Monday, August 8, 2016

निरंतर विकासमान यथार्थवाद

पिछले साल 8 अगस्त, 2105 को भीष्म साहनी जन्मशती के अवसर पर दिया गया मेरा एक व्याख्यान 'निरंतर विकासमान यथार्थवाद के रचनाकार भीष्म साहनी' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था. उसमें मैंने कहा था कि हमें भीष्म साहनी की जन्मशतवार्षिकी यथार्थवादी साहित्य की प्रकृति और परंपरा पर एक राष्ट्रीय बहस चलाकर मनानी चाहिए. कई लेखकों और पाठकों ने मेरे इस विचार का स्वागत करते हुए मुझे सुझाव दिया कि मैं 'निरंतर विकासमान यथार्थवाद' को स्पष्ट करते हुए एक लेख लिखूँ. उनके सुझाव के लिए आभार सहित प्रस्तुत है यह लेख. --रमेश उपाध्याय

निरंतर विकासमान यथार्थवाद


यथार्थवाद के पक्ष में उतना नहीं लिखा गया है, जितना उसके विरोध में। और विरोध भी कैसा? निराधार लांछन लगाने जैसा। उस पर तरह-तरह के इतने अधिक लांछन लगा दिये गये हैं कि उसका नाम लेने पर उसकी अपनी शक्ल-सूरत की जगह उस पर लगे लांछन ही नजर आते हैं। मसलन, यथार्थवाद कल्पनाशून्य होता है; वह सुंदरता को न देख कुरूपता को ही देखता है; वह जीवन की जटिलता में न जाकर उसका सरलीकरण करता है; वह महान और उदात्त को छोड़ साधारण और भदेस को अपनाता है; वह नये प्रयोग करने के बजाय पुरानी परिपाटियों पर चलता है; नये रास्ते खोजने और बनाने का कठिन काम करने के बजाय बने-बनाये रास्तों पर चलने का आसान तरीका अपनाता है; वह ऐसी सरलीकृत, घिसी-पिटी, फार्मूलाबद्ध और ‘पे्रडिक्टेबल’ रचनाओं की ओर ले जाता है, जिनके आरंभ में ही पता चल जाता है कि अंत क्या होगा...इत्यादि-इत्यादि।
यथार्थवाद पर लगाये जाने वाले इस प्रकार के सरासर गलत और निराधार लांछनों की जाँच-पड़ताल करने और उनका वास्तविक अर्थ स्पष्ट करने का काम यथार्थवादियों का है, जिसे वे बहुत कम कर पाये हैं। इसलिए विरोधियों ने यथार्थवाद के विरुद्ध ऐसा वातावरण बना दिया है कि साहित्यकार या कलाकार का यथार्थवादी होना मानो उसका गुण नहीं, दोष हो; विश्वविद्यालयों में उसका अध्ययन और अनुसंधान करना-कराना मानो समय तथा संसाधनों को बेकार ही बर्बाद करना हो। 

स्वच्छंदतावादियों और आधुनिकतावादियों से लेकर उत्तर-आधुनिकतावादियों तक बेशुमार लोगों ने यथार्थवाद का विरोध किया है। साहित्य और कला में इसके विरुद्ध कई आंदोलन चलाये गये हैं। ‘इतिहास का अंत’ की भाँति ‘यथार्थवाद का अंत’ की घोषणाएँ भी की जा चुकी हैं। लेकिन जीवन के लिए जरूरी चीजें कभी खत्म नहीं होतीं। बलपूर्वक दबा दी जाने पर भी वे उभर आती हैं। 

यथार्थवाद एक अंतरराष्ट्रीय कला आंदोलन के रूप में उन्नीसवीं सदी के मध्य में यूरोप में उभरा था। इस शब्द का पहला प्रयोग फ्रांसीसी भाषा में 1826 में हुआ, लेकिन जल्दी ही यह सर्वत्र चर्चा का विषय बन गया। चित्रकारों, उपन्यासकारों और हर प्रकार के आलोचकों के बीच इस पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार की जोरदार बहसें छिड़ीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में इसका स्वरूप भी बदला और कटु-कठोर तथा नग्न यथार्थ को चित्रित करने वाला ‘प्रकृतवाद’ सामने आया। इसके बाद अनेक प्रकार के ‘वाद’ आकर यथार्थवाद को चुनौती देने लगे। उनमें से सबसे बड़ी टक्कर दी आधुनिकतावाद ने, जिसने यथार्थवाद के ‘‘दिखाओ और बताओ’’ के रचना-सिद्धांत की जगह ‘‘नया बनाओ!’’ का रचना-सिद्धांत चलाया और आधुनिकतावादी आलोचक यथार्थवाद को पुराना तथा बेकार घोषित करने लगे। हिंदी में ‘नयी कविता’ और ‘नयी कहानी’ के आंदोलन इसी यथार्थवाद-विरोधी आधुनिकतावाद से प्रेरित-प्रभावित थे। यह और बात है कि इन आंदोलनों में अनेक यथार्थवादी रचनाकार भी शामिल थे। 

हिंदी साहित्य में, खास तौर से 1970 और 1980 के दशकों में, ‘प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा’ का जाप तो बहुत हुआ, लेकिन उसे समझने और आगे बढ़ाने के प्रयास कम ही हुए। यदि आधुनिकतावादी लेखकों तथा आलोचकों ने उसका मजाक उड़ाया, तो कई प्रगतिशील-जनवादी कहलाने वाले लेखकों तथा आलोचकों ने उस पर तरह-तरह के सवाल उठाकर उसे खारिज करने के प्रयास किये। मसलन, किसी ने कहा कि प्रेमचंद ग्रामीण यथार्थ के लेखक थे, आज के महानगरीय यथार्थ का चित्रण उनकी परंपरा में नहीं किया जा सकता; किसी ने कहा कि प्रेमचंद का समय और था, हमारा समय और है और इस बदले हुए समय में प्रेमचंद का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद संभव नहीं है; तो किसी ने कहा कि प्रेमचंद आदर्शवादी थे, यथार्थवादी तो वे अपनी अंतिम कुछ रचनाओं में ही हुए थे!  

दूसरी तरफ उत्तर-आधुनिकतावादियों ने अपने विखंडनवाद से यथार्थवाद के मूल आधार समग्रता का ही खंडन किया, तो जादुई यथार्थवादियों ने यथार्थवाद के सभी पुराने रूपों को वर्तमान समय के लिए बेकार हो चुका बताया और उत्तर-आधुनिकतावादियों के ‘माक्र्सवादोत्तर’ और ‘यथार्थवादोत्तर’ के नारों से उसका तालमेल बिठाकर वर्तमान में (अर्थात् सोवियत संघ के विघटन के बाद और पूँजीवादी भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में) उसी को एकमात्र सही और संभव यथार्थवाद बताया। 

आश्चर्य की बात यह है कि हिंदी साहित्य में वामपंथी लेखकों और लेखक संगठनों की संख्या कम न होने पर भी यथार्थवाद पर कोई बड़ी बहस नहीं चली, जबकि उनको ही साहित्य में यथार्थवाद की जरूरत सबसे ज्यादा थी। उत्तर-आधुनिकतावाद के संदर्भ में फ्रेडरिक जेमेसन का नाम अवश्य लिया जाता रहा, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया कि उन्होंने आज के पूँजीवाद के दौर में यथार्थवाद के नये रूपों के आविष्कार की जरूरत के बारे में क्या कुछ कहा था। 

पश्चिम के साहित्य में यथार्थवाद का विरोध आधुनिकतावाद के दौर में ही होने लगा था। आधुनिकतावाद की यथार्थवाद-विरोधी प्रवृत्ति को उत्तर-आधुनिकतावाद ने विभिन्न प्रकार की नयी रणनीतियों से आगे बढ़ाया। उनमें सबसे बड़ी रणनीति थी समग्रता का विरोध, जिसे उत्तर-आधुनिकतावाद के जनक जैसे माने जाने वाले ल्योतार ने ‘‘वार अगेंस्ट टोटैलिटी’’ (समग्रता के विरुद्ध युद्ध) कहा। इस युद्ध में जिस ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया गया, वह था विखंडन। 

लेकिन 1990 के बाद से ‘लेट कैपिटलिज्म’ (आज के पूँजीवाद) ने भूमंडलीकरण के रूप में एक ऐसी आर्थिक-राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की, जिससे एक नये ढंग के साम्राज्यवाद की वापसी हुई और उसके साथ ही एक नयी बात यह हुई कि सारी दुनिया को एक नये ढंग की गुलामी का अहसास होने लगा, जिससे वह एक नये रूप में मुक्ति के लिए छटपटाने लगी। इस छटपटाहट को व्यक्त करने वाली किताबें आने लगीं, जैसे डेविड हार्वी की ‘दि न्यू इंपीरियलिज्म’ (2003), गोपाल बालकृष्णन द्वारा संपादित ‘डिबेटिंग एंपायर’ (2003) और एलेक्स कोलिनिकाॅस की ‘दि न्यू मैंडेरिंस आॅफ अमेरिकन पाॅवर’ (2005)। उत्तर-आधुनिकतावाद ने माक्र्सवाद और यथार्थवाद के अंत की ही नहीं, इतिहास के अंत की भी घोषणा कर दी थी। मगर अब उन घोषणाओं को गलत साबित करने वाली किताबें भी आने लगीं, जैसे अंस्र्ट ब्रायसाख की ‘आॅन दि फ्यूचर आॅफ हिस्टरी: दि पोस्टमाॅडर्न चैलेंज एंड इट्स आफ्टरमैथ’ (2003), डेविड हार्वी की ‘स्पेसेज आॅफ होप’ (2003), फ्रेडरिक जेमेसन की ‘आर्कियोलाॅजीज आॅफ दि फ्यूचर: दि डिजायर काॅल्ड यूटोपिया एंड अदर साइंस फिक्शंस’ (2005), मैथ्यू बोमों द्वारा संपादित ‘एडवेंचर्स इन रियलिज्म’ (2007) इत्यादि। 

सोवियत संघ के विघटन और शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद पूँजीवाद की ओर से बड़ी विजयोल्लसित घोषणाएँ की गयीं कि पूँजीवाद जीत गया, समाजवाद हार गया, अब सारी दुनिया में और हमेशा पूँजीवाद ही चलेगा। उत्तर-आधुनिकतावादियों ने तो पहले ही कला, साहित्य और सौंदर्यशास्त्र में एक नये युग के आगमन की घोषणा कर रखी थी--मार्क्सवादोत्तर युग! यथार्थवादोत्तर युग! 

एक यथार्थवादी लेखक के रूप में मुझे लगा कि अब एक नये यथार्थवाद के लिए संघर्ष करना जरूरी है। मैं एक रचनाकार के रूप में तो यह संघर्ष अपनी कहानियों में नये यथार्थ को नये यथार्थवादी रूपों में सामने लाकर कर ही रहा था, अब मैं एक लेखक, प्राध्यापक और पत्रकार के रूप में भी यह संघर्ष अपने लेखों, व्याख्यानों और अपनी पत्रिका ‘कथन’ के अंकों के जरिये करने लगा। मैंने कुछ नये प्रश्न उठाने शुरू किये, जैसे--यदि पूँजीवाद एक विश्व-व्यवस्था है, तो क्या समाजवाद भी एक विश्व-व्यवस्था नहीं है? यदि पूँजी का भूमंडलीकरण संभव है, तो श्रम का क्यों नहीं? जब पूँजीवादी भूमंडलीकरण हो सकता है, तो समाजवादी भूमंडलीकरण क्यों नहीं हो सकता? 

इन प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जब तक समाजवाद एक संभावना है, तब तक माक्र्सवाद भी जरूरी है, यथार्थवाद भी जरूरी है। अलबत्ता यह एक नया मार्क्सवाद होगा, एक नया यथार्थवाद होगा। ऐतिहासिक परिस्थितियों के बदलने के साथ-साथ इतिहास के नये बोध के साथ बदलता और विकसित होता मार्क्सवाद और यथार्थवाद। 

1930 के दशक में जर्मनी में यथार्थवाद संबंधी एक ‘‘महान बहस’’ चली थी, जिसमें अर्न्स्ट ब्लाॅख, जाॅर्ज लुकाच, बर्टोल्ट ब्रेष्ट, वाल्टर बेंजामिन और थियोडोर एडोर्नो ने भाग लिया था। यह बहस 1980 में ‘एस्थेटिक्स एंड पाॅलिटिक्स’ नामक संकलन में प्रकाशित हुई थी। उसका ‘उपसंहार’ फ्रेडरिक जेमेसन ने लिखा था, जिसमें उन्होंने ‘‘उत्तर-मार्क्सवादों’’ की चर्चा करते हुए कहा था कि इतिहास की उपेक्षा करने वाले ही उसे दोहराने के लिए अभिशप्त नहीं होते, पिछले दिनों जो तरह-तरह के ‘‘उत्तर-मार्क्सवाद’’ सामने आये हैं, वे भी इसी सत्य को सामने लाते हैं। ‘‘माक्र्सवाद के परे’’ जाने के प्रयासों का अंत ‘‘मार्क्सवाद के पहले’’ की स्थितियों में लौट जाने के रूप में सामने आ रहा है। ‘‘दबा दी गयी चीजों की वापसी’’ का जैसा नाटकीय रूप यथार्थवाद और आधुनिकतावाद के झगड़े की वापसी के रूप में दिख रहा है, अन्यत्र कहीं नहीं दिखता। लेकिन उस झगड़े में पड़े बिना हम नहीं रह सकते, चाहे आज हमें उसमें शामिल दोनों पक्षों में से एक भी पूरी तरह स्वीकार्य न लगता हो। 

जेमेसन ने यह भी कहा था कि यथार्थवाद चीजों को समग्रता में देखता था, जबकि आधुनिकतावाद चीजों को विखंडित करके उन्हें ‘‘अपरिचित’’ बनाकर ‘‘नयी’’ बनाता था। मगर नयापन पैदा करने की यह आधुनिकतावादी तकनीक आज उपभोक्ताओं को पूँजीवाद से तालमेल बिठाकर चलना सिखाने की जानी-पहचानी तकनीक बन गयी है। उसमें कोई नयापन नहीं रहा। इसलिए अब नया कुछ करने के लिए विखंडन को भी ‘‘अपरिचित’’ बनाने का प्रयास किया जा रहा है। लगता है, अमूर्तन का एक चक्र पूरा हो चुका है और उसकी जगह यथार्थवाद की वापसी का समय आ गया है। मगर यथार्थवाद का भी ऐतिहासिक आधार संदिग्ध हो गया है, क्योंकि आधारभूत अंतर्विरोध स्वयं इतिहास के भीतर है और उसकी वास्तविकताओं को समझने के लिए हम जिन अवधारणाओं से काम लेते हैं, वे चिंतन के लिए एक पहेली बन जाती हैं। इससे जो संदेह पैदा होता है, बहुत मूल्यवान है। हमें उसी को पकड़ना चाहिए, क्योंकि उसी की संरचना में इतिहास का वह मर्म छिपा है, जिसे हम अभी तक समझ नहीं पाये हैं। जाहिर है, यह संदेह हमें यह नहीं बता सकता कि यथार्थवाद की हमारी अवधारणा क्या होनी चाहिए; फिर भी इसका अध्ययन हमारे ऊपर यह जिम्मेदारी अवश्य डालता है कि हम यथार्थवाद की एक नयी अवधारणा का आविष्कार करें। आज इस जिम्मेदारी को महसूस न करना असंभव है। 

जेमेसन जिस नये यथार्थवाद की जरूरत पर जोर दे रहे थे, वह उनके विचार से उपभोक्ता समाज की उस शक्ति का प्रतिरोध करने वाला यथार्थवाद होना चाहिए था, जो मनुष्य और उसकी पूरी दुनिया को वस्तुओं में बदल देती है। उपभोक्ता समाज में यह शक्ति होती है कि वह मनुष्य के शारीरिक और मानसिक श्रम से उत्पन्न तमाम चीजों के साथ-साथ मनुष्य के विचारों, भावनाओं तथा संपूर्ण जड़ और चेतन जगत से उसके संबंधों को भी बेची और खरीदी जाने वाली चीजें बना दे। इस शक्ति का प्रतिरोध समग्रता में ही किया जा सकता है। आज के मानवीय जीवन तथा सामाजिक संगठन के सभी स्तरों पर चल रहे विखंडन को व्यवस्थित रूप से समाप्त करने के लिए चीजों को समग्रता में देखना और उन्हें समग्र रूप से बदलना आवश्यक है। नये यथार्थवाद की अवधारणा समग्रता की कोटि के आधार पर ही की जा सकती है; क्योंकि यही वह चीज है, जो वर्गों के बीच के संरचनात्मक संबंधों को सामने ला सकती है। 

लगभग दो दशकों के बाद जेमेसन ने अपनी पुस्तक ‘अ सिंग्यूलर माॅडर्निटी: एस्से आॅन ओंटोलाॅजी आॅफ प्रेजेंट’ (2002) में पुनः लिखा कि ‘‘प्रत्येक यथार्थवाद नया ही होता है...और यही कारण है कि समूचे आधुनिकतावादी युग में और उसके बाद भी दुनिया के कई हिस्सों तथा सामाजिक समग्रता के कई अंशों में नये और जीवंत यथार्थवादों की आहटें सुनायी पड़ती रही हैं, जिन्हें सुनना और पहचानना जरूरी रहा है।...प्रत्येक नया यथार्थवाद न केवल अपने से पहले के यथार्थवादों की सीमाओं से असंतोष होने के कारण उत्पन्न होता है, बल्कि इस कारण भी, तथा अधिक आधारभूत रूप में इसी कारण से ही, उभरकर सामने आता है कि आम तौर पर यथार्थवाद स्वयं आधुनिकता की ठीक वही गतिशील नवीनता लिये रहता है, जिसे हम आधुनिकतावाद की अद्वितीय विशेषता मानते आये हैं।’’ 

इसके बाद ‘आर्कियोलाॅजीज आॅफ दि फ्यूचर: दि डिजायर काॅल्ड यूटोपिया एंड अदर साइंस फिक्शंस’ (2005) में उन्होंने ‘‘भूमंडलीकरण के बाद के नयी पीढ़ी के तमाम वामपंथियों’’ को संबोधित करते हुए यथार्थवाद की उन समस्याओं को उठाया, जो नये सिरे से उठ खड़ी हुई थीं और जिन पर तुरंत ध्यान दिया जाना जरूरी था।
भूमंडलीकरण का वर्तमान दौर शुरू होते ही उत्तर-आधुनिकतावाद अपनी फैशनेबल चमक-दमक खोने लगा था और एक नये यथार्थवाद की जरूरत महसूस की जाने लगी थी। देखते-देखते यथार्थवाद संबंधी नयी पुस्तकें सामने आने लगीं, जैसे पीटर ब्रुक्स की ‘रियलिस्ट विजंस’ (2005) और मैथ्यू बोमों द्वारा संपादित ‘एडवंेंचर्स इन रियलिज्म’ (2007)। यथार्थवाद की इस वापसी में समकालीन पूँजीवाद की बदलती संरचना से उत्पन्न समस्याओं का बड़ा हाथ था, जिन्होंने यथार्थ को समझने तथा उसे कला और साहित्य में चित्रित करने के नये तरीके निकालने के लिए एक तरफ चिंतकों तथा आलोचकों को और दूसरी तरफ कलाकारों और साहित्यकारों को प्रेरित किया। पूँजीवाद में आये बदलाव का ही शायद यह नतीजा था कि जहाँ पहले यथार्थवाद की चर्चा में इतिहास पर जोर दिया जाता था, अब राजनीतिक अर्थशास्त्र पर जोर दिया जाने लगा। भूमंडलीकरण ने इतिहास को नये ढंग से पढ़ना जरूरी बनाया, जिससे ‘‘इतिहास का भूमंडलीकरण’’ हुआ और ‘‘भूमंडलीकरण का इतिहास’’ सामने आया। इन दोनों चीजों का असर साहित्य पर और उसमें किये जाने वाले यथार्थ-चित्रण तथा आलोचनात्मक विवेचन पर पड़ना स्वाभाविक था। 

उत्तर-आधुनिकतावादियों का सबसे ज्यादा जोर विखंडन पर रहा। उन्होंने जीवन, समाज और दुनिया को समग्रता में देखने, समझने और साहित्य में चित्रित करने के यथार्थवादी प्रयासों को इस आधार पर गलत, अनुचित और अवांछित बताया कि ऐसा करना असंभव है। उन्होंने कहा कि जीवन, समाज और दुनिया को ही नहीं, जिस कला और साहित्य में ये चित्रित या प्रतिबिंबित होते हैं, उसे भी विखंडन से या खंड-खंड करके ही समझा जा सकता है। 

मार्क्सवादी रचनाकारों, आलोचकों तथा सिद्धांतकारों ने विखंडनवाद का खंडन करते हुए बार-बार कहा है कि द्वंद्ववाद के अनुसार एक समग्रता के भीतर जो अंतर्विरोध होते हैं, वे ही उस समग्रता को बनाते और बदलते हैं। माक्र्स ने समाज और विश्व की कल्पना एक ऐसी समग्रता के रूप में की थी, जिसमें मुख्य और ऐतिहासिक अंतर्विरोध शोषक और शोषित वर्गों के बीच है, इन वर्गों के बीच संघर्ष है और वह संघर्ष समाज और विश्व को बदल रहा है। अंततः यह बदलाव वहाँ तक जा सकता है, जहाँ समाज या विश्व नामक समग्रता में न वर्ग होंगे, न वर्ग-संघर्ष। फिर वह एक नयी ही समग्रता होगी, जिसके अपने नये अंतर्विरोध और संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन वे वर्तमान पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था के आमूलचूल बदल जाने के बाद के नये ही अंतर्विरोध और संघर्ष होंगे। 

वर्तमान पूँजीवादी भूमंडलीकरण ने ज्यों ही यह संभावना दुनिया के लोगों के सामने रखी कि पूँजीवाद की ही तरह समाजवाद भी एक विश्व-व्यवस्था है और उसका भी भूमंडलीकरण हो सकता है, पूँजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों ने एक तरफ समाजवाद के अंत, माक्र्सवाद के अंत, यथार्थवाद के अंत आदि की अलग-अलग घोषणाओं के साथ-साथ समग्र रूप में ‘‘इतिहास के अंत’’ की घोषणा कर दी, तो दूसरी तरफ समग्रता के विचार के ही विरुद्ध जंग छेड़ दी। 

लेकिन 1990 के बाद से, जब से भूमंडलीकरण की प्रक्रिया और उसके आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि तमाम पक्षों पर ध्यान दिया जाने लगा, विभिन्न देशों के वामपंथी विद्वान भूमंडलीय यथार्थ को समग्रता में समझने की जरूरत पर जोर देने लगे। इससे पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के बारे में नया विचार-मंथन शुरू हुआ और एक ‘‘बेहतर दुनिया की तलाश’’ के प्रयासों के साथ-साथ यह आशाजनक नारा भी सामने आया कि ‘‘दूसरी और बेहतर दुनिया मुमकिन है’’। इससे यथार्थवाद को, जिसे उत्तर-आधुनिकतावादियों ने मृत घोषित कर दिया था, फिर से जीवंत और विचारणीय माना जाने लगा। यह विचार जोर पकड़ने लगा कि पूँजीवाद भूमंडलीय है, तो समाजवाद भी भूमंडलीय है। और अब ‘‘एक देश में समाजवाद’’ की जगह ‘‘संपूर्ण विश्व में समाजवाद’’ के बारे में सोचा जाना चाहिए तथा उसके लिए यथार्थवादी रणनीतियाँ बनायी जानी चाहिए। 

आकस्मिक नहीं था कि माक्र्सवाद में लोगों की रुचि नये सिरे से पैदा होने लगी, सोवियत संघ के विघटन के संदर्भ में समाजवाद पर पुनर्विचार होने लगा, सोवियत समाजवाद की ऐतिहासिक भूलों और गलतियों से सबक लेते हुए सच्चे समाजवाद की दिशा में आगे बढ़ने की बातें होने लगीं और यथार्थवाद पुनः चर्चा का विषय बन गया। यथार्थवादी लेखकों का ध्यान स्थानीय यथार्थ के साथ-साथ भूमंडलीय यथार्थ पर भी गया और जब यह स्पष्ट दिखने लगा कि स्थानीय यथार्थ भूमंडलीय यथार्थ का ही अंग है, तो समग्रता के विचार ने जोर पकड़ा और उत्तर-आधुनिकतावादी विखंडनवाद की माक्र्सवादी आलोचना ने उसकी सीमाएँ और असंगतियाँ उजाकर करना शुरू कर दिया। 

समग्रता की अवधारणा में भी इस बीच काफी बदलाव और विकास हुआ था। हालाँकि माक्र्सवादी चिंतन में पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था की जगह भविष्य की समाजवादी विश्व-व्यवस्था का विचार पहले से मौजूद था (जिसकी अभिव्यक्ति सर्वहारा अंतरराष्ट्रीयतावाद के सिद्धांत और ‘‘दुनिया के मजदूरो एक हो’’ के नारे में होती थी), लेकिन सोवियत शासन के दौरान ‘‘एक देश में समाजवाद’’ के विचार ने अंतरराष्ट्रीयतावाद की जगह राष्ट्रवाद पर अनावश्यक और ऐतिहासिक रूप से गलत जोर डालकर समग्रता की अवधारणा को सीमित कर दिया था। सोवियत संघ के विघटन और वर्तमान पूँजीवादी भूमंडलीकरण ने समग्रता की सीमित (राष्ट्रीय अथवा ‘स्थानीय’) अवधारणा को पुनः व्यापक (अंतरराष्ट्रीय अथवा ‘भूमंडलीय’) बना दिया। इस प्रकार यथार्थ को ‘स्थानीय’ से आगे बढ़ाकर ‘भूमंडलीय’ के रूप में देखना जरूरी और संभव हो गया। 

फ्रेडरिक जेमेसन ने समग्रता की ‘‘वापसी’’ के साथ-साथ यथार्थ की ‘‘व्याप्ति’’ का विचार भी फिर से प्रस्तुत किया, जिसे वे ‘माकर््िसज्म एंड फाॅर्म’ (1971) में पहले ही व्यक्त कर चुके थे। उनका कहना था कि ‘‘यथार्थवाद इतिहास के किसी खास क्षण में परिवर्तन की शक्तियों तक पहुँचने की संभावना पर निर्भर करता है।’’ हालाँकि वे भूमंडलीकरण को एक ऐसी स्थिति मानते हैं, जो इस संभावना को बाधित करती है, लेकिन उनके विचार से आज नहीं तो कल यह संभावना साकार हो सकती है। 

इसका अर्थ यह हुआ कि पूँजीवादी भूमंडलीकरण ही यथार्थ नहीं है, एक संभावना के रूप में समाजवादी भूमंडलीकरण भी यथार्थ है। यथार्थवाद की इस समझ से साहित्य की रचना में ‘‘यथार्थवादी पद्धति’’ को ही अपनाना (अर्थात् यूटोपिया, डिस्टोपिया, रूपक, फैंटेसी वगैरह को यथार्थवादी रचना के लिए त्याज्य समझना) आवश्यक नहीं रहता और यथार्थवादी रचना उन रूपों में भी की जा सकती है, जो आधुनिकतावादी माने जाने के कारण यथार्थवादियों के लिए त्याज्य समझे जाते थे। जेमेसन ने ‘‘समकालीन विश्व के थके हुए यथार्थवाद’’ की तुलना में ‘साइंस फिक्शन’ (विज्ञान कथाओं) को ‘‘अधिक विश्वसनीय सूचना लौटाकर लाने वाला’’ बताकर रचना के रूप के स्तर पर नये यथार्थवाद की संभावनाओं की ओर संकेत किया। मगर इसका मतलब न तो यह था कि वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में यथार्थवाद के सभी पुराने रूप ‘‘थके हुए यथार्थवाद’’ के रूप हो चुके हैं और न यह कि आधुनिकतावादी सभी रूप यथार्थवादी रचना के लिए स्वीकार्य हो गये हैं। हाँ, इसका यह मतलब जरूर था कि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में यथार्थवाद पुराने ढंग का यथार्थवाद नहीं, एक नये ही ढंग का यथार्थवाद होगा और होना भी चाहिए। 

जेमेसन ने यथार्थवाद पर अलग से कोई विशेष अध्ययन प्रस्तुत नहीं किया, लेकिन लगभग तीन दशकों तक अपने लेखन में जगह-जगह यथार्थवाद से संबंधित सवालों से जूझते हुए उसकी नयी संभावनाओं का पता लगाया। इसके लिए वे बार-बार जाॅर्ज लुकाच के पास गये, उनसे प्रेरित हुए, उनसे सीखा और उनसे टकराये भी; क्योंकि लुकाच ने साहित्य के रूपों और ऐतिहासिक शक्तियों के संबंध को समग्रता में देखा था और यथार्थवाद का एक सामान्य सिद्धांत निर्मित करने का प्रयास किया था। जेमेसन समग्रता की अवधारणा को जाँचने-परखने और विकसित करने के लिए रह-रहकर उसकी ओर लौटे और उन्होंने पाया कि समग्रता के आधार पर ही रचना और आलोचना में यथार्थवादी होना संभव है। 

समग्रता का अर्थ यह नहीं है कि यथार्थ में जो कुछ है, या जितना दिखता है, वह सब चित्रित कर दिया जाये। यह असंभव है और आवश्यक भी नहीं। अतः समग्रता यथार्थवादी रचना के रूप या उसकी शैली (अथवा चित्रण की पद्धति) में नहीं, बल्कि रचनाकार की दृष्टि में होती है। वह यथार्थ का चाहे एक छोटा-सा अंश ही प्रस्तुत करे--जैसे किसी एक चरित्र के रूप में--लेकिन उसकी नजर उसे समग्रता में देखने वाली होनी चाहिए। अर्थात् रचना में चित्रित यथार्थ का एक अंश संपूर्ण यथार्थ के अंश के रूप में चित्रित होना चाहिए, न कि उस संपूर्णता को खंडित करके पाये गये उसके एक अंश को ही संपूर्ण मानकर। 

उदाहरण के लिए, वर्तमान समाज या उसके किसी प्रातिनिधिक चरित्र को चित्रित करते समय रचनाकार उसके वर्तमान को तो देखता ही है, ऐतिहासिक दृष्टि से उसके अतीत और भविष्य को भी देखता है। आधुनिकतावादी तथा उत्तर-आधुनिकतावादी लोगों के लिए उस चरित्र के अतीत का कुछ अर्थ भले ही हो, उसके भविष्य का कोई अर्थ नहीं होता; क्योंकि उनके लिए भविष्य तो अनागत है और जो अभी आया ही नहीं है, जिसका अस्तित्व ही नहीं है, वह यथार्थ कैसे हो सकता है! भविष्य के बारे में सोचने, उसकी कल्पना करने, उसका कोई आदर्श सामने रखकर उसकी प्राप्ति के प्रयास करने या साहित्य में उसे चित्रित करने को वे एक ‘यूटोपिया’ (अयथार्थ, कल्पनालोक या असंभव आदर्श) मानते हैं। लेकिन लुकाच और जेमेसन दोनों यथार्थवाद को समग्रता में अर्थात् अतीत-वर्तमान-भविष्य को एक साथ ध्यान में रखने से बनी दृष्टि के रूप में देखते हैं। लुकाच ने यथार्थ के चित्रण में ‘‘समग्रता के प्रश्न की निर्णायक भूमिका’’ बतायी थी। जेमेसन ने उसमें एक नैतिक आयाम भी जोड़ा और ‘यूटोपिया’ को अयथार्थ नहीं, बल्कि यथार्थ ही मानते हुए ‘मार्क्सिज्म एंड फाॅर्म’ में कहा : 

‘‘मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य तो उस ‘यूटोपिया’ तक ही पहुँचना है, जहाँ जीवन और उसका अर्थ पुनः अविभाज्य हो जायेंगे, इसमें मनुष्य और विश्व एकमत हो जायेंगे। लेकिन यह भाषा अमूर्त है और ‘यूटोपिया’ कोई विचार नहीं, बल्कि एक ‘विजन’ (दृष्टि) है। अतः वह अमूर्त चिंतन नहीं, बल्कि स्वयं आख्यान ही है, जो समस्त ‘यूटोपियाई’ गतिविधि को प्रमाणित करने का आधार है, और महान उपन्यासकार ‘यूटोपिया’ की समस्याओं का ठोस निरूपण प्रस्तुत करते हैं।’’ 

लुकाच ने आख्यान और समग्रता के बीच का संबंध खोजा था। जेमेसन ने उस खोज को आगे बढ़ाते हुए ‘यूटोपिया’ को भावी समाजवादी विश्व-व्यवस्था के रूप में देखा और बताया कि आज जो ‘यूटोपिया’ अयथार्थ, कल्पनालोक या असंभव आदर्श लगता है, उसके भविष्य में साकार होने की संभावना को यथार्थ मानकर चलना यथार्थवादी लेखकों का एक राजनीतिक कार्यभार ही नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। 

जेमेसन ने काल की अवधारणा से जुड़े यथार्थवाद को ‘‘ऐतिहासिक यथार्थवाद’’ कहा है। इससे उनका आशय उन्नीसवीं सदी के बाल्जाक, स्काॅट, डिकेंस आदि के कथासाहित्य में पाये जाने वाले यथार्थवाद से है। जेमेसन के सामने ही नहीं, पश्चिम के प्रायः सभी माक्र्सवादी आलोचकों के सामने यह समस्या रही है कि बुर्जुआ वर्ग के सत्तारोहण के समय की क्रांतिकारी परिस्थिति में उदित हुए उस यथार्थवाद की परंपरा को वर्तमान समय में कैसे आगे बढ़ाया जाये। ‘‘ऐतिहासिक यथार्थवाद’’ के उदय के पहले तक यह माना जाता था कि सामाजिक यथार्थ का चित्रण करने वाले साहित्य का संबंध ज्ञानमीमांसा से तो है, किंतु सौंदर्यशास्त्र से नहीं। दूसरे शब्दों में, यथार्थवादी साहित्य ‘ज्ञान’ तो दे सकता है, ‘आनंद’ नहीं दे सकता। ‘‘ऐतिहासिक यथार्थवाद’’ ने दावा किया, जिसे बाल्जाक, स्काॅट, डिकेंस आदि के साहित्य ने सत्य भी सिद्ध किया कि वह निरा ज्ञानात्मक नहीं, सौंदर्यात्मक भी है। 

हिंदी में प्रेमचंद ने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की अवधारणा के जरिये तथा मुक्तिबोध ने ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान की अपनी कोटियों के जरिये यही दावा पेश किया था और अपनी रचनाओं में चरितार्थ भी किया था।

जेमेसन ने ‘दि पाॅलिटिकल अनकांशस: नैरेटिव ऐज अ सोशली सिंबाॅलिक एक्ट’ (2002) में यथार्थवाद की ज्ञानात्मक और सौंदर्यात्मक दोनों तरह की उपलब्धियों को देखा। यह मानते हुए भी कि उन्नीसवीं सदी का-सा ‘‘ऐतिहासिक यथार्थवाद’’ बीसवीं सदी के पूँजीवाद के अंतर्गत संभव नहीं है, उन्होंने उसकी परंपरा को नये रूप में आगे बढ़ाना संभव, उचित और आवश्यक बताया। उन्होंने नये यथार्थवादों के पैदा होने की संभावना बताते हुए अपने आशावाद का परिचय तो दिया ही, उत्तर-आधुनिकतावादी विखंडन के विरुद्ध समग्रता की अवधारणा में विश्वास भी व्यक्त किया। उन्होंने नये यथार्थवादों की संभावना ही नहीं, आवश्यकता भी बतायी और कहा कि आज के पूँजीवादी भूमंडलीकरण के दौर में यथार्थवाद को एक राजनीतिक लक्ष्य और कार्यक्रम के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने यथार्थवाद के नवीनीकरण की बात की और कहा कि आज का यथार्थवाद अपनी पुरानी परंपरा से बहुत कुछ ग्रहण करते हुए भी एक नया यथार्थवाद होगा। बल्कि एक नहीं, अनेक यथार्थवाद होंगे, जिनका आविष्कार किया जाना है। 

मैंने भूमंडलीय यथार्थ के बारे में तभी से सोचना शुरू कर दिया था, जब अपनी पुस्तक ‘आज का पूँजीवाद और उसका उत्तर-आधुनिकतावाद’ (1999) में संकलित निबंध लिखे थे। उसके बाद लिखे गये मेरे निबंध जैसे ‘साहित्य में फैशन और नवोन्मेष’, ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की जरूरत’, ‘रूढ़ सोच के साँचों को तोड़ना जरूरी’, ‘आगे की कहानी’, ‘हिंदी में विज्ञान कथाएँ क्यों नहीं हैं?’ इत्यादि भूमंडलीय यथार्थ को ही ध्यान में रखकर लिखे गये थे। अंततः ‘भूमंडलीय यथार्थवाद’ नामक निबंध में भूमंडलीय यथार्थवाद की मेरी अवधारणा विकसित होकर सामने आयी। (ये सभी निबंध 2008 में प्रकाशित मेरे साहित्यिक निबंधों के संग्रह ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ में संकलित हैं।) भूमंडलीय यथार्थवाद की मेरी अवधारणा संक्षेप में यह है : 

आज की दुनिया का सबसे अहम प्रश्न है: क्या पूँजीवाद की वैश्विक व्यवस्था की जगह कोई और वैश्विक किंतु बेहतर व्यवस्था संभव है? यदि हाँ, तो उसकी रूपरेखा क्या है और वह व्यवस्था किन आधारों पर, किन शक्तियों के द्वारा और किन तरीकों से बनायी जा सकती है? इस प्रश्न का उत्तर भूमंडलीय यथार्थवाद के आधार पर ही दिया जा सकता है, क्योंकि इसका उत्तर देने के लिए यह आवश्यक है कि आज की दुनिया के यथार्थ को भौगोलिक के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी देखा जाये और ऐतिहासिक दृष्टि को केवल अतीत को देखने वाली दृष्टि नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी देखने वाली ऐसी सर्जनात्मक दृष्टि मानकर चला जाये, जो आने वाले कल की बेहतर दुनिया बनाने के लिए हमें आज ही प्रेरित और सक्रिय कर सके। 

हिंदी साहित्य में यह मान्यता न जाने कब से और क्यों चली आ रही है कि यथार्थ और कल्पना परस्पर-विरोधी हैं। मेरा कहना यह है कि यथार्थवाद कल्पना का निषेध नहीं करता। सृजनशील कल्पना तो यथार्थवादी रचना के लिए अपरिहार्य है, क्योंकि वह जिस ‘यूटोपिया’ अथवा भविष्य के स्वप्न को साकार करने के लिए की जाती है, वह सृजनशील कल्पना के बिना साकार हो ही नहीं सकता--न रचना में, न यथार्थ में। कारण यह है कि यथार्थवादी रचना के लिए इतिहास का बोध, वर्तमान का अनुभव और भविष्य का स्वप्न आवश्यक है। और आवश्यक है वह परिप्रेक्ष्य, जो इन तीनों के मेल से बनता है। जाहिर है कि ऐसा यथार्थवाद--रचनाकार के जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे--एक समाजवादी परियोजना है, क्योंकि भविष्य का स्वप्न पूँजीवादी व्यवस्था में समाजवाद ही हो सकता है। चाहे भविष्य में उसका नाम और रूप कुछ और ही हो जाये, आज वह पूँजीवाद का निषेध है और उसके परे जाने का प्रयत्न। 

ठीक इसी कारण आज का पूँजीवाद यथार्थवाद का विरोधी है। यथार्थवाद के विकास को तरह-तरह से बाधित करना, उसे तरह-तरह से बदनाम करना, यथार्थवादियों को उपेक्षित या दंडित करना तथा तमाम प्रत्यक्ष और परोक्ष तरीकों से उनका दमन करना पूँजीवादी राजनीति का आवश्यक अंग है। 

मगर यह राजनीति अक्सर अराजनीतिक प्रतीत होने वाले रूपों में की जाती है। मसलन, यथार्थवाद की जगह अनुभववाद पर जोर देना, यूटोपिया का मजाक उड़ाना, उसे असंभव बताकर खारिज करना, भविष्य के स्वप्न देखने-दिखाने वाले यथार्थवादियों को स्वप्नजीवी, आदर्शवादी या गैर-यथार्थवादी सिद्ध करना, साहित्य को ‘‘वादमुक्त’’ तथा ‘‘राजनीति से दूर’’ रखने की सलाहें देना इत्यादि। साहित्यिक आलोचना में अराजनीति की राजनीति का सबसे घातक किंतु सबसे प्रभावशाली रूप है रचना का उत्तर-आधुनिकतावादी अथवा उत्तर-संरचनावादी पाठ। सारी दुनिया में इसका प्रचार इतने जोर-शोर से और इतने बड़े पैमाने पर किया गया है कि बहुत-से आलोचकों ने इसे सर्वथा सही मानकर अपना लिया है। लेकिन इसके विरुद्ध विवेकपूर्ण स्वर भी निरंतर सुनायी देते रहे हैं, जिन्हें ध्यान से सुना जाये, तो पता चलता है कि आज दुनिया भर में ऐसे यथार्थवादी साहित्य की जरूरत महसूस की जा रही है, जो आज के भूमंडलीय यथार्थ को समझने में ही नहीं, बल्कि बदलने में भी लोगों की मदद करे। 
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Saturday, October 3, 2015

प्रेम के पाठ


आज मैं 'वागर्थ' पत्रिका के सितम्बर, २०१५ के अंक में प्रकाशित अपनी कहानी 'प्रेम के पाठ' आप सबके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ. पढ़ें और अपनी राय बतायें.


हमारे जीवन का मूल मंत्र था मजे में रहना। और इसका तरीका हमने बचपन में ही सीख लिया था : थोड़ा-सा बेवकूफ (होना नहीं) दिखना। लोग आपको थोड़ा-सा बेवकूफ समझते रहें और आप मजे में रहते रहें, इसमें क्या बुराई है?

हमारे परिवार में परीक्षाओं में प्रथम आने की परंपरा थी। पिताजी हमेशा हर कक्षा में प्रथम आये थे। भाईसाहब भी उनके नक्शे-कदम पर चलते थे और वे भी हमेशा हर कक्षा में प्रथम आते थे। हमेशा हर कक्षा का मतलब है कि क्लास टेस्ट हो, तिमाही, छमाही या सालाना इम्तिहान हो, फर्स्ट ही आना है। पिताजी अपने जमाने के फर्स्ट क्लास फर्स्ट बी.ए. पास थे। भाईसाहब भी हमेशा फर्स्ट आते थे। आगे चलकर वे एम.ए. फर्स्ट क्लास और ऊपर से गोल्ड मेडलिस्ट हुए। जाहिर है कि पिताजी और भाईसाहब ने हमारे सामने अपना-अपना आदर्श प्रस्तुत करते हुए हमसे भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कहा। लेकिन हमारी जीजी के लिए प्रथम आने की कोई शर्त नहीं थी, क्योंकि उनकी पढ़ाई हाई स्कूल तक ही होनी थी, जिसके बाद उनकी शादी कर दी जाने वाली थी।

लेकिन हमेशा फर्स्ट आने का जो तरीका पिताजी और भाईसाहब ने हमें बताया, बालबुद्धि होते हुए भी हमें काफी मूर्खतापूर्ण लगा। टाइमपीस में चार बजे का अलार्म लगाकर सोओ। घंटी बजते ही उठ बैठो। उठते ही लोटा भर पानी पियो और पाखाने जाओ। लोटा भर से जरा भी कम पिया, तो पेट साफ नहीं होगा। पेट साफ नहीं हुआ, तो नींद आयेगी या सिर में दर्द होगा या यूँ ही पढ़ाई में मन नहीं लगेगा। पाखाने से निकलते ही गर्मी हो या कड़ाके की सर्दी, ठंडे पानी से नहा डालो। नहाकर साफ धुले हुए कपड़े पहनो और पढ़ने बैठ जाओ। बिस्तर पर नहीं, बाकायदा मेज-कुर्सी पर। पिताजी कहते थे, ‘‘तुम तो बड़े खुशकिस्मत हो कि मेज-कुर्सी और बिजली की रोशनी जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। हमारे जमाने में तो किरासिन की ढिबरी या लालटेन की रोशनी में जमीन पर बोरी बिछाकर पढ़ने बैठना पड़ता था।’’

हमें आदेश था कि स्कूल जाने के समय से एक घंटा पहले तक कल का पढ़ाया गया सब कुछ इस तरह दिमाग में बैठा लो कि क्लास में जो भी पूछा जाये, फौरन बता सको। जो भी सवाल दिया जाये, फटाफट हल कर सको। अब जो एक घंटा तुम्हारे पास है, उसी में तुम्हें अपना बस्ता लगाना है, नाश्ता करना है, ब्रश करना है, यूनिफॉर्म पहननी है और स्कूल पहुँचना है। स्कूल में हर पीरियड में पूरा मन लगाकर पढ़ना है, रिसेस में टिफिन खाना है, खेल के पीरियड में खेलना है। घर आकर, कपड़े बदलकर, हाथ-मुँह धोकर, खाना खाकर एक घंटे सोना है। शाम को एक घंटा खेलने जा सकते हो, पर एक घंटे से एक मिनट भी फालतू नहीं। खेलकर आने के बाद अगर गर्मियाँ हैं तो नहाकर और सर्दियाँ हैं तो हाथ-मुँह धोकर भीगे हुए बादाम चबाते हुए एक गिलास दूध पीकर होम वर्क करने बैठ जाना है। चाहे आधी रात ही क्यों न हो जाये, उसे पूरा करके ही खाना और सोना है। वैसे मन लगाकर पढ़ोगे, तो होम वर्क फटाफट निपटा सकोगे और जल्दी से खाकर जल्दी सो सकोगे। भाईसाहब इस आदेश में अंग्रेजी की एक लाइन भी जोड़ दिया करते थे, ‘‘अर्ली टु बेड एंड अर्ली टु राइज, मेक्स अ मैन हैल्दी वैल्दी एंड वाइज।’’

भाईसाहब ने पता नहीं कैसे पिताजी के नक्शे-कदम पर चलना या उनके उपदेशों पर अमल करना सीख लिया होगा! हमें तो यह अनुशासन कड़ी सजा जैसा लगा और लगा कि ऐसी जिंदगी जीने में क्या मजा। हमेशा हर कक्षा में प्रथम आना आखिर क्यों जरूरी है? फर्स्ट क्लास फर्स्ट ही क्यों? सेकेंड क्लास फर्स्ट या फर्स्ट क्लास सेकेंड में क्या बुराई है? पिताजी पुराने जमाने के हैं, इसलिए कहते हैं, ‘‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब’’। उनके जमाने में नवाब होते होंगे, अब कहाँ होते हैं। होते भी हों, तो नवाब रामपुर या नवाब धामपुर कौन बनना चाहेगा? नवाब ही बनना है, तो क्रिकेट वाले नवाब पटौदी न बनेंगे! पढ़ेंगे-लिखेंगे, पास भी अच्छे से होंगे, लेकिन फर्स्ट क्लास फर्स्ट आने के लिए की जाने वाली कठोर तपस्या नहीं करेंगे। खेलेंगे-कूदेंगे, पर खराब नहीं होंगे। होंगे नहीं, पर थोड़े-से बेवकूफ दिखेंगे और मजे में रहेंगे। जैसा किसी लोकोक्तिकार ने कहा भी है, ‘‘जो सुख चाहे जीव को, तो हौलू बनके रह!’’

अपने इस मूल मंत्र के मुताबिक हमने तय किया कि फेल नहीं होंगे, लेकिन फर्स्ट आने के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। पहली बार सेकेंड आये, तो पिताजी ने हमारे दोनों कान उमेठकर उनमें खूब सदुपदेश भरे और भाईसाहब ने रिजल्ट देखकर हमारे गाल पर एक थप्पड़ जड़ते हुए अपना आदर्श हमारे सामने रखा। कान के दर्द और गाल की चोट के अनुपात में हम कुछ ज्यादा ही जोर से रोये, ताकि अम्मा और जीजी का कोमल नारी हृदय पसीज उठे और वे हमारी रक्षा के लिए सन्नद्ध हो उठें। वैसे भी हम अम्मा के ‘पेटपोंछना’ और जीजी के दुलारे ‘छुटकू भैया’ होने के कारण दोनों के लाड़ले थे। घर में सबसे छोटे होने के कारण सबका प्यार-दुलार पाने के न्यायोचित अधिकारी भी थे ही। अतः पिताजी और भाईसाहब ने एक लिमिट में रहकर ही हम पर सख्ती बरती।

लेकिन उन्होंने हमें यह समझाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी कि हम सेकेंड आने वालों में सबसे अधिक नंबर लाये हैं, इसलिए हम में बुद्धि और प्रतिभा कम नहीं है, केवल थोड़ी मेहनत और करने की जरूरत है; फिर हमें फर्स्ट आने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन हमने अगली दो-तीन कक्षाओं में सेकेंड आना और उन दोनों ने हल्की सजा और भारी उपदेश देना जारी रखा, तो हमने अगले साल थोड़ा प्रयास किया और थर्ड आ गये। परिणाम जो होना था, हुआ। सख्त सजा मिली और पहले से भी ज्यादा वजनी उपदेश सुनने पड़े। लेकिन भविष्य में सेकेंड आते रहने का हमारा रास्ता साफ हो गया, क्योंकि थर्ड से सेकेंड आना बेहतर समझा गया। हमारे परीक्षकों ने भी हम पर दया दिखायी कि पूरे शिक्षाकाल में हमें हमेशा फर्स्ट क्लास सेकेंड आने लायक नंबर दिये और दो बार तो गोल्ड मेडल जैसा भी दिया कि दो-दो नंबर कम देकर हमारी फर्स्ट डिवीजन रोक ली।

हमारे परिवार में सब पढ़े-लिखे थे। अम्मा अंग्रेजों के जमाने की मिडिल पास थीं, पिताजी अंग्रेजों के जमाने के बी.ए. पास। भाईसाहब और जीजी भी आजादी से पहले पैदा हुए थे। एक हम ही थे, जो उसी साल पैदा हुए, जिस साल देश आजाद हुआ। कारण यह था कि भाईसाहब और जीजी की उम्र में तो दो ही साल का अंतर था, पर हम जीजी के छह साल बाद पैदा हुए थे। इस प्रकार जब हम पाँच साल के थे और पहली में पढ़ते थे, जीजी ग्यारह साल की थीं और छठी में पढ़ती थीं, जबकि भाईसाहब तेरह साल के थे और आठवीं में पढ़ते थे। पिताजी अध्यापक थे और एक इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे।

पिताजी पढ़ाने के बड़े शौकीन थे। बाहर तो पढ़ाते ही थे, घर में भी खूब पढ़ाते। उन्होंने हमें शुरू से ही प्रेम के पाठ पढ़ाये थे। उन असंख्य पाठों में से कुछ थे: अपने परमात्मा से प्रेम करो। अपने धर्म से प्रेम करो। अपनी जाति से प्रेम करो। अपनी भाषा से प्रेम करो। अपनी सभ्यता से प्रेम करो। अपनी संस्कृति से प्रेम करो। अपनी परंपराओं से प्रेम करो। अपने परिवार से प्रेम करो। अपने पड़ोसियों से प्रेम करो। अपने देश और देशवासियों से प्रेम करो। अपनी दुनिया और दुनिया भर के लोगों से प्रेम करो।

अजीब बात थी कि जिन से प्रेम करने को कहा जाता था, वे या तो अमूर्त होते थे, या पुरुष, क्योंकि स्त्रियों से प्रेम करने का कोई पाठ हमें नहीं पढ़ाया गया। स्त्रियों को हमारे यहाँ पूज्य माना जाता था, प्रेम्य नहीं। हमें शिष्टाचार के जो पाठ पढ़ाये गये थे, उनमें से एक यह था कि गुरुजन यानी बड़े तो पितातुल्य आदरणीय होते हैं--जैसे पिताजी, भाईसाहब और तमाम तरह के दादा, बाबा, चाचा, ताऊ, मामा, मौसा, शिक्षक, साधु, संत, पुजारी इत्यादि--किंतु स्त्रियाँ बड़ी हों या छोटी, सभी माता के समान पूजनीय होती हैं। ‘‘मातृवत परदारेषु’’ का अर्थ समझाते हुए पिताजी हमसे कहा करते थे कि परायी स्त्रियों को माँ के समान मानना चाहिए, अर्थात् तुम्हारी एक संभावित पत्नी को छोड़कर संसार में जितनी भी स्त्रियाँ हैं, सब माँ के समान हैं और माँ पूजनीय होती है, इसलिए वे सब भी पूजनीय हैं। वे तुमसे उम्र में बड़ी हों या छोटी, सब माँ के समान हैं।

‘‘उम्र में छोटी भी?’’ यह पूछने पर पिताजी बताते थे, ‘‘परदारा वही नहीं है, जो विवाहित होकर परायी हो चुकी है। जो कल विवाहित होकर परायी बनने वाली है, वह भी परदारा है। इसलिए उम्र में छोटी कुँवारी लड़की भी मातृवत है और पूजनीय है। वैसे ही, जैसे छोटी बहनें, सगी छोटी बहनें और अपनी बेटियाँ भी पूज्य होती हैं। राखी बँधवाते समय छोटी बहन के भी पाँव छुए जाते हैं, बेटी के विवाह के समय उसके भी पाँव छुए जाते हैं। क्यों? इसलिए कि वे भी परदारा हैं। इसीलिए उन्हें पराया धन कहा जाता है।’’

हमें याद था कि जब तक जीजी की शादी नहीं हुई थी, हम अम्मा के साथ जीजी के भी पाँव छुआ करते थे। हमारी कोई छोटी बहन तो थी नहीं, इसलिए कानपुर में ही रहने वाले हमारे मामा की बेटी माधुरी हमें राखी बाँधती थी। राखी बँधवाते समय हम उसके भी पाँव छुआ करते थे और वह नटखट हमें बड़ी-बूढ़ियों की तरह आशीर्वाद दिया करती थी। जीजी की शादी हो गयी और भाभी आ गयीं, तो हमें उनके भी पाँव छूकर प्रणाम करने को कहा गया। समझाया भी गया, ‘‘बड़ा भाई पिता के समान होता है, तो भाभी माँ के समान हुई न!’’

किशोरावस्था से निकलकर युवावस्था में प्रवेश करते समय ही हमें फिल्में देखने के साथ-साथ ‘माया’ और ‘मनोहर कहानियाँ’ नामक पत्रिकाओं में प्रेम कहानियाँ पढ़ने का चस्का लग चुका था। संक्षेप में, हम चाहने लगे थे कि हम भी किसी से प्रेम करें। लेकिन पिताजी ने ‘‘परदारेषु मातृवत’’ का पाठ पढ़ाकर हमारे लिए मानो प्रेम के सभी मार्ग बंद कर दिये थे, क्योंकि उस पाठ के अनुसार हमारी दूर भविष्य में संभावित पत्नी के अतिरिक्त संसार की समस्त स्त्रियाँ परदारा या तो थीं या भविष्य में हो जाने वाली थीं। मुहल्ले-पड़ोस की और स्कूल में हमारे साथ पढ़ने वाली वे सुंदर-सुंदर लड़कियाँ भी, जिनसे प्रेम करने को हमारा मन मचलता था, पराया धन की श्रेणी में आती थीं और ‘‘परदारेषु मातृवत’’ वाले श्लोक में ही आगे का सूत्र था ‘‘परद्रव्येषु लोष्टवत’’ अर्थात् पराये धन को ‘लोष्ट’ यानी मिट्टी के ढेले के समान मानना चाहिए। इसके अनुसार जैसे रास्ते में पड़े ढेलों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता, वैसे ही हमें लड़कियों की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए था। आखिर हम अभी विद्यार्थी थे और पिताजी द्वारा बार-बार सुनाया हुआ ‘‘काकचेष्टा वकोध्यानम्’’ वाला वह श्लोक हमें हमेशा याद रखना था, जिसके अनुसार विद्यार्थी के पाँच लक्षणों में सबसे मुख्य लक्षण यह है कि वह अपनी पढ़ाई पर (केवल कोर्स की पढ़ाई पर) ही ध्यान केंद्रित किये रखने वाला हो। मगर हम नासमझ-से दिखते हुए भी यह समझ चुके थे कि पिताजी की बातें और उनके श्लोक-फिश्लोक ‘‘सब कहने-सुनने की बातें’’ हैं, उन पर अमल-वमल करना जरूरी नहीं है।

उदाहरण हमें अपने घर में ही मिल चुके थे। नन्हे-मुन्ने कासिद के रूप में हमने जीजी के प्रेमपत्र उनके प्रेमी तक और भाईसाहब के प्रेमपत्र उनकी प्रेमिका तक पहुँचाने का काम किया था और ऐसी होशियारी से किया था कि अम्मा और पिताजी को कभी भनक भी नहीं पड़ी थी। (हमारी सेवाओं के बदले में जीजी और भाईसाहब द्वारा इनाम या रिश्वत के रूप में जो पैसे चोरी-चोरी हमें दिये जाते थे, उनसे हम चोरी-चोरी फिल्में देखकर प्रेम के पाठ पढ़ते थे।) हालाँकि जीजी की शादी उनके प्रेमी से और भाईसाहब की शादी उनकी प्रेमिका से नहीं हुई, लेकिन दोनों ने प्रेम तो किया ही न! इसलिए हमने सोच लिया था कि हम भी प्रेम करेंगे।

प्रेम करने का निश्चय करने के बाद हमारे सामने समस्या उठी कि प्रेम किस लड़की से किया जाये। हमारी देखी हुई फिल्मों और पढ़ी हुई कहानियों के अनुसार लड़की सुंदर तो होनी ही चाहिए थी, साथ ही ऐसी भरोसेमंद भी अवश्य होनी चाहिए थी, जो प्रेम-प्रसंग में गोपनीयता के महत्त्व को समझती हो। अगर उसने स्कूल में या अपने घर जाकर हमारी शिकायत कर दी, तो पिटाई निश्चित थी। बाहर पिटकर हमारे बदनाम होने की और उस बदनामी के कारण पुनः घर में पिटने की प्रबल आशंका थी। हम जानते थे कि जब पिताजी के करकमलों से हमारी पिटाई होगी, तब भाईसाहब यह भूल जायेंगे कि वे भी कभी प्रेम करते थे और हम उनके कासिद बनकर उनकी सेवा किया करते थे।

ऐसी सुंदर और भरोसेमंद प्रेमिका खोजने के लिए हमने गली-मुहल्ले की लड़कियों से लेकर स्कूल में साथ पढ़ने वाली लड़कियों तक खूब नजर दौड़ायी, पर इन दोनों गुणों से युक्त कोई लड़की नजर न आयी। जो लड़कियाँ सुंदर थीं, वे भरोसेमंद नहीं थीं। जो भरोसेमंद हो सकती थीं, वे सुंदर नहीं थीं। अंततः हमें अपनी ममेरी बहन माधुरी याद आयी, जो बहुत सुंदर थी और अपने जेबखर्च के लिए मामा-मामी से मिले पैसे कभी-कभी चोरी से हमें सिनेमा देखने के लिए दिया करती थी। मामा-मामी सिनेमा कभी-कभार ही देखते थे और बड़ी होती इकलौती लड़की को सिनेमा के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए उसे प्रायः धार्मिक फिल्में ही दिखाते थे।

माधुरी हमें सिनेमा देखने के लिए चोरी-चोरी पैसे क्यों देती थी?

बात यह थी कि तब तक भारत में टी.वी. नहीं आया था और मनोरंजन का मुख्य साधन सिनेमा या फिर रेडियो था, जिस पर रेडियो सीलोन से प्रसारित और अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला नाम का फिल्मी गानों का कार्यक्रम लड़कियों के बीच सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम था। माधुरी फिल्मों और फिल्मी गानों की दीवानी थी। वह फिल्मी गाने सुनती थी, याद करती थी और गाती-गुनगुनाती रहती थी। उन दिनों खारी बावली दिल्ली से छपी फिल्मी गानों की किताबें एक-एक आने में बिकती थीं। तब तक दशमलव प्रणाली शुरू नहीं हुई थी और बाजार से लेकर गणित की पुस्तकों तक में रुपया-आना-पाई, मन-सेर-छटाँक और गज-फुट-इंच वाला हिसाब चलता था। एक रुपये में सोलह आने होते थे और एक आने में हर फिल्म के गानों की सोलह पेजी किताब मिलती थी। वह ‘किताब’ दरअसल किसी घटिया प्रेस में बेशुमार गलतियों के साथ सस्ते अखबारी कागज पर छपा एक सोलह पेजी फर्मा होता था, जिसे किसी प्रकार की कटिंग-बाइंडिंग के बिना सिर्फ मोड़कर ‘किताब’ बना दिया जाता था। लेकिन ये किताबें बहुत बिकती थीं और बाजार में उनकी माँग हमेशा बनी रहती थी। ब्याह-शादी में गाने-बजाने की शौकीन महिलाएँ और लड़कियाँ उन्हें खरीदती थीं और सहेजकर रखती थीं। खुद बाजार जाकर फिल्मी गानों की किताबें खरीदना उनके लिए ‘‘हाय बेहया-बेशरम’’ वाली बात थी, इसलिए वे किसी बच्चे को इकन्नी-दुअन्नी पकड़ाकर बाजार दौड़ा देती थीं कि वह जाकर ‘आन’, ‘अंदाज’, ‘दीदार’, ‘अनारकली’ या ‘नया दौर’ के गाने ले आये। लड़कियों में तो नयी से नयी फिल्मों के गाने खरीदने की होड़ भी लगी रहती थी।

हमारी ममेरी बहन माधुरी जेबखर्च के लिए रोजाना मिलने वाली इकन्नी फिल्मी गानों की किताबें खरीदने और नयी फिल्मों की स्टोरी सुनने पर खर्च किया करती थी। वह जेबखर्च के लिए प्रतिदिन मामा या मामी से मिलने वाले एक आने को चटोरी लड़कियों की तरह चाट-पकौड़ी या गोलगप्पे खाने पर खर्च नहीं करती थी। (उन दिनों अधन्ने में चाट का पूरा पत्ता या दोना आता था और एक आने के आठ गोलगप्पे मिलते थे।) वह उन पैसों को बचाती थी और एक रुपया पूरा हो जाने पर चुपके से हमें थमा देती थी। वह हमसे एकाध साल ही छोटी थी और हमसे एक ही क्लास पीछे थी, लेकिन अपने घर में उसने हमारी विद्वत्ता के झंडे गाड़ रखे थे। वह स्वयं को पढ़ाई में कमजोर बताती थी और हमारे बारे में कहती थी कि हम बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। मामा-मामी ने उसके लिए ट्यूशन लगाने के बजाय हमारी मुफ्त सेवाएँ इस प्रकार ले रखी थीं कि हम छुट्टी वाले दिन आकर घंटे-दो घंटे उसे पढ़ा दिया करें। सो जब हम उसे पढ़ाने जाते, वह चुपके से एक पुड़िया में बँधी सोलह इकन्नियाँ या आठ दुअन्नियाँ या चार चवन्नियाँ या दो अठन्नियाँ हमें पकड़ा देती। उसके दिये एक रुपये में से हम सिनेमा का सेकेंड क्लास का दस आने वाला टिकट लेकर नयी फिल्म देखते थे और बाकी छह आनों की फिल्मी गानों वाली ‘किताबें’ खरीदते थे। अगली बार जब हम उसे पढ़ाने जाते, अपनी किसी किताब में छिपाकर ले जायी गयी वे ‘किताबें’ उसे दे देते और पढ़ाने के बहाने देखी हुई फिल्म की पूरी स्टोरी उसे सुना देते। वह हमारे शब्दों के सहारे अपनी कल्पना में पूरी फिल्म देख लेती, उसके संवाद याद कर लेती, उसके गानों की सिचुएशंस अच्छी तरह समझ लेती, अगले दिन स्कूल जाकर अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों पर शान से नयी फिल्म देखने का रौब जमाती और उनके खर्चे पर चाट-पकौड़ी खाकर उसकी स्टोरी उन्हें सुनाती।

इस प्रकार हम और माधुरी ममेरे-फुफेरे भाई-बहन होते हुए भी एक-दूसरे के राजदार थे और हमें लगा कि प्रेम के लिए वह उपयुक्त पात्र है। सुंदर तो है ही, भरोसेमंद भी है। हमें भी अपने घर से जेबखर्च के लिए एक आना प्रतिदिन मिलता था। हमने पाँच दिन के पाँच आने बचाये, माधुरी के लिए फिल्मी गानों की पाँच किताबें खरीदीं और चुपके से उसके हवाले करते हुए प्रेम निवेदन कर दिया।

माधुरी पहले तो हक्की-बक्की रह गयी, फिर उसकी आँखें डबडबा गयीं। टूटे-फूटे शब्दों में उसने जो कहा, उसका सार यह था कि हम बहुत अच्छे हैं, उसे बहुत अच्छे लगते हैं, फर्क यही है कि वह जो कह नहीं पा रही थी, हमने कह दिया। और कि वह हमारे प्रेम को अपना सौभाग्य मानकर स्वीकार कर लेती, मगर क्या करे, भाई-बहन का पवित्र रिश्ता बीच में आ गया। ममेरी ही सही, वह हमारी बहन है और भाई-बहन के बीच प्रेम नहीं हो सकता। उसने यह भी कहा कि काश हम लोग मुसलमान होते, जिनमें ममेरे-फुफेरे भाई-बहन में शादी हो जाती है। हमारा (और शायद अपना भी) दिल टूटने से बचाने के लिए उसने यह भी कहा कि वह भगवान से प्रार्थना करेगी कि अगले जनम में हमें फिर मिलाये, मगर हिंदू भाई-बहन न बनाये।

दिल-विल तो हमारा नहीं टूटा, लेकिन प्रेम का पहला पाठ हमने पढ़ लिया: प्रेम करने से पहले अच्छी तरह देख-भाल लेना चाहिए कि कोई पवित्र रिश्ता तो बीच में नहीं आ रहा।

जब हम नवीं कक्षा में पढ़ते थे, एक इंग्लिश टीचर स्कूल में नयी-नयी आयी थीं। वे इतनी सुंदर थीं कि उन्हें देखते ही हमें उनसे प्रेम हो गया। कक्षा में उनके आते ही हम उन्हें देखने लगते और देखते ही रह जाते। वे क्या पढ़ाती थीं, हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़ता था। वे कई बार हमसे पूछ चुकी थीं कि हम कहाँ खोये रहते हैं। लेकिन हम उनके द्वारा पूछे जाने वाले पढ़ाई से संबंधित सवालों की तरह इस सवाल का जवाब भी नहीं दे पाते थे। हम चीजों के खो जाने या उन्हें खो देने का मतलब तो जानते थे, क्योंकि हमारी चीजें अक्सर खोती रहती थीं; एक बार हम दशहरे के मेले में खुद भी खो गये थे और बड़ी मुश्किल से पाये गये थे, इसलिए भीड़ में खो जाने का मतलब भी जानते थे; लेकिन कक्षा में अपनी जगह पर बैठा-बैठा कोई कैसे खो सकता है, यह नहीं जानते थे। हम उन्हें एकटक देखते रहकर बड़ा सुख पाते थे। लेकिन यह नहीं बता सकते थे कि हम क्या पाते हैं। जानते और बातें बनाना भी जानते होते, तो शायद उनसे कहते--मैम, यह पूछिए कि हम क्या पाये रहते हैं!

एक दिन कक्षा के बाहर कहीं जाते हुए हम उन्हें अकेले में मिल गये, तो रोककर बोलीं, ‘‘तुम क्लास में मुझे घूरते क्यों रहते हो?’’

उनका सुंदर चेहरा क्रोध में ऐसा तमतमाया हुआ था कि भयभीत होकर हमने सच बोल दिया, ‘‘मैम, आप हमें बहुत अच्छी लगती हैं।’’

‘‘मतलब, तुम्हें मुझसे प्रेम हो गया है?’’

हमने पहली बार जाना कि ‘घिग्घी बँध जाना’ और ‘सिट्टी-पिट्टी भूल जाना’ क्या होता है।

तब उन्होंने वहीं खड़े-खड़े हमें समझाया कि प्रेम हो जाने वाली बात बकवास है। प्रेम होता नहीं, किया जाता है। और वह कभी भी, कहीं भी, किसी से भी नहीं किया जाता।

‘‘अभी तुम्हारी उम्र मन लगाकर पढ़ाई करने की है। बड़े हो जाओ, पढ़-लिखकर कुछ बन जाओ, तब अपने लायक कोई लड़की देखकर उससे प्रेम और विवाह कर लेना।’’ कहकर वे मुस्करायीं और हमारी पीठ थपथपाकर आगे बढ़ गयीं।

इस प्रकार हमने प्रेम का दूसरा पाठ पढ़ा: प्रेम होता नहीं, किया जाता है, उसे करने की एक उम्र होती है, उससे पहले कुछ बनना होता है, और प्रेम जो है सो विवाह के लिए किया जाता है।

उस दिन हमने अपनी इंग्लिश टीचर को ही नहीं, किसी भी स्त्री या लड़की को घूरकर न देखने की, देखकर उसे देखते ही न रह जाने की और अपनी सुध-बुध भूलकर उसी में खोये न रह जाने की कसमें खा लीं और मन लगाकर पढ़ाई करने की, पढ़-लिखकर कुछ बन जाने की और उसके बाद अपने लायक कोई लड़की देखकर उससे प्रेम और विवाह करने की प्रतिज्ञाएँ कर लीं।

हमारी कसमें न टूटें और प्रतिज्ञाएँ पूरी हों, इसका उपाय हमें यही सूझा कि स्त्रियों या लड़कियों के सामने या तो हम नीचे देखें या इधर-उधर। मगर वास्तव में हम उनकी ओर न देखते हुए भी उन्हें बहुत ध्यान से देखते थे, क्योंकि आज नहीं तो कल, हमें प्रेम और विवाह तो करना ही था और करने से पहले इन दोनों चीजों को समझना था। ममेरी बहन माधुरी ने जो पाठ हमें पढ़ाया था, उसके अनुसार हमने ‘पवित्र रिश्तों’ वाली स्त्रियों और लड़कियों को अपने अध्ययन का विषय बनाया और यह ज्ञान पाया कि उनमें से प्रायः सभी का कभी न कभी, किसी न किसी से प्रेम रहा है, लेकिन एकाध को छोड़कर किसी का भी प्रेम विवाह के रूप में सफल नहीं हुआ है।

स्कूल की पढ़ाई पूरी करके कॉलेज में आ जाने पर भी हमने लड़कियों को देखते ही नजरें झुका लेना या इधर-उधर देखने लगना जारी रखा, तो हमारे बारे में मशहूर हो गया कि हम बहुत शरमीले हैं। हमारे सहपाठी हमें बुद्धू समझते थे और समझाते थे कि लड़कियों की तरफ देखो, उनसे आँखें मिलाकर बात करो, क्योंकि उनमें से कुछ तुमसे नैना मिलाना और अँखियाँ लड़ाना चाहती हैं। मगर हम अपनी कसमों और प्रतिज्ञाओं के चलते शरमीले बने रहे। यहाँ तक कि हम पर एक चुटकुला भी बन गया कि हम फिल्म देखते समय भी, जब कोई लड़की परदे पर आती है, नीचे या इधर-उधर देखने लगते हैं।

इस प्रकार हम न तो प्रेम में अंधे हुए न पागल। हमेशा शरमीले और शरीफ कहलाये। लेकिन हमारे आसपास--सहपाठियों और शिक्षकों के बीच, मुहल्ले और पड़ोस में, नगर और प्रदेश में, देश और विदेश में--जो प्रेमलीलाएँ होती थीं, उनके समाचार-श्रोता के रूप में प्रत्यक्ष और साहित्य-पाठक के रूप में परोक्ष साक्षी बनकर प्रेम के विविध रूपों का हमारा अध्ययन बराबर जारी रहा। हम अंतरजातीय, अंतरवर्णीय, अंतरधार्मिक, अंतरप्रांतीय तथा अंतरदेशीय प्रेम विवाहों के बारे में पढ़ने, सुनने और जानने को विशेष रूप से उत्सुक रहते थे। ज्यों-ज्यों हम इस प्रकार के प्रेम और विवाह से संबंधित विभिन्न कॉमिक, रोमांचक और मार्मिक किंतु भयानक रूप से हिंसक पक्षों से परिचित होते जा रहे थे, त्यों-त्यों प्रेम हमारे लिए बड़ी और उससे भी बड़ी गुत्थी बनता जा रहा था।

प्रेम के हिंसक पक्ष हमने फिल्मों में भी देखे थे, कहानियों और उपन्यासों में भी पढ़कर जाने थे, लेकिन समाचारों और उन पर बनी सत्यकथाओं में प्रेम से संबंधित हिंसा के जो रूप हमारे सामने आते थे, बिलकुल भिन्न होते थे। फिल्मों और कहानियों में प्रेम से जुड़ी हिंसा के तीन रूप प्रचलित थे: कॉमिक, जैसे प्रेम करने वाली लड़की के दकियानूसी बाप द्वारा की जाने वाली हल्की-सी पिटाई; रोमांचक, जैसे नायक और खलनायक के बीच लड़की को लेकर होने वाली मारामारी; या मार्मिक, जैसे प्रेम में असफल रहने पर नायक-नायिका में से किसी एक की आत्महत्या से अथवा दोनों की ‘बेदर्द जमाने’ द्वारा की जाने वाली हत्या। मगर हिंसा के ये तीनों रूप अंततः मनोरंजक होते थे। इसलिए उन्हें देख-पढ़कर हम हँसें चाहे रोयें, वे हमें अच्छे लगते थे। उनसे हमें डर नहीं लगता था, बल्कि जोश आता था कि ‘‘चाहे सिर फूटे या माथा’’ हम भी प्रेम करेंगे। लेकिन समाचारों और सत्यकथाओं में प्रेम से जुड़ी हिंसा कभी प्रेम करने वाली लड़की को उसके रूढ़िवादी माता-पिता और भाई-भाभी द्वारा ही जलाकर मार डालने या काटकर घर में ही गाड़ देने के रूप में सामने आती थी; कभी जातिवादी पंचों-सरपंचों द्वारा प्रेमी-प्रेमिका दोनों को लाठियों से पीट-पीटकर या कुल्हाड़ियों से काट-काटकर या गोलियों से भून-भूनकर मार डालने के रूप में सामने आती थी; तो कभी सांप्रदायिक नेताओं द्वारा कराये गये भयानक दंगों के रूप में सामने आती थी। तब प्रेम के ये हिंसक पक्ष हमें भयानक रूप से आतंकित करने के साथ-साथ घोर घृणा से भर देते थे।

इस प्रकार हमने प्रेम का तीसरा पाठ पढ़ा: प्रेम कहानियाँ काल्पनिक होती हैं, वे मजा तो दे सकती हैं, मार्ग नहीं दिखा सकतीं; इसलिए प्रेम के इन काल्पनिक रूपों से बचकर और हिंसक रूपों से लड़कर हमें प्रेम का मार्ग स्वयं बनाना पड़ेगा।

और हमने निश्चय किया कि हम प्रेम और विवाह तो अवश्य करेंगे, लेकिन यह देखकर करेंगे कि लड़की और उसके माता-पिता या अभिभावक रूढ़िवादी, जातिवादी और संप्रदायवादी न हों। ऐसा प्रेम और विवाह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने पर ही किया जा सकता था, इसलिए हमने निश्चय किया कि पढ़ाई करके हम भाईसाहब के साथ नहीं रहेंगे (पिताजी इस बीच गुजर चुके थे), किसी दूसरे शहर में नौकरी करेंगे और वहीं रहकर प्रेम और विवाह करेंगे।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमने कानपुर में रहते हुए प्रेम के सारे रास्ते बंद कर रखे थे। हमने अपनी तरफ से बाहर जाकर किसी से प्रेम करने का रास्ता बंद कर रखा था, लेकिन बाहर से कोई हमसे प्रेम करने आये, तो उसके आ सकने का रास्ता खुला रखा था। उस रास्ते से हमारे जीवन में तीन लड़कियाँ और दो स्त्रियाँ आयीं। अर्थात् तीन भावी परदाराएँ और दो वर्तमान परदाराएँ। पाँचों एक साथ नहीं, एक-एक करके आयीं, लेकिन पाँचों ही यह घोषणा-सी करती हुई आयीं कि उन्हें ‘‘मातृवत परदारेषु’’ वाली दृष्टि से नहीं, बल्कि ‘‘मित्रवत परदारेषु’’ वाली दृष्टि से देखा जाये। मगर उनकी मित्रता कुछ नहीं, काफी अजीब थी।

एक मामले में वह मित्रता जब तक शादी नहीं हो जाती, तब तक की वक्तकटी या मौज-मस्ती थी।

दूसरे मामले में वह मित्रता स्वयं अपना वर खोजकर स्वयंवर रचाने निकली आधुनिका की तलाश थी।

तीसरे मामले में वह मित्रता धोखा दे भागे पूर्व प्रेमी के विरुद्ध हमें सच्चा प्रेमी बनाने की चुनौती थी।

चौथे मामले में वह मित्रता परदेस में रह रहे पति के अभाव में देह की भूख मिटाने की कोशिश थी।

पाँचवें मामले में वह मित्रता पति की नपुंसकता के कारण सूनी गोद को संतान से भर देने की करुण पुकार थी।

हम तब भी नहीं जानते थे और आज भी नहीं जानते--शायद भविष्य में भी कभी नहीं जान पायेंगे--कि प्रेम वास्तव में क्या होता है। मगर यह जानने में हमने देर नहीं लगायी कि यह और जो भी हो, प्रेम नहीं है। इसलिए हम ऐसे प्रेम को हमेशा हाथ जोड़कर विदा करते रहे। इसमें हमारे हौलूपन का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

जब हम एम.ए. में पढ़ रहे थे और भाईसाहब की इच्छा के विरुद्ध अंग्रेजी भाषा और साहित्य की जगह हिंदी भाषा और साहित्य पढ़ रहे थे, तब एक दिन अचानक हमने पाया कि हम प्रेम के कवि हैं। हुआ यह कि कॉलेज की वार्षिक पत्रिका के लिए छात्रों से रचनाएँ माँगी गयीं, तो हमने ‘यह तो प्रेम नहीं’ शीर्षक से पाँच खंडों वाली एक कविता लिखी और उन प्रोफेसर साहब के पास ले गये, जो पत्रिका के हिंदी खंड के संपादक थे। वे हिंदी के प्रोफेसर ही नहीं, साहित्यकार भी थे। जिस समय हम उनके पास गये, कॉलेज में छुट्टी होने का समय था और वे स्टाफ रूम में अकेले बैठे छात्रों की रचनाएँ पढ़ रहे थे। वे हमें पढ़ाते थे, जानते थे और अच्छा विद्यार्थी मानते थे। उन्होंने सरसरी नजर से हमारी कविता देखी और कहा, ‘‘बैठो।’’

स्टाफ रूम में छात्र जा तो सकते थे, शिक्षकों से बातचीत भी कर सकते थे, लेकिन खड़े-खड़े ही। इसलिए हम बैठने का आदेश पाकर भी खड़े ही रहे। उन्होंने फिर बैठने के लिए कहा, तो हम सकुचाते हुए उनसे कुछ हटकर उसी सोफे पर बैठ गये, जिस पर वे बैठे थे। उन्हांेने हमारी कविता ध्यान से पढ़ी और पूछा, ‘‘प्रेम किया है?’’

‘‘जी, नहीं।’’ हमने दोटूक उत्तर दिया।

‘‘और प्रेम पर कविता लिखते हो!’’ उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा।

‘‘यह कविता प्रेम पर नहीं है, सर!’’ हमने विनम्र किंतु मजबूत स्वर में कहा, ‘‘इसका शीर्षक ही है ‘यह तो प्रेम नहीं’।’’

‘‘जो प्रेम नहीं है, उसे वही कहो, जो वह है।’’ हमें लगा कि हमारी कविता अस्वीकृत हो गयी, लेकिन उन्होंने कहा, ‘‘लो, इसे ले जाओ। यह एक कविता नहीं, पाँच अलग-अलग कविताएँ हैं। इनके अलग-अलग शीर्षक दो। सोचो कि जो प्रेम नहीं है, वह क्या है। उसे वही नाम दो, जो वह वास्तव में है।’’

हम कविता लेकर उठने लगे, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी ये कविताएँ तो हम कॉलेज की पत्रिका में छाप देंगे। लेकिन तुम कुछ ऐसी कविताएँ लिखो, जिनमें प्रेम हो और जिन्हें प्रेम की कविताएँ कहा जा सके। अच्छी होंगी, तो उन्हें हम किसी साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित करायेंगे।’’

हमने उस कविता की पाँच कविताएँ तो बनायीं, लेकिन शीर्षक एक ही रखा--‘प्रवंचना: पाँच कविताएँ’। उनके शीर्षक हमने अलग-अलग रखे: प्रवंचना-1, प्रवंचना-2, प्रवचंना-3 इत्यादि। यह काम आसानी से हो गया, लेकिन प्रेम कविताएँ लिखने में बड़ी मुश्किल पड़ी। अंततः हमने ‘मूर्खता-1’ और ‘मूर्खता-2’ शीर्षक से दो कविताएँ लिखीं। पहली कविता हमने अपनी ममेरी बहन से प्रेम निवेदन करने की मूर्खता पर लिखी और दूसरी अपनी इंग्लिश टीचर को सुध-बुध भूलकर एकटक देखते रहने की मूर्खता पर।

साहित्यकार प्रोफेसर हमारे दोनों कारनामों से खुश हुए। उन्होंने हमारी पहली पाँच कविताएँ कॉलेज मैगजीन में छापीं और दूसरी दो कानपुर से ही निकलने वाली एक साहित्यिक पत्रिका में छपवायीं। आश्चर्य कि उन दो कविताओं के छपते ही हम प्रेम के कवि मान लिये गये।

इस प्रकार हमने प्रेम का चौथा पाठ पढ़ा: प्रेम के नाम पर ऐसा बहुत कुछ होता है, जो प्रेम नहीं होता और प्रेम मूर्खता कहलाने पर भी प्रेम ही रहता है।

एम.ए. फाइनल में हमारे साहित्यकार प्रोफेसर हमें मध्यकालीन काव्य और उसका इतिहास पढ़ाते थे। जब से उन्होंने हमारी कविताएँ प्रकाशित करायी थीं, हम उन्हें अपना साहित्यिक गुरु मानने लगे थे। वे प्रगतिवादी माने जाते थे, लेकिन हमें वे खासे परंपरावादी लगते थे। हम से कहते थे, ‘‘अच्छे कवि बनना चाहते हो, तो मध्यकालीन काव्य को ध्यान से पढ़ो। रीतिकाल और भक्तिकाल की कविता को समझे बिना तुम न तो हिंदी कविता को समझ सकते हो, न हिंदी में अच्छी कविता लिख सकते हो--खासकर प्रेम कविता--क्योंकि प्रेम और प्रेम कविता के अच्छे-बुरे तमाम तरह के रूप तुम्हें उसी में मिलेंगे, जिनसे तुम यह सीख सकते हो कि अच्छी प्रेम कविता क्या होती है। और देखो, एम.ए. के पाठ्यक्रम में जितना रीतिकालीन और भक्तिकालीन काव्य लगा हुआ है, उतना ही पढ़ने से दूसरे छात्रों का काम शायद चल जाये, तुम्हारा चलने वाला नहीं है। इसलिए उसे विस्तार से और गहराई से पढ़ो। उसके साथ-साथ उस समय के इतिहास को भी पढ़ो। वह जिन भाषाओं में लिखा गया है, उनके विकास और ह्रास को भी पढ़ो। इसके लिए तुम्हें एक तरफ संस्कृत की तरफ जाकर हिंदी तक आना पड़ेगा और दूसरी तरफ अरबी-फारसी की तरफ जाकर उर्दू तक आना पड़ेगा। और यह काम एक-दो या दस-बीस साल का नहीं, जिंदगी भर का काम है। बड़ा काम है। बोलो, करना चाहोगे?’’

‘‘चाहें, तो क्या कर पायेंगे?’’ हमने डरते-डरते पूछा।

‘‘मन से चाहोगे, तो कर पाओगे।’’

‘‘तो बताइए, कहाँ से शुरू करें?’’

‘‘उर्दू आती है?’’ उन्होंने पूछा, लेकिन अगले ही क्षण शायद हमारी पारिवारिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर बोले, ‘‘कहाँ से आती होगी! लेकिन उर्दू सीखना ज्यादा मुश्किल नहीं है। जल्दी सीख जाओगे। हम अपने एक मित्र का पता तुमको देते हैं। उनके पास चले जाओ। वे उर्दू साहित्य के जानकार ही नहीं, खुद भी उर्दू के शायर हैं। उनको उस्ताद बनाकर उर्दू शायरी पढ़ोगे, तो हिंदी में अच्छी प्रेम कविता लिखना अपने-आप सीख जाओगे।’’

उनके दिये पते पर कॉमरेड अंसारी को खोजते हुए हम जहाँ पहुँचे, वह कानपुर का एक ऐसा इलाका था, जो हमने अभी तक नहीं देखा था। वह औद्योगिक क्षेत्र की एक मजदूर बस्ती थी।

कॉमरेड अंसारी ने हमारा परिचय पाकर स्वागत करते हुए कहा, ‘‘अहा, आ गये आप! आपके प्रोफेसर साहब ने फोन पर हमें बता दिया था कि आप आयेंगे। कहिए, पहले कभी आप इस तरफ आये हैं?’’

‘‘जी, नहीं।’’

‘‘ठीक तो है!’’ कॉमरेड अंसारी व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ बोले, ‘‘आप उस कानपुर में रहते हैं, जो इस कानपुर की तरफ कम ही आता है।’’

फिर उन्होंने बताया कि यह एक मजदूर बस्ती है, जो तब बसी थी, जब कानपुर एक बड़ा औद्योगिक शहर बना था; जब कानपुर में एक जबर्दस्त मजदूर संगठन और आंदोलन हुआ करता था; जब कानपुर में रहने वाले गरीब और दूर-पास गाँवों-कस्बों के भूमिहीन किसान और कारीगर पहली बार कारखानों के मजदूर बने थे; जब हर धर्म और हर जाति के लोगों ने मिलकर मजदूर आंदोलन खड़ा किया था और सर्वहारा वर्ग की शुरुआती लड़ाइयाँ लड़ी थीं। यों कानपुर अब भी एक औद्योगिक शहर है और यहाँ ऐसी कई मजदूर बस्तियाँ हैं, मगर वह आंदोलन इतिहास बन गया है, जो शहर के दूसरे हिस्सों को ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित करके अपने होने का अहसास कराया करता था।

कॉमरेड अंसारी उस बस्ती के एक पुराने मगर बड़े-से मकान में रहने वाले संपन्न बुजुर्ग थे। पेशे से वकील थे और सिर्फ मजदूरों के मुकद्दमे लड़ते थे। उनकी बेटियों की शादियाँ हो चुकी थीं और बेटों ने दूसरे शहरों में अपने घर बसा लिये थे। वे खुद यहाँ अपनी बेगम, एक नौकर, एक नौकरानी और अपने दफ्तर के एक सहायक के साथ रहते थे। वकालत अब ज्यादा नहीं चलती थी, फिर भी गुजर-बसर हो रही थी। फालतू वक्त काफी बचता था, सो उसमें वे पढ़ने और लिखने का काम करते थे।

अपने बारे में विस्तार से बताकर उन्होंने हमारे बारे में, हमारी पढ़ाई-लिखाई के बारे में, हमारे घर-परिवार के बारे में और अंततः हमारे कविता लिखने के बारे में पूछा।

शायद हमारे द्वारा दी गयी जानकारी से संतुष्ट होकर उन्होंने कहा, ‘‘आप प्रेम की कविता लिखना चाहते हैं, तो प्रेम कीजिए। करते हैं? अभी नहीं? कोई बात नहीं, हम उस प्रेम की बात कर भी नहीं रहे। हम उस प्रेम की बात कर रहे हैं, जो खुद से किया जाता है; जो हमें अपनी खुदी से मिलाता है और बेखुदी तक ले जाता है। खुदी के बारे में इकबाल का शेर आपने सुना होगा--‘खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।’ खुदी को बुलंद करने का मतलब है खुद को इतना बड़ा बना लेना कि आप सारी दुनिया से, सारी कायनात से प्यार कर सकें। मगर इसका मतलब खुदा बन जाना या खुद को खुदा समझने लगना नहीं है। खुदा कौन है, क्या है, आप यह जानने के चक्कर में न पड़ें। उसे न कोई जान सका है, न जान ही सकता है। जिस चीज को आप जानते नहीं और जान भी नहीं सकते, वह चीज आप कैसे बन सकते हैं? बन नहीं सकते और फिर भी समझते हैं कि आप वह हैं, तो समझिए कि आप से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं। खुदी को बुलंद करने का मतलब अहंकार नहीं है, खुद को औरों से या सबसे बड़ा समझने लगना नहीं है; बल्कि खुद को ऐसी ऊँचाई तक ले जाना है, जहाँ से आप सारी कायनात को देख सकें, उसे बाँहों में लेकर उससे प्यार कर सकें। जो वहाँ पहुँच जाता है, वह खुद को भूल जाता है। यही बेखुदी है। और दुनिया भर की अच्छी प्रेम कविता इसी बेखुदी के आलम में लिखी गयी है।’’

इस प्रकार हमने प्रेम का पाँचवाँ पाठ पढ़ा। लेकिन वह ऐसा निकला कि खत्म ही नहीं होता। उसे हम आज तक पढ़ रहे हैं और शायद ताउम्र पढ़ते ही रहेंगे।

--रमेश उपाध्याय 

Friday, May 1, 2015

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ

'बेहतर दुनिया की तलाश' पर आज प्रस्तुत है मेरा लेख 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ'। यह लेख प्रसिद्ध पत्रिका 'नवनीत के मई, 2015  के अंक की आवरण कथा 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे' के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है, जिसमें मेरे लेख के अलावा संपादक विश्वनाथ सचदेव, प्रियंवद, न्यायमूर्ति चंद्रशेखर धर्माधिकारी और रमेश नैयर के लेख भी हैं. --रमेश उपाध्याय


मैं साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में भी सक्रिय रहा हूँ। तीनों क्षेत्रों में मैंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न का सामना किया है। आम तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘‘बोलने की आजादी’’ के रूप में समझा जाता है, लेकिन वह सिर्फ बोलने की आजादी नहीं, उसमें और भी कई चीजें आती हैं। भाषण या वक्तव्य देने से लेकर लिखने और पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित करने, चित्र और व्यंग्य चित्र बनाकर उन्हें प्रदर्शित और प्रकाशित करने, नाटक और नुक्कड़ नाटक लिखने-करने, डॉक्यूमेंटरी और फीचर फिल्में बनाने-दिखाने, रेडियो और टेलीविजन के कार्यक्रम प्रस्तुत करने, सार्वजनिक मंच या सोशल मीडिया पर दूसरों से सहमत-असहमत होते या मतभेद और विरोध प्रकट करते हुए अपने विचार व्यक्त करने, सड़कों पर जुलूस निकालने और नारे लगाने, धरना-प्रदर्शन और घेराव-हड़ताल करने, साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन चलाकर और सामाजिक-राजनीतिक संगठन बनाकर मनुष्य को बेहतर मनुष्य तथा दुनिया को बेहतर दुनिया बनाने तक के विभिन्न काम करने की स्वतंत्रता। 


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस व्यापक अर्थ में समझने पर ही उसके दमन या हनन और उसे प्राप्त करने के लिए किये जाने वाले संघर्ष का अर्थ समझ में आता है। 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजंेसी और सेंसरशिप लगाकर केवल प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध नहीं लगाया था। उन्होंने उसके जरिये नागरिक स्वतंत्रताओं और जनता के जनवादी अधिकारों का हनन भी किया था। वह इमरजेंसी तो 1977 में हट गयी, लेकिन एक अघोषित इमरजेंसी और सेंसरशिप अब भी लगी हुई है, जो उत्तरोत्तर सघन होती जा रही है। उसके अंतर्गत कभी कानून बनाकर और अक्सर गैर-कानूनी तरीकों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन और हनन किया जाता है।

कानून बनाकर ऐसा करने का उदाहरण है 2008 में भारत सरकार द्वारा सन् 2000 के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में धारा 66-ए को जोड़ा जाना (जिसे अभी मार्च, 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाया गया अनुचित अंकुश मानकर निरस्त किया है)। इस धारा के अनुसार पुलिस को यह अधिकार था कि वह चाहे जिस अभिव्यक्ति को अपराध मानकर दमनात्मक कार्रवाई कर सके। उदाहरण के लिए, फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखने वाली लड़की को ही नहीं, उस टिप्पणी को ‘लाइक’ करने वाली एक दूसरी लड़की को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा को निरस्त कर दिया, बहुत अच्छा किया।

लेकिन गैर-कानूनी तरीकों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो दमन और हनन किया जाता है, उसका क्या? पिछले काफी समय से धार्मिक या सांप्रदायिक आधारों पर बने विभिन्न प्रकार के लोगों के समूह और संगठन लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, अखबारों और टी.वी. चैनलों के दफ्तरों आदि पर लगातार और उत्तरोत्तर बड़ी संख्या में हमले कर रहे हैं। यह एक प्रकार की अघोषित इमरजेंसी और नितांत गैर-कानूनी, बल्कि आपराधिक किस्म की सेंसरशिप है, जिससे किसी लेखक-पत्रकार को खामोश कर दिया जाता है, किसी अखबार या टी.वी. चैनल का स्वर बदल दिया जाता है, किसी कलाकार को देश छोड़कर दूसरे देश में जा बसने को मजबूर कर दिया जाता है, किसी सामाजिक या राजनीतिक कार्यकर्ता को जान से मार दिया जाता है, तो किसी साहित्यकार को जीते-जी अपनी साहित्यिक मृत्यु की घोषणा करने के लिए बाध्य कर दिया जाता है। इस इमरजेंसी और इस सेंसरशिप के रहते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाता है?

इंदिरा गांधी द्वारा थोपी गयी इमरजेंसी का विरोध करने वाले लोगों के बीच हिंदी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ की ये पंक्तियाँ बहुत लोकप्रिय हुई थीं :

अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे।
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।

अब फिर से ये पंक्तियाँ दोहरायी जाने लगी हैं, तो एक प्रकार से यह अच्छी ही बात है। लेकिन मुझे लगता है कि इन पंक्तियों का वास्तविक अर्थ न तब समझा गया था, न अब समझा जा रहा है। मुझे याद है कि इमरजेंसी के दौरान इन पंक्तियों को अक्सर दोहराने वाले एक पत्रकार मित्र से मैंने पूछा था कि ‘‘अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने’’ और ‘‘मठ और गढ़ सब तोड़ने’’ का क्या अर्थ है। उनका उत्तर था, ‘‘प्रेस की आजादी के लिए हम सारे खतरे उठाकर भी लड़ेंगे’’ और ‘‘जिस सरकार ने यह इमरजेंसी लगायी है, उसे बदलकर रख देंगे’’। सीमित अर्थों में उनका उत्तर सही था, लेकिन मैं उससे संतुष्ट नहीं था। एक दिन मैंने उन्हें मुक्तिबोध की पूरी कविता सुनाकर पूछा कि इसमें जो ‘‘रक्तालोक स्नात-पुरुष’’ है, जिसे मुक्तिबोध ने ‘‘रहस्यमय व्यक्ति’’ कहा है, उसे ध्यान में रखते हुए बताइए कि कविता की इन पंक्तियों का क्या अर्थ है :

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है,
पूर्ण अवस्था वह
निज-संभावनाओं, निहित प्रभाओं, प्रतिभाओं की
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा।

पत्रकार मित्र बेचारे क्या बताते! मैं तीन दशकों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक रहा हूँ और मैंने हिंदी के कई प्रख्यात प्रोफेसरों तथा अग्रणी आलोचकों को इस कविता का अनर्थ करते देखा है। यहाँ कविता की व्याख्या करने का अवकाश नहीं है, इसलिए मैं संक्षेप में और संकेत में कहना चाहता हूँ कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल ‘‘बोलने की आजादी’’ या ‘‘प्रेस की आजादी’’ नहीं, कुछ और है। उसका वास्तविक अर्थ मनुष्य को अभी तक प्राप्त अभिव्यक्ति की क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि ‘‘अब तक न पायी गयी’’ अभिव्यक्ति की क्षमता के आधार पर ही समझा जा सकता है।

मेरे विचार से मुक्तिबोध यह कहना चाहते हैं कि मनुष्य अब तक अपनी संपूर्ण प्रगति और उन्नति के बावजूद पूर्ण मनुष्य नहीं बन पाया है, जबकि उसके जीवन का उद्देश्य पूर्ण मनुष्य बनना ही है। मनुष्यता की पूर्ण अवस्था वह है, जिसमें मनुष्य की अपनी संभावनाओं का, उसमें ‘‘निहित प्रभाओं, प्रतिभाओं’’ का ‘‘परिपूर्ण आविर्भाव’’ हो। जब तक ऐसा नहीं है, तब तक मनुष्य अपूर्ण है, आधा-अधूरा है, उसकी अभिव्यक्ति भी आधी-अधूरी है; क्योंकि वह अपूर्ण मनुष्य होने के कारण अपनी मनुष्यता की पूर्ण अभिव्यक्ति में सक्षम नहीं है। वर्तमान समाज और राज्य की व्यवस्था में मनुष्य को अभिव्यक्ति की जो क्षमता प्राप्त है, वह अपूर्ण है, अविकसित है। वह भविष्य की किसी बेहतर व्यवस्था में ही पूर्ण रूप से विकसित होगी। मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति में तभी स्वतंत्र होगा, जब वह पूर्ण मनुष्य बनकर अपनी ‘‘अब तक न पायी गयी अभिव्यक्ति’’ को प्राप्त कर लेगा।

इस प्रकार देखें, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है मनुष्य का मनुष्य होना और अपनी मनुष्यता को व्यक्त करने में सक्षम होना। लेकिन जो भूखा है, बीमार है, अशिक्षित है, बेरोजगार है, हर तरह से लाचार है और पशुओं का-सा जीवन जीता है, उसे आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दे भी दें, तो वह उसका क्या करेगा? वह स्वयं को व्यक्त करना चाहे और कर भी सके, तो क्या व्यक्त करेगा? कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे आदमी को देखते हैं, जो बेघर और बेरोजगार है, जो माँगकर या चुराकर या छीनकर या कूड़े-कचरे में से कुछ बीनकर खाता है। आप उसके पास जाते हैं और कहते हैं कि ‘‘तुझे बोलने की आजादी है, बोल, क्या बोलना है तुझे’’, तो वह क्या बोलेगा? बहुत मुमकिन है कि वह आपसे भीख माँगेगा और भीख न मिलने पर गंदी गालियों से आपको नवाजेगा।

दुर्भाग्य से हमारे देश में, और आज की पूरी दुनिया में भी, ऐसे ही अमानुषिक बना दिये गये लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसी अनुपात में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या मनुष्यता की अभिव्यक्ति सबसे कम है। जो मनुष्य पशुवत जीवन जी रहा है, वह अपनी मनुष्यता की अभिव्यक्ति कैसे करेगा? वह तो पशुता को ही व्यक्त करेगा। अतः उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने का अर्थ है पहले उसे पशु से मनुष्य बनाना और फिर उसे अपनी मनुष्यता की अभिव्यक्ति में सक्षम बनाते हुए पूर्ण मनुष्यता की ओर ले जाना। यह काम आज की पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था नहीं कर सकती, क्योंकि वही तो मनुष्यों को ऐसा अमानुषिक बनाती है। अतः यह हमारी, हम सबकी, जिम्मेदारी है। भाग्य, भगवान, सरकार या खुद उस अभागे पर यह जिम्मेदारी डालकर हम अपनी अभिव्यक्ति में स्वतंत्र होकर भी वास्तव में क्या व्यक्त करते हैं? कम से कम मनुष्यता तो नहीं ही!

दूसरी तरफ उन लोगों को देखें, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सबकी नहीं, सिर्फ अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में देखते हैं। उन्हें लगता है कि जो हम जैसा नहीं है, वह मनुष्य नहीं है। जो हमारे धर्म का, हमारी जाति का, हमारी पार्टी का या हमारे विचारों का नहीं है, वह कोई मानवेतर प्राणी है, जो हमारा शत्रु है, और हमारा यह अधिकार है कि हम उसे या तो अपने वश में करके अपना गुलाम या पालतू पशु बना लें, या उसे मार डालें। आजकल अपने देश में, और दूसरे तमाम देशों में भी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यही रूप होता जा रहा है और इसकी भयानकता बढ़ती ही जा रही है। इसे हम सरेआम बरती और फैलायी जाने वाली घृणा, असहिष्णुता, हिंसा, बर्बरता, आतंकवाद आदि के विभिन्न रूपों में रोज देखते हैं। ऐसे लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समझाना और उन्हें उनकी मनुष्यता की याद दिलाकर अमानुषिक कृत्यों से विरत करना भी हमारी, हम सबकी, जिम्मेदारी है। उन्हें मनुष्य बनाने की जिम्मेदारी हम उन व्यवस्थाओं पर नहीं डाल सकते, जो खुद ही उन्हें अमानुषिक, नृशंस और बर्बर बनाने के लिए जिम्मेदार हैं।

मेरे विचार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है स्वयं अपनी मनुष्यता को बचाते और बढ़ाते हुए दूसरों को मनुष्य बनाना। यह एक आदर्श है, किंतु असंभव आदर्श नहीं। खोजने चलें, तो हमें आज की घोर अमानुषिक परिस्थितियों में भी मनुष्यता के उदाहरण मिल जायेंगे। मसलन, आप उन लोगों को देखें, जो शिक्षित हैं, सुसंस्कृत हैं, सृजनशील हैं, सभ्य और शिष्ट हैं, उदार और सहिष्णु हैं और जो घर-बाहर दोनों जगह आजादी, बराबरी और भाईचारे के जनतांत्रिक मूल्यों के अनुसार आचरण करते हैं। ऐसे लोग दुर्लभ नहीं हैं। खोजने चलेंगे, तो आप पायेंगे कि आपके आसपास ही ऐसे अनेक लोग हैं, जो आपके धर्म, आपकी जाति या आपकी-सी राजनीति वाले न होकर भी आपको मनुष्य मानते हैं। आप पायेंगे कि वे आपसे अपनी भिन्नता के आधार पर आपको अपने वश में करके अपना गुलाम या पालतू पशु बनाना अथवा ऐसा न कर पाने पर आपको मार डालना कत्तई न चाहते होंगे। वे ‘‘सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट’’ की जगह सब मनुष्यों को समान मानकर ‘‘जियो और जीने दो’’ वाली बात में, ‘‘मारो-खाओ हाथ न आओ’’ की जगह ‘‘दुनिया को बेहतर बनाओ’’ वाली बात में और ‘‘सबसे बड़ा रुपैया’’ की जगह ‘‘प्रेेम से बढ़कर कुछ नहीं’’ वाली बात में विश्वास करते होंगे। वे दूसरों में दोष और बुराइयाँ ही नहीं, गुण और अच्छाइयाँ भी देखते होंगे। हर बुराई या खराबी के लिए समाज या सरकार को जिम्मेदार ठहराने की जगह कुछ बुराइयों और खराबियों के लिए खुद को भी जिम्मेदार मानते होंगे। वे समाज या राज्य की व्यवस्था को डंडे के जोर पर ठीक कर सकने वाले किसी तानाशाह को देश का शासक बनाने वाली बात की जगह जनतंत्र को सच्चा जनतंत्र बनाने तथा उसे बचाने-बढ़ाने वाली बात में विश्वास करते होंगे।

आप पायेंगे कि आपके आसपास ऐसे लोग हैं और वे कम नहीं हैं। विश्वास न हो, तो उन लोगों को देखें, जिन्हें अपने परिजनों से स्नेह और गुरुजनों से प्रोत्साहन मिला है। जिन्हें अच्छे मित्रों का साथ और सहयोग प्राप्त है। जिन्होंने प्रेम किया है और प्रेम पाया है। जो ज्ञान-विज्ञान में निपुण और साहित्य-संगीत आदि के प्रेमी हैं। जिनके विचार ऊँचे और सामाजिक सरोकार बड़े हैं। जो स्वहित के साथ सर्वहित के लिए भी सक्रिय रहते हैं। जो अपने भविष्य के साथ-साथ अपने पड़ोसियों और देशवासियों के भविष्य के बारे में भी सोचते हैं। जो स्वयं को पूर्ण मनुष्य बनाने के साथ-साथ दुनिया के सभी मनुष्यों को पूर्ण मनुष्य बनाने का स्वप्न देखते हैं और उस स्वप्न को साकार करने के लिए अभिव्यक्ति की जो भी और जैसी भी स्वतंत्रता उन्हें प्राप्त है, उसका सदुपयोग करते हैं।

ऐसे लोग बोलेंगे, तो क्या बोलेंगे? वे एक तरफ मनुष्यों को अमानुषिक बनाने वाली व्यवस्था की आलोचना करेंगे, तो दूसरी तरफ अमानुषिक बना दिये गये लोगों को याद दिलायेंगे कि तुम्हें तुम्हारी मनुष्यता से वंचित कर दिया गया है, या पूर्ण मनुष्य बनने से रोक दिया गया है, इसलिए इस व्यवस्था को बनाये रखने के बजाय इसे बदलो। इस दुनिया को एक बेहतर दुनिया बनाओ।

लेकिन स्थापित व्यवस्थाएँ, चाहे वे किसी भी देश की हों, ऐसी स्वतंत्र अभिव्यक्ति को अपने लिए खतरनाक मानती हैं और उसका दमन करती हैं। ऐसी स्वतंत्र अभिव्यक्ति से उनके वे सब मठ और गढ़ असुरक्षित हो जाते हैं, जिनमें बैठकर वे मनुष्यों को अमानुषिक, गुलाम या पालतू पशु बनाती हैं। वे उनकी रक्षा के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन और हनन और तेजी से करती हैं। इससे अभिव्यक्ति के लिए जो खतरे पैदा होते हैं, एक नहीं अनेक होते हैं। इसीलिए मुक्तिबोध ‘‘सारे खतरे’’ उठाने की बात करते हैं। स्थापित व्यवस्था के मठ और गढ़ भी अनेक और कई प्रकार के होते हैं। इसीलिए मुक्तिबोध उन ‘‘सब’’ को तोड़ने की बात करते हैं।
इस प्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है ऐसी बात बोलना, जिससे बोलने वाले की मनुष्यता व्यक्त होती हो और उसके साथ-साथ दुनिया के सभी मनुष्यों के लिए ‘‘अब तक न पायी गयी अभिव्यक्ति’’ को पाने की संभावना पैदा होती हो।

Sunday, March 15, 2015

'परिकथा' के नवलेखन अंक (जनवरी-फरवरी, 2015) में प्रकाशित कुछ कहानियों के संदर्भ में आज की हिंदी कहानी पर कुछ विचार


हिंदी कहानी में फिर एक नया बदलाव

रमेश उपाध्याय


दस साल पहले, 2005 में, मैंने एक लेख लिखा था ‘आगे की कहानी’, जो मेरी पुस्तक ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ (2008) में संकलित है। उसमें मैंने लिखा था :

देखते-देखते कहानी क्या, दुनिया ही बदल गयी। पूँजीवादी भूमंडलीकरण की प्रचंड आँधी पहले का बहुत कुछ उड़ा ले गयी। यहाँ तक कि सोवियत संघ जैसी ‘महाशक्ति’ भी उसमें ध्वस्त हो गयी और आत्मनिर्भरता की बात करने वाले हमारे देश में निजीकरण तथा उदारीकरण की तेज धूल भरी हवाएँ चलने लगीं, जिनके कारण समाजवाद का सपना तो धूमिल हुआ ही, जनवाद को भी बेकार बताने और बनाने के सिलसिले शुरू हो गये। ‘जनवादी कहानी’ साहित्य में ‘आउट ऑफ फैशन’ हो गयी और ‘जादुई यथार्थवाद’ का नया फैशन चल पड़ा।

ऐसा लगने लगा, जैसे कल तक जो सामाजिक यथार्थ कहानी में आ रहा था, वह किसी जादू के जोर से अचानक गायब हो गया हो! जैसे भूख, गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी, शोषण, दमन, उत्पीड़न आदि की समस्याएँ छूमंतर हो गयी हों! शोषक-उत्पीड़क पूँजीपतियों और भूस्वामियों को मानो आम माफी मिल गयी हो और वामपंथी-जनवादी लोग ही कटघरे में खड़े किये जाने लायक रह गये हों! कल तक हिंदी का जो कहानीकार प्रेमचंद, निराला और मुक्तिबोध के नाम जपता हुआ दबे-कुचले, सताये हुए मजदूरों, किसानों और मध्यवर्गीय मेहनतकश स्त्री-पुरुषों को क्रांति का हिरावल दस्ता समझता था, वह मानो गरीब ‘हिंदीवाला’ से अचानक अमीर अंग्रेजी वाला हो गया और किसी ऊँचे आसन पर बैठकर हिंदी के लेखकों पर हिकारत के साथ हँसने लगा। यथार्थ को समझने और बदलने से संबंधित गंभीर चिंताएँ मानो एकाएक ही बेमानी हो गयीं और खिलंदड़ापन ही सबसे बड़ा साहित्यिक मूल्य बन गया। हिंदी के बहुत-से कहानीकार एकदम पलटकर जनोन्मुख से अभिजनोन्मुख हो गये। वे अपनी कहानियों में अभिजनों की-सी भाषा बोलने लगे तथा अभिजनों के प्रिय विषयों पर चटपटी कहानियाँ लिखने लगे।

लेकिन अब लगता है कि हिंदी कहानी में फिर एक नया बदलाव आ रहा है, फिर से एक नयापन दिखायी दे रहा है। अनुभववादी और कलावादी फैशनों से हटकर यथार्थवादी कहानियाँ लिखी जा रही हैं। उनके पात्र स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि सभी तरह के हैं, लेकिन वे विमर्शवादी कहानियाँ नहीं हैं। उनमें से ज्यादातर कहानियाँ किसी न किसी बड़ी सामाजिक समस्या को उठाती हैं और उसके कारणों को इस प्रकार सामने लाती हैं कि पाठक उसके समाधान के बारे में सोचने को प्रेरित हों। ऐसी कहानियाँ अवसरवादी किस्म के तटस्थतावाद के विरुद्ध लेखकीय पक्षधरता के साथ सामाजिक अंतर्विरोधों को सामने लाती हैं। आज के नये कहानीकार अपनी कहानियों में प्रायः जाने-पहचाने विषयों और प्रश्नों को उठाते हैं, लेकिन नये संदर्भों में उन्हें नये-नये रूपों में सामने लाते हैं।

उदाहरण के लिए, ‘परिकथा’ के नवलेखन अंक (जनवरी-फरवरी, 2015) की कुछ कहानियों को देखा जा सकता है। ‘परिकथा’ कई वर्षों से नवलेखन अंक निकालती आ रही है और प्रस्तुत अंक के संपादकीय में लिखी गयी संपादक शंकर की इन बातों से शायद ही कोई असहमत होगा कि नये लेखकों को एक साथ मंच पर लाने का यह उपक्रम ‘‘एक दौर की रचनाशीलता को समझने-पहचानने’’ का, ‘‘अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों और उनके समानांतर लेखन-सृजन में उभर रही प्रवृत्तियों को साथ-साथ देखने-परखने’’ का, ‘‘मौजूदा परिस्थितियों में लेखन की सामाजिक भूमिका को समझने’’ का और नये लेखकों के लिए ‘‘आत्म-मंथन तथा आत्म-विश्लेषण’’ का भी उपयुक्त अवसर होता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए इस अंक की कहानियों को देखा जाये, तो कहानी की रचना और आलोचना में शायद कुछ कदम आगे बढ़ा जा सकता है।

इस अंक में नये लेखकों की बीस कहानियाँ हैं। सभी पर एक लेख में विचार करना संभव नहीं, इसलिए मैं केवल पाँच कहानियों की चर्चा करूँगा और इधर हिंदी कहानी में फिर से जो एक नया बदलाव आता दिख रहा है, उसे सामने लाने का प्रयत्न करूँगा।

पूस की एक और रात : गंगा सहाय मीणा
प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कहानी

अद्भुत संयोग है कि हाल ही में ‘पूस की एक और रात’ शीर्षक से हिंदी में दो कहानियाँ लिखी गयी हैं। एक लक्ष्मी शर्मा की, जो पिछले दिनों ‘कथादेश’ में आयी थी और दूसरी गंगा सहाय मीणा की, जो ‘परिकथा’ के प्रस्तुत नवलेखन अंक में प्रकाशित हुई है। यद्यपि दोनों कहानियों के विषय भिन्न हैं और शीर्षक के सिवा कोई और समानता उनमें नहीं है, तथापि एक ही समय में एक ही शीर्षक से दो कहानियों का लिखा जाना सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि हिंदी कहानी में एक नये विकास तथा प्रेमचंद की यथार्थवादी कथा-परंपरा को एक बार फिर दृढ़तापूर्वक अपनाकर आगे बढ़ाने के नये संकल्प की सूचना है। यहाँ दोनों कहानियों को साथ रखकर उन पर विचार करने का अवकाश नहीं है, इसलिए मैं गंगा सहाय मीणा की कहानी पर ही बात करूँगा।

यह कहानी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पूस की रात’ की याद दिलाती है, लेकिन यह उससे भिन्न बिलकुल आज के (इक्कीसवीं सदी के) भारत के ग्रामीण यथार्थ और किसान जीवन की और विशेष रूप से खेती-किसानी करने वाली स्त्रियों के कठिन जीवन की कहानी है। यह राजस्थान के एक जनजाति बहुल गाँव के जनजातीय किसान परिवार की कहानी है, जिसमें पिता की मृत्यु हो चुकी है, विधवा माँ बूढ़ी है, जिसके दो बेटों में से बड़ा हरकेश गाँव से दो सौ किलोमीटर दूर एक स्कूल में ‘शिक्षामित्र’ के रूप में काम करता है और उसका छोटा भाई बी.ए. करने के बाद जयपुर में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। हरकेश की युवा पत्नी भूरी तथा बूढ़ी माँ गाँव में खेती-बाड़ी सँभालती हैं। पहले खेतों की सिंचाई गाँव के तालाब और कुओं से होती थी और किसी किसान को पानी की किल्लत नहीं होती थी। लेकिन वर्तमान पूँजीवादी प्रपंच के चलते गाँव की परस्पर सहयोग वाली सामाजिक संरचना ध्वस्त हो गयी है, स्वार्थपरता पनप गयी है, जिसके कारण प्रकृति और पर्यावरण की भारी क्षति हुई है। तालाब का भरना बंद हो गया है, कुएँ सूख गये हैं और जमीन के अंदर गहराई तक बोरिंग करके निकाले गये पानी से खेतों को सींचने का नया चलन चल निकला है।

भारतीय कृषि व्यवस्था में पूँजीवाद के प्रसार ने प्रेमचंद के समय के भारतीय गाँवों को बिलकुल बदल दिया है। जब गाँवों में हमेशा भरे रहने वाले कुएँ हमेशा के लिए सूख गये, तो ‘‘बड़े किसानों ने बोरिंग करना शुरू किया। बोरिंग से सिंचाई महँगी हुई और मुश्किल भी। एक बोर करने में तीन-चार लाख तक का खर्च सामान्य था। उस पर बोर फेल होने का खतरा अलग। परिणाम यह हुआ कि बोर मालिकों ने दूसरे किसानों के खेतों में सिंचाई कर इस खर्च को निकालना शुरू कर दिया। गाँव में कुल मिलाकर आधा दर्जन ही बोर थे, इसलिए किसानों की भी मजबूरी थी उनसे महँगी रेट पर पानी लेने की। बोर मालिक दिन में अपने खेतों को भराते थे और रात में दूसरे किसानों को पानी देते।’’

कहानी यों है कि पूस का महीना है, जब हड्डियों तक को कँपा देने वाला जाड़ा पड़ता है। हरकेश गाँव से दो सौ किलोमीटर दूर अपनी नौकरी पर है और गाँव में उसके सरसों के खेत की भराई (सिंचाई) होनी है। उसकी पत्नी भूरी हफ्ते भर से कोशिश कर रही है कि बोर का मालिक रामजीलाल पटेल, जिसके साथ चार सौ रुपये प्रति घंटे की दर से पानी लेने का सौदा तय हो चुका है, उसके खेत के लिए पानी दे दे। आखिरकार भूरी की सरसों भराने की बारी आ जाती है और रामजीलाल मोबाइल पर ‘‘मिस कॉल करके’’ हरकेश मास्टर को बताता है कि आज रात आठ बजे उसका नंबर है। हरकेश मोबाइल पर गाँव में अपनी पत्नी और माँ से बात करता है कि सरसों आज ही भरा ली जाये। सास बूढ़ी है और भूरी अकेली यह काम कर नहीं सकती, इसलिए तीन सौ रुपये में आधी रात के लिए एक मजूर तय कर लेती है। आठ बजे से पहले वह अपने दोनों बच्चों को खाना खिलाकर सुला देती है और सास तथा मजूर के साथ एक टॉर्च और गैस लेकर खेत पर चली जाती है। भयंकर शीत की रात में वह अपने खेत की सिंचाई करती है। बोर से खेत तक आने वाले पानी के पाइप के टूट जाने पर वह अपने ओढ़े हुए शॉल को ही टूटे हुए पाइप में बाँधकर उसकी मरम्मत करती है। इस प्रक्रिया में वह शीत की रात में पानी की बौछारों में भीग भी जाती है। फिर भी वह पूरे धीरज और परिश्रम के साथ अपना काम पूरा करती है।

गंगा सहाय मीणा अगर चाहते, तो विगत बीसेक वर्षों से हिंदी कहानी में चल रही चीजों की तर्ज पर इस कहानी को एक जनजाति से संबंधित और पति से दूर गाँव में अकेली रहने वाली स्त्री की कहानी के रूप में लिखकर मजे में जातिवादी या देहवादी किस्म की कहानी बना सकते थे, लेकिन उन्होंने इसे परिवार और खेती को अकेले अपने दम पर सँभालने वाली एक किसान स्त्री की कहानी के रूप में लिखकर सचेत रूप से प्रेमचंद की यथार्थवादी कथा-परंपरा को आगे बढ़ाने का नया प्रयास किया है। कहानी का शीर्षक प्रेमचंद के समय के किसान जीवन के यथार्थ की याद दिलाता है, लेकिन वे कहानी के पहले ही वाक्य में कहानी का ‘काल’ स्पष्ट रूप से बताकर (कि यह ‘‘इक्कीसवीं सदी का पहला दशक बीत जाने के बाद के एक बरस के पूस के महीने’’ की कहानी है) पाठक को सचेत कर देते हैं कि यह हमारे बिलकुल आज के समय के यथार्थ की कहानी है। यह समय निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण का समय है, जिसमें गाँव का और किसान जीवन का यथार्थ बिलकुल बदल गया है।

यह एक नया यथार्थ है। ग्रामीण जीवन और कृषि कर्म में कई नयी चीजें आ गयी हैं। जनजाति बहुल गाँव के लड़के खेती-किसानी पर निर्भर न रहकर पढ़-लिख रहे हैं और पढ़ा भी रहे हैं। वे गाँव से दूर जाकर नौकरियाँ कर रहे हैं, उच्च शिक्षा पाकर परीक्षाएँ दे रहे हैं और ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँच रहे हैं। गाँव में पीछे छूटा उनका परिवार भी अब ज्यादा दिन वहाँ नहीं रहने वाला है, क्योंकि देहाती जीवन और कृषि कर्म में उच्च तकनीक वाली बड़ी पूँजी के प्रवेश ने छोटे किसानों का खेती पर निर्भर रहना मुश्किल कर दिया है। पूँजी ने देहाती लोगों को स्वार्थी बना दिया है, जिससे प्रकृति और पर्यावरण का नाश हो गया है। प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट हो जाने से किसान नयी तकनीक से खेती करने को विवश है और नयी तकनीक के तार बड़ी भूमंडलीय पूँजी से जुड़े हैं। एक छोटे-से खेत को सींचने के लिए चार सौ रुपये प्रति घंटे की दर से पानी लेना पड़ता है और तीन सौ रुपये में आधी रात के लिए मजदूर करना पड़ता है। कहानी में मोबाइल फोन की भूमिका और ‘‘मिस कॉल’’ वाला व्यंग्य भी गौर करने लायक है। इतनी महँगी खेती के लिए जरूरी है कि किसान अपने लिए अन्न पैदा करने के बजाय बाजार के लिए नकदी फसलें उगाये। (कहानी में भूरी का खेत भी नकदी फसल सरसों का खेत है।) लेकिन जाहिर है कि यह पूँजीवादी विकास ‘सस्टेनेबल’ (टिकाऊ) नहीं है और इसमें छोटे किसान को बर्बाद होना ही है, चाहे वह कर्जदार होकर आत्महत्या करे या खेती और गाँव छोड़कर कहीं और चला जाये, कोई और पेशा अपनाये।

यह कहानी आज के इसी बदले हुए यथार्थ को सामने लाती है। लेकिन इस बदले हुए यथार्थ के दो पहलू हैं--किसानों के कष्टों और आत्महत्या के प्रयासों वाला निराशाजनक पहलू और गैर-टिकाऊ खेती से जुड़ा ग्रामीण जीवन जीते रहने के बजाय शिक्षित होकर कोई वैकल्पिक और बेहतर जीवन जीने के प्रयासों वाला आशाजनक पहलू। इस कहानी में बदलते हुए यथार्थ के आशाजनक पहलू को सामने लाया गया है। भूरी का जीवन हमेशा ऐसा ही रहने वाला नहीं है। उसका पति पढ़-लिखकर पढ़ाने लगा है, उसका देवर ऊँचे पद पर पहुँचने के लिए तैयारी कर रहा है, उसके बच्चे भी पढ़-लिख जायेंगे, तो गाँव में न रहकर बाहर चले जायेंगे। यह भी हो सकता है कि वे ‘लोकल’ न रहकर ‘ग्लोबल’ हो जायें।

इस प्रकार यह कहानी ठेठ भारतीय यथार्थ की कहानी होते हुए भी आज के भूमंडलीय यथार्थ की कहानी है और इसका यथार्थवाद प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाने वाला भूमंडलीय यथार्थवाद है।

तस्वीर के पीछे : प्रज्ञा
पितृसत्ता के पीछे छिपी अर्थव्यवस्था की कहानी

विगत बीसेक वर्षों में दलित विमर्श की भाँति स्त्री विमर्श की कहानियाँ भी हिंदी में खूब लिखी गयीं। दलित लेखन की तर्ज पर स्त्री लेखन की भी एक अलग कोटि बना ली गयी और शेष साहित्य से उसे अलगाकर देखा गया। जिस प्रकार दलित लेखन ब्राह्मणवाद के बजाय सवर्णों के विरुद्ध विद्रोह का लेखन था, उसी प्रकार स्त्री लेखन पितृसत्तावाद के बजाय पुरुषों के विरुद्ध विद्रोह का लेखन बन गया। जिस प्रकार दलित लेखन में जाति सर्वप्रमुख रही, उसी प्रकार स्त्री लेखन में देह सर्वप्रमुख रही। लेकिन दोनों प्रकार के लेखन की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि ब्राह्मणवाद और पितृसत्तावाद को सामाजिक समस्याओं के रूप में न देखकर मनोवैज्ञानिक समस्याओं के रूप में देखा गया। दलित लेखन में यह मान्यता प्रचलित रही कि जब तक सवर्णों की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक दलितों के प्रति अन्याय होता रहेगा। स्त्री लेखन में यह माना जाता रहा कि जब तक पुरुषों की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक स्त्रियों पर अत्याचार होता रहेगा।

इस मान्यता के मुताबिक मानसिकता को बदलने का उपाय यह माना गया कि दलितों के द्वारा सवर्णों के प्रति और स्त्रियों के द्वारा पुरुषों के प्रति घृणा का प्रचार किया जाये। यह नहीं देखा गया कि समाज की व्यवस्था को बदले बिना लोगों की मानसिकता को नहीं बदला जा सकता। समाज की व्यवस्था को बदलने के लिए जाति और लिंग के आधार पर किये जाने वाले शोषण को समाप्त करना, शोषण को समाप्त करने के लिए वर्गों में बँटी समाज व्यवस्था को बदलना और उसे बदलने के लिए जाति, धर्म, लिंग आदि के भेद भुलाकर वर्गीय शोषण के खिलाफ लड़ना जरूरी है। यह बात प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार शुरू से कहते आ रहे थे, लेकिन दलित और स्त्री लेखकों ने इसे अनसुना तो किया ही, इसका विरोध भी यह कहते हुए किया कि वर्गभेद को समाप्त करने से पहले जातिभेद और लिंगभेद को समाप्त करना जरूरी है और इसके लिए समाज की व्यवस्था से पहले सवर्णों तथा पुरुषों की मानसिकता को बदलना जरूरी है। इस प्रकार उनका लेखन यथार्थ को बदलने के बजाय यथास्थिति को बनाये रखने वाला लेखन बन गया।

लेकिन इधर की कहानियों में दलितों और स्त्रियों के लेखन में एक बदलाव दिखायी दे रहा है। उदाहरण के लिए, ‘परिकथा’ के प्रस्तुत अंक में प्रज्ञा की कहानी ‘तस्वीर के पीछे’ में स्त्री के प्रति होने वाले अन्याय और अत्याचार को पुरुष मानसिकता से जोड़कर नहीं, बल्कि स्त्री की कमजोर आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखा गया है। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, यह प्रत्यक्ष दिखायी देते यथार्थ के पीछे छिपे यथार्थ को सामने लाने वाली कहानी है।

प्रत्यक्ष दिखायी देता यथार्थ यह है कि कहानी की प्रमुख पात्र रानी रूप और गुणों की खान है। वह स्वयं को प्यार करने वाली चाची के परिवार और नाते-रिश्ते के लोगों के बीच सदा हँसती-खिलखिलाती और पूरी मुस्तैदी से, कुशलतापूर्वक तथा हँसते-हँसते काम में जुटी रहती है, जिससे लगता है कि वह एक सुखी और संतुष्ट स्त्री है। लेकिन उसका जीवन दुख भरी कथा है। छोटी उम्र में ही माँ का साया सिर से उठ गया था। पिता और दो अविवाहित भाइयों के खाने-पीने और घर की व्यवस्था का दायित्व उसके जिम्मे आ गया था। पिता ने उसकी पढ़ाई को व्यर्थ समझकर दसवीं के बाद ही स्कूल छुड़ा दिया, कई वर्षों तक विवाह के बाद की जिम्मेदारियों को सँभालने लायक और सिलाई-बुनाई जैसे कामों में पारंगत बनाने के नाम पर उसे घरेलू नौकरानी बनाये रखा और उसके बाद कम खर्च में उसके विवाह की जिम्मेदारी का बोझ सिर से उतारने के लिए उसका विवाह एक कम पढ़े-लिखे, काफी बड़ी उम्र के, कुरूप और क्रूर व्यक्ति से कर दिया।

शादी से पहले पिता शक करते थे कि रानी किसी के संग भाग न जाये, शादी के बाद रूप-गुण में रानी से हीन पति उस पर शक करने लगा। वह उस पर पहरा बिठाने लगा, बात-बात पर उसे नीचा दिखाने लगा, उसे मारने-पीटने लगा। एक बार मार-पीट के बाद रानी को प्यार करने वाली चाची उसके फोन करने पर उसे अपने साथ ले आयी, तो रानी के सगे भाई अपनी बहन को बहनोई के अत्याचार से बचाने के लिए स्वयं कुछ करने के बजाय चाची से ही लड़ने आ गये कि ‘‘आप क्यों हमारी बहन का घर तुड़वाने पर तुली हैं?’’ रानी कोई चारा न देख पति के पास लौट गयी और उसके सारे अत्याचार सहते हुए अपने बच्चों (एक बेटा, एक बेटी) को प्यार से पालने लगी। उसने तमाम दुखों और कष्टों में भी हँसते-हँसते जीने का पाठ पढ़ लिया कि ‘‘जब कोई रास्ता नहीं है और सब सहना ही है, तो खुश दिखकर ही सह लो सब।’’

लेकिन जब उसने देखा कि उसका पति बेटे को तो प्यार करता है, बेटी को प्यार नहीं करता, बल्कि बेटी को खिलाने-पिलाने और पढ़ाने-लिखाने पर होने वाले खर्च पर कुढ़ा करता है, तो उसने ठान लिया कि वह स्वयं अपने सपनों का जो जीवन नहीं जी पायी, वह जीवन उसकी बच्ची जिये। इसके लिए वह पति से छिपाकर भी अपनी बेटी की सारी इच्छाएँ पूरी करती है। उसका पति चाहता है कि बेटी को पढ़ाने-लिखाने के बजाय वह ‘‘उसे अपनी तरह सीना-पिरोना ही सिखा दे।’’ लेकिन रानी अपनी बच्ची को स्कूल भेजने के साथ-साथ कंप्यूटर, डांस और टाइक्वांडो भी सीखने के लिए भेजती है। बेटी रुचिका जब स्कूल में फुटबॉल टीम की कप्तान चुनी जाती है, तो रानी के पति को यह बात इतनी अखर जाती है कि वह खराब खाना बनाने का दोष मढ़कर गुस्से में थाली रानी पर दे मारता है।

ऐसे अत्याचारों को सहते-सहते रानी जब बीमार हो जाती है, तो उसका पति अपना खर्च बचाने के लिए उचित ढंग से उसका इलाज नहीं कराता। वह रानी को अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूँक करने वाले ओझा को घर बुलाकर अपना खर्च बचाने का जतन करता है। रानी की हालत बिगड़ती जाती है और एक दिन रुचिका रानी की स्नेहमयी चाची को फोन करती है, ‘‘नानी, तुरंत आ जाओ, मम्मी आपको बुला रही हैं।’’ चाची आती हैं, तो रानी अपनी बेटी रुचिका को उन्हें सौंप देती है। चाची को आश्चर्य होता है कि रानी का पति ऐसा कैसे होने देगा। लेकिन रानी बताती है कि उसके पति को बेटी की कोई परवाह नहीं है। वह तो बेटी के बारे में कहता है, ‘‘नौकरी करूँगा या लड़की जात को सँभालूँगा? और कुछ जिम्मेदारी तो तेरे घर की भी बनती है आखिर?’’ लेकिन अपने बेटे को अपने पास रखने में उसे कोई ऐतराज नहीं है, क्योंकि बेटा उसके लिए लाभदायक है।

रानी शुरू से जानती है कि पुरुषों की मानसिकता को नहीं बदला जा सकता, क्योंकि वह मानसिकता आर्थिक हानि-लाभ से जुड़ी है। बेटी को पढ़ाना-लिखाना हानिकर है, उसे मुफ्त की घरेलू नौकरानी बनाकर उससे काम लेना लाभकर। इसी तरह बेटे को अपने पास रखने में फायदा है, जबकि बेटी की जिम्मेदारी दूसरों पर डाल देने में फायदा है। रानी पहले अपने पिता और भाइयों की और बाद में अपने पति की इस अपरिवर्तनीय मानसिकता को जानने के कारण उसे बदलने का प्रयास नहीं करती, लेकिन अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनाकर पति के परिवार की व्यवस्था को ही बदल देती है।

कहने की जरूरत नहीं कि प्रज्ञा की यह कहानी एक स्त्री के द्वारा स्त्री के बारे में लिखी हुई होने पर भी चालू स्त्री विमर्श से बिलकुल हटकर लिखी गयी कहानी है। इस कहानी की नवीनता और खूबसूरती इसका यथार्थवाद है। प्रगतिशील-जनवादी कहानी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला यथार्थवाद। इसी यथार्थवाद के जरिये प्रज्ञा नितांत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शोषित-उत्पीड़ित व्यक्ति को साहसपूर्वक जीते और समझौते के बजाय संघर्ष करते हुए दिखाती हैं। कहानी की खूबी यह है कि रानी बाहर से समझौते कर चुकी स्त्री दिखती है, लेकिन भीतर से वह एक मजबूत संघर्षशील स्त्री है।

जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है : सत्यम सत्येंद्र पांडेय
दलित प्रश्न को सांप्रदायिकता से जोड़कर दिखाने वाली कहानी

सत्यम सत्येंद्र पांडेय की कहानी ‘जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है’ दलितों के अपमान की तथा उनके साथ होने वाले सामाजिक अन्याय और उनके जनतांत्रिक अधिकारों के सार्वजनिक रूप से किये जाने वाले हनन की समस्या को एक नये रूप में सामने लाती है।

कहानी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के सांप्रदायिक तनाव, दंगे और शहर में कर्फ्यू लग जाने की खबर से शुरू होती है। कॉलेज में पढ़ने वाला एक दलित युवक राजकुमार अपनी मोटरसाइकिल पर कॉलेज जाने के लिए निकलता है कि शहर की तरफ से बदहवास लौटते उसके एक पड़ोसी उसे शहर में कर्फ्यू लग जाने की खबर देते हैं। मिडिल स्कूल में उसके सहपाठी रहे उसके ये पड़ोसी, जो आठवीं में दूसरी बार फेल होने पर पढ़ाई से तौबा कर चुके थे, कई धंधे चलाकर उनमें असफल हो चुके हैं और अब धर्म रक्षा मिशन के फुलटाइम कार्यकर्ता हैं। राजकुमार उनसे दंगे का कारण पूछता है, तो पाता है कि दंगा हिंदू हुड़दंगियों की वजह से हुआ। वह हुड़दंगियों को गलत बताता है, तो धर्मरक्षक कहते हैं, ‘‘अबे, तुम जैसों के कारण ही तो इन मुसल्लों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं। साले तुम हिंदू होकर भी ऐसी बात करते हो, शर्म नहीं आती तुम्हें?’’

जवाब में दलित युवक राजकुमार कहता है, ‘‘अरे काहे का हिंदू, कैसी शर्म? अपने घर में तो पानी नहीं दे सकते, मंदिर में घुसने नहीं देते। उस समय क्यों नहीं हिंदू मानते हमको?’’

धर्मरक्षक राजकुमार को उसके जाति के नाम से गाली देते-देते रुक जाते हैं, क्योंकि ‘‘जब से हरिजन एक्ट और हरिजन थाने प्रकट हुए हैं, ये पसंदीदा शब्द मुँह से निकालने में डर लगता है।’’ तभी राजकुमार देखता है कि कॉलेज में उसकी सहपाठी दीपाली, जो उसके पड़ोसी पंडित रामधन की पाँच संतानों में सबसे छोटी है, कॉलेज जाने के लिए ऑटोरिक्शा में सवार हो रही है। राजकुमार उसे रोकता है और उससे दो मिनट बात करके उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर नर्मदा नदी के भेड़ाघाट की ओर चल देता है। धर्मरक्षक धर्म की रक्षा के लिए मोबाइल पर दीपाली के भाइयों को इसकी सूचना दे देते हैं। 

ट्रैक्टर से खेतों की जुताई करके लौटते दीपाली के तीन भाइयों को यह सूचना मिलती है, तो वे ‘‘प्रेम से परिपूर्ण सुखद भविष्य की योजनाएँ बनाते हुए’’ चले जा रहे राजकुमार और दीपाली का रास्ता रोक लेते हैं। वे अनिष्ट के भय से काँपती बहन के सामने ही राजकुमार को लात-घूँसों से पीटने लगते हैं और गालियाँ देते हुए पूछने लगते हैं, ‘‘अब मिलेगा दीपाली से? बिठायेगा कभी मोटरसाइकिल पर?’’ राजकुमार एक नजर दीपाली पर डालता है और अपने प्रेम की शक्ति को संचित करते हुए कहता है, ‘‘हाँ, मिलूँगा। जरूर मिलूँगा।’’ उससे बार-बार यही सवाल पूछा जाता है और वह बार-बार यही जवाब देता है, तो तीनों भाई उसे और पीटते हैं। लेकिन जब वे देखते हैं कि चारों तरफ भीड़ इकट्ठी हो गयी है, तो बहन की बदनामी के डर से दीपाली का नाम लेना तो बंद कर देते हैं, लेकिन राजकुमार को ट्रैक्टर से बाँधकर घसीटते हुए नर्मदा के पुल की ओर चल देते हैं। घिसटते हुए राजकुमार की मर्मांतक चीखों के साथ टैªक्टर पुल पार करता है, जिस पर उसके खून की पट्टी बन जाती है। दीपाली भाइयों की तवज्जो अपनी ओर न देख पुल पर से नदी में छलाँग लगाकर आत्महत्या कर लेती है।

यह दृश्य जितना भयानक है, उससे भी अधिक भयानक यह है कि हजारों लोगों के सामने दिनदहाड़े एक युवक को ट्रैक्टर से बाँधकर घसीटा और मार डाला जाता है, एक युवती इस अन्याय को सह न पाने के कारण आत्महत्या कर लेती है, लेकिन हजारों की वह भीड़ पूरी तरह खामोश होकर इस दृश्य को देखती रहती है, जबकि यहाँ कोई कर्फ्यू नहीं लगा है।

यह कहानी दलित प्रश्न को बड़ी शिद्दत से उठाती है, लेकिन चालू दलित विमर्श की कहानियों से भिन्न है। यह केवल सवर्णों और दलितों के बीच के अंतर्विरोध की बात नहीं करती। इसका नयापन यह है कि यह कहानी सामाजिक अन्याय को सांप्रदायिकता की समस्या से जोड़कर देखती है और इन दोनों के बने रहने तथा बढ़ते जाने के कारणों को लोगों में सामाजिक चेतना के अभाव तथा उनकी राजनीतिक हस्तक्षेप न करने वाली निष्क्रियता में खोजती है, जिसके शिकार वे दलित भी हैं, जो सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक शक्तियों से हाथ मिला लेते हैं। कहानी में जो भीड़ चुपचाप तमाशा देख रही है, क्या उसमें सब सवर्ण ही होंगे? उस नौजवान की अपनी बिरादरी के लोग न होंगे? अवश्य होंगे, लेकिन वे अन्याय होते देखकर भी मूक दर्शक बने रहते हैं, उसका विरोध और प्रतिरोध नहीं करते।

इस प्रकार यह कहानी आज के इस बृहत्तर यथार्थ की ओर संकेत करती है कि हमारे समाज में ही नहीं, समूचे देश और विश्व में हिंसा और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन में बढ़ोतरी हो रही है। युद्धों के रूप में, धर्म के नाम पर की जाने वाली आतंकवादी कार्रवाई के रूप में, राज्य द्वारा की जाने वाली जन-दमनकारी हिंसा के रूप में हम उसे नित्यप्रति देखते हैं, लेकिन चुपचाप, निष्क्रिय होकर देखते रहते हैं। जबकि हिंसा किसी के भी द्वारा किसी के भी प्रति की जा रही हो, उसके विरुद्ध नागरिक अथवा जन-हस्तक्षेप होना ही चाहिए। यह तभी हो सकता है, जब लोगों में सामाजिक चेतना हो और हिंसा के विरुद्ध राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाली सक्रियता हो। मगर वर्तमान व्यवस्था इस प्रकार की चेतना और सक्रियता को कुंद करने के लिए धर्म का सहारा लेती है और इसके लिए इस कहानी के धर्मरक्षक जैसे लोगों का इस्तेमाल करती है।

शहर में जो सांप्रदायिक दंगा हुआ है, वह धर्मरक्षक जैसे लोगों के ही कारण हुआ है। धर्मरक्षक स्वयं भी देशी कट्टा जेब में रखकर वहाँ मुसलमानों को मारने जाता है, लेकिन कर्फ्यू लग जाने के कारण पुलिस द्वारा खदेड़ दिया जाता है। राजकुमार उससे मजाक करता है, ‘‘तो टपका देते दो-तीन पुलिस वालों को ही।’’ तो वह कहता है, ‘‘पुलिस में कौन रहता है बे, सब अपनी ही तरफ के लोग न? काहे मारें उनको?’’ वही धर्मरक्षक जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है, वहाँ ब्राह्मण दीपाली से प्रेम करने वाले चमार राजकुमार को मारने के लिए दीपाली के भाइयों को बुलाता है। अर्थात् दोनों जगह हो रही हिंसा में धर्मरक्षक या उस जैसे लोगों का ही हाथ है। इस दृष्टि से देखें, तो कहानी का धर्मरक्षक नामक चरित्र बहुत महत्त्वपूर्ण और कहानी का शीर्षक बहुत अर्थपूर्ण हो जाता है।


कबीर का मोहल्ला : मज्कूर आलम
जानी-पहचानी चीजों को नये अंदाज में प्रस्तुत करने वाली कहानी

आज के नये लेखक सांप्रदायिकता की समस्या पर नये ढंग से सोचते हैं और उस पर कुछ नये ढंग की कहानी लिखने का प्रयास करते हैं। इसके चलते आज की कहानी में कई बार कुछ नये प्रयोग किये जाते दिखायी देते हैं। उदाहरण के लिए, मज्कूर आलम की कहानी ‘कबीर का मोहल्ला’ को देखा जा सकता है। यह कहानी अत्यंत जानी-पहचानी और बार-बार पढ़ी-सुनी चीजों को एक नये अंदाज में, एक नयी तरतीब देकर पेश करती है और सांप्रदायिक वैमनस्य के विरुद्ध सद्भाव का संदेश देती है।

कबीर के बारे में किंवदंती है कि हिंदू उन्हें हिंदू मानते थे और मुसलमान मुसलमान। इसलिए जब कबीर की मृत्यु हुई, तो हिंदुओं ने कहा कि वे उनकी चिता जलायेंगे और मुसलमानों ने कहा कि वे उनकी कब्र बनायेंगे। लेकिन दोनांे की मंशा पूरी न हुई, क्योंकि कबीर की लाश फूलों में बदल गयी। यह किंवदंती स्वयं ही सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है। मज्कूर आलम ने इसी का इस्तेमाल करते हुए कहानी में एक नया प्रयोग किया है।

एक मोहल्ला है, जिसमें गली की एक तरफ हिंदू रहते हैं और दूसरी तरफ मुसलमान। यह सांप्रदायिकता पर लिखी जाने वाली कहानियों की एक चिर-परिचित स्थिति है और भारत के कई शहरों-कस्बों की हकीकत भी। कहानीकार भी कहता है कि ‘‘यह जैसा मोहल्ला है, वैसे मोहल्ले गंगा-जमुनी तहजीब वाले वतन के कई शहरों में आपको देखने को मिल जायेंगे।’’ ऐसे मोहल्लों में सांप्रदायिक तनाव तो रहता ही है, इसलिए ‘‘चार-पाँच साल में यहाँ दंगे हो ही जाते हैं।’’ लेकिन ‘‘कमाल की बात है कि तमाम तनावों के बाद भी गली की दोनों तरफ के बीच रिश्ते की डोर भी उतनी ही मजबूत और यकीनी है।’’

ऐसे मोहल्ले में एक दिन एक बच्चा कहीं से चला आया। लोगों से उसका नाम पूछा, तो तोतली भाषा में उसने जो बताया, किसी की समझ में न आया। मोहल्ले के लोगों ने उसे आश्रय दे दिया और वह अलग-अलग दिन अलग-अलग परिवार के साथ रहने लगा। लोगों ने उसे छोटू कहना शुरू कर दिया। बच्चा बड़ा होता गया, लेकिन वह कौन है, कहाँ से आया है, उसकी जाति और धर्म क्या है, कुछ भी पता नहीं चला। ‘‘जब वह थोड़ा बड़ा हुआ, तो मोहल्ले वालों ने ही नीम के पेड़ के नीचे उसके रहने की व्यवस्था कर दी। उसके फूस के छप्पर के ऊपर ही मोहल्ले के नाम का बैनर भी लगा दिया--कबीरगंज।’’ उस बैनर के चलते उस लड़के का नाम कबीर पड़ गया। वह किस जात-मजहब का है, यह तो उसे तब भी नहीं पता था, जब यहाँ आया था और अब वह जानना भी नहीं चाहता था, क्योंकि वह भीख माँगकर गुजारा करता था। यदि वह किसी एक धर्म का हो जाता, तो ‘‘धर्म उसके कर्म के मार्ग की बाधा’’ बन जाता, जबकि किसी भी धर्म का न होने से उसे हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई सभी धर्मस्थलों के बाहर खड़े होकर भीख माँगने की सुविधा थी। वह किसी धर्म का नहीं था, ‘‘शायद यही वजह थी कि वह गली के दोनों तरफ दुलारा था।’’ जब कोई सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली घटना हो जाती, तो लोग एक-दूसरे पर शक करते, लेकिन कबीर पर कभी शक न करते।

कहानी उस रात की है, जब भयंकर बारिश हो रही थी और बर्फ पड़ रही थी। कबीर जिस पेड़ के नीचे सोता था, उसके नीचे एक साँड़ बारिश और बर्फ से बचने के लिए आ खड़ा हुआ। संयोग से उसी पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता था, जो बर्फबारी के कारण टूट गया और इससे गुस्सायी मधुमक्खियों ने कबीर और साँड़ दोनांे पर हमला बोल दिया। उनके हमले से बचने के लिए दोनों भागे, लेकिन अँधेरे में दोनों एक नाले में जा गिरे। साँड़ का एक सींग कबीर के पेट में घुस जाने से कबीर की और नाले में गिर जाने से साँड़ की मौत हो गयी। मरने से पहले दोनों चिल्लाये। साँड़ के रँभाने और कबीर के चीखने की दर्द भरी आवाजें मोहल्ले के लोगों ने सुनीं, तो हिंदुओं ने समझा कि मुसलमानों ने किसी गाय को मार डाला है और मुसलमानों ने समझा कि हिंदुओं ने किसी मुसलमान को। बस, अनुमान के आधार पर ही दोनों तरफ सांप्रदायिक तनाव फैल गया और एक तरफ से ‘‘हर-हर महादेव’’ के और दूसरी तरफ से ‘‘अल्लाहो अकबर’’ के नारे लगने लगे। दंगे की आशंका से पुलिस आ पहुँची। तब तक बारिश बंद हो चुकी थी और सुबह भी हो चुकी थी। पुलिस की जीप आयी देख घरों में छिपे डरे-सहमे लोग निकल पड़े। लेकिन उन्होंने देखा कि पुलिस की जीप नाले के पास खड़ी है, जहाँ कबीर और साँड़ दोनों मधुमक्खियों के काटने और उनसे बचने के प्रयास में नाले में गिर जाने के कारण मारे गये हैं।

कहानी में घटना का वर्णन इस प्रकार पूरा किया जाता है कि ‘‘लाश का पंचनामा कर इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट तैयार करने के बाद पुलिस ने लोगों से पूछा कि इसका कोई अपना है, जो अंतिम संस्कार कर सके। दोनों तरफ के लोग आगे आ गये ...हाँ, हम करेंगे इसका अंतिम संस्कार...पूरा मोहल्ला है इसका...इसके बाद दोनों तरफ के लोगों में एक बार फिर कमान खिंच गयी कि शव को दफनाया जाये कि लाश को जलाया जाये...दोनों तरफ के लोग एक बार फिर से बाँहें फड़काने लगे थे, लेकिन आज कबीर की लाश फूलों में तब्दील नहीं हुई।’’

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इसके बाद कहानी में एक ‘उत्तर कथा’ भी है, जो कहानी लेखन में एक नया प्रयोग है। यह प्रयोग आज के मीडिया और सोशल मीडिया के द्वारा बड़े पैमाने पर फैलायी जाने वाली सांप्रदायिकता का, लेकिन लोगों में मौजूद आपसी सद्भाव का यथार्थ सामने लाने के लिए किया गया है। सांप्रदायिकता की आग भड़काने वाले तत्त्व इस घटना के काल्पनिक वीडियो बनाते हैं, जिनमें दिखाया जाता है कि कैसे मुसलमानों ने एक गाय की हत्या कर दी और कैसे हिंदुओं ने एक मुसलमान लड़के को मार डाला। ये वीडियो आननफानन सोशल साइट्स पर वायरल हो जाते हैं और उन्हें देखकर देश में कई जगह सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठती है। यह सच्चाई सामने आ जाने पर भी कि साँड़ और कबीर की मौत मधुमक्खियों के काटने से हुई है, मीडिया में मनगढ़ंत ‘समाचार’ और ‘कार्यक्रम’ दिखाये जाते रहते हैं, जो देशी मीडिया से चलकर विदेशी मीडिया तक में जा पहुँचते हैं। सांप्रदायिक तनाव लंबे समय तक बना रहता है।

कहानी का अंत इस प्रकार किया जाता है कि एक साल बाद ‘‘कबीर की पुण्यतिथि पर मोहल्ले वालों ने एक बार फिर इस अहद को दोहराया कि वे हर समस्या का हल आपस में मिल-बैठकर करेंगे, किसी के बहकावे में नहीं आयेंगे।’’

मीडिया की कार्यप्रणाली को व्यंग्यात्मक रूप में दिखाते हुए जो प्रयोग कहानी में किया गया है, वह सांप्रदायिक राजनीति, बाजारवादी मीडिया तथा उसके द्वारा फैलाये जाने वाले तनावों और दंगों को रोकने में अक्षम विधि-व्यवस्था के यथार्थ को एक नये रूप में सामने लाता है।

भोला बबवा के पैर : प्रमोद राय
‘फुटलूज लेबर’ के यथार्थ को सामने लाने वाली कहानी

अनुभववादी और कलावादी किस्म की हिंदी कहानियों में चित्रित पात्र या तो केवल अपने तन, मन और निजी जीवन में व्यस्त लोग होते हैं, या ऐसे लोग, जिनकी कोई सामाजिक पहचान ही नहीं होती। या फिर वे स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि होते हैं, जिनकी पहचान केवल लिंग, जाति या धर्म से होती है। ऐसे पात्रों की कहानियाँ पढ़कर लगता है कि जैसे कहानीकारों ने अमीर-गरीब या मालिक-मजदूर जैसी वर्गीय स्थितियों वाले पात्रों के यथार्थ-चित्रण को सर्वथा अनावश्यक मान लिया हो। शायद इसका एक कारण विगत बीसेक वर्षों की कहानी समीक्षा भी है, जो अनुभववाद और कलावाद पर जोर देती है। वह कहानी में विचारधारा, पक्षधरता और प्रतिबद्धता को पुरानी और गैर-जरूरी चीज ही नहीं, बल्कि साहित्य के लिए हानिकारक चीज भी मानकर चलती है। शायद यही कारण है कि इधर की हिंदी कहानी में किसानों, मजदूरों और छोटे-मोटे काम-धंधे करने वाले गरीब श्रमजीवी लोगों के जीवन के यथार्थ को सामने लाने वाले चरित्र दुर्लभ हो गये हैं। 

इस दृष्टि से ‘परिकथा’ में प्रस्तुत अंक में प्रकाशित प्रमोद राय की ‘भोला बबवा के पैर’ एक उल्लेखनीय कहानी है। यह उन लोगों की कहानी है, जो गाँवों से शहरों में आकर असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करते हैं, घरेलू नौकर, दरबान, ड्राइवर वगैरह बनते हैं, ठेलों पर छोटी-मोटी चीजें बेचते हैं या राज-मिस्त्री, रिक्शाचालक वगैरह बनकर अपना पेट भरते हैं--बल्कि अपना पेट काटकर गाँव में पीछे छूटे अपने परिवारों को पैसा भेजकर जीवित रखते हैं। 

इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे ‘टेेमिंग दि कुली बीस्ट’, ‘बियोंड पैट्रोनेज एंड एक्सप्लॉयटेशन’, ‘वेज हंटर्स एंड गैदरर्स’ आदि पुस्तकों के लेखक जान ब्रेमन की पुस्तक ‘फुटलूज लेबर’ की याद आयी। एम्सटर्डम विश्वविद्यालय में तुलनात्मक समाजशास्त्र के प्रोफेसर जान ब्रेमन ने कई बार भारत आकर यहाँ के असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का अध्ययन किया था। उनकी पुस्तक ‘फुटलूज लेबर वर्किंग इन इंडिया’ज इनफॉर्मल इकॉनॉमी’ (भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करने वाले घुमंतू श्रमिक) के बारे में मैंने 2003 में एक लेख लिखा था, जो मेरी पुस्तक ‘भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्ठभूमि’ (2014) में संकलित है। प्रमोद राय की कहानी के संदर्भ में अपने उस लेख का प्रारंभिक अंश उद्धृत करना मुझे जरूरी लग रहा है :

भारतीय श्रम का भूमंडलीकरण एक बार औपनिवेशिक शासन काल में हुआ और दूसरी बार निजीकरण की नीति के चलते अब हो रहा है, क्योंकि यह नीति भारत पर (और लगभग सारी दुनिया में) विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी भूमंडलीय संस्थाओं द्वारा थोपी गयी है। इस नीति का संबंध पूँजीवादी भूमंडलीकरण और आज के उस पूँजीवाद से है, जो कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को त्याग चुका है और उससे जुड़ी तमाम चीजों को नष्ट करने में लगा है। अब उसे राज्य का हस्तक्षेप केवल पूँजी की रक्षा करने, पूँजीपतियों के हित में नीतियाँ बनाने और उन्हें सख्ती से लागू करने में ही चाहिए, जनहित की नीतियाँ बनाने और उन्हें लागू करने के लिए नहीं। राज्य के हस्तक्षेप से बन सकने वाली जनहित की नीतियों को न बनने देने के लिए ही मुक्त बाजार की वैश्विक नीति अपनायी गयी है, जिसके तहत श्रम के बाजार को भी राज्य के हस्तक्षेप से मुक्त रखने का आग्रह किया जा रहा है। इसी नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में विनिवेश की या उन उद्योगों को निजी क्षेत्र के हाथों बेचने की नीति अपनायी गयी है और कहा जा रहा है कि श्रमिकों को ‘औपचारिक’ तथा ‘अनौपचारिक’ दो क्षेत्रों में बाँटने के बजाय केवल अनौपचारिक क्षेत्र में रहने देना चाहिए।

व्यवहार में इस नीति का अर्थ यह है कि सरकार न तो श्रमिकों को रोजगार देने की चिंता करे और न उनके हित में कोई नियम-कानून बनाकर उन्हें लागू करे। मसलन, न्यूनतम वेतन या मजदूरी तय करने, श्रमिकों को जरूरी सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षाएँ देने-दिलाने के उन कामों से, जिनसे ‘औपचारिक अर्थव्यवस्था’ का निर्माण होता है, सरकार को अलग रहना चाहिए। उसे श्रम के बाजार को माँग और पूर्ति के अपने नियमों से ही चलने देना चाहिए और इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि श्रमिकों को स्थायी रोजगार, न्यूनतम वेतन, शिक्षा, आवास, चिकित्सा, बीमा, पेंशन आदि देने से संबंधित नियम-कायदों का पालन किया जा रहा है या नहीं। ऐसे कोई नियम-कायदे होने ही नहीं चाहिए। जो बने हुए हैं, उन्हें भी समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि उनके रहने पर श्रमिक उन्हें लागू कराने की कोशिश करते हैं और इसके लिए संगठित होकर संघर्ष करते हैं। इस चीज को रोकने के लिए श्रमिकों के संगठनों को भंग कर देना चाहिए और ऐसे कानून बना देने चाहिए कि श्रमिक संगठित न हो सकें। इसके अलावा ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करनी चाहिए कि श्रमिकों का संगठित होना स्वतः ही मुश्किल हो जाये। इसका एक कारगर तरीका यह हो सकता है कि श्रमिक किसी एक स्थान पर इकट्ठे और टिककर न रह सकें, बल्कि जहाँ उनकी जरूरत हो, वहाँ जायें और जब तक उनकी जरूरत हो, तभी तक वहाँ रहें।

‘भोला बबवा के पैर’ ऐसे ही श्रमिकों की कहानी है। यह बिहार के एक गाँव के भोलानाथ दुबे और उनके तेरह वर्षीय पुत्र गोल्डेन कुमार दुबे की कहानी है। भोलानाथ दुबे थोड़ा पढ़े-लिखे थे, पर कोई अच्छी नौकरी नहीं पा सके। जमीन-जायदाद ज्यादा थी नहीं, सो गाँव के एक धरमदेव के साथ दिल्ली चले गये, जो दिल्ली में एक सेठ के यहाँ नौकरी करता था और सेठ या उसके संबंधियों को किसी भरोसेमंद नौकर की जरूरत होने पर गाँव आकर किसी लड़के को अच्छी नौकरी दिलाने का वादा करके दिल्ली ले जाता था। उसने भोलानाथ दुबे को नौकरी दिलायी, लेकिन वे वहाँ टिके नहीं। उन्होंने दिल्ली में कई तरह के काम किये और एक दिन अचानक कहीं गायब हो गये। तीन साल बीत गये, पर न तो वे गाँव लौटे और न उनके मर जाने की खबर मिली। गाँव में उनकी पत्नी उन्हें जीवित मानती रही और इस इंतजार में कि वे पैसा कमाकर लौटेंगे, तो कर्ज चुका दिया जायेगा, खेत गिरवी रखकर लिये गये कर्ज से किसी तरह काम चलाती रही और अपने बेटे गोल्डेन कुमार को पढ़ाती रही। उधर धरमदेव के मालिक की बेटी को भरोसेमंद घरेलू नौकर की जरूरत महसूस हुई, तो वह गाँव आया और अच्छी नौकरी दिलाने का वादा करके गोल्डेन कुमार को अपने साथ दिल्ली ले गया। वह भोलानाथ दुबे को भोला बाबा कहता था (‘बाबा’ प्यार और तिरस्कार दोनों में ‘बबवा’ हो जाता है) और गोल्डेन कुमार को गोल्डेन बाबा कहता है। वही गोल्डेन को बताता है कि उसके पिता कहीं टिककर नहीं रहते थे, ‘‘उनके पैरों में चक्कर था।’’ इसीलिए कहानी का शीर्षक है ‘भोला बबवा के पैर’।

लेकिन तेरह वर्षीय गोल्डेन कुमार केवल नौकरी करने दिल्ली नहीं जाता, बल्कि दिल्ली में अपने खोये हुए पिता को खोजने जाता है। दिल्ली की खोड़ा कॉलोनी में उसके गाँव के कई लोग रहते हैं, जो तरह-तरह के छोटे-मोटे काम या नौकरी-चाकरी करते हैं। गोल्डेन वहाँ जाकर उनसे मिलता है। वे लोग उसे बताते हैं कि भोला बबवा कहीं टिककर कोई काम नहीं करते थे। कभी किसी फैक्टरी में काम किया, तो कभी किसी स्कूल में चौकीदारी की। कभी किसी सिक्योरिटी एजेंसी में भरती होकर एटीएम गार्ड बने, तो कभी दिल्ली की प्राइवेट बसों में कंडक्टर। कभी किसी ठेकेदार के नौकर रहे, तो कभी जूस बेचने की अपनी ठेली लगायी। हालाँकि नौकरी की मजबूरी में उन्होंने फैक्टरी के संगठित मजदूरों की हड़ताल तोड़ने वाले के रूप में भी काम किया, मगर अपनी ईमानदारी और गलत कामों को रोकने की प्रवृत्ति के चलते वे नौकरी से या तो खुद निकले या निकाले गये; हर जगह लड़े-भिड़े और मारे-पीटे गये। कभी चाकू से घायल होने पर अस्पताल ले जाये गये, तो कभी पुलिस को हफ्ता न देने पर पुलिस चौकी में ले जाकर पीटे गये। भोला बबवा के गायब हो जाने या मर जाने के बारे में गाँव वालों को ठीक-ठीक कुछ मालूम नहीं। केवल अटकलें हैं कि उन्हें किसी ने मारकर नाले में फेंक दिया था या उन्हें एड्स-वेड्स हो गया था। लेकिन लोगों को यह विश्वास भी है कि ‘‘सब फालतू बात है, भोला बबवा वैसा आदमी नहीं था।’’

गोल्डेन जिस कोठी में काम करता है, वहाँ से खोड़ा कॉलोनी जाकर अपने गाँव के लोगों से मिलने के बाद जब लौटता है, तो उसे तरह-तरह के काम करते लोगों में अपने पिता नजर आते हैं। इस प्रकार कहानीकार बड़ी कुशलता और कलात्मकता के साथ गाँवों से शहरों में आकर तरह-तरह के काम करने वाले लोगों के जीने और मरने का भयावह यथार्थ सामने लाता है। कहानी से पता चलता है कि चक्कर सिर्फ भोला बाबा के पैरों में नहीं था, इन तमाम लोगों के पैरों में है। ये सब एक अस्थिर और अस्थायी जीवन जी रहे हैं और भोला बाबा की तरह शहर में आकर खो गये हैं। कहानी का नयापन इसमें है कि यह भारत की उस ‘अनौपचारिक अर्थव्यवस्था’ पर हमारा ध्यान केंद्रित करती है, जो अस्थायी श्रमिकों के बल पर चलती है।

इस प्रकार आज की हिंदी कहानी में कई नये स्वर उभर रहे हैं। पिछले कुछ समय से हिंदी कहानी अपनी यथार्थवादी परंपरा से कटकर भटक-सी गयी थी। लेकिन अब वह फिर पटरी पर लौट रही है और आगे बढ़ रही है। इसमें नये कहानीकारों के साथ-साथ ‘परिकथा’ जैसी पत्रिकाओं की भी भूमिका है, जो नयी रचनाशीलता को निरंतर सामने लाने का सार्थक और जरूरी काम करती हैं।