Friday, January 25, 2019

"मेरे आशावाद का आधार है भूमंडलीय यथार्थवाद"

'परिकथा' पत्रिका के जनवरी-फरवरी, 2019 के अंक में संपादक शंकर द्वारा लिया गया इंटरव्यू

शंकर : रमेश जी, आप 1970 के आसपास उभरे एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व हैं। आपने स्तरीयता और मात्रा दोनों ही दृष्टियों से पर्याप्त से अधिक रचनाकर्म किया है। आपने जितना रचनात्मक लेखन किया है, उतना ही आलोचना कर्म भी किया है। आपने न सिर्फ साहित्यिक आलोचना, बल्कि समाज और संस्कृति के जरूरी प्रश्नों पर सशक्त समाजशास्त्रीय आलोचना भी की है। समाजशास्त्रीय आलोचना का आपका काम तो इतना विशिष्ट है कि रचनात्मक लेखन करने वाला आपके साथ का या आपके बाद का भी कोई दूसरा लेखक उसकी बराबरी में नहीं दिखायी पड़ता है। आपने कई प्रचलित अवधारणाओं पर अपनी नयी स्थापना दी, कई मौलिक व्याख्याएँ दीं। साहित्य के समाजशास्त्रीय पक्ष को सर्वोपरि मानने और बताने में आपने अपनी तर्कशक्ति लगायी, अनेक बहसों में हिस्सेदारी निभायी, नयी बहसें शुरू कीं। आपने अपनी बातें बिना लाग-लपेट के रखीं। जो बात अच्छी नहीं लगी, उसे अच्छा नहीं बताया, असहमति जाहिर की; और जो बात अच्छी लगी, उसका खुलकर समर्थन किया। आपकी निर्भीकता और साहस के अनेक दृष्टांत आपके समूचे लेखन में मौजूद हैं। जहाँ आवश्यक होता है, आप अपनी आलोचना करने में भी पीछे नहीं रहते। आपके जीवन और लेखन में ऐसी पारदर्शिता है कि गलतफहमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। फिर भी, जैसा कि हर लेखक आम तौर पर कभी न कभी सोचता है, क्या आपको कभी यह सोचने की जरूरत महसूस हुई कि दूसरों ने आपके कृतित्व को सही तरह से या अच्छी तरह से नहीं समझा? 

रमेश उपाध्याय : (हँसकर) शंकर जी, मुझे तो यह लगता है कि दूसरे मुझे मुझसे ज्यादा समझते हैं। उनसे मुझे अपने बारे में कई ऐसी बातें पता चलती हैं कि मैं चकित रह जाता हूँ। फिर भी, अगर कभी ऐसा लगता है कि मुझे गलत समझा जा रहा है, तो मैं मन ही मन दुखी होते रहने या पीठ पीछे शिकायतें करने के बजाय साफ-साफ कह देता हूँ कि महोदय, आप मुझे गलत समझ रहे हैं। या महोदया, आप मुझे गलत समझ रही हैं। (ठहाका) 

शंकर : आपके संस्मरणों से पता चलता है कि पारिवारिक परिस्थितियों के चलते हाई स्कूल के बाद आपको पढ़ाई छोड़कर प्रेस में कंपोजीटर का काम करना पड़ा। लेकिन आपने पढ़ना जारी रखा, प्राइवेट परीक्षाएँ दीं और धीरे-धीरे एम.ए. और पीएच.डी. करके दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक-प्रोफेसर बने। जाहिर है, आपके लेखकीय मानस के निर्माण में आपके इन जीवन-संघर्षों की भूमिका रही है। आप इसे किस तरह व्यक्त करना चाहेंगे? 

रमेश उपाध्याय : मैं ‘जीवन-संघर्षों’ की जगह ‘जीवन-अनुभवों’ की बात करना चाहूँगा। संघर्ष से ऐसा लगता है कि जैसे आप किसी रणभूमि में शत्रुओं से लड़-भिड़कर विजयी हुए हैं, जबकि अनुभव लोगों से मिल-जुलकर, उनके साथ प्रेमपूर्वक जीने से प्राप्त होते हैं। मैं सोचता हूँ कि मेरी पारिवारिक परिस्थितियाँ यदि सामान्य होतीं, मैंने सामान्य ढंग से शिक्षा पायी होती, सामान्य ढंग से नौकरी पाकर और सामान्य ढंग से गृहस्थी बसाकर सामान्य जीवन जिया होता, तो आज मैं क्या होता? जो भी होता, शायद लेखक न होता और लेखक होता भी, तो शायद वैसा लेखक न होता, जैसा मैं हूँ। मुझे तो लगता है कि मैंने एक बँधी-बँधायी जिंदगी से जल्दी ही मुक्ति पाकर आजादी से जीते हुए, खूब यात्राएँ करते हुए, तरह-तरह के लोगों के संपर्क में आते हुए और तरह-तरह की परिस्थितियों से गुजरते हुए जो अनुभव प्राप्त किये, वे एम.ए. और पीएच.डी. से कहीं ज्यादा शिक्षाप्रद थे। मैंने राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. और दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की, लेकिन जैसे गोर्की की आत्मकथा के एक खंड का नाम है ‘मेरे विश्वविद्यालय’, वैसे ही मेरे वास्तविक विश्वविद्यालय तो वे शहर रहे, जहाँ मैं रहा और जिन्होंने मुझे प्रेम से अपनाया। मेरे वास्तविक शिक्षक तो वे लोग रहे, जिनके साथ मैं रहा और जिनसे मैंने नितांत अजनबी होते हुए भी भरपूर प्यार पाया। 

शंकर : आपने लेखन की शुरुआत कहानियों से की थी। आपने जिस समय लिखना शुरू किया, उस समय तक आप विचारधारात्मक रूप से सजग या प्रबुद्ध हो चुके थे या आपकी सजगता लिखने के दौरान बाद में आयी?

रमेश उपाध्याय : मेरी पहली कहानी बीस साल की उम्र में, 1962 में छपी थी। बीस साल का लड़का विचारधारात्मक रूप से बहुत सजग या प्रबुद्ध तो नहीं हो सकता, लेकिन चैदह साल की उम्र में पढ़ाई छोड़कर परिवार की जिम्मेदारी उठा लेने वाला लड़का, कई शहरों में मेहनत-मजदूरी करने वाला लड़का, टेªड-यूनियन वगैरह के अनुभवों से गुजरा हुआ लड़का, प्रेमचंद और दूसरे प्रगतिशील लेखकों के लेखन से प्रभावित लड़का चाहे किसी विचारधारा से प्रतिबद्ध न हो, वर्गीय पक्षधरता के कुछ पाठ तो पढ़ ही चुका था, जिनका असर आप मेरी पहली कहानी ‘एक घर की डायरी’ पर देख सकते हैं। बाकी सजगता बाद में लिखने के दौरान ही आयी। 

शंकर : आपकी कहानियों से गुजरते हुए जो चीज सबसे पहले और सबसे अधिक आकर्षित करती है, वह है विविधता। आपकी शायद ही कोई दो कहानियाँ एक जैसी हों। आपकी कहानियों में गाँव हैं, कस्बे हैं, शहर हैं और महानगर भी हैं। आपकी कहानियों के पात्रों में किसान हैं, मजदूर हैं, तरह-तरह के काम करने वाले मध्यवर्गीय लोग हैं और उच्चवर्गीय शासक लोग भी हैं। स्त्रियों में शिक्षित और अशिक्षित, विवाहित और अविवाहित, विधवाएँ और परित्यक्ताएँ, शहरी और ग्रामीण, मेहनत-मजदूरी करने वाली या नौकरी-चाकरी करने वाली, उच्चवर्गीय या शासकवर्गीय स्त्रियाँ भी हैं। उनमें बच्चे हैं, किशोर हैं, युवा हैं, प्रौढ़ हैं और वृद्ध भी हैं। फिर, आपकी कहानियों में पात्रों की पृष्ठभूमि, परिस्थितियों और उनकी निजी विशेषताओं से संबंधित भिन्नताएँ और विचित्रताएँ भी हैं। यह विविधता आपकी कहानियों में अनायास आयी है या सायास लायी गयी है? 

रमेश उपाध्याय : शंकर जी, मैंने अब तक के अपने आधी सदी से अधिक के लेखन काल में दो सौ से अधिक कहानियाँ लिखी हैं। मगर मुझे या मेरे पाठकों को कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं स्वयं को दोहरा रहा हूँ। लेकिन मेरी कहानियों में विविधता सायास लायी गयी नहीं है, अनायास ही आयी है। मैं समझता हूँ, इसके दो कारण हैं। एक यह कि मैं बहुत-से भिन्न परिवेशों और परिस्थितियों में जिया हूँ, मैंने विभिन्न प्रकार के काम किये हैं, विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ जीवन जिया है। और दूसरा यह कि मैं अक्सर अपने आसपास के यथार्थ में अचानक मिल जाने वाली नयी चीजों से प्रेरित होकर कहानी लिखता हूँ। मुझे नयी चीजें, जैसे कहानी के नये विषय, खोजने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता। वास्तव में वे यथार्थ में पहले से मौजूद होती हैं। लेकिन मुझे उनके होने का ज्ञान या अनुभव नहीं होता। जब किसी नयी चीज का सहसा ज्ञान या अनुभव होता है, तो मैं चकित रह जाता हूँ। मसलन, आप जिस रास्ते से रोजाना आते-जाते हों, उसके किनारे खड़ा कोई पेड़ या मकान आपको पहली बार दिखे, या आपका ध्यान खींच ले, और आप विस्मित हो जायें कि अरे, यह यहाँ कहाँ से आ गया! हमारे जीवन में, हमारे आसपास के लोगों में, उनकी बातों में, उनकी भाषा में, उस भाषा में व्यक्त होने वाले उनके संबंधों में और उन संबंधों में नित्यप्रति होने वाले बदलावों में मेरे ज्ञान और अनुभव से बाहर की इतनी चीजें होती हैं कि मैं हैरान रह जाता हूँ और सोचता हूँ कि जीवन के इस पक्ष को या मनुष्य के इस रूप को मैंने पहले क्यों नहीं देखा! और मेरी यह हैरानी मुझे एक नयी कहानी लिखने के लिए प्रेरित करती है। चूँकि यह प्रेरणा पहले की प्रेरणाओं से भिन्न होती है, इसलिए वह कहानी भी पहले की कहानियों से भिन्न होती है। 

शंकर : आपकी कहानियों में कथ्य की ही नहीं, रूप और शिल्प की विविधता भी खूब है। जैसे कि आप कहीं परंपरागत आख्यान वाली कहानी लिखते हैं, तो कहीं उस आख्यान में नये-नये प्रयोग करते हैं। कभी ‘पैदल अँधेरे में’ और ‘चिंदियों की लूट’ जैसी छोटी-छोटी सूक्ष्म सांकेतिक कहानियाँ लिखते हैं, तो कभी ‘अंधा कुआँ’ और ‘पानी की लकीर’ जैसी विस्तृत विवरणों वाली लंबी कहानियाँ। कभी पौराणिक आख्यानों को नया रूप देकर नये अर्थों-संदर्भों वाली ‘कल्पवृक्ष’, ‘कामधेनु’ और विश्वामित्र वाली ‘प्रतिसृष्टि’ जैसी कहानियाँ लिखते हैं, तो कभी लोककथा वाले रूप में ‘प्रजा का तंत्र’ और ‘मायानगरी में एक दिन’ जैसी कहानियाँ। कभी हास्य-व्यंग्य वाली ‘दूसरी पत्नी’ और ‘परथम श्रेणी सबको दो!’ जैसी कहानियाँ लिखते हैं, तो कभी ‘मेरे दोस्त का सपना’ या ‘एक झरने की मौत’ जैसी करुण कहानियाँ। और आपकी प्रयोगशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण तो है आपकी कहानी-शृंखला ‘किसी देश के किसी शहर में’, जिसमें आपने लोककथा के शिल्प में यथार्थ और फैंटेसी तथा व्यंग्य और विडंबना के अद्भुत प्रयोग किये हैं। ऐसी कहानी-शंृखला हिंदी कहानी में न आपसे पहले किसी ने लिखी है, न आपके बाद के किसी लेखक ने। तो यह बताइए कि कहानी में ऐसे प्रयोग करने की आवश्यकता आप क्यों महसूस करते हैं? 

रमेश उपाध्याय : देखिए, हिंदी कहानी में यथार्थवाद और यथार्थवादी कहानी को लेकर बहुत सारे विभ्रम फैले हुए हैं। जैसे आम तौर पर यह माना जाता है कि यथार्थ और कल्पना परस्पर-विरोधी हैं, इसलिए यथार्थवादी कहानी में कल्पना या फैंटेसी का, अलौकिक चीजों या पौराणिक पात्रों का कोई काम नहीं। फिर, यह भी माना जाता है कि यथार्थ रूखा-सूखा, रूप-रस-गंध-स्पर्श आदि के आनंद से रहित होता है, इसलिए यथार्थवादी कहानी में इन सब चीजों का और हास-परिहास का या व्यंग्य-विनोद का कोई काम नहीं। लेखक ने जो देखा है, उसी को यथावत लिख देना, या उसने जो जिया-भोगा है, उसी को लिख देना यथार्थवादी कहानी लिखना माना जाता है, चाहे ऐसी कहानी महाबोर और नितांत अपठनीय ही क्यों न हो। ब्रेख्त की तरह मेरा मानना है कि यथार्थ को किसी एक ही तरीके से नहीं, हजारों तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। हाँ, इसमें नये प्रयोगों के असफल हो जाने की जोखिम है, पर यह जोखिम उठाये बिना आप साहित्य में नया क्या कर सकते हैं? 

शंकर : आपकी शुरू की कहानियों में, मसलन ‘आने वाले के लिए’, ‘आत्मघात’, ‘दूसरी पवित्रा’, ‘शेष इतिहास’, ‘पानी की लकीर’, ‘पैदल अँधेरे में’, ‘बराबरी का खेल’, ‘माटीमिली’, ‘देवीसिंह कौन?’ आदि में, आपकी लेखकीय पक्षधरता या वैचारिक प्रतिबद्धता कहानी में अंतर्धारा के रूप में मौजूद है, जबकि आपकी बाद की कहानियों में, जैसे ‘प्राइवेट पब्लिक’, ‘त्रासदी...माइ फुट!’, ‘अर्थतंत्र’ या ‘हम किस देश के वासी हैं’ आदि में उसकी मुखरता ज्यादा है। संभव है, बाद की इन कहानियों को लिखते हुए आपने महसूस किया हो कि बिना मुखर हुए कहानी के माध्यम से जो बात कही जानी है, वह नहीं कही जा सकेगी। आप इन कहानियों को किस रूप में देखते हैं? 

रमेश उपाध्याय : देखिए, कहानी में लेखकीय पक्षधरता या वैचारिक प्रतिबद्धता का अंतर्निहित रहना या खुलकर व्यक्त होना, या कहानी का सूक्ष्म अथवा स्थूल होना, या अंग्रेजी में कहें तो उसका सटल या लाउड होना कई चीजों पर निर्भर करता है। जैसे, कहानी के लिखे जाने के समय का सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक वातावरण। मैंने जिस समय कहानियाँ लिखना शुरू किया, राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के समय जनता द्वारा देखे गये स्वप्नों के भंग होने का समय था, जिसे साहित्य में मोहभंग कहा जाता था। हालाँकि मध्यवर्ग में देश के नवनिर्माण से बेहतर भविष्य या समाजवादी समाज बनने की आशाएँ मौजूद थीं, सरकारी नौकरियाँ आसानी से मिल जाती थीं, पत्रकारिता और प्रकाशन जगत में आज की-सी व्यावसायिकता नहीं थी और पत्र-पत्रिकाओं के संपादक प्रायः साहित्यकार हुआ करते थे। लाखों की पाठक संख्या वाले ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसे साप्ताहिक पत्रों और टाइम्स आॅफ इंडिया तथा हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े प्रकाशन समूहों से निकलने वाली ‘सारिका’ और ‘कादंबिनी’ जैसी मासिक पत्रिकाओं में भी साहित्य के लिए काफी जगह होती थी। फिर, इनके साथ-साथ ‘कल्पना’, ‘लहर’, ‘माध्यम’, ‘ज्ञानोदय’, ‘कहानी’, ‘नयी कहानियाँ’ आदि साहित्यिक पत्रिकाएँ भी थीं, जिनमें नये-पुराने सभी तरह के लेखक अपना मनचाहा लिख सकते थे। उदाहरण के लिए, ‘नयी कहानी’ आंदोलन के समय परिमल वाले धर्मवीर भारती ‘धर्मयुग’ में प्रगतिशील लेखकों की और प्रगतिशील भैरवप्रसाद गुप्त ‘कहानी’ और ‘नयी कहानियाँ’ में गैर-प्रगतिशील लेखकों की भी कहानियाँ सम्मान के साथ प्रकाशित करते थे। इसलिए रचना में लेखकीय पक्षधरता या वैचारिक प्रतिबद्धता का मुखर होना या न होना ज्यादा मायने नहीं रखता था। मगर बाद में, जब सामाजिक-राजनीतिक जीवन में निराशा छाने लगी, युवाओं में कुछ देशी-विदेशी प्रभावों से विद्रोह के स्वर उभरने लगे, शीतयुद्ध की राजनीति के तहत साहित्य में खेमेबंदी होने लगी, तब वाम राजनीति और विचारधारा पर आक्रमण होने लगे। कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन-दर-विभाजन से भी साहित्यिक वातावरण बहुत बदला। ‘बड़ी’ पत्रिकाओं के विरुद्ध ‘लघु’ पत्रिकाओं का आंदोलन शुरू हुआ। और फिर आया आपातकाल, जिसमें लेखकों ने पाया कि लिखने-बोलने की आजादी पर लगे हुए जो प्रतिबंध पहले नजर नहीं आते थे, अब स्पष्ट होकर लेखन को बाधित और नियंत्रित करने लगे हैं। हिंदी कहानी इन परिवर्तनों से अप्रभावित कैसे रह सकती थी? मेरी कहानियाँ भी अप्रभावित नहीं रहीं। आपने मेरी जिन तीन कहानियों--‘प्राइवेट पब्लिक’, ‘त्रासदी...माइ फुट!’ और ‘हम किस देश के वासी हैं’--में ज्यादा मुखरता देखी है, वे तीनों कहानियाँ निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रक्रियाओं में बदलते हुए भूमंडलीय यथार्थ की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में जो यथार्थ है, वह लेखकीय पक्षधरता और वैचारिक प्रतिबद्धता की मुखरता के बिना व्यक्त किया ही नहीं जा सकता था। 

शंकर : आपको अपनी कहानियों में से कौन ज्यादा प्रिय हैं? 

रमेश उपाध्याय : यह बताना बहुत मुश्किल है। फिर भी, जिन कहानियों के नाम आपने लिये हैं, वे तो मुझे पसंद हैं ही, उनके अलावा भी कई कहानियाँ मुझे अपनी दूसरी कहानियों से ज्यादा पसंद हैं। जैसे, ‘गलत-गलत’, ‘ब्रह्मराक्षस’, ‘कहीं जमीन नहीं’, ‘नदी के साथ एक रात’, ‘कामधेनु’, ‘दूसरा दरवाजा’, ‘अविज्ञापित’, ‘डाॅक्यूड्रामा’, ‘लाला बुकसेलर’, ‘एक झरने की मौत’ आदि। इससे याद आया कि जब कमलेश्वर साहित्य अकादमी के लिए ‘बीसवीं सदी की हिंदी कथा-यात्रा’ का संपादन कर रहे थे, उन्होंने फोन करके मुझसे पूछा था कि मेरे संग्रह ‘डाॅक्यूड्रामा तथा अन्य कहानियाँ’ में मुझे कौन-सी कहानी ज्यादा पसंद है। मेरे लिए अपने एक संग्रह में भी अपनी सबसे प्रिय कहानी बताना मुश्किल हो गया। जैसे-तैसे मैंने एक कहानी का नाम बताया। ‘प्रजा का तंत्र’। और कमलेश्वर ने कहा, ‘‘मुझे भी यह कहानी बहुत पसंद है। मैं इसी को ले रहा हूँ।’’
शंकर: आप ‘प्रजा का तंत्र’ को किस रूप में देखते हैं? 

रमेश उपाध्याय : ‘प्रजा का तंत्र’ में मैंने समकालीन भूमंडलीय यथार्थ को भारतीय और विशेष रूप से हिंदी की यथार्थवादी कथा-परंपरा में कुछ नया जोड़ते हुए लोककथा के रोचक रूप में व्यक्त किया है। इस यथार्थ का एक सिरा जनता के शोषण और दमन के इतिहास से जुड़ा है, तो दूसरा सिरा मानव-मुक्ति के भविष्य-स्वप्न से। इस कहानी में मैंने अपने देश और बाकी दुनिया में प्रायः सर्वत्र चल रही वह जन-विरोधी तथा जनतंत्र-विरोधी प्रक्रिया दिखायी है, जिसमें राज्यतंत्र उत्तरोत्तर अधिक दमनकारी होता जाता है और जनतंत्र निरंतर कमजोर पड़ता जाता है। इसके चलते जनतंत्र के नाम पर निरंकुश राजा और विवश प्रजा वाली पुरानी व्यवस्था ही आधुनिक रूप में चलती दिखायी देती है। लेकिन यह दिखाने के लिए कि यथार्थ इकहरा नहीं, द्वंद्वात्मक होता है, मैंने इस व्यवस्था को बदल सकने वाली एक नयी जनतांत्रिक प्रतिरोध-प्रक्रिया का संकेत भी एक यथार्थ संभावना के रूप में कर दिया है। मैंने इस छोटी-सी कहानी में देश-काल की दृष्टि से अत्यंत विस्तृत भौगोलिकता तथा अत्यंत गहन ऐतिहासिकता वाले भूमंडलीय यथार्थ को सहज संप्रेषणीय बनाने के लिए भारतीय लोककथाओं वाली शैली तथा व्यंग्यात्मक भाषा अपनायी है, जिससे कहानी में पुरानी किस्सागोई के साथ व्यंग्य, विडंबना, पैरोडी, फैंटेसी, ऐलेगरी आदि के नये प्रयोग सहजता से होते चले गये हैं। शायद इसी कारण मेरी यह प्रिय कहानी लोकप्रिय भी है। 

शंकर : ‘त्रासदी...माइ फुट!’ आपकी एक बहुत महत्त्वपूर्ण और उत्कृष्ट कहानी है। भोपाल गैस कांड पर तो शायद यह अपने ढंग की अकेली ही कहानी है। इसमें कंपनी के क्रियाकलाप के बारे में वे तथ्य आये हैं, जिनको कंपनी ने छिपाने की कोशिशें कीं। कहानी के पात्र नूर भोपाली ने इस कांड को लेकर बहुत सारे तथ्य जुटाये हैं। वे उन्हें गजल में नहीं ढाल पा रहे हैं, लिहाजा इस कांड पर वे उपन्यास लिखना चाह रहे हैं, लेकिन वे उपन्यास का रूपबंध तैयार नहीं कर पा रहे हैं। शायद यह दिक्कत आपको भी इस कहानी को लिखते समय आयी और इसीलिए आपने नूर से कहलाया है--‘‘उपन्यास के लिए मसाला तो मैंने बहुत सारा जमा कर लिया है। लेकिन यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि इसे कहानी के रूप में किस तरह ढालूँ। मैं जो कहानी कहना चाहता हूँ, वह किसी एक व्यक्ति की, एक परिवार की, एक शहर की या एक देश की नहीं, बल्कि सारी दुनिया की कहानी होगी। मुझे लगता है, ग्लोबलाइजेशन के दौर में साहित्य को भी ग्लोबल होना पड़ेगा। मगर किस तरह?’’ इस पर नूर का कहानीकार मित्र राजन कहता है--‘‘मैं भी आजकल इसी समस्या से जूझ रहा हूँ।’’ इस कहानी में राजन शायद आपका ही प्रतिरूप है, क्योंकि आपने ही भूमंडलीय यथार्थवाद की नयी अवधारणा प्रस्तुत की है और इस कहानी में तथा ‘प्राइवेट पब्लिक’ और ‘हम किस देश के वासी हैं’ जैसी अन्य कहानियों में भूमंडलीय यथार्थवाद के सफल उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। हिंदी कहानी में यह एक सर्वथा नयी चीज है। ‘त्रासदी...माइ फुट!’ की रचना-प्रक्रिया के बारे में बताते हुए आप इसके बारे में बतायें। 

रमेश उपाध्याय : शंकर जी, भोपाल गैस कांड में मारे गये और जीवन भर के लिए बीमार और अपाहिज हो गये सर्वथा निर्दोष लोगों के साथ उस रात जो हुआ, उसका प्रत्यक्षदर्शी तो मैं नहीं था, लेकिन उससे मैं बहुत विचलित हुआ। बाद में उसके बारे में मैंने जो पढ़ा-सुना, उससे मुझे लगा कि यह कोई त्रासदी नहीं, जान-बूझकर किया गया हत्याकांड था। इससे मेरे मन में एक तरफ अथाह दुख और दूसरी तरफ अपार क्रोध उत्पन्न हुआ। उस विक्षोभ की अभिव्यक्ति के लिए मैंने 1985 में ‘अनदीखती’ कहानी लिखी, जो ‘पहल’ के कहानी विशेषांक में छपी थी। मगर मैं उस कहानी से संतुष्ट नहीं था। इसलिए उस कहानी को लिख चुकने के बाद भी मैं उस कांड के बारे में कुछ शोध जैसा करता रहा। बीसवीं सदी के अंतिम दशक से पूँजीवादी भूमंडलीकरण की जो आँधी चली, उसके अनुभव ने भी मुझे झकझोरा और मुझे लगा कि अब यथार्थ को किसी एक व्यक्ति के, एक परिवार के, एक शहर के या एक देश के यथार्थ के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के यथार्थ के रूप में देखना होगा, क्योंकि आज की दुनिया में जो कुछ हो रहा है, उसका संबंध समूचे वैश्विक या भूमंडलीय यथार्थ से है। लेकिन भूमंडलीय यथार्थ को कहानी में ढालना बहुत मुश्किल काम था और ऐसी कहानियों के कोई उदाहरण भी मेरे सामने नहीं थे। इसलिए यह एक बड़ी रचनात्मक चुनौती थी, जिसे स्वीकार करते हुए मैंने 2006 में यह कहानी लिखी। इस प्रकार आप कह सकते हैं कि इस कहानी की रचना-प्रक्रिया लगभग बीस बरस जारी रही। 

शंकर : हिंदी की कहानी समीक्षा में आम तौर पर यह माना जाता है कि कहानी में लेखकीय पक्षधरता और वैचारिक प्रतिबद्धता अंतर्निहित रहनी चाहिए, मुखर होकर व्यक्त नहीं होनी चाहिए। आपकी ‘शेष इतिहास’, ‘पानी की लकीर’, ‘पैदल अँधेरे में’, ‘माटीमिली’, ‘बराबरी का खेल’, ‘देवीसिंह कौन?’ आदि बहुत ऊँचे दरजे की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में आपकी लेखकीय पक्षधरता और वैचारिक प्रतिबद्धता बिलकुल स्पष्ट है। फिर भी ये ऊँचे दरजे की कहानियाँ हैं। इस विषय में आपको क्या कहना है? 

रमेश उपाध्याय : शंकर जी, मेरे विचार से यह एक मिथ्या धारणा है कि कहानी में लेखकीय पक्षधरता और वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट या मुखर होने से कहानी खराब हो जाती है। यह धारणा वाम विचारधारा और यथार्थवादी लेखन का विरोध करने के लिए इस्तेमाल और प्रचारित की जाती रही है। दिक्कत यह है कि हिंदी के प्रगतिशील और जनवादी कहानी समीक्षक भी इसे सही मानते रहे हैं। लेकिन आधुनिक काल से पहले, बल्कि आधुनिकतावादी साहित्य समीक्षा से पहले, यह धारणा आपको कहीं नहीं मिलेगी। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ से लेकर संस्कृत और दूसरी तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्य में ही नहीं, पश्चिम के पुराने साहित्य में भी लेखकीय पक्षधरता और वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखायी देती है। मैं आपकी पत्रिका ‘परिकथा’ के जनवरी-फरवरी, 2018 के अंक में प्रकाशित अपने लेख ‘साहित्यिक आंदोलन और लेखक संगठन’ में भक्तिकाल के कवियों के उदाहरणों से यह बात स्पष्ट कर चुका हूँ। कहानी की गुणवत्ता और मूल्यवत्ता का निर्णय उसमें लेखकीय पक्षधरता और प्रतिबद्धता के मुखर या अंतर्निहित रहने के आधार पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसे चाहे कितना भी छिपाया जाये, जरा-सा प्रयत्न करते ही वह स्पष्ट हो जाती है। कहानी की गुणवत्ता और मूल्यवत्ता के मानदंड दूसरे हैं, जो कहानी की विषयवस्तु के साथ-साथ कहानी कहने की कला से भी संबंध रखते हैं। कहानी में क्या कहा गया है, यह तो महत्त्वपूर्ण है ही; कैसे कहा गया है, यह भी महत्त्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से हिंदी की कहानी समीक्षा में विषयवस्तु ही मुख्य मानी जाती रही है, उसके रूप पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। रूप पर ध्यान देने वाले कहानी समीक्षक चाहे प्रगतिशील और जनवादी ही क्यों न हों, रूपवादी, कलावादी, अनुभववादी आदि यथार्थवाद-विरोधी युक्तियाँ अपनाते रहे हैं। लेकिन कहानी ऐसी कला है, जिसका जादू सिर चढ़कर बोलता है। अगर वह कला कहानी में है, तो लेखकीय पक्षधरता और वैचारिक प्रतिबद्धता के मुखर होने पर भी उसका जादू सिर चढ़कर बोलेगा। 

शंकर : आपने हमेशा कहा है कि यथार्थवादी कथाकारों को कलावादी नहीं होना चाहिए, लेकिन कहानी में कलात्मकता का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। आप अपनी कहानियों में निरंतर नये, गतिशील और परिवर्तनशील यथार्थ को कलात्मक रूप में सामने लाते रहे हैं। इसके लिए आपने अपनी कहानियों में मिथक, रूपक, प्रतीक, व्यंग्य, विडंबना आदि के प्रयोगों के साथ कथा कहने की विभिन्न शैलियों का उपयोग भी किया है। जैसे वर्णन और चित्रण की शैली, आत्मकथात्मक शैली, लोककथाओं वाली शैली इत्यादि। इस दृष्टि से आपकी कहानी-शंृखला ‘किसी देश के किसी शहर में’ एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है। विजयदान देथा ने लोककथाओं को लोककथा की तरह लिखा है, जबकि आपने अद्यतन जीवन-प्रसंगों, स्थितियों और घटनाओं को लोककथा की तरह लिखा है। आपने इस सिलसिले को आगे क्यों नहीं बढ़ाया? 

रमेश उपाध्याय : ‘किसी देश के किसी शहर में’ कहानी-शृंखला कथा पत्रिका ‘सारिका’ के संपादक अवध नारायण मुद्गल के आग्रह पर लिखी गयी थी और ये कहानियाँ ‘सारिका’ में धारावाहिक रूप से छपी थीं। ऐसा अवसर कोई और संपादक देता, तो मैं इस सिलसिले को आगे बढ़ाना अवश्य पसंद करता। 

शंकर : लगभग सभी महत्त्वपूर्ण कथाकारों ने अपनी रचना-प्रक्रिया बतायी है--कभी किसी इंटरव्यू में, कभी किसी वक्तव्य में, कभी किसी किताब की भूमिका में, कभी किसी लेख या टिप्पणी में। आपने अपने उपन्यास ‘दंडद्वीप’ की भूमिका में और कहानी संग्रह ‘किसी देश के किसी शहर में’ की लंबी भूमिका में यह काम किया है। इन दोनों भूमिकाओं से पता चलता है कि आपकी कहानियाँ कभी आपके अनुभवों से निकलती हैं, तो कभी दूसरों के अनुभवों से। इसे आपने कहीं ‘‘आपबीती को जगबीती बनाकर और जगबीती को आपबीती बनाकर लिखना’’ कहा है। क्या अलग से किसी लेख में आपने अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में लिखा है? 

रमेश उपाध्याय : जी, हाँ। मेरी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ में मेरा एक लेख है ‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’। उसमें मैंने ‘जुलूस’, ‘कामधेनु’, ‘डाॅक्यूड्रामा’, ‘माटीमिली’ आदि कहानियों की रचना-प्रक्रिया के बारे में लिखा है। कथ्य और रूप की दृष्टि से मेरी ये कहानियाँ एक-दूसरी से सर्वथा भिन्न हैं और लिखी भी गयी हैं अलग-अलग समयों पर, अलग-अलग तरह से। जैसे ‘जुलूस’ कहानी लिखने का विचार एक दिन एक बाजार से गुजरते हुए अचानक आया और मैंने तपती दोपहरी में एक बस स्टैंड पर, भीड़-भाड़ के बीच बैठकर वह पूरी कहानी एक बार में ही लिख डाली, जबकि ‘माटीमिली’ मैंने ग्यारह वर्षों में कम से कम ग्यारह बार लिखी, तब कहीं जाकर वह मुझे संतुष्ट करने वाले रूप में लिखी जा सकी। 

शंकर : कहानियाँ अंतर्वस्तु, कथानक और कथ्य के आधार पर तो जनोन्मुखी या अभिजनोन्मुखी ठहरायी जाती रही हैं, लेकिन आपका मानना है कि कहानियाँ रूप या कला पक्ष के स्तर पर भी जनोन्मुखी या अभिजनोन्मुखी ठहरती हैं। क्या इस बात को ‘परिकथा’ के पाठकों के लिए कुछ और स्पष्ट करेंगे? 

रमेश उपाध्याय : देखिए, कहानी की विधा तो आदिकाल से आज तक जनोन्मुखी ही है, पर कुछ इलीटिस्ट किस्म के लोग जान-बूझकर उसे अभिजनोन्मुखी बनाया करते हैं। मैं यह मानता हूँ कि कहानी आधुनिक युग में लिखी और पढ़ी जाने वाली चीज बन जाने के बावजूद अपनी मूल प्रकृति के अनुसार आज भी सुनी और सुनायी जाने वाली चीज है। किसी कहानी को पढ़ते समय हम एक प्रकार से उसे सुन ही रहे होते हैं। जैसे कहानीकार सामने बैठकर हमें कहानी सुना रहा हो। मुझे कहानी लिखते समय महसूस होता है कि मैं सामने बैठे श्रोताओं को कहानी सुना रहा हूँ। लेकिन जैसे किसी सभा या गोष्ठी के सभी श्रोता या किसी कक्षा के सभी छात्र एक जैसे नहीं होते, और वक्ता या प्रवक्ता को ध्यान रखना पड़ता है कि उसकी बात सभी सुन-समझ सकें, वैसे ही कहानीकार चाहता है कि उसकी कहानी प्रबुद्ध और साधारण दोनों प्रकार के पाठक रुचिपूर्वक पढ़ें और पसंद करें... 

शंकर : आप प्राध्यापक भी तो रहे हैं...

रमेश उपाध्याय : (मुस्कराते हुए) हाँ, अध्यापन के अनुभव से मैंने कहानी लेखन के बारे में कई बातें सीखीं। जैसे मैं गोष्ठियों में, सम्मेलनों में और रेडियो पर कहानियाँ पढ़ता रहा हूँ। एक बार मेरे नाटककार मित्र और ‘अभिव्यक्ति’ के संपादक शिवराम ने राजस्थान में कई हजार मजदूरों के सामने मेरा कहानी पाठ कराया और मुझे खुशी हुई कि कहानी लंबी होने के बावजूद, शहरी मध्यवर्गीय लोगों की कहानी होने के बावजूद, श्रोताओं ने ध्यान से सुनी और अगले दिन मिलने पर मुझसे उसके बारे में बात की। 

शंकर : आप कहानी के जनोन्मुखी होने के बारे में जो बात बता रहे थे, उसे जारी रखें। 

रमेश उपाध्याय :
हाँ, मैं कह रहा था कि कहानी मेरे विचार से प्रबुद्ध और साधारण दोनों तरह के पाठकों द्वारा रुचिपूर्वक पढ़ी और पसंद की जानी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि कहानी की भाषा साहित्यिक होते हुए भी बोलचाल की भाषा जैसी हो, उसमें कलात्मक बारीकियाँ तो हों, पर उसे समझने में किसी को दिक्कत न हो। लेकिन कुछ उच्चभ्रू कहानीकार कहानी को सुनी-सुनायी जाने वाली चीज नहीं, बल्कि लिखी और पढ़ी जाने वाली चीज ही समझते हैं। वे साधारण पाठकों के स्तर तक उतरना अपनी तौहीन समझते हैं और उस तथाकथित प्रबुद्ध पाठक के लिए लिखते हैं, जो उनकी कहानी को समझ और सराह सके। लोकप्रिय कहानी और कहानीकारों को वे नीची नजर से देखते हैं और चंद विशिष्ट पाठकों, यानी आलोचकों से प्राप्त प्रशंसा को ही पर्याप्त समझते हैं। मगर मैं तो चाहता हूँ कि मेरी कहानी ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें, समझें और सराहें। मेरी ‘किसी देश के किसी शहर में’ शृंखला की कहानियों के बारे में मेरे कई लेखक मित्रों ने बताया कि उनके बच्चों को भी ये कहानियाँ पसंद हैं। कुछ मित्रों ने अपने बच्चों से मुझे पत्र भी लिखवाकर भेजे। मुझे ऐसी प्रतिक्रियाएँ किसी बड़े पुरस्कार से कम नहीं लगतीं। 

शंकर : कई कहानीकार कहानी में नयापन लाने के लिए विषयवस्तु और भाषा के स्तर पर कुछ अतिरिक्त प्रयास करते दिखायी पड़ते हैं... 

रमेश उपाध्याय : हाँ, लेकिन वे कहानी में नयापन लाने के लिए प्रायः विदेशी कहानियों की नकल करते पाये जाते हैं। भाषा के स्तर पर तो शब्दों, वाक्यों और कुछ खास अभिव्यक्तियों की नकल करना आम बात है। लेकिन वे शायद यह नहीं देख पाते कि ऐसा करने से कहीं उनकी कहानी की भाषा अनुवाद जैसी, कहीं झूठे पांडित्य-प्रदर्शन जैसी, कहीं भौंडे हास्य और छिछोरे व्यंग्य जैसी, कहीं गाली-गलौज करने वाले सड़कछाप लोगों की-सी, तो कहीं अतिबौद्धिकता या अतिआंचलिकता की मारी-सी हो जाती है। ऐसी भाषा कुछ चमत्कार पैदा करके पाठक को आतंकित भले ही कर दे, कहानी की रोचकता और पठनीयता को कम कर देती है। मैं यह मानता हूँ कि कहानी में नयापन जन-जीवन के सतत परिवर्तनशील यथार्थ की अभिव्यक्ति से आता है, जो अपने लिए उचित भाषा स्वतः ही खोज लेती है। नयी भाषा का निर्माण लेखक नहीं करता, जनता करती है। इसलिए जन-भाषा के नित्यप्रति बदलते रूपों पर अपनी पकड़ बनाने वाला यथार्थवादी कहानीकार ही कहानी में भाषा के स्तर पर कुछ नया कर पाता है। 

शंकर : आपकी पुस्तक ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ में एक निबंध है ‘आगे की कहानी’, जिसमें आपने ‘आज की कहानी’ की जगह ‘आगे की कहानी’ की बात की है और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा दिये गये पाँच सूत्रों में अपने भी पाँच सूत्र जोड़े हैं। सर्वेश्वर जी के पाँच सूत्र हैं--1. पश्चिमी फैशनपरस्त अंधानुकरण से बचो। 2. शिल्प को आतंक मत बनाओ। 3. उनके लिए भी लिखो जो अर्द्धशिक्षित हैं और उनके लिए भी जो अशिक्षित हैं, जिन्हें तुम्हारी कहानी पढ़कर सुनायी जा सके। 4. इस देश की तीन-चैथाई जनता की सोच-समझ को वाणी दो, जो वह खुद नहीं कह सकती। और, 5. कहानी को लोककथाओं और ‘फेबल्स’ की सादगी की ओर मोड़ो, उनके विन्यास से सीखो, और उसे आम आदमी के मन से जोड़ो। और आपके पाँच सूत्र हैं--1. चालू विमर्शों की कहानी लिखने से बचो। 2. बदलते हुए यथार्थ को देखो और यथार्थ को बदलने के लिए लिखो। 3. दुनिया भर के उत्कृष्ट कहानी-लेखन से सीखो, पर अपनी कथा परंपरा में और अपनी जनता के लिए लिखो। 4. साहित्य की बदली हुई शब्दावली को आँख मूँदकर मत अपनाओ। 5. वैश्विक पूँजीवाद के विरुद्ध वैश्विक समाजवाद का स्वप्न साकार करने के लिए अच्छी कहानियाँ बेखटके गढ़ो। इन दस सूत्रों को एक कसौटी मान लिया जाये, तो पिछले ढाई दशकों के दौर के कहानी लेखन पर क्या राय बन सकती है? 

रमेश उपाध्याय : सच कहूँ, तो कोई ज्यादा अच्छी राय नहीं बनती। पश्चिमी फैशनों का अंधानुकरण कम होने के बजाय बढ़ा है। शिल्प को आतंक बनाने वालों की संख्या तो ज्यादा नहीं बढ़ी है, पर वे बहुत महत्त्वपूर्ण माने गये हैं। अर्द्धशिक्षितों और अशिक्षितों में तो दलित, स्त्री, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि सभी होते हैं, जिन्हें एक शब्द में गरीब कहा जा सकता है और ‘गरीब’ एक वर्गीय अवधारणा है। लेकिन पिछले ढाई दशकों में समाज को वर्गीय दृष्टि से देखा जाना कम हुआ है और उसे जाति, लिंग, समुदाय, संप्रदाय आदि के आधार पर ज्यादा देखा गया है। इसलिए किसान और मजदूर हिंदी कहानी से गायब-से हो गये हैं। कहानी को आम आदमी के मन से जोड़ने वाली सीधी-सच्ची जनभाषा के निकट की भाषा अपनाने के बजाय अखबारी या अनुवाद की-सी भाषा में कहानी लिखी जा रही है। साहित्यिक आंदोलनों की जगह जो अस्मिता विमर्श चले, उनसे कहानी लेखन एक प्रकार के चालू अनुभववादी लेखन में बदल गया है, जिससे यथार्थवादी रचना और आलोचना की बहुत हानि हुई है। कुल मिलाकर आज की कहानी का परिदृश्य काफी निराशाजनक है। 

शंकर : लेकिन अच्छी कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं। आपने स्वयं ‘नया ज्ञानोदय’ के अपने स्तंभ ‘लगे हाथ’ में आज की कई अच्छी कहानियों की चर्चा की है। 

रमेश उपाध्याय : अच्छी-बुरी दोनों तरह की कहानियाँ हर दौर में लिखी जाती हैं। लेकिन अच्छी कहानियाँ अपना प्रभाव तभी छोड़ पाती हैं, जब कहानी-समीक्षा अपना काम सही ढंग से कर रही हो या कहानीकार स्वयं अच्छी कहानियों के पक्ष में एक वातावरण बना पा रहे हों। आज ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। इसलिए खराब कहानियाँ खोटे सिक्कों की तरह अच्छी कहानियों के खरे सिक्कों को चलन से बाहर कर देती हैं। आज की कहानी का परिदृश्य तो यही है, लेकिन आगे की कहानी अब भी एक संभावना है, क्योंकि स्थानीय और भूमंडलीय यथार्थ स्वयं को बुनियादी तौर पर बदले जाने की माँग कर रहा है और हिंदी कहानी ने भूमंडलीय यथार्थवाद की दिशा में आगे बढ़ना शुरू कर दिया है। 

शंकर : आप भूमंडलीय यथार्थवाद पर इतना जोर क्यों देते हैं? 

रमेश उपाध्याय : मुझे लगता है, जीवन के हर क्षेत्र में आज एक निराशा-सी छायी हुई है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि आशा लोगों में तब जागती है, जब कोई दल, संगठन, नेतृत्व या आंदोलन अपने सही होने का विश्वास दिलाता है, अपने सफल होने की उम्मीद जगाता है, बेहतर भविष्य का सपना दिखाता है और लोगों को यह अहसास कराता है कि वे मिल-जुलकर अपने सपने को साकार कर सकते हैं। आज ऐसा कुछ भी होता नजर नहीं आता। लोग वर्तमान व्यवस्था का कोई बेहतर विकल्प चाहते हैं, लेकिन वे विकल्प खोजते हैं केवल स्थानीय स्तर पर। जैसे चुनावों के जरिये एक दल को सत्ता से हटाकर दूसरे दल को सत्ता सौंप देना। लेकिन यह कोई विकल्प नहीं होता। इससे सरकार तो बदल सकती है, व्यवस्था नहीं बदल सकती। तब नयी सरकार से भी लोगों का मोहभंग होता है और उन्हें लगता है कि कुछ भी कर लो, कुछ नहीं होता; क्योंकि व्यवस्था नहीं बदलती। लेकिन व्यवस्था बदले कैसे? वे उसे स्थानीय स्तर पर बदलना चाहते हैं, जबकि वह भूमंडलीय हो चुकी है। भूमंडलीय व्यवस्था को बदलने का काम स्थानीय स्तर पर नहीं, भूमंडलीय स्तर पर ही किया जा सकता है। इसलिए मैं भूमंडलीय यथार्थवाद पर जोर देता हूँ। और मैं चाहता हूँ कि इस बात को साहित्यकार तो समझें ही, मुक्तिकामी दल और संगठन भी समझें। 

शंकर : हिंदी में प्रेमचंद के ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ को यथार्थवाद से कुछ कमतर मानने की प्रवृत्ति रही है, लेकिन आपने उसे सही यथार्थवाद माना है। इसे कुछ स्पष्ट करेंगे? 

रमेश उपाध्याय : (हँसकर) इसे स्पष्ट करने का काम मैं कई वर्षों से विभिन्न रूपों में करता आ रहा हूँ। यहाँ संक्षेप में इतना ही कहना काफी होगा कि हिंदी में यथार्थवाद को लेकर काफी भ्रम रहे हैं और आज भी व्यापक स्तर पर फैले हुए हैं। कई लोगों को तो मालूम ही नहीं है कि यथार्थवाद हिंदी में कब आया और कैसे आया। उन्हें बताना पड़ता है कि हिंदी में यथार्थवाद ‘नेचुरलिज्म’ (प्रकृतवाद) के रूप में आया था, जिसमें जीवन को रचना में जस का तस चित्रित करने की कोशिश की जाती थी। उसमें प्रायः समाज की गंदगी, अपराध, व्यभिचार आदि के चित्र होते थे, इसलिए उसे पसंद नहीं किया जाता था और ‘नग्न यथार्थवाद’ कहा जाता था। लेकिन पश्चिम से यथार्थवाद का एक और रूप आया था, जिसमें समाज की आलोचना की जाती थी और जिसे ‘क्रिटिकल रियलिज्म’ (आलोचनात्मक यथार्थवाद) कहा जाता था। प्रेमचंद ने प्रकृतवाद या नग्न यथार्थवाद की जगह आलोचनात्मक यथार्थवाद को अपनाया और उसे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का नाम दिया। लेकिन हिंदी साहित्य में यथार्थवाद संबंधी भ्रमों में से एक बड़ा भ्रम यह भी रहा है कि यथार्थ और कल्पना, यथार्थ और स्वप्न, यथार्थ और आदर्श परस्पर-विरोधी हैं; यथार्थवादी साहित्य में कल्पना, स्वप्न और आदर्श के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए; लेखन में इनके होने से यथार्थवाद यथार्थवाद नहीं रहता; इत्यादि। इसी तर्क से प्रेमचंद के अधिकांश लेखन को आदर्शवादी कहकर खारिज किया गया और उनकी कुछ अंतिम रचनाओं को ही यथार्थवादी माना गया। मेरा कहना यह है कि यथार्थवादी साहित्य कल्पना, स्वप्न और आदर्श के बिना रचा ही नहीं जा सकता। प्रेमचंद बाद की कुछ रचनाओं के कारण नहीं, बल्कि अपने संपूर्ण लेखन के कारण महान हैं, जो आदर्शोन्मुख यथार्थवादी लेखन है। 

शंकर : हिंदी में ‘यूटोपिया’ को भी यथार्थवाद के विलोम जैसा कुछ माना जाता रहा है। मगर आपके अनुसार पूँजीवाद और समाजवाद हमारे समय के दो बड़े यूटोपिया हैं और इनके इर्द-गिर्द गांधीवाद, अंबेडकरवाद, नारीवाद, पर्यावरणवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे कई यूटोपिया हैं। समाज की पुनर्रचना के संदर्भ में साहित्यिक रचना और आलोचना में इन यूटोपियाओं की क्या भूमिका हो सकती है? 

रमेश उपाध्याय : मुझे लगता है कि हर लेखक का कोई न कोई यूटोपिया होता है, जिसके अनुसार वह अपने दृष्टिकोण से भविष्य के एक आदर्श समाज की कल्पना करता है कि वह कैसा समाज होना चाहिए। जैसे तुलसीदास रामराज्य की कल्पना करते हैं। या गांधीजी हिंद स्वराज की कल्पना करते हैं। हर लेखक अपने यूटोपिया के अनुसार दुनिया को बदलने और भविष्य का निर्माण करने की कोशिश करता है। देखने की बात यह है कि यह कोशिश वस्तुपरक दृष्टि से कितनी नैतिक और कितनी ऐतिहासिक है। बहुत-से लोग, जिनमें से कुछ स्वयं को क्रांतिकारी भी मानते हैं, इतिहास और नैतिकता में कोई संबंध नहीं देखते। इसीलिए वे नैतिक आदर्श और ऐतिहासिक जरूरत के बीच कोई सार्थक तालमेल बिठाने में असफल होते हैं। ‘‘पे्रम और युद्ध में सब चलता है’’ की तर्ज पर ‘‘राजनीति में सब चलता है’’ वाली अनैतिकता के साथ भविष्य का निर्माण करने की ऐतिहासिक जरूरत कम से कम साहित्य में तो कभी पूरी नहीं की जा सकती, क्योंकि साहित्य अंततः एक व्यक्तिगत कर्म है और उसमें निजी पहल का बड़ा महत्त्व है। यह निजी पहल किसी नैतिक आदर्श के बिना संभव नहीं है। मगर देखना यह चाहिए कि नैतिक आदर्श का ऐतिहासिक जरूरत से क्या, कितना और कैसा संबंध है। साहित्य के सौंदर्यशास्त्र में अभी इस दृष्टि से बहुत कम काम हुआ है, लेकिन इन दोनों के संबंध पर गहराई से विचार किया जाये, तो पता चलेगा कि यह संबंध रचना के साहित्यिक मूल्य और ऐतिहासिक महत्त्व को समझने में बहुत सहायक हो सकता है। 

शंकर : भारतीय समाज के संदर्भ में कौन-सा यूटोपिया ज्यादा कारगर होगा? 

रमेश उपाध्याय : मैं तो समाजवादी यूटोपिया को ही अपने देश और सारी दुनिया के लिए कारगर मानता हूँ। भूमंडलीय पूँजीवाद की जगह भूमंडलीय समाजवाद मेरा यूटोपिया है। भले ही जब उसकी स्थापना हो, तब उसका नाम समाजवाद की जगह कुछ और ही हो। 

शंकर : आपने ‘जनवादी कहानी: पृष्ठभूमि से पुनर्विचार तक’ पुस्तक लिखी है, जिसे डाॅ. नामवर सिंह ने ‘‘साहित्य का एक जीवंत इतिहास’’ कहा है। जनवादी कहानी प्रेमचंद की परंपरा की प्रगतिशील कहानी या यथार्थवादी कहानी जैसी ही कहानी है या कुछ भिन्न किस्म की कहानी है? यदि भिन्न है, तो किस रूप में? 

रमेश उपाध्याय : जनवादी कहानी प्रेमचंद की परंपरा की प्रगतिशील और यथार्थवादी कहानी का ही अगला विकास है। उस विकास को चिह्नित करने के लिए ही उसे यह नाम दिया गया है। लेकिन कई लोग इस विकास को सामाजिक और साहित्यिक संदर्भों में समझने के बजाय दलगत राजनीति के संदर्भ में समझने की गलती करते हैं। जैसे, वे प्रगतिशील कहानी को प्रगतिशील लेखक संघ तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों की कहानी मानते हैं और जनवादी कहानी को जनवादी लेखक संघ तथा माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों की कहानी। यह निहायत गलत समझ है। प्रगतिशील कहानी प्रगतिशील लेखक संघ के बनने के पहले से लिखी जा रही थी, जिसके सबसे बड़े उदाहरण स्वयं प्रेमचंद हैं। इसी तरह जनवादी कहानी जनवादी लेखक संघ के बनने के पहले से लिखी जा रही थी। जनवादी लेखक संघ की स्थापना 1982 में हुई, जबकि दिल्ली में जनवादी लेखक मंच की स्थापना उसके एक दशक पहले 1973 में हो चुकी थी और उस मंच से पढ़ी गयी जनवादी कहानियाँ चर्चित हो चुकी थीं। 1976 में मेरा तीसरा कहानी संग्रह ‘नदी के साथ’ आया था, जिसे जनवादी कहानियों का पहला संग्रह कहा गया था। और 1978 में दिल्ली के ही जनवादी विचार मंच द्वारा एक बड़े लेखक सम्मेलन में ‘जनवादी साहित्य के दस वर्ष’ विषय पर कई सत्रों में विचार किया गया था और उनमें पढ़े गये परचों को इसी नाम से पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था। इस प्रकार जनवादी लेखक संघ बनने के बहुत पहले जनवादी कहानी अस्तित्व में आ चुकी थी। जहाँ तक प्रगतिशील कहानी और जनवादी कहानी के भिन्न होने का प्रश्न है, उसमें ज्यादा भिन्नता नहीं है, सिवाय इसके कि दोनों में यथार्थ के विश्लेषण की भिन्नता के कारण यथार्थवाद की समझ कुछ भिन्न हो सकती है। 

शंकर : आपका बहुत महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘हरे फूल की खुशबू’ दो जीवन-दृष्टियों, दो तरह के मूल्यों और दो तरह के उद्देश्यों के बीच के अंतर्विरोधों को कलाकार रमणीक लाल और उसकी कलाकार पत्नी अलका के माध्यम से सामने लाता है। लेकिन सूक्ष्म संवेदनाओं वाला यथार्थवादी उपन्यास होते हुए भी इसमें किसी प्रकार की आदर्शोन्मुखता नजर नहीं आती। आरंभ में रमणीक लाल एक सकारात्मक पात्र लगता है, किंतु बाद में वह बिलकुल नकारात्मक हो जाता है। इस पर आपको क्या कहना है? यह भी बतायें कि इस उपन्यास के लिखे जाने की प्रेरणा या पृष्ठभूमि क्या है? 

रमेश उपाध्याय : ‘हरे फूल की खुशबू’ की पृष्ठभूमि यह है कि मैं सातवें दशक में दिल्ली में कुछ समय बेरोजगार रहा था। उन दिनों मैं फ्रीलांसिंग करता था और पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए तरह-तरह के काम किया करता था। उन कामों में से एक था दिल्ली में होने वाली कला-प्रदर्शनियों की समीक्षाएँ लिखना और कलाकारों के इंटरव्यू लेना। इसके चलते मैंने देशी-विदेशी चित्रकला के बारे में खूब पढ़ा और दिल्ली के कला-जगत तथा कलाकारों के जीवन को निकट से देखा। उसी समय के अनुभवों को मैंने 1990 में उपन्यास के रूप में लिखा। लेकिन इसके पात्र रमणीक लाल और अलका कोई वास्तविक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस समय के दिल्ली के कला-जगत के दो प्रातिनिधिक चरित्र हैं, जिनकी रचना अनेक वास्तविक व्यक्तियों की चारित्रिक विशेषताओं को मिलाकर की गयी है। मैंने इस उपन्यास में दिखाया है कि कला के क्षेत्र में एक ओर संगठित व्यावसायिकता है, तो दूसरी ओर व्यक्तिगत अराजकता। दोनों के बीच एक सतही किस्म का द्वंद्व या संघर्ष दिखायी पड़ता है, जो बाद में समझौते में बदल जाता है और अराजक व्यक्तिवादी कलाकार अंततः संगठित व्यावसायिकता को समर्पित हो जाता है। 

शंकर : रमणीक लाल की निस्संदेह बहुत सारी दुविधाएँ हैं, किंतु इस उपन्यास के अंत को मैं इस तरह नहीं देख पा रहा हूँ। समझौता और समर्पण उस स्थिति को कहा जायेगा, जब कोई सुचिंतित रूप से ऐसा करे। यहाँ रमणीक लाल दुविधा में है और उपन्यास के अंतिम प्रसंग में वह बेमन से एक अदृश्य आक्रोश के साथ कैनवस पर रंग फेंकता है, जिससे अनायास एक पेंटिंग बन जाती है और व्यावसायिकता के तंत्र को यह पेंटिंग बहुत काम की लगती है, क्योंकि रमणीक लाल एक जाना-माना नाम है और कला का व्यवसाय-तंत्र ऐसे नामों की तलाश में रहता है, ताकि वह उन्हें इस्तेमाल कर सके। इस प्रकार यह उपन्यास वास्तव में रमणीक के चरित्र के एक्सपोजर का नहीं, व्यावसायिकता के चरित्र के एक्सपोजर का उपन्यास है। मेरे विचार से यही इस उपन्यास की सही व्याख्या है। क्या इस उपन्यास को इस तरह नहीं समझा जाना चाहिए? 

रमेश उपाध्याय : शंकर जी, आपने उपन्यास को बिलकुल सही समझा है। उसमें मेरी कोशिश कला के व्यावसायिक तंत्र के वास्तविक चरित्र को सामने लाने की ही रही है और रमणीक लाल के माध्यम से उसे ही सामने लाया गया है। मगर मैं यह भी दिखाना चाहता था कि कला जगत में एक तरफ संगठित व्यावसायिकता है, जिसका एक पूरा तंत्र देश से विदेशों तक फैला हुआ है, तो दूसरी तरफ है एक अद्वितीय प्रतिभाशाली कलाकार की व्यक्तिगत अराजकता। रमणीक लाल पूरी ‘ईमानदारी’ के साथ ‘विद्रोही’ हो सकता है और व्यावसायिकता के विरुद्ध उसमें सच्चा ‘आक्रोश’ हो सकता है। लेकिन कला को जन-जन तक पहुँचाने की अपनी सदिच्छा पूरी करने के लिए वह कुछ करता नहीं है। उसके लिए किसी वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोचने और उसके लिए कुछ करने के बजाय अंततः ‘बेमन से’ ही सही, वह उसी व्यवस्था को समर्पित हो जाता है। 

शंकर : आपके उपन्यास ‘स्वप्नजीवी’ का मुख्य पात्र शिवेंद्र सान्याल भी लगभग रमणीक लाल जैसा ही एक विद्रोही चरित्र है, जो सिनेमा की दुनिया में दूसरों से भिन्न अपना कुछ नया करना चाहता है और नहीं कर पाता। वह भी अत्यंत प्रतिभाशाली है और व्यावसायिक सिनेमा की दुनिया से समझौता न कर पाने के कारण अंततः पागलपन की-सी स्थिति में पहुँच जाता है। लेकिन स्वप्नजीवी की चर्चा मैं उसे लेकर नहीं, बल्कि इसलिए कर रहा हूँ कि आपके लेखन में स्वप्नों का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। ‘स्वप्नजीवी’ उपन्यास के अलावा आपकी स्वप्न-संबंधी कहानियाँ हैं ‘स्वप्न-कथा’, ‘आप जानते हैं’ और ‘मेरे दोस्त का सपना’; आपके स्वप्न-संबंधी निबंध हैं ‘हमारे समय के स्वप्न’ तथा ‘भविष्य-स्वप्न का लोप और उसकी पुनप्र्राप्ति’; और अंततः आपकी पुस्तक है ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’। आप यथार्थवादी लेखक होकर भी अपने लेखन में स्वप्नों को इतना महत्त्व क्यों देते हैं? 

रमेश उपाध्याय : पाश की वह कविता है न--‘‘सबसे खतरनाक होता है हमारे स्वप्नों का मर जाना।’’ मुझे लगता है कि हम ऐसे ही खतरनाक समय में जी रहे हैं। शायद इसीलिए साहिर लुधियानवी ने अपनी एक नज्म में कहा था--‘‘आओ कि आज गौर करें इस सवाल पर, देखे थे हमने जो वो हसीं ख्वाब क्या हुए? दौलत बढ़ी तो मुल्क में इफलास क्यों बढ़ा? खुशहालि-ए-अवाम के असबाब क्या हुए?’’ मेरे उपन्यास ‘स्वप्नजीवी’ का शिवेंद्र सान्याल अपने साथ के लोगों से व्यंग्यपूर्वक कहता है--‘‘मुझे लगता है कि तुम सबके सपनों की आधारशिलाएँ रखी जा चुकी हैं और मैं अभी तक प्लाॅट ही ढूँढ़ रहा हूँ।’’ मुझे लगता है, आज बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो ठेठ वर्तमान में जीते हैं और भविष्य का कोई स्वप्न उनके पास नहीं है। मैं अपने समय के इस यथार्थ को देखता हूँ और दहशत से भर जाता हूँ, क्योंकि मैं अतीत और वर्तमान के साथ-साथ भविष्य के बारे में भी सोचता हूँ। स्वप्न का संबंध भविष्य से होता है। शायद इसीलिए मैं अपने लेखन में बार-बार स्वप्नों की बात करता हूँ। जहाँ तक स्वप्न और यथार्थ का संबंध है, मेरा मानना है कि एक बेहतर भविष्य का स्वप्न देखने वाला ही यथार्थवादी हो सकता है। मुक्तिबोध महान स्वप्नद्रष्टा हैं, इसी कारण वे महान यथार्थवादी हैं। साहित्य और कला की दुनिया में व्याप्त व्यावसायिकता के विरुद्ध यथार्थवादी लेखक-कलाकार ही लड़ सकते हैं, भले ही वे उस लड़ाई में हार जायें और दूसरों की नजरों में सिरफिरे या पागल होकर ही रह जायें। 

शंकर : हल्की-फुल्की मनोरंजन प्रधान सामग्रियों से ज्यादा से ज्यादा पाठक हासिल करके व्यवसाय करने वाली पत्रिकाओं की काट में साहित्यिक लघु पत्रिकाएँ सामने आयी थीं। आप एक उत्कृष्ट संपादक रहे हैं और आपने ‘कथन’ जैसी स्तरीय विचार-प्रधान साहित्यिक पत्रिका का संपादन किया है। आपने एक लेख में साहित्यिक लघु पत्रिकाओं को भी दो रूपों में देखा है--एक सिर्फ लेखकों के लिए निकलने वाली साहित्यिक लघु पत्रिकाएँ और दूसरी लेखकों के साथ-साथ पाठकों के लिए भी निकलने वाली साहित्यिक लघु पत्रिकाएँ। साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के इन दोनों रूपों को कुछ और स्पष्ट करें। 

रमेश उपाध्याय : शंकर जी, आप स्वयं एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक लघु पत्रिका ‘परिकथा’ के कुशल संपादक हैं। आपने लघु पत्रिकाओं के विभिन्न रूप देखे हैं और उनके बीच अपनी पत्रिका की एक अलग पहचान बनायी है, जो एक जनोन्मुख साहित्यिक पत्रिका की पहचान है। लेकिन हिंदी में निकलने वाली कुछ लघु पत्रिकाएँ ‘‘लेखकों की, लेखकों के द्वारा, लेखकों के लिए’’ निकलने वाली अभिजनोन्मुखी पत्रिकाएँ हैं। मैं यह मानता हूँ कि साहित्यिक लघु पत्रिका साधारण और विशिष्ट दोनों तरह के पाठकों के लिए होनी चाहिए। आप और मैं लघु पत्रिका आंदोलन में शामिल रहे हैं और उस राष्ट्रीय लघु पत्रिका समन्वय समिति में भी सक्रिय रहे हैं, जिसमें आज के बाजारवाद और मीडिया को ध्यान में रखते हुए लघु पत्रिकाओं की एक नयी भूमिका पर जोर दिया गया था। उसके अनुसार साहित्यिक लघु पत्रिकाओं को अव्यावसायिक रहते हुए भी व्यापक पाठक समुदाय तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए। 

शंकर : प्रगतिशीलता, जनवाद और समाजवाद में विश्वास न करने वाले उन लेखकों के लिए, जो किसी राजनीतिक दल या लेखक संगठन से न जुड़े होने पर भी पूँजीवाद, साम्राज्यवाद और संप्रदायवाद के विरुद्ध मानवीय मूल्यों के पक्षधर हो सकते हैं, वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं की जिम्मेदारी बनती है या नहीं? 

रमेश उपाध्याय : क्यों नहीं? उन्हें ऐसे लेखकों को साथ लेकर चलना चाहिए। 

शंकर : रमेश जी, आपके चिंतन और लेखन में एक गहरा आशावाद मौजूद है। आपका यह लेखकीय विश्वास कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बहुत कुछ संभव है, बार-बार सामने आता है। आपने साहित्य को भूमंडलीय यथार्थवाद की जो नयी और महत्त्वपूर्ण अवधारणा दी है, उसका आधार भी आपका यह आशावाद है कि वैश्विक पूँजीवाद को वैश्विक समाजवाद में बदला जाना आवश्यक ही नहीं, बल्कि संभव भी है। यह बतायें कि आपके इस आशावाद का आधार क्या है? 

रमेश उपाध्याय : (व्यंग्यपूर्वक मुस्कराते हुए) दुनिया के बदल सकने के बारे में आशावादी होना आजकल अच्छा नहीं माना जाता, बल्कि यथार्थ को न समझने की निशानी माना जाता है। शायद यह मान लिया गया है कि दुनिया जितनी बदलनी थी, बदल चुकी, अब और कभी नहीं बदलेगी। यानी अब हमेशा पूँजीवाद ही चलेगा। लेकिन दुनिया हमेशा बदलती रही है और छोटे-छोटे निराशाजनक बदलावों के बाद अचानक किसी बड़े गुणात्मक बदलाव के हो जाने पर बेहतर भी बनती रही है। यह इतिहास और विज्ञान दोनों का सच है और यह सच ही मुझे आशावादी बनाता है। किसी व्यवस्था के बने रहने के कुछ आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आधार होते हैं। लेकिन उसका एक आधार नैतिक भी होता है। जब कोई व्यवस्था अपने बने रहने का नैतिक आधार खो देती है, तो वह ज्यादा देर टिकी नहीं रह सकती। आज के भूमंडलीय पूँजीवाद के पास स्वयं को टिकाये रखने के लिए दमन और ध्वंस की दानवीय शक्तियाँ तो हैं, पर मानवीय मूल्यों वाली कोई नैतिक शक्ति उसके पास नहीं रह गयी है। लेकिन ऐसी व्यवस्था ज्यादा देर चल नहीं सकती। देर-सबेर उसका बदलना और उसकी जगह एक बेहतर व्यवस्था का बनना अवश्यंभावी है। यही आज का भूमंडलीय यथार्थ है और इसी से उद्भूत भूमंडलीय यथार्थवाद मेरे आशावाद का आधार है। 

शंकर : पाठक आपसे यह जानना चाहेंगे कि पूँजीवाद की वैश्विक व्यवस्था की जगह कोई बेहतर वैश्विक व्यवस्था किन आधारों पर, किन शक्तियों के द्वारा और किन तरीकों से बनायी जा सकती है। 

रमेश उपाध्याय : पूँजीवाद से बेहतर जो भी वैश्विक व्यवस्था बनेगी, मनुष्यों के द्वारा और मनुष्यता के आधार पर ही बनेगी। लेकिन यह भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि वह व्यवस्था कब और कैसे बनेगी। हम यह भी नहीं कह सकते कि भविष्य में बनने वाली उस व्यवस्था का नाम क्या होगा। फिलहाल हम भूमंडलीय पूँजीवाद की जगह लेने वाली व्यवस्था को भूमंडलीय समाजवाद ही कह सकते हैं। ऐसी व्यवस्था किसी भूमंडलीय क्रांति से ही बन सकती है। अब तक दुनिया में जो क्रांतियाँ हुई हैं, उनका आधार राष्ट्रीय रहा है--जैसे फ्रांस की क्रांति, रूस की क्रांति, चीन की क्रांति। माक्र्सवाद ने वैश्विक क्रांति का स्वप्न देखा और उसका आधार राष्ट्रीयता को नहीं, अंतरराष्ट्रीयता को बनाया। इसलिए समाजवाद का एक आधार अंतरराष्ट्रीयतावाद रहा। माक्र्स-एंगेल्स या लेनिन-माओ के समय तक दुनिया को बदलने की सोच राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर अंतरराष्ट्रीयता तक ही पहुँची थी, इसलिए समाजवादी क्रांति राष्ट्रीय स्तर पर घटित होने वाली परिघटना होती थी, जिसे व्यापक बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रांति की बात सोची जाती थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीयता में राष्ट्र तो निहित रहता ही है, जो एक पूँजीवादी अवधारणा है। राष्ट्र में अपने भीतर अधिनायकवादी वर्चस्व और अपने से बाहर साम्राज्यवादी प्रभुत्व कायम करने की प्रवृत्ति होती है। रूस और चीन की समाजवादी क्रांतियाँ राष्ट्रीय स्तर की क्रांतियाँ थीं और उनसे जो व्यवस्थाएँ बनीं, उनमें ये दोनों प्रवृत्तियाँ थीं, इसलिए वहाँ जो व्यवस्था बनी, वह वास्तव में समाजवादी व्यवस्था नहीं, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था का ही एक भिन्न रूप थी। इसीलिए उसे पुनः पूँजीवाद में बदल जाने में ज्यादा देर नहीं लगी। लेकिन पूँजीवादी भूमंडलीकरण ने राष्ट्र की अवधारणा को हिला दिया है और वैश्विक क्रांति के लिए अंतरराष्ट्रीयता की जगह भूमंडलीयता के आधार पर वैश्विक पूँजीवाद की जगह वैश्विक समाजवाद की व्यवस्था को आवश्यक और संभव बना दिया है। मेरा खयाल है कि अब जो क्रांतियाँ होंगी, वे राष्ट्रीय स्तर से आगे बढ़कर वैश्विक या भूमंडलीय स्तर की होंगी। 

शंकर : अंतिम सवाल: आप इन दिनों क्या लिख रहे हैं और आगे क्या करना चाहते हैं? 

रमेश उपाध्याय : इन दिनों मेरे बच्चे मेरे इंटरव्यू के रूप में मेरा साहित्यिक सफरनामा तैयार कर रहे हैं। आजकल मैं उसी में व्यस्त हूँ। आगे ‘भूमंडलीयता और परिपूर्ण मनुष्यता’ नामक एक पुस्तक लिखने का विचार है। यह विचार मेरे मन में ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’ पुस्तक लिखते समय आया था और धीरे-धीरे पक रहा है।

Saturday, December 15, 2018

मौत से पहले आदमी

'वागर्थ' के दिसंबर, 2018 के अंक में हमारी कहानी 'मौत से पहले आदमी' प्रकाशित हुई है. पढ़ें और प्रतिक्रिया से अवगत करायें.-- रमेश उपाध्याय



चारों ओर एक मनहूस धुंध छायी हुई थी। साफ-साफ कुछ भी देख पाना मुश्किल था। उसे महसूस हुआ कि अब वह कुछ भी साफ-साफ नहीं देख पायेगा। ‘‘हो सकता है, ये मेरा वहम ही हो।’’ उसने सोचा। उसे लगा कि वह बेहोश है, या कम से कम इतना तो है ही कि नींद पूरी तरह नहीं खुली है। ‘‘नींद और बेहोशी में क्या कोई फर्क नहीं होता?’’ उसने स्वयं से पूछा। ‘‘क्या दोनों स्थितियों में धुंध ही दिखायी देती है?’’ उसने दिमाग पर जोर दिया। ‘‘लेकिन मैं सोया था या बेहोश हुआ था? सोया था तो कहाँ और बेहोश हुआ था तो क्यों? ये जगह कौन-सी है, जहाँ मैं पड़ा हूँ?’’

उसने हाथ-पैरों को तानकर उठने की कोशिश की, लेकिन उस कोशिश में उसका अंग-अंग दर्द से कराह उठा। ‘‘यह दर्द?’’ उसकी आँखें मुँद गयीं और उस मनहूस धुंध की जगह कुछ लाल-काले धब्बे उभर आये। रेशमी-से वे लाल-काले धब्बे आँखों में थोड़ी देर फैलते-सिकुड़ते रहे और फिर न जाने किस रास्ते से कहीं बह गये। उसे लगा, वह अवसन्न होता जा रहा है। ‘‘अचेत होते जाने की अनुभूति स्वयं की जा सकती है क्या!’’ उसने फिर सोचा और स्वयं से पूछा, ‘‘मैं अचेत क्यों हो रहा हूँ?’’

‘‘सपना है। डरावना सपना। कभी-कभी ऐसा हो जाता है। अभी ये सपना टूट जायेगा। आँखें खुल जायेंगी और सब ठीक हो जायेगा। सारी असंभाव्यता की जगह वास्तविकताएँ लौट आयेंगी और मैं स्वयं को बिस्तर पर पड़ा हुआ मिलूँगा। जागता हुआ। सना पास ही सोयी हुई होगी। उसे जगा लूँगा और कहूँगा--उठकर मुझे एक गिलास पानी पिला दो। पानी पीने के बाद नींद ठीक से आ जायेगी।’’ इस राहत तक पहुँचकर भी वह सही-सही निश्चय नहीं कर पाया कि वह नींद में है या बेहोशी में, सोया हुआ है या जाग रहा है। ‘‘मेरे हाथ कहाँ हैं? सीने पर तो नहीं रखे हुए हैं? सना कहा करती है कि सीने पर हाथ रखा रह जाये, तो डरावने सपने आते हैं। सना सच कहती है। मैं कई बार के अनुभव से उसकी बात की सच्चाई को परख चुका हूँ...लेकिन जब मैं ये जान रहा हूँ कि ये सपना है तो ये सपना कैसे हो सकता है? कहीं, कुछ गड़बड़ है, सना...’’

उसने देखा, वह एक पहाड़ी पर चढ़ रहा है। पहाड़ी पर हर तरफ अनगढ़ और नुकीले पत्थर हैं और कँटीली झाड़ियाँ हैं, जिनमें उसके पायजामे के पाँयचों का खुलापन उलझ रहा है। हालाँकि पास ही एक साफ-सुथरा सीमेंट का बना रास्ता है, जिस पर आराम से चला जा सकता है, लेकिन रास्ते के किनारे एक तख्ती लगी हुई है, जिस पर लिखा है--केवल नीचे जाने के लिए। यह पढ़कर उसे बुरा लगा है। उसे अपने दफ्तर की लिफ्ट याद आ गयी है, जिसके बारे में न जाने किस अहमक ने ये नियम बना दिया था कि लिफ्ट सिर्फ ऊपर जाने के लिए है, उतरने के लिए सीढ़ियों का प्रयोग कीजिए। इस नियम पर उसे बहुत क्रोध आया करता है, क्योंकि जब वह जल्दी में सीढ़ियों से उतरा करता है, उसे हमेशा आशंका बनी रहती है कि वह किसी दिन यों ही उतरते हुए गिर पड़ेगा और सीढ़ियों पर गोल-गोल लुढ़कता हुआ नीचे जा पड़ेगा--औंधे मुँह। और नीचे पहुँचने तक उसके प्राण निकल चुके होंगे।

लेकिन यहाँ तो उलटा नियम है--चढ़ने के लिए यह ऊबड़-खाबड़ कँटीली-पथरीली पहाड़ी और उतरने के लिए यह सीधा-सपाट सीमेंटी रास्ता। फिर भी वह मन में बड़ी कोफ्त महसूस करते हुए पहाड़ी पर चढ़ता रहा। ‘‘जगह यह जरूर जानी-पहचानी है।’’ उसने सोचा, ‘‘नींद खुलने पर मैं सोचकर इस जगह का नाम बता सकता हूँ, लेकिन अभी उसकी जरूरत नहीं है। अभी तो यह देखूँ कि इस पहाड़ी पर बनी उस इमारत के भीतर क्या है।’’

उसे आश्चर्य हुआ कि अगले ही क्षण वह उस इमारत के अंदर था और उसे महसूस हुआ कि अंदर का मौसम बदला हुआ है। गर्म और चमकीली धूप से भरा हुआ, और सामने एक ऊँची-लंबी दीवार के सिवा कुछ भी नहीं है। दीवार सपाट है और उसमें ऊपर की ओर एक--सिर्फ एक--अंधी खिड़की है, जिसमें कोई रोशनी, कोई चेहरा नहीं है। ‘‘क्या दीवार के उस पार रात हो गयी है?’’ उसने स्वयं से सवाल किया, लेकिन जवाब नहीं दे पाया। उसी समय उस अंधी खिड़की से एक झंडे की शक्ल में कोई चीज बाहर निकली और झूल गयी। झंडा ही था। लाल और उस पर एक स्वस्तिक का चिह्न। ‘‘ये हिटलर का झंडा है क्या? तो क्या मैं नात्सी जर्मनी में हूँ?’’ उसने स्वप्न की असंभाव्यता पर जोर से हँसना चाहा, लेकिन तभी वह अजीब-से खौफ से जकड़-सा गया और उसे लगा, किसी ने उसे उठाकर ‘केवल नीचे जाने के लिए’ वाले रास्ते पर लुढ़का दिया है और वह लुढ़कता जा रहा है। लहूलुहान होता जा रहा है...थोड़ी देर और...और वह नीचे जा पड़ेगा...औंधे मुँह...और नीचे पहुँचने पर उसके प्राण निकल चुके होंगे...

हड़बड़ाकर उसने आँखें खोल दीं। फिर वही मनहूस धुंध दिखायी दी, लेकिन अपने घर की परिचित दीवारें नहीं। एक ओर कुछ पीलापन-सा दिखायी दिया। गौर से देखा, तो कुछ सरसों के फूल बिखरे दिखायी दिये। हरियाली और पीलापन। ‘‘हरे पत्ते और पीले फूल? ये मैं कहाँ आ गया हूँ? सना कहाँ है? सना...।’’ उसने फिर उठने की कोशिश की, लेकिन फिर उसके अंग भयंकर पीड़ा से कराह उठे। उसे लगा कि दर्द मोटी-मोटी रस्सियों की शक्ल में उसके सारे जिस्म पर बँधा हुआ है। हाथों को शायद लकवा मार गया है कि वे हिल भी नहीं सकते। वह सिर भी नहीं उठा सकता। ऐसा हो सकता, तो वह उचककर कम से कम अपनी हालत तो देख सकता। ‘‘यह क्या हो गया है मुझे?’’ उसने अंदर ही अंदर चीखकर पूछा और अपनी बेबसी पर एक वहशी पागलपन से भर उठा कि उसका वश चले, तो स्वयं को मार-मारकर अधमरा कर दे।

‘‘मार-मारकर अधमरा...?’’ उसे कुछ याद आया? मुँदती आँखों में बंद फैलते-सिकुड़ते लाल-काले रेशमी धब्बों की शक्ल में हल्का-सा कुछ याद आया, लेकिन कुछ भी साफ नहीं हो सका। ‘‘मारेगा कोई क्यों मुझे? मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है? बचपन से अब तक कोई अपराध नहीं किया। किसी को छेड़ा-सताया नहीं। पढ़ता था तब भी, और पढ़ाई के बाद अब इतने वर्षों से नौकरी कर रहा हूँ, सो अब भी पूरे अनुशासन में रहता हूँ। किसी से कोई कड़वी बात नहीं कहता। सबके साथ प्यार और आदर से पेश आता हूँ। यथासंभव सबकी सेवा और सहायता करता हूँ। उनकी भी, जो मुझसे बेवजह नफरत करते हैं। फिर कोई क्यों मारेगा मुझे? गलत है। बकवास है। सपना है। अभी नींद टूटने पर सब ठीक हो जायेगा। सना, तुम जरा उठकर मुझे झकझोर दो न! सुनो, तुम मुझे झिंझोड़कर जगा दो और एक गिलास पानी पिला दो...’’

उसे लगा कि सना बहुत गहरी नींद में है। जाग नहीं सकती, जब तक कि उसे खूब झिंझोड़कर जगाया नहीं जाये। क्या मुसीबत है! इस स्वप्न को देखते चले जाने के सिवा कोई चारा नहीं है। लेकिन ये सरसों के पीले फूल यहाँ क्यों हैं?...नाइजर नदी के किनारे उसका गाँव था, उसका अपना घर था, जहाँ से पकड़कर उसे बेच दिया गया था और एक दिन अपने मालिक के खेत में काम करते-करते वह सो गया था और सपने में वह नीग्रो गुलाम नाइजर नदी के किनारे पहुँच गया था।...लेकिन मेरा घर तो सरसों के फूलों के पास नहीं था। मैं तो...मैं तो...हाँ, याद आया, मैं तो महात्मा गांधी लेन के आखिरी स्क्वायर में रहता हूँ...अपने फ्लैट की हर चीज को मैं अच्छी तरह पहचानता हूँ। फिर ये हरे पत्ते और पीले फूल? यह सब क्या है? मेरी नींद क्यों नहीं टूटती है? यह सपना कब तक चलेगा?’’

अचानक उसे अपने दाहिने हाथ में, हाथ की उँगलियों में कुछ हरकत होती हुई-सी महसूस हुई। ‘‘क्या मेरी चेतना लौट रही है? हाँ। अभी सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा। लेकिन मेरी उँगलियाँ ये क्या टटोल रही हैं? घास? लेकिन मेरे बिस्तर पर घास कहाँ से आ गयी? सना के बाल तो नहीं? सना के बालों की छुअन को तो मैं अच्छी तरह पहचानता हूँ। यह घास ही है--ताजा गीलापन, नुकीलापन--लेकिन मेरे न चाहते हुए भी मेरे हाथ की उँगलियाँ थोड़ी-सी घास तोड़कर आँखों के सामने क्यों ले आती हैं?’’

दूर से आती हुई घूँ-घर्रर्रर्र की आवाज पास आकर दूर चली गयी। ‘‘शायद कोई ट्रक था!? तो क्या मैं किसी सड़क के किनारे...? ओफ्फ...!’’

जैसे अँधेरे में भक्क से कोई बल्ब जल उठे, उसे याद आया कि वो फिल्म का नाइट शो देखकर सना के साथ घर लौट रहा था...अपनी कार में...पीछा करती एक जीप ने आगे आकर रास्ता रोक लिया था...वे कई थे। उनमें से कुछ उसे मार रहे थे...कुछ सना को उठाकर ले जा रहे थे...सना चीख रही थी, ‘‘छोड़ो मुझे, दरिंदो, छोड़ो मुझे!’’
स्मृति का बल्ब फिर बुझ गया। उसे फिर महसूस हुआ कि वह अभी तक अपने दुःस्वप्न से उबर नहीं पाया है। वही मनहूस धुंध आँखों में फिर से घिर आयी। उसे फिर अपनी चेतना लुप्त होती हुई महसूस हुई। राहत-सी मिली। ‘‘नहीं, यह सच नहीं हो सकता। मैं स्वप्न में हूँ और उस बर्बर युग में पहुँच गया हूँ, जिसमें कभी भी किसी लुटेरे की फौज अँधेरे की तरह घिर आती थी, रक्तपात होता था, लूट मचती थी और भूखे फौजी परास्त देश की स्त्रिायों पर सामूहिक बलात्कार करते थे...

उसे याद आया, उसने अपनी कार से उस जीप का पीछा किया था...फिर एक जगह उसने अपनी कार रोकी थी और सना को उन बदमाशों के चंगुल से छुड़ाने के लिए उतरा था और वे भी उतरे थे और वे उसे मारकर फेंक गये थे...सना चीख रही थी, ‘‘छोड़ो मुझे, उसके पास जाने दो...वह मर जायेगा...’’ वे उसकी कार भी ले गये थे।

उसने पूरा जोर लगाकर उठने का प्रयत्न किया। चीखना भी चाहा। लेकिन शरीर का कोई भी हिस्सा उठ नहीं रहा था और गले में कोई गाढ़ी-सी तरल चीज भरी हुई थी, जिसे उगलना या निगलना संभव नहीं लग रहा था। उसकी साँस घुट रही थी। एक बार फिर उसने स्वयं को अचेत होते हुए महसूस किया। अब उसे अपने ऊपर आसमान में उड़ती हुई चील दिखायी दे रही थी। रोशनी, जो कुछ-कुछ साफ हो आयी थी, फिर बुझने लगी और आँखों में आतिशबाजी के गरम फूल खिलने लगे। ‘‘यह मुझे क्या हो गया है?’’ उसने दिमाग पर जोर देकर सोचने की कोशिश की। यह सपना तो हरगिज नहीं है। ‘‘फिर क्या है? फिर क्या है यह? कोई मुझे बताता क्यों नहीं है?’’
उसने तड़पकर उठने की कोशिश की। उसे अपने लहूलुहान जिस्म की एक झलक दिखायी दी और उसके सारे जख्म एक साथ दहक उठे। उसे लगा कि उस पर मक्खियाँ भिनभिना रही हैं और किसी किस्म के कीड़े उसे जगह-जगह से कुतर रहे हैं...

वह उलटा लेटकर अपना चेहरा घास में छिपा लेना चाहता था, लेकिन उलटते ही उसका मुँह खुल गया और आँखों के करीब कोई लाल चीज बिखर गयी। ‘‘खून है...मेरा खून...’’ उसने सोचा और अपने-आपको बेहद कमजोर महसूस करते हुए आँखें मूँद लीं।

बंद आँखों के बड़े परदे पर सना के चेहरे का क्लोजअप उभर आया।

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Thursday, February 1, 2018

साहित्यिक आंदोलन और लेखक संगठन

पिछले दिनों प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच तीनों ही लेखक संगठनों में एक उत्साहवर्धक सक्रियता दिखायी दी है. किन्हीं भी कारणों से, किन्ही भी उद्देश्यों से और किन्हीं भी लोगों के प्रयासों से यह संभव हुआ हो, स्वागतयोग्य है. इस संदर्भ में 'परिकथा' पत्रिका के नए अंक (जनवरी-फरवरी, 2018) में प्रकाशित हमारा लेख 'साहित्यिक आंदोलन और लेखक संगठन' प्रस्तुत है.--रमेश उपाध्याय


‘परिकथा’ के सितंबर-अक्टूबर, 2017 के अंक में शंकर ने अपने संपादकीय ‘लेखक संगठन और यह समय’ में बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों और इक्कीसवीं सदी के पहले दो दशकों के हिंदी साहित्य की तुलना करते हुए कहा है कि तब के लेखन के एक बड़े हिस्से में जो गुण थे, वे अब के लेखन के एक बड़े हिस्से में या तो अनुपस्थित हैं या दुर्गुणों में बदल गये हैं। उनके अनुसार तब के लेखन में यथार्थवाद, लोकोन्मुखता और सामाजिक सरोकारों को सर्वोच्चता प्राप्त थी, अब के लेखन में या तो इनसे इनकार है या इनकी उपस्थिति बहुत धुँधली है। तब के लेखन में अंतर्वस्तु को प्रमुखता दी जाती थी, अब के लेखन में रूप को प्राथमिकता दी जाती है। तब के लेखन में निजी या वैयक्तिक किस्म के विषय कम होते थे, अब के लेखन में वे बहुतायत में पाये जाते हैं और महिमामंडित भी किये जाते हैं। तब के लेखन में आत्मालोचना दिखती थी, अब के लेखन में उसकी जगह गहरी आत्ममुग्धता दिखती है। तब की साहित्यिक आलोचना में जरूरी और उत्कृष्ट रचनाओं को महत्त्व दिया जाता था, अब की साहित्यिक आलोचना में गैर-जरूरी और घटिया रचनाओं को महत्त्वपूर्ण बताने की जिद भरी कोशिश की जाती है। तब के लेखन में अनुभवों की पुनर्रचना, सकारात्मक स्थितियों की परिकल्पना और बेहतर स्थितियों की कामना की जाती थी, अब के लेखन में विभ्रम, विफलता और विकल्पहीनता के ही आख्यान दिखायी देते हैं। 

आज के हिंदी साहित्य में आयी इस गिरावट के कारणों को आज के समय में खोजते हुए शंकर ने आज के समय को बाजार, उच्चस्तरीय भोग-संस्कृति, विलासितापूर्ण परिवेश की चकाचैंध, किसानों की आत्महत्याओं, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए रोजगार के अभाव तथा दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के लिए मुश्किलों और अनिश्चितताओं का समय बताया है, जिसके कारण साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में अवांतर मूल्य सर्वोपरि बन गये हैं। 

ऐसे समय की चुनौतियों का सामना करने की आशा और अपेक्षा शंकर विवेकवान और प्रबुद्ध सामाजिक इकाइयों के साथ-साथ लेखक संगठनों तथा उनके समानधर्मा संगठनों से करते हैं, जो उनके अनुसार इन्हीं प्रतिकूलताओं में आगे चलते रहेंगे, क्रियाशील बने रहेंगे और जो लोग जोखिमों के इस दौर में भी अपनी प्रतिबद्धता के अनुसार कुछ कर रहे हैं, उनके पीछे सुरक्षा-पंक्ति बनकर खड़े रहेंगे। 

‘‘विवेकवान और प्रबुद्ध सामाजिक इकाइयों’’ से उनका क्या आशय है, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट है कि वे वाम-जनवादी लेखक संगठनों की बात कर रहे हैं और उनसे कुछ ज्यादा ही आशा और अपेक्षा कर रहे हैं। शायद उन्हें लगता है कि लेखक संगठन आज की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सक्रिय हैं, आगे बढ़ रहे हैं और प्रतिबद्ध लेखकों, लघु पत्रिकाओं के संपादकों और साहित्य को जनता तक पहुँचाने के कार्यों में लगे लोगों की सुरक्षा करने में समर्थ हैं। लेकिन उनका यह आकलन यथार्थ से बहुत दूर का लगता है। 

हिंदी साहित्य आंदोलनधर्मी रहा है। उसमें ‘छायावाद’ और ‘प्रगतिवाद’ से लेकर ‘नयी कविता’, ‘नयी कहानी’, ‘अकविता’, ‘अकहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘समांतर कहानी’ आदि कई साहित्यिक आंदोलन चले हैं। इनमें से प्रगतिवादी आंदोलन को छोड़कर, जो साहित्यिक के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन भी था, सभी आंदोलन निरे साहित्यिक और प्रायः किसी एक साहित्यिक विधा के आंदोलन रहे हैं। आजादी से पहले चले प्रगतिवादी आंदोलन जैसा ही एक आंदोलन आजादी के बाद बीसवीं सदी के आठवें और नवें दशकों में चला, जिसे वाम-जनवादी आंदोलन कहा जाता है। इन दोनों की विशेषता यह रही कि इनका जोर ‘लिखने’ के साथ-साथ कुछ ‘करने’ पर भी रहा। मसलन, साहित्य को समाज से जोड़ने के लिए सभाएँ, सम्मेलन, नाटक, नुक्कड़ नाटक आदि करना, जलसों-जुलूसों में गाकर सुनाये जाने वाले जनगीत लिखना और उन्हें हजारों श्रोताओं के बीच गाकर सुनाना, व्यावसायिक रंगमंच के विरुद्ध जन-रंगमंच का विकास करना, व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरुद्ध जन-चेतना जगाने वाले साहित्य की लघु पत्रिकाओं तथा पुस्तकों का प्रकाशन करना इत्यादि। 

पुराने प्रगतिवादी आंदोलन से प्रगतिशील लेखक संघ और ‘इप्टा’ (इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) का जन्म हुआ था। नये वाम-जनवादी आंदोलन से जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे नये लेखक संगठन बने तथा जन नाट्य मंच और निशांत नाट्य मंच जैसी नयी नाटक मंडलियाँ अस्तित्व में आयीं। इस नये आंदोलन ने पुराने प्रगतिशील लेखक  संघ में तो नये प्राण फूँके ही, लेखन के पुराने तौर-तरीके भी बदले, जिससे साहित्य में एक नवोन्मेष हुआ और पोस्टर कविता, किस्सागोई, जनगीत तथा नुक्कड़ नाटक जैसी नयी साहित्यिक विधाओं का जन्म हुआ। इस आंदोलन से साहित्यिक आलोचना भी अभूतपूर्व रूप से समृद्ध हुई। लेखकीय पक्षधरता, प्रतिबद्धता, साहित्य के समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र आदि पर जैसा व्यापक विचार-विमर्श इस आंदोलन के दौरान हुआ, वैसा उसके बाद आज तक नहीं हुआ।  

वाम-जनवादी आंदोलन में शामिल लेखकों ने अपने समय और समाज की जरूरतों के मुताबिक साहित्य में कुछ नया करने का प्रयास किया। उन्होंने नये के नाम पर पुराने सब कुछ को नकारने के बजाय पुरानी रूढ़ियों को त्यागकर उसकी जीवंत परंपरा को अपनाया और आगे बढ़ाया। उन्होंने जो आंदोलन चलाया, वह किसी नये दशक, नयी पीढ़ी या किसी नये साहित्यिक फैशन के आधार पर नया नहीं था। वह नये विचारों, नये सरोकारों और साहित्य में एक नवोन्मेष करने के कारण नया था। उसमें विभिन्न पीढ़ियों के, विभिन्न विधाओं के और विभिन्न प्रकार की लेखन शैलियों वाले लेखक एकजुट थे। उसमें प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच नामक तीनों लेखक संगठनों से जुड़े हुए तथा इन तीनों से स्वतंत्र भी ऐसे बहुत-से लेखक शामिल थे, जो वाम-जनवादी साहित्य में एक नवोन्मेष करना चाहते थे। 

आज लेखक संगठन तो हैं, पर कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं है। और दिक्कत यह है कि आंदोलन से संगठन बनते हैं, संगठनों से कोई आंदोलन नहीं चलता। 

आज कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं है, जबकि उसकी साहित्य को ही नहीं, समाज को भी सख्त जरूरत है। आज देश और दुनिया में प्रायः सर्वत्र यथार्थवाद, प्रगतिशीलता और जनवाद की विरोधी शक्तियाँ शासन कर रही हैं, जो वाम-जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर ही नहीं, सच बोलकर यथार्थ को सामने लाने की आजादी तक पर प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रतिबंध लगा रही हैं। वे अज्ञान तथा अंधविश्वास फैलाने वाली अपनी विचारधाराओं तथा जन और जनतंत्र का दमन करने वाली अपनी तानाशाही नीतियों के चलते यथार्थवादी लेखकों-कलाकारों को आतंकित करने से लेकर उनकी हत्याएँ तक कराने से नहीं चूक रही हैं। आम लोगों के बीच फैले अज्ञान और अंधविश्वास को दूर करने तथा उन्हें बढ़ाने वाली राजनीति का विरोध करने वाले नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्याएँ इसके ताजा उदाहरण हैं। लेखकों को आतंकित और प्रताड़ित करके उन्हें साहित्यकार के रूप में जीते जी मार डालने के उदाहरण (जैसे पेरुमल मुरुगन) भी सामने आ रहे हैं। इन स्थितियों के चलते एक नये साहित्यिक आंदोलन की जरूरत स्वतः स्पष्ट है।
और एक नये साहित्यिक आंदोलन की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। हम देख सकते हैं कि आज की अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी देश और दुनिया के जनगण सब कुछ सहते हुए चुपचाप नहीं बैठे हैं। सतही तौर पर सर्वत्र भय और आतंक का साम्राज्य नजर आता है, पर सतह के नीचे देखें, तो किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, स्त्रियाँ, छात्र, बेरोजगार युवा, लेखक, पत्रकार, कलाकार, रंगकर्मी, शिक्षक आदि अपने देश में और दुनिया के सभी देशों में तरह-तरह के आंदोलन चला रहे हैं। उन्हें आतंकित और गुमराह करके आंदोलन से विरत करने की तमाम कोशिशों और साजिशों के बावजूद उनके आंदोलनों की संख्या और आवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। पूँजीपतियों का खरीदा हुआ मीडिया चाहे उनके समाचार न देता हो, पर देश और दुनिया में आज ऐसे असंख्य आंदोलन चल रहे हैं। वे अभी अलग-अलग बहने वाली छोटी-छोटी धाराएँ हैं, जो भविष्य में मिलकर एक वेगवान और शक्तिशाली प्रवाह बन सकती हैं। इसी प्रकार साहित्य में यथार्थवादी, प्रगतिशील और जनवादी लेखन करने वाले लेखकों, उनके लेखन को सामने लाने वाली पत्रिकाओं के संपादकों तथा लेखक संगठनों के छोटे-छोटे प्रयास अलग-अलग जारी हैं। अनुकूल परिस्थिति पैदा होने पर ये प्रयास भी आपस में जुड़ सकते हैं और एक सशक्त साहित्यिक आंदोलन का रूप ले सकते हैं। 

मैं वाम-जनवादी आंदोलन में शामिल रहने, लगभग दो दशकों तक जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सक्रिय रहने तथा वाम-जनवादी साहित्य की पत्रिका ‘कथन’ के संस्थापक संपादक के रूप में उसके साठ अंक संपादित करने के अपने अनुभव के आधार पर कुछ बातें आज के वाम-जनवादी लेखकों, लेखक संगठनों और लघु पत्रिकाओं के संपादकों के समक्ष विचार-विमर्श के लिए रखना चाहता हूँ, ताकि एक नया साहित्यिक आंदोलन शुरू करने के बारे में सोचा जा सके और वाम-जनवादी आंदोलन में रही कमजोरी से बचा जा सके।  मेरे विचार से उसकी मुख्य कमजोरी थी: नवीनता, यथार्थवाद, पक्षधरता और प्रतिबद्धता की सही समझ का न होना या कम होना। 


नवीनता

मैंने 2000 में एक निबंध लिखा था ‘साहित्य में फैशन और नवोन्मेष’, जो मेरी पुस्तक ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ (2008) में संकलित है। उसमें मैंने लिखा था कि फैशन को अक्सर परिवर्तन और नयेपन के रूप में समझा जाता है, पर उसमें कोई वास्तविक परिवर्तन या नयापन नहीं होता। फैशन बहुत बड़े पैमाने पर किया जाने वाला अनुकरण होता है। साहित्य में भी फैशन चलते हैं। उदाहरण के लिए, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के हिंदी साहित्य को देखें। एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक सात्र्र, कामू, काफ्का आदि की चर्चा करते हुए ऊब, कुंठा, अकेलेपन, अजनबीपन आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं। फिर एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक माक्र्स, लेनिन, माओ आदि की चर्चा करते हुए वर्ग-संघर्ष, क्रांति, पक्षधरता, प्रतिबद्धता आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं। इसी तरह फिर एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक ल्योतार, फूको, दरीदा आदि की चर्चा करते हुए आख्यान, पाठ, अंत, विमर्श आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं।

फैशनपरस्त लेखक अन्य लेखकों से भिन्न और विशिष्ट दिखने के लिए कोई नयी-सी विचारधारा तथा रचना-शैली अपनाकर स्वयं को नवीनतम सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। फैशनपरस्त आलोचक भी चूँकि भिन्नता, विशिटता और नवीनता को बहुत मूल्यवान मानते हैं, इसलिए फैशनपरस्त लेखकों का ऊँचा मूल्य आँकते हैं। इससे प्रभावित होकर बहुत-से लेखक फैशनपरस्त लेखकों की नकल करते हुए उनके जैसा लिखने की चेष्टा करने लगते हैं। यह न जानते हुए--या जानते हुए भी--कि फैशनपरस्त लेखक स्वयं किन्हीं और लेखकों की नकल कर रहे हैं। इस प्रकार नकल-दर-नकल का एक सिलसिला चल पड़ता है, जिसमें साहित्यिक फैशन तेजी से पुराना पड़ता जाता है।

साहित्यिक फैशन और साहित्यिक आंदोलन में फर्क करना आवश्यक है। फैशनपरस्त लेखक हमेशा अद्वितीय होना चाहते हैं, अतः अन्य लेखकों के साथ एकजुट या संगठित होने में अपनी अद्वितीयता की हानि समझते हैं। इसी कारण वे स्वयं कोई आंदोलन चलाने या किसी आंदोलन में शामिल होने में विश्वास नहीं रखते। हाँ, ऐसा हो सकता है कि जब कोई आंदोलन अपने उत्कर्ष पर हो, तो वे उसे भी कोई नया फैशन मानकर उसके साथ चलते नजर आने लगें। मगर उत्कर्ष के समय वे जितनी तेजी के साथ उसमें आते हैं, अपकर्ष के समय उतनी ही तेजी के साथ उससे अलग भी हो जाते हैं। हिंदी के वाम-जनवादी आंदोलन में आने तथा उससे अलग हो जाने वाले लेखकों के उदाहरण से इस तथ्य को समझा जा सकता है। आंदोलन में आते समय ऐसे लेखक स्वयं को सबसे अधिक प्रगतिशील, सबसे अधिक जनवादी, सबसे अधिक क्रांतिकारी जताते हैं और उससे अलग होते समय उसकी निंदा करने या उसका मजाक उड़ाने में भी सबसे आगे दिखायी देते हैं।

हिंदी साहित्य में नवीनता को दशकों और पीढ़ियों से जोड़कर भी देखा जाता है और यह माना जाता है कि हर दशक के बाद लेखकों की जो ‘नयी’ या ‘युवा’ पीढ़ी आती है, वह साहित्य में नयापन लाती है। लेकिन यह बहुत ही गलत और भ्रामक मान्यता है। साहित्य में वास्तविक नयापन तब आता है, जब बहुत-से लेखक मिलकर रचना और आलोचना के पुराने तौर-तरीकों को बदलते समय की जरूरतों के मुताबिक बदलने का प्रयास करते हैं। उनका यह सामूहिक प्रयास ही साहित्यिक आंदोलन कहलाता है और इसी से साहित्य में एक नवोन्मेष होता है। 

वाम-जनवादी आंदोलन की शक्ति यही नवोन्मेष था, पर उसकी कमजोरी यह थी कि उसमें ऐसे भी बहुत-से लेखक शामिल थे, जो उसे एक नया साहित्यिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक नया साहित्यिक फैशन मानकर चल रहे थे। इसीलिए बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब सोवियत संघ के विघटन और पूँजीवादी भूमंडलीकरण से वाम-जनवादी आंदोलन को एक जबर्दस्त धक्का लगा, तो उसमें शामिल फैशनपरस्त लोगों ने नये फैशन अपना लिये। 

वाम-जनवादी आंदोलन की कमजोरी यह रही कि उसने भूमंडलीय पूँजीवाद की विचारधारा उत्तर-आधुनिकतावाद के ‘पोस्ट-माकर््िसस्ट’ (माक्र्सवादोत्तर) और ‘पोस्ट-रियलिस्ट’ (यथार्थवादोत्तर) जैसे फैशनेबल नारों का सक्षम प्रतिकार नहीं किया और माक्र्सवाद तथा यथार्थवाद को दृढ़तापूर्वक अपनाये रखकर किसी नवोन्मेष के जरिये स्वयं को आगे नहीं बढ़ाया। उलटे, सोवियत संघ के विघटन को समाजवाद के अंत और पूँजीवादी भूमंडलीकरण को दुनिया की नयी नियति के रूप में स्वीकार कर लिया। इस प्रकार वह आंदोलन विघटित हो गया और हिंदी साहित्य में नयेपन को पुनः नये दशक और नयी पीढ़ी से जोड़कर या नये विमर्शवादी फैशन से जोड़कर देखा जाने लगा। अतः नये आंदोलन को नवीनता की सही समझ के साथ यह देखना होगा कि उसमें फैशन वाली नकली नवीनता नहीं, नवोन्मेष वाली असली नवीनता हो।

यथार्थवाद

सोवियत संघ के विघटन और पूँजीवादी भूमंडलीकरण के बाद अत्यंत आवश्यक था कि वाम-जनवादी लेखक और उनके संगठन यथार्थवाद को नये संदर्भों में पुनः परिभाषित करते हुए पूँजीवाद के इस मिथ्या प्रचार का जोरदार खंडन करते कि सोवियत संघ के विघटन के साथ ही माक्र्सवाद अप्रासंगिक हो गया है, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के बीच की लड़ाई में समाजवाद हार गया है और अब सारी दुनिया में और हमेशा पूँजीवाद ही चलेगा, क्योंकि उसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन वे न तो इस दुष्प्रचार का खंडन कर पाये और न ही नये पूँजीवाद का कोई नया विकल्प प्रस्तुत कर पाये। पूँजीवादी भूमंडलीकरण के बाद शीतयुद्ध के समय वाला पूँजीवाद बदल गया था। अतः उसका विकल्प रूसी या चीनी किस्म का समाजवाद नहीं, एक नया समाजवाद ही हो सकता था। नये पूँजीवाद और नये समाजवाद को स्पष्ट करने के लिए एक नये यथार्थवाद की जरूरत थी। मगर वाम-जनवादी लेखकों ने अपने बीच यथार्थवाद पर कोई बहस चलाना तक जरूरी नहीं समझा। 

हिंदी में उत्तर-आधुनिकतावाद के आने से पहले ही तरह-तरह के यथार्थवाद-विरोधी साहित्य-सिद्धांत प्रचारित किये जाने लगे थे, जिनमें सबसे सशक्त और प्रभावशाली साबित हुआ अनुभववाद, जो सतही तौर पर यथार्थवाद से मिलता-जुलता था, लेकिन वास्तव में उसका विरोधी था। अनुभववाद हिंदी में ‘नयी कहानी’ आंदोलन के दौरान ही बहुत-से लेखकों-आलोचकों ने अपना लिया था। उसके अनुसार लेखक के अनुभवों को (उसके ‘‘अपने जिये-भोगे यथार्थ’’ को) ही यथार्थ, बल्कि ‘‘प्रामाणिक यथार्थ’’,  और उसकी अभिव्यक्ति को ही यथार्थवाद माना जाता था। उसके अनुसार वर्तमान में ‘जो है’, उसी का चित्रण करने वाले लेखकों को यथार्थवादी माना जाता था। ‘जो होना चाहिए’ की बात करने वाले लेखकों को आदर्शवादी या नैतिकतावादी बताकर और भविष्य में ‘जो हो सकता है’ की बात करने  वाली रचनाओं को काल्पनिक, गढ़ी हुई या गैर-यथार्थवादी कहकर खारिज किया जाता था। इससे रचना में यथार्थ को देखने-दिखाने की दृष्टि अत्यंत संकुचित हुई तथा वाम-जनवादी रचना और आलोचना, दोनों की अपार क्षति हुई। वाम-जनवादी लेखक यथार्थवाद को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहकर नयी परिस्थिति में एक नया यथार्थवाद विकसित नहीं कर पाये, इसलिए वे स्वयं को उत्तर-आधुनिकतावाद के हमले से नहीं बचा सके, जो साहित्य में ‘यथार्थवादोत्तर’ लेखन की सैद्धांतिकी प्रचारित कर रहा था। 

जरूरत इस बात की थी कि यथार्थवाद पर व्यापक बहस चलाकर देश और दुनिया के बदले हुए यथार्थ को सामने लाने के लिए यथार्थवाद को पुनः परिभाषित किया जाता और उसे एक नया नाम देकर आगे बढ़ाया जाता। इसके लिए यह समझना आवश्यक था कि वाम-जनवादी साहित्य उस माक्र्सवादी विश्व-दृष्टि से प्रेरित-परिचालित था, जो पूँजीवाद को ही नहीं, उसके विकल्प समाजवाद को भी एक विश्व-व्यवस्था के रूप में देखती थी। पूँजीवादी भूमंडलीकरण से यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि अब पूँजीवाद का विकल्प किसी एक देश या कुछ देशों के स्तर पर नहीं, बल्कि भूमंडलीय स्तर पर ही खोजना होगा और यथार्थवादी लेखकों को अपने स्थानीय यथार्थ को भूमंडलीय यथार्थ से जोड़कर समझना होगा। इस प्रकार नया यथार्थवादी साहित्य अब भूमंडलीय यथार्थवादी साहित्य होगा और वह भूमंडलीय समाजवादी विश्व-व्यवस्था को भूमंडलीय पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था का विकल्प मानकर चलेगा।  

जरूरत इस बात की भी थी कि भूमंडलीय यथार्थवाद को हिंदी साहित्य की अपनी परंपरा में विकसित किया जाये। हिंदी के वाम-जनवादी लेखन की आधारभूत विशेषता यथार्थवाद थी और यथार्थवाद का अर्थ यथार्थ का चित्रण करना मात्र नहीं, वर्तमान यथार्थ को बेहतर भविष्य की परिकल्पना के साथ बदलने के उद्देश्य से चित्रित करना भी था। लेकिन यथार्थ निरंतर बदलता रहता है, इसलिए उसे बदलने के तौर-तरीके भी बदलते रहते हैं। तदनुसार साहित्य में यथार्थवाद के रूप भी बदलते रहते हैं, जो साहित्यिक आलोचना तथा सौंदर्यशास्त्र को भी बदलते हैं। यह बात 1930 के दशक से 1950 के दशक तक जर्मनी में यथार्थवाद पर चली उस महान बहस से बखूबी स्पष्ट हो गयी थी, जिसमें भाग लेने वाली हस्तियाँ थीं--जाॅर्ज लुकाच, बर्टोल्ट बे्रष्ट, अंस्र्ट ब्लाॅख, वाल्टर बेंजामिन तथा थियोडोर एडोर्नो। हिंदी में प्रेमचंद ने भी अपने समय के बदलते यथार्थ के अनुसार यथार्थवाद को ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ का नया नाम दिया था। लेकिन अधिकतर वाम-जनवादी लेखक यथार्थवाद के नाम पर प्रायः अनुभववाद को ही अपनाये रहे। 

उन्हें गर्व होना चाहिए था कि हमारे प्रेमचंद ने साहित्य को ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ दिया। उन्हें प्रेमचंद की इस अद्भुत देन के लिए कृतज्ञ होना चाहिए था और इसे अपनाकर आगे बढ़ाना चाहिए था। लेकिन उन्होंने आदर्शवाद को प्रेमचंद की कमजोरी माना और खुद को खरा यथार्थवादी मानते हुए प्रेमचंद में भी खरा यथार्थवाद खोजा। नतीजा यह हुआ कि उन्हें प्रेमचंद की अंतिम कुछ रचनाओं में ही यथार्थवाद नजर आया। शेष रचनाओं कोे आदर्शवादी मानते हुए या तो उन्होंने खारिज कर दिया, या उनका मूल्य बहुत कम करके आँका। इससे उन्हें या साहित्य को फायदा क्या हुआ, यह तो पता नहीं, पर नुकसान यह जरूर हुआ कि स्वयं को यथार्थवादी समझने वाले लेखक ‘जो है’ उसी का चित्रण करने को यथार्थवाद समझते रहे और ‘जो होना चाहिए’ उसे आदर्शवाद समझकर उसका चित्रण करने से बचते रहे। 

लेखक के सामने जब कोई आदर्श नहीं होता, तो उसकी समझ में नहीं आता कि वह क्या लिखे और क्यों लिखे। किसी बड़ी प्रेरणा के अभाव में वह या तो लिखना छोड़कर कोई ऐसा काम करने लगता है, जो उसे ज्यादा जरूरी, ज्यादा लाभदायक या ज्यादा संतुष्टि देने वाला लगता है; या वह निरुद्देश्य ढंग का कलावादी अथवा पैसा कमाने के उद्देश्य से लिखने वाला बाजारू लेखक बन जाता है। आदर्शोन्मुख यथार्थवादी लेखक कुछ नैतिक मूल्यों से प्रेरित-परिचालित होने के कारण अपनी रचना में सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक तथा सुंदर-असुंदर के बीच विवेकपूर्वक फर्क करने में जितना समर्थ होता है, उतना आदर्शरहित निरा यथार्थवादी लेखक कभी नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, निरा यथार्थवादी लेखक अपनी रचना को उस पूर्णता तक कभी नहीं पहुँचा सकता, जिससे उसे आत्मसंतोष और पाठक को आनंद मिलता है। कहानी, उपन्यास और नाटक के लेखन पर तो यह बात कुछ ज्यादा ही लागू होती है।

मैंने अपनी पत्रिका ‘कथन’ के जरिये वर्षों तक भूमंडलीय यथार्थ के विभिन्न पक्षों को सामने लाते हुए एक नये यथार्थवाद की जरूरत बतायी। दो पुस्तकें भी लिखीं--‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ (2008) तथा ‘भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्ठभूमि’ (2014)। मेरा मानना है कि साहित्य और कला में वास्तविक नयापन तो यथार्थवाद ही लाता है, क्योंकि नये यथार्थों को सामने लाना या पुरानी वास्तविकताओं को नयी दृष्टि से देखना-दिखाना ही उसका काम है। यह काम हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के बाद मुक्तिबोध ने सबसे ज्यादा और सबसे अच्छे ढंग से किया। उनके समय में भूमंडलीय शब्द नहीं था, लेकिन उनकी रचनाओं में जो यथार्थवाद है, वह भूमंडलीय यथार्थवाद ही है। यह बात मैंने अपनी पुस्तक ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा’ (2017) में विस्तार से स्पष्ट की है। अतः आज के हिंदी साहित्य को भूमंडलीय यथार्थवाद का विकास प्रेमचंद और मुक्तिबोध की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए करना होगा।   

पक्षधरता

किसी भी युग का और किसी भी देश का साहित्यकार सत्य, न्याय, नैतिकता, सुंदरता, प्रेम, समता, स्वतंत्रता जैसी सकारात्मक चीजों का पक्षधर और असत्य, अन्याय, अनैतिकता, कुरूपता, घृणा, विषमता, पराधीनता जैसी नकारात्मक चीजों का विरोधी होता है। यदि ऐसा नहीं है, तो वह साहित्यकार कहलाने का अधिकारी ही नहीं है। सच्चा साहित्यकार वह है, जिसे बड़े से बड़ा दमन या प्रलोभन भी ऐसी पक्षधरता से विचलित न कर सके। 

बीसवीं सदी के आठवें-नवें दशकों में हिंदी के वाम-जनवादी लेखकों के बीच मुक्तिबोध के दो कथन बहुत प्रचलित थे। एक  यह कि ‘‘पार्टनर, तुम्हारी पाॅलिटिक्स क्या है?’’ और दूसरा यह कि ‘‘बशर्ते तय करो किस ओर हो तुम’’। मुक्तिबोध ऐसी बातें पूँजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं के बीच चलने वाले उस शीतयुद्ध के संदर्भ में कहा करते थे, जो विचारधारात्मक और प्रचारात्मक हथियारों से लड़ा जाता था। साहित्यकार भी, चाहे वे प्रतिबद्ध साहित्यकार हों या अप्रतिबद्ध साहित्यकार, अपनी वर्गीय स्थितियों अथवा सामाजिक परिस्थितियों के चलते अनजाने ही या सचेत रूप से उस युद्ध में शामिल रहते थे। जो लेखक सचेत रूप से समाजवाद के पक्ष में और पूँजीवाद के विरुद्ध लड़ते थे, वे अपनी पक्षधरता को छिपाते नहीं थे, क्योंकि वे स्वयं को देश और दुनिया के तमाम शोषित-उत्पीड़ित जनों की मुक्ति के लिए लड़ने वाला सिपाही मानते थे। प्रेमचंद की तरह ‘कलम का सिपाही’। वे शोषण, दमन, अन्याय और अत्याचार पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक शोषणमुक्त समतामूलक और न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए लड़ने वाले लेखक के रूप में अपने पक्ष को नैतिक आधार पर उचित समझते थे, इसलिए अपनी राजनीति को दूसरे पक्ष के साहित्यकारों की तरह छिपाते नहीं थे। जो लेखक अपनी राजनीति को छिपाते थे, उनसे वे पूछते थे कि ‘‘पार्टनर, तुम्हारी पाॅलिटिक्स क्या है?’’ और उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय, सही-गलत आदि में फर्क न कर पाने के कारण दुविधा में पड़े साहित्यकारों को बताते थे कि लड़ाई तो तुम्हें लड़नी ही पड़ेगी, चाहे इस पक्ष में रहकर लड़ो या उस पक्ष में रहकर, इसलिए तय करो कि तुम किस पक्ष में हो। 

मुक्तिबोध जिस यथार्थ के संदर्भ में ऐसे प्रश्न उठा रहे थे, वह उनके समय का भूमंडलीय यथार्थ था। उस समय दुनिया तीन दुनियाओं में बँटी हुई थी--पूँजीवादी देशों वाली पहली दुनिया, समाजवादी देशों वाली दूसरी दुनिया और औपनिवेशिक गुलामी से नये-नये आजाद हुए देशों वाली तीसरी दुनिया। पहली और दूसरी दुनियाओं के बीच शीतयुद्ध चल रहा था, जिसके एक पक्ष का नेतृत्व अमरीका कर रहा था और दूसरे पक्ष का नेतृत्व सोवियत संघ। तीसरी दुनिया के देशों के सामने एक विकल्प यह था कि वे पूँजीवादी खेमे में रहें, दूसरा विकल्प यह था कि समाजवादी खेमे में चले जायें और तीसरा विकल्प यह कि वे दोनों गुटों से अलग रहें। भारत ने तीसरा विकल्प अपनाया और गुटनिरपेक्ष देशों का आंदोलन ही नहीं चलाया, उसका नेतृत्व भी किया। लेकिन वाम-जनवादी लेखक चाहते थे कि भारत वैश्विक राजनीति में खुल्लमखुल्ला पूँजीवाद के विरुद्ध समाजवाद के पक्ष में खड़ा हो। इसीलिए वे मुक्तिबोध के उपर्युक्त कथनों को बार-बार दोहराते थे। इसमें कहीं न कहीं यह भाव भी शामिल होता था कि जो हमारे साथ नहीं है, वह निश्चय ही दूसरे खेमे का है और हमारा शत्रु है। यदि ऐसा नहीं है, तो वह समाजवादी खेमे के पक्ष में खुलकर खड़ा हो। अर्थात् हमारे साथ आकर अपनी पक्षधरता का प्रमाण दे। 

आगे चलकर जब समाजवादी शिविर के अंदर आपसी मतभेद उभरे और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में यह सवाल उठा कि भारत में क्रांति रूसी रास्ते पर चलकर होगी या चीनी रास्ते पर चलकर, और इस सवाल पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन तथा पुनर्विभाजन होने से एक की जगह तीन-तीन कम्युनिस्ट पार्टियाँ बन गयीं, और बाद में तीनों के अपने अलग-अलग लेखक संगठन भी बन गये, तो साहित्यकार की पक्षधरता का प्रश्न एक जटिल समस्या बन गया। लेखकों के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया कि वे किसके पक्षधर हों। नेताओं ने इस समस्या का एक सरल समाधान यह बताया कि साहित्यकार उस दल और संगठन से जुड़ें, जो सबसे सही हो। लेकिन इससे हुआ यह कि वामपंथी दलों और उनसे जुड़े लेखक संगठनों में स्वयं को सही और दूसरों को गलत साबित करने की होड़ मच गयी। संकीर्णता और कट्टरता बढ़ी और इस विचार ने जोर पकड़ा कि जो लेखक हमारे दल और संगठन को सबसे सही नहीं मानता, वह हमारा शत्रु है। 

वाम-जनवादी साहित्यिक आंदोलन शोषित-उत्पीड़ित सभी मुक्तिकामी जनों का, अर्थात् किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों आदि का साझा आंदोलन था, जो इनके सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों से जुड़कर चलता था। भूमंडलीय पूँजीवाद और उसकी विचारधारा उत्तर-आधुनिकतावाद ने इस समग्रता को तोड़कर इन्हें अलग किया और इनकी मुक्ति के साझे आंदोलन को अस्मिता के अलग-अलग विमर्शों में बाँट दिया। वाम-जनवादी लेखकों को यथार्थवादी ढंग से इस खेल को समझकर ‘आंदोलन’ और ‘विमर्श’ में फर्क करके इसके विरुद्ध वैचारिक संघर्ष चलाना चाहिए था। लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके और नतीजा यह हुआ कि स्त्रियाँ, दलित, आदिवासी आदि सबकी पक्षधरताएँ अलग-अलग हो गयीं। मसलन, स्त्रियाँ पुरुषों के विरुद्ध स्त्रियों की पक्षधर होकर लिखने लगीं और दलित सवर्णों के विरुद्ध दलितों के पक्षधर होकर लिखने लगे। इससे सबका साझा संघर्ष, जो भूमंडलीय पूँजीवाद का एक सशक्त प्रतिरोध बन सकता था, विभाजित होकर कमजोर हो गया और ऐसा प्रतीत होने लगा कि जैसे भूमंडलीय पूँजीवाद का कोई विकल्प ही नहीं रह गया हो। 

आज विकल्पहीनता के निराशाजनक विचार के विरुद्ध विकल्प का आशाजनक विचार ही वाम-जनवादी आंदोलन को पुनर्जीवित कर सकता है। इसी विचार के आधार पर वह स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों आदि को विमर्शों के विभ्रम से निकालकर आंदोलन के यथार्थ से जोड़ने में समर्थ हो सकता है।

प्रतिबद्धता

साहित्य में प्रतिबद्धता कोई नयी चीज नहीं है। और वह केवल वाम-जनवादी साहित्य की ही विशेषता नहीं है। यह विशेषता भी प्रत्येक देश-काल के महान साहित्य में मौजूद रही है। उदाहरण के लिए, भक्तिकाल के हिंदी साहित्य को देखें। उसमें सगुण भक्ति वाले कवि हों या निर्गुण भक्ति वाले कवि, रामभक्त कवि हों या कृष्णभक्त कवि, संत कवि हों या सूफी कवि--सब में वैचारिक प्रतिबद्धता देखी जा सकती है। सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, मीरा आदि में से किसी को भी देख लीजिए। सभी में यह चीज मिलेगी। मीराबाई जब कहती हैं कि ‘‘मेरे तो गिरधर गुपाल दूसरो न कोई’’, तो अपनी प्रतिबद्धता ही व्यक्त करती हैं। इसी प्रकार तुलसीदास जब कहते हैं कि ‘‘जाके प्रिय न राम-वैदेही, तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही’’, तो अपनी प्रतिबद्धता ही प्रकट करते हैं। मुझे मीराबाई की-सी प्रतिबद्धता बेहतर लगती है, जिसमें अपनी प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति तो है, उसके लिए लोकलाज की परवाह न करने से लेकर विष का प्याला तक पी लेने की दृढ़ता भी है, लेकिन तुलसीदास की तरह दूसरों को यह उपदेश या आदेश देने वाली बात नहीं है कि जो हमारे राम-वैदेही से प्रेम नहीं करते--अथवा हमारी विचारधारा से सहमत नहीं हैं--उन्हें करोड़ों शत्रुओं के समान मानकर त्याग देना चाहिए। वाम-जनवादी लेखन की कमजोरी यह रही कि उसमें मीराबाई की-सी प्रतिबद्धता कम और तुलसीदास की-सी प्रतिबद्धता अधिक थी।  

प्रतिबद्धता दरअसल एक नैतिक निर्णय और उस पर आधारित नैतिक आचरण है। बीसवीं सदी के आठवें-नवें दशकों का वाम-जनवादी आंदोलन लेखकों को प्रतिबद्ध होने के लिए प्रेरित करता था। उस आंदोलन के समाप्त होने पर यह जिम्मेदारी स्वयं लेखकों पर आ पड़ी कि वे अपनी प्रतिबद्धता को बचाये रखें और उस पर दृढ़ रहें। प्रश्न उठता है--कैसे? मैं इसके उत्तर में वही कहना चाहता हूँ, जो अक्सर अपने-आप से कहता हूँ। 

मैं अपने-आप से कहता हूँ--क्या तुमसे किसी डाॅक्टर ने कहा था कि तुम्हें लेखक बनना है और प्रतिबद्ध लेखक ही बनना है? तुम स्वेच्छा से लेखक बने थे और प्रतिबद्ध लेखन करने का निर्णय तुम्हारा अपना निर्णय था। तुम जब चाहो, अपने इस निर्णय को बदल भी सकते हो। अगर तुम लिखना बंद कर दो, अथवा यह घोषणा कर दो कि अब तुम प्रतिबद्ध लेखक नहीं हो, तो तुम पर, समाज पर और साहित्य पर कोई कहर नहीं टूट पड़ेगा। उलटे, हो सकता है, तुम्हें इससे कुछ फायदा ही हो जाये। लेकिन जब तक तुम अपने निर्णय पर कायम हो, अपनी प्रतिबद्धता में कमी या शिथिलता आ जाने के लिए दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकते। प्रतिबद्ध लेखक बने रहने के लिए जो भी करना जरूरी है, तुमको ही करना है। परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं, तो उनको अनुकूल बनाने का काम किसी और का नहीं, तुम्हारा ही है। माना कि तुम्हारी सीमाएँ हैं, तुम अकेले सब कुछ नहीं कर सकते, लेकिन उस काम को तो ढंग से करो, जिसे करने का निर्णय तुमने लिया है। तुम वही करो, जो कर सकते हो; मगर उसे बेहतरीन ढंग से करना तुम्हारी जिम्मेदारी है। उसको न कर पाने के लिए वातावरण और परिस्थितियों को दोष देकर तुम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। तुम लेखक हो और नहीं लिख पा रहे हो, या अच्छा नहीं लिख पा रहे हो, तो लिखना बंद कर देने का विकल्प तुम्हारे सामने हमेशा खुला है। यदि तुम प्रतिबद्ध लेखक नहीं बने रहना चाहते, तो अप्रतिबद्ध लेखक बन जाने का विकल्प भी तुम्हारे सामने हमेशा खुला है। मगर जब तक तुम लेखक हो, बेहतरीन ढंग से लिखने की कोशिश करना तुम्हारा काम है। जब तक तुम प्रतिबद्ध लेखक हो, प्रतिबद्ध लेखन के लिए अनुकूल वातावरण बनाना भी तुम्हारा काम है। प्रतिबद्ध लेखक का काम यथार्थ को केवल देखना-दिखाना ही नहीं, उसे बदलना भी है। मौजूदा परिस्थितियाँ वास्तव में प्रतिकूल हैं और उनसे जो निराशा पैदा होती है, वह भी एक यथार्थ है। लेकिन यथार्थ कभी इकहरा नहीं होता। वह द्वंद्वात्मक होता है। कोई भी स्थिति या परिस्थिति सर्वथा और सदा-सर्वदा के लिए निराशाजनक नहीं होती। घना अँधेरा, जिसमें रास्ता नहीं सूझता, एक यथार्थ है। उसमें भटकते हुए लोगों को यदि ऐसा लगता है कि कहीं कोई रास्ता नहीं है, तो उनका यह अनुभव भी यथार्थ है। इस अनुभव से उत्पन्न होने वाली उनकी निराशा भी यथार्थ है। लेकिन यथार्थ यही और इतना ही नहीं है। यथार्थ यह भी है कि प्रत्येक अंधकार में प्रकाश की संभावना मौजूद रहती है। उदाहरण के लिए, घने अँधेरे में माचिस की एक नन्ही-सी तीली या एक छोटी-सी टाॅर्च भी प्रकाश पैदा कर सकती है। यह संभावना भी यथार्थ है। इसलिए केवल अंधकार को देखना और उसमें प्रकाश की संभावना को न देखना यथार्थवाद नहीं है। यथार्थ को उसके द्वंद्वात्मक रूप में देखना ही यथार्थवाद है।


Wednesday, October 18, 2017

पागलों ने दुनिया बदल दी

आज मित्रों के लिए प्रस्तुत है मेरी नवीनतम  कहानी :

पागलों ने दुनिया बदल दी

मैं पूछती, ‘‘आप कैसे हैं?’’

और वे हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’

मैं पूछती, ‘‘आपकी यह हालत कब से है?’’

और वे हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’

मैं पूछती, ‘‘आप क्या थे? डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, प्रोफेसर…?’’

और वे हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’

मैं पूछती, ‘‘आप लोग यह सामूहिक आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?’’

और वे हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’

मैं पूछती, ‘‘आप लोग तो असमर्थों में समर्थ थे, आपको जैविक कूड़ा बन जाने की क्या सूझी?’’

मेरे इस सवाल पर वे और भी जोर से हँसते, ‘‘हा-हा-हा!’’

मैं ‘सभूस’ की पत्रकार थी। ‘सभूस’ यानी समर्थों की भूमंडलीय समाचारसेवा। मुझे देश-देश जाकर पागलों की गतिविधियों के समाचार देने का काम सौंपा गया था। काम खतरनाक था, पर मैंने खुशी-खुशी करना मंजूर कर लिया था। मुझे शुरू से ही शक था कि पागलपन की वह बीमारी, जो इधर भूमंडलीय महामारी का रूप ले चुकी थी, बीमारी या महामारी नहीं, कोई और ही चीज है। मैं निजी तौर पर उसका पता लगाना चाहती थी। दूसरे, मुझे हल्की-सी एक उम्मीद थी कि मेरे देश की तबाही के साथ मेरे सब लोग शायद तबाह न हुए हों। शायद मेरे दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता, मामा-मौसी और भाइयों-बहनों में से कोई बचकर भागने और किसी दूसरे देश में शरण पाने में सफल हो गया हो। निजी तौर पर तो मैं देश-देश घूमकर अपने लोगों का पता लगा नहीं सकती थी, सो मैंने सोचा कि पत्रकार के रूप में शायद मैं उन्हें पा सकूँ।

अपने-अपने कामों में लगे स्वस्थ लोगों के पागल होने का सिलसिला ठीक-ठीक कब और कहाँ शुरू हुआ, यह तो शायद कोई नहीं जानता, लेकिन वह समर्थ और असमर्थ दोनों तरह के देशों में और दुनिया भर में एक साथ शुरू हुआ था। सामान्य जीवन जीते, रोजमर्रा के काम करते, अच्छे-भले लोग अचानक हँसना शुरू कर देते और हँसते ही चले जाते। वे अपने घरों, दफ्तरों, खेतों, कारखानों वगैरह से निकलकर सड़कों पर आ जाते। उनमें पुरुष और स्त्रियाँ, बूढ़े और बूढ़ियाँ, प्रौढ़ और प्रौढ़ाएँ, युवक और युवतियाँ सभी होते।

ठीक तारीख बताना तो संभव नहीं, पर लोगों के पागल होने का सिलसिला जब शुरू हुआ, तब अखिल भूमंडल पर समर्थों के शासन का सत्रहवाँ साल चल रहा था। सोलह साल पहले समर्थ शासकों ने अपनी विश्व संसद बनायी थी और अपना नया संवत् शुरू किया था। उसके अनुसार वह समर्थ संवत् का सत्रहवाँ साल था। उसके पहले समर्थों और असमर्थों के बीच एक भूमंडलीय युद्ध हुआ था, जिसमें समर्थों की विजय और असमर्थों की पराजय हुई थी।

मैं एक असमर्थ देश की लड़की थी, जो युद्ध के समय एक समर्थ देश में पढ़ रही थी। मैं अपने देश लौटना चाहती थी, लेकिन मेरे माता-पिता ने सख्ती से मना कर दिया था। उनके विचार से मेरी सुरक्षा इसी में थी कि मैं जहाँ हूँ, वहीं बनी रहूँ। युद्ध में असमर्थ देश हार रहे थे और तबाह हो रहे थे।

उन्हें हारना ही था, क्योंकि उस युद्ध में दुनिया के सभी समर्थ देश एक होकर लड़े थे, जबकि असमर्थ देश आपस में लड़ते हुए लड़े थे। यों समर्थ देशों में भी कुछ देश कम और कुछ अधिक शक्तिशाली थे और उनके भीतर भी रंग, नस्ल, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र और भाषा वगैरह के तमाम झगड़े थे, लेकिन उस समय उनका लक्ष्य एक हो गया था–जैसे भी हो, असमर्थ देशों पर विजय पाना। दूसरी तरफ असमर्थ देश उस निर्णायक युद्ध में भी अपने भीतर के झगड़ों को छोड़कर–यानी धर्म-संप्रदाय, खान-पान, रहन-सहन, बोली-बानी, ऊँच-नीच, छूत-अछूत जैसे झगड़ों को छोड़कर–अपना एक लक्ष्य तय करके नहीं लड़ सके थे। उनका लक्ष्य समर्थों पर विजय प्राप्त करना नहीं, केवल स्वयं को बचाना था। उन्हें एक-दूसरे की चिंता नहीं थी, सबको अपनी-अपनी पड़ी थी। नतीजा वही हुआ, जो होना था। समर्थ जीते, असमर्थ हारे। जीतने के बाद समर्थों ने अपनी भूमंडलीय समर्थ संसद कायम की, अपना नया संवत् चलाया और अखिल भूमंडल पर शासन करने लगे।

समर्थों ने जो भूमंडलीय संविधान बनाया, उसकी सर्वप्रमुख धारा, जिससे समस्त उपधाराएँ निकलती थीं, यह थी कि समर्थों को ही जीवित रहने का अधिकार है। असमर्थ लोग और असमर्थ देश तभी जीवित रह सकते हैं, जब वे समर्थ बनने के लिए प्रयत्नशील होकर पूरी निष्ठा से समर्थों की सेवा करें। जो असमर्थ लोग या देश ऐसा नहीं करेंगे, उन्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं होगा। इतना ही नहीं, वे समर्थों के प्रति कितने निष्ठावान हैं, यह भी समर्थ तय करेंगे और उन्हें पूरा अधिकार होगा कि निष्ठा में कमी पायी जाने पर वे असमर्थ लोगों को जैसे चाहें मारें-पीटें, जेलों में डाल दें या गोली-गोलों से उड़ा दें और असमर्थ देशों को जैसे चाहें लूटें और तबाह करें।
अब, जीवित और सलामत रहना कौन नहीं चाहता? दुनिया भर के लोगों और देशों ने समर्थों की सेवा करते हुए स्वयं समर्थ बनने का प्रयास करना शुरू कर दिया। लेकिन समर्थों को यह अधिकार भी था कि वे किसे अपनी सेवा में रखें और किसे न रखें, और रखें, तो किस दर्जे का सेवक बनाकर रखें।

इस अधिकार के चलते असमर्थ लोगों में से योग्य सेवक छाँटे गये। भूख और कुपोषण से कमजोर तथा रोगों से जर्जर लोगों को सेवा के अयोग्य पाया गया। समर्थों की संसद में विचार किया गया और तय पाया गया कि अयोग्य लोग किसी काम के नहीं हैं, दुनिया में फैला हुआ कूड़ा हैं, उन्हें बुहारकर फेंक देना चाहिए। हाँ, इस प्रश्न पर कुछ बहस हुई कि उन्हें ‘ह्यूमन वेस्ट’ (मानव कूड़ा) कहा जाये अथवा ‘बायो वेस्ट’ (जैविक कूड़ा)। बहस के बाद तय हुआ कि उन्हें जैविक कूड़ा ही कहा जाना चाहिए, क्योंकि मानव कूड़े को तो श्मशान में ले जाकर जलाना या कब्रिस्तान में ले जाकर दफ्नाना होगा, और उसमें बेकार का खर्च होगा, जबकि जैविक कूड़ा खुद-ब-खुद सड़-गलकर मिट्टी में मिल जायेगा। उसे निपटाने का खर्च तो बचेगा ही, उससे कंपोस्ट खाद भी बनेगी, जो जमीन को अधिक उपजाऊ बनायेगी।

इस प्रकार चुने गये योग्य सेवकों से कहा गया कि योग्य सेवक बन जाना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें योग्यतम सेवक बनने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए आपस में होड़ लगाकर सर्वोच्च समर्थ-भक्ति का प्रमाण देना चाहिए। इसके लिए उन्हें हर समय अपना सर्वस्व समर्थों को समर्पित कर देने के लिए, यहाँ तक कि अपने प्राण तक दे देने के लिए, तैयार रहना चाहिए। जिस की समर्थ-भक्ति में तनिक भी कमी पायी गयी, उस पर कड़ी नजर रखी जायेगी। जिस किसी के मन में समर्थों के विरुद्ध कोई विचार पाया गया, हल्की-सी भावना भी पायी गयी, उसे कठोर दंड दिया जायेगा, जो आजीवन कारावास या तत्काल मृत्युदंड भी हो सकता है। ऐसे विचार या भावनाएँ रखने वालों की सूचना देने, उनको पकड़वाने या स्वयं ही घेरकर मार डालने वाले समर्थ-भक्तों को पुरस्कृत किया जायेगा।

असमर्थों को बताया गया कि उनमें से जो लोग सच्ची निष्ठा और भक्ति के साथ समर्थों की सेवा करेंगे, वे ही समर्थों के कृपापात्र बनकर समर्थों में शामिल हो सकेंगे। उन्हें समझाया गया कि जीवन एक दौड़ है, जिसमें उन्हें अपने तमाम प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़कर आगे निकलना है। इसके लिए दूसरों को टँगड़ी मारकर गिराना भी पड़े, तो जायज है, क्योंकि पिछड़ जाने का अर्थ होगा अशक्त, अक्षम और अयोग्य सिद्ध होकर दौड़ से बाहर हो जाना और जैविक कूड़ा बनकर रह जाना।

समर्थों की यह व्यवस्था इतनी बढ़िया थी कि दूसरों के आगे निकल जाने के लोभ और दूसरों से पिछड़ जाने के भय से असमर्थ लोग जी-जान से समर्थों की सेवा दूसरों से बढ़-चढ़कर करने लगे। वे दिन-रात एक-दूसरे की, यहाँ तक कि अपने घर-परिवार के लोगों तक की जासूसी करने लगे और प्रमाण सहित उन्हें पकड़वाकर पुरस्कार प्राप्त करने लगे। इसके चलते तमाम लोग इतने भयभीत और संत्रस्त रहने लगे कि अपने-आप को भी भूल गये। वे भूल गये कि कल तक इन्हीं समर्थों से लड़ रहे थे। अब समर्थ उन पर चाहे जितना अन्याय और अत्याचार करें, वे उनके विरुद्ध विद्रोह करना तो दूर, विरोध का विचार भी मन में न लाते। वे उनके विरुद्ध धरना, प्रदर्शन, हड़ताल, भूख हड़ताल, आमरण अनशन आदि करना तो दूर, उनसे असहमति व्यक्त करना तक भूल गये थे।

असमर्थों के मन में अपना आतंक जमाये रखने के लिए समर्थों ने प्रत्येक देश में विभिन्न धर्मों के आतंकी संगठन बनवाये, उन्हें खूब हथियार दिये, उनका खूब प्रचार किया और उन्हें खूब बढ़ावा दिया। दूसरी तरफ, यह सोचकर कि ये सशस्त्र आतंकी संगठन किसी दिन समर्थों के ही विरुद्ध न हो जायें, उन्होंने हर देश में पुलिस और फौज के अलावा तरह-तरह के आतंक-विरोधी सशस्त्र बल संगठित किये और उन्हें भी खूब हथियार दिये, उनका भी खूब प्रचार किया और उन्हें भी खूब बढ़ावा दिया। इससे एक तरफ तो पूरी दुनिया में धार्मिक संगठनों की अपनी-अपनी निजी सेनाएँ बनीं और दूसरी तरफ हथियारों की माँग बेतहाशा बढ़ी, जिसकी पूर्ति के लिए हथियारों का उत्पादन और व्यापार अत्यंत तेजी से बढ़ा। इससे असमर्थों में असुरक्षा की भावना बढ़ी। कोई नहीं जानता था कि कौन कब कहाँ और कैसे मार डाला जायेगा। असमर्थ लोग साँस भी लेते, तो डर-डरकर।

इसके साथ ही समर्थों ने सत्य, न्याय, नैतिकता, शांति, अहिंसा, प्रेम, सहयोग, सद्भाव आदि शब्दों के अर्थ अपने हित में बदल दिये और घोषणा कर दी कि जो लोग पुराने मानव-मूल्यों के अर्थ में इन शब्दों का प्रयोग करेंगे, वे मूल्य-अपराधी माने जायेंगे। मूल्य-अपराधियों के लिए उन्होंने विशेष पुलिस थानों और जेलों की व्यवस्था की। उन्हें नवीनतम हथियारों से लैस किया और मूल्य-अपराधियों को क्रूरतम यातनाएँ तथा भीषण दंड देने की व्यवस्थाएँ कीं। फिर भी पता नहीं क्यों और कैसे, मूल्य-अपराध और मूल्य-अपराधी बढ़ते जा रहे थे। शुरू-शुरू में व्यक्ति ही, जैसे स्त्रियाँ और पुरुष ही, मूल्य-अपराधी होते थे। बाद में उनके संगठन भी मूल्य-अपराधी होने लगे। फिर पूरे के पूरे इलाके और यहाँ तक कि पूरे के पूरे देश भी मूल्य-अपराधी होने लगे। मसलन, प्रेम करने वाली लड़कियाँ और लड़के मूल्य-अपराधी। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले संगठन मूल्य-अपराधी। स्वायत्तता की माँग करने वाले इलाके मूल्य-अपराधी। स्वतंत्रता की माँग करने वाले देश मूल्य-अपराधी। आतंक और युद्ध के विरुद्ध शांति की माँग करने वाले सभी लोग और देश मूल्य-अपराधी।

समर्थों की सेवा से मुक्त होकर आत्मनिर्भर होकर जीना चाहने वाले लोग और देश तो सबसे बड़े मूल्य-अपराधी माने जाने लगे। उन्हें दंड देने के लिए स्थानीय स्तर पर पुलिस और कई दूसरे सशस्त्र बलों की व्यवस्था थी, जबकि भूमंडलीय स्तर पर समर्थों की भूमंडलीय सेनाएँ हमेशा तैयार रहतीं और इशारा पाते ही जल, थल और वायु मार्गों से जाकर उन पर टूट पड़तीं। गोली-गोलों से लेकर अत्यंत विनाशकारी बमों तक का इस्तेमाल करके वे अपराधी देशों को धूल में मिला देतीं। जो देश धूल में मिलाये जाते, उन देशों के खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, कल-कारखाने, स्कूल-कॉलेज, पुस्तकालय और संग्रहालय आदि सब धूल में मिला दिये जाते। उनके साथ-साथ करोड़ों लोग और उनके अरबों-खरबों सपने भी धूल में मिला दिये जाते।

मेरा असमर्थ देश भी इसी तरह धूल में मिलाया गया था। मेरे देश के करोड़ों लोग मारे गये थे। करोड़ों लोग लापता हो गये थे। उनमें मेरे माता-पिता, भाई-बहन, सगे-संबंधी, मित्र-परिचित तथा बचपन में मेरे साथ पढ़ने और खेलने वाले मेरे सहपाठी भी थे। मैं बच गयी थी, क्योंकि मैं एक समर्थ देश में रहकर पढ़ रही थी।

बाद में मुझे पता चला कि धूल में मिलाये जा चुके मेरे देश के कुछ लोग बच गये थे, मगर बड़ी मुश्किल से बचे थे। उनका बाकी सब तो नष्ट हो चुका था, बस उनकी और उनके कुछ लोगों की जान बाकी थी, जिसे बचाने के लिए वे भागे थे। गोलियों और गोलों से, छोटे और बड़े बमों से, बचते-बचाते जब वे भाग रहे होते, तभी किसी के पिता की, किसी की माँ की, किसी के भाई की, किसी की बेटी या बेटे की जान चली जाती। अपने मृतकों को वहीं पड़ा छोड़ भागते-भागते–समुद्री, पहाड़ी और रेगिस्तानी रास्तों से भागते-भागते–वे कहीं समुद्रों में जल-समाधि ले लेते, कहीं बर्फ की कब्रें बनाकर उनमें दफ्न हो जाते, तो कहीं अपने ऊपर रेत के पिरामिड बनाकर उनके नीचे अदृश्य हो जाते। और इतनी मुसीबतें उठाने के बाद जब वे हजारों-लाखों की संख्या में समर्थ देशों में शरण लेने पहुँचते, तो उन देशों की सीमाओं पर खड़ी फौजें उन्हें रोक देतीं। वे कँटीले तारों की बाड़ तोड़कर जबर्दस्ती घुसने की कोशिश करते, तो फौजें उनका सामूहिक संहार कर डालतीं।

सौभाग्य से जिन्हें समर्थ देशों में शरण मिल जाती, उन्हें कई कठिन अग्नि-परीक्षाओं से गुजरना पड़ता। पहले उन्हें ठोक-बजाकर देखा जाता कि उनमें कौन सशक्त है, कौन अशक्त। अशक्तों को शरण न दी जाती और जैविक कूड़ा मानकर खुद-ब-खुद मरने के लिए छोड़ दिया जाता। सशक्तों में देखा जाता कि कोई मूल्य-अपराधी तो नहीं है। जिसमें सत्य, न्याय, नैतिकता आदि के मूल अर्थों वाले कीटाणु पाये जाते, उसे तुरंत मृत्युदंड देकर खत्म कर दिया जाता। इसके बाद जो बच जाते, उन्हें भी संदिग्ध माना जाता और उन पर कड़ी नजर रखी जाती। उन्हें ढेर सारी शर्तों के साथ और अत्यंत सख्त निगरानी में समर्थों की सेवा में लगाया जाता।

मैं धूल में मिलाये जा चुके अपने देश लौटकर क्या करती? मैंने मान लिया, या कल्पना कर ली, कि मैं वहाँ से अपनी जान बचाकर भागी हूँ और जहाँ पढ़ रही हूँ, वहाँ मैंने शरण ले रखी है। मैंने पढ़ाई पूरी करके नौकरी कर ली और पत्रकार बनकर देश-देश घूमने लगी।

समर्थ संवत् सोलह तक ऐसा लगता था, जैसे पूरी दुनिया पर समर्थों का शासन सदा के लिए कायम हो गया है और दुनिया की कोई ताकत उसे हिला नहीं सकती। लेकिन अगले साल ही उसकी नींव हिल गयी। समर्थ संवत् सत्रह में दुनिया के हर देश में एक अजीब-सा परिवर्तन होने लगा।

असमर्थों में दो तरह के लोग थे–सामान्य असमर्थ और विशिष्ट असमर्थ। सामान्य असमर्थ पुराने जमाने के अकुशल श्रमिकों जैसे थे, जबकि विशिष्ट असमर्थ कुशल श्रमिकों तथा अपने-अपने कार्यक्षेत्र के विशेषज्ञों जैसे। उन्हें असमर्थों में समर्थ कहा जाता था और यह माना जाता था कि देर-सबेर वे भी समर्थ बन जायेंगे और अखिल भूमंडल पर शासन करने वाली विश्व संसद के सदस्य बन जायेंगे। मगर उन्होंने पाया कि वे एक तरफ तो समर्थ बन जाने के लोभ में समर्थों की सेवा में दिन-रात एक किये रहते हैं और दूसरी तरफ उन्हें असमर्थ हो जाने का या कूड़ा ही बनकर रह जाने का डर सताता रहता है। इस विकट स्थिति से उत्पन्न उनका तनाव इतना बढ़ जाता कि वे एक दिन पागल हो जाते और हँसने लगते–हा-हा-हा!

वे प्रायः सामूहिक रूप से हँसते थे। मसलन, उनमें से कोई कहता, ‘‘सत्य।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ कोई कहता, ‘‘न्याय।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ कोई कहता, ‘‘नैतिकता।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ कोई कहता, ‘‘आजादी।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ कोई कहता, ‘‘बराबरी।’’ और बाकी सब हँसने लगते, ‘‘हा-हा-हा!’’ वे कहते कुछ नहीं थे, बस हँसते और हँसते ही चले जाते, ‘‘हा-हा-हा!’’ स्पष्ट था कि वे मूल्य-अपराधी हैं, लेकिन उन्हें मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि वे समर्थों के काम के लोग थे। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षक, प्रशिक्षक, उद्योगों-व्यापारों के व्यवस्थापक आदि। उनके बिना समर्थों का काम नहीं चल सकता था, इसलिए उन्हें मारा नहीं जाना था, उनके पागलपन का इलाज ही किया जाना था।

समर्थों ने पागलों के इलाज के लिए पागलखाने बना रखे थे। कोई पागल नजर आता, तो सरकारी कर्मचारी आते और उसे पकड़कर पागलखाने में ले जाते। शुरू-शुरू में समर्थों ने उस पागलपन को मामूली बीमारी समझा था, लेकिन वह पागलपन धीरे-धीरे छूत के रोग की तरह बढ़ने लगा और फिर महामारी की तरह तेजी से फैलने लगा। कोई सोच भी नहीं सकता था कि अचानक दुनिया में एक साथ इतने पागल पैदा हो जायेंगे। ऐसा लगता था, मानो जिसे वे बहुत देर से समझ नहीं पा रहे थे, वह जोक, मजाक या चुटकुला अचानक उनकी समझ में आ गया हो और उसे इतनी देर से समझ पाने पर वे उस पर कम और अपने-आप पर ज्यादा हँस रहे हों। पहले वे धीरे से हँसते–हा-हा-हा! फिर जोर से–हा-हा-हा! फिर और जोर से–हा-हा-हा!

जरा सोचिए, दुनिया के हर हिस्से में हजारों-लाखों-करोड़ों लोग अचानक जोर-जोर से, पूरा गला फाड़कर हँसने लगे होंगे, तो दुनिया का क्या हाल हुआ होगा!

हुआ यह कि समर्थों की नींद उड़ गयी। वे अपनी सरकारों के भरोसे चैन से सोते थे। जागकर उन्होंने सरकारों से पूछा, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’ लेकिन सरकारों की अपनी ही नींद उड़ी हुई थी। वे पुलिस-थानों, अदालतों, जेलों, पागलखानों आदि की व्यवस्थाओं के भरोसे चैन से सोती थीं। अब वे जागकर उन व्यवस्थाओं से पूछ रही थीं, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’ व्यवस्थाएँ भी, जो प्रायः सोती रहती थीं, अब जाग उठी थीं और सारी दुनिया की एक-एक हलचल से निरंतर अवगत कराते रहने वाले भूमंडलीय खुफिया तंत्र से पूछ रही थीं, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’ और खुफिया तंत्र के लोग नवीनतम तकनीकों से प्राप्त फुटेज खँगालते हुए तीव्रतम गति वाले कंप्यूटर खटखटाकर एक-दूसरे से पूछ रहे थे, ‘‘यह क्या हो रहा है?’’

समर्थों की समझ में कुछ नहीं आ रहा था और पागलों की संख्या और उनकी हँसी का शोर पल-प्रतिपल बढ़ता जा रहा था। असमर्थ लोग भी चैन से नहीं सो पा रहे थे। वे लगातार बनी रहने वाली बेचैनी में दुःस्वप्न देखते हुए सोते थे। अब उनकी दुःस्वप्नों वाली नींद भी हराम हो गयी और वे अपने घरों से निकलकर सड़कों पर आ गये। देखते-देखते उनमें से भी कई पागल होने लगे और उनमें भी पागलों की संख्या बढ़ने लगी।

समर्थों ने अपनी विश्व संसद की आपातकालीन बैठक बुलायी और उसमें तय किया कि दिन-दूने और रात-चैगुने बढ़ते पागलों का इलाज संभव नहीं है, अतः उन्हें नियंत्रित करने के लिए त्वरित कार्रवाई की जाये।

पहली कार्रवाई हर देश में पुलिस की तरफ से हुई। उसने बड़े पैमाने पर धावा बोलकर पागलों को गिरफ्तार किया, लेकिन पहली बार यह देखा कि पागल न तो डरे, न गिरफ्तार होने से बचने के लिए भागे। वे हँसते-हँसते, ठहाके लगाते हुए, ठाठ से गिरफ्तार हुए। यह देखकर पुलिस घबरा गयी। उसे पता था कि पागलखानों में पहले ही जरूरत से ज्यादा पागल भरे हुए हैं। नये पागलखाने तत्काल बनवाना संभव नहीं है और तब तक इतने सारे पागलों को कहीं और रखना भी संभव नहीं है। उसने सोचा, गिरफ्तार पागल उसकी गिरफ्त से छूटकर भागने की कोशिश करेंगे, तो वह उन्हें भाग जाने देगी। किसी-किसी देश में तो पुलिस पागलों से प्रार्थना भी करती पायी गयी कि वे भाग जायें। लेकिन पुलिस की इस प्रार्थना पर पागल इतने जोर से हँसे कि वह डर गयी। उसने अपने-अपने देशों की सरकारों से पूछा, ‘‘पागल काबू में नहीं आ रहे हैं। क्या किया जाये?’’ सरकारों ने समर्थों की विश्व संसद से पूछा, ‘‘पागल काबू में नहीं आ रहे हैं। क्या किया जाये?’’

समर्थों की विश्व संसद ने समस्त सरकारों को और सरकारों ने अपने-अपने देश की पुलिस को आदेश दिया, ‘‘पागलों को दूर जंगल में ले जाकर छोड़ आओ।’’ पुलिस ने आदेश का पालन किया। लेकिन पागलों को जंगलों में छोड़कर हर जगह की पुलिस अपनी गाड़ियों में वापस आयी, तो उसने देखा कि पहले से भी ज्यादा पागल हाथ उठाकर हँसते हुए उसका स्वागत कर रहे हैं। पुलिस हैरान रह गयी। इतनी दूर जंगल में छोड़े हुए पागल पैदल उससे पहले वापस कैसे पहुँचे? सरकारों को बताया गया, तो उन्होंने कोई और उपाय न देख आदेश दिया, ‘‘पागलों को फिर से गाड़ियों में भरकर फिर से दूर जंगल में छोड़कर आओ।’’ पुलिस ने पुनः आदेश का पालन किया। लेकिन घोर आश्चर्य! जंगलों में पहले छोड़े गये पागल वहाँ पहले से ही हाथ उठाकर अट्टहास करते हुए नये पागलों के स्वागत में खड़े थे!

यह चमत्कार कैसे हुआ? न पुलिस की समझ में आया, न सरकारों की समझ में।

दरअसल किसी की भी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। दुनिया के हर शहर, हर गाँव में जोर-जोर से हँसने वाले नये-नये पागल पैदा हो रहे थे और न जाने कब से वीरान-सुनसान पड़े जंगल उनसे आबाद हो रहे थे। वे वहाँ अपनी बस्तियाँ बसा रहे थे और खेती, बागवानी, पशु पालन जैसे काम करते हुए अपनी नयी जिंदगी शुरू कर रहे थे। दुनिया की सरकारों को लगा कि यह तो भारी गड़बड़ है। इस तरह गाँव-गाँव और शहर-शहर असमर्थ लोग पागल होते रहे और जंगलों में जाकर अपनी अलग दुनिया बसाकर अपने ढंग से जीने लगे, तो समर्थों की व्यवस्था का क्या होगा? उनके खेतों और कारखानों में काम कौन करेगा? उनके उद्योग और व्यापार कौन चलायेगा? उनके लिए भोजन-वस्त्र कौन जुटायेगा? उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस और फौज में भर्ती होने कौन आयेगा? उनके दफ्तर, स्कूल, काॅलेज, अस्पताल वगैरह कौन चलायेगा?

पागलों की बढ़ती संख्या से सबसे पहले पुलिस प्रभावित हुई। समर्थों के शासन में पुलिस वालों को वेतन बहुत कम दिया जाता था, लेकिन असमर्थों को डरा-धमकाकर लूटने की पूरी छूट दी जाती थी। इसलिए पुलिस की नौकरी में ‘ऊपर की कमाई’ असली कमाई मानी जाती थी। मगर ऊपर की कमाई का कम-ज्यादा होना इस बात पर निर्भर करता था कि असमर्थ पुलिस से कम डरते हैं या ज्यादा। ज्यादा कमाई के लिए पुलिस असमर्थों को ज्यादा से ज्यादा डराकर रखती थी। वह पागलों को भी डराना चाहती थी, मगर पागल थे कि पुलिस से डरते ही नहीं थे। वह उन्हें आधी रात उनके घरों से उठाकर ले जाये, थानों में ले जाकर उनकी पिटाई करे, हवालात में उन्हें थर्ड डिग्री की यातनाएँ दे, या उनका एनकाउंटर ही क्यों न कर दे, पागल उससे डरते ही नहीं थे। पुलिस द्वारा दी जाने वाली हर धमकी, हर गाली, हर लाठी, हर गोली का जवाब वे गलाफाड़ हँसी से देते।

पागलों के इस रवैये से पुलिस की ऊपर की कमाई बहुत घट गयी। उसी अनुपात में पागलों को पकड़-धकड़कर जंगलों में छोड़ आने के काम में उसकी रुचि भी घट गयी। होते-होते यह होने लगा कि सरकारें जब पुलिस को पागलों से निपटने के आदेश देतीं, तो पुलिस उनसे निपटने की झूठी रिपोर्टें सरकारों को देकर अपना कर्तव्य पूरा हुआ मान लेती। नतीजा यह हुआ कि पुलिस नाकारा हो गयी और सभी देशों की सभी सरकारों के प्रशासन ठप्प हो गये। पुलिस थाने बेकार हुए, तो अदालतें और जेलें भी बेकार हो गयीं। यह पूरा तंत्र इतना बड़ा था कि उसके बेकार हो जाने से कई काम एक साथ हुए। एक तरफ सरकारें, जो इसी तंत्र के बल पर टिकी थीं और इसी से लोगों को आतंकित रखकर उन पर शासन करती थीं, अचानक बेहद कमजोर हो गयीं। दूसरी तरफ हर देश में पुलिस के अफसर और सिपाही, अदालतों के जज और वकील, जेलों के जेलर और जल्लाद एक साथ बेकार हो गये। करोड़ों-करोड़ लोग बेरोजगार हो गये।

अब इतने सारे बेरोजगार लोग करें तो क्या करें? जायें तो कहाँ जायें? कोई और उपाय न देख वे पागलों के पास गये और उनसे पूछा, ‘‘हम कहाँ जायें और क्या करें?’’

पागलों ने हँसकर उनसे कहा, ‘‘सत्ता के आसमान में बहुत उड़ लिये, अब श्रम की जमीन से जुड़ो। मेहनत करो और खुद कमाओ-खाओ।’’

‘‘कैसे?’’

‘‘जहाँ भी खाली जमीन मिले, वहाँ खेती और बागवानी करके अन्न और फल पैदा करो। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, मुर्गी, मछली आदि पालकर दूध, मांस आदि पैदा करो। बेचने के लिए नहीं, खुद खाने और दूसरों को खिलाने के लिए। खुद जीने के लिए और दूसरों को जिलाने के लिए।’’

मरता क्या न करता! थानों, अदालतों और जेलों से मुक्त हुए लोगों ने जगह-जगह छोटी-छोटी देहाती बस्तियाँ बसायीं और आत्मनिर्भर होकर जीना शुरू कर दिया। प्रशासन और न्याय व्यवस्था द्वारा बड़े पैमाने पर किये जाने वाले काम उनकी पंचायतें छोटे पैमाने पर करने लगीं। अपराध एकदम कम या खत्म ही हो गये थे। अदालतों और जेलों की जरूरत ही नहीं रही थी, छोटे-मोटे झगड़े पंचायतों में ही निपटा लिये जाते।

तब सरकारों ने पागलों से निपटने का काम फौजों को सौंपा। समर्थ-असमर्थ हर देश के पास अपनी फौज थी। फौजें अपने-अपने देश की सीमाओं की सुरक्षा करती थीं, दूसरे देशों के हमलों को रोकती थीं और कभी-कभी खुद भी दूसरे देशों पर हमले करती थीं। ज्यों ही पता चलता, किसी असमर्थ देश में अशांति है, समर्थ देशों की फौजें शांति स्थापित करने पहुँच जातीं और वहाँ मरघट की-सी शांति स्थापित कर देतीं। ज्यों ही पता चलता, किसी असमर्थ देश में जनतंत्र खतरे में है, वे जनतंत्र की रक्षा करने पहुँच जातीं और वहाँ निहायत सख्त और मजबूत तानाशाही वाला जनतंत्र स्थापित कर देतीं। ज्यों ही पता चलता, कोई असमर्थ देश समर्थों की सेवा से मुक्त होकर स्वतंत्र और स्वायत्त होना चाहता है, समर्थों की फौजें उसे समर्थ-भक्ति का पाठ पढ़ाने पहुँच जातीं और वहाँ की सरकार को डरा-धमकाकर, या खुले बाजार में खरीदकर, उसकी जगह समर्थों के लिए काम करने वाली कोई कमजोर-सी कठपुतली सरकार बनाकर बिठा देतीं।

लेकिन पागलों से निपटने का मामला बड़ा टेढ़ा था। वे न तो आजादी या अपने लिए अलग राज्य जैसी कोई माँग करते, न ऐसी किसी माँग के लिए अहिंसक आंदोलन या हिंसक विद्रोह करते। वे बस इतना करते कि समर्थों की सेवा करना छोड़ हँसने लगते। वे सिर्फ हँसते थे और समर्थों का बताया हुआ कोई काम नहीं करते थे। उन्होंने खेतों और कारखानों, दुकानों और दफ्तरों, स्कूलों और अस्पतालों आदि में काम करने जाना बंद कर दिया था। उनसे काम करने को कहा जाता, तो वे हँसने लगते। भूखों मर जाने का डर दिखाया जाता, तो हँसने लगते। जेलों और पागलखानों में भेजे जाने का डर दिखाया जाता, तो हँसने लगते। उन्हें दूर जंगलों में छुड़वा दिया जाता, तो भी वे हँसते और हँसते ही रहते।

आखिरकार समर्थों की विश्व संसद में एक प्रस्ताव पास हुआ कि पागलों को मौत से डराया जाये, क्योंकि मौत से बड़ा डर कोई नहीं होता। प्रस्ताव के अनुसार समर्थ और असमर्थ, सब देशों की सरकारों ने अपनी फौजों को आदेश दिया कि वे जाकर अपने-अपने देश के पागलों को मौत से डरायें। गाँव-गाँव, शहर-शहर, मुहल्ले-मुहल्ले और गली-गली में जायें, इक्के-दुक्के पागलों को गोली से उड़ा दें और उनकी लाशें पेड़ों या खंभों पर लटका दें, ताकि दूसरे पागल डरें और पागलपन छोड़कर काम पर लौटें। अगर कहीं एक से अधिक पागल मिलें, तो उनमें से कुछ को गोली चलाकर खत्म कर दें। अगर पागलों की भीड़ें मिलें, तो जरूरत के मुताबिक उन पर छोटे बम डालकर उनमें से कुछ को मार डालें। पागलों को हर हाल में डराकर उनका हँसना बंद कराना है और उन्हें काबू में लाकर काम पर लगाना है।

आदेश पाकर सभी देशों की फौजें अपने-अपने देश के पागलों को पागलपन छोड़कर काम पर लौटने के लिए तैयार करने निकल पड़ीं। मगर पागल इतने ज्यादा पागल हो चुके थे कि उन्हें मरने से डर ही नहीं लगता था। गोली लगने पर वे चीखते नहीं थे, गला फाड़कर हँसते थे–हा-हा-हा! गोले बरसाये जाने पर वे भागते नहीं थे, तोपों के सामने निहत्थे खड़े रहकर हँसते थे–हा-हा-हा! ऊपर से बम बरसाये जाने पर जब उनकी लाशों के चिथड़े उड़ने लगते, तब भी उनके सामूहिक ठहाके सुनायी पड़ते–हा-हा-हा! उन ठहाकों का ऐसा गगनभेदी शोर उठता कि फौजियों के दिल दहल जाते। जंगलों में छोड़े गये पागलों पर जब गोली-गोले बरसाये जाते, तब तो पागलों की हँसी में जंगल के पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और नदी-नालों की आवाजें भी शामिल होकर उसे ऐसे विकट हास्य की भयंकर गड़गड़ाहट में बदल देतीं कि हथियारों के बल पर स्वयं को परम शक्तिशाली समझने वाले फौजी डरकर भाग खड़े होते।

एक बार मैं पागलों की रिपोर्टिंग के लिए एक जंगल में गयी, तो मैंने देखा कि जंगल में छोड़ दिये गये हजारों पागल जिंदा रहने की जुगत में लगे हैं। कोई जमीन खोद रहा है, कोई पेड़ पर चढ़कर फल तोड़ रहा है, कोई आग जला रहा है, तो कोई उस पर कुछ भून रहा है। फौजियों को आते देख वे इकट्ठे होकर सामने आये और हँसकर बोले, ‘‘मारोगे? मारो!’’ और हँसने लगे, ‘‘हा-हा-हा!’’

फौजी हैरान होकर देखते रह गये कि सामने मौत देखकर भी ये लोग हँस रहे हैं। उन्होंने ऐसे लोग पहले कभी नहीं देखे थे, जो मारे जाने से डरते न हों, बल्कि हँसते हों। फौजियों को लगा, यह तो लड़ाई नहीं, निर्दोष निहत्थे लोगों की हत्या है। सामूहिक हत्या। जनसंहार।

फौजी भी आखिर थे तो मनुष्य ही। उन्होंने हथियार फेंक दिये और घुटनों के बल बैठकर, हाथों में चेहरे छिपाकर, फूट-फूटकर रोने लगे। उन्हें रोते देख पागल आगे बढ़े, उनके पास पहुँचे, उनके गले मिले और वे भी रोने लगे।

फौजियों ने रोते-रोते कहा, ‘‘हम कितने पागल थे, जो तुम को पागल समझते थे! असली पागल तो हम हैं, जो मरने और मारने की वह नौकरी करते हैं, जिसने हमें इंसान से हैवान और शैतान बना दिया है!’’

‘‘तो समझ लो कि आज से तुम्हारी मरने और मारने वाली नौकरी खत्म, जीने और जिलाने वाली जिंदगी शुरू! तुम्हें इंसान से हैवान और शैतान बनाने वाले हैं ये हथियार। इनको दुनिया से विदा करो।’’

‘‘मगर कैसे?’’

‘‘यह तुम खुद सोचो। लेकिन यह समझ लो कि जब तक हथियारों का बनना और बिकना बंद नहीं होगा, लोग डरते रहेंगे और पागल भी होते रहेंगे।’’

फौजियों ने पागलों को गौर से देखा, फिर आपस में एक-दूसरे को देखा, मुस्कराये और पागलों से बोले, ‘‘हम समझ गये।’’

‘‘तो आज की रात तुम हमारे मेहमान रहो। मिलकर जंगल में मंगल करते हैं।’’

और उस रात जंगल में जो जश्न पागलों और फौजियों ने मिलकर मनाया, उसमें उन्होंने मुझे भी शामिल किया। ऐसा जश्न मैंने पहले कभी नहीं देखा था।

अगले दिन मैंने इस घटना की विस्तृत रिपोर्टिंग की और वह सभूस (समर्थों की भूमंडलीय समाचारसेवा) के जरिये एक बड़ी खबर बनकर सारी दुनिया में प्रकाशित और प्रसारित हुई। इस खबर से समर्थों की हालत खराब हो गयी। उन्होंने झटपट समर्थों की विश्व संसद की एक आपातकालीन बैठक बुलायी और उसमें आनन-फानन यह फैसला किया कि पागलों को खत्म करने के लिए भेजी गयी फौजें वापस बुला ली जायें और पागलों के प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए बुलाया जाये।

फैसले के मुताबिक तुरंत सारी दुनिया के पागलों को अपने प्रतिनिधि चुनकर भेजने के संदेश और फौजियों को अपने ठिकानों पर वापस लौटने के आदेश भेजे गये। लेकिन पागलों तक यह संदेश और फौजियों तक यह आदेश पहुँचा, तो पागल और फौजी दोनों एक साथ हँसे। दोनों की सम्मिलित हँसी दुनिया भर में ऐसी गूँजी कि जैसे दुनिया भर के पूरे आसमान में छाये घने बादल गड़गड़ा उठे हों। उस गड़गड़ाहट में बिजली-से चमकते और तड़तड़ाते कुछ समवेत शब्द भी थे :

‘‘मरेंगे और मारेंगे नहीं, जियेंगे और जिलायेंगे।’’
 ‘‘डरेंगे और डरायेंगे नहीं, हँसेंगे और हँसायेंगे।’’

अब, यह उस सम्मिलित हँसी का असर रहा हो या उन समवेत शब्दों का, दुनिया भर में तमाम असमर्थ हँसने लगे। जो असमर्थ पागल और फौजी नहीं थे, वे भी हँसने लगे। और उसी विश्वव्यापी समवेत हँसी के बीच वह घटना घटी, जो दुनिया में न तो पहले कभी घटी थी और न आगे कभी घटेगी।

फौजियों ने अपने भूमंडलीय संचार-तंत्र के जरिये न जाने कैसे सारी दुनिया की सारी फौजों के बीच एक सहमति बनायी और एक दिन प्रत्येक देश की फौज ने अपने देश के हथियार-कारखानों और आयुध-भंडारों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने अपने पास के तथा आयुध-भंडारों में भरे सब छोटे-बड़े अस्त्रों-शस्त्रों और परम विनाशकारी बमों के साथ-साथ उन्हें बनाने वाली मशीनों को भी ले जाकर गहरे महासागरों में डुबो दिया। हथियार बनाने के कारखानों की जगहों पर उन्होंने सस्ते खाद्य पदार्थों, पोषक आहारों, औषधियों और चिकित्सा संबंधी उपकरण आदि बनाने के कारखाने खुलवा दिये।

दुनिया भर के हथियारों के कारखाने बंद हो गये, तो हथियारों का भूमंडलीय बाजार और व्यापार भी खत्म हो गया। पुलिस, दूसरे सशस्त्र बलों और आतंकी संगठनों के पास जो हथियार थे, वे भी कुछ दिन बाद गोला-बारूद न मिलने से बेकार हो गये। इस प्रकार दुनिया भर के लोग हथियारों द्वारा पैदा किये जाने वाले भय और आतंक से मुक्त हो गये। इसके साथ ही भय और आतंक के सहारे अनंत काल तक अखिल भूमंडल पर शासन करने के लिए समर्थों द्वारा बनायी गयी संस्थाएँ और व्यवस्थाएँ भी बेकार हो गयीं। समर्थों की वह विश्व-संसद, जिसने हजारों साल आगे की सोचकर अपना नया संवत् चलाया था, वह भी नहीं रही।

मेरा और दूसरे बहुत-से लोगों का खयाल था कि अब पागल लोग समर्थों की बनायी विश्व संसद पर कब्जा करेंगे और उसमें बैठकर समर्थों की भाँति ही अखिल भूमंडल पर शासन करेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। किया सिर्फ यह कि विश्व संसद की इमारत को ऐतिहासिक वस्तुओं का संग्रहालय बनाकर उसे हमेशा के लिए ‘इतिहास की वस्तु’ बना दिया।

हथियारों के कारखाने नष्ट हो जाने के बाद फौजों का भी कोई काम नहीं रहा। सो फौजियों ने यह किया कि जिन सीमाओं की सुरक्षा वे किया करते थे, उन्होंने हँसते-हँसते मिटा दीं और यह काम सीमाओं के इस पार और उस पार के फौजियों ने, जो पहले एक-दूसरे के दुश्मन हुआ करते थे, दोस्त बनकर साथ-साथ किया। सीमाएँ मिटा देने के बाद फौजियों ने अपनी वर्दियाँ उतारकर सादा कपड़े पहने, वर्दियों के ढेर लगाये, उनकी होलियाँ जलायीं और एक-दूसरे के गले मिले। देशों और दिलों को बाँटने वाली सीमाओं से दुनिया को मुक्त करने की खुशी में वे पागलों की तरह हँसे। उन्होंने जमकर जाम छलकाये, मुक्ति के गीत गाये, जी भरकर नाचे और एक-दूसरे से विदा लेकर पागलों के पास यह पूछने गये कि अब वे क्या करें। पागलों ने उनसे कहा, ‘‘तुमने मरने और मारने का काम छोड़कर जीने और जिलाने का काम करने की कसम खायी थी। अब उस काम को कर दिखाने का समय आ गया है। लोगों के बीच जाओ और भूख, कुपोषण, बीमारी और बेरोजगारी के कारण मर रहे उन मनुष्यों को जिलाओ, जो समर्थों की विश्व व्यवस्था द्वारा मानव कूड़ा और जैविक कूड़ा बना दिये गये हैं। इसके लिए उत्पादन और वितरण की एक नयी व्यवस्था बनाओ, जिसका मूल मंत्र हो–अपना उत्पादन और अपना उपभोग। बड़े-बड़े शहरों में केंद्रित बड़े-बड़े उद्योगों की बड़ी-बड़ी मशीनों वाली उत्पादन प्रणाली को बदलकर छोटी-छोटी ग्रामीण बस्तियों में विकेंद्रित छोटे-छोटे उद्योगों और हाथ से या हवा, पानी, धूप, भाप और पशुओं की शक्ति से चलने वाली छोटी-छोटी मशीनों वाली उत्पादन प्रणाली शुरू करो।’’

भूतपूर्व फौजियों में एक नयी जिंदगी शुरू करने और एक नयी व्यवस्था बनाने का उत्साह पैदा हुआ, तो वे मुक्त मन, स्वस्थ तन और सुंदर भावनाओं और योजनाओं के साथ दुनिया भर में फैल गये। उन्होंने सबसे पहले उन ऊँची इमारतों, बड़े कारखानों, बड़े बाजारों, मॉलों, मनोरंजन केंद्रों आदि को बंद किया, जिनमें नाहक ही ऊर्जा की भारी फिजूलखर्ची होती थी। उनमें लगने वाली ऊर्जा को उन्होंने ग्रामीण बस्तियों की ओर मोड़ा, जहाँ खेती-बाड़ी और उससे जुड़े छोटे-छोटे उद्योगों के लिए तथा घरों, स्कूलों, अस्पतालों आदि के लिए उसकी जरूरत थी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी छूमंतर हो गयी और वहाँ रोजगार इतने बढ़ गये कि शहरों के बेरोजगार वहाँ जाकर अपना उत्पादन और अपना उपभोग करने लगे। मनुष्यों को कूड़ा बनाने वाली व्यवस्था को अतीत की वस्तु बनाकर वे मनुष्यता का भविष्य बनाने लगे।

पहले के लोग गाँवों से शहरों की ओर भागते थे, अब उलटा होने लगा। शहर खाली होने लगे। ऊँची-ऊँची इमारतें बेकार हो गयीं। बड़े-बड़े कारखाने या तो बंद हो गये, या बेहद जरूरी चीजों का उत्पादन करने लगे। बाजारों में विज्ञापन के बल पर गैर-जरूरी चीजों का बिकना बंद हो गया। दुनिया की पूरी व्यवस्था ही बदलती नजर आने लगी।

अब कुछ और तरह के पागलों ने एक चमत्कार किया। एक दिन दुनिया भर के अर्थशास्त्री, वित्त विशेषज्ञ, मुद्रा विशेषज्ञ, बैंकिंग विशेषज्ञ, सट्टा बाजार विशेषज्ञ और दुनिया भर की वित्त व्यवस्था से जुड़े कंप्यूटरों के विशेषज्ञ मिले, जो अपने-अपने काम करते हुए ही किसी दिन हँस पड़े थे और पागल हो गये थे। उन्होंने एक-दूसरे से कहा, ‘‘मनुष्यों को पागल बनाने वाली दो चीजें हैं–भय और लालच। फौजी पागलों ने दुनिया को भय से मुक्त कर दिया है, अब लालच से मुक्त करने की बारी हमारी है। भय से मुक्ति के लिए उन्होंने हथियारों को दफ्नाया और सीमाओं को मिटाया, लालच से मुक्ति के लिए हम दुनिया से धन का सफाया करेंगे।’’

‘‘कैसे?’’

इस प्रश्न पर उनके बीच लंबी बहस हुई और एक योजना बनी, जिसके अनुसार एक दिन बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों की भूमंडलीय संचार-व्यवस्था एकदम ठप्प हो गयी। दुनिया भर के बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों के कंप्यूटर खराब हो गये। उनमें पल-पल में अरबों-खरबों का जो धन दुनिया में इधर से उधर होता रहता था, उसका आना-जाना बंद हो गया। दुनिया भर के बैंक अकाउंट बंद हो गये। बैंकों में जितने भी खाते थे, उन सब में जमा राशियाँ शून्य हो गयीं।

इससे दुनिया में ऐसी खलबली मची, जैसी हथियारों के दफ्नाये जाने और सीमाओं के मिटाये जाने के समय भी नहीं मची थी। कल तक जो धनी और महाधनी थे, रातोंरात धनहीन हो गये। जिन लोगों के घरों, दुकानों और दफ्तरों में लाखों-करोड़ों की नकदी रखी हुई थी, वह सब बेकार हो गयी। सट्टा बाजार सहित सारा बाजार और व्यापार ठप्प हो गया। सिक्के धातुओं के और नोट कागजों के बेकार टुकड़े होकर रह गये।

पहले लोग हँसते-हँसते पागल हुए थे, इस बार बहुत-से लोग रोते-रोते पागल हुए।

अगला कदम कुछ और पागलों ने उठाया। दुनिया के हर देश में लोगों की आबादी, जनसंख्या के घनत्व और नगर-नियोजन आदि का हिसाब रखने से संबंधित विभागों में काम करने वाले जो विशेषज्ञ हँसते-हँसते पागल हुए थे, उन्होंने मिलकर हिसाब लगाया कि दुनिया में कहाँ आबादी बहुत कम है और कहाँ बहुत ज्यादा। हालाँकि दुनिया से धन का सफाया हो जाने के बाद धनी-निर्धन जैसे भेद खत्म हो गये थे, फिर भी कहीं अधिकांश लोग अब भी बेघर थे और कहीं बहुत थोड़े लोग अब भी बहुत बड़ी-बड़ी जगहों में रहते थे। कहीं लोगों के पास खाने-पहनने की चीजों के भंडार भरे हुए थे और कहीं बहुत-से लोग भूखे-नंगे घूम रहे थे। पागलों ने घनी आबादी वाले इलाकों के बेघर, बेरोजगार और भूखे-नंगे लोगों से कहा, ‘‘यह पृथ्वी उन थोड़े-से लोगों की बपौती नहीं है, जो इस पर इतनी बड़ी-बड़ी जगहें घेरकर बैठे हुए हैं। यह पृथ्वी सबकी है और इस पर सबको आराम से रहने-बसने का हक है। जाओ, जहाँ बहुत ज्यादा जगह में थोड़े-से लोग रहते हों, वहाँ जाकर रहो और जो लोग जरूरत से ज्यादा खाते-पहनते हों, उनके साथ मिल-बाँटकर खाओ-पहनो।’’

भय और आतंक तो अब दुनिया में रह ही नहीं गया था, सीमाएँ मिट जाने से अब लोग वीजा और पासपोर्ट के बिना दुनिया में कहीं भी आ-जा सकते थे। समर्थों की विश्व व्यवस्था में लोग दूसरे देशों में नौकरी करने या शरण लेने के लिए दीन-हीन होकर जाया करते थे। अब वे अधिकारपूर्वक रहने-बसने के लिए जाने लगे। इससे बहुत बड़ी-बड़ी जगहों में रहने वाले और जरूरत से ज्यादा खाने-पहनने वाले थोड़े-से लोगों को थोड़ी तकलीफ हुई, लेकिन बहुत छोटी-छोटी जगहों में बहुत बड़ी संख्या में रहने वाले और खाने-पहनने को बहुत कम पाने वाले बहुत-से लोगों को बहुत राहत मिली।

इसके बाद वे साहित्यकार, कलाकार, शिक्षक और अन्य संवेदनशील लोग सक्रिय हुए, जो अपने-अपने समाजों में ऊँच-नीच के भेद और उनके आधार पर किये जाने वाले अन्याय-अत्याचार देखकर पागल हुए थे। हालाँकि अब काफी आजादी और बराबरी हो गयी थी, जिससे अमीर-गरीब, मर्द-औरत, गोरा-काला, सवर्ण-शूद्र, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक जैसे भेदों के आधार पर किये जाने वाले अन्याय-अत्याचार काफी कम हो गये थे, फिर भी पुरानी आदतों और मान्यताओं के चलते इस प्रकार के कुछ अन्याय-अत्याचार अब भी होते थे। यह देखकर उन पागलों ने औरतों से कहा कि वे मर्दों को घेरें, कालों से कहा कि वे गोरों को घेरें, शूद्रों से कहा कि वे सवर्णों को घेरें और अल्पसंख्यकों से कहा कि वे उन बहुसंख्यकों को घेरें, जो लैंगिक, नस्ली, धार्मिक, सांप्रदायिक और खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन आदि के भेदों के आधार पर उनके प्रति अन्याय और अत्याचार करते हैं। पागलों ने उनसे कहा कि उन लोगों को घेरकर मारना-पीटना नहीं है, बस उन्हें घेरकर उन पर हँसना है और तब तक हँसते रहना है, जब तक वे शर्मिंदा होकर मनुष्यों को मनुष्य न समझने की अपनी भूल स्वीकार करके उसे सुधार न लें।

इस तरह दुनिया भर में सामाजिक अन्याय के विरुद्ध हँसी के हथियार से लड़ाई लड़ी गयी और जीती गयी।
हाँ, मैं अपने बारे में बताना तो भूल ही गयी। मैं अब भी पत्रकार थी, मगर अब मैं ‘सभूस’ (समर्थों की भूमंडलीय समाचारसेवा) की नहीं, बल्कि उसे बदलकर बनायी गयी ‘अभूस’ (अखिल भूमंडलीय समाचारसेवा) की पत्रकार थी। अब मेरा काम दुनिया में हो रहे नये बदलावों की रिपोर्टिंग करना था। दुनिया में इतने बड़े-बड़े बदलाव इतनी तेजी के साथ हो रहे थे कि मैं उनकी रिपोर्टिंग के लिए दिन-रात यहाँ से वहाँ भागती रहती थी। इधर मेरी रुचि प्रकृति और पर्यावरण से संबंधित बदलावों में अनायास बढ़ गयी थी।

अपने काम के साथ-साथ मैं अपने माता-पिता, भाई-बहन और दूसरे सगे-संबंधियों की तलाश भी करती रहती थी। मगर उनमें से कोई भी मुझे कहीं भी नहीं मिला। हाँ, एक बार जब मैं दुनिया भर में घूम-घूमकर पागलों द्वारा शुरू की गयी नये ढंग की सामूहिक खेती-बाड़ी, बागवानी और खाने योग्य पशुओं, पक्षियों, मछलियों आदि के उत्पादन के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा से संबंधित कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग कर रही थी, तब मुझे एक पर्यावरण सम्मेलन में एक पागल दिखा, जो मुझे अपने बड़े भाई जैसा लगा। लेकिन मुझे अपने परिवार से बिछुड़े इतना लंबा अरसा हो चुका था और वह जिस देश में मुझे दिखा था, वह मेरे देश से इतनी दूरी पर था कि वहाँ मुझे अपने भाई का होना संभव नहीं लगा। फिर भी मैंने उससे मिलकर उसके अतीत के बारे में जानना चाहा। लेकिन वह हँस दिया। मैं समझ गयी, यदि वह मेरा भाई होता, तो अवश्य ही मुझे पहचान लेता।

लेकिन उस पागल से मिलने के बाद मैंने सोचा, कम से कम एक बार मुझे उस देश में अवश्य जाना चाहिए, जो कभी मेरा देश था और जिसे कभी समर्थों ने धूल में मिला दिया था। दुनिया में इतने बड़े-बड़े परिवर्तन हो गये हैं, क्या पता वहाँ जाकर मुझे अपने परिवार के लोगों के बारे में कुछ पता चले या शायद वहाँ कोई मुझे मिल ही जाये।

और एक दिन मैं वहाँ पहुँच गयी, जहाँ मेरा शहर हुआ करता था। उस जगह का नाम तो वही था, लेकिन मेरा जाना-पहचाना वह शहर वहाँ नहीं था, जो नदी के दोनों किनारों पर घनी बस्तियों, बहुमंजिली ऊँची-ऊँची इमारतों और बड़े-बड़े उद्योगों वाला एक बड़ा शहर था। नदी अब भी वहाँ थी, लेकिन उसके दोनों तरफ घनी बस्तियों की जगह हरी-भरी खेतियाँ थीं। बहुमंजिली इमारतों की जगह इकमंजिले मकान थे। दिन में धूप और रात में चाँदनी के लिए खुले-खुले मकान। बड़ी-बड़ी मशीनों वाले बड़े कारखानों की जगह छोटे-छोटे कारखाने थे, जिनमें हाथ से या छोटी मशीनों से रोजमर्रा के काम की चीजें बनायी जा रही थीं। जहाँ फौजी छावनी हुआ करती थी, वहाँ स्कूल, काॅलेज और अस्पताल बन गये थे। परेड मैदानों को खेल के मैदानों में बदल दिया गया था। हथियार बनाने का कारखाना दवाइयाँ बनाने का कारखाना बन गया था। आयुध-भंडार खाद्य सुरक्षा के लिए बनाया गया अन्न भंडार बन गया था। रेलवे स्टेशन था, लेकिन पहले जितना बड़ा, बंद और भीड़भाड़ वाला नहीं, बल्कि छोटा-सा खुला हुआ और शांत। पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन जब सारी दुनिया में ही चलने बंद हो गये थे, तो पहले की तरह उनसे घिरी सड़कें अब मुझे वहाँ कहाँ दिखतीं? उनकी जगह मुझे वे वाहन दिखे, जो मैंने बचपन में शहरों से दूर गाँव-देहात में चलते देखे थे–बैलगाड़ी, भैंसागाड़ी, घोड़ागाड़ी, ऊँटगाड़ी। लोग ज्यादातर पैदल चल रहे थे या साइकिलों पर।

मैं संवाददाता वाली जिज्ञासा के साथ लोगों से पूछताछ करती, अपने बदले हुए शहर के बारे में नयी जानकारियाँ जुटाती घूम रही थी और साथ-साथ उस जगह का पता भी लगा रही थी, जहाँ कभी मेरा घर था। बड़ी देर बाद मुझे एक बूढ़ा आदमी मिला, जिसे मैं पहचान गयी। उसने भी मेरे माता-पिता के नाम से मुझे पहचान लिया। मैंने उससे अपने घर के बारे में पूछा, तो वह मुझे एक टीले पर ले गया और वहाँ से नदी किनारे के हरे-भरे खेतों के बीच बने खूबसूरत मकानों वाली छोटी-सी बस्ती की तरफ इशारा करते हुए बोला, ‘‘वहाँ है तुम्हारा घर।’’

मेरे पूछने पर उसने बताया कि युद्ध के दिनों में जब शहर पर भारी बम बरसाये जा रहे थे, दूसरे लोगों की तरह मेरे परिवार के लोग भी जान बचाने के लिए भागे थे। वे कहाँ-कहाँ गये, कहाँ-कहाँ रहे, उसे मालूम नहीं था। कब और कैसे लौटे, यह भी वह नहीं बता सका। मगर उससे मुझे यह मालूम हो गया कि लौटने वालों में मेरी माँ थीं, मेरे पिता नहीं थे। मेरी छोटी बहन नहीं थी, पर मेरे बड़े भाई थे। माँ और बड़े भाई ने दूसरे लोगों के साथ मिलकर नदी के किनारे खाली पड़ी जमीन को सामुदायिक खेती के लायक बनाया, खेतों के बीच सामूहिक श्रम से मकान बनाये, जो सुंदर थे और एक जैसे नहीं थे।   उनमें से ही एक मकान में मेरी माँ मेरे भाई, मेरी भाभी और मेरी एक भतीजी के साथ सुख से रहती हैं।

विदा लेते समय मैंने शुक्रिया कहा, तो उस भले बूढ़े ने मेरा सिर थपथपाकर आशीर्वाद दिया, ‘‘खुश रहो। जाओ, मिलो अपने लोगों से।’’

मुद्दतों बाद मुझसे मिलकर माँ और भाई तो खुश हुए ही, पहली बार मिली भाभी और भतीजी भी बहुत खुश हुईं। भतीजी को देखकर मुझे लगा कि जैसे मैं उसमें अपनी किशोरावस्था देख रही हूँ।

मैं शाम को घर पहुँची थी। शाम से देर रात तक खाना-पीना चलता रहा और दुनिया भर की बातें होती रहीं। बातों ही बातों में मुझे पता चला कि माँ, भाई और भाभी तीनों मिलकर सामुदायिक खेती और बागवानी करते हैं और मेरी भतीजी स्कूल में पढ़ती है। मगर इसके अलावा चारों सार्वजनिक जीवन में भी खूब सक्रिय रहते हैं। माँ की रुचि शुरू से ही संगीत में थी, सो वे एक संगीतशाला में बच्चों को संगीत सिखाती हैं। भाई को बचपन से ही चित्रकला में रुचि थी और अब वे एक अच्छे चित्रकार बन गये हैं। भाभी की रुचि इतिहास लेखन में है और वे एक पुस्तक लिख रही हैं–‘पागलों ने दुनिया बदल दी’। भतीजी की रुचि तैराकी में है और उसने तैराकी की कई प्रतियोगिताओं में पदक प्राप्त किये हैं।

अगले दिन सुबह सबने मुझे पूरा घर दिखाया, अपने पड़ोसियों से मिलवाया और अपने सामुदायिक खेतों और बागों में घुमाया। वहाँ से नदी पास ही थी। भाई ने मुझसे कहा, ‘‘आओ, नदी पर चलते हैं।’’

‘‘नहीं, नदी पर नहीं।’’ सहसा मेरे मुँह से निकल गया।

‘‘क्यों? नदी पर क्यों नहीं?’’ भाई को आश्चर्य हुआ, लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने मेरी तरफ देखा और हँस पड़े, ‘‘डरती हो कि फिसलकर उसमें गिर न पड़ो?’’

मैं शरमा गयी। मुझे बचपन की वह घटना याद थी, जब मैं माता-पिता और भाई-बहन के साथ एक बार नदी पर घूमने आयी थी और किनारे पर से फिसलकर नदी में गिर गयी थी। नदी शहर की गंदगी और कारखानों से निकलने वाले काले गंधाते पानी के मिलने से बदबूदार गंदे नाले जैसी हो गयी थी और गहरी होने के बावजूद बड़ी मंथर गति से बहती थी। मैं उसमें गिरकर डूबने लगी, तो पिता उसमें कूद पड़े और उन्होंने मेरे बाल पकड़कर मुझे पानी में से निकाला। पिता और मैं नदी में से निकलकर आये, तो काले बदबूदार पानी में भीगे हुए थे और उसमें बहते सड़े-गले खर-पतवार के तिनके हमारे बालों में, मुँह और हाथ-पैरों पर चिपके हुए थे। हमें इस हालत में देखकर मेरे भाई-बहन ही नहीं, माँ भी खूब हँसी थीं।

मुझे शरमाते देख भाई ने कहा, ‘‘डरो नहीं, दूसरी तमाम चीजों की तरह हमारी नदी भी बहुत बदल गयी है।’’

और मैंने पास जाकर नदी को देखा, तो देखती ही रह गयी। काले बदबूदार पानी वाली और मंथर गति से बहने वाले गंदे नाले-सी नदी अब एकदम स्वच्छ जल और तेज बहाव वाली सुंदर नदी बन गयी थी।

उसमें कुछ ऐसा आकर्षण और आमंत्रण था कि मैंने कहा, ‘‘मैं नहाऊँगी।’’ और जो कपड़े मैं पहने हुए थी, उन्हीं को पहने-पहने मैंने छलाँग लगा दी। मुझे मालूम नहीं था कि पानी का बहाव इतना तेज होगा। तैरना जानते हुए भी मैं नदी की तेज धार में बह चली और डूबने लगी। यह देखकर मेरी भतीजी नदी में कूदी, तेजी से तैरती हुई मेरे पास आयी और मुझे बाहर निकाल लायी।

‘‘याद है, माँ, जब यह बचपन में फिसलकर नदी में गिर गयी थी और पिता इसे निकालकर लाये थे?’’ भाई ने मुस्कराते हुए कहा।

‘‘हाँ, याद है। तब यह कैसी भूतनी बनकर निकली थी!’’ माँ हँस पड़ीं।

उनको हँसते देख मेरी भी हँसी छूट गयी और मैं खूब हँसी। बहुत दिनों बाद इतना हँसी।

हँसते-हँसते मैंने नदी की ओर देखा। स्वच्छ जल की वेगवती धारा के उस पार खड़े घने दरख्तों के ऊपर उठते सुबह के सूरज को देखा। पीछे मुड़कर हरे-भरे खेतों के एक तरफ फलदार पेड़ों के बागों को और दूसरी तरफ बने सुंदर इकमंजिले मकानों को देखा। फिर मैंने अपने परिवार को देखा और सभी कुछ मुझे इतना सुंदर लगा, इतना सुंदर लगा कि बता नहीं सकती!