हिन्दी का पुस्तक प्रकाशन भी 'सेलेब्रिटीज' की ओर?
दिवाली के त्यौहार के लिए घर की सफाई करते समय मुझे अपने कुछ पुराने नोट्स मिले। कुछ कागजों पर मैंने आधा-अधूरा-सा कुछ लिख रखा था। कुछ उद्धरण थे, लेकिन उनके सन्दर्भ नहीं थे। ऐसे कागजों को फाड़कर फेंकते समय एक कागज़ पर नज़र पड़ी, जिस पर लिखा था :
"सुबह अखबार में पढा लेख याद आ गया--'बियोंड लेफ्ट एंड राइट'। उसमें लिखा था कि परिस्थिति बदल जाने से बहुत-से वामपंथी मार्क्स, माओ, मंडेला को छोड़कर मैनेजमेंट, मार्केटिंग और मीडिया की तरफ़ चले गए हैं। वाम और दक्षिण का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। बहुत-से लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने दलगत राजनीति और उससे सम्बद्ध विचारधाराओं से ही नहीं, बल्कि राजनीति मात्र से ही पल्ला झाड़ लिया है। लेकिन सभी ऐसा नहीं कर रहे हैं। जाक दरीदा मार्क्सवाद के अंत पर पुनर्विचार कर रहा है। ल्योतार उत्तर-आधुनिक नैतिकता पर किताब लिख रहा है। फ्रांस्वा फ्यूरे कम्युनिज्म का अध्ययन कर रहा है। लेकिन तीन-चार दिन पहले मैंने एक और लेख पढा था--'सेलेब्रिटी नोवेल्स'। उसमें लिखा था--'बुक पब्लिशिंग नाउ रिज़म्बल्स हॉलीवुड एंड दि फ़िल्म इंडस्ट्री। इट हैज़ दि सेम रिलेंटलेस सेलेब्रिटी पफ्स, सिनिकल मार्केटिंग प्लोयज़ एंड रूथलेस टैक्टिक्स...'। तभी तो पश्चिम के प्रकाशक एक लेखक की पुस्तकों की चार करोड़ प्रतियाँ तक बेच लेते हैं। इतना बिकने वाला एक लेखक है कैन फालेट, जिसे ब्रिटेन के आलोचक 'शैम्पेन सोशलिस्ट' कहते हैं..."
ये बातें शायद मैंने कोई लेख लिखने की तैयारी करते समय नोट की होंगी। लेकिन कब? याद नहीं। जिन लेखों का यहाँ ज़िक्र है, वे किनके थे, कब और कहाँ छपे थे, यह भी याद नहीं। लेकिन इन बातों को फिर से पढ़ा, तो लगा कि अब हिन्दी का पुस्तक प्रकाशन भी सेलेब्रिटीज की तरफ़ जा रहा है। उसकी शक्ल भी फ़िल्म उद्योग से मिलने लगी है। उसमें भी मार्केटिंग के सिनिकल तौर-तरीके अपनाए जाने लगे हैं और अपनाई जाने लगी हैं 'रूथलेस टैक्टिक्स'। और आज नहीं तो कल, हिन्दी के भी अपने कैन फालेट होंगे! हिन्दी के भी अपने 'शैम्पेन सोशलिस्ट' होंगे!
--रमेश उपाध्याय
Monday, October 19, 2009
Wednesday, October 7, 2009
साहित्य में संबोधन
संबोधन बदलेगा तो संवाद भी बदल जाएगा
साहित्य सबसे पहले एक संवाद है। लेखक का अपने पाठक, श्रोता या दर्शक से होने वाला संवाद। रचना को ध्यान से पढ़ें, तो उसमें दोनों परस्पर संवाद करते दिख जायेंगे और उन्हें सुनकर पता चल जाएगा कि लेखक क्या, क्यों और कैसे कह रहा है।
नन्द भारद्वाज का उपन्यास 'आगे खुलता रास्ता' पढ़ते हुए मुझे लगा कि जब यह उपन्यास राजस्थानी में लिखा गया था, तब यह राजस्थानी पाठक को संबोधित था और अब जब लेखक ने स्वयं इसका हिन्दी में "अनुवाद और पुनर्सृजन" किया है, इसका पाठक बदल गया है। यह आसान नहीं होता कि आप एक व्यक्ति से एक भाषा में कही गई बात दूसरे व्यक्ति से दूसरी भाषा में ज्यों की त्यों कह सकें। ऊपरी तौर पर लग सकता है--जैसा कि अनुवादकों को लगता है--कि एक भाषा में कही गई बात दूसरी भाषा में यथावत कह दी गई है, लेकिन मैं अंग्रेज़ी, गुजराती और पंजाबी से किए गए अनुवादों के अपने अनुभव से जानता हूँ कि हर अनुवाद एक "पुनर्सृजन" ही होता है, क्योंकि रचना मूलतः जिस पाठक को संबोधित होती है, उसके अनुवाद का पाठक उससे भिन्न होता है। अनूदित रचना में लेखक एक दुभाषिये के माध्यम से दूसरी भाषा के पाठक को संबोधित करता है। अब यह दुभाषिये पर निर्भर करता है कि वह लेखक की भाषा में कही हुई बात दूसरी भाषा के पाठक तक कैसे पहुंचाता है। वह उस बात को ज्यों की त्यों दूसरी भाषा में नहीं कह सकता, इसलिए अच्छे से अच्छा अनुवाद भी मूल का लगभग सही रूप ही होता है। अर्थात्, लगभग सदृश, ज्यों का त्यों नहीं। लेखक यदि स्वयं दूसरी भाषा में अनुवाद करता है, तो वह मूल लेखक होने के नाते अपनी रचना का "पुनर्सृजन" करने की--अर्थात् जहाँ ज़रूरत हो, वहाँ उसे फिर से या दूसरे रूप में लिखने की--छूट ले सकता है और अक्सर लेता ही है। नन्द भारद्वाज ने अपने राजस्थानी उपन्यास का हिन्दी अनुवाद करते समय यह छूट इस प्रकार ली है :
"जब इसके अनुवाद का काम हाथ में लिया, तो आरम्भ से ही यह अनुभव करने लगा कि इसके राजस्थानी पाठ में कुछ अंश ऐसे हैं, जिन्हें दुबारा से लिखने की ज़रूरत है। इसके आरम्भ और अंत से भी मैं संतुष्ट नहीं था। पाठ में कसावट की कमी बराबर खलती रही। इस पुनर्सृजन के दौरान मुझे यह भी लगा कि इसकी मूल भाषा और अनुवाद की भाषा की प्रकृति एक-सरीखी नहीं है। जो वाक्य अपनी मूल भाषा में बेहद व्यंजनापरक और असरदार लगता है, उसके यथावत शाब्दिक अनुवाद में वह सारी व्यंजना और चमक खो जाती है। ऐसी सूरत में उस प्रसंग के पूरे वाक्य-विन्यास और अभिव्यक्ति को हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप रखने की दृष्टि से मुझे इसका पुनर्सृजन करना बेहतर लगा।"
यह पढ़ते हुए मुझे लगा कि साहित्य को देखने-परखने का एक अच्छा तरीका यह देखना हो सकता है कि रचना में लेखक किस प्रकार के पाठक को संबोधित कर रहा है। इससे लेखक का भाषा-व्यवहार ही नहीं, समाज और जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण भी सामने आ जाता है।
नन्द भारद्वाज ने जो कठिनाई महसूस की, उसका कारण यही था कि उपन्यास को राजस्थानी से हिन्दी में लाने की प्रक्रिया में उनका पाठक बदल गया। हिन्दी के पाठक को वे उसी तरह संबोधित नहीं कर सकते थे, जिस तरह उन्होंने राजस्थानी के पाठक को संबोधित किया था। संबोधन बदला, तो लेखक-पाठक संवाद की, अर्थात् रचना की प्रकृति भी बदल गई।
--रमेश उपाध्याय
साहित्य सबसे पहले एक संवाद है। लेखक का अपने पाठक, श्रोता या दर्शक से होने वाला संवाद। रचना को ध्यान से पढ़ें, तो उसमें दोनों परस्पर संवाद करते दिख जायेंगे और उन्हें सुनकर पता चल जाएगा कि लेखक क्या, क्यों और कैसे कह रहा है।
नन्द भारद्वाज का उपन्यास 'आगे खुलता रास्ता' पढ़ते हुए मुझे लगा कि जब यह उपन्यास राजस्थानी में लिखा गया था, तब यह राजस्थानी पाठक को संबोधित था और अब जब लेखक ने स्वयं इसका हिन्दी में "अनुवाद और पुनर्सृजन" किया है, इसका पाठक बदल गया है। यह आसान नहीं होता कि आप एक व्यक्ति से एक भाषा में कही गई बात दूसरे व्यक्ति से दूसरी भाषा में ज्यों की त्यों कह सकें। ऊपरी तौर पर लग सकता है--जैसा कि अनुवादकों को लगता है--कि एक भाषा में कही गई बात दूसरी भाषा में यथावत कह दी गई है, लेकिन मैं अंग्रेज़ी, गुजराती और पंजाबी से किए गए अनुवादों के अपने अनुभव से जानता हूँ कि हर अनुवाद एक "पुनर्सृजन" ही होता है, क्योंकि रचना मूलतः जिस पाठक को संबोधित होती है, उसके अनुवाद का पाठक उससे भिन्न होता है। अनूदित रचना में लेखक एक दुभाषिये के माध्यम से दूसरी भाषा के पाठक को संबोधित करता है। अब यह दुभाषिये पर निर्भर करता है कि वह लेखक की भाषा में कही हुई बात दूसरी भाषा के पाठक तक कैसे पहुंचाता है। वह उस बात को ज्यों की त्यों दूसरी भाषा में नहीं कह सकता, इसलिए अच्छे से अच्छा अनुवाद भी मूल का लगभग सही रूप ही होता है। अर्थात्, लगभग सदृश, ज्यों का त्यों नहीं। लेखक यदि स्वयं दूसरी भाषा में अनुवाद करता है, तो वह मूल लेखक होने के नाते अपनी रचना का "पुनर्सृजन" करने की--अर्थात् जहाँ ज़रूरत हो, वहाँ उसे फिर से या दूसरे रूप में लिखने की--छूट ले सकता है और अक्सर लेता ही है। नन्द भारद्वाज ने अपने राजस्थानी उपन्यास का हिन्दी अनुवाद करते समय यह छूट इस प्रकार ली है :
"जब इसके अनुवाद का काम हाथ में लिया, तो आरम्भ से ही यह अनुभव करने लगा कि इसके राजस्थानी पाठ में कुछ अंश ऐसे हैं, जिन्हें दुबारा से लिखने की ज़रूरत है। इसके आरम्भ और अंत से भी मैं संतुष्ट नहीं था। पाठ में कसावट की कमी बराबर खलती रही। इस पुनर्सृजन के दौरान मुझे यह भी लगा कि इसकी मूल भाषा और अनुवाद की भाषा की प्रकृति एक-सरीखी नहीं है। जो वाक्य अपनी मूल भाषा में बेहद व्यंजनापरक और असरदार लगता है, उसके यथावत शाब्दिक अनुवाद में वह सारी व्यंजना और चमक खो जाती है। ऐसी सूरत में उस प्रसंग के पूरे वाक्य-विन्यास और अभिव्यक्ति को हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप रखने की दृष्टि से मुझे इसका पुनर्सृजन करना बेहतर लगा।"
यह पढ़ते हुए मुझे लगा कि साहित्य को देखने-परखने का एक अच्छा तरीका यह देखना हो सकता है कि रचना में लेखक किस प्रकार के पाठक को संबोधित कर रहा है। इससे लेखक का भाषा-व्यवहार ही नहीं, समाज और जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण भी सामने आ जाता है।
नन्द भारद्वाज ने जो कठिनाई महसूस की, उसका कारण यही था कि उपन्यास को राजस्थानी से हिन्दी में लाने की प्रक्रिया में उनका पाठक बदल गया। हिन्दी के पाठक को वे उसी तरह संबोधित नहीं कर सकते थे, जिस तरह उन्होंने राजस्थानी के पाठक को संबोधित किया था। संबोधन बदला, तो लेखक-पाठक संवाद की, अर्थात् रचना की प्रकृति भी बदल गई।
--रमेश उपाध्याय
Friday, September 18, 2009
पुरस्कारों की निरर्थकता
अब हकीकत सामने आने लगी है
पुरस्कारों की निरर्थकता अब सामने आने लगी है। वे किन आधारों पर दिए जाते रहे हैं, लोग जानते तो पहले भी थे, पर अब खुलकर बताने भी लगे हैं। और वे ही लोग, जो उनके निर्णायक रहे हैं!
इस बार का भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार 'कथन' में प्रकाशित मनोज कुमार झा की कविता 'स्थगन' को मिला है। लेकिन जिस दिन दिल्ली में यह पुरस्कार दिया गया, उसी दिन से पुरस्कार पर प्रश्नचिन्ह भी लगने शुरू हो गए। उसी दिन पुरस्कार पर केंद्रित पुस्तक 'उर्वर प्रदेश-३' का लोकार्पण किया गया, जिसमें इस पुरस्कार से पुरस्कृत कवियों की कविताएँ संकलित हैं। मैंने वह संकलन देखा नहीं है, लेकिन १५ सितम्बर, २००९ के 'जनसत्ता' दैनिक में पढ़ा कि संकलन की भूमिका विष्णु खरे ने लिखी है, जो स्वयं पुरस्कार के निर्णायकों में से एक रहे हैं। भूमिका का शीर्षक है 'एक पुरस्कार के तीन दशक : एक विवादास्पद जायजा'। 'जनसत्ता' के अनुसार भूमिका में लिखा है--"अन्य पुरस्कारों सहित भारत भूषण पुरस्कार पर भी हर वर्ष जाति, क्षेत्र, बोली, आस्था, विभिन्न किस्मों के अन्तरंग संबंधों, रसूख, विनिमय आदि के सच्चे-झूठे संदेह किए जाते रहे हैं।"
इस पुरस्कार के निर्णायकों में विष्णु खरे के अलावा नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी और अरुण कमल शामिल हैं। 'जनसत्ता' लिखता है--"विष्णु खरे ने अपनी भूमिका में जहाँ दूसरे निर्णायकों के निर्णय पर संदेह किया है, वहीं कई कवियों की कविताओं को लेकर भी संदेह खड़े किए हैं और कइयों के उम्मीद पर खरा नहीं उतरने की बात कही है। उन्होंने तमाम पुरस्कृत कवियों की कविता (जिस पर पुरस्कार दिया गया) का जमकर पोस्टमार्टम किया है। खरे की टिप्पणी पर कवियों के बीच भी उतनी ही तीखी प्रतिक्रिया हुई है। कुछ कवि काफी नाराज़ बताये जाते हैं।"
१९८६ में पुरस्कृत कवि विमल कुमार को पुरस्कार देने का निर्णय ख़ुद खरे ने किया था, लेकिन अब उन्होंने लिखा है--"मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि विमल कुमार ने जो उम्मीदें 'सपने में एक औरत से बातचीत' में जगाईं थीं, वे उन्हें, मेरे विचार से, अपनी बाद की अधिकांश कविताओं में निभा नहीं पा रहे है।"
उदय प्रकाश के बारे में विष्णु खरे का कहना है--"कहानी लेखन में असाधारण ख्याति और सफलता कमाने के बावजूद कवि के रूप में भी स्वीकृत होने की उनकी त्रासद महत्वाकांक्षा उनसे कविता में अतिलेखन करवा रही है।"
विष्णु खरे की इस आलोचना से पुरस्कृत कवि ही नहीं, पुरस्कार देने वाले भी आहत हैं। अब बेचारे पुरस्कृत कवि तो विमल कुमार की तरह पुरस्कार लौटाने और विष्णु खरे की "आलोचना की तानाशाही" की आलोचना ही कर सकते हैं, पर पुरस्कार देने वाले खरी-खरी कहने वाले खरे को निर्णायक मंडल से निकाल देने का दंड देने में समर्थ हैं! और मंडल के पुनर्गठन के नाम पर खरे को निकालने का फ़ैसला उन्होंने शायद कर भी लिया है!
जो भी हो, इससे हिन्दी आलोचना, मूल्यांकन, सम्मानों और पुरस्कारों के बारे में कुछ सच्चाई तो खुलकर सामने आई ही है!
--रमेश उपाध्याय
पुरस्कारों की निरर्थकता अब सामने आने लगी है। वे किन आधारों पर दिए जाते रहे हैं, लोग जानते तो पहले भी थे, पर अब खुलकर बताने भी लगे हैं। और वे ही लोग, जो उनके निर्णायक रहे हैं!
इस बार का भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार 'कथन' में प्रकाशित मनोज कुमार झा की कविता 'स्थगन' को मिला है। लेकिन जिस दिन दिल्ली में यह पुरस्कार दिया गया, उसी दिन से पुरस्कार पर प्रश्नचिन्ह भी लगने शुरू हो गए। उसी दिन पुरस्कार पर केंद्रित पुस्तक 'उर्वर प्रदेश-३' का लोकार्पण किया गया, जिसमें इस पुरस्कार से पुरस्कृत कवियों की कविताएँ संकलित हैं। मैंने वह संकलन देखा नहीं है, लेकिन १५ सितम्बर, २००९ के 'जनसत्ता' दैनिक में पढ़ा कि संकलन की भूमिका विष्णु खरे ने लिखी है, जो स्वयं पुरस्कार के निर्णायकों में से एक रहे हैं। भूमिका का शीर्षक है 'एक पुरस्कार के तीन दशक : एक विवादास्पद जायजा'। 'जनसत्ता' के अनुसार भूमिका में लिखा है--"अन्य पुरस्कारों सहित भारत भूषण पुरस्कार पर भी हर वर्ष जाति, क्षेत्र, बोली, आस्था, विभिन्न किस्मों के अन्तरंग संबंधों, रसूख, विनिमय आदि के सच्चे-झूठे संदेह किए जाते रहे हैं।"
इस पुरस्कार के निर्णायकों में विष्णु खरे के अलावा नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी और अरुण कमल शामिल हैं। 'जनसत्ता' लिखता है--"विष्णु खरे ने अपनी भूमिका में जहाँ दूसरे निर्णायकों के निर्णय पर संदेह किया है, वहीं कई कवियों की कविताओं को लेकर भी संदेह खड़े किए हैं और कइयों के उम्मीद पर खरा नहीं उतरने की बात कही है। उन्होंने तमाम पुरस्कृत कवियों की कविता (जिस पर पुरस्कार दिया गया) का जमकर पोस्टमार्टम किया है। खरे की टिप्पणी पर कवियों के बीच भी उतनी ही तीखी प्रतिक्रिया हुई है। कुछ कवि काफी नाराज़ बताये जाते हैं।"
१९८६ में पुरस्कृत कवि विमल कुमार को पुरस्कार देने का निर्णय ख़ुद खरे ने किया था, लेकिन अब उन्होंने लिखा है--"मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि विमल कुमार ने जो उम्मीदें 'सपने में एक औरत से बातचीत' में जगाईं थीं, वे उन्हें, मेरे विचार से, अपनी बाद की अधिकांश कविताओं में निभा नहीं पा रहे है।"
उदय प्रकाश के बारे में विष्णु खरे का कहना है--"कहानी लेखन में असाधारण ख्याति और सफलता कमाने के बावजूद कवि के रूप में भी स्वीकृत होने की उनकी त्रासद महत्वाकांक्षा उनसे कविता में अतिलेखन करवा रही है।"
विष्णु खरे की इस आलोचना से पुरस्कृत कवि ही नहीं, पुरस्कार देने वाले भी आहत हैं। अब बेचारे पुरस्कृत कवि तो विमल कुमार की तरह पुरस्कार लौटाने और विष्णु खरे की "आलोचना की तानाशाही" की आलोचना ही कर सकते हैं, पर पुरस्कार देने वाले खरी-खरी कहने वाले खरे को निर्णायक मंडल से निकाल देने का दंड देने में समर्थ हैं! और मंडल के पुनर्गठन के नाम पर खरे को निकालने का फ़ैसला उन्होंने शायद कर भी लिया है!
जो भी हो, इससे हिन्दी आलोचना, मूल्यांकन, सम्मानों और पुरस्कारों के बारे में कुछ सच्चाई तो खुलकर सामने आई ही है!
--रमेश उपाध्याय
Sunday, August 16, 2009
लेखकों की नैतिकता
दलगत राजनीति साहित्यिक आलोचना की कसौटी नहीं
७ अगस्त की अपनी टिप्पणी 'निरर्थक विवादों को छोड़ सार्थक बहसें चलायें' में मैंने लिखा था कि लेखकीय नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के नैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक और मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए।
अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि दलगत राजनीति को लेखकों के नैतिक आचरण की कसौटी नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल सर्वमान्य रूप से सही या ग़लत नहीं हो सकता। मसलन, कांग्रेस की नज़र में भाजपा ग़लत हो सकती है और भाजपा की नज़र में कांग्रेस, लेकिन इन दोनों दलों के सदस्य और समर्थक स्वयं को सही समझते रह सकते हैं। यदि वे एक दूसरे को अनैतिक कहते हैं, तो यह कोई वस्तुगत सत्य नहीं, उनका अपना निजी विचार ही हो सकता है। इसे नैतिकता की कसौटी नहीं माना जा सकता। इस प्रकार किसी लेखक को किसी दल का समर्थक होने या न होने के आधार पर नैतिक या अनैतिक नहीं ठहराया जा सकता।
लेकिन हिन्दी लेखकों में दलगत आधार पर स्वयं को नैतिक और दूसरों को अनैतिक सिद्ध करने की एक सर्वथा गैर-जनतांत्रिक प्रवृत्ति पाई जाती है। यह प्रवृत्ति हिन्दी लेखकों में एक तरह के जातिवाद का रूप ले चुकी है, जिसके चलते लेखक जिस दल के सदस्य या समर्थक होते हैं, उसी को सबसे सही और सबसे नैतिक समझते हुए स्वयं को ऊँची और दूसरों को नीची जाति का समझने लगते हैं। कुछ लेखकों का व्यवहार तो ऐसा हो जाता है कि जैसे वे किसी खास दल से जुड़कर ब्राह्मण हो गए हों और बाकी लेखक अछूत। फिर, जैसे ब्राह्मणों में भी अनेक उपजातियां होती हैं, और उनमें भी ऊँच-नीच के भेद होते हैं, वैसे ही एक राजनीतिक दल के बँट जाने से बने विभिन्न दलों के लेखक एक-दूसरे को नीची नज़र से देखने लगते हैं। यह प्रवृत्ति जातिवाद का विरोध करने वाले वामपंथी लेखकों में भी पाई जाती है। उनमें भी प्रगतिशील, जनवादी और क्रांतिकारी लगभग जातिसूचक शब्द बन गए हैं। वे अपनी-अपनी जाति के आधार पर स्वयं को नैतिक और दूसरों को अनैतिक मानते हुए दूसरों की आलोचना करते हैं और स्वयं को सही तथा दूसरों को ग़लत सिद्ध करने की कोशिश किया करते हैं। यह और बात है किक्रांतिकारियों" में भी कुछ उपजातियां हों और उनमें भी ऊँच-नीच का भेद पाया जाता हो।
ज़ाहिर है, ऐसी दलगत राजनीति साहित्यिक आलोचना का आधार नहीं हो सकती। इसके आधार पर लेखकों को नैतिक या अनैतिक नहीं ठहराया जा सकता। हमें लेखकीय आचरण की कोई और ही कसौटियां बनानी होंगी। इसका मतलब यह नहीं है कि लेखकों को राजनीति से अलग रहना चाहिए या दलगत राजनीति को गंदी चीज समझते हुए उससे ऊपर उठने के नाम पर अराजनीतिक हो जाना चाहिए। मेरा कहना केवल यह है कि लेखक की आलोचना उसके लेखन के आधार पर ही की जानी चाहिए। समर्थ आलोचक लेखन में ही लेखक की राजनीति और उसकी नैतिकता खोज सकता है।
--रमेश उपाध्याय
७ अगस्त की अपनी टिप्पणी 'निरर्थक विवादों को छोड़ सार्थक बहसें चलायें' में मैंने लिखा था कि लेखकीय नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के नैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक और मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए।
अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि दलगत राजनीति को लेखकों के नैतिक आचरण की कसौटी नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल सर्वमान्य रूप से सही या ग़लत नहीं हो सकता। मसलन, कांग्रेस की नज़र में भाजपा ग़लत हो सकती है और भाजपा की नज़र में कांग्रेस, लेकिन इन दोनों दलों के सदस्य और समर्थक स्वयं को सही समझते रह सकते हैं। यदि वे एक दूसरे को अनैतिक कहते हैं, तो यह कोई वस्तुगत सत्य नहीं, उनका अपना निजी विचार ही हो सकता है। इसे नैतिकता की कसौटी नहीं माना जा सकता। इस प्रकार किसी लेखक को किसी दल का समर्थक होने या न होने के आधार पर नैतिक या अनैतिक नहीं ठहराया जा सकता।
लेकिन हिन्दी लेखकों में दलगत आधार पर स्वयं को नैतिक और दूसरों को अनैतिक सिद्ध करने की एक सर्वथा गैर-जनतांत्रिक प्रवृत्ति पाई जाती है। यह प्रवृत्ति हिन्दी लेखकों में एक तरह के जातिवाद का रूप ले चुकी है, जिसके चलते लेखक जिस दल के सदस्य या समर्थक होते हैं, उसी को सबसे सही और सबसे नैतिक समझते हुए स्वयं को ऊँची और दूसरों को नीची जाति का समझने लगते हैं। कुछ लेखकों का व्यवहार तो ऐसा हो जाता है कि जैसे वे किसी खास दल से जुड़कर ब्राह्मण हो गए हों और बाकी लेखक अछूत। फिर, जैसे ब्राह्मणों में भी अनेक उपजातियां होती हैं, और उनमें भी ऊँच-नीच के भेद होते हैं, वैसे ही एक राजनीतिक दल के बँट जाने से बने विभिन्न दलों के लेखक एक-दूसरे को नीची नज़र से देखने लगते हैं। यह प्रवृत्ति जातिवाद का विरोध करने वाले वामपंथी लेखकों में भी पाई जाती है। उनमें भी प्रगतिशील, जनवादी और क्रांतिकारी लगभग जातिसूचक शब्द बन गए हैं। वे अपनी-अपनी जाति के आधार पर स्वयं को नैतिक और दूसरों को अनैतिक मानते हुए दूसरों की आलोचना करते हैं और स्वयं को सही तथा दूसरों को ग़लत सिद्ध करने की कोशिश किया करते हैं। यह और बात है किक्रांतिकारियों" में भी कुछ उपजातियां हों और उनमें भी ऊँच-नीच का भेद पाया जाता हो।
ज़ाहिर है, ऐसी दलगत राजनीति साहित्यिक आलोचना का आधार नहीं हो सकती। इसके आधार पर लेखकों को नैतिक या अनैतिक नहीं ठहराया जा सकता। हमें लेखकीय आचरण की कोई और ही कसौटियां बनानी होंगी। इसका मतलब यह नहीं है कि लेखकों को राजनीति से अलग रहना चाहिए या दलगत राजनीति को गंदी चीज समझते हुए उससे ऊपर उठने के नाम पर अराजनीतिक हो जाना चाहिए। मेरा कहना केवल यह है कि लेखक की आलोचना उसके लेखन के आधार पर ही की जानी चाहिए। समर्थ आलोचक लेखन में ही लेखक की राजनीति और उसकी नैतिकता खोज सकता है।
--रमेश उपाध्याय
Friday, August 7, 2009
हिन्दी में जारी निरर्थक विवाद
निरर्थक विवादों को छोड़ सार्थक बहसें चलायें
हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास न होने देना चाहने वाली शक्तियां आजकल यह देखकर परम प्रसन्न होंगी कि वे जो चाहती हैं, हिन्दी वाले स्वयं कर रहे हैं। कुछ दिन पहले वर्धा के महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की पत्रिकाओं के संपादकों की नियुक्ति का मामला विवादों में रहा। फिर दिल्ली की हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष की नियुक्ति और सञ्चालन समिति के कुछ सदस्यों के त्यागपत्र विवाद का विषय बने। गोरखपुर में एक कथाकार का एक योगी के हाथों सम्मानित होना अभी चर्चा में ही था कि रायपुर में एक सम्मान समारोह में कुछ लेखकों का भाग लेना और कुछ लेखकों द्वारा उसका बहिष्कार करना विवाद का विषय बन गया। ये विवाद पत्रिकाओं में कम, इन्टरनेट पर अधिक हो रहे हैं और उनमें व्यक्त विचारों तथा भाषा के प्रयोगों को देख कर लगता है कि हिन्दी में होने वाली चर्चाओं का स्तर कितना घटिया और शर्मनाक हो गया है। लगता है, हिन्दी के लेखक-पाठक देश, दुनिया, मानवता, समाज, साहित्य, सभ्यता और संस्कृति से सम्बंधित बृहत्तर प्रश्नों पर विचार करना छोड़ निरर्थक चर्चाओं में व्यस्त हो गए हैं, जिनका उद्देश्य येन केन प्रकारेण स्वयं को चर्चित बनाना होता है। और इसका तरीका होता है कोई ऐसा मुद्दा उछालना, जिस पर बिना किसी जिम्मेदारी या जवाबदेही के कोई भी कुछ भी कह सके। ऐसी चर्चाओं में भाग लेने के लिए न किसी विषय के गंभीर अध्ययन की आवश्यकता होती है, न चिंतन-मनन की। न भाषा पर ध्यान देने की ज़रूरत होती है, न बातचीत को विषय पर केंद्रित रखने के अनुशासन की। अतः कोई भी कितनी ही भद्दी भाषा में कुछ भी कह गुज़रता है।
इन विवादों में भाग लेने वाले लोग आजकल हिन्दी के लेखकों को अनैतिक सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि वे हिन्दी साहित्य में मौजूद गंदगी के विरुद्ध एक सफाई अभियान चला रहे हैं। वे दूसरों को अनैतिक बताते हुए स्वयं को परम नैतिकतावादी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन उनके विचारों से ही नहीं, उनकी भाषा तक से पता चल जाता है कि वे नैतिकता का 'न' भी नहीं जानते और स्वयं किसी प्रकार नैतिक अनुशासन को नहीं मानते। दूसरों पर कीचड़ उछालने को वे सफाई करना समझते हैं और यह भी नहीं देखते कि ऐसा करते समय वे स्वयं कितने और कैसे कीचड़ में सन रहे हैं। उन्हें यह भी होश नहीं रहता कि हिन्दी में जो कुछ होता है, उससे हिन्दी वाले ही नहीं, दूसरी भाषाओँ के लोग भी प्रभावित होते हैं। हिन्दी देश की इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण भाषा है कि अन्य भारतीय भाषाओँ के लेखक हिन्दी लेखकों से एक नेतृत्वकारी भूमिका तथा मार्गदर्शन की अपेक्षा करते हैं। सोचने की बात है कि हिन्दी में हो रही कुचर्चाओं से वे हिन्दी लेखकों तथा हिन्दी साहित्य के बारे में कैसी धारणाएं बनाते होंगे और कैसे निष्कर्ष निकालते होंगे।
इन्टरनेट का सदुपयोग किया जाए, तो वह अपनी भाषा और साहित्य के विकास तथा व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए बेहतरीन माध्यम हो सकता है। लेकिन बड़े खेद की बात है कि इसका दुरुपयोग अपनी भाषा और साहित्य से लोगों को विमुख करने के लिए किया जा रहा है। और यह काम हिन्दी वाले स्वयं कर रहे हैं!
नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के अनैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक तथा मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए। लेकिन हिन्दी लेखकों की अनैतिकता की जो आलोचना आजकल की जा रही है, उसमें कहीं भी यह स्पष्ट नहीं होता कि आलोचक स्वयं क्या है और क्या करना चाहता है।
लेखकों के आचरण को सम्पूर्ण साहित्यिक गतिविधि के सन्दर्भ में ही सही ढंग से समझा जा सकता है और उसके सन्दर्भ में पहला नैतिक प्रश्न आज यह उठाना चाहिए कि साहित्यिक गतिविधियों पर राज्य, राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों द्वारा जो रुपया पानी की तरह बहाया जाता है, वह कहाँ से आता है और कहाँ जाता है। एक जनतांत्रिक व्यवस्था में नैतिकता की कसौटी यह है कि जनता का पैसा जनहित में खर्च होना चाहिए। साहित्यिक गतिविधि के सन्दर्भ में इसका अर्थ यह है कि जनता का पैसा जनता की भाषा की उन्नति के लिए तथा जनता को अच्छा साहित्य सुलभ कराने के लिए खर्च होना चाहिए। यदि वह इस जनतांत्रिक उद्देश्य के लिए खर्च न होकर किन्हीं अन्य उद्देश्यों के लिए खर्च होता है, तो यह अनैतिक है। और इस कार्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जो भी शामिल है, वह अनैतिक है।
इस दृष्टि से देखें, तो साहित्यिक गतिविधि में अनैतिकता का स्रोत है वह पूंजीवादी व्यवस्था और उसमें शासकवर्ग की वह राजनीति, जो अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूपों में लेखकों को भ्रष्ट बनाने के साथ-साथ उनमें छोटे-बड़े का भेद, आपसी ईर्ष्या-द्वेष और गलाकाटू प्रतिद्वंद्विता पैदा करती है। वह साहित्य के विकास और प्रचार-प्रसार के नाम पर असंख्य सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं के जरिये भारी धनराशियाँ खर्च करती है, जिनसे विभिन्न प्रकार की साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और संस्थान बनाये-चलाये जाते हैं, उनके द्वारा हर साल काफ़ी बड़े बजट वाले कार्यक्रम किए जाते हैं, छोटे-बड़े असंख्य पुरस्कार बांटे जाते हैं, पुस्तकों और पत्रिकाओं की थोक सरकारी खरीद की जाती है, साहित्यिक पत्रिकाओं को विज्ञापन तथा आर्थिक सहायतायें दी जाती हैं और लेखकों को विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ, सहायताएं, सुविधाएं आदि उपलब्ध कराई जाती हैं। इस प्रक्रिया में जो विशाल धनराशियाँ खर्च की जाती हैं, वे नैतिकता की इस कसौटी पर कदापि जायज़ नहीं ठहराई जा सकतीं कि जनता का पैसा जनता की भाषा की उन्नति के लिए तथा जनता को अच्छा साहित्य सुलभ कराने के लिए खर्च होना चाहिए।
अतः जो लोग हिन्दी साहित्य में वाकई कोई सफाई अभियान चलाना चाहते हैं, उन्हें लेखकों की अनैतिकता के मूल स्रोत पर ध्यान देना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए कि उस स्रोत से साहित्य में गन्दगी का आना बंद हो। इस दिशा में पहला और सबसे ज़रूरी काम यह है कि यदि जनता का पैसा साहित्यिक गतिविधि में जनता के लिए खर्च न होकर किन्हीं और लोगों पर किन्हीं और उद्देश्यों के लिए खर्च हो रहा है, तो इससे सम्बंधित तमाम तथ्य और आंकडे जनता के सामने लाकर इसके विरुद्ध एक व्यापक जन-आन्दोलन चलाया जाए।
लेकिन यह गंभीरतापूर्वक मेहनत और ज़िम्मेदारी के साथ किया जाने वाला काम है और यह काम अकेले-अकेले नहीं, मिल-जुलकर ही किया जा सकता है। यह काम निरर्थक विवादों में अपना और दूसरों का समय नष्ट करके नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ सार्थक बहस चला कर ही किया जा सकता है।
--रमेश उपाध्याय
हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास न होने देना चाहने वाली शक्तियां आजकल यह देखकर परम प्रसन्न होंगी कि वे जो चाहती हैं, हिन्दी वाले स्वयं कर रहे हैं। कुछ दिन पहले वर्धा के महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की पत्रिकाओं के संपादकों की नियुक्ति का मामला विवादों में रहा। फिर दिल्ली की हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष की नियुक्ति और सञ्चालन समिति के कुछ सदस्यों के त्यागपत्र विवाद का विषय बने। गोरखपुर में एक कथाकार का एक योगी के हाथों सम्मानित होना अभी चर्चा में ही था कि रायपुर में एक सम्मान समारोह में कुछ लेखकों का भाग लेना और कुछ लेखकों द्वारा उसका बहिष्कार करना विवाद का विषय बन गया। ये विवाद पत्रिकाओं में कम, इन्टरनेट पर अधिक हो रहे हैं और उनमें व्यक्त विचारों तथा भाषा के प्रयोगों को देख कर लगता है कि हिन्दी में होने वाली चर्चाओं का स्तर कितना घटिया और शर्मनाक हो गया है। लगता है, हिन्दी के लेखक-पाठक देश, दुनिया, मानवता, समाज, साहित्य, सभ्यता और संस्कृति से सम्बंधित बृहत्तर प्रश्नों पर विचार करना छोड़ निरर्थक चर्चाओं में व्यस्त हो गए हैं, जिनका उद्देश्य येन केन प्रकारेण स्वयं को चर्चित बनाना होता है। और इसका तरीका होता है कोई ऐसा मुद्दा उछालना, जिस पर बिना किसी जिम्मेदारी या जवाबदेही के कोई भी कुछ भी कह सके। ऐसी चर्चाओं में भाग लेने के लिए न किसी विषय के गंभीर अध्ययन की आवश्यकता होती है, न चिंतन-मनन की। न भाषा पर ध्यान देने की ज़रूरत होती है, न बातचीत को विषय पर केंद्रित रखने के अनुशासन की। अतः कोई भी कितनी ही भद्दी भाषा में कुछ भी कह गुज़रता है।
इन विवादों में भाग लेने वाले लोग आजकल हिन्दी के लेखकों को अनैतिक सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि वे हिन्दी साहित्य में मौजूद गंदगी के विरुद्ध एक सफाई अभियान चला रहे हैं। वे दूसरों को अनैतिक बताते हुए स्वयं को परम नैतिकतावादी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन उनके विचारों से ही नहीं, उनकी भाषा तक से पता चल जाता है कि वे नैतिकता का 'न' भी नहीं जानते और स्वयं किसी प्रकार नैतिक अनुशासन को नहीं मानते। दूसरों पर कीचड़ उछालने को वे सफाई करना समझते हैं और यह भी नहीं देखते कि ऐसा करते समय वे स्वयं कितने और कैसे कीचड़ में सन रहे हैं। उन्हें यह भी होश नहीं रहता कि हिन्दी में जो कुछ होता है, उससे हिन्दी वाले ही नहीं, दूसरी भाषाओँ के लोग भी प्रभावित होते हैं। हिन्दी देश की इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण भाषा है कि अन्य भारतीय भाषाओँ के लेखक हिन्दी लेखकों से एक नेतृत्वकारी भूमिका तथा मार्गदर्शन की अपेक्षा करते हैं। सोचने की बात है कि हिन्दी में हो रही कुचर्चाओं से वे हिन्दी लेखकों तथा हिन्दी साहित्य के बारे में कैसी धारणाएं बनाते होंगे और कैसे निष्कर्ष निकालते होंगे।
इन्टरनेट का सदुपयोग किया जाए, तो वह अपनी भाषा और साहित्य के विकास तथा व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए बेहतरीन माध्यम हो सकता है। लेकिन बड़े खेद की बात है कि इसका दुरुपयोग अपनी भाषा और साहित्य से लोगों को विमुख करने के लिए किया जा रहा है। और यह काम हिन्दी वाले स्वयं कर रहे हैं!
नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के अनैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक तथा मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए। लेकिन हिन्दी लेखकों की अनैतिकता की जो आलोचना आजकल की जा रही है, उसमें कहीं भी यह स्पष्ट नहीं होता कि आलोचक स्वयं क्या है और क्या करना चाहता है।
लेखकों के आचरण को सम्पूर्ण साहित्यिक गतिविधि के सन्दर्भ में ही सही ढंग से समझा जा सकता है और उसके सन्दर्भ में पहला नैतिक प्रश्न आज यह उठाना चाहिए कि साहित्यिक गतिविधियों पर राज्य, राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों द्वारा जो रुपया पानी की तरह बहाया जाता है, वह कहाँ से आता है और कहाँ जाता है। एक जनतांत्रिक व्यवस्था में नैतिकता की कसौटी यह है कि जनता का पैसा जनहित में खर्च होना चाहिए। साहित्यिक गतिविधि के सन्दर्भ में इसका अर्थ यह है कि जनता का पैसा जनता की भाषा की उन्नति के लिए तथा जनता को अच्छा साहित्य सुलभ कराने के लिए खर्च होना चाहिए। यदि वह इस जनतांत्रिक उद्देश्य के लिए खर्च न होकर किन्हीं अन्य उद्देश्यों के लिए खर्च होता है, तो यह अनैतिक है। और इस कार्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जो भी शामिल है, वह अनैतिक है।
इस दृष्टि से देखें, तो साहित्यिक गतिविधि में अनैतिकता का स्रोत है वह पूंजीवादी व्यवस्था और उसमें शासकवर्ग की वह राजनीति, जो अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूपों में लेखकों को भ्रष्ट बनाने के साथ-साथ उनमें छोटे-बड़े का भेद, आपसी ईर्ष्या-द्वेष और गलाकाटू प्रतिद्वंद्विता पैदा करती है। वह साहित्य के विकास और प्रचार-प्रसार के नाम पर असंख्य सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं के जरिये भारी धनराशियाँ खर्च करती है, जिनसे विभिन्न प्रकार की साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और संस्थान बनाये-चलाये जाते हैं, उनके द्वारा हर साल काफ़ी बड़े बजट वाले कार्यक्रम किए जाते हैं, छोटे-बड़े असंख्य पुरस्कार बांटे जाते हैं, पुस्तकों और पत्रिकाओं की थोक सरकारी खरीद की जाती है, साहित्यिक पत्रिकाओं को विज्ञापन तथा आर्थिक सहायतायें दी जाती हैं और लेखकों को विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ, सहायताएं, सुविधाएं आदि उपलब्ध कराई जाती हैं। इस प्रक्रिया में जो विशाल धनराशियाँ खर्च की जाती हैं, वे नैतिकता की इस कसौटी पर कदापि जायज़ नहीं ठहराई जा सकतीं कि जनता का पैसा जनता की भाषा की उन्नति के लिए तथा जनता को अच्छा साहित्य सुलभ कराने के लिए खर्च होना चाहिए।
अतः जो लोग हिन्दी साहित्य में वाकई कोई सफाई अभियान चलाना चाहते हैं, उन्हें लेखकों की अनैतिकता के मूल स्रोत पर ध्यान देना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए कि उस स्रोत से साहित्य में गन्दगी का आना बंद हो। इस दिशा में पहला और सबसे ज़रूरी काम यह है कि यदि जनता का पैसा साहित्यिक गतिविधि में जनता के लिए खर्च न होकर किन्हीं और लोगों पर किन्हीं और उद्देश्यों के लिए खर्च हो रहा है, तो इससे सम्बंधित तमाम तथ्य और आंकडे जनता के सामने लाकर इसके विरुद्ध एक व्यापक जन-आन्दोलन चलाया जाए।
लेकिन यह गंभीरतापूर्वक मेहनत और ज़िम्मेदारी के साथ किया जाने वाला काम है और यह काम अकेले-अकेले नहीं, मिल-जुलकर ही किया जा सकता है। यह काम निरर्थक विवादों में अपना और दूसरों का समय नष्ट करके नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ सार्थक बहस चला कर ही किया जा सकता है।
--रमेश उपाध्याय
Thursday, July 9, 2009
एक ताज़ा कविता
बुढ़ऊ का पाजामा
बुढ़ऊ का तकियाकलाम था--
"बैठा मत रह कुछ किया कर
पाजामा उधेड़कर सिया कर।"
औरों को उपदेश नहीं देते थे बुढ़ऊ
ख़ुद इसका पालन करते थे
जब से सेवा मुक्त हुए वे
बैठ गए पाजामा लेकर
रोज़ उधेड़ा करते उसको
रोज़ सिया करते थे उसको
लेकिन आख़िर बोर हो गए
लगे सोचने--
"बहुत हो गई दुनियादारी
कर लो चलने की तैयारी
यह सीना-उधेड़ना आख़िर
क्यूं और कब तक?
रोज़ सुबह उठने से बेहतर
एक रात सो जाएँ सदा को शांतिपूर्वक।"
लेकिन देखा--मृत्यु सामने खड़ी हुई है
उन्हें देख मुस्करा रही है
लिए हाथ में वह पाजामा
जो उधेड़कर बुढ़ऊ ने कल
फ़ेंक दिया था, सिया नहीं था
कहा मृत्यु ने--
"यह लो, बुढ़ऊ!
अभी नहीं मरना है तुमको
कई साल का जीवन बाकी बचा तुम्हारा
कर लो जो करना है तुमको
अपना काम अधूरा क्यों छोड़ो?
पूरा कर जाओ
यह उधडा पाजामा अपना सीकर जाओ।"
--रमेश उपाध्याय
Tuesday, June 2, 2009
लोकसभा चुनावों में
जनता की राजनीतिक समझदारी
भारतीय जनतंत्र में--एक आदर्श जनतंत्र की दृष्टि से--चाहे जितने दोष हों, चुनावों में जनता के विवेक और राजनीतिक समझदारी का परिचय हर बार मिलता है। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भी उसकी यह समझदारी प्रकट हुई। मसलन
१- जनता ने राजनीति में युवाओं को समर्थन दिया है, लेकिन स्पष्ट कर दिया है कि वह राहुल गाँधी जैसे युवाओं को पसंद करती है, वरुण गाँधी जैसे युवाओं को नहीं।
२- उसे बूढे-पुराने राजनीतिज्ञों से भी परहेज़ नहीं, लेकिन वे मनमोहन सिंह जैसे हों, लालकृष्ण अडवानी जैसे नहीं।
३- भाजपा ने भावी प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को पेश किया, जबकि कांग्रेस ने राहुल गाँधी को। जनता ने नरेन्द्र मोदी को खारिज करके राहुल गाँधी को चुना।
४- सोनिया गाँधी, राहुल और प्रियंका का चुनाव प्रचार दूसरी पार्टियों के चुनाव प्रचार से भिन्न था। उसमें शालीनता और गंभीरता के साथ-साथ एक प्रकार के निस्स्वार्थ भाव का प्रदर्शन भी था, जैसे वे कह रहे हों कि हमें राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की कोई जल्दी नहीं है। जनता ने इन बातों को पसंद किया।
५- जनता ने वाम दलों की 'गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा' वाली राजनीति को खारिज कर दिया है, क्योंकि यह नकारात्मक राजनीति है। वाम दल बहुत समय से विकल्प के नाम पर यही कहते आ रहे हैं कि यह नहीं चाहिए-वह नहीं चाहिए। वे यह नहीं बताते कि क्या चाहिए। जनता ने उन्हें बता दिया है कि सकारात्मक राजनीति करो और साफ़-साफ़ बताओ कि हम यह चाहते हैं, हम यह कर सकते हैं, और हम यह करेंगे। इससे उन्हें अपनी ताकत का सही अंदाजा रहेगा और वे 'तीसरा मोर्चा' जैसा भानमती का कुनबा जोड़कर सत्ता में पहुँचने की खामखयाली से मुक्त रह सकेंगे।
--रमेश उपाध्याय
भारतीय जनतंत्र में--एक आदर्श जनतंत्र की दृष्टि से--चाहे जितने दोष हों, चुनावों में जनता के विवेक और राजनीतिक समझदारी का परिचय हर बार मिलता है। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भी उसकी यह समझदारी प्रकट हुई। मसलन
१- जनता ने राजनीति में युवाओं को समर्थन दिया है, लेकिन स्पष्ट कर दिया है कि वह राहुल गाँधी जैसे युवाओं को पसंद करती है, वरुण गाँधी जैसे युवाओं को नहीं।
२- उसे बूढे-पुराने राजनीतिज्ञों से भी परहेज़ नहीं, लेकिन वे मनमोहन सिंह जैसे हों, लालकृष्ण अडवानी जैसे नहीं।
३- भाजपा ने भावी प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को पेश किया, जबकि कांग्रेस ने राहुल गाँधी को। जनता ने नरेन्द्र मोदी को खारिज करके राहुल गाँधी को चुना।
४- सोनिया गाँधी, राहुल और प्रियंका का चुनाव प्रचार दूसरी पार्टियों के चुनाव प्रचार से भिन्न था। उसमें शालीनता और गंभीरता के साथ-साथ एक प्रकार के निस्स्वार्थ भाव का प्रदर्शन भी था, जैसे वे कह रहे हों कि हमें राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की कोई जल्दी नहीं है। जनता ने इन बातों को पसंद किया।
५- जनता ने वाम दलों की 'गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा' वाली राजनीति को खारिज कर दिया है, क्योंकि यह नकारात्मक राजनीति है। वाम दल बहुत समय से विकल्प के नाम पर यही कहते आ रहे हैं कि यह नहीं चाहिए-वह नहीं चाहिए। वे यह नहीं बताते कि क्या चाहिए। जनता ने उन्हें बता दिया है कि सकारात्मक राजनीति करो और साफ़-साफ़ बताओ कि हम यह चाहते हैं, हम यह कर सकते हैं, और हम यह करेंगे। इससे उन्हें अपनी ताकत का सही अंदाजा रहेगा और वे 'तीसरा मोर्चा' जैसा भानमती का कुनबा जोड़कर सत्ता में पहुँचने की खामखयाली से मुक्त रह सकेंगे।
--रमेश उपाध्याय
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