ा अनर्थ कर रही है, पंडित! हम तो समझा-बुझाकर हार गये। अब तो तुम ही उसे समझाओ। नहीं माने तो गाँव से साली का बहिष्कार कर दो।’’

पंडित शिवदत्त को नहीं मालूम था कि रधिया को समझाने का मौका उन्हें इतनी जल्दी मिल जायेगा। रधिया से वे डरते भी थे। एक बार कुछ कहा था, तो रधिया ने सबके सामने उसका पानी उतार दिया था। इसलिए उन्होंने मजाक में लोगों से कहा था, ‘‘हम समझाने गये, तो तुम ही लोग कहोगे कि पंडित भी रधिया से जा फँसे।’’ मुखिया की चैपाल पर बैठे लोग उनकी बात सुनकर हँसे थे। कहा था, ‘‘अरे पंडितजी, तुम अब साठ से ऊपर के हुए, अब तुम क्या फँसोेगे किसी से!’’

मन में यह सरस वार्तालाप चल रहा है और मुँह से धाराप्रवाह उपदेश निकल रहा है। एक पंथ दो काज वाली कहावत को मन ही मन गुनते हुए पंडित शिवदत्त एक साथ दो बातें सोच रहे हैं। रधिया को समझा-बुझाकर सुमार्ग पर लाना है और मौका लगे, तो यह परीक्षा भी कर देखनी है कि इस उम्र में किसी से फँस सकते हैं या नहीं।

लेकिन रधिया ठंड में सुन्न हुई जा रही है। पैरों में चढ़ता शीत उसकी टाँगों को काठ न बना दे, इसलिए कभी एक पाँव पर जोर देकर खड़ी होती है, कभी दूसरे पाँव पर। कह कुछ नहीं रही, लेकिन समझ सब रही है। मुखिया की चैपाल पर हुई बातचीत वह सुन चुकी है। सोबरन से भी अभी यही बात करके आ रही है। सोबरन ने उसे आश्वासन दिया है, लेकिन उसने कहा है कि वह नूरसिंह को तो देख लेगा पर पंडित शिवदत्त से कुछ नहीं कह पायेगा। पंडित शिवदत्त उसके गुरु हैं। उन्हीं के हनुमान मंदिर वाले अखाड़े में वह पहलवान बना है। रधिया शिवदत्त को मँगता बामन ही कहती-मानती है, लेकिन सोबरन से बात करने के बाद उनसे डर रही है। जानती है, यह मँगता बामन गाँव के मुखिया और पंच-प्रधान लोगों से मिलकर उसे गाँव से निकलवा सकता है। अपने बालकोें की चिंता है उसे। गाँव से निकाल दी गयी, तो कहाँ जायेगी उनको लेकर? पीहर में भी तो कोई नहीं बचा, नहीं तो...

‘‘तू कुछ बोलेगी भी? हम इतनी देर से तुझसेे सिर मार रहे हैं और तू एकदम चुप्प खड़ी है।’’ पंडित शिवदत्त जोर से डाँटते हैं, तो रधिया को लगता है, अब तो कुछ बोलना ही पड़ेगा। कहती है, ‘‘तुम ठीक कह रहे हो, पंडितजी। कान पकड़ती हूँ, अब उसकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखूँगी।’’

‘‘पर तेरा क्या विश्वास? कल को फिर तू...?’’

‘‘नहीं पंडितजी, अपने बालकों की सौंह।’’ जानती है कि झूठी कसम खा रही है, लेकिन इसके अलावा जान छुड़ाने का और उपाय भी क्या है? कसम खाते-खाते रुआँसी हो आयी है। इस समय तो वह इस मँगते बामन के पाँव भी पकड़ सकती है। लेकिन पंडित शिवदत्त इतने से ही संतुष्ट हो गयेे हैं। कहते हैं, ‘‘तो जा, अब घर जा। जिन बालकों की सौगंध खायी है, उन्हें जाकर सँभाल।’’

रधिया तेज-तेज कदमों से गाँव की ओर चल दी है और पंडित शिवदत्त ‘हरिओम-हरिओम’ कहते हुए खेत की तरफ बढ़ गये हैं। एक पतिता को पाप से बचा लेने और स्वयं पाप में पड़ते-पड़ते बच जाने के संतोष और आनंद के साथ वे खेत की मेंढ़ पर लोटा रखकर हगने बैठ गये हैं, लेकिन रधिया का गोरा रंग और सुंदर चेहरा उनकी आँखों में बसा हुआ है। थोड़ी देर पहले रधिया और सोबरन ने खेत में बने मचान पर जो लीला की होगी, उसकी कल्पना से वे उत्तेजित हो जाना चाह रहे हैं, लेकिन जाड़े की रात में खुले मैदान की यह ठंड...हरिओम-हरिओम...  

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गाँव सोया पड़ा है। बुझे हुए अलावों की राख से थोड़ी गरमाई पाते हुए कुत्तों ने रधिया की आहट पर जागकर गुर-गुर ही है, लेकिन भौंके नहीं हैं। ताल के किनारे गाँव से अलग-थलग बना रधिया का घर एकदम भूतवासा लग रहा है। एक मड़हे और एक छप्पर वाले इस घर के गज-भर ऊँची सपील से घिरे आँगन में ही चाक चलता है और उसी के एक कोने में आँवाँ सुलगता है। विधवा हो जाने के बाद से रधिया ही मिट्टी खोदने-गोेेड़ने से लेकर बरतन पकाने तक का सारा काम करती है। हुनर हाथ में ऐसा है कि उसे अपने बरतनों पर गेरू पोतने की जरूरत कभी नहीं पड़ी। आँच ही ऐसी देती है कि काली मिट््टी में भी दमकता हुआ लाल रंग खिल उठता है। इस समय सारा आँगन आज ही चाक से उतारे गये कच्चे सकोरों की पाँतों से भरा हुआ है। कल जब ये सूख जायेंगे, तब रधिया इन्हें पकायेगी। अभी तो ये ऐसे लग रहे हैं, जैसे इनमें चाँदनी भरने के लिए इन्हें आँगन में सजा दिया गया हो। 

सकोरों को देखकर रधिया मुस्कराती है। पंडित जी की सारी धमकियाँ और सारे उपदेश बिसर जाते हैं। शाम की वह घड़ी याद आ जाती है, जब वह यहाँ बैठी चाक चला रही थी। थकान से उसकी कमर टूट रही थी, जब सोबरन ताल में बैलों को पानी पिलाकर खँखारता हुआ घर के सामने से गुजरा था। रधिया समझ गयी थी और काम खत्म करने के बाद वह बेहद ठंड के बावजूद गरम पानी और खुशबूदार साबुन से नहायी थी। बच्चों को खिला-पिलाकर उन्हें सुलाते हुए खुद भी थोड़ी देर ऊँघ ली थी कि रात भी हो जाये और कुछ थकान भी उतर जाये। फिर अपने-आप ही जागी थी और घर का दरवाजा भेड़कर दबे पाँव निकल गयी थी। खेत में सोबरन उसकी प्रतीक्षा में जागता मिला था। रधिया ने मचान केे नीचे पहुँचकर सियार की बोली उतारी थी और सोबरन हुर्र करता हुआ फौरन उठ बैठा था। वह मचान पर चढ़ गयी थी और जब सोबरन ने उसे अपनी रजाई में लेकर सीने से चिपटाया था, ठंड के मारे उसके दाँत बज रहे थे और उत्तेजना में उसकी रग-रग काँप रही थी। 

वह सुख मिट्टी हो चुका है। ठंड से काँपती हुई रधिया चुपके से घर में घुसती है। देखती है, दोनों बच्चे चैन से सो रहे हैं। वह अपनी खाट पर रजाई में दुबक जाती है। रजाई ठंडी है और रधिया के पैर तो बरफ हो रहे हैं। जब तक बाहर थी, इतनी ठंड नहीं लग रही थी, लेकिन रजाई ओढ़ लेने के बाद अब उसके दाँत किटकिटा रहे हैं। थोड़ी देर वह पंडित शिवदत्त की बातों पर विचार करती है, लेकिन उसे पता नहीं चलता कि कब रजाई भरक गयी, कब उसकी कँपकँपी बंद हुई और कब उसे नींद आ गयी। 

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पंडित शिवदत्त रधिया को समझाकर ही संतुष्ट नहीं हुए। न जाने उन्हें क्या सूझा कि जंगल-झाड़े से निबटकर खाली लोटा लटकाये खेत की मेढ़-मेढ़ चलते वे सोबरन के मचान तक जा पहुुँचे। सोबरन खर्राटे भर रहा था, पंडित शिवदत्त की ललकारती-सी आवाज सुनकर जागा। लाठी सँभालकर ऊपर से झाँकता हुआ बोला, ‘‘कौन है?’’ और पंडित शिवदत्त को पहचानकर बोला, ‘‘क्या बात है, गुरूजी?’’ कहता हुआ अपनी रजाई लपेटे नीचे उतर आया। मन में खुटका तो हो रहा था कि पंडित ने शायद रधिया को यहाँ से जाते देख लिया है, लेकिन यह नहीं जानता था कि वे इस बात को इतना तूल देंगे।

‘‘तुमको शरम नहीं आती, सोबरन?’’ पंडित शिवदत्त कोई भूमिका बाँधे बिना लताड़ने लगे, ‘‘घर में सुंदर-सुशील बहू है, ठाकुर नेगसिंह जैसे मातबर आदमी के तुम लड़के हो, हमारे अखाड़े में बीस बरस ब्रह्मचारी रहकर तुमने पहलवानी और हनुमान-पूजा की है, और एक नीच कुम्हारिन पर अपना ईमान बिगाड़ लिया है तुमने, ऐं?’’

सोबरन कुछ बोला नहीं, पर उसे हँसी आ गयी। आधी रात को, इतनी ठंड में, और इस तरह सुनसान खेत में आकर, सोबरन को सोते से जगाकर पंडितजी यह सब कहेंगे, यह बात उसे बहुत ही मजेदार लगी।

लेकिन पंडित शिवदत्त पगला रहे थे। पहले वे रधिया की नीचता बताते रहे, फिर न जाने क्या हुआ कि बोेले, ‘‘रधिया के पास ऐसा क्या है, जो तुम्हारी बहू के पास नहीं है?’’ इसके बाद वे रधिका के अंग-प्रत्यंग की तुलना सोबरन की बहू से करने लगे। अपने जाने वे सोबरन को सुमार्ग पर लाने के लिए ही ऐसा कर रहे थे, लेकिन सोबरन को उनके मुँह से रधिया की छातियों के साथ अपनी बहू की छातियों का बखान अच्छा नहीं लगा। उसे गुस्सा आ गया। उसने अपनी रजाई उतार फेंकी और पंडित शिवदत्त को उठाकर खेत में पटक दिया। गेहूँ और सरसों के हाथ-हाथ भर ऊँचे पौधों पर जमी ओस में पंडित शिवदत्त नहा-से गये और भयार्त स्वर में चिल्लाने लगे। सोबरन ने उनका मुँह बंद कर दिया और बुढ़ऊ कहीं मर न जाये, इस डर से उन्हें पीटने के बजाय झकझोरकर बोला, ‘‘कहे देता हूँ पंडित, आगे कुछ बोले तो जबान खेंच लूँगा। सोबरन को समझ क्या रखा है तुमने? अब खैर चाहते हो, तो चुपचाप चले जाओ यहाँ से।’’

पंडित शिवदत्त लटपटाते हुए उठकर चले गये। बासठ की उम्र हुई, आज तक इतना अपमान उनका कभी नहीं हुआ। भृगु, विश्वामित्र और दुर्वासा जैसे तमाम क्रोधी ऋषि-मुनियों को याद करते हुए वे खेत से निकलकर दगड़े में आये और घूमकर खड़े हो गये। मचान के नीचे सोबरन अभी भी खड़ा था। ठाकुर के लौंडे ने ब्राह्मण पर हाथ उठाया। पंडित शिवदत्त को अपने अंदर परशुराम की आत्मा उतरती महसूस हुई और उन्होंने खाली लोटे को फरसे की तरह उठाकर चिल्लाते हुए प्रतिज्ञा की, ‘‘तेरा वंश न मेट दिया तो नाम शिवदत्त नहीं।’’

खेत में छायी खामोशी पर तैरते उनके शब्द दूर खड़े सोबरन तक पहुँचे और वह दगड़े की तरफ बढ़ा। लेकिन उसकी आकृृति हिलती दिखाई दी, तो पंडित शिवदत्त फिर से पकड़ लिये जाने के डर से गिरते-पड़ते गाँव की तरफ दौड़ पड़े। 

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पंडित शिवदत्त चले गये, पर सोबरन को नींद नहीं आ रही है। वह मचान पर बनी झोंपड़ी में घुसकर रजाई ओढ़कर बैठ गया है और बीड़ी फूँक रहा है। सुन रहा है कि नीचे खेत में कोई जानवर घुस आया है और चर रहा है, लेकिन वह उसे भगाने के लिए उठ नहीं पा रहा है। लड़ाई-झगड़ा उसके लिए नयी चीज नहीं है, लेकिन पंडित शिवदत्त पर हाथ उठाना उसे अखर रहा है। अपने गुस्से को सही ठहराने के लिए वह पंडित शिवदत्त की बातें याद कर रहा है, लेकिन उनकी बातें उसे गलत भी लग रही हैं और सही भी। रधिया और अंगूरी की जिस तुलना पर वह बिगड़ उठा था, खुद तब से कई बार कर चुका है। रधिया कभी उन्नीस लगती है, कभी इक्कीस। अंगूरी उसकी बहू है, रधिया से ज्यादा जवान है, उसके लड़के की माँ है। फिर रधिया? लेकिन रधिया में जो बात है, अंगूरी में नहीं। रधिया प्यार करती है, अंगूरी अधिकार जमाती है। अंगूरी सोबरन के दारू पीने पर चिढ़ती है और लड़ती है, रधिया दारू को बुरा नहीं समझती, बल्कि पीने के लिए दो-चार रुपये भी दे देती है। आज भी तीन रुपये दे गयी है। लेकिन...

सोबरन को लगता है, बात सिर्फ देह और दारू की नहीं, बात कुछ और है। लेकिन क्या?

उसे रधिया की बातें याद आ रही हैं। मुखिया उसे गाँव से निकाल देने की फिराक में हैं, यह सोबरन भी जानता है। लेकिन वह इसमें क्या कर सकता है? रधिया का कोई कानूनी हक तो यहाँ है नहीं। और होता भी तो क्या? कानून तो पैसे का है सब। मेरे ही मामले में क्या हुआ? झूठा मुकद्दमा था, फिर भी जेल हो गयी होती, अगर पैसा न होता...और पैसा तो साले मुखिया जैसे लोगों के पास ही है। उनकी पहुँच भी ऊपर तक है। थाना-कचहरी से लेकर असेंबली तक। सोबरन उनसे अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पा रहा है, रधिया के लिए कैसे लड़े?

मगर उसकी यह कमजोरी रधिया जाने, यह सोबरन को मंजूर नहीं। वह कौन होती है उस पर ताना कसने वाली कि वह कुछ नहीं कर सकता? अरे, जब मैं कह रहा हूँ कि मैं सब देख लूँगा तो विश्वास कर। नहीं करती तो मर। उस मास्टर साले को बीच में क्यों लाती है?

दरअसल गुस्सा सोबरन को मास्टर पर ही था, मारे गये पंडित शिवदत्त। रधिया ने सोबरन को कच्चा पड़ता देख कहा था, ‘‘देख लो, सोबरन, कहीं मास्टर की ही बात सच्ची न निकले कि तुम कुछ नहीं कर पाओगे।’’

सोबरन ने रधिया को डाँट दिया था, ‘‘उस पाजी की बात मत करो, राधे! मैं उसका नाम भी तुम्हारे मुँह से नहीं सुनना चाहता।’’ रधिया हँस दी थी, ‘‘मैं उसका नाम क्यों लूँ, बात आयी तो मैंने कह दी। तुम्हें नहीं पसंद है, तो छोड़ो। पर यह सोच लो कि अब तुम्हें कुछ करना जरूर पड़ेगा। मुखिया मुझे गाँव से निकालने पर तुले हैं।’’

रधिया हँस दी थी और सोबरन ने कह दिया था, ‘‘तुम फिकर मत करो, मैं सब देख लूँगा।’’ लेकिन कहते समय उसे लगा था कि वह झूठ बोल रहा है और रधिया उस झूठ को समझ रही है। रधिया के जाने के बाद भी सोबरन इस अहसास से तिलमिला रहा था। उसे लगा, मास्टर से रधिया की बातचीत आजकल कुछ ज्यादा ही होने लगी है। मास्टर जरूर उसे मेरे खिलाफ भड़काता होगा। 

‘‘मुखिया के खिलाफ तुम कुछ नहीं करोगे। तुम्हें अपने मौज-मजे से फुर्सत मिले तब न!’’ गाँव के स्कूल में पढ़ाने आने वाले मास्टर की यह बात सोबरन को अक्सर याद आती है। हालाँकि मास्टर ने उसका कभी कुछ बुरा नहीं किया, फिर भी उसे मास्टर पर गुस्सा आता है। उसकी समझ में नहीं आता कि जब दुनिया में सभी बदमाश हैं, तो मास्टर ही एक शरीफ कैसे हो सकता है? फिर गाँव के लोग आनगाँव के इस आदमी की इतनी इज्जत क्योें करते हैं? यहाँ तक कि मुखिया भी उससे दबते हैं, जबकि वह खुलेआम मुखिया की मुखालफत करता है। बातें उसकी सोबरन को भी सही लगती हैं, लेकिन उसमें कुछ ऐसा है कि सोबरन को उससे डर लगता है। और डेढ़ पसली के उस आदमी से सोेबरन डरना नहीं चाहता। हालाँकि मास्टर से डरने की कोई बात नहीं है, मास्टर जब भी मिलता है, हँसकर बात करता है, लेकिन उसकी बातों में कुछ ऐसा होता है कि सोबरन उसके सामने खुद को बहुत छोटा और कमजोर समझने लगता है। यह चीज उसे तिलमिला देती है। तिलमिलाकर वह गुस्से से भर उठता है। गुस्से में किसी से लड़ाई-झगड़ा कर लेता है। कोई और नहीं मिलता, तो अंगूरी को ही पीट देता है। अपने लड़के को ही मार बैठता है। फिर भी तिलमिलाहट जाती नहीं। दारू पीता है, रधिया को भोगता है, फिर भी नहीं। भीतर एक आग-सी लगी रहती है। सोचता है, जब तक नूरसिंह से बदला नहीं ले लेगा, यह आग बुझेगी नहीं। लेकिन मुखिया नूरसिंह रात-बिरात कभी निकलते नहीं, निकलें भी तो तमंचा हर वक्त उनकी जेब में रहता है।

इसी उधेड़-बुन में पड़ा सोबरन जागता रहा और बीड़ियाँ फूँकता रहा। उसके लिए यह एक अजीब और परेशानी वाली बात थी। वह कभी उधेड़-बुन में नहीं पड़ता। या तो सीधा सोचता है, या सोचता ही नहीं। सही-गलत जो होता है, कर डालता है। भुगतना पड़ता है, तो भुगत लेता है। चिंता और पहलवानी का कोई साथ नहीं। 

हारकर सोबरन ने सीधी बात सोच ली है: सुबह होते ही वह पंडित शिवदत्त के पास जायेगा। उनके चरण छूकर क्षमा माँगेगा। रधिया का जो होना हो सो हो, उसकी परवाह नहीं करेगा। सोबरन ने उसकी सुरक्षा का ठेका थोड़े ही ले रखा है! मास्टर के गुण गाती है, तो जा, मास्टर से मदद माँग। मास्टर की भगतिन...साले को मारा नहीं तो नाम सोबरन नहीं!

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सुबह रोज की-सी सुबह थी। रात को जो घटना खेत में घट गयी थी, उसका रंचमात्र भी प्रभाव रधिया के मन पर नहीं था। आँख खुलने पर राधे-राधे कहकर बातें करने वाले सोबरन की आवाज उसके कानों में जरूर गूँजी थी, उठकर अँगड़ाई लेते समय एक सुखद सिहरन भी उसने महसूस की थी, दगड़े में खड़े पंडित शिवदत्त का उपदेश भी उसे याद आया था, लेकिन इस सबको उसने मन पर टिकने नहीं दिया था।

रोज की तरह उठी और बाजरा पीसने बैठ गयी। पीसती रही और जो मन में आया, गाती रही। बच्चों के जागने का समय हुआ, तो छप्पर के नीेचे बने चैके में आकर चूल्हा चेताया और पानी का बटुला गरम होने को रख दिया। ठंडे पैरों को आँच के सामने रखकर तपाने लगी। अरहर की सूखी डंडियाँ भरभराकर जल रही थीं और लपट लेती आँच को देखना उसे अच्छा लग रहा था। कल खरीदी हुई गुड़ की भेली उसके ध्यान में थी और वह सोच रही थी कि बालक उठ जायें, तो उनके लिए बाजरे का मीठा दलिया पका देगी।

तभी पाँच बरस की उसकी बिटिया उसके पास आ बैठी। रधिया ने ओढ़ा हुआ खेस खोलकर बेटी को ढँक लिया और अपने साथ सटा लिया। फिर बोली, ‘‘अपने मास्साब की बात भूल गयी, बिट्टो?’’

सुनकर बिट्टो को सहसा ध्यान आया और उसने मुस्कराते हुए छोटे-छोटे हाथ जोड़कर माँ से कहा, ‘‘अम्मा, नमस्ते।’’

रधिया खिल उठी। बिट्टो पर असीसें बरसा दीं। आशीर्वादों में बिट्टो खूब बड़ी हो गयी, पढ़-लिखकर मास्टरनी बन गयी, अच्छे-से दूल्हे के साथ उसकी शादी भी हो गयी। बिट्टो ने माँ की गोद में लेटकर आँखों में बची रह गयी नींद में फिर सपने खोजना शुरू कर दिया, लेकिन माँ चुप होकर चूल्हे में लकड़ियाँ सरकाती हुई, आँच की लपटों को एकटक देखने लगी। 

माँ का सपना बहुत बड़ा है, इसलिए खुली आँखों से देखना पड़ता है उसे। वह जानती है कि एक मेहनत-मजूरी करने वाली, नीच जात, अकेली विधवा को अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर किसी लायक बनाने का सपना नहीं देखना चाहिए, लेकिन वह देखती है। वह जानती है कि उसका सपना कहीं भी टूट सकता है या तोड़ दिया जा सकता है; लेकिन कच्चे बरतन टूट जायेंगे इस डर से क्या कोई बरतन बनाना छोड़ देता है? उसके बच्चे तो चाक पर चढ़ी गीली मिट्टी हैं। वह उन्हें अच्छे से अच्छा बनाकर चाक सेे उतारेगी, बढ़िया से बढ़िया आँच देकर उन्हें पकायेगी, सुंदर से सुंदर बेल-बूटों से उन्हें सजायेगी।

स्कूल में बिट्टो को दाखिल कराने गयी थी, तो उसने मास्टर से कहा था, ‘‘खूब अच्छी तरह पढ़ाना, मास्टर, मैं अपनी बिट्टो को मास्टरानी बनाऊँगी।’’

मास्टर एक विधवा कुम्हारिन की इस महत्त्वाकांक्षा पर मुस्कराया था। मूँछों में हँसते हुए उसने कहा था, ‘‘सो तो ठीक है, रधिया, लेकिन यह ठहरी लड़की जात। मास्टरनी बन भी गयी, तो क्या इसकी कमाई तुम्हारे हाथ आयेगी?’’

रधिया बात समझकर भी तिलमिलायी नहीं थी। हँसकर कहा था, ‘‘इतने गगरे-सुराहियाँ बनाती हूँ, मास्टर, सबका ठंडा पानी मैं ही पीती हूँ क्या? और तुम भी तो यही काम करते हो। तुम्हारे पढ़ाये हुए बालकों में से कोई मास्टर बनेगा, कोई पटवारी, कोई थानेदार। क्या उनकी कमाई तुम्हें खाने को मिल जायेगी?’’

मास्टर अचकचाकर रधिया का मुँह देखने लगा था। रधिया जैसी औरत के मुँह से ऐसी ज्ञान की बात सुनने की उम्मीद उसे नहीं थी। उस समय कुछ नहीं कहा था उसने, पर एक दिन बिट्टो ने स्कूल से लौटकर माँ को बताया था कि मास्साब ने क्या कहा है--अपनी माँ से खूब प्यार किया करो। रोज सुबह उठकर नमस्ते किया करो। तुम्हारी माँ बहुत समझदार औरत है।

रधिया चूल्हेे की आँच को देखती है और मुस्कराती है। अपने बारे में सोचती है--कितनी गिरी हुई और बदनाम औरत है वह, लेकिन कोई तो है, जो उसे ठीक समझता है। मास्टर के लिए उसके मन में आदर ही आदर है। उसे वह बिट्टो के संदर्भ से ही नहीं, अपने संदर्भ से भी जानती है।

गाँव में सोबरन के साथ रधिया को सबसे पहले मास्टर ने ही देखा था। उस दिन मास्टर को गाँव में कुछ देर हो गयी थी। शाम के झुटपुटे में रेतीले दगड़े में अपनी साइकिल रौंदता वह अपने गाँव जा रहा था कि अमराई के साथ वाले अरहर के खेत में से सोबरन और रधिया अचानक एक साथ निकल पड़े थे। गाँव में अरहर के खेत बदनाम होते हैं। रधिया के साथ सोबरन को अरहर के खेत से निकलते देख अनुमान के लिए कुछ बचा ही नहीं था। मास्टर मुस्कराता हुआ आगे बढ़ गया था, लेकिन सोबरन ने उसे पुकार लिया था, ‘‘सुनो मास्टर!’’ और मास्टर के रुक जाने पर सोबरन ने पास आकर उसकी साइकिल का हैंडिल पकड़ लिया था। कहा था, ‘‘तुमने देख तो लिया और देखकर मुस्करा भी लिये, पर आगे बात फैली, तो इस गाँव में मास्टरी नहीं कर पाओगे। मेरा नाम सोबरन है।’’

धमकी तगड़ी थी, क्योंकि सोबरन तगड़ा था, लेकिन मास्टर हँस दिया था। बोला, ‘‘हाँ, भाई, तुम सोबरन ही हो। मैं तुम्हें जानता हूँ। नामी पहलवान हो। लेकिन गाँव में शायद एक सोबरन और भी तो है, जो किसी डकैती-वकैती में पकड़ा गया था? सुना है, वह थानेदार के जूते चाटकर जेल जाने से बच आया था।’’ सोबरन को झटका लगा था, लेकिन मास्टर उसे बोलने का मौका दिये बिना कहता गया था, ‘‘मुझे तो तुम यहाँ मास्टरी करने नहीं दोगे, पर नूरसिंह ने तुमको डाके में फँसाकर जबर्दस्ती तुम्हारे खेत रेहन रख लिये, तब तुम्हारी मर्दानगी कहाँ गयी थी?’’

‘‘उस बात से तुमको कोई मतलब नहीं, मास्टर!’’ सोबरन को गुस्सा चढ़ आया था और साइकिल के हैंडिल को झकझोरते हुए उसने कहा था, ‘‘तुमने मेरे खिलाफ कुछ किया, तो काटकर नहर में फेंक दूँगा।’’

‘‘तुम्हारा क्या खयाल है, मैं तुम्हारे खिलाफ क्या करूँगा?’’ मास्टर ने गंभीर होकर पूछा था। 

‘‘बदनामी करोगे, और क्या करोगे तुम! पर मैं भी देख लूँगा।’’

‘‘निश्चिंत रहो, तुम्हारी बदनामी करते फिरने की मुझे फुरसत नहीं है। लेकिन तुम्हें देखना ही हो, तो अपने को देखो। क्या हो तुम? अच्छे-भले किसान के लड़के थे, दारूबाजी और गुंडागर्दी में पड़ गये और जिनके लिए लड़े-मरे, उन्हीें के बनाये झूठे मुकद्दमे में फँसकर अपनी जमीन से हाथ धो बैठे। अपने ही खेतों में तुम ठाकुर नूरसिंह के नौकर बनकर रह गये हो, इस चीज को भी देखते हो तुम?’’

‘‘सब देख रहा हूँ, मास्टर! मौका देख रहा हूँ। नूरा को एक दिन ठिकाने लगाकर ही रहूँगा। देख लेना।’’

‘‘देख लिया! मुखिया के खिलाफ तुम कुछ नहीं करोगे। तुम्हें अपने मौज-मजे से फुरसत मिले तब न!’’ कहते हुए मास्टर ने सोबरन का हाथ पकड़कर अपनी साइकिल के हैंडिल से हटा दिया था।

रधिया देखती रह गयी थी। सोबरन कुछ नहीं बोल पाया था। सोबरन को किसी के सामने इतना फीका पड़ते रधिया ने कभी नहीं देखा था। उसे आश्चर्य हुआ था, इस पतले सींक-से आदमी में कौन-सी ताकत है, जो सोबरन जैसे खूनी आदमी का हाथ झटककर चला गया? रधिया की समझ में एक ही बात आयी थी कि मास्टर के पास विद्या है और विद्या की ताकत सोबरन की खूनी ताकत से बड़ी है। उसने सोचा था, अगर वह पढ़ी-लिखी होती और कहीं मास्टरानी होती, तो क्या उसे किसी से डरना पड़ता?

उस दिन से रधिया मास्टर की इज्जत करने लगी थी और उसे अपनी बिट्टो को मास्टरनी बनाने की धुन सवार हो गयी थी। और जिस दिन से रधिया ने बिट्टो के मुँह से मास्टर द्वारा की गयी अपनी प्रशंसा सुनी है, वह उसका और भी आदर करने लगी है। मास्टर सुबह-शाम गाँव में आते-जाते रधिया के घर के सामने से ही गुजरता है। स्कूल रधिया के घर से जरा दूर है, इसलिए जाते समय बिट्टो को साइकिल पर बिठा ले जाता है, लौटते समय छोड़ जाता है। रधिया से दो-चार बातें भी कर लेता है।

एक दिन उसने पूछा था, ‘‘सोबरन तुम्हें कैसा आदमी लगता है, रधिया?’’
‘‘मेरे लिए तो अच्छा ही है, मास्टर!’’

‘‘उसे दारू-पानी के लिए पैसा तुम देती हो?’’

‘‘कभी-कभार हाथ में कुछ रह जाता है तो...’’ रधिया सकुचा गयी थी। उस दिन मास्टर से न जाने क्यों उसे कुछ डर-सा लगा था। लेकिन मास्टर ने फिर और कुछ नहीं पूछा था, मुस्कराकर रह गया था। रधिया का मन हुआ था, कह दे--सोबरन का हाथ मैंने अपनी हिफाजत के लिए पकड़ा है, मास्टर! गाँव के लोगों को तो तुम जानते हो, उनका बस चले तो मुझे चींथकर खा जायें। सोबरन बदमाश आदमी है, उससे सब डरते हैं, इसीलिए उसकी होकर रहती हूँ। इसीलिए चार पैसे भी उस पर खरच देती हूँ। लेकिन मास्टर से यह सब कह नहीं पायी थी। कहना जरूरी भी नहीं लगा था। सोचा था, मास्टर इतना विद्वान आदमी है, क्या इतनी बात नहीं समझता होगा?

‘‘सोबरन की बहू को यह सब मालूम है?’’ मास्टर ने पूछा था।

‘‘मालूम है। एक दिन आकर मुझसे लड़ी भी थी, पर सोबरन ने उसे पीट दिया था। फिर नहीं आयी। हाँ, राह-बाट कभी मिल जाती है, तो गालियाँ देती है। मैं जवाब नहीं देती।’’

‘‘ऐसा कब तक चलेगा, रधिया?’’

‘‘जब तक जिंदा हूँ, जब तक ये हाथ-गोड़ चलते हैं, तब तक ऐसा ही चलेगा, मास्टर! मेरे लिए दुनिया में और कहीं ठौर नहीं है। बस, ये बालक पल जायें, कुछ पढ़-लिख जायें।’’ रधिया ने कहा था और फिर एकाएक पूछ लिया था, ‘'बिट्टो कुछ पढ़ती-पढ़ाती है कि नहीं?’’

‘‘पढ़ती तो है, पढ़ाने भी लगेेगी कभी।’’

‘‘मास्टरानी बन जायेगी?’’ 

‘‘तुम बनाना चाहती हो, तो क्यों नहीं बनेगी? तुम मास्टरनी की अम्मा जरूर बनोगी।’’

तब से मास्टर रधिया को ‘मास्टरनी की अम्मा’ कहने लगा है। रधिया को उसका यह मजाक अच्छा लगता है। एक दिन उसने भी मजाक में कहा था, ‘‘तुम इतने बड़े, ऊँची जात के और बाल-बच्चों वाले न होते और मेरी बिट्टो बड़ी होती, तो तुमसे उसका ब्याह कर देती। फिर बिट्टो को मास्टरानी बनाये बिना ही मास्टरानी की अम्मा बन जाती।’’ मास्टर ने रधिया को झिड़क दिया था। कहा था, ‘‘क्या बात करती हो! बिट्टो मेरी छोटी लड़की के बराबर है।’’

एक दिन इसी तरह हँसते और बातें करते उन्हें किसी ने देख लिया था और सोबरन से जाकर कह दिया था। सोबरन ने रधिया पर गुस्सा किया था। कहा था, ‘‘अब मास्टर से आँख लड़ाने लगी हो?’’ रधिया नाराज हो गयी थी। धारदार जबान से कह दिया था, ‘‘होश की बात करो, सोबरन! अव्वल तो ऐसी कोई बात है नहीं, और हो भी तो मैं तुम्हारी ब्याहता नहीं हूँ। तुमसे कुछ लेती नहीं हूँ, तुम्हें कुछ दे ही देती हूँ।’’

कहने को कह गयी थी, लेकिन कहने के बाद डर गयी थी। सोेबरन कहीं कुछ कर न डाले। इतनी बात कौन मर्द बर्दाश्त करेगा? लेकिन सोबरन बेशरम-सा हँस दिया था और रधिया की खुशामद करने लगा था। उस रात रधिया को सोेबरन--वही गुंडा पहलवान, जिससे सारा गाँव डरता था--एकदम नामर्द-सा लगा था और रधिया को अपनी चिंता हो आयी थी। मुखिया अगर मुझे गाँव से निकाल देने पर तुल जायें, तो क्या वह मुझे बचा लेगा? और कोई सहारा न देख उसने अपने डर को मन में ही दबा लिया था। लेकिन उस रात सोबरन के साथ का सुख रधिया को सुख-सा नहीं लगा था। 

कल रात भी कुछ-कुछ ऐसा ही...

अंदर से छोटे बच्चे के जागकर रोने की आवाज सुनकर सोच में डूबी रधिया का ध्यान भंग हुआ। गोद में ऊँघती बिट््टो को जगाकर उसने कहा, ‘‘उठ बिट्टो, लाला जाग गया है। तू यह गरम पानी ले ले। हाथ-मुँह धोकर स्कूल जाने को तैयार हो।’’

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मास्टर ओस-भीगे दगड़े में साइकिल चलाता हुआ खेतों के बीच से निकलकर गाँव की तरफ आ रहा है। तेजी से चलती हुई उसकी साँस धुएँ की शक्ल में बाहर निकल रही है। नौ बजने वाले हैं और धूप निकल आयी है, लेकिन रात कोहरा इतना घना पड़ा है कि अभी तक नहीं छँटा है। मास्टर ताल की ओर देखता है। कोहरे को भेदकर जल तक पहुँचती किरणों का दृृश्य उसे अच्छा लगता है। जल पर भाप-सी उठ रही है, जैसे ताल में नहाने के लिए गरम किया हुआ पानी भरा हो।

मास्टर मुग्ध होकर ताल की तरफ देख रहा था, इसलिए देख नहीं पाया कि सोबरन कब सामने आ गया और कब उसने पास आकर उसकी साइकिल को पकड़ लिया। मास्टर ने चैंककर देखा और दारू की तीखी गंध उसके नथुनों में घुस पड़ी। 

कोई और होता तो डर जाता, लेकिन मास्टर को सोबरन से डर नहीं लगता। सोबरन सामने आता है, तो मास्टर को हँसी आने लगती है। सोचता है, यह बैल कभी नहीं समझ पायेगा कि इसकी जिंदगी किस तरह बर्बाद हो रही है। पंडित शिवदत्त के धर्म और ठाकुर नूरसिंह की राजनीति के मिक्सचर ने इसे एक तरफ निहायत बौड़म, निकम्मा और डरपोक बना दिया है, तो दूसरी तरफ एकदम लंपट, हिंसक और दुस्साहसी। ऐसे लोगों से किस तरह पेश आया जाता है, मास्टर को मालूम है। सोबरन की चर्चा चलने पर वह कहा करता है, ‘‘ऐसे लोगों से डरे तो मरे।’’

  ‘‘आज सुबह-सुबह कहाँ से पी आये, ठाकुर सोबरन सिंह?’’ मास्टर ने साइकिल से उतरकर मुस्कराते हुए कहा, ‘‘लगता है, रधिया आजकल पैसे कुछ ज्यादा देने लग गयी है!’’

क्षण-भर पहले तक सोबरन का खयाल था कि वह मास्टर को मारेगा। इतना मारेगा कि मास्टर इस गाँव में आना भूल जायेगा। वह काफी देर से पुलिया पर बैठा मास्टर की ही प्रतीक्षा कर रहा था, जिसकी बातों ने उसे सारी रात सोने नहीं दिया था। रात को ही उसने एक सीधी बात सोच ली थी: रधिया के खयाल के साथ मास्टर का खयाल आता है, और यह ठीक नहीं है, इसलिए वह मास्टर को मारेगा। इसके बाद कुछ भी सोचना जरूरी नहीं था। रात को रधिया तीन रुपये दे गयी थी। खेत से उठकर सोबरन सुबह सीधा छिद्दा के घर चला गया था, जिसके यहाँ कच्ची दारू खिंचती और बिकती है। तीन रुपये में जितनी आ सकती थी, खडे़-खड़े पीकर सोबरन चला आया था और मास्टर को मारने के लिए पुलिया पर बैठकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा था। लेकिन मास्टर की बात सुनकर वह भौंचक-सा बस उसे देखता रह गया। न हाथ उठा, न मुँह से कोई गाली निकली। उसे लगा, यह सुबह-सुबह ठंड में खाली पेट नशा कर लेने के कारण है।

‘‘पुलिया पर बैठो और धूप खाओ।’’ मास्टर ने कहा और साइकिल खड़ी कर दी। सोबरन के हाथ से हैंडिल छुड़ाया और उसे पकड़कर पुलिया पर ले आया। बिठाकर चलने लगा था कि सोबरन औंधे मुँह उसके पैरों पर गिर पड़ा। मास्टर ने समझा, नशे के कारण गिर गया है। उठाने की कोई जरूरत न समझकर उसने अपने पैर खींचे, लेकिन देखा कि सोबरन उसके पैर पकड़े हुए है और कह रहा है, ‘‘मुझे माफ कर दो, गुरूजी! अब कभी तुम पर हाथ नहीं उठाऊँगा।’’

मास्टर मुस्कराया। बोला, ‘‘चलो, कर दिया माफ। अब उठो।’’

‘‘नहीं-नहीं, पहले वचन दो, वचन।’’

‘‘क्या वचन लेना चाहते हो मुझसे?’’

‘‘नहीं, पहले वचन दो, वचन।’’

‘‘अच्छा, वचन दिया। अब बोलो, क्या चाहते हो?’’

कुछ देर मास्टर उत्तर की प्रतीक्षा में खड़ा रहा। कोई जवाब नहीं आया, तो उसने झुककर सोबरन को उठाया। सोबरन की आँखें बंद थीं और मुँह में दगड़े की धूल भरी हुई थी। वह या तो सो गया था, या बेहोश हो गया था। उसे वहीं छोड़कर मास्टर गाँव की तरफ चल दिया।

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रधिया का घर रास्ते में ही पड़ता है और स्कूल जाने के लिए तैयार बिट्टो अक्सर मास्टर को घर के बाहर खड़ी मिलती है। बिट्टो को अपने साथ स्कूल ले जाना मास्टर का नियम-सा बन गया है। लेकिन यह क्या? आज बिट्टो नहीं, रधिया के घर के सामने गाँव के कई लोग खड़े दिखायी दे रहे हैं। पंडित शिवदत्त, चैधरी रामसेेवक, मुखिया नूरसिंह, और भी कई लोग। घूँघट वाली एक औरत हाथ नचा-नचाकर ऊँची आवाज में रधिया को गालियाँ दे रही है, ‘‘तेरे बालकों को साँप डस जाये, नासपीटी नागिन! रंडी, छिनाल, मेरा ही आदमी रह गया था तेरी आग बुझाने को?’’

मास्टर ने साइकिल से उतरकर देखा, रधिया छोटे बच्चे को गोद में चिपकाये और एक बाँह से बिट््टो को अपने-से सटाये अंदर दरवाजे के पास खड़ी भय से काँप रही है। पंडित शिवदत्त ने बिना पूछे ही मास्टर को बता दिया कि गालियाँ देने वाली औरत सोबरन की बहू है, कि रात को उन्होंने अपनी आँखों से रधिया को सोबरन के खेत में देखा था, कि सोबरन सुबह खेत से घर नहीं लौटा और खेत पर भी नहीं है। मास्टर को स्थिति से अवगत कराने के बाद पंडित शिवदत्त रधिया की ओर मुड़ गये, ‘‘अब बोलती क्यों नहीं? कहाँ भेज दिया है सोबरन को?’’
मास्टर कुछ कहता कि गाँव के दो-तीन लोग उसे खींचकर एक तरफ ले गये। संतू धीमर जल्दी-जल्दी कहने लगा, ‘‘मास्साब, मुखिया लोग रधिया को गाँव से निकालने की मिसकौट करके आये हैं। हमारे खयाल से इन्होंने सोबरन को कहीं छिपा दिया है और उसकी बहू को भड़काककर यहाँ ले आये हैं। अब बताओ, क्या किया जाये?’’

‘‘तुम मेरे साथ आओ।’’ मास्टर ने संतू से कहा। दूसरों से वहीं रुकने को कहकर उसने साइकिल वहीं खड़ी कर दी और संतू केे साथ पुलिया की ओर चल दिया। 

मुखिया नूरसिंह उस समय रधिया से कह रहे थे, ‘‘तुझे क्या हम जानते नहीं हैं! तू कुछ भी कर सकती है। तू तो ऐसी है कि जिंदा आदमी को खा जाये। अब सीधे-सीधे बता दे कि सोबरन कहाँ है, नहीं तो पुलिस बुलाकर जूते पड़वाऊँगा साली पर।’’

रधिया चुप है। उसकी चुप्पी से अंगूरी का हौसला और बढ़ गया है। गालियाँ बकती हुई वह रधिया के घेर में घुस आयी है। आँगन में सूखने के लिए रखे सकोरों को उसने लात मारकर इधर-उधर छितरा दिया है। पाँव पटक-पटककर उन्हें तोड़ रही है। रधिया क्रोध से थरथर काँपती हुई भी अपनी मेहनत की यह बरबादी देख रही है, मगर चुप है। अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रही है। बच्चों को उसने और ज्यादा अपने साथ सटा लिया है। शायद वह खतरे को भाँप गयी है कि अंगूरी अब उसके बच्चों पर झपटने वाली है। लेकिन उसकी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि जब रात को वह सोबरन को अच्छा-भला छोड़ आयी थी, तो सुबह होते ही वह कहाँ चला गया? क्यों चला गया? और चला गया, तो क्या इसका दुख रधिया को नहीं होगा? जिसकी छाया में वह अपने को सुरक्षित समझती है, उसे वह कहाँ भेज देगी? क्यों भेज देगी? फिर ये लोग उसके पीछे क्यों पड़े हैं?

रधिया के कच्चे सकोरों को चूर-चूर करने के बाद अंगूरी रधिया पर झपटी और गोद के बच्चे को छीनने लगी। अब उसे घूँघट का खयाल नहीं रह गया था और क्रोध में बिफरती हुई वह रधिया को एकदम डायन लग रही थी। लगता था, बच्चा उसके हाथ आ गया, तो वह उसे धरती पर पटककर मार डालेगी या दूूर ताल में फेंक देगी। छीना-झपटी में छोटा बच्चा चीखा, तो घबराकर बिट्टो भी चीखने लगी। बच्चे को छीनने के लिए जब अंगूरी रधिया को नोचने-काटने लगी, तो रधिया उसे धक्का देकर चीख उठी, ‘‘छोड़ मुझे, चुड़ैल! मुझे क्यों खाने आ रही है? तेरा आदमी मेरी गाँठ में तो बँधा नहीं है। घर में बैठा हो, तो तू खुद जाकर देख ले।’’

एक तरह से खुद ही अंगूरी को अपने घर के भीतर ठेलकर रधिया बाहर घेर में निकल आयी। जबान खुल ही गयी, तो अब क्या है! वह एक-एक को देख लेगी। गाँव के पंच-प्रधान लोगों से उसे नफरत हो रही थी, जो सोबरन की बहू को समझाने के बजाय खड़े-खड़े तमाशा देख रहे थे। सबसे ज्यादा नफरत हो रही थी उसे पंडित शिवदत्त से। रात को कैसे उपदेश दे रहे थे, और अब झूठा इल्जाम लगा रहे हैं कि मैंने सोबरन को कहीं भगा दिया है। मैं कहाँ भगा दूँगी उसे?

बाहर आकर उसने पंडित शिवदत्त को लताड़ा, ‘‘क्यों रे मँगते, तूने ही लगायी है न यह आग? तू कहता है, तूने मुझे रात में सोबरन के साथ खेत में देखा था। अब खोल दूँ तेरी पोल-पट्टी?’’ पंडित शिवदत्त को उम्मीद नहीं थी कि रधिया इतने दिन बाद फिर अपने पुराने चंडी रूप में लौट आयेगी। वे कुछ कहते, तब तक तो रधिया ने अन्य लोगों को सुनाते हुए कह दिया, ‘‘इससे पूछो, आधी रात को यह मँगता आनगाँव के एक आदमी लेकर मेरे घर पर क्या अपनी बिटिया की दलाली करने आया था? मैंने इसे फटकार दिया, तो यह बगुला भगत बदला निकालने आया है? झूठे, मक्कार, तुझे कोेढ़ फूटे, मेरे बासनों का नास करा दिया। एक-एक फूटे सकोरे की पाई-पाई टेंट से न निकलवा ली, तो नाम रधिया नहीं। गाँव वालों को तमाशा दिखाने लाया है तू? पर गाँव वालों की आँखें फूट गयी हैं क्या? सोबरन से दुश्मनी रही होगी, तो तेरी रही होगी। उसको कुछ किया होगा, तो तूने किया होगा।’’

पंडित शिवदत्त नहीं जानते थे कि रधिया इतना साफ झूठ इतनी सफाई से बोल जायेगी। वे कब किसके लिए दलाली करने आये थे इसके द्वार पर? उन्होंने लोगों से कहा कि रधिया झूठ बोल रही है, लेकिन रधिया ने बात इस ढंग से कही थी कि लोगों को पंडित शिवदत्त की बात पर विश्वास नहीं हुआ। सबूत यह था कि रात को पंडित शिवदत्त के यहाँ सचमुच कोई बाहर का आदमी आया था, जो सुबह होते ही चला गया था। पंडित शिवदत्त सफाई देने लगे कि वह तो उनकी जिजमानी का नाई था, जो एक बारात का न्यौता देने आया था। लेकिन वह तो उनके साथ कहीं नहीं निकला। और उसे लेकर रधिया के घर आने का तो सवाल ही नहीं उठता। वे इतने धरम-करम वाले आदमी क्या रंडी की दलाली करने आयेंगे? कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू आ गये। रात को सोबरन ने उन्हेें खेत में उठाकर पटक दिया था और अब रधिया ने यह झूठा इल्जाम उन पर लगा दिया है। हे भगवान, सचमुच कलियुग आ गया है। सत्य का कोई मूल्य नहीं रहा।

रधिया ने देखा कि पंडित शिवदत्त फँस गये हैं, तो उसकी आवाज और ऊँची हो गयी, ‘‘एक-एक पाई धरा लूँगी, एक-एक पाई। मुझ पर कोई बस नहीं चला, तो इस घोड़ी को भड़काकर ले आया। नासपीटे, मेरे सारे बासन खुँदवा दिये। सारे दिन हाड़-गोड़ तोड़कर बनाये थे। माँग-माँगकर फोकट का माल खाने वाले मँगते, तुझे क्या मालूम कि इनको बनाने में कितनी मेहनत लगती है। और मुझे धमकाने के लिए इन मुखिया-चैधरी लोगों को अपने साथ लाया है तू? तू समझता है, मैं इनकी दाब-डाँट में आ जाऊँगी? अरे, मैं किसी का दिया नहीं खाती। ढैया-पँसेरी नाज देते हैं, तो ढाई मन की मेहनत के बासन बनवा लेते हैं। ऊपर से बेगार। कभी रधिया इनका आँगन लीपे, कभी रधिया इनके घरों में मिट्टी पहुँचाये। इतनी मेहनत तो चमार-टोले के लिए करूँगी, तो भी अपना और अपने बालकों का पेट भर लूँगी। तू यह मत समझ कि मुझे तू गाँव से निकलवा देगा। यहाँ सब कितने बड़े धर्मात्मा हैं, सो मैं खूब जानती हूँ। कहे तो एक-एक के गुन बखान दूँ?’’

‘‘चलो भाई, चलो। अब रधिया किसी को नहीं बोलने देगी।’’ चौधरी रामसेवक ने मुखिया नूरसिंह से कहा। 

मुखिया नूरसिंह पंडित शिवदत्त का हाथ पकड़कर बोले, ‘‘छोड़ो पंडित, तुमको वहम हो गया होगा। रधिया की जगह किसी और को देख लिया होगा तुमने।’’

पंडित शिवदत्त की स्थिति बड़ी विचित्र हो गयी थी। अब वहाँ से चल देेने में ही उन्हें कुशल दिखायी दी। लेकिन सोबरन की बहू उन्हें खिसकते देख आगे बढ़ आयी। सोबरन को रधिया के घर में न पाकर वह कब की बाहर निकल आयी थी और चुपचाप खड़ी हुई नासमझ-सी यह सब देख-सुन रही थी। अब वह पंडित शिवदत्त की ओर लपकी, ‘‘जाते कहाँ हो, पंडित, पहले यह बताओ कि मेरा आदमी कहाँ है?’’

‘‘यह रहा तुम्हारा आदमी।’’ मास्टर की आवाज ने सबको चौंका दिया।

सबने देखा, नशे में धुत्त सोबरन को एक-एक बाँह से कंधे पर उठाये मास्टर और संतू धीमर उसे घसीटते-से ला रहे हैं। 

‘‘पुलिया के पास पीये पड़ा था।’’ संतू ने कहा और सोबरन को वहीं जमीन पर डाल दिया। 

अंगूरी सोबरन को देखकर सिहर गयी। उसने घूँघट खींच लिया और जहाँ की तहाँ खड़ी रह गयी। क्या कहे-करे, उसे कुछ नहीं सूझा। 

‘‘ले जाओ, भाई, कोई इसे इसके घर पहुँचा दो।’’ मुखिया ने कहा। लेकिन कोई आगे नहीं आया। संतू हाथ झाड़ चुका था और मास्टर अपनी साइकिल थाम चुका था। बाकी लोग मुखिया से नजर बचाकर मास्टर की तरफ देख रहे थे। स्थिति समझ कर मुखिया ने कहा, ‘‘मास्टर, तुम कहो, कोई दो आदमी इसे यहाँ से उठाकर इसके घर ले जायें।’’

मास्टर का इशारा पाकर जवाहर नाई और सीतो मुसहर ने सोबरन को उसी तरह कंघों पर डाला और घसीट ले चले। सोबरन की बहू भी चुपचाप उनके पीछे चली गयी। 

‘‘कोई बात न बात की जड़।’’ किसी ने कहा और अपनी साइकिल से टिके खड़े मास्टर को छोड़कर बाकी सब लोग भौंचक, डरे-सहमे और बेवकूफ-से बने वहाँ से चल पड़े।

मास्टर चकित-सा खड़ा था और रधिया के चेहरे पर बदलते भावों को पढ़ रहा था। फिर आँगन में फूटे पड़े कच्चे सकोरों की ओर देखते हुए उसने कहा, ‘‘आज तो तुम्हारा बहुत नुकसान हो गया, मास्टरनी की अम्मा!’’

‘‘नहीं मास्टर, यह कोई खास नुकसान नहीं है।’’ रधिया ने कहा और बिट्टो को मास्टर के पास छोड़कर गोद के बच्चे को चूमती हुई भीतर चली गयी। जब वह मुड़ी थी, मास्टर ने उसकी डबडबायी आँख में चमकता एक आँसू देख लिया था। 

मास्टर कुछ पल ठिठका-सा खड़ा रहा, फिर बिट्टो के साथ स्कूल की तरफ चल दिया। 

रधिया भीतर जाकर बच्चे को सीने से लगाये फूटकर रो पड़ी। वह रो रही थी और अपने को ही कोस रही थी, ‘‘माटीमिली, तूने हाथ भी पकड़ा तो किसका!’’

--रमेश उपाध्याय

Saturday, May 20, 2017

मेरे और तुम्हारे बीच


अंबाला शहर (हरियाणा) से एक पत्रिका निकलती है 'पुष्पगंधा'. उसके संपादक हैं हमारे एक पुराने मित्र विकेश निझावन. वर्षों से उनसे न मिलना हुआ था न किसी माध्यम से संपर्क रहा था, पर अचानक कुछ समय पहले उनका फोन आया कि उन्हें हमारी कहानी 'चिंदियों की लूट' अपनी पत्रिका के लिए चाहिए. हमने भेज दी और वह उसके नये अंक (मई-जुलाई 2017) में छप गयी है. उस पर प्रशंसात्मक प्रतिक्रियाओं के फोन भी आने लगे है. अंक के साथ उनका जो पत्र आया है, उसमें उन्होंने लिखा है :
"बहुत समय पहले का आपका एक आलेख 'मेरे और तुम्हारे बीच' क्या उपलब्ध हो पायेगा? उस वक्त मेरे और मित्रों के बीच उस पर काफी चर्चा रही थी. कई वर्ष सँभाल कर रखा था, अब मिल नहीं रहा..."
आज वह लेख खोजा तो पाया कि 1974 का लिखा हुआ है. (बहुत-से अन्य लेखों की तरह यह भी हमारी किसी पुस्तक में नहीं है.) हम इसे लगभग भूल चुके थे, पर आज मिलने पर पढ़ा तो बड़ा सुख मिला कि पत्र शैली में लिखा गया यह लेख आज भी प्रासंगिक और पठनीय है. --रमेश उपाध्याय

 लेख

मेरे और तुम्हारे बीच

मेरे और तुम्हारे बीच अब शायद ऐसा कोई संबंध-सूत्र नहीं रह गया है, जिसे पकड़कर मैं अपनी बात कह सकूँ, क्योंकि कल तक तुम मुझे जितना प्रिय और आत्मीय मानते थे, आज उससे भी अधिक अपना शत्रु मानने लगे हो। ऐसे में तुम्हें मेरी कोई भी बात सच और अच्छी नहीं लगेगी। फिर भी मैं निराश नहीं हूँ। मुझे अब भी आशा है कि तुम मुझे समझ सकोगे। आज नहीं तो कल। और मैं तो कहूँगा कि तुम इस पत्र को बैंक में अपने लाॅकर में रख देना और मेरी मृत्यु के बाद निकालकर पढ़ना। मुझे विश्वास है कि उस समय तुम्हें इसका एक-एक शब्द सच लगेगा। 

तुम मुझे एक सामूहिक कार्य में शामिल होने पर मिले थे। मुझे नहीं मालूम कि तुम्हें मुझमें क्या अच्छा लगा कि तुम मेरी तरफ आकृष्ट हुए, लेकिन कुछ तो अच्छा लगा ही होगा। मुझे तुममें जो अच्छा और आकर्षक लगा, वह था तुम्हारा सौहार्दपूर्ण निश्छल व्यवहार, शर्मीला-सा विनम्र स्वभाव, तुम्हारे अंदर छलकता हुआ नये यौवन का उत्साह, निःस्वार्थ भाव से सामूहिक कार्य में जी-जान से जुट पड़ने की तुम्हारी लगन और तुम्हारा वह मासूम भोलापन, जिसे बगैर मिलावट के शुद्ध सोने जैसी इंसानियत का नाम देने को जी करता है। हमारे संबंध की यह शुरुआत शायद हम दोनों को ही जिंदगी भर बहुत अच्छे दिनों के रूप में याद रहेगी। 

उन दिनों हम बहुत-से थे, मगर सब एक। सारी अलग-अलग इकाइयाँ एकजुट थीं, जैसे एक के बिना दूसरी का अस्तित्व ही न हो। फिर वह काम पूरा हो गया और हम सब बिखर गये। कोई कहीं चला गया, कोई कहीं। लेकिन इस बीच हमारे संबंध मजबूत हो चुके थे। तुम मेरे काफी नजदीक आ गये थे। मेरे अन्य मित्र भी तुम्हारे मित्र बन गये और मेरे परिवार के बीच भी तुम एक आत्मीय जन के रूप में माने जाने लगे। इसका एक कारण यह भी था कि हमारे उस ग्रुप के बिखरने के बाद मैं और तुम ही अपने-अपने परिवारों के कारण उस छोटे शहर से इस महानगर में साथ-साथ आ सके। यहाँ आकर भी हम उसी आत्मीय भाव से मिलते रहे। यह सब बहुत अच्छा लगता था--तुम्हें भी अच्छा लगता था और मुझे भी। शुरू के वे तीन वर्ष मेरे-तुम्हारे संबंधों को उत्तरोत्तर घनिष्ठ बनाते चले गये थे। 

लेकिन ऐसे संबंधों में एक भूल अक्सर हो जाया करती है। वह यह कि हम भावुकता में बह जाते हैं। अपनी भावुकता में हम यह भूल जाते हैं कि समय बीतने के साथ-साथ हमारा जीवन बदलता रहा है और अब हम बिलकुल वैसे ही नहीं रहे हैं, जैसे कुछ वर्ष पहले थे। होना तो यह चाहिए कि हम अपने जीवन में आये परिवर्तनों को देखते-जानते-समझते चलें और तदनुसार अपने संबंधों को पुनर्परिभाषित करते चलें, लेकिन हमारी भावुकता हमें ऐसा करने से रोकती है। भावुकता बुद्धि की दुश्मन है। वह तर्क को स्वीकार नहीं करती। नतीजा यह होता है कि हम अपने संबंधों में आये परिवर्तनों के अनुसार स्वयं को बदलने के बजाय (या उन्हें बदले हुए रूप में समझने के बजाय) उसी पुराने संबंध को जीते रहना चाहते हैं, जो शुरू में था और हमें प्रिय था।

हमारी यह भूल, यह भावुकता, बड़ी गड़बड़ी पैदा कर देती है। हम पहले की तरह ही मिलना चाहते हैं, वैसी ही बातें करना चाहते हैं, उसी तरह साथ-साथ रहना और मीठे सपने देखना चाहते हैं, उसी तरह एकजुट होकर काम करना चाहते हैं। ऐसे में यदि हम फिर किसी सामूहिक कार्य में एक साथ शामिल हो जाते, तो शायद हमारी यह इच्छा पूरी होती रहती। लेकिन वैसा हो नहीं पाया। किसी एक समान उद्देश्य के लिए एक साथ आगे बढ़ने के बजाय हमारे काम की दिशाएँ अलग-अलग हो गयीं। हाँ, हमारा मिलना-जुलना बना रहा। 

यदि हम भावुक हों, तो किसी पुराने मित्र से मिलने जाते समय हम वैसे ही भाव मन में लेकर जाते हैं, जो उससे मिलते समय वर्षों पहले हमारे मन में होते थे। लेकिन हम पाते हैं कि उससे मिलकर हमें ठेस लगी है और हम कहते हैं--अरे, वह तो एकदम बदल गया है। वह बदलाव हमें अच्छा नहीं लगता। हम दुखी हो जाते हैं। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। कुछ लोग होते हैं, जिनसे हम चाहे जितने समय बाद मिलें, हमें नहीं लगता कि वे बदल गये हैं। ऐसा केवल दो स्थितियों में हो सकता है--या तो हम दोनों भावुकता में जीने वाले अतीतजीवी हों और हमारा बौद्धिक विकास समान रूप से रुका रहा हो, अथवा हम दोनों बौद्धिकता के साथ अपने वर्तमान को समझते हुए जीने वाले हों और हमारा बौद्धिक विकास एक-दूसरे को जानते-समझते हुए समान रूप से हुआ हो। लेकिन ऐसा आदर्श जोड़ बहुत कम देखने में आता है। गड़बड़ी सबसे ज्यादा वहाँ होती है, जहाँ दोनों में एक व्यक्ति भावुक हो और दूसरा बौद्धिक। बौद्धिक व्यक्ति जीवन में आने वाले बदलाव को समझता हुआ अपने पुराने संबंधों को नयी नजर से देखता है और उन्हें बदलना चाहता है, जबकि भावुक व्यक्ति पुराने संबंधों को पुरानी नजर से ही देखता है और उन्हें उसी रूप में देखते रहना चाहता है। 

मेरे और तुम्हारे बीच यही हुआ है। मैं स्वीकार कर लूँ कि शुरू के दिनों में मैं भी तुम्हारी तरह भावुक था। हाँ, इतना नहीं। शायद उस भावुकता के लिए मेरी परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार थीं, क्योंकि उस समय मैं अकेला था और उस छोटे शहर में घरेलू जिम्मेदारियों से मुक्त छात्र जीवन जीते समय उस प्यार करने वाली उम्र में वह भावुकता शायद जायज भी थी। या कम से कम अस्वाभाविक नहीं थी। लेकिन फिर मैं इस महानगर में आ गया। आजीविका संबंधी तमाम समस्याएँ मेरे जीवन में आ गयीं। मेरी शादी हो गयी। बच्चे हो गये। नये-नये लोगोें से मेरा परिचय हुआ। मैं एक नयी विचारधारा के संपर्क में आया, जिसने मुझे ऐसा झकझोरा कि मेरे बहुत-से पुराने विचार और विश्वास बदल गये। मेरा लेखन बदल गया। संक्षेप में, मैं काफी बदल गया। बदले तुम भी। अपने छोटे और प्यारे शहर से इस बड़े और अजनबी शहर में आये, नौकरी की, व्यवस्थित हुए, अपना निजी जीवन शुरू किया, लेकिन... 

तुम्हें याद है, अपनी नौकरी के कुछ दिन बाद ही तुम्हें लगने लगा था कि सब लोग बदल गये हैं? लोग सचमुच बदल गये थे। बदलते ही हैं। बदलना ही है। बदलना जीवन का नियम है। और जीवन हमें इसीलिए इतना प्रिय भी होता है कि वह बदलता रहता है। लेकिन तुमने अपने और दूसरों के जीवन में आये परिवर्तनों को समझने की कोशिश नहीं की। तुम्हें लगा, दूसरे ही बदलते हैं; तुम नहीं बदलते, तुम वही हो। लेकिन जब हम यह मान लेते हैं कि हम वही हैं, तो दूसरे सब और भी ज्यादा बदले हुए लगने लगते हैं। दरअसल, तब हम स्वयं को अपरिवर्तित मानते हुए अपने अतीत से प्यार कर रहे होते हैं और इस अतीत में जिन लोगों से हमने प्यार किया होता है, उनसे उसी रूप में प्यार करते और उसी रूप में उनसे प्यार पाते रहना चाहते हैं। उन लोगों की एक प्रिय प्रतिमा हमारे मन में बनी होती है और उस प्रतिमा में किसी प्रकार का परिवर्तन हमें उसमें आयी हुई विकृति जैसा लगता है। अपने मन की उस प्रतिमा को हम बाहर भी उसी अविकृत रूप में देखना चाहते हैं। यही भावुकता है। यह सोचने का अबौद्धिक-अतार्किक ढंग है। सारी गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। अपनी भावुकता में हम भूल जाते हैं कि हमारे मन में बनी प्रतिमा में और यथार्थ व्यक्ति में अंतर है। और जब ऐसा होता है कि वह अंतर हमें बाहर तो नजर आता है, पर हमारा मन उसे स्वीकार नहीं करना चाहता, तो हमारा पहला काम यह होना चाहिए कि हम इस अंतर्विरोध को समझें और अपने-आप को बदले हुए यथार्थ के साथ एडजस्ट करें। लेकिन यह बुद्धि का काम है और हमारी भावुकता बुद्धि को यह काम करने से रोकती है। 

अकेलेपन, अजनबीपन, संबंधों की निरर्थकता, जीवन के ऊलजलूलपन आदि की बातें यहीं से पैदा होती हैं और उन बातों में हम जितने उलझते जाते हैं, उतनी ही यथार्थ की पकड़ हमसे छूटती जाती है। और तब यदि कोई हमें कोंचकर यथार्थ दिखाना चाहता है, तो हम क्षुब्ध हो उठते हैं। तर्क और बुद्धि का मजाक उड़ाते हुए हम दूसरों की ‘दुनियादारी’ से चिढ़ने लगते हैं। तब हम सारी बातें भावनाओं से कहना और समझना चाहते हैं। शब्द हमें व्यर्थ लगने लगते हैं और हम शब्दों के अर्थ समझने के बजाय बोलने वाले के आशय को भाँपने लगते हैं (जो पुनः एक अबौद्धिक काम है) और तब हमारे लिए आंगिक चेष्टाएँ तथा चेहरे पर आने वाले भाव अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं--अपने भी और दूसरों के भी। शब्दों के प्रति अविश्वास हमारे मन में घर कर जाता है और भाषा हमारे लिए व्यर्थ होने लगती है। तभी हम अपने संबंधों को पुनर्परिभाषित करने और उन्हें नया नाम देने से कतराने लगते हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी, कैसा भी मानवीय संबंध भाषा में व्यक्त हुए बिना, यदि वह हो भी तो अस्तित्वहीन है। मानवीय संबंधों का जन्म ही भाषा के साथ हुआ है। अतः स्नेह संबंधों में भाषा के इस्तेमाल को फालतू मानना और मौन से बातों को समझाने की कोशिश करना सारे मानवीय विकास को अँगूठा दिखाकर बहुत पीछे, आदिम पशुवत जीवन-स्थिति में लौट जाना होगा। अगर तुम्हें याद हो, तुमने देखा होगा कि अकविता और अकहानी के दौर में बहुत-से हिंदी लेखक अपनी रचनाओं में उसी आदिम पशुवत जीवन-स्थिति की ओर लौटते मालूम होते थे। 

अपनी भावुकता में हम यह मान लेते हैं कि हमारे कोमल और जटिल भावों को व्यक्त करने की क्षमता भाषा में नहीं है, लेकिन वास्तव में उस समय हम अपने और अपने आसपास की चीजों के बदलते हुए संबंधों को नये नाम देने की जरूरत महसूस कर रहे होते हैं। बौद्धिक व्यक्ति के लिए यह एक चुनौती होती है, वह इस चुनौती को स्वीकार करता है और यदि उसे अपनी भाषा में इन संबंधों को नये नाम देने के लिए उचित शब्द नहीं मिलते, तो वह नये शब्द गढ़ता है, नयी भाषा का आविष्कार करता है। भाषा का विकास इसी तरह होता है। और साहित्य इसीलिए तो हर युग में नया होता हुआ विकसित होता रहता है। लेकिन भावुक लोग इस चुनौती को स्वीकार करने के बजाय पुरानी भाषा में ही अपने-आप को अभिव्यक्त करने की कोशिश करते हैं और जब इस कोशिश में कामयाब नहीं हो पाते, तो भाषा को अक्षम बताकर मौन में सार्थकता खोजते हैं। 

तब हमें बात करना नहीं, खामोश रहना अच्छा लगता है और हम चाहने लगते हैं कि अगर हम खामोश बैठे हैं, तो दूसरे भी खामोश बैठें। हमें प्रायः महसूस भी नहीं होता और हमारी इच्छाएँ हमारे लिए सर्वोपरि होती जाती हैं। तब हम चाहते हैं कि हम हँसें तो सारी दुनिया हँसे, हम उदास हों तो सारी दुनिया उदास हो जाये, हम कोई काम करें तो हमसे संबंधित सारे लोग उस काम में हिस्सा लें, हम निष्क्रिय हो जायें तो सारे लोग हमारी तरह निष्क्रिय हो जायें। मगर जब ऐसा नहीं होता, क्योंकि ऐसा हो नहीं सकता, तो दुनिया हमें बड़ी गलत, क्रूर और बेईमान दिखायी देने लगती है। लगता है, जैसे हम एक तरफ हैं और बाकी सारी दुनिया दूसरी तरफ। हमारा अतीतजीवी होना हमारी इस धारणा को और पुष्ट करता है। हम सोचते हैं--यदि हम पहले सही थे, और इसका प्रमाण यह कि बहुत-से लोग हमारे साथ थे और हमें सही कहते थे, और आज भी हम वही हैं, तो सही क्यों नहीं हैं? और यदि हम सही हैं और नहीं बदले हैं, तो दूसरे जो बदल गये हैं, निश्चय ही गलत हैं। (भावुकता की भी अपनी एक तर्क-पद्धति होती है, जो अपने-आप को जस्टीफाइ करने के लिए इस्तेमाल की जाती है।) 

ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि हम दूसरों में आये हुए परिवर्तन को गलत या अनैतिक मानने लगें। लेकिन भावुकता में नैतिकता का मानदंड भावुक व्यक्ति स्वयं होता है, क्योंकि वह खुद को ही सही मानता है और बाकी सबको गलत। अधिक से अधिक वह उन्हीं को सही मान सकता है, जो उसी जैसे हों या उसका समर्थन करते हों। कोई वस्तुपरक मानदंड न होने के कारण वह भावना पर आधारित अपनी उस अबौद्धिक तथा अवैज्ञानिक तर्क-पद्धति को ही आगे बढ़ाता जाता है और बढ़ाते-बढ़ाते एक पूरा व्यक्तिपरक नीतिशास्त्र गढ़ लेता है। दुर्भाग्य से वह अपने द्वारा गढे़ गये उस नीतिशास्त्र में विश्वास भी करने लगता है। यहाँ तक कि उसे लगने लगता है कि उसकी तर्क-पद्धति और उसका अपना नीतिशास्त्र सर्वमान्य है। 

लेकिन किसी का निजी नीतिशास्त्र दूसरों पर कैसे लागू हो सकता है? और जब वह लागू नहीं होता, तो उसके आधार पर दूसरों को गलत, बुरा या बेईमान कैसे कहा जा सकता है? मगर भावुक व्यक्ति की यह विशेषता होती है कि अपनी बनायी नैतिकता का वह खुद जितनी सख्ती से पालन करता है (और अपनी इस कोशिश में वह इतना ‘ईमानदार’ होता है कि दोस्त, प्रेमिका या देश के लिए सचमुच प्राण दे सकता है!), उतनी ही सख्ती से उसका पालन वह दूसरों से कराना चाहता है। और जब दूसरे उसका पालन नहीं करते, तो उसे बेइंतिहा गुस्सा आता है। (और अपने इस गुस्से में वह इतना ‘ईमानदार’ होता है कि दूसरों की बेईमानी बर्दाश्त न कर पाने के कारण उनकी हत्या तक कर डालता है!) दोनों तरह के पचासों उदाहरण तुम्हें मिल जायेंगे। लेकिन यहाँ सोचने की बात यह है कि अबौद्धिक-अवैज्ञानिक चिंतन के कारण एक बलिदानी और एक हत्यारे में कितना कम फर्क रह जाता है। उत्कट प्रेम करने वाले प्रेमी-प्रेमिका और एक-दूसरे पर जान देने वाले दोस्त क्यों कभी-कभी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं? इस सवाल का जवाब उनकी भावुकता या अबौद्धिकता में ही मिल सकता है। शादी के बाद अनेक प्रेम-विवाहों के असफल हो जाने का कारण अक्सर यह होता है कि प्रेमी से दंपती बन चुके दो व्यक्ति शादी के बाद बदले हुए अपने संबंधों को बौद्धिक ढंग से स्वीकारने के बजाय प्रेम के पुराने संबंध को ही जीने की कोशिश करते हैं। प्रेम-प्रसंगों में हत्याएँ और आत्महत्याएँ प्रायः किसी एक की भावुकताजन्य नैतिकता के कारण होती हैं, जिसे वह दूसरे पर भी लागू करना चाहता है। 

राजनीति में इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा उदाहरण हिटलर है। फासिज्म आखिर क्या है? अबौद्धिक, अतार्किक, अवैज्ञानिक चिंतन से पैदा हुई विचारधारा, जिसको मानने वाले एक खास तरह की नैतिकता के कट्टर समर्थक और पालनकर्ता होते हैं। यद्यपि वह नैतिकता उनकी अपनी होती है, जिसे वे बलपूर्वक दूसरों से मनवाते हैं और जो लोग उसे मानने से इनकार करते हैं, उन्हें वे खत्म कर देते हैं। बुद्धि से काम न लेकर भावना से काम लेने वाले फासिस्टों को अपने देश में देखना हो, तो जनसंघियों को देख लो। जनसंघी लोग नैतिकता और उच्चचरित्रता की दुहाई देते मिलेंगे, पर उनकी नैतिकता है क्या? वे सारे मूल्य, जो शोषण पर आधारित समाज-व्यवस्था को बनाये रखने में सहायक हों। लेकिन जिनका शोषण हो रहा है और जो शोषण से मुक्त होना चाहते हैं, वे उस नैतिकता को कैसे स्वीकार कर लें? वे तो उसके विरुद्ध आवाज उठायेंगे। जनसंघियों को यह बर्दाश्त नहीं। यही कारण है कि देश के नाम पर प्राण देने को तैयार जनसंघी देश की करोड़ों शोषित जनता के दमन का कट्टर समर्थक बन जाता है। यही नहीं, उस दमन में वह खुद दमनकारी शक्तियों का साथ देता है। तुमने सुना होगा कि जनसंघी लोग अक्सर जनता के चारित्रिक पतन की बात किया करते हैं और उसके चारित्रिक उत्थान के लिए हिटलर जैसे किसी डिक्टेटर की जरूरत पर जोर दिया करते हैं। 

भावुक व्यक्ति जनसंघी या फासिस्ट न हो, तो भी वह समाजवादी नहीं हो सकता। कारण यह है कि समाजवाद एक वैज्ञानिक चिंतन पर आधारित जीवन-दर्शन है और उसमें अबौद्धिकता के लिए गुंजाइश नहीं है। दूसरे, समाजवादी होने के लिए प्रगतिशील होना जरूरी है, लेकिन भावुकता इसके विपरीत हमें प्रतिगामी बनाती है। प्रगतिशील व्यक्ति के लिए जो परिवर्तन सामाजिक प्रगति और उन्नति का सूचक है, प्रतिगामी व्यक्ति के लिए वही परिवर्तन बेईमानी या चारित्रिक पतन की निशानी है। अब तुम्हीं सोचो, जो आदमी परिवर्तन को ही गलत मानता है, वह किसी महत् और व्यापक परिवर्तन (क्रांति) से अपना तालमेल कैसे बिठायेगा? 

तुमने लेखक और लेखन के बारे में कुछ धारणाएँ बना रखी हैं या जाने-अनजाने दूसरों से लेकर अपना रखी हैं। उनमें से एक प्रमुख धारणा यह है कि लेखक को राजनीति से दूर रहना चाहिए। यदि वह पहले अराजनीतिक था और अब राजनीतिक हो गया है, तो उसमें आया यह परिवर्तन अनुचित और अनैतिक है। तुम अपनी इसी धारणा के आधार पर मुझ में आये परिवर्तन को अनुचित और अनैतिक मानते हो। 

इसी से जुड़ी हुई एक और धारणा यह है कि लेखक यदि क्रांति की बात करता है, मजदूरों और किसानों के पक्ष से उनके बारे में लिखता है, तो उसे नौकरी, गृहस्थी और साहित्य-वाहित्य छोड़कर क्रांति ही करनी चाहिए। उसे अपना सुख-सुविधासंपन्न जीवन त्यागकर मजदूरों और किसानों के बीच जाकर रहना चाहिए। उन्हीं का-सा खाना-पहनना चाहिए। और जो लेखक ऐसा नहीं करता, वह झूठा है, बेईमान है, अनैतिक है। 

लेकिन ये धारणाएँ तर्कसंगत या बुद्धिसंगत नहीं, नितांत अतार्किक और अबौद्धिक हैं, जो आदमी को भावुक और कुतर्की बनाती हैं। भावुक और कुतर्की व्यक्ति भावना के आधार पर अपने मन में क्रांति और क्रांतिकारियों की एक काल्पनिक तस्वीर बना लेता है और मानने लगता है कि उसके मन में बनी हुई तस्वीर ही सच है। तुम मुझे एक ऐसा आदमी समझते हो, जो क्रांतिकारी बनता है, लेकिन है नहीं; जो कुछ करता नहीं, सिर्फ बातें बनाता है। यानी एक ऐसा आदमी, जिसकी कथनी और करनी में फर्क है; जो झूठा और बेईमान है। लेकिन मैंने कब तुमसे कहा कि मैं क्रांतिकारी हूँ? मैं क्रांति चाहता हूँ, क्योंकि शोषण, दमन और अन्याय पर टिकी वर्तमान व्यवस्था की जगह मैं भविष्य की एक बेहतर व्यवस्था चाहता हूँ। ऐसी इच्छा या कामना मेरे मन में, तुम्हारे मन में, किसी के भी मन में हो सकती है और जब वह मन में होती है, तो वाणी में व्यक्त भी होती है। मैं लेखक हूँ, सो मेरे लेखन में मेरी यह इच्छा या कामना व्यक्त होती है। कभी वर्तमान व्यवस्था की आलोचना के रूप में, तो कभी भविष्य की बेहतर व्यवस्था की परिकल्पना के रूप में। लेकिन इससे तुम यह निष्कर्ष कैसे निकाल सकते हो कि मैं क्रांति की बात करता हूँ, तो मुझे प्रोफेशनल क्रांतिकारी होना चाहिए, जो कि मैं नहीं हूँ? 

दरअसल, तुम अपना प्रिय मित्र और आदर्श व्यक्ति मुझे नहीं, मेरी उस काल्पनिक छवि को मानते हो, जो भावुकतावश तुमने अपने मन में बना ली है। उसके अनुसार तुम मुझे जैसा देखना चाहते हो, वैसा मैं नहीं दिखता हूँ, बिलकुल बदल गया लगता हूँ, तो तुम्हें बुरा लगता है और मुझ पर गुस्सा आता है। मैं तुम्हें समझाने की कोशिश करता हूँ, तो तुम मुझे गलत और स्वयं को सही ठहराने लगते हो। तुम यह मानते ही नहीं कि कुछ भी और कोई भी हमेशा सही या हमेशा गलत नहीं होता। तुम स्वयं को हमेशा सही समझते हो, लेकिन अपने-आप को हमेशा सही कहने वाला तो कोई हिटलर ही हो सकता है। (तुम्हें पता है, हिटलर ने अपने बारे में क्या प्रचार कराया था? यह कि हिटलर हमेशा सही होता है।) 

तो, मेरे और तुम्हारे बीच इस बात का फैसला कैसे हो कि कौन सही है और कौन गलत? इस बात का फैसला भावुकतापूर्ण  ढंग से नहीं, यथार्थवादी तरीके से ही हो सकता है। मेरे और तुम्हारे बीच अगर कोई वास्तविक निर्णायक है, तो वह है यथार्थ, जो निरंतर स्वयं तो बदलता ही है, मुझे और तुम्हें भी बदलता है। लेकिन यथार्थ ही हमें नहीं बदलता, हम भी यथार्थ को बदलते हैं। हमारे उस बदलाव की दिशा यदि प्रतिगामी न होकर प्रगतिशील है, मनुष्य और समाज को बेहतर भविष्य की ओर ले जाने वाली है, तो हम सही हैं, अन्यथा गलत। मेरे और तुम्हारे बीच सही-गलत की कसौटी यही हो सकती है।

Saturday, February 4, 2017

स्वतंत्र लेखन की चाह का एक दुखांत

संस्मरण

रमेश उपाध्याय


प्रेम की गहराई का संबंध उसकी अवधि से नहीं होता। लंबे समय तक प्रेम करने वाले दो व्यक्ति भी कभी यह महसूस कर सकते हैं कि उनके बीच जो था, वह तो प्रेम था ही नहीं। दूसरी तरफ केवल कुछ दिन साथ रहकर भी दो व्यक्तियों में इतना प्रगाढ़ प्रेम हो सकता है कि आजीवन भुलाये न भूले। मित्रता में भी ऐसा ही होता है। इब्राहीम शरीफ का और मेरा साथ तीन-चार वर्षों का ही रहा, पर उस थोड़े-से ही समय में उससे मेरी ऐसी दोस्ती हुई, जो मुझे लगता है कि आज भी कायम है, जबकि उसको गुजरे चार दशक हो चुके हैं।  

उम्र में इब्राहीम शरीफ मुझसे पाँच साल बड़ा था। उसका जन्म 1937 में हुआ था और मेरा 1942 में। लेकिन लिखना हमने लगभग साथ-साथ शुरू किया था। हमने 1960 के दशक में कहानी लिखना शुरू किया था, लेकिन ‘साठोत्तरी’ कहलाने वाले कहानीकारों (ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया आदि) के बाद के युवा कहानीकारों में हमारी गिनती होती थी। हिंदी कहानी में ‘नयी कहानी’ के आंदोलन के बाद कई कहानी आंदोलन चले थे, जैसे साठोत्तरी कहानी (1960 के बाद की या सातवें दशक की हिंदी कहानी), अकहानी, सचेतन कहानी, सहज कहानी आदि। हमारी कहानियाँ इन सब आंदोलनों से संबंधित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं, लेकिन हम इनमें से किसी भी आंदोलन में शामिल नहीं थे और अपने लेखन से अपनी एक अलग पहचान बना रहे थे। अतः हमें हमारी उम्र के आधार पर युवा कहानीकार कहा जाता था। 

दिसंबर, 1970 में पटना (बिहार) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘सिर्फ’ की ओर से एक युवा लेखक सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें दूसरे बहुत-से युवा लेखकों के साथ-साथ मुझे भी आमंत्रित किया गया था। उस समय मैं एम.ए. और शादी करने के बाद दिल्ली में रहता था और प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर के अंगे्रजी साप्ताहिक ‘शंकर्स वीकली’ के हिंदी संस्करण ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ में काम करता था। ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ का प्रकाशन उसी साल शुरू हुआ था। शंकर जवाहरलाल नेहरू के मित्र थे, उनसे उनके पारिवारिक संबंध थे, इसलिए ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ का लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। संयोग से उसके दोनों संपादक कथाकार थे और दोनों के नाम रमेश थे। प्रधान संपादक थे रमेश बक्षी और सहायक संपादक रमेश उपाध्याय। बक्षी जी ‘नयी कहानी’ आंदोलन से संबंधित वरिष्ठ कथाकार थे, जबकि मैं तब तक किसी भी आंदोलन से असंबद्ध युवा कथाकार। 

पटना में हो रहे युवा लेखक सम्मेलन में मेरा जाना तय था। दिल्ली से जा रहे कुछ अन्य लेखकों के साथ मैंने रेल-आरक्षण भी करा लिया था, लेकिन उसी समय मुझे दिल्ली छोड़कर बंबई जाना पड़ा। बंबई से एक पत्रिका निकलती थी ‘नवनीत हिंदी डाइजेस्ट’, जो अंग्रेजी ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ की तर्ज पर निकाली जाती थी। कुछ दिन पहले ‘नवनीत’ के संपादक नारायण दत्त बंबई से दिल्ली आये थे। मैं कुछ समय स्वतंत्र लेखक के रूप में बंबई में रह चुका था और ‘नवनीत’ के लिए कुछ लेखन तथा अनुवाद कर चुका था, इसलिए वे मुझे जानते थे। वे मुझसे मिले। उन्हें ‘नवनीत’ के लिए एक ऐसे सहायक संपादक की जरूरत थी, जो संपादन के साथ-साथ लेखन और अनुवाद भी कर सके। वे जानते थे कि मैं ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ से पहले ‘सरिता’, ‘मुक्ता’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादकीय विभागों में काम कर चुका हूँ और ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘कल्पना’, ‘ज्ञानोदय’ आदि प्रसिद्ध पत्रिकाओं में लिखने वाला चर्चित युवा लेखक हूँ। उन्होंने ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ के मुकाबले ड्योढ़े वेतन पर ‘नवनीत’ के सहायक संपादक का पद सँभालने के लिए कहा, तो मैं राजी हो गया और पटना के युवा लेखक सम्मेलन में जाने के बजाय ‘नवनीत’ में काम शुरू करने के लिए बंबई चला गया। 

‘नवनीत’ का दफ्तर ताडदेव में एक पुरानी इमारत की ऊपरी मंजिल पर था। सहायक संपादक होने के नाते मुझे दफ्तर में एक अलग कमरा मिला हुआ था। एक दिन मैं अपने कमरे में अकेला बैठा कुछ काम कर रहा था कि बंबई का मेरा एक युवा कहानीकार मित्र जितेंद्र भाटिया एक लंबे, छरहरे, साँवले-से युवक के साथ मुझसे मिलने आया। वह युवक था इब्राहीम शरीफ। व्यक्तिगत रूप में हम पहली बार मिल रहे थे, किंतु कहानीकार के रूप में हम एक-दूसरे को पहले से जानते और पसंद करते थे। जितेंद्र हम दोनों का साझा मित्र और प्रिय कहानीकार था। शरीफ उस समय कालीकट (केरल) के सर सय्यद अहमद काॅलेज में हिंदी पढ़ाता था (एम.ए. हिंदी की पढ़ाई उसने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज काॅलेज से की थी) और जितेंद्र बंबई के आइ.आइ.टी. में पढ़ रहा था। 

वे दोनों पटना के युवा सम्मेलन से लौटे थे। शरीफ ने मुझसे पूछा, ‘‘आप वहाँ क्यों नहीं आये? मुझे उम्मीद थी कि आप तो वहाँ जरूर मिलेंगे। वहाँ के लोग भी कह रहे थे कि आपका आना निश्चित था। फिर क्या हुआ?’’
मैंने संक्षेप में ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ और दिल्ली छोड़कर ‘नवनीत’ में बंबई आने का किस्सा सुनाकर पूछा, ‘‘पटना में क्या-क्या हुआ?’’ 

जितेंद्र और शरीफ वहाँ से बहुत क्षुब्ध होकर लौटे थे। उन्हें वहाँ पर साहित्यिक राजनीति और लेखकीय गुटबंदियों के कुछ कटु अनुभव हुए थे। दोनों ने विस्तार से अपने अनुभव सुनाये और मुझसे कहा, ‘‘अब हम लोगों को कुछ करना चाहिए।’’ 

‘‘क्या?’’ मैंने पूछा। 

‘‘हम नये लेखकों को साठोत्तरी लोगों से अलग अपनी पहचान बनानी चाहिए, क्योंकि जिस तरह ‘नयी कहानी’ वालों ने इन लोगों को ‘‘अपना ही विस्तार’’ कहा था, उसी तरह ये भी हम लोगों को ‘‘अपना ही विस्तार’’ कहकर हमारी नवीनता और भिन्नता को नकारना चाहते हैं। हमें यह मंजूर नहीं।’’ 

मैंने चाय मँगवायी, चाय की चुस्कियों के साथ कुछ हल्की-फुल्की बातें कीं और हँसकर पूछा, ‘‘तो हम लोग भी अपना एक अलग गुट बनायें?’’ 

शरीफ गुटबंदी की निंदा कर चुका था, इसलिए थोड़ा अचकचाकर बोला, ‘‘नहीं, गुट तो नहीं, पर...’’ 

मैं शायद यही सुनना चाहता था। मैंने कहा, ‘‘तब हमें गंभीरता से एक नया कहानी आंदोलन चलाने के बारे में सोचना चाहिए। इसके लिए पहले हमें एक सूची बनानी चाहिए कि नये लेखकों में से कौन-कौन हमारे साथ आ सकते हैं। फिर यह सोचना चाहिए कि आंदोलन के जरिये हम करना क्या चाहते हैं। उसी उद्देश्य के मुताबिक हमें आंदोलन का नाम रखना चाहिए और उसी नाम से एक पत्रिका निकालनी चाहिए, जो हमारे आंदोलन का मंच बन सके।’’ 

जितेंद्र यह सुनकर उछल पड़ा। बोला, ‘‘रमेश, तुम विश्वास नहीं करोगे, पर मैं भी ठीक ऐसा ही कुछ सोच रहा था।’’ 

‘‘और आप क्या सोचते हैं, शरीफ साहब?’’ मैंने शरीफ से पूछा। 

‘‘पहली बात तो यह कि आप मुझे शरीफ साहब नहीं, शरीफ ही कहिए। दूसरी बात यह कि मैं आप दोनों से सहमत हूँ।’’ शरीफ ने मुस्कराते हुए कहा। 

‘‘तो शाम को कहीं मिलते हैं और इस पर विस्तार से बात करते हैं।’’ मैंने कहा। 

‘‘शाम को हम दोनों कमलेश्वर जी से मिलने ‘सारिका’ के दफ्तर में जायेंगे। चाहो, तो तुम भी वहीं आ जाओ। उनसे मिलने के बाद जहाँ तुम कहोगे, चले चलेंगे।’’ जितेंद्र ने कहा और मैं राजी हो गया। 

कमलेश्वर उन दिनों कहानी पत्रिका ‘सारिका’ के संपादक थे और हम नये कहानीकारों की कहानियाँ बड़े प्रेम से छापते थे। मैं उन्हें तब से जानता था, जब वे दिल्ली में ‘नयी कहानियाँ’ पत्रिका के संपादक थे। वे उम्र में मुझसे बड़े थे, और बड़े साहित्यकार तो थे ही, फिर भी मुझसे मित्रवत व्यवहार करते थे। 

शाम को अपने दफ्तर से मैं उनके दफ्तर पहुँचा, तो मैंने पाया कि जितेंद्र और शरीफ एक नया कहानी आंदोलन शुरू करने का विचार उन्हें बता चुके हैं और कमलेश्वर उसी के बारे में कुछ कह रहे हैं। कमलेश्वर ने खड़े होकर मेरा स्वागत करते हुए कहा, ‘‘आओ, रमेश! हम तुम्हारी ही बात कर रहे थे। नया कहानी आंदोलन शुरू करने का तुम्हारा विचार बहुत अच्छा है। मैं जितेंद्र और शरीफ से कह रहा था कि मैं तुम लोगों के साथ हूँ। तुम लोग ‘सारिका’ को अपनी ही पत्रिका समझो और इसी को अपने आंदोलन का मंच बनाओ।’’ 

वे लोग चाय पी चुके थे, पर मेरे पहुँचने पर चाय का एक दौर और चला, जिसके दौरान आंदोलन के नाम पर विचार होने लगा। उन दिनों बंबई की फिल्मी दुनिया में ‘समांतर सिनेमा’ के नाम से एक नया आंदोलन शुरू हुआ था, जिसके अंतर्गत बंबइया सिनेमा की व्यावसायिक लीक से हटकर कुछ नये ढंग की फिल्में बनायी जा रही थीं। बातों ही बातों में कमलेश्वर ने कहा, ‘‘समांतर कहानी नाम कैसा रहेगा?’’ 

‘‘बहुत अच्छा रहेगा।’’ हम तीनों ने खुश होकर लगभग एक साथ कहा। 

‘‘तो मिलाओ हाथ।’’ कमलेश्वर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, जिस पर जितेंद्र, शरीफ और मैंने तले-ऊपर अपने हाथ रखे और कमलेश्वर ने दूसरे हाथ से हम तीनों के हाथों को दबाते हुए कहा, ‘‘समांतर कहानी जिंदाबाद!’’
शरीफ तो शायद अगले दिन अपने घर मद्रास चला गया, पर मैं और जितेंद्र समांतर कहानी आंदोलन की शुरुआत के लिए युवा कहानीकारों का एक सम्मेलन बंबई में कराने के काम में उत्साहपूर्वक जुट गये। कमलेश्वर से भी लगातार सलाह-मशविरा होने लगा। बंबई में उस समय जो अन्य युवा कहानीकार थे (जैसे सुदीप, अरविंद, निरुपमा सेवती, राम अरोड़ा आदि), उनसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क और संवाद किया गया। दूसरी जगहों के लोगों के साथ पत्राचार के जरिये बात की गयी। 

अंततः जून, 1971 में ‘समांतर’ का पहला सम्मेलन बंबई में हुआ, जिसमें भाग लेने वाले लेखक थे--कमलेश्वर, कामतानाथ, मधुकर सिंह, रमेश उपाध्याय, जितेंद्र भाटिया, से.रा. यात्री, सुदीप, सतीश जमाली, राम अरोड़ा, दामोदर सदन, अरविंद, निरुपमा सेवती, आशीष सिनहा, विभु कुमार, श्याम गोविंद, सनत कुमार, मृदुला गर्ग, श्रवण कुमार, प्रभात कुमार त्रिपाठी, शीला रोहेकर आदि। 

इब्राहीम शरीफ को भी उस सम्मेलन में आना था, लेकिन किसी कारणवश वह आ नहीं पाया था। उसने अपना लिखित परचा भेजा था, जो एक गोष्ठी में बाकायदा पढ़ा गया था और उस पर चर्चा की गयी थी।


सम्मेलन बहुत सफल रहा था। पूरे हिंदी जगत में उसकी धूम मची थी और ‘समांतर कहानी’ तुरंत चर्चा में आ गयी थी। अगले साल 1972 में कमलेश्वर द्वारा संपादित ‘समांतर-1’ नामक कहानी संकलन भी प्रकाशित हुआ था, जिसमें सम्मेलन की विस्तृत रपट थी और उसमें भाग लेने वाले लेखकों की कहानियाँ। 

समांतर सम्मेलन के बाद शरीफ के दो पत्र मुझे मेरे बंबई के पते पर मिले। उसका पहला पत्र यह था :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
19-6-71
                                                                                                                                        
प्रिय भाई,
बंबई में दुबारा आपसे मिल नहीं सका, इसका मलाल है। बहरहाल, मैं मद्रास पहुँच तो गया था, लेकिन बहुत चाहकर भी थोड़ी-सी व्यस्तता की वजह से आपको तत्क्षण लिख नहीं सका, क्षमा करेंगे।
बंबई वाली गोष्ठी में आप रहे होंगे। क्या कुछ हुआ वहाँ, लिखने की कृपा करेंगे।
मैंने जिस योजना की बात आपसे कही थी, उस संबंध में निवेदन है कि यथाशीघ्र सुदीप का अंतरंग परिचय भेजें। साथ ही आपके पास अपनी कहानी ‘पुराने जूतों की जोड़ी’ की कटिंग हो तो भेजें, अपने चित्र के साथ। एक बात और, अपनी इस कहानी को लेकर 500 शब्दों का एक वक्तव्य भी भेजें। यह सब जितना जल्द मिल जाये उतना सुविधाजनक रहेगा मेरे लिए।
और? संभव हुआ तो मैं अगले महीने आपके लिए कोई कहानी भेजूँगा।
सानंद होंगे।
पत्र दीजिएगा।
आपका
इब्राहीम शरीफ


शरीफ के पहले पत्र में जिस योजना का जिक्र है, वह यह थी कि मद्रास से निकलने वाली पत्रिका ‘अंकन’ में शरीफ एक स्थायी स्तंभ शुरू करेगा, जिसमें वह हर बार किसी युवा कहानीकार की एक कहानी, कहानी से संबंधित एक लेखकीय वक्तव्य और किसी अन्य कहानीकार द्वारा लिखा गया उसका अंतरंग परिचय दिया करेगा। बंबई में हुई पहली मुलाकात में ही उसने अपनी यह योजना मुझे बतायी थी। स्तंभ की शुरुआत वह सुदीप से करना चाहता था। सुदीप मेरा मित्र था, इसलिए उसका अंतरंग परिचय शरीफ मुझसे लिखवाना चाहता था। उस स्तंभ के लिए मेरी कहानी ‘पुराने जूतों की जोड़ी’ उसने पहले से ही चुन रखी थी। मेरा अंतरंग परिचय वह सुदीप से लिखवाना चाहता था। शायद उसकी योजना यह थी कि दो कहानीकार मित्र एक-दूसरे का अंतरंग परिचय लिखें।

‘‘अगले महीने आपके लिए कोई कहानी भेजूँगा’’ का संदर्भ यह है कि मैंने ‘नवनीत’ में प्रकाशित करने के लिए उससे कहानी माँगी थी। 

बंबई में मुझसे हुई पहली मुलाकात होने तक वह कालीकट के काॅलेज की नौकरी छोड़कर मद्रास आ चुका था और मद्रास में अपना प्रेस लगाकर आजीविका की समस्या के स्थायी समाधान के बारे में सोच रहा था। प्रेस लगाने के बाद एक पत्रिका निकालने और पुस्तकों का प्रकाशन करने की भी उसकी योजना थी, जिसकी चर्चा उसने मुझसे और जितेंद्र से की थी। हम दोनों ने खुश होकर उसका उत्साह बढ़ाया था। अतः उसके पहले पत्र का उत्तर लिखते समय मैंने ‘नवनीत’ के लिए उसकी कहानी फिर से माँगी थी और प्रेस के बारे में पूछा था। मेरे उस पत्र के उत्तर में उसने लिखा था :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
5-7-71


प्रिय भाई, 
आपका पत्र मिल गया था। उत्तर देने में देरी हुई। क्षमा करेंगे।
गोष्ठी के बारे में बहुत विस्तार से जितेंद्र ने लिखा है। जानकर बहुत खुशी हुई कि गोष्ठी हर दृष्टि से सफल रही।
अब तक कहानी, वक्तव्य और चित्र नहीं मिला है। कृपया जल्द भिजवा दीजिए।
अंतरंग परिचय के बारे में आपने जो लिखा है, वही बातें कमलेश्वर जी ने भी लिखी हैं। उनकी बातें ठीक ही लगती हैं। इसलिए आप सुदीप का परिचय तो लिखिए ही, लेकिन अब बदले हुए दृष्टिकोण से। यह भी अपनी कहानी वगैरह के साथ ही भेजने की कृपा करें। यह योजना यथाशीघ्र आरंभ हो जानी चाहिए।
मैं कहानी जब भी लिख लूँगा, आपके पास अवश्य भेजूँगा। तब तक क्षमा करेंगे।
प्रेस वाली बात अभी कुछ नहीं हुई है। देखिए।
और? पत्र दीजिएगा।
सानंद होंगे।
आपका
इब्राहीम शरीफ


मैं जुलाई, 1971 में ‘नवनीत’ की सहायक संपादकी और बंबई छोड़कर दिल्ली वापस आ गया। इस बीच मैं एक बेटी का पिता बन चुका था और अब मेरा परिवार से दूर बंबई में रहना संभव नहीं था। दिल्ली आने के कुछ दिन बाद मैंने शरीफ को पत्र लिखा, जिसमें अपने बारे में बताते हुए लिखा कि जब तक कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलती, मैं भी उसकी तरह फ्रीलांसिंग (स्वतंत्र लेखन) करूँगा। ‘अंकन’ वाली उसकी योजना के लिए उसने मेरी ‘पुराने जूतों की जोड़ी’ कहानी माँगी थी, पर इस बीच मैं कई और कहानियाँ लिख चुका था, जो मेरी नजर में उससे बेहतर थीं। इसलिए मैंने उसे लिखा कि मैं उसकी योजना के लिए अपनी दो कहानियाँ भेजँूगा। उनमें से वह जिसे चाहे चुन ले। 

मेरे पत्र के उत्तर में उसने लिखा :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
18-8-71

प्रिय भाई,
बहुत लंबी प्रतीक्षा के बाद कल शाम को आपका पत्र मिला। जितेंद्र ने लिखा तो था कि आप बंबई छोड़कर दिल्ली वापस चले गये हैं। मगर चूँकि आपका दिल्ली वाला पता मेरे पास नहीं था, इसलिए मैं खुद भी आपको लिख नहीं सका। अब आप मेरी ही तरह फ्रीलांसिंग करेंगे, यह जानकर बल मिला।
आपके विगत जीवन के बारे में जानकर, सच मानिए, आपसे और ज्यादा निकटता अनुभव करने लग गया हूँ। बल्कि आपके प्रति इज्जत अनुभव करने लगा हूँ। मेरा जीवन भी कुछ इसी तरह का रहा है।
आपकी एक कहानी अपने पास रख लूँगा, दूसरी लौटा दूँगा। जो कहानी मैं अपने पास रख लूँगा, उसके बारे में आपका वक्तव्य (500 शब्दों का) भी चाहिए होगा। साथ में आपका चित्र भी।
मैं आपका Social Background सुदीप को भेज रहा हूँ। वैसे, उन्होंने लिखा था कि सारा मैटर वे जल्दी ही भेजने वाले हैं। एक reminder और दूँगा।
‘सारिका’ में आपकी अंतर्कथा पढ़ी थी। बहुत पसंद आयी।
और क्या लिख रहे हैं?
दिल्ली का जीवन कैसा है? क्या भाभीजी कहीं काम कर रही हैं?
सारी बातें लिखिएगा।
मेरी ओर से भाभीजी को नमस्कार। बच्ची को ढेरों प्यार।
पत्र देते रहिएगा।
आपका
इब्राहीम शरीफ


शरीफ के इस पत्र के उत्तर में मैंने लिखा कि मेरी पत्नी दिल्ली के एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में इतिहास पढ़ाती हैं। वे अपनी नौकरी तथा दिल्ली छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहतीं, इसलिए मुझे अब सदा के लिए दिल्लीवासी होकर रहना पड़ेगा, जबकि मुझे दिल्ली में कोई ढंग की नौकरी मिल नहीं रही है और स्वतंत्र लेखन मुझे रास नहीं आ रहा है। मैं दिल्ली छोड़कर कहीं और जाना चाहता हूँ, जहाँ मुझे कोई मनपंसद काम मिल सके। मैंने अपनी कहानियाँ और संबंधित सामग्री उसे भेज दी। कुछ समय पहले ‘अंकन’ में मेरी एक कहानी छपी थी, जिसकी प्रति मेरे पास नहीं थी। मैंने उसे लिखा कि वह मेरी उस कहानी की कतरन मुझे भेज दे। शरीफ ने मेरे इस पत्र का उत्तर काफी दिनों बाद दिया।


54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
2-10-71


प्रिय भाई,
आपका पत्र मिल गया था। मैं बहुत लज्जित हूँ कि आपको लिखने में देरी कर दी। यहाँ आने के बाद से जिंदगी इतनी अस्त-व्यस्त हो गयी है कि क्या बताऊँ। फ्रीलांसिंग ने तो हालत खराब कर रखी है। जवाब देने में जो विलंब हो गया, उसे आप किसी भी अर्थ में उपेक्षा के रूप में मत लीजिएगा।
अब आपको दिल्ली का जीवन भी अच्छा नहीं लग रहा है। फिर भी दिल्ली मत छोडिए। कब तक इसी तरह घूमते रहेंगे?
‘धर्मयुग’ में आपका लेख देखा। पसंद आया।
आजकल क्या लिख रहे हैं? अपने बारे में विस्तार से लिखिए।
‘अंकन’ वालों से मैं बहुत दिनों से नहीं मिला हूँ। मिलकर आपकी कहानी की कटिंग जरूर भेजूँगा।
हमारी योजना तो सफल होगी ही। स्थायी स्तंभ में एक-एक कहानीकार को छापना संभव न हुआ, तो एक साथ सारे कथाकारों को ‘अंकन’ के एक विशेषांक में छाप देंगे। मैं कोशिश में हूँ। अगले पत्र में इस बारे में तफसील से लिखूँगा। आपकी एक कहानी लौटा रहा हूँ। दूसरी मैंने अपने पास रख ली है। उसे तेलुगु में भी करवाने का इरादा है।
भाभीजी को मेरी तरफ से नमस्कार कहें। बच्ची को प्यार।
इस महीने के आखिर में मेरे यहाँ भी एक नये सदस्य का आगमन होगा। आपको तो लिखूँगा ही।
पत्र दीजिएगा। व्यग्र प्रतीक्षा रहेगी।
 आपका
इब्राहीम शरीफ


अब याद नहीं कि शरीफ की वह कौन-सी कहानी थी, जो मुझे पसंद नहीं आयी थी और मैंने उसकी आलोचना की थी। किस पत्रिका में वह आलोचना छपी थी, यह भी मुझे याद नहीं। मैंने उसे लिख दिया था कि मैं उस कहानी पर लिख रहा हूँ। उत्तर में उसने लिखा :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
12-10-71

प्रिय भाई,
पत्र मिला। खुशी हुई।
शायद आपको पता होगा कि आज जितेंद्र भाटिया का जयपुर में सुधा अरोड़ा के साथ विवाह हो रहा है।
मेरी कहानी पर आपने जो भी लिखा हो, मुझे प्रसन्नता ही होगी। असल में, मैं खुद छपने के बाद उस कहानी से बेहद नाखुश हो गया था। मैंने जितेंद्र को इस बाबत लिखा भी था। अब आगे से ऐसी रचना नहीं लिखूँगा। किसी तरह के दबाव में आकर भी।
श्री चंद्रभूषण तिवारी ‘वाम’ निकाल रहे हैं। कल ही उनका पत्र आया है। आपको भी लिखा है।
‘कहानी’ में आपकी कहानी पढ़ी। क्या ‘कहानी’ के दीपावली अंक में आपकी कहानी आने वाली है? मेरी  एक कहानी है। पढ़कर लिखिएगा।
आपके उपन्यास की कैसी प्रगति है?
फ्रीलांसिंग वाली आपकी बात से मैं सहमत हूँ। जैसा कि आपने लिखा है, क्लर्क भी, अपनी जगह, हमारी तुलना में जमा हुआ इसलिए माना जाता है कि उसे हर महीने डेढ़ सौ रुपये ही सही, बँधे हुए मिलते हैं। हम लोगों के साथ ऐसी सुविधा नहीं है। और इस तरह की सुविधा न होने में, दो तकलीफें हैं--(1) रोजमर्रे की सामान्य जरूरतों का पूरा न हो पाना (2) इन जरूरतों की पूर्ति के लिए आवश्यक रूपया कमाने के लिए अक्सर न चाहते हुए भी बहुत कुछ लिखने पर विवश हो जाना।
आप जानते हैं, आर्थिक दबाव बहुत तकलीफदेह होता है और वह समझौते करने पर मजबूर करता है। और समझौते लेखक के लिए घातक तो होते ही हैं। जैसे, आपने कोई साफ कहानी लिखी, पत्रिका वाले अपनी नीति और बिक्री के हिसाब से उसे छापने के लिए तैयार नहीं हैं। अब आप क्या कीजिएगा? फ्रीलांसिंग कैसे बनाये रखेंगे? नतीजा यह होता है कि या तो आप नौकरी की खोज में लग जाते हैं या कूड़ा लिखने पर विवश हो जाते हैं। ये दोनों बातें ठीक नहीं हैं, कम से कम फ्रीलांसिंग की सही ताप को हल्की कर देती हैं। और इसी कारण ले-देकर लेखक समाज के साधारण अर्थ में second rate नागरिक बन जाता है। बात ले-देकर यहीं आ जाती है कि सारी चीजें बदलें, खासकर राजनीतिक व्यवस्था।
आपके विचार जानना चाहूँगा।
भाभीजी को नमस्कार। बच्ची को प्यार।
  आपका
  इब्राहीम शरीफ


फ्रीलांसिंग के बारे में मैंने शरीफ को एक लंबा पत्र लिखा, जिसमें मैंने उसे बताया कि सिर्फ कहानी-उपन्यास लिखकर हिंदी का लेखक जिंदा नहीं रह सकता, क्योंकि रचनात्मक लेखन आप नियमित रूप से और इतना अधिक नहीं कर सकते कि उससे मासिक वेतन की तरह एक बँधी हुई रकम आपको लगातार मिलती रह सके। महीनों की मेहनत से आप एक कहानी और वर्षों की मेहनत से आप एक उपन्यास लिखते हैं, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं कि आपकी रचना छप ही जायेगी और उसका उचित पारिश्रमिक भी आपकेा मिल ही जायेगा। इसलिए मैं अपने रचनात्मक लेखन को फ्रीलांसिंग से अलग रखता हूँ। फ्रीलांसिंग के तौर पर मैं साहित्येतर विषयों पर लेख लिखता हूँ, रेडियो और टेलीविजन के लिए नाटक लिखता हूँ, अंग्रेजी और गुजराती से अनुवाद करता हूँ। कहानी किसी बड़ी पत्रिका में छप जाये और उसका उचित पारिश्रमिक मिल जाये, तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं। यही कारण है कि मेरी दो कहानियाँ बड़ी पत्रिकाओं में छपती हैं, तो चार छोटी पत्रिकाओं में, जो पारिश्रमिक नहीं देतीं। 

मैंने उसे सलाह दी थी कि हो सके तो वह भी ऐसी ही फ्रीलांसिंग करे और अपने रचनात्मक लेखन को उससे अलग रखे। लेकिन मेरे पत्र का कोई उत्तर नहीं आया। बाद के पत्र से पता चला कि पत्र तो उसने लिखा था, पर किसी कारण से वह मुझ तक पहुँचा नहीं। 

मेरी पहली संतान (बड़ी बेटी प्रज्ञा) 1971 के अप्रैल महीने में पैदा हुई थी और उसी साल शरीफ अपनी पहली संतान (बडे़ बेटे राहुल) का पिता बना था। इसकी सूचना देते हुए उसने लिखा था :


54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
17-11-71

प्रिय भाई,
आपको मेरा पिछला पत्र मिल गया होगा। उत्तर की प्रतीक्षा थी, पता नहीं क्यों अब तक आपने उसका जवाब नहीं दिया। आशा करता हूँ, आप सपरिवार सकुशल होंगे।
आज ही मैंने आपकी टिप्पणी पढ़ी। सच मानिए, आपके सही और स्पष्ट विचारों को पढ़कर मैं बहुत खुश हुआ हूँ। असल में, मैं काफी कड़े शब्दों की प्रतीक्षा में था, लेकिन लगता है कि आपने फिर भी काफी उदारता दिखायी है। जैसा कि मैं आपको लिख चुका हूँ, मैं आपके विचारों से अक्षरशः सहमत हूँ, क्योंकि मैं खुद उस कहानी से संतुष्ट नहीं हूँ। संबंधों की ऐसी चलती हुई कहानी आगे मैं लिखने की गुस्ताखी नहीं करूँगा।
26-10-71 की सुबह हमारे घर नये मेहमान का आगमन हो गया है। पत्नी और बच्चा सकुशल हैं। बच्चे का नाम रखा है राहुल शरीफ।
आपके और क्या समाचार हैं? क्या उपन्यास वाला काम आगे बढ़ रहा है? कितना लिख लिया है? कब तक पूरा हो जायेगा? और इधर क्या लिखा है?
दिल्ली का जीवन कैसा है? पता चला है कि विश्वेश्वर, अशोक अग्रवाल वगैरह आजकल दिल्ली ही रह रहे हैं। क्या कभी उन लोगों से मुलाकात हुई है?
भाभीजी को नमस्कार कहिए। बच्ची को प्यार।
आपके पत्र की प्रतीक्षा रहेगी।    
 आपका
 इब्राहीम शरीफ


1972 के आरंभ में शरीफ दिल्ली आया और चार महीने रहा। स्वतंत्र लेखन में होने वाले आर्थिक कष्ट से तंग आकर उसने दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार करने वाले मोटूरि सत्यनारायण (जिनके नाम से अब केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा एक पुरस्कार दिया जाता है) की संस्था हिंदी विकास समिति में नौकरी कर ली, जिसका एक कार्यालय मद्रास में था और दूसरा दिल्ली में। इस संस्था के द्वारा हिंदी का पहला विश्वकोश ‘हिंदी विश्वज्ञान संहिता’ के नाम से प्रकाशित किया जाने वाला था। वहाँ विश्वकोश के संपादन का काम दो व्यक्ति पहले से करते थे--एक दक्षिण भारतीय रवींद्रन और दूसरा उत्तर भारतीय गौरीशंकर। दफ्तरी काम करने वाले क्लर्क, टाइपिस्ट, चपरासी वगैरह तो थे ही। 

शरीफ दिल्ली आते ही मेरे घर आकर मुझसे मिला और बोला, ‘‘मैं चाहता हूँ कि आप हिंदी विकास समिति द्वारा निकाले जा रहे हिंदी विश्वकोश के संपादक मंडल में शामिल होकर मेरे साथ काम करें।’’ वह मद्रास में ही मोटूरि सत्यनारायण से मेरे बारे में बात कर आया था और उनसे मेरी नियुक्ति की अनुमति लेकर आया था। मुझे नौकरी की जरूरत तो थी ही, विश्वकोश के संपादन जैसे महत्त्वपूर्ण काम के अनुभव का आकर्षण भी था, इसलिए मैंने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 

दिल्ली में हिंदी विकास समिति का कार्यालय तिलक मार्ग पर उच्च न्यायालय के सामने की एक कोठी में था। उसमें एक छोटा कमरा था और एक बड़ा हाॅल। कमरा प्रधान संपादक का था। मोटूरि सत्यनारायण विश्वकोश के प्रधान संपादक थे। वे जब दिल्ली में होते, उसी कमरे में बैठते और बाकी सब लोग हाॅल में। उनकी अनुपस्थिति में शरीफ उस कमरे में बैठता था। इस प्रकार वह हम सबका बाॅस था, लेकिन उसमें अफसरी अकड़ नहीं थी। उसका व्यवहार सभी के साथ दोस्ताना था। लंच के समय वह और मैं उच्च न्यायालय परिसर के एक ढाबे पर खाना खाने जाते और सर्दियों की धूप में कुछ देर सड़क पर टहलते हुए गपशप करते। शरीफ बहुत हँसमुख था और बहुत अच्छा किस्सागो। दिल्ली में उसके दो पुराने मित्र थे--उत्तर भारतीय सुधीर चौहान और दक्षिण भारतीय जे.एल. रेड्डी। वे दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी प्राध्यापक थे। शरीफ के कारण मेरी भी उनसे मित्रता हो गयी। बाद में जब मैं भी दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हो गया, तो उन दोनों से मेरी मित्रता और प्रगाढ़ हुई, जो आज तक कायम है, जबकि हम तीनों प्राध्यापकी से मुक्त हो चुके हैं। 

शरीफ मेरे घर अक्सर आया करता था। मेरे परिवार में सब लोगों से वह खूब घुलमिल गया था। हँसी-मजाक में एक दिन हम लोगों ने फिल्मी तर्ज पर तय किया कि जब हमारे बच्चे बड़े हो जायेंगे, हम उनकी शादी करके अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल देंगे। तभी से शरीफ मेरी बेटी प्रज्ञा को बहूरानी कहने लगा और मैं उसके बेटे राहुल को दामाद जी। यह संबंध बाद में हमारे पत्राचार में भी व्यक्त होता रहा। 

चार महीने बाद शरीफ वापस मद्रास चला गया, लेकिन वहाँ जाकर भी वह हिंदी विकास समिति का काम करता रहा। उसका वेतन दिल्ली से उसे भेजा जाता था। मद्रास जाते समय वह अपनी कुर्सी और जिम्मेदारी मुझे सौंप गया। अर्थात्, जब मोटूरि सत्यनारायण और इब्राहीम शरीफ दिल्ली में नहीं होंगे, विश्वकोश के प्रधान संपादक के कमरे में बैठकर दफ्तर का सारा कामकाज मुझे देखना होगा। लेकिन यह बात वहाँ मुझसे पहले से काम करने वाले रवींद्रन और गौरीशंकर को अच्छी नहीं लगी। वहाँ उनकी नियुक्ति मुझसे पहले हुई थी, इसलिए वे वरीयता क्रम में स्वयं को मुझसे ऊपर समझते थे। मेरे आदेशों का पालन करने में उन्हें अपनी हेठी लगती थी, इसलिए वे मेरे द्वारा बताये गये कामों को टाल देते थे या उनमें जान-बूझकर ढिलाई बरतते थे। इससे काम की गति तो धीमी होती ही थी, दफ्तर में एक तरह का तनाव भी पैदा होता था। शरीफ मद्रास से पत्र लिखकर पूछता था कि दफ्तर का कामकाज कैसा चल रहा है। उसका कहना था कि मोटूरि सत्यनारायण हर हफ्ते काम की प्रगति की विस्तृत रपट चाहते हैं। काम उसकी, और मेरी भी, अपेक्षा के मुताबिक तेजी से नहीं हो रहा था। मगर मैं अपने साथ काम करने वालों की शिकायत नहीं करना चाहता था, इसलिए शरीफ के पत्रों के उत्तर देना या तो गोल कर जाता, या बहुत संक्षेप में उत्तर देता। उसके दोस्त सुधीर चैहान और जे.एल. रेड्डी दफ्तर की दशा जानते थे, पर मैंने उनसे भी कह रखा था कि इस बाबत शरीफ को लिखकर उसे परेशान न करें। 

उधर शरीफ इसी बात से चिंतित और परेशान रहता था। इस बीच वह मुझसे बहुत निकटता और आत्मीयता अनुभव करने लगा था, इसलिए उसके पत्रों में ‘‘प्रिय भाई’’ वाला औपचारिक संबोधन बदलकर ‘‘प्रिय रमेश’’ हो गया था। पत्र के नीचे भी अब वह ‘‘आपका इब्राहीम शरीफ’’ लिखने की जगह ‘‘तुम्हारा शरीफ’’ लिखता था। उन्हीं दिनों का उसका एक पत्र है :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
26-6-72

प्रिय रमेश,
मुझे ऐसी कोई घटना याद नहीं आ रही है जिसके अंतर्गत मैंने तुम्हारे प्रति इस हद तक गुस्ताखी की हो कि तुम मेरे खत का जवाब देना तक गवारा न कर सको। अगर मुझसे ऐसी कोई भूल हो गयी हो तो मुझे माफ कर दो, मेरे भाई!
तुम बखूबी सोच सकते हो कि चार महीने लगातार तुम्हारी आत्मीयता पाकर मैं इतनी दूर आ जाऊँ और तुम मेरे पत्र का जवाब तक न दो, तो मुझे किस हद तक तकलीफ हो सकती है। मैं यह तो बिलकुल नहीं मान सकता कि तुम्हें इतनी भी फुर्सत न मिलती हो कि चार अक्षर तुम मुझे लिख सको। इसलिए मैं यह सोचने पर विवश हूँ कि मुझसे कोई भूल हो गयी है, जिसकी वजह से तुम भरे बैठे हो। तो मेरे भाई, गाली-गलौज ही क्यों नहीं दे लेते, जिससे पता तो चले कि मैं कितना गिरा हुआ इंसान हूँ। सिर्फ दफ्तरी पत्र पाने ही के लिए तो मैंने तुमसे दोस्ती नहीं की थी न?
मैंने अपने 16-6-72 वाले विस्तृत पत्र में तुम्हें बहुत सारी बातें लिखी थीं। तुमने उन बातों में कोई जान नहीं देखी कि चुप्पी साध गये? आखिर तुम्हें हो क्या गया है, रमेश? क्या तुम वही रमेश हो, प्यारे, भोले और आत्मीय, जिसे मैंने चार महीने जाना और चाहा था?
अगर तुम इस पत्र का भी जवाब नहीं दोगे, तो याद रखो, मैं जिंदगी में किसी पर भी कोई विश्वास नहीं करूँगा। उस गधे चौहान से भी कहो कि उसने भी मेरे पत्र का उत्तर नहीं दिया है।
भाभीजी के क्या हाल हैं? उन्हें मेरी नमस्ते कहो और बहूरानी को ढेरों प्यार।
तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा में, 
तुम्हारा
शरीफ


हिंदी विकास समिति मोटूरि सत्यनारायण द्वारा स्थापित एक गैर-सरकारी संस्था थी, जो सरकारी सहायता से चलती थी। वे दक्षिण में हिंदी का प्रचार करने वाले एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में विख्यात थे और हिंदी में पहला विश्वकोश निकालने की उनकी योजना बहुत प्रभावशाली थी, अतः अपनी संस्था के लिए सरकारी अनुदान प्राप्त करना उनके लिए मुश्किल नहीं था। वे संस्था के सर्वेसर्वा थे और तानाशाह की तरह उसे चलाते थे। जब जिसे चाहा, रख लिया; जब जिसे चाहा, हटा दिया। लेकिन यह काम वे सीधे नहीं करते थे, शरीफ से कराते थे और शरीफ न चाहते हुए भी उनके आदेशों का पालन करने को विवश होता था। 

शरीफ उस नौकरी में खुश नहीं था, लेकिन उसे छोड़ना भी नहीं चाहता था। वह कालीकट के जिस काॅलेज में हिंदी प्राध्यापक रह चुका था, वहाँ के हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ. मलिक चाहते थे कि वह पुनः काॅलेज में पढ़ाने आ जाये। लेकिन शरीफ की न जाने क्या मजबूरी थी कि वह वहाँ नहीं जाना चाहता था। 

कमलेश्वर ने शरीफ को ही नहीं, मुझे भी यह आश्वासन दे रखा था कि वे हम दोनों को टाइम्स आॅफ इंडिया में, यानी उस प्रकाशन समूह की ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘दिनमान’ या ‘पराग’ नामक पत्रिकाओं में से किसी के संपादकीय विभाग में नौकरी दिला देंगे। लेकिन उनका कोई आश्वासन पूरा होने का नाम नहीं ले रहा था। 

शरीफ और मैं अपने लिए कोई ढंग का ठौर-ठिकाना ढूँढ़ रहे थे, लेकिन विडंबना यह थी कि अन्य लोग हमें इतना शक्तिशाली समझते थे कि हम जिसे चाहें, हिंदी विकास समिति में नौकरी पर रख या रखवा सकते हैं। मेरे और शरीफ के साझे मित्र कहानीकार सतीश जमाली को नौकरी की जरूरत थी और वह चाहता था कि हम उसे समिति में नौकरी दिला दें। मैंने शरीफ से सतीश के बारे में बात की, तो उसने किन्हीं डाॅ. सुब्रह्मण्यम् के बारे में बताया कि उन्हें नौकरी की ज्यादा जरूरत है और शरीफ उन्हें समिति के मद्रास कार्यालय में रखवाने का प्रयास कर रहा है, इसलिए फिलहाल सतीश के लिए कुछ नहीं कर सकता। 

इन सारे संदर्भों से युक्त शरीफ का एक पत्र इस प्रकार था :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
28-6-72

मेरे रमेश,
आखिर तुम्हारा एक खत मिला, संक्षिप्त-सा। पढ़कर तसल्ली तो हुई मगर मजा नहीं आया।
यार, चैहान और तुम्हारे नाम लिखे हुए मेरे पत्र जा कहाँ रहे हैं? और लोगों को मेरे पत्र मिल रहे हैं और तुम दोनों सालो मेरे पत्र न मिलने का बहाना कर चुप्पी साधे बैठे हो। मैंने तुम दोनों के नाम और दो पत्र लिखे हैं।
क्या कमलेश्वर जी दिल्ली आये थे? क्या बातें हुईं? वह टाइम्स वाली बात उन्होंने कुछ नहीं लिखी है। पता नहीं क्या हुआ?
डॉ. मलिक कालीकट बहुत जोर देकर बुला रहे हैं, लेकिन मैं अभी तक कुछ तय नहीं कर पाया हूँ। डॉ. सुब्रह्मण्यम, जिसके बारे में मैंने बताया था कि बेचारा यहाँ सभा की नौकरी से हटा दिया गया था, उसके लिए मैंने हिंदी विकास समिति में यहाँ के लिए इंतजाम कर लिया है। जुलाई की पहली से संभवतः वह लग जाये। अब यार, सतीश जमाली की चिंता है। उसके लिए कुछ करें, तभी बात बने। उसकी नौकरी छूटने वाली है और बेकारी में बेचारा कैसे घर चला पायेगा? तुम भी कुछ सोचो उस भाई के लिए।
यहाँ से निकलने वाली पत्रिका का क्या सोचा है तुम लोगों ने? कमलेश्वर जी के साथ हुई बातचीत का ब्योरेवार परिचय मुझे दो।
मेरे वेतन में से 100 रुपये इस महीने मत काटो। मुझे घर जाना है, भाई के बच्चों के लिए कपड़े खरीदने हैं। मुझे रुपयों की जरूरत होगी।
और?
मेरी बहूरानी के क्या हाल हैं? उसे उसके ‘वो’ बहुत याद करते रहते हैं। उसकी सास को तो वह बहुत पसंद आयी है। कहती है, बहुत sweet है।
भाभीजी को सादर नमस्कार। मेरी बीवी की ओर से तुम दोनों को प्रणाम।
उस चौहान गधे के क्या हाल हैं? लिखो।
                                                तुम्हारा                                                                                                                                                                                               
 शरीफ


जिस संस्था में तानाशाही और अस्थायित्व हो, उसमें काम करने वाले लोग असुरक्षा की मानसिकता में जीते हुए एक-दूसरे के प्रति ईष्र्या और द्वेष से ग्रस्त हो जाते हैं। हिंदी विकास समिति के दिल्ली कार्यालय में मेरे साथ काम करने वाले रवींद्रन और गौरीशंकर मेरे प्रति ऐसे ही ईर्ष्या-द्वेष से ग्रस्त थे। वे मेरे विरुद्ध शरीफ को भड़काने वाले पत्र तो लिखते ही थे, विश्वकोश से संबंधित काम भी मुस्तैदी से नहीं करते थे। उधर मोटूरि सत्यनारायण का शरीफ पर और शरीफ का मुझ पर निरंतर यह दबाव रहता था कि विश्वकोश के पहले खंड का प्रकाशन जल्दी से जल्दी हो जाये। शायद इसी पर सरकारी अनुदान मिलना निर्भर करता था। अंततः मुझे एक पत्र में दफ्तर का सारा हाल शरीफ को लिखना पड़ा। मेरे पत्र के उत्तर में शरीफ के दो पत्र आये, एक दफ्तरी और दूसरा निजी। निजी पत्र इस प्रकार था : 
 
54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
13-7-72

प्रिय रमेश,
 तुम्हारा खत मिला। 
आज सुबह ही मैंने तुम्हारे नाम दफ्तर के पते पर एक पत्र भेजा है, जिसमें मैंने तुम तीनों को संबोधित किया है। मैंने अब तक का सारा दफ्तर का पत्र-व्यवहार सत्यनारायण जी को दिखाया है और जो कुछ मैंने तुम लोगों को लिखा है, वह सब उन्हीं के आदेशानुसार लिखा है। तुम जानते हो, मैं भी तुम लोगों की तरह ही नौकर हूँ और मुझे जो आदेश दिया जाता है, वह करना मेरा कर्तव्य हो जाता है।
गौरी के बारे में तुमने जो बातें लिखी थीं, वे सारी सत्यनारायण जी पहले ही से जानते हैं। और उन्होंने मुझे बताया भी था। इस सबके बावजूद, हो सकता है, गौरी या रवींद्रन या तुम खुद भी मुझे गलत समझ सकते हो। लेकिन मेरे भाई, शायद तुम अपने चार महीनों के अनुभव के आधार पर इतना तो जान गये होगे कि मैं न किसी की बुराई चाहता हूँ, न किसी पर कोई अधिकार चलाना चाहता हूँ। गौरी खुद ये सारी बातें जानता है। मगर वह इतना रूखा इंसान है कि व्यक्तिगत संबंधों को कोई तरजीह नहीं देता है। खैर, मेरी असलियत मेरे साथ है, तुम लोग जो भी समझो।
मैं खुद इस नौकरी में बहुत दिन नहीं रहूँगा। ताकि तुम लोग मुझे और ज्यादा गलत समझने का मौका न पा सको। खैर, ये तो दफ्तर की बेहूदा बातें हैं।
कमलेश्वर जी के पत्र आये। ‘समांतर’ संग्रह के लिए उन्होंने मेरी ‘दिग्भ्रमित’ कहानी चाही है। उसकी कटिंग मेरे पास नहीं है। यहाँ मिलने की भी संभावना नहीं है। तुम्हारे पास ‘धर्मयुग’ के पुराने अंक हों, तो (4 अक्टृबर, 1970 के अंक से) कटिंग तत्काल कमलेश्वर जी के पास भेजो। श्रवण कुमार बता रहे थे कि मेरी उस कहानी की कटिंग उनके पास भी है। उन्हें भी पूछो। उनके पास हो, तो लेकर बंबई भेज दो।
और?
सतीश के बारे में अभी कोई व्यवस्था करने की स्थिति नहीं है। पहली जिल्द निकलने के बाद ही वह संभव हो पायेगा। इसलिए इस नवंबर-दिसंबर के पहले नहीं हो पायेगा। मैंने कमलेश्वर जी को भी यही बातें सूचित की हैं। तुम भी लिख दो।
और क्या हो रहा है?
भाभी जी को प्रणाम। बच्ची को प्यार। पत्र दो। कहानी बंबई भिजवाओ।
 तुम्हारा
 शरीफ


‘प्रिय भाई’, ‘प्रिय रमेश’, ‘मेरे रमेश’ जैसे संबोधनों वाले पत्र लिखने वाले शरीफ ने एक बार मुझे ‘अप्रिय रमेश’ लिखकर भी संबोधित किया था :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
26-8-72
                                                        
अप्रिय रमेश, 
लगता है, मुझे भाभीजी से यह जानना पड़ेगा कि तुम अपने-आपको क्या समझते हो! यार, पत्र क्यों नहीं लिखते? दफ्तर पर पत्र लिखा, जवाब नहीं। घर के पते पर लिखा, वही मौन। लगता है, निर्दयी होते जा रहे हो। खासकर मेरे साथ। खासकर तुम्हारी प्यारी बिटिया के ससुर के साथ।
खुश हो जाओ कि अगले महीने की दूसरी तारीख तक बंदा दिल्ली पहुँच रहा है। सत्यनारायण जी भी चाहते हैं। एक तार भिजवाया था सत्यनारायण जी ने तुम्हारे नाम--मेरे द्वारा (यानी मेरा नाम रखकर) घबराने की कोई बात नहीं। संक्षेप में लिखो कि कितना काम हुआ है। उन्हें इन बातों को बार-बार जानने की लत है।
यह पत्र, ध्यान रखो कि एकदम व्यक्तिगत है, इससे बढ़कर कुछ नहीं। बाहर न जाये।
भाभीजी को प्रणाम।
बिटिया को प्यार।
तत्क्षण लिखो।
तुम्हारा
शरीफ


सितंबर, 1972 में शरीफ दिल्ली आ गया, तो मुझे दफ्तर की उस जिम्मेदारी से मुक्ति मिली, जिसे सँभालने के बदले में मेरा वेतन तो एक पैसा भी नहीं बढ़ा था, पर सिरदर्दी बहुत बढ़ गयी थी। शरीफ अपने कमरे में बैठने लगा और मैं वापस हाॅल में अपनी पहली वाली जगह। मुझे तो इससे तनावमुक्त हो जाने की खुशी हुई, लेकिन रवींद्रन और गौरीशंकर को इस बात की खुशी हुई कि मैं अब उनका सीनियर नहीं रहा, बल्कि नियुक्ति के तिथि-क्रम के अनुसार पुनः उन दोनों से जूनियर हो गया हूँ। 

मुझे इसकी परवाह नहीं थी, बल्कि खुशी थी कि मेरा बहुत-सा समय बच गया, जो शरीफ की जगह बैठने से विश्वकोश के लेखकों को टेलीफोन करके काम जल्दी करने के लिए कहने में, टाइपिस्ट को काम देने, उसके काम को जाँचने और उसे ठीक से काम करने की ताईद करने में तथा कारण-अकारण मिलने आने वालों के साथ बातचीत करने में चला जाता था। वापस अपनी जगह आकर मैंने संपादन का काम तेजी से करना शुरू किया। देखा-देखी रवींद्रन और गौरीशंकर भी मुस्तैदी से काम करने लगे। 

उन्हीं दिनों कानपुर में ‘समांतर’ का दूसरा सम्मेलन हुआ, जिसमें शरीफ और मैं दिल्ली से साथ-साथ गये। सम्मेलन 15, 16, 17 अक्टूबर को होना था, लेकिन कमलेश्वर ने मुझे, शरीफ, जितेंद्र और मधुकर सिंह को एक दिन पहले कानपुर पहुँच जाने के लिए कहा था, ताकि ‘‘समांतर के कोर ग्रुप’’ के लोग (अर्थात् कमलेश्वर, मैं, शरीफ, जितेंद्र, कामतानाथ और मधुकर सिंह) पहले मिलकर तय कर लें कि सम्मेलन में क्या-क्या और किस तरह किया जाना है। 

मैं और शरीफ 13 अक्टूबर को रात की गाड़ी से कानपुर गये। रास्ते में समांतर को लेकर शरीफ से मेरी लंबी बातचीत हुई। हम दोनों के विचार से कमलेश्वर ने हमारे आंदोलन को चालाकी से हथियाकर अपना नेतृत्व उस पर थोप दिया था। गलती हम लोगों की भी थी कि हमने अपना आंदोलन स्वयं चलाने के बजाय उसकी बागडोर उनके हाथ सौंप दी। होना यह चाहिए था कि हम अपना आंदोलन अपने ढंग से चलाते, उसके लिए एक नया मंच बनाते और उसके जरिये कहानी के रूप तथा वस्तुतत्त्व में आ रहे नये बदलाव को उसके मूल्य और महत्त्व के साथ सामने लाते। उस समय हिंदी साहित्य में पुराने प्रगतिशील आंदोलन का जो नया उभार वाम-जनवादी लेखन के रूप में सामने आ रहा था, उससे जुड़कर हमें एक नया कहानी आंदोलन शुरू करना चाहिए था और ‘पहल’, ‘वाम’, ‘उत्तरार्द्ध’ आदि पत्रिकाओं जैसी कोई नयी पत्रिका निकालकर उस समय लिखी जा रही वाम-जनवादी कहानी को एक नये साहित्यिक आंदोलन का रूप देना चाहिए था। लेकिन हमने तत्कालीन सत्ता और व्यवस्था के समर्थक एक पुराने लेखक को अपना नेता तथा एक पूँजीवादी संस्थान से निकलने वाली व्यावसायिक पत्रिका को अपना मंच मान लिया था। समांतर आंदोलन में शामिल ज्यादातर कहानीकार अराजनीतिक किस्म के लेखक थे और कमलेश्वर ‘नयी कहानी’ आंदोलन के समाप्त हो जाने पर साहित्य में अपनी साख और धाक फिर से जमाने की फिराक में थे। फिर, एक तरफ कमलेश्वर को कहानी की एक पत्रिका चलाने के लिए लगातार अच्छी कहानियों की जरूरत थी, जो नये कहानीकार ही पूरी कर सकते थे, तो दूसरी तरफ नये कहानीकारों को ‘सारिका’ जैसी लोकप्रिय पत्रिका में निरंतर प्रकाशित होने और उसके संपादक की निकटता का लाभ उठाकर साहित्य में अपने पैर जमाने का अवसर मिल रहा था। इस प्रकार पारस्परिक लाभ के सिद्धांत पर समांतर कहानी का आंदोलन चल रहा था। 

उस समय हिंदी साहित्य में वाम-जनवादी लेखन का जो नया उभार आया हुआ था, उससे जुड़े लेखक तथा साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक माक्र्सवादी थे और वाम दलों के सदस्य अथवा समर्थक थे। हम साहित्य की उस नयी प्रवृत्ति से जुड़कर अपना कहानी आंदोलन चलाते, तो हमारे आंदोलन की दशा और दिशा कुछ और ही होती। लेकिन समांतर आंदोलन उस नयी प्रवृत्ति के विरोधी उन लेखकों का एक गुट बनकर रह गया, जो माक्र्सवाद तथा माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधी थे। 

मैं शरीफ से दोस्ती होने से पहले से ही माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थक था (यद्यपि मैं उसका सदस्य कभी नहीं रहा) और मेरी गिनती वाम-जनवादी लेखकों में होने लगी थी। कमलेश्वर चाहते थे कि समांतरी लेखक वाम राजनीति और विचारधारा से कोई संबंध न रखें। ज्यादातर समांतरी लेखक उनसे सहमत थे। उनकी दलगत संबद्धताएँ जो भी रही हों, या न रही हों, उन सबमें एक चीज समान थी--सी.पी.एम. का विरोधी होना। कामतानाथ सी.पी.एम. वालों की तीखी आलोचना किया करता था, मधुकर सिंह सी.पी.एम. के ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद जैसे नेताओं तक को गालियाँ दिया करता था, जितेंद्र भाटिया राजनीति से अलग और ऊपर रहने की बातें किया करता था और शरीफ सभी प्रकार की राजनीति से नफरत-सी किया करता था। (यह नफरत उसकी ‘दिग्भ्रमित’ जैसी कहानियों में भी दिखायी देती थी।) कमलेश्वर सी.पी.एम. की आलोचना करने और उसके नेताओं को गाली देने के बजाय उनका मजाक उड़ाने के जरिये अपना विरोध प्रकट करते थे। मसलन, ‘वाम’ के संपादक चंद्रभूषण तिवारी को ‘चंभूति’ कहकर वे ठहाके लगाया करते थे। 

मैंने और शरीफ ने तय किया कि हम कानपुर में होने जा रहे समांतर के दूसरे सम्मेलन में अपने आंदोलन की राजनीतिक पक्षधरता और प्रतिबद्धता स्पष्ट करने पर जोर देंगे। 

हम 14 अक्टूबर को सुबह के ढाई बजे कानपुर पहुँचे। हमें कामतानाथ के घर पहुँचना था, लेकिन इतने सवेरे उसके घर पर दस्तक देना उचित न समझ हमने स्टेशन पर अपना सामान रखा, एक रिक्शा किया और उस पर शहर में घूमते रहे। रमजान का महीना था, इसलिए मुसलमान लोग दिन भर के उपवास के लिए खा-पीकर तैयार होते दिखे। रिक्शे वाला भी मुसलमान था, पर उसने बताया कि वह रोजे नहीं रखता, क्योंकि रोजा रखकर रिक्शा नहीं चला सकता। एक जगह रुककर हमने चाय पी, उसे भी पिलायी और वह हमारे कहने पर हमें कानपुर के मुस्लिम इलाकों में ले गया। दो कब्रिस्तानों के बीच की एकदम अँधेरी सड़क से भी हम गुजरे। सुबह की शबनमी ठंड में पाँच बजे तक घूमकर हम स्टेशन लौटे। तभी कलकत्ता से दिल्ली जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस से जितेंद्र उतरा। वह कलकत्ता से आया था। उसके साथ हम कामतानाथ के घर गये। कमलेश्वर के बंबई से और मधुकर सिंह के आरा से आ जाने पर सम्मेलन की रूपरेखा पर विचार हुआ। 

उस समय कानपुर में सी.पी.एम. का बड़ा सशक्त मजदूर संगठन था। काॅमरेड रामआसरे और सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में रहीं कैप्टन लक्ष्मी सहगल की बेटी सुभाषिणी सहगल (जो बाद में मुजफ्फर अली से शादी करके सुभाषिणी अली और सी.पी.एम. की बड़ी नेता बनी) वहाँ के दो बड़े लोकप्रिय मजदूर नेता थे। सुभाषिणी से कुछ दिन पहले दिल्ली में मेरी भेंट हुई थी। मैंने उसे कानपुर में होने वाले समांतर सम्मेलन के बारे में बताया था। उसे यह बात याद रही और वह सम्मेलन में मुझसे मिलने आयी। मेरे कहने पर एक गोष्ठी में उपस्थ्ति रही और बोली भी। मैंने शरीफ और जितेंद्र को अलग ले जाकर उससे मिलवाया, तो उसने हम तीनों से बात करने के लिए हमें सम्मेलन-स्थल के निकट ही रहने वाले अपने एक काॅमरेड के घर ले जाकर चाय पिलायी और यह जानकर कि शरीफ मद्रास से एक उर्दू अखबार निकालने की सोच रहा है, उसने शरीफ को मद्रास के अपने कुछ साथियों के पते दिये, जो अखबार निकालने में शरीफ की मदद कर सकते थे। 

कमलेश्वर को समांतर सम्मेलन में सुभाषिणी का आना, हम तीनों से उसका बातचीत करना और हमारा उसके साथ चाय पीने जाना अच्छा नहीं लगा। रात को कामतानाथ के घर पर हुई दारू-पार्टी में कमलेश्वर ने मुझसे कहा, ‘‘रमेश, सी.पी.एम. वाले तुम्हें ओन करने लगे हैं, यह गलत बात है।’’ उन्हें इस पर भी ऐतराज था कि मैंने शरीफ और जितेंद्र को सुभाषिणी से क्यों मिलवाया और क्यों मैं उन दोनों को लेकर उसके साथ चाय पीने गया। मुझे यह बात बहुत बुरी लगी। मैंने पूछा, ‘‘क्या समांतर के लेखकों को यह आजादी नहीं कि वे अपनी मर्जी से अपने मित्रों के साथ कहीं चाय पीने भी जा सकें?’’ 

गंभीर बातों को हँसी-मजाक में उड़ा देने की कूट-कला में माहिर कमलेश्वर ने इस विषय पर आगे बात नहीं होने दी और शराब की चुस्कियों के साथ उनकी चुटकुलेबाजी शुरू हो गयी। मुझे यह बात आश्चर्यजनक लगी कि शरीफ और जितेंद्र ने भी वह बात आगे नहीं बढ़ायी।


मैंने कानपुर में ही फैसला कर लिया था कि मैं समांतर में नहीं रहूँगा। लेकिन शरीफ और जितेंद्र अपना भविष्य शायद समांतर में बने रहने में ही देख रहे थे। अतः दोनों मुझे समझाते रहे कि मैं समांतर छोड़ने की गलती न करूँ। 

उन दिनों बड़ी (व्यावसायिक) पत्रिकाओं के विरुद्ध लघु (साहित्यिक) पत्रिकाओं का आंदोलन जोर-शोर से चल रहा था और कई लेखकों ने, जो अभी तक बड़ी पत्रिकाओं में धड़ल्ले से छपते आ रहे थे, उनमें न लिखने का फैसला किया था। मैं उन दिनों ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ आदि बड़ी पत्रिकाओं में खूब लिखता था। ‘धर्मयुग’ और ‘सारिका’ टाइम्स आॅफ इंडिया प्रकाशन से निकलने वाली बड़ी पत्रिकाएँ थीं, जिनमें मेरी कहानियाँ खूब छपती थीं। टाइम्स आॅफ इंडिया प्रेस बंबई में बोरीबंदर के पास था। बोरीबंदर के नाम से जोड़कर रवींद्र कालिया ने मुझे कहीं ‘‘बोरीबंदर का लाडला कथाकार’’ कहा था और उसका यह जुमला खूब चला था। फिर भी मैंने लघु पत्रिका आंदोलन में शामिल होकर बड़ी पत्रिकाओं में न लिखने का फैसला किया। ‘सारिका’ बड़ी पत्रिका थी और वह समांतर आंदोलन की पत्रिका भी थी। इसलिए ‘सारिका’ से नाता तोड़ने का अर्थ अपने-आप ही ‘समांतर’ से नाता तोड़ना भी हो गया। 

शरीफ को मेरा यह निर्णय अच्छा नहीं लगा। उसने और समांतर से जुड़े अन्य लेखकों ने भी ‘सारिका’ और ‘समांतर’ से जुड़े रहने में ही अपनी भलाई देखी। 

कानपुर से लौटने के कुछ दिन बाद शरीफ पुनः मद्रास चला गया। हिंदी विकास समिति में विश्वकोश का पहला खंड छपने चला गया था और अगले खंड के संपादन का काम शुरू होने में अभी देर थी, इसलिए मोटूरि सत्यनारायण ने शरीफ से कहा कि कुछ समय के लिए दिल्ली दफ्तर से किसी एक व्यक्ति को नौकरी से हटा दिया जाये। जब जरूरत होगी, उसे फिर से रख लेंगे। तदनुसार शरीफ ने मुझे लिखा :

 
54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
28-10-72

                                                        
प्रिय रमेश,
तुम्हारा लंबा पत्र मिल गया था। मुझे खुद लिखना चाहिए था। मगर लिख नहीं सका। इस बार तुमसे दूर होकर मुझे कुछ अतिरिक्त बेचैनी हो रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह कि जिस नौकरी पर मैंने अपनी तरफ से तुम्हें लगाया था, उसकी रक्षा मैं खुद करने की हालत में फिलहाल नहीं रह गया हूँ। तुम जानते ही हो कि अब दफ्तर में काम कम है और इसलिए किसी एक को दो-एक महीने के लिए हटाना जरूरी है। मैं चाहता, तो गौरी को भी हटा सकता था, लेकिन तुम्हारे सामने क्या छिपाना कि मैंने तुम्हें ही हटाने की बात सत्यनारायण जी से कही है। वह इसलिए कि तुम नौकरी के बगैर भी एक-दो महीने चला सकते हो, मगर वह नहीं। यह बात मैं तुम्हें साफ लिख रहा हूँ, ताकि तुम कभी भी मुझे गलत न समझो।
मैं वादा करता हूँ कि जनवरी से फिर से तुम्हें वहाँ रखवाऊँगा। श्री रवींद्रन के लिए मैंने कालीकट वाली व्यवस्था कर दी है। उन्हें निश्चित रूप से छात्रवृत्ति मिल जायेगी दिसंबर में। वे चले जायेंगे और मैं तुम्हें फिर से रखवा लूँगा। और इस बार कुछ महीनों के लिए नहीं, कई सालों के लिए, अगर तुम चाहोगे, तो। सत्यनारायण जी भी तुम्हें बहुत चाहते हैं। लेकिन अभी वे भी विवश हैं। तुम नवंबर की पहली तारीख से दफ्तर मत जाओ। मैं तुम्हें वििपबपंससल न लिखकर व्यक्तिगत रूप से लिख रहा हूँ, एक भाई के नाते। तुम सत्यनारायण जी से मेरे पत्र का जिक्र करो और उन्हें बता दो कि पहली नवंबर से तुम काम पर नहीं आओगे, अगली सूचना तक।
मेरे भाई, यह पत्र लिखते हुए मैं क्या कुछ अनुभव कर रहा हूँ, तुम्हें बता नहीं सकता। खैर, तुम मुझे गलत नहीं समझोगे, इस आशा के साथ।
मैंने कमलेश्वर जी को उर्दू पत्रिका वाली योजना भेज दी है। देखें, क्या होता है। तुम अपनी बातें लिखो।
भाभीजी को प्रणाम। बिटिया को बहुत-बहुत प्यार।
पत्र तत्काल दो। 
तुम्हारा
 शरीफ


हिंदी विकास समिति की नौकरी खत्म होने का मुझे दुख नहीं हुआ, बल्कि एक बेमतलब तनाव से मुक्त होने की खुशी ही हुई। मैंने मोटूरि सत्यनारायण को अपना त्यागपत्र तो भेजा ही, शरीफ को भी लिख दिया कि वह मेरी चिंता न करे, मुझे इस नौकरी में वापस कभी नहीं आना है और इस प्रसंग का हमारी दोस्ती पर कोई असर नहीं पड़ना है। 

मैं फ्रीलांसिंग और अस्थायी नौकरियों के अपने अनुभव से अच्छी तरह समझ चुका था कि हिंदी में स्वतंत्र लेखन के सहारे जीना बहुत मुश्किल है। इसलिए मैंने प्राध्यापक बनने के वास्ते पीएच.डी. के लिए शोध करना शुरू कर दिया था। शरीफ मुझसे पहले ही पीएच.डी. कर चुका था। उसने आगरा विश्वविद्यालय से ‘दक्खिनी हिंदी के लोकगीत’ विषय पर पीएच.डी. की थी। उससे मैंने कई बार कहा कि वह कोई स्थायी नौकरी खोजे और आजीविका की ओर से निश्चिंत होकर अपना साहित्य-सृजन करे। यदि डाॅ. मलिक अपने काॅलेज में प्राध्यापक बनाने के लिए उसे कालीकट बुला रहे हैं, तो उसे वहाँ अवश्य चले जाना चाहिए। लेकिन शरीफ की न जाने वह कौन-सी जिद या मजबूरी थी कि वह हिंदी विकास समिति की नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं था और उसमें रहकर खुश भी नहीं था। वह मद्रास में ही रहकर कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिससे वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके। पहले उसने वहाँ प्रेस लगाने की योजना बनायी। फिर हिंदी की साहित्यिक पत्रिका निकालने की योजना बनायी। फिर उर्दू का अखबार और उसकी जगह फिर उर्दू में पत्रिका निकालने की योजना बनायी। मगर कोई योजना सफल नहीं हुई, क्योंकि ऐसा कोई काम शुरू करने के लिए जरूरी पैसा उसके पास नहीं था। 

कमलेश्वर तब तक हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखक बन चुके थे। उन्होंने शरीफ को जिस तरह टाइम्स आॅफ इंडिया की किसी पत्रिका में नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया था, या जैसे उसके द्वारा निकाले जाने वाले उर्दू अखबार के लिए सरकारी सहायता दिलाने का आश्वासन दिया था, वैसे ही फिल्मों में काम दिलाने का आश्वासन भी दिया। लेकिन वे सब हवाई बातें थीं, जिनके कारण अंततः कमलेश्वर और समांतर आंदोलन से भी उसका मोहभंग हुआ। फिर भी न जाने क्यों, वह मेरी तरह उससे अलग कभी नहीं हुआ। 

मैंने उससे यह भी कहा था कि वह वाम-जनवादी साहित्य और लघु पत्रिकाओं के आंदोलन से अपना संबंध स्पष्ट कर ले। किंतु वह सोचता था कि बड़ी पत्रिकाओं में लिखना छोड़कर पारिश्रमिक न देने वाली लघु पत्रिकाओं में लिखने का फैसला करके वह जिंदा नहीं रह सकेगा। समांतर आंदोलन को भी वह शायद इसीलिए छोड़ना नहीं चाहता था। 

इधर वाम-जनवादी आंदोलन में एक नया उभार आया देख प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े लोगों ने उसे पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से 1973 में ‘‘सभी रंगतों के प्रगतिशील’’ लेखकों का एक बड़ा सम्मेलन बाँदा (उत्तर प्रदेश) में आयोजित किया। मुझे भी उसमें बुलाया गया था। मैंने शरीफ को लिखा कि वह भी उस सम्मेलन में शामिल हो। मगर वह समांतर से इतना निराश हो चुका था कि बाँदा सम्मेलन को भी समांतर सम्मेलन जैसी ही कोई चीज समझ रहा था, जिसमें रात को शराब की चुस्कियों के साथ चुटकुलेबाजी होती थी।
मैंने उसे एक विस्तृत पत्र लिखकर उसे समांतर सम्मेलन और बाँदा के प्रगतिशील साहित्यकार सम्मेलन का फर्क समझाते हुए बाँदा चलने के लिए कहा, तो उत्तर में उसने लिखा :
54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
9-2-73

                                                                                                                                 
प्रिय रमेश, 

 तुम्हारा विस्तृत पत्र कल शाम को मिला।
बाँदा वाले सम्मेलन में मैं नहीं जाऊँगा। मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं शराब पीने के लिए और चुटकुले सुनने-सुनाने के लिए उतनी दूर जाऊँ। जितेंद्र ने भी मुझसे आग्रह किया था कि मैं चलूँ। कमलेश्वर जी ने भी लिखा था। मैंने मना कर दिया है। ‘समांतर’ के अंतर्गत हम लोग दो बार मिले हैं। कोई काम हुआ है? कोई योजना पूरी हुई है? कोई महान कहानी-उपन्यास-नाटक लिखा गया है? या कम से कम सारे ‘समांतरी’ एक तरह सोच पाये हैं? एक खयाल पाल पाये हैं? या कम से कम एक-दूसरे के सही दोस्त बन पाये हैं? एक-दूसरे के आगे ईमानदार रह सके हैं? एक-दूसरे के लिए सच्ची मुहब्बत जगा पाये हैं? अब बाँदा में मिलकर कौन-सी प्रगति छाँटोगे? तुम जाओ, और सारे समाचार मुझे दो। काफी होगा।
स्वयं प्रकाश के बारे में विस्तृत जानकारी तुमने दी, अच्छा किया। उनका एक-डेढ़ हफ्ता पहले एक पत्र आया था, तत्काल ‘क्यों’ के लिए कहानी भेजने का आग्रह करते हुए। मैंने कोई उत्तर नहीं दिया है। वह इसलिए कि उन्होंने एक बार लिखा था कि उनका ‘क्यों’ से कोई संबंध नहीं है। और अब फिर कहानी माँग रहे हैं। अजीब मजाक है। पहले, ‘क्यों’ का समाचार पाकर, उत्साहित होकर, एक गरीब व्यक्ति के महत्त्वपूर्ण, ईमानदार प्रयासों को उत्साहित करने के लिए मैंने तत्काल बतौर चंदा उन्हें 8 रुपये भेज दिये थे। मैं सोच रहा हूँ, मैंने गलती कर दी है। खैर छोड़ो, कोई बात नहीं।
‘समांतर’ को लेकर तुम्हारी सोच मिली। ठीक है। रमेश, मैं अब भी तहे दिल से चाहता हूँ कि समांतर हम लोगों का ठीक मंच बने। उसके जरिये हम लोग महत्त्वपूर्ण काम करें। देखो क्या होता है। मैं चाह रहा हूँ कि संभव हुआ, तो एक बार बंबई हो आऊँ। कमलेश्वर जी से, जितेंद्र से और लोगों से मिलकर बात तो करें। देखें, कौन क्या सोच रहा है। जहाँ तक जितेंद्र की बात है, उसे कोई क्या कह सकता है। वह खुद समझदार है। खुद सोच सकता है कि उसके लेखक और व्यक्ति की अधिक से अधिक रक्षा के लिए उसे कौन-सा रास्ता अपनाना चाहिए। हम कुछ कहें, तो हो सकता है, उससे कई जगहों में कई तरह की गलतफहमी सिर उठाये।
रमेश, मैं बेहद अजीब-सी स्थिति से गुजर रहा हूँ। मैं बहुत अकेला हो गया हूँ, रमेश, हर दृष्टि से। इस नौकरी से भी तंग आ गया हूँ। किसी भी वक्त छोड़ दूँ। मगर, मेरे यार, यह बताओ, उसके बाद बीवी-बच्चों को कैसे पालूँ? क्या तुम कोई रास्ता दिखा सकोगे? दिखा सको, तो लिखो। मेरा लिखना-पढ़ना सब समाप्त होता जा रहा है इस माहौल में रहकर।
सारी बातें विस्तार से लिखो।
भाभीजी को प्रणाम। अरे, मैं अपनी बहूरानी को कैसे भूल सकता हूँ। जब राहुल तंग करता है, तो उसकी माँ कहती रहती है कि तुझे अपनी बीवी के पास दिल्ली भेज दूँगी, जो तुझे सुधार लेगी। मैं अगले पत्र के साथ तुम्हारे दामाद का चित्र भेजूँगा।
 तुम्हारा
 शरीफ


इसके बाद हमारा पत्राचार दो-चार संक्षिप्त पत्रों से अधिक आगे नहीं बढ़ सका। वह फिर कभी दिल्ली भी नहीं आया। यदि आया भी होगा, तो मुझसे मिला नहीं। सुधीर चौहान और जे.एल. रेड्डी जैसे अपने पुराने मित्रों से भी उसने लगभग नाता तोड़ लिया था। उसके जीवन के अंतिम चार वर्ष किस अवस्था में गुजरे, हम में से कोई नहीं जान सका। 1977 में हुई उसकी असामयिक मृत्यु पर सुधीर और रेड्डी मद्रास गये थे और उसके परिवार से मिलकर आये थे। मगर वे भी मुझे इतना ही बता सके कि शरीफ के अंतिम दिन बड़े आर्थिक कष्ट में गुजरे। वह बहुत अकेला और शायद अवसादग्रस्त भी हो गया था। शायद यही चीज उसकी अचानक हुई असामयिक मृत्यु का कारण बनी।