Saturday, February 4, 2017

स्वतंत्र लेखन की चाह का एक दुखांत

संस्मरण

रमेश उपाध्याय


प्रेम की गहराई का संबंध उसकी अवधि से नहीं होता। लंबे समय तक प्रेम करने वाले दो व्यक्ति भी कभी यह महसूस कर सकते हैं कि उनके बीच जो था, वह तो प्रेम था ही नहीं। दूसरी तरफ केवल कुछ दिन साथ रहकर भी दो व्यक्तियों में इतना प्रगाढ़ प्रेम हो सकता है कि आजीवन भुलाये न भूले। मित्रता में भी ऐसा ही होता है। इब्राहीम शरीफ का और मेरा साथ तीन-चार वर्षों का ही रहा, पर उस थोड़े-से ही समय में उससे मेरी ऐसी दोस्ती हुई, जो मुझे लगता है कि आज भी कायम है, जबकि उसको गुजरे चार दशक हो चुके हैं।  

उम्र में इब्राहीम शरीफ मुझसे पाँच साल बड़ा था। उसका जन्म 1937 में हुआ था और मेरा 1942 में। लेकिन लिखना हमने लगभग साथ-साथ शुरू किया था। हमने 1960 के दशक में कहानी लिखना शुरू किया था, लेकिन ‘साठोत्तरी’ कहलाने वाले कहानीकारों (ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया आदि) के बाद के युवा कहानीकारों में हमारी गिनती होती थी। हिंदी कहानी में ‘नयी कहानी’ के आंदोलन के बाद कई कहानी आंदोलन चले थे, जैसे साठोत्तरी कहानी (1960 के बाद की या सातवें दशक की हिंदी कहानी), अकहानी, सचेतन कहानी, सहज कहानी आदि। हमारी कहानियाँ इन सब आंदोलनों से संबंधित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं, लेकिन हम इनमें से किसी भी आंदोलन में शामिल नहीं थे और अपने लेखन से अपनी एक अलग पहचान बना रहे थे। अतः हमें हमारी उम्र के आधार पर युवा कहानीकार कहा जाता था। 

दिसंबर, 1970 में पटना (बिहार) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘सिर्फ’ की ओर से एक युवा लेखक सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें दूसरे बहुत-से युवा लेखकों के साथ-साथ मुझे भी आमंत्रित किया गया था। उस समय मैं एम.ए. और शादी करने के बाद दिल्ली में रहता था और प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर के अंगे्रजी साप्ताहिक ‘शंकर्स वीकली’ के हिंदी संस्करण ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ में काम करता था। ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ का प्रकाशन उसी साल शुरू हुआ था। शंकर जवाहरलाल नेहरू के मित्र थे, उनसे उनके पारिवारिक संबंध थे, इसलिए ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ का लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। संयोग से उसके दोनों संपादक कथाकार थे और दोनों के नाम रमेश थे। प्रधान संपादक थे रमेश बक्षी और सहायक संपादक रमेश उपाध्याय। बक्षी जी ‘नयी कहानी’ आंदोलन से संबंधित वरिष्ठ कथाकार थे, जबकि मैं तब तक किसी भी आंदोलन से असंबद्ध युवा कथाकार। 

पटना में हो रहे युवा लेखक सम्मेलन में मेरा जाना तय था। दिल्ली से जा रहे कुछ अन्य लेखकों के साथ मैंने रेल-आरक्षण भी करा लिया था, लेकिन उसी समय मुझे दिल्ली छोड़कर बंबई जाना पड़ा। बंबई से एक पत्रिका निकलती थी ‘नवनीत हिंदी डाइजेस्ट’, जो अंग्रेजी ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ की तर्ज पर निकाली जाती थी। कुछ दिन पहले ‘नवनीत’ के संपादक नारायण दत्त बंबई से दिल्ली आये थे। मैं कुछ समय स्वतंत्र लेखक के रूप में बंबई में रह चुका था और ‘नवनीत’ के लिए कुछ लेखन तथा अनुवाद कर चुका था, इसलिए वे मुझे जानते थे। वे मुझसे मिले। उन्हें ‘नवनीत’ के लिए एक ऐसे सहायक संपादक की जरूरत थी, जो संपादन के साथ-साथ लेखन और अनुवाद भी कर सके। वे जानते थे कि मैं ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ से पहले ‘सरिता’, ‘मुक्ता’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादकीय विभागों में काम कर चुका हूँ और ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘कल्पना’, ‘ज्ञानोदय’ आदि प्रसिद्ध पत्रिकाओं में लिखने वाला चर्चित युवा लेखक हूँ। उन्होंने ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ के मुकाबले ड्योढ़े वेतन पर ‘नवनीत’ के सहायक संपादक का पद सँभालने के लिए कहा, तो मैं राजी हो गया और पटना के युवा लेखक सम्मेलन में जाने के बजाय ‘नवनीत’ में काम शुरू करने के लिए बंबई चला गया। 

‘नवनीत’ का दफ्तर ताडदेव में एक पुरानी इमारत की ऊपरी मंजिल पर था। सहायक संपादक होने के नाते मुझे दफ्तर में एक अलग कमरा मिला हुआ था। एक दिन मैं अपने कमरे में अकेला बैठा कुछ काम कर रहा था कि बंबई का मेरा एक युवा कहानीकार मित्र जितेंद्र भाटिया एक लंबे, छरहरे, साँवले-से युवक के साथ मुझसे मिलने आया। वह युवक था इब्राहीम शरीफ। व्यक्तिगत रूप में हम पहली बार मिल रहे थे, किंतु कहानीकार के रूप में हम एक-दूसरे को पहले से जानते और पसंद करते थे। जितेंद्र हम दोनों का साझा मित्र और प्रिय कहानीकार था। शरीफ उस समय कालीकट (केरल) के सर सय्यद अहमद काॅलेज में हिंदी पढ़ाता था (एम.ए. हिंदी की पढ़ाई उसने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज काॅलेज से की थी) और जितेंद्र बंबई के आइ.आइ.टी. में पढ़ रहा था। 

वे दोनों पटना के युवा सम्मेलन से लौटे थे। शरीफ ने मुझसे पूछा, ‘‘आप वहाँ क्यों नहीं आये? मुझे उम्मीद थी कि आप तो वहाँ जरूर मिलेंगे। वहाँ के लोग भी कह रहे थे कि आपका आना निश्चित था। फिर क्या हुआ?’’
मैंने संक्षेप में ‘हिंदी शंकर्स वीकली’ और दिल्ली छोड़कर ‘नवनीत’ में बंबई आने का किस्सा सुनाकर पूछा, ‘‘पटना में क्या-क्या हुआ?’’ 

जितेंद्र और शरीफ वहाँ से बहुत क्षुब्ध होकर लौटे थे। उन्हें वहाँ पर साहित्यिक राजनीति और लेखकीय गुटबंदियों के कुछ कटु अनुभव हुए थे। दोनों ने विस्तार से अपने अनुभव सुनाये और मुझसे कहा, ‘‘अब हम लोगों को कुछ करना चाहिए।’’ 

‘‘क्या?’’ मैंने पूछा। 

‘‘हम नये लेखकों को साठोत्तरी लोगों से अलग अपनी पहचान बनानी चाहिए, क्योंकि जिस तरह ‘नयी कहानी’ वालों ने इन लोगों को ‘‘अपना ही विस्तार’’ कहा था, उसी तरह ये भी हम लोगों को ‘‘अपना ही विस्तार’’ कहकर हमारी नवीनता और भिन्नता को नकारना चाहते हैं। हमें यह मंजूर नहीं।’’ 

मैंने चाय मँगवायी, चाय की चुस्कियों के साथ कुछ हल्की-फुल्की बातें कीं और हँसकर पूछा, ‘‘तो हम लोग भी अपना एक अलग गुट बनायें?’’ 

शरीफ गुटबंदी की निंदा कर चुका था, इसलिए थोड़ा अचकचाकर बोला, ‘‘नहीं, गुट तो नहीं, पर...’’ 

मैं शायद यही सुनना चाहता था। मैंने कहा, ‘‘तब हमें गंभीरता से एक नया कहानी आंदोलन चलाने के बारे में सोचना चाहिए। इसके लिए पहले हमें एक सूची बनानी चाहिए कि नये लेखकों में से कौन-कौन हमारे साथ आ सकते हैं। फिर यह सोचना चाहिए कि आंदोलन के जरिये हम करना क्या चाहते हैं। उसी उद्देश्य के मुताबिक हमें आंदोलन का नाम रखना चाहिए और उसी नाम से एक पत्रिका निकालनी चाहिए, जो हमारे आंदोलन का मंच बन सके।’’ 

जितेंद्र यह सुनकर उछल पड़ा। बोला, ‘‘रमेश, तुम विश्वास नहीं करोगे, पर मैं भी ठीक ऐसा ही कुछ सोच रहा था।’’ 

‘‘और आप क्या सोचते हैं, शरीफ साहब?’’ मैंने शरीफ से पूछा। 

‘‘पहली बात तो यह कि आप मुझे शरीफ साहब नहीं, शरीफ ही कहिए। दूसरी बात यह कि मैं आप दोनों से सहमत हूँ।’’ शरीफ ने मुस्कराते हुए कहा। 

‘‘तो शाम को कहीं मिलते हैं और इस पर विस्तार से बात करते हैं।’’ मैंने कहा। 

‘‘शाम को हम दोनों कमलेश्वर जी से मिलने ‘सारिका’ के दफ्तर में जायेंगे। चाहो, तो तुम भी वहीं आ जाओ। उनसे मिलने के बाद जहाँ तुम कहोगे, चले चलेंगे।’’ जितेंद्र ने कहा और मैं राजी हो गया। 

कमलेश्वर उन दिनों कहानी पत्रिका ‘सारिका’ के संपादक थे और हम नये कहानीकारों की कहानियाँ बड़े प्रेम से छापते थे। मैं उन्हें तब से जानता था, जब वे दिल्ली में ‘नयी कहानियाँ’ पत्रिका के संपादक थे। वे उम्र में मुझसे बड़े थे, और बड़े साहित्यकार तो थे ही, फिर भी मुझसे मित्रवत व्यवहार करते थे। 

शाम को अपने दफ्तर से मैं उनके दफ्तर पहुँचा, तो मैंने पाया कि जितेंद्र और शरीफ एक नया कहानी आंदोलन शुरू करने का विचार उन्हें बता चुके हैं और कमलेश्वर उसी के बारे में कुछ कह रहे हैं। कमलेश्वर ने खड़े होकर मेरा स्वागत करते हुए कहा, ‘‘आओ, रमेश! हम तुम्हारी ही बात कर रहे थे। नया कहानी आंदोलन शुरू करने का तुम्हारा विचार बहुत अच्छा है। मैं जितेंद्र और शरीफ से कह रहा था कि मैं तुम लोगों के साथ हूँ। तुम लोग ‘सारिका’ को अपनी ही पत्रिका समझो और इसी को अपने आंदोलन का मंच बनाओ।’’ 

वे लोग चाय पी चुके थे, पर मेरे पहुँचने पर चाय का एक दौर और चला, जिसके दौरान आंदोलन के नाम पर विचार होने लगा। उन दिनों बंबई की फिल्मी दुनिया में ‘समांतर सिनेमा’ के नाम से एक नया आंदोलन शुरू हुआ था, जिसके अंतर्गत बंबइया सिनेमा की व्यावसायिक लीक से हटकर कुछ नये ढंग की फिल्में बनायी जा रही थीं। बातों ही बातों में कमलेश्वर ने कहा, ‘‘समांतर कहानी नाम कैसा रहेगा?’’ 

‘‘बहुत अच्छा रहेगा।’’ हम तीनों ने खुश होकर लगभग एक साथ कहा। 

‘‘तो मिलाओ हाथ।’’ कमलेश्वर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, जिस पर जितेंद्र, शरीफ और मैंने तले-ऊपर अपने हाथ रखे और कमलेश्वर ने दूसरे हाथ से हम तीनों के हाथों को दबाते हुए कहा, ‘‘समांतर कहानी जिंदाबाद!’’
शरीफ तो शायद अगले दिन अपने घर मद्रास चला गया, पर मैं और जितेंद्र समांतर कहानी आंदोलन की शुरुआत के लिए युवा कहानीकारों का एक सम्मेलन बंबई में कराने के काम में उत्साहपूर्वक जुट गये। कमलेश्वर से भी लगातार सलाह-मशविरा होने लगा। बंबई में उस समय जो अन्य युवा कहानीकार थे (जैसे सुदीप, अरविंद, निरुपमा सेवती, राम अरोड़ा आदि), उनसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क और संवाद किया गया। दूसरी जगहों के लोगों के साथ पत्राचार के जरिये बात की गयी। 

अंततः जून, 1971 में ‘समांतर’ का पहला सम्मेलन बंबई में हुआ, जिसमें भाग लेने वाले लेखक थे--कमलेश्वर, कामतानाथ, मधुकर सिंह, रमेश उपाध्याय, जितेंद्र भाटिया, से.रा. यात्री, सुदीप, सतीश जमाली, राम अरोड़ा, दामोदर सदन, अरविंद, निरुपमा सेवती, आशीष सिनहा, विभु कुमार, श्याम गोविंद, सनत कुमार, मृदुला गर्ग, श्रवण कुमार, प्रभात कुमार त्रिपाठी, शीला रोहेकर आदि। 

इब्राहीम शरीफ को भी उस सम्मेलन में आना था, लेकिन किसी कारणवश वह आ नहीं पाया था। उसने अपना लिखित परचा भेजा था, जो एक गोष्ठी में बाकायदा पढ़ा गया था और उस पर चर्चा की गयी थी।


सम्मेलन बहुत सफल रहा था। पूरे हिंदी जगत में उसकी धूम मची थी और ‘समांतर कहानी’ तुरंत चर्चा में आ गयी थी। अगले साल 1972 में कमलेश्वर द्वारा संपादित ‘समांतर-1’ नामक कहानी संकलन भी प्रकाशित हुआ था, जिसमें सम्मेलन की विस्तृत रपट थी और उसमें भाग लेने वाले लेखकों की कहानियाँ। 

समांतर सम्मेलन के बाद शरीफ के दो पत्र मुझे मेरे बंबई के पते पर मिले। उसका पहला पत्र यह था :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
19-6-71
                                                                                                                                        
प्रिय भाई,
बंबई में दुबारा आपसे मिल नहीं सका, इसका मलाल है। बहरहाल, मैं मद्रास पहुँच तो गया था, लेकिन बहुत चाहकर भी थोड़ी-सी व्यस्तता की वजह से आपको तत्क्षण लिख नहीं सका, क्षमा करेंगे।
बंबई वाली गोष्ठी में आप रहे होंगे। क्या कुछ हुआ वहाँ, लिखने की कृपा करेंगे।
मैंने जिस योजना की बात आपसे कही थी, उस संबंध में निवेदन है कि यथाशीघ्र सुदीप का अंतरंग परिचय भेजें। साथ ही आपके पास अपनी कहानी ‘पुराने जूतों की जोड़ी’ की कटिंग हो तो भेजें, अपने चित्र के साथ। एक बात और, अपनी इस कहानी को लेकर 500 शब्दों का एक वक्तव्य भी भेजें। यह सब जितना जल्द मिल जाये उतना सुविधाजनक रहेगा मेरे लिए।
और? संभव हुआ तो मैं अगले महीने आपके लिए कोई कहानी भेजूँगा।
सानंद होंगे।
पत्र दीजिएगा।
आपका
इब्राहीम शरीफ


शरीफ के पहले पत्र में जिस योजना का जिक्र है, वह यह थी कि मद्रास से निकलने वाली पत्रिका ‘अंकन’ में शरीफ एक स्थायी स्तंभ शुरू करेगा, जिसमें वह हर बार किसी युवा कहानीकार की एक कहानी, कहानी से संबंधित एक लेखकीय वक्तव्य और किसी अन्य कहानीकार द्वारा लिखा गया उसका अंतरंग परिचय दिया करेगा। बंबई में हुई पहली मुलाकात में ही उसने अपनी यह योजना मुझे बतायी थी। स्तंभ की शुरुआत वह सुदीप से करना चाहता था। सुदीप मेरा मित्र था, इसलिए उसका अंतरंग परिचय शरीफ मुझसे लिखवाना चाहता था। उस स्तंभ के लिए मेरी कहानी ‘पुराने जूतों की जोड़ी’ उसने पहले से ही चुन रखी थी। मेरा अंतरंग परिचय वह सुदीप से लिखवाना चाहता था। शायद उसकी योजना यह थी कि दो कहानीकार मित्र एक-दूसरे का अंतरंग परिचय लिखें।

‘‘अगले महीने आपके लिए कोई कहानी भेजूँगा’’ का संदर्भ यह है कि मैंने ‘नवनीत’ में प्रकाशित करने के लिए उससे कहानी माँगी थी। 

बंबई में मुझसे हुई पहली मुलाकात होने तक वह कालीकट के काॅलेज की नौकरी छोड़कर मद्रास आ चुका था और मद्रास में अपना प्रेस लगाकर आजीविका की समस्या के स्थायी समाधान के बारे में सोच रहा था। प्रेस लगाने के बाद एक पत्रिका निकालने और पुस्तकों का प्रकाशन करने की भी उसकी योजना थी, जिसकी चर्चा उसने मुझसे और जितेंद्र से की थी। हम दोनों ने खुश होकर उसका उत्साह बढ़ाया था। अतः उसके पहले पत्र का उत्तर लिखते समय मैंने ‘नवनीत’ के लिए उसकी कहानी फिर से माँगी थी और प्रेस के बारे में पूछा था। मेरे उस पत्र के उत्तर में उसने लिखा था :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
5-7-71


प्रिय भाई, 
आपका पत्र मिल गया था। उत्तर देने में देरी हुई। क्षमा करेंगे।
गोष्ठी के बारे में बहुत विस्तार से जितेंद्र ने लिखा है। जानकर बहुत खुशी हुई कि गोष्ठी हर दृष्टि से सफल रही।
अब तक कहानी, वक्तव्य और चित्र नहीं मिला है। कृपया जल्द भिजवा दीजिए।
अंतरंग परिचय के बारे में आपने जो लिखा है, वही बातें कमलेश्वर जी ने भी लिखी हैं। उनकी बातें ठीक ही लगती हैं। इसलिए आप सुदीप का परिचय तो लिखिए ही, लेकिन अब बदले हुए दृष्टिकोण से। यह भी अपनी कहानी वगैरह के साथ ही भेजने की कृपा करें। यह योजना यथाशीघ्र आरंभ हो जानी चाहिए।
मैं कहानी जब भी लिख लूँगा, आपके पास अवश्य भेजूँगा। तब तक क्षमा करेंगे।
प्रेस वाली बात अभी कुछ नहीं हुई है। देखिए।
और? पत्र दीजिएगा।
सानंद होंगे।
आपका
इब्राहीम शरीफ


मैं जुलाई, 1971 में ‘नवनीत’ की सहायक संपादकी और बंबई छोड़कर दिल्ली वापस आ गया। इस बीच मैं एक बेटी का पिता बन चुका था और अब मेरा परिवार से दूर बंबई में रहना संभव नहीं था। दिल्ली आने के कुछ दिन बाद मैंने शरीफ को पत्र लिखा, जिसमें अपने बारे में बताते हुए लिखा कि जब तक कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलती, मैं भी उसकी तरह फ्रीलांसिंग (स्वतंत्र लेखन) करूँगा। ‘अंकन’ वाली उसकी योजना के लिए उसने मेरी ‘पुराने जूतों की जोड़ी’ कहानी माँगी थी, पर इस बीच मैं कई और कहानियाँ लिख चुका था, जो मेरी नजर में उससे बेहतर थीं। इसलिए मैंने उसे लिखा कि मैं उसकी योजना के लिए अपनी दो कहानियाँ भेजँूगा। उनमें से वह जिसे चाहे चुन ले। 

मेरे पत्र के उत्तर में उसने लिखा :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
18-8-71

प्रिय भाई,
बहुत लंबी प्रतीक्षा के बाद कल शाम को आपका पत्र मिला। जितेंद्र ने लिखा तो था कि आप बंबई छोड़कर दिल्ली वापस चले गये हैं। मगर चूँकि आपका दिल्ली वाला पता मेरे पास नहीं था, इसलिए मैं खुद भी आपको लिख नहीं सका। अब आप मेरी ही तरह फ्रीलांसिंग करेंगे, यह जानकर बल मिला।
आपके विगत जीवन के बारे में जानकर, सच मानिए, आपसे और ज्यादा निकटता अनुभव करने लग गया हूँ। बल्कि आपके प्रति इज्जत अनुभव करने लगा हूँ। मेरा जीवन भी कुछ इसी तरह का रहा है।
आपकी एक कहानी अपने पास रख लूँगा, दूसरी लौटा दूँगा। जो कहानी मैं अपने पास रख लूँगा, उसके बारे में आपका वक्तव्य (500 शब्दों का) भी चाहिए होगा। साथ में आपका चित्र भी।
मैं आपका Social Background सुदीप को भेज रहा हूँ। वैसे, उन्होंने लिखा था कि सारा मैटर वे जल्दी ही भेजने वाले हैं। एक reminder और दूँगा।
‘सारिका’ में आपकी अंतर्कथा पढ़ी थी। बहुत पसंद आयी।
और क्या लिख रहे हैं?
दिल्ली का जीवन कैसा है? क्या भाभीजी कहीं काम कर रही हैं?
सारी बातें लिखिएगा।
मेरी ओर से भाभीजी को नमस्कार। बच्ची को ढेरों प्यार।
पत्र देते रहिएगा।
आपका
इब्राहीम शरीफ


शरीफ के इस पत्र के उत्तर में मैंने लिखा कि मेरी पत्नी दिल्ली के एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में इतिहास पढ़ाती हैं। वे अपनी नौकरी तथा दिल्ली छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहतीं, इसलिए मुझे अब सदा के लिए दिल्लीवासी होकर रहना पड़ेगा, जबकि मुझे दिल्ली में कोई ढंग की नौकरी मिल नहीं रही है और स्वतंत्र लेखन मुझे रास नहीं आ रहा है। मैं दिल्ली छोड़कर कहीं और जाना चाहता हूँ, जहाँ मुझे कोई मनपंसद काम मिल सके। मैंने अपनी कहानियाँ और संबंधित सामग्री उसे भेज दी। कुछ समय पहले ‘अंकन’ में मेरी एक कहानी छपी थी, जिसकी प्रति मेरे पास नहीं थी। मैंने उसे लिखा कि वह मेरी उस कहानी की कतरन मुझे भेज दे। शरीफ ने मेरे इस पत्र का उत्तर काफी दिनों बाद दिया।


54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
2-10-71


प्रिय भाई,
आपका पत्र मिल गया था। मैं बहुत लज्जित हूँ कि आपको लिखने में देरी कर दी। यहाँ आने के बाद से जिंदगी इतनी अस्त-व्यस्त हो गयी है कि क्या बताऊँ। फ्रीलांसिंग ने तो हालत खराब कर रखी है। जवाब देने में जो विलंब हो गया, उसे आप किसी भी अर्थ में उपेक्षा के रूप में मत लीजिएगा।
अब आपको दिल्ली का जीवन भी अच्छा नहीं लग रहा है। फिर भी दिल्ली मत छोडिए। कब तक इसी तरह घूमते रहेंगे?
‘धर्मयुग’ में आपका लेख देखा। पसंद आया।
आजकल क्या लिख रहे हैं? अपने बारे में विस्तार से लिखिए।
‘अंकन’ वालों से मैं बहुत दिनों से नहीं मिला हूँ। मिलकर आपकी कहानी की कटिंग जरूर भेजूँगा।
हमारी योजना तो सफल होगी ही। स्थायी स्तंभ में एक-एक कहानीकार को छापना संभव न हुआ, तो एक साथ सारे कथाकारों को ‘अंकन’ के एक विशेषांक में छाप देंगे। मैं कोशिश में हूँ। अगले पत्र में इस बारे में तफसील से लिखूँगा। आपकी एक कहानी लौटा रहा हूँ। दूसरी मैंने अपने पास रख ली है। उसे तेलुगु में भी करवाने का इरादा है।
भाभीजी को मेरी तरफ से नमस्कार कहें। बच्ची को प्यार।
इस महीने के आखिर में मेरे यहाँ भी एक नये सदस्य का आगमन होगा। आपको तो लिखूँगा ही।
पत्र दीजिएगा। व्यग्र प्रतीक्षा रहेगी।
 आपका
इब्राहीम शरीफ


अब याद नहीं कि शरीफ की वह कौन-सी कहानी थी, जो मुझे पसंद नहीं आयी थी और मैंने उसकी आलोचना की थी। किस पत्रिका में वह आलोचना छपी थी, यह भी मुझे याद नहीं। मैंने उसे लिख दिया था कि मैं उस कहानी पर लिख रहा हूँ। उत्तर में उसने लिखा :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
12-10-71

प्रिय भाई,
पत्र मिला। खुशी हुई।
शायद आपको पता होगा कि आज जितेंद्र भाटिया का जयपुर में सुधा अरोड़ा के साथ विवाह हो रहा है।
मेरी कहानी पर आपने जो भी लिखा हो, मुझे प्रसन्नता ही होगी। असल में, मैं खुद छपने के बाद उस कहानी से बेहद नाखुश हो गया था। मैंने जितेंद्र को इस बाबत लिखा भी था। अब आगे से ऐसी रचना नहीं लिखूँगा। किसी तरह के दबाव में आकर भी।
श्री चंद्रभूषण तिवारी ‘वाम’ निकाल रहे हैं। कल ही उनका पत्र आया है। आपको भी लिखा है।
‘कहानी’ में आपकी कहानी पढ़ी। क्या ‘कहानी’ के दीपावली अंक में आपकी कहानी आने वाली है? मेरी  एक कहानी है। पढ़कर लिखिएगा।
आपके उपन्यास की कैसी प्रगति है?
फ्रीलांसिंग वाली आपकी बात से मैं सहमत हूँ। जैसा कि आपने लिखा है, क्लर्क भी, अपनी जगह, हमारी तुलना में जमा हुआ इसलिए माना जाता है कि उसे हर महीने डेढ़ सौ रुपये ही सही, बँधे हुए मिलते हैं। हम लोगों के साथ ऐसी सुविधा नहीं है। और इस तरह की सुविधा न होने में, दो तकलीफें हैं--(1) रोजमर्रे की सामान्य जरूरतों का पूरा न हो पाना (2) इन जरूरतों की पूर्ति के लिए आवश्यक रूपया कमाने के लिए अक्सर न चाहते हुए भी बहुत कुछ लिखने पर विवश हो जाना।
आप जानते हैं, आर्थिक दबाव बहुत तकलीफदेह होता है और वह समझौते करने पर मजबूर करता है। और समझौते लेखक के लिए घातक तो होते ही हैं। जैसे, आपने कोई साफ कहानी लिखी, पत्रिका वाले अपनी नीति और बिक्री के हिसाब से उसे छापने के लिए तैयार नहीं हैं। अब आप क्या कीजिएगा? फ्रीलांसिंग कैसे बनाये रखेंगे? नतीजा यह होता है कि या तो आप नौकरी की खोज में लग जाते हैं या कूड़ा लिखने पर विवश हो जाते हैं। ये दोनों बातें ठीक नहीं हैं, कम से कम फ्रीलांसिंग की सही ताप को हल्की कर देती हैं। और इसी कारण ले-देकर लेखक समाज के साधारण अर्थ में second rate नागरिक बन जाता है। बात ले-देकर यहीं आ जाती है कि सारी चीजें बदलें, खासकर राजनीतिक व्यवस्था।
आपके विचार जानना चाहूँगा।
भाभीजी को नमस्कार। बच्ची को प्यार।
  आपका
  इब्राहीम शरीफ


फ्रीलांसिंग के बारे में मैंने शरीफ को एक लंबा पत्र लिखा, जिसमें मैंने उसे बताया कि सिर्फ कहानी-उपन्यास लिखकर हिंदी का लेखक जिंदा नहीं रह सकता, क्योंकि रचनात्मक लेखन आप नियमित रूप से और इतना अधिक नहीं कर सकते कि उससे मासिक वेतन की तरह एक बँधी हुई रकम आपको लगातार मिलती रह सके। महीनों की मेहनत से आप एक कहानी और वर्षों की मेहनत से आप एक उपन्यास लिखते हैं, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं कि आपकी रचना छप ही जायेगी और उसका उचित पारिश्रमिक भी आपकेा मिल ही जायेगा। इसलिए मैं अपने रचनात्मक लेखन को फ्रीलांसिंग से अलग रखता हूँ। फ्रीलांसिंग के तौर पर मैं साहित्येतर विषयों पर लेख लिखता हूँ, रेडियो और टेलीविजन के लिए नाटक लिखता हूँ, अंग्रेजी और गुजराती से अनुवाद करता हूँ। कहानी किसी बड़ी पत्रिका में छप जाये और उसका उचित पारिश्रमिक मिल जाये, तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं। यही कारण है कि मेरी दो कहानियाँ बड़ी पत्रिकाओं में छपती हैं, तो चार छोटी पत्रिकाओं में, जो पारिश्रमिक नहीं देतीं। 

मैंने उसे सलाह दी थी कि हो सके तो वह भी ऐसी ही फ्रीलांसिंग करे और अपने रचनात्मक लेखन को उससे अलग रखे। लेकिन मेरे पत्र का कोई उत्तर नहीं आया। बाद के पत्र से पता चला कि पत्र तो उसने लिखा था, पर किसी कारण से वह मुझ तक पहुँचा नहीं। 

मेरी पहली संतान (बड़ी बेटी प्रज्ञा) 1971 के अप्रैल महीने में पैदा हुई थी और उसी साल शरीफ अपनी पहली संतान (बडे़ बेटे राहुल) का पिता बना था। इसकी सूचना देते हुए उसने लिखा था :


54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
17-11-71

प्रिय भाई,
आपको मेरा पिछला पत्र मिल गया होगा। उत्तर की प्रतीक्षा थी, पता नहीं क्यों अब तक आपने उसका जवाब नहीं दिया। आशा करता हूँ, आप सपरिवार सकुशल होंगे।
आज ही मैंने आपकी टिप्पणी पढ़ी। सच मानिए, आपके सही और स्पष्ट विचारों को पढ़कर मैं बहुत खुश हुआ हूँ। असल में, मैं काफी कड़े शब्दों की प्रतीक्षा में था, लेकिन लगता है कि आपने फिर भी काफी उदारता दिखायी है। जैसा कि मैं आपको लिख चुका हूँ, मैं आपके विचारों से अक्षरशः सहमत हूँ, क्योंकि मैं खुद उस कहानी से संतुष्ट नहीं हूँ। संबंधों की ऐसी चलती हुई कहानी आगे मैं लिखने की गुस्ताखी नहीं करूँगा।
26-10-71 की सुबह हमारे घर नये मेहमान का आगमन हो गया है। पत्नी और बच्चा सकुशल हैं। बच्चे का नाम रखा है राहुल शरीफ।
आपके और क्या समाचार हैं? क्या उपन्यास वाला काम आगे बढ़ रहा है? कितना लिख लिया है? कब तक पूरा हो जायेगा? और इधर क्या लिखा है?
दिल्ली का जीवन कैसा है? पता चला है कि विश्वेश्वर, अशोक अग्रवाल वगैरह आजकल दिल्ली ही रह रहे हैं। क्या कभी उन लोगों से मुलाकात हुई है?
भाभीजी को नमस्कार कहिए। बच्ची को प्यार।
आपके पत्र की प्रतीक्षा रहेगी।    
 आपका
 इब्राहीम शरीफ


1972 के आरंभ में शरीफ दिल्ली आया और चार महीने रहा। स्वतंत्र लेखन में होने वाले आर्थिक कष्ट से तंग आकर उसने दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार करने वाले मोटूरि सत्यनारायण (जिनके नाम से अब केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा एक पुरस्कार दिया जाता है) की संस्था हिंदी विकास समिति में नौकरी कर ली, जिसका एक कार्यालय मद्रास में था और दूसरा दिल्ली में। इस संस्था के द्वारा हिंदी का पहला विश्वकोश ‘हिंदी विश्वज्ञान संहिता’ के नाम से प्रकाशित किया जाने वाला था। वहाँ विश्वकोश के संपादन का काम दो व्यक्ति पहले से करते थे--एक दक्षिण भारतीय रवींद्रन और दूसरा उत्तर भारतीय गौरीशंकर। दफ्तरी काम करने वाले क्लर्क, टाइपिस्ट, चपरासी वगैरह तो थे ही। 

शरीफ दिल्ली आते ही मेरे घर आकर मुझसे मिला और बोला, ‘‘मैं चाहता हूँ कि आप हिंदी विकास समिति द्वारा निकाले जा रहे हिंदी विश्वकोश के संपादक मंडल में शामिल होकर मेरे साथ काम करें।’’ वह मद्रास में ही मोटूरि सत्यनारायण से मेरे बारे में बात कर आया था और उनसे मेरी नियुक्ति की अनुमति लेकर आया था। मुझे नौकरी की जरूरत तो थी ही, विश्वकोश के संपादन जैसे महत्त्वपूर्ण काम के अनुभव का आकर्षण भी था, इसलिए मैंने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 

दिल्ली में हिंदी विकास समिति का कार्यालय तिलक मार्ग पर उच्च न्यायालय के सामने की एक कोठी में था। उसमें एक छोटा कमरा था और एक बड़ा हाॅल। कमरा प्रधान संपादक का था। मोटूरि सत्यनारायण विश्वकोश के प्रधान संपादक थे। वे जब दिल्ली में होते, उसी कमरे में बैठते और बाकी सब लोग हाॅल में। उनकी अनुपस्थिति में शरीफ उस कमरे में बैठता था। इस प्रकार वह हम सबका बाॅस था, लेकिन उसमें अफसरी अकड़ नहीं थी। उसका व्यवहार सभी के साथ दोस्ताना था। लंच के समय वह और मैं उच्च न्यायालय परिसर के एक ढाबे पर खाना खाने जाते और सर्दियों की धूप में कुछ देर सड़क पर टहलते हुए गपशप करते। शरीफ बहुत हँसमुख था और बहुत अच्छा किस्सागो। दिल्ली में उसके दो पुराने मित्र थे--उत्तर भारतीय सुधीर चौहान और दक्षिण भारतीय जे.एल. रेड्डी। वे दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी प्राध्यापक थे। शरीफ के कारण मेरी भी उनसे मित्रता हो गयी। बाद में जब मैं भी दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हो गया, तो उन दोनों से मेरी मित्रता और प्रगाढ़ हुई, जो आज तक कायम है, जबकि हम तीनों प्राध्यापकी से मुक्त हो चुके हैं। 

शरीफ मेरे घर अक्सर आया करता था। मेरे परिवार में सब लोगों से वह खूब घुलमिल गया था। हँसी-मजाक में एक दिन हम लोगों ने फिल्मी तर्ज पर तय किया कि जब हमारे बच्चे बड़े हो जायेंगे, हम उनकी शादी करके अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल देंगे। तभी से शरीफ मेरी बेटी प्रज्ञा को बहूरानी कहने लगा और मैं उसके बेटे राहुल को दामाद जी। यह संबंध बाद में हमारे पत्राचार में भी व्यक्त होता रहा। 

चार महीने बाद शरीफ वापस मद्रास चला गया, लेकिन वहाँ जाकर भी वह हिंदी विकास समिति का काम करता रहा। उसका वेतन दिल्ली से उसे भेजा जाता था। मद्रास जाते समय वह अपनी कुर्सी और जिम्मेदारी मुझे सौंप गया। अर्थात्, जब मोटूरि सत्यनारायण और इब्राहीम शरीफ दिल्ली में नहीं होंगे, विश्वकोश के प्रधान संपादक के कमरे में बैठकर दफ्तर का सारा कामकाज मुझे देखना होगा। लेकिन यह बात वहाँ मुझसे पहले से काम करने वाले रवींद्रन और गौरीशंकर को अच्छी नहीं लगी। वहाँ उनकी नियुक्ति मुझसे पहले हुई थी, इसलिए वे वरीयता क्रम में स्वयं को मुझसे ऊपर समझते थे। मेरे आदेशों का पालन करने में उन्हें अपनी हेठी लगती थी, इसलिए वे मेरे द्वारा बताये गये कामों को टाल देते थे या उनमें जान-बूझकर ढिलाई बरतते थे। इससे काम की गति तो धीमी होती ही थी, दफ्तर में एक तरह का तनाव भी पैदा होता था। शरीफ मद्रास से पत्र लिखकर पूछता था कि दफ्तर का कामकाज कैसा चल रहा है। उसका कहना था कि मोटूरि सत्यनारायण हर हफ्ते काम की प्रगति की विस्तृत रपट चाहते हैं। काम उसकी, और मेरी भी, अपेक्षा के मुताबिक तेजी से नहीं हो रहा था। मगर मैं अपने साथ काम करने वालों की शिकायत नहीं करना चाहता था, इसलिए शरीफ के पत्रों के उत्तर देना या तो गोल कर जाता, या बहुत संक्षेप में उत्तर देता। उसके दोस्त सुधीर चैहान और जे.एल. रेड्डी दफ्तर की दशा जानते थे, पर मैंने उनसे भी कह रखा था कि इस बाबत शरीफ को लिखकर उसे परेशान न करें। 

उधर शरीफ इसी बात से चिंतित और परेशान रहता था। इस बीच वह मुझसे बहुत निकटता और आत्मीयता अनुभव करने लगा था, इसलिए उसके पत्रों में ‘‘प्रिय भाई’’ वाला औपचारिक संबोधन बदलकर ‘‘प्रिय रमेश’’ हो गया था। पत्र के नीचे भी अब वह ‘‘आपका इब्राहीम शरीफ’’ लिखने की जगह ‘‘तुम्हारा शरीफ’’ लिखता था। उन्हीं दिनों का उसका एक पत्र है :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
26-6-72

प्रिय रमेश,
मुझे ऐसी कोई घटना याद नहीं आ रही है जिसके अंतर्गत मैंने तुम्हारे प्रति इस हद तक गुस्ताखी की हो कि तुम मेरे खत का जवाब देना तक गवारा न कर सको। अगर मुझसे ऐसी कोई भूल हो गयी हो तो मुझे माफ कर दो, मेरे भाई!
तुम बखूबी सोच सकते हो कि चार महीने लगातार तुम्हारी आत्मीयता पाकर मैं इतनी दूर आ जाऊँ और तुम मेरे पत्र का जवाब तक न दो, तो मुझे किस हद तक तकलीफ हो सकती है। मैं यह तो बिलकुल नहीं मान सकता कि तुम्हें इतनी भी फुर्सत न मिलती हो कि चार अक्षर तुम मुझे लिख सको। इसलिए मैं यह सोचने पर विवश हूँ कि मुझसे कोई भूल हो गयी है, जिसकी वजह से तुम भरे बैठे हो। तो मेरे भाई, गाली-गलौज ही क्यों नहीं दे लेते, जिससे पता तो चले कि मैं कितना गिरा हुआ इंसान हूँ। सिर्फ दफ्तरी पत्र पाने ही के लिए तो मैंने तुमसे दोस्ती नहीं की थी न?
मैंने अपने 16-6-72 वाले विस्तृत पत्र में तुम्हें बहुत सारी बातें लिखी थीं। तुमने उन बातों में कोई जान नहीं देखी कि चुप्पी साध गये? आखिर तुम्हें हो क्या गया है, रमेश? क्या तुम वही रमेश हो, प्यारे, भोले और आत्मीय, जिसे मैंने चार महीने जाना और चाहा था?
अगर तुम इस पत्र का भी जवाब नहीं दोगे, तो याद रखो, मैं जिंदगी में किसी पर भी कोई विश्वास नहीं करूँगा। उस गधे चौहान से भी कहो कि उसने भी मेरे पत्र का उत्तर नहीं दिया है।
भाभीजी के क्या हाल हैं? उन्हें मेरी नमस्ते कहो और बहूरानी को ढेरों प्यार।
तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा में, 
तुम्हारा
शरीफ


हिंदी विकास समिति मोटूरि सत्यनारायण द्वारा स्थापित एक गैर-सरकारी संस्था थी, जो सरकारी सहायता से चलती थी। वे दक्षिण में हिंदी का प्रचार करने वाले एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में विख्यात थे और हिंदी में पहला विश्वकोश निकालने की उनकी योजना बहुत प्रभावशाली थी, अतः अपनी संस्था के लिए सरकारी अनुदान प्राप्त करना उनके लिए मुश्किल नहीं था। वे संस्था के सर्वेसर्वा थे और तानाशाह की तरह उसे चलाते थे। जब जिसे चाहा, रख लिया; जब जिसे चाहा, हटा दिया। लेकिन यह काम वे सीधे नहीं करते थे, शरीफ से कराते थे और शरीफ न चाहते हुए भी उनके आदेशों का पालन करने को विवश होता था। 

शरीफ उस नौकरी में खुश नहीं था, लेकिन उसे छोड़ना भी नहीं चाहता था। वह कालीकट के जिस काॅलेज में हिंदी प्राध्यापक रह चुका था, वहाँ के हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ. मलिक चाहते थे कि वह पुनः काॅलेज में पढ़ाने आ जाये। लेकिन शरीफ की न जाने क्या मजबूरी थी कि वह वहाँ नहीं जाना चाहता था। 

कमलेश्वर ने शरीफ को ही नहीं, मुझे भी यह आश्वासन दे रखा था कि वे हम दोनों को टाइम्स आॅफ इंडिया में, यानी उस प्रकाशन समूह की ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘दिनमान’ या ‘पराग’ नामक पत्रिकाओं में से किसी के संपादकीय विभाग में नौकरी दिला देंगे। लेकिन उनका कोई आश्वासन पूरा होने का नाम नहीं ले रहा था। 

शरीफ और मैं अपने लिए कोई ढंग का ठौर-ठिकाना ढूँढ़ रहे थे, लेकिन विडंबना यह थी कि अन्य लोग हमें इतना शक्तिशाली समझते थे कि हम जिसे चाहें, हिंदी विकास समिति में नौकरी पर रख या रखवा सकते हैं। मेरे और शरीफ के साझे मित्र कहानीकार सतीश जमाली को नौकरी की जरूरत थी और वह चाहता था कि हम उसे समिति में नौकरी दिला दें। मैंने शरीफ से सतीश के बारे में बात की, तो उसने किन्हीं डाॅ. सुब्रह्मण्यम् के बारे में बताया कि उन्हें नौकरी की ज्यादा जरूरत है और शरीफ उन्हें समिति के मद्रास कार्यालय में रखवाने का प्रयास कर रहा है, इसलिए फिलहाल सतीश के लिए कुछ नहीं कर सकता। 

इन सारे संदर्भों से युक्त शरीफ का एक पत्र इस प्रकार था :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
28-6-72

मेरे रमेश,
आखिर तुम्हारा एक खत मिला, संक्षिप्त-सा। पढ़कर तसल्ली तो हुई मगर मजा नहीं आया।
यार, चैहान और तुम्हारे नाम लिखे हुए मेरे पत्र जा कहाँ रहे हैं? और लोगों को मेरे पत्र मिल रहे हैं और तुम दोनों सालो मेरे पत्र न मिलने का बहाना कर चुप्पी साधे बैठे हो। मैंने तुम दोनों के नाम और दो पत्र लिखे हैं।
क्या कमलेश्वर जी दिल्ली आये थे? क्या बातें हुईं? वह टाइम्स वाली बात उन्होंने कुछ नहीं लिखी है। पता नहीं क्या हुआ?
डॉ. मलिक कालीकट बहुत जोर देकर बुला रहे हैं, लेकिन मैं अभी तक कुछ तय नहीं कर पाया हूँ। डॉ. सुब्रह्मण्यम, जिसके बारे में मैंने बताया था कि बेचारा यहाँ सभा की नौकरी से हटा दिया गया था, उसके लिए मैंने हिंदी विकास समिति में यहाँ के लिए इंतजाम कर लिया है। जुलाई की पहली से संभवतः वह लग जाये। अब यार, सतीश जमाली की चिंता है। उसके लिए कुछ करें, तभी बात बने। उसकी नौकरी छूटने वाली है और बेकारी में बेचारा कैसे घर चला पायेगा? तुम भी कुछ सोचो उस भाई के लिए।
यहाँ से निकलने वाली पत्रिका का क्या सोचा है तुम लोगों ने? कमलेश्वर जी के साथ हुई बातचीत का ब्योरेवार परिचय मुझे दो।
मेरे वेतन में से 100 रुपये इस महीने मत काटो। मुझे घर जाना है, भाई के बच्चों के लिए कपड़े खरीदने हैं। मुझे रुपयों की जरूरत होगी।
और?
मेरी बहूरानी के क्या हाल हैं? उसे उसके ‘वो’ बहुत याद करते रहते हैं। उसकी सास को तो वह बहुत पसंद आयी है। कहती है, बहुत sweet है।
भाभीजी को सादर नमस्कार। मेरी बीवी की ओर से तुम दोनों को प्रणाम।
उस चौहान गधे के क्या हाल हैं? लिखो।
                                                तुम्हारा                                                                                                                                                                                               
 शरीफ


जिस संस्था में तानाशाही और अस्थायित्व हो, उसमें काम करने वाले लोग असुरक्षा की मानसिकता में जीते हुए एक-दूसरे के प्रति ईष्र्या और द्वेष से ग्रस्त हो जाते हैं। हिंदी विकास समिति के दिल्ली कार्यालय में मेरे साथ काम करने वाले रवींद्रन और गौरीशंकर मेरे प्रति ऐसे ही ईर्ष्या-द्वेष से ग्रस्त थे। वे मेरे विरुद्ध शरीफ को भड़काने वाले पत्र तो लिखते ही थे, विश्वकोश से संबंधित काम भी मुस्तैदी से नहीं करते थे। उधर मोटूरि सत्यनारायण का शरीफ पर और शरीफ का मुझ पर निरंतर यह दबाव रहता था कि विश्वकोश के पहले खंड का प्रकाशन जल्दी से जल्दी हो जाये। शायद इसी पर सरकारी अनुदान मिलना निर्भर करता था। अंततः मुझे एक पत्र में दफ्तर का सारा हाल शरीफ को लिखना पड़ा। मेरे पत्र के उत्तर में शरीफ के दो पत्र आये, एक दफ्तरी और दूसरा निजी। निजी पत्र इस प्रकार था : 
 
54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
13-7-72

प्रिय रमेश,
 तुम्हारा खत मिला। 
आज सुबह ही मैंने तुम्हारे नाम दफ्तर के पते पर एक पत्र भेजा है, जिसमें मैंने तुम तीनों को संबोधित किया है। मैंने अब तक का सारा दफ्तर का पत्र-व्यवहार सत्यनारायण जी को दिखाया है और जो कुछ मैंने तुम लोगों को लिखा है, वह सब उन्हीं के आदेशानुसार लिखा है। तुम जानते हो, मैं भी तुम लोगों की तरह ही नौकर हूँ और मुझे जो आदेश दिया जाता है, वह करना मेरा कर्तव्य हो जाता है।
गौरी के बारे में तुमने जो बातें लिखी थीं, वे सारी सत्यनारायण जी पहले ही से जानते हैं। और उन्होंने मुझे बताया भी था। इस सबके बावजूद, हो सकता है, गौरी या रवींद्रन या तुम खुद भी मुझे गलत समझ सकते हो। लेकिन मेरे भाई, शायद तुम अपने चार महीनों के अनुभव के आधार पर इतना तो जान गये होगे कि मैं न किसी की बुराई चाहता हूँ, न किसी पर कोई अधिकार चलाना चाहता हूँ। गौरी खुद ये सारी बातें जानता है। मगर वह इतना रूखा इंसान है कि व्यक्तिगत संबंधों को कोई तरजीह नहीं देता है। खैर, मेरी असलियत मेरे साथ है, तुम लोग जो भी समझो।
मैं खुद इस नौकरी में बहुत दिन नहीं रहूँगा। ताकि तुम लोग मुझे और ज्यादा गलत समझने का मौका न पा सको। खैर, ये तो दफ्तर की बेहूदा बातें हैं।
कमलेश्वर जी के पत्र आये। ‘समांतर’ संग्रह के लिए उन्होंने मेरी ‘दिग्भ्रमित’ कहानी चाही है। उसकी कटिंग मेरे पास नहीं है। यहाँ मिलने की भी संभावना नहीं है। तुम्हारे पास ‘धर्मयुग’ के पुराने अंक हों, तो (4 अक्टृबर, 1970 के अंक से) कटिंग तत्काल कमलेश्वर जी के पास भेजो। श्रवण कुमार बता रहे थे कि मेरी उस कहानी की कटिंग उनके पास भी है। उन्हें भी पूछो। उनके पास हो, तो लेकर बंबई भेज दो।
और?
सतीश के बारे में अभी कोई व्यवस्था करने की स्थिति नहीं है। पहली जिल्द निकलने के बाद ही वह संभव हो पायेगा। इसलिए इस नवंबर-दिसंबर के पहले नहीं हो पायेगा। मैंने कमलेश्वर जी को भी यही बातें सूचित की हैं। तुम भी लिख दो।
और क्या हो रहा है?
भाभी जी को प्रणाम। बच्ची को प्यार। पत्र दो। कहानी बंबई भिजवाओ।
 तुम्हारा
 शरीफ


‘प्रिय भाई’, ‘प्रिय रमेश’, ‘मेरे रमेश’ जैसे संबोधनों वाले पत्र लिखने वाले शरीफ ने एक बार मुझे ‘अप्रिय रमेश’ लिखकर भी संबोधित किया था :

54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
26-8-72
                                                        
अप्रिय रमेश, 
लगता है, मुझे भाभीजी से यह जानना पड़ेगा कि तुम अपने-आपको क्या समझते हो! यार, पत्र क्यों नहीं लिखते? दफ्तर पर पत्र लिखा, जवाब नहीं। घर के पते पर लिखा, वही मौन। लगता है, निर्दयी होते जा रहे हो। खासकर मेरे साथ। खासकर तुम्हारी प्यारी बिटिया के ससुर के साथ।
खुश हो जाओ कि अगले महीने की दूसरी तारीख तक बंदा दिल्ली पहुँच रहा है। सत्यनारायण जी भी चाहते हैं। एक तार भिजवाया था सत्यनारायण जी ने तुम्हारे नाम--मेरे द्वारा (यानी मेरा नाम रखकर) घबराने की कोई बात नहीं। संक्षेप में लिखो कि कितना काम हुआ है। उन्हें इन बातों को बार-बार जानने की लत है।
यह पत्र, ध्यान रखो कि एकदम व्यक्तिगत है, इससे बढ़कर कुछ नहीं। बाहर न जाये।
भाभीजी को प्रणाम।
बिटिया को प्यार।
तत्क्षण लिखो।
तुम्हारा
शरीफ


सितंबर, 1972 में शरीफ दिल्ली आ गया, तो मुझे दफ्तर की उस जिम्मेदारी से मुक्ति मिली, जिसे सँभालने के बदले में मेरा वेतन तो एक पैसा भी नहीं बढ़ा था, पर सिरदर्दी बहुत बढ़ गयी थी। शरीफ अपने कमरे में बैठने लगा और मैं वापस हाॅल में अपनी पहली वाली जगह। मुझे तो इससे तनावमुक्त हो जाने की खुशी हुई, लेकिन रवींद्रन और गौरीशंकर को इस बात की खुशी हुई कि मैं अब उनका सीनियर नहीं रहा, बल्कि नियुक्ति के तिथि-क्रम के अनुसार पुनः उन दोनों से जूनियर हो गया हूँ। 

मुझे इसकी परवाह नहीं थी, बल्कि खुशी थी कि मेरा बहुत-सा समय बच गया, जो शरीफ की जगह बैठने से विश्वकोश के लेखकों को टेलीफोन करके काम जल्दी करने के लिए कहने में, टाइपिस्ट को काम देने, उसके काम को जाँचने और उसे ठीक से काम करने की ताईद करने में तथा कारण-अकारण मिलने आने वालों के साथ बातचीत करने में चला जाता था। वापस अपनी जगह आकर मैंने संपादन का काम तेजी से करना शुरू किया। देखा-देखी रवींद्रन और गौरीशंकर भी मुस्तैदी से काम करने लगे। 

उन्हीं दिनों कानपुर में ‘समांतर’ का दूसरा सम्मेलन हुआ, जिसमें शरीफ और मैं दिल्ली से साथ-साथ गये। सम्मेलन 15, 16, 17 अक्टूबर को होना था, लेकिन कमलेश्वर ने मुझे, शरीफ, जितेंद्र और मधुकर सिंह को एक दिन पहले कानपुर पहुँच जाने के लिए कहा था, ताकि ‘‘समांतर के कोर ग्रुप’’ के लोग (अर्थात् कमलेश्वर, मैं, शरीफ, जितेंद्र, कामतानाथ और मधुकर सिंह) पहले मिलकर तय कर लें कि सम्मेलन में क्या-क्या और किस तरह किया जाना है। 

मैं और शरीफ 13 अक्टूबर को रात की गाड़ी से कानपुर गये। रास्ते में समांतर को लेकर शरीफ से मेरी लंबी बातचीत हुई। हम दोनों के विचार से कमलेश्वर ने हमारे आंदोलन को चालाकी से हथियाकर अपना नेतृत्व उस पर थोप दिया था। गलती हम लोगों की भी थी कि हमने अपना आंदोलन स्वयं चलाने के बजाय उसकी बागडोर उनके हाथ सौंप दी। होना यह चाहिए था कि हम अपना आंदोलन अपने ढंग से चलाते, उसके लिए एक नया मंच बनाते और उसके जरिये कहानी के रूप तथा वस्तुतत्त्व में आ रहे नये बदलाव को उसके मूल्य और महत्त्व के साथ सामने लाते। उस समय हिंदी साहित्य में पुराने प्रगतिशील आंदोलन का जो नया उभार वाम-जनवादी लेखन के रूप में सामने आ रहा था, उससे जुड़कर हमें एक नया कहानी आंदोलन शुरू करना चाहिए था और ‘पहल’, ‘वाम’, ‘उत्तरार्द्ध’ आदि पत्रिकाओं जैसी कोई नयी पत्रिका निकालकर उस समय लिखी जा रही वाम-जनवादी कहानी को एक नये साहित्यिक आंदोलन का रूप देना चाहिए था। लेकिन हमने तत्कालीन सत्ता और व्यवस्था के समर्थक एक पुराने लेखक को अपना नेता तथा एक पूँजीवादी संस्थान से निकलने वाली व्यावसायिक पत्रिका को अपना मंच मान लिया था। समांतर आंदोलन में शामिल ज्यादातर कहानीकार अराजनीतिक किस्म के लेखक थे और कमलेश्वर ‘नयी कहानी’ आंदोलन के समाप्त हो जाने पर साहित्य में अपनी साख और धाक फिर से जमाने की फिराक में थे। फिर, एक तरफ कमलेश्वर को कहानी की एक पत्रिका चलाने के लिए लगातार अच्छी कहानियों की जरूरत थी, जो नये कहानीकार ही पूरी कर सकते थे, तो दूसरी तरफ नये कहानीकारों को ‘सारिका’ जैसी लोकप्रिय पत्रिका में निरंतर प्रकाशित होने और उसके संपादक की निकटता का लाभ उठाकर साहित्य में अपने पैर जमाने का अवसर मिल रहा था। इस प्रकार पारस्परिक लाभ के सिद्धांत पर समांतर कहानी का आंदोलन चल रहा था। 

उस समय हिंदी साहित्य में वाम-जनवादी लेखन का जो नया उभार आया हुआ था, उससे जुड़े लेखक तथा साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक माक्र्सवादी थे और वाम दलों के सदस्य अथवा समर्थक थे। हम साहित्य की उस नयी प्रवृत्ति से जुड़कर अपना कहानी आंदोलन चलाते, तो हमारे आंदोलन की दशा और दिशा कुछ और ही होती। लेकिन समांतर आंदोलन उस नयी प्रवृत्ति के विरोधी उन लेखकों का एक गुट बनकर रह गया, जो माक्र्सवाद तथा माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधी थे। 

मैं शरीफ से दोस्ती होने से पहले से ही माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थक था (यद्यपि मैं उसका सदस्य कभी नहीं रहा) और मेरी गिनती वाम-जनवादी लेखकों में होने लगी थी। कमलेश्वर चाहते थे कि समांतरी लेखक वाम राजनीति और विचारधारा से कोई संबंध न रखें। ज्यादातर समांतरी लेखक उनसे सहमत थे। उनकी दलगत संबद्धताएँ जो भी रही हों, या न रही हों, उन सबमें एक चीज समान थी--सी.पी.एम. का विरोधी होना। कामतानाथ सी.पी.एम. वालों की तीखी आलोचना किया करता था, मधुकर सिंह सी.पी.एम. के ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद जैसे नेताओं तक को गालियाँ दिया करता था, जितेंद्र भाटिया राजनीति से अलग और ऊपर रहने की बातें किया करता था और शरीफ सभी प्रकार की राजनीति से नफरत-सी किया करता था। (यह नफरत उसकी ‘दिग्भ्रमित’ जैसी कहानियों में भी दिखायी देती थी।) कमलेश्वर सी.पी.एम. की आलोचना करने और उसके नेताओं को गाली देने के बजाय उनका मजाक उड़ाने के जरिये अपना विरोध प्रकट करते थे। मसलन, ‘वाम’ के संपादक चंद्रभूषण तिवारी को ‘चंभूति’ कहकर वे ठहाके लगाया करते थे। 

मैंने और शरीफ ने तय किया कि हम कानपुर में होने जा रहे समांतर के दूसरे सम्मेलन में अपने आंदोलन की राजनीतिक पक्षधरता और प्रतिबद्धता स्पष्ट करने पर जोर देंगे। 

हम 14 अक्टूबर को सुबह के ढाई बजे कानपुर पहुँचे। हमें कामतानाथ के घर पहुँचना था, लेकिन इतने सवेरे उसके घर पर दस्तक देना उचित न समझ हमने स्टेशन पर अपना सामान रखा, एक रिक्शा किया और उस पर शहर में घूमते रहे। रमजान का महीना था, इसलिए मुसलमान लोग दिन भर के उपवास के लिए खा-पीकर तैयार होते दिखे। रिक्शे वाला भी मुसलमान था, पर उसने बताया कि वह रोजे नहीं रखता, क्योंकि रोजा रखकर रिक्शा नहीं चला सकता। एक जगह रुककर हमने चाय पी, उसे भी पिलायी और वह हमारे कहने पर हमें कानपुर के मुस्लिम इलाकों में ले गया। दो कब्रिस्तानों के बीच की एकदम अँधेरी सड़क से भी हम गुजरे। सुबह की शबनमी ठंड में पाँच बजे तक घूमकर हम स्टेशन लौटे। तभी कलकत्ता से दिल्ली जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस से जितेंद्र उतरा। वह कलकत्ता से आया था। उसके साथ हम कामतानाथ के घर गये। कमलेश्वर के बंबई से और मधुकर सिंह के आरा से आ जाने पर सम्मेलन की रूपरेखा पर विचार हुआ। 

उस समय कानपुर में सी.पी.एम. का बड़ा सशक्त मजदूर संगठन था। काॅमरेड रामआसरे और सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में रहीं कैप्टन लक्ष्मी सहगल की बेटी सुभाषिणी सहगल (जो बाद में मुजफ्फर अली से शादी करके सुभाषिणी अली और सी.पी.एम. की बड़ी नेता बनी) वहाँ के दो बड़े लोकप्रिय मजदूर नेता थे। सुभाषिणी से कुछ दिन पहले दिल्ली में मेरी भेंट हुई थी। मैंने उसे कानपुर में होने वाले समांतर सम्मेलन के बारे में बताया था। उसे यह बात याद रही और वह सम्मेलन में मुझसे मिलने आयी। मेरे कहने पर एक गोष्ठी में उपस्थ्ति रही और बोली भी। मैंने शरीफ और जितेंद्र को अलग ले जाकर उससे मिलवाया, तो उसने हम तीनों से बात करने के लिए हमें सम्मेलन-स्थल के निकट ही रहने वाले अपने एक काॅमरेड के घर ले जाकर चाय पिलायी और यह जानकर कि शरीफ मद्रास से एक उर्दू अखबार निकालने की सोच रहा है, उसने शरीफ को मद्रास के अपने कुछ साथियों के पते दिये, जो अखबार निकालने में शरीफ की मदद कर सकते थे। 

कमलेश्वर को समांतर सम्मेलन में सुभाषिणी का आना, हम तीनों से उसका बातचीत करना और हमारा उसके साथ चाय पीने जाना अच्छा नहीं लगा। रात को कामतानाथ के घर पर हुई दारू-पार्टी में कमलेश्वर ने मुझसे कहा, ‘‘रमेश, सी.पी.एम. वाले तुम्हें ओन करने लगे हैं, यह गलत बात है।’’ उन्हें इस पर भी ऐतराज था कि मैंने शरीफ और जितेंद्र को सुभाषिणी से क्यों मिलवाया और क्यों मैं उन दोनों को लेकर उसके साथ चाय पीने गया। मुझे यह बात बहुत बुरी लगी। मैंने पूछा, ‘‘क्या समांतर के लेखकों को यह आजादी नहीं कि वे अपनी मर्जी से अपने मित्रों के साथ कहीं चाय पीने भी जा सकें?’’ 

गंभीर बातों को हँसी-मजाक में उड़ा देने की कूट-कला में माहिर कमलेश्वर ने इस विषय पर आगे बात नहीं होने दी और शराब की चुस्कियों के साथ उनकी चुटकुलेबाजी शुरू हो गयी। मुझे यह बात आश्चर्यजनक लगी कि शरीफ और जितेंद्र ने भी वह बात आगे नहीं बढ़ायी।


मैंने कानपुर में ही फैसला कर लिया था कि मैं समांतर में नहीं रहूँगा। लेकिन शरीफ और जितेंद्र अपना भविष्य शायद समांतर में बने रहने में ही देख रहे थे। अतः दोनों मुझे समझाते रहे कि मैं समांतर छोड़ने की गलती न करूँ। 

उन दिनों बड़ी (व्यावसायिक) पत्रिकाओं के विरुद्ध लघु (साहित्यिक) पत्रिकाओं का आंदोलन जोर-शोर से चल रहा था और कई लेखकों ने, जो अभी तक बड़ी पत्रिकाओं में धड़ल्ले से छपते आ रहे थे, उनमें न लिखने का फैसला किया था। मैं उन दिनों ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ आदि बड़ी पत्रिकाओं में खूब लिखता था। ‘धर्मयुग’ और ‘सारिका’ टाइम्स आॅफ इंडिया प्रकाशन से निकलने वाली बड़ी पत्रिकाएँ थीं, जिनमें मेरी कहानियाँ खूब छपती थीं। टाइम्स आॅफ इंडिया प्रेस बंबई में बोरीबंदर के पास था। बोरीबंदर के नाम से जोड़कर रवींद्र कालिया ने मुझे कहीं ‘‘बोरीबंदर का लाडला कथाकार’’ कहा था और उसका यह जुमला खूब चला था। फिर भी मैंने लघु पत्रिका आंदोलन में शामिल होकर बड़ी पत्रिकाओं में न लिखने का फैसला किया। ‘सारिका’ बड़ी पत्रिका थी और वह समांतर आंदोलन की पत्रिका भी थी। इसलिए ‘सारिका’ से नाता तोड़ने का अर्थ अपने-आप ही ‘समांतर’ से नाता तोड़ना भी हो गया। 

शरीफ को मेरा यह निर्णय अच्छा नहीं लगा। उसने और समांतर से जुड़े अन्य लेखकों ने भी ‘सारिका’ और ‘समांतर’ से जुड़े रहने में ही अपनी भलाई देखी। 

कानपुर से लौटने के कुछ दिन बाद शरीफ पुनः मद्रास चला गया। हिंदी विकास समिति में विश्वकोश का पहला खंड छपने चला गया था और अगले खंड के संपादन का काम शुरू होने में अभी देर थी, इसलिए मोटूरि सत्यनारायण ने शरीफ से कहा कि कुछ समय के लिए दिल्ली दफ्तर से किसी एक व्यक्ति को नौकरी से हटा दिया जाये। जब जरूरत होगी, उसे फिर से रख लेंगे। तदनुसार शरीफ ने मुझे लिखा :

 
54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
28-10-72

                                                        
प्रिय रमेश,
तुम्हारा लंबा पत्र मिल गया था। मुझे खुद लिखना चाहिए था। मगर लिख नहीं सका। इस बार तुमसे दूर होकर मुझे कुछ अतिरिक्त बेचैनी हो रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह कि जिस नौकरी पर मैंने अपनी तरफ से तुम्हें लगाया था, उसकी रक्षा मैं खुद करने की हालत में फिलहाल नहीं रह गया हूँ। तुम जानते ही हो कि अब दफ्तर में काम कम है और इसलिए किसी एक को दो-एक महीने के लिए हटाना जरूरी है। मैं चाहता, तो गौरी को भी हटा सकता था, लेकिन तुम्हारे सामने क्या छिपाना कि मैंने तुम्हें ही हटाने की बात सत्यनारायण जी से कही है। वह इसलिए कि तुम नौकरी के बगैर भी एक-दो महीने चला सकते हो, मगर वह नहीं। यह बात मैं तुम्हें साफ लिख रहा हूँ, ताकि तुम कभी भी मुझे गलत न समझो।
मैं वादा करता हूँ कि जनवरी से फिर से तुम्हें वहाँ रखवाऊँगा। श्री रवींद्रन के लिए मैंने कालीकट वाली व्यवस्था कर दी है। उन्हें निश्चित रूप से छात्रवृत्ति मिल जायेगी दिसंबर में। वे चले जायेंगे और मैं तुम्हें फिर से रखवा लूँगा। और इस बार कुछ महीनों के लिए नहीं, कई सालों के लिए, अगर तुम चाहोगे, तो। सत्यनारायण जी भी तुम्हें बहुत चाहते हैं। लेकिन अभी वे भी विवश हैं। तुम नवंबर की पहली तारीख से दफ्तर मत जाओ। मैं तुम्हें वििपबपंससल न लिखकर व्यक्तिगत रूप से लिख रहा हूँ, एक भाई के नाते। तुम सत्यनारायण जी से मेरे पत्र का जिक्र करो और उन्हें बता दो कि पहली नवंबर से तुम काम पर नहीं आओगे, अगली सूचना तक।
मेरे भाई, यह पत्र लिखते हुए मैं क्या कुछ अनुभव कर रहा हूँ, तुम्हें बता नहीं सकता। खैर, तुम मुझे गलत नहीं समझोगे, इस आशा के साथ।
मैंने कमलेश्वर जी को उर्दू पत्रिका वाली योजना भेज दी है। देखें, क्या होता है। तुम अपनी बातें लिखो।
भाभीजी को प्रणाम। बिटिया को बहुत-बहुत प्यार।
पत्र तत्काल दो। 
तुम्हारा
 शरीफ


हिंदी विकास समिति की नौकरी खत्म होने का मुझे दुख नहीं हुआ, बल्कि एक बेमतलब तनाव से मुक्त होने की खुशी ही हुई। मैंने मोटूरि सत्यनारायण को अपना त्यागपत्र तो भेजा ही, शरीफ को भी लिख दिया कि वह मेरी चिंता न करे, मुझे इस नौकरी में वापस कभी नहीं आना है और इस प्रसंग का हमारी दोस्ती पर कोई असर नहीं पड़ना है। 

मैं फ्रीलांसिंग और अस्थायी नौकरियों के अपने अनुभव से अच्छी तरह समझ चुका था कि हिंदी में स्वतंत्र लेखन के सहारे जीना बहुत मुश्किल है। इसलिए मैंने प्राध्यापक बनने के वास्ते पीएच.डी. के लिए शोध करना शुरू कर दिया था। शरीफ मुझसे पहले ही पीएच.डी. कर चुका था। उसने आगरा विश्वविद्यालय से ‘दक्खिनी हिंदी के लोकगीत’ विषय पर पीएच.डी. की थी। उससे मैंने कई बार कहा कि वह कोई स्थायी नौकरी खोजे और आजीविका की ओर से निश्चिंत होकर अपना साहित्य-सृजन करे। यदि डाॅ. मलिक अपने काॅलेज में प्राध्यापक बनाने के लिए उसे कालीकट बुला रहे हैं, तो उसे वहाँ अवश्य चले जाना चाहिए। लेकिन शरीफ की न जाने वह कौन-सी जिद या मजबूरी थी कि वह हिंदी विकास समिति की नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं था और उसमें रहकर खुश भी नहीं था। वह मद्रास में ही रहकर कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिससे वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके। पहले उसने वहाँ प्रेस लगाने की योजना बनायी। फिर हिंदी की साहित्यिक पत्रिका निकालने की योजना बनायी। फिर उर्दू का अखबार और उसकी जगह फिर उर्दू में पत्रिका निकालने की योजना बनायी। मगर कोई योजना सफल नहीं हुई, क्योंकि ऐसा कोई काम शुरू करने के लिए जरूरी पैसा उसके पास नहीं था। 

कमलेश्वर तब तक हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखक बन चुके थे। उन्होंने शरीफ को जिस तरह टाइम्स आॅफ इंडिया की किसी पत्रिका में नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया था, या जैसे उसके द्वारा निकाले जाने वाले उर्दू अखबार के लिए सरकारी सहायता दिलाने का आश्वासन दिया था, वैसे ही फिल्मों में काम दिलाने का आश्वासन भी दिया। लेकिन वे सब हवाई बातें थीं, जिनके कारण अंततः कमलेश्वर और समांतर आंदोलन से भी उसका मोहभंग हुआ। फिर भी न जाने क्यों, वह मेरी तरह उससे अलग कभी नहीं हुआ। 

मैंने उससे यह भी कहा था कि वह वाम-जनवादी साहित्य और लघु पत्रिकाओं के आंदोलन से अपना संबंध स्पष्ट कर ले। किंतु वह सोचता था कि बड़ी पत्रिकाओं में लिखना छोड़कर पारिश्रमिक न देने वाली लघु पत्रिकाओं में लिखने का फैसला करके वह जिंदा नहीं रह सकेगा। समांतर आंदोलन को भी वह शायद इसीलिए छोड़ना नहीं चाहता था। 

इधर वाम-जनवादी आंदोलन में एक नया उभार आया देख प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े लोगों ने उसे पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से 1973 में ‘‘सभी रंगतों के प्रगतिशील’’ लेखकों का एक बड़ा सम्मेलन बाँदा (उत्तर प्रदेश) में आयोजित किया। मुझे भी उसमें बुलाया गया था। मैंने शरीफ को लिखा कि वह भी उस सम्मेलन में शामिल हो। मगर वह समांतर से इतना निराश हो चुका था कि बाँदा सम्मेलन को भी समांतर सम्मेलन जैसी ही कोई चीज समझ रहा था, जिसमें रात को शराब की चुस्कियों के साथ चुटकुलेबाजी होती थी।
मैंने उसे एक विस्तृत पत्र लिखकर उसे समांतर सम्मेलन और बाँदा के प्रगतिशील साहित्यकार सम्मेलन का फर्क समझाते हुए बाँदा चलने के लिए कहा, तो उत्तर में उसने लिखा :
54, Bazar Road,
Mylapore, Madras-4
9-2-73

                                                                                                                                 
प्रिय रमेश, 

 तुम्हारा विस्तृत पत्र कल शाम को मिला।
बाँदा वाले सम्मेलन में मैं नहीं जाऊँगा। मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं शराब पीने के लिए और चुटकुले सुनने-सुनाने के लिए उतनी दूर जाऊँ। जितेंद्र ने भी मुझसे आग्रह किया था कि मैं चलूँ। कमलेश्वर जी ने भी लिखा था। मैंने मना कर दिया है। ‘समांतर’ के अंतर्गत हम लोग दो बार मिले हैं। कोई काम हुआ है? कोई योजना पूरी हुई है? कोई महान कहानी-उपन्यास-नाटक लिखा गया है? या कम से कम सारे ‘समांतरी’ एक तरह सोच पाये हैं? एक खयाल पाल पाये हैं? या कम से कम एक-दूसरे के सही दोस्त बन पाये हैं? एक-दूसरे के आगे ईमानदार रह सके हैं? एक-दूसरे के लिए सच्ची मुहब्बत जगा पाये हैं? अब बाँदा में मिलकर कौन-सी प्रगति छाँटोगे? तुम जाओ, और सारे समाचार मुझे दो। काफी होगा।
स्वयं प्रकाश के बारे में विस्तृत जानकारी तुमने दी, अच्छा किया। उनका एक-डेढ़ हफ्ता पहले एक पत्र आया था, तत्काल ‘क्यों’ के लिए कहानी भेजने का आग्रह करते हुए। मैंने कोई उत्तर नहीं दिया है। वह इसलिए कि उन्होंने एक बार लिखा था कि उनका ‘क्यों’ से कोई संबंध नहीं है। और अब फिर कहानी माँग रहे हैं। अजीब मजाक है। पहले, ‘क्यों’ का समाचार पाकर, उत्साहित होकर, एक गरीब व्यक्ति के महत्त्वपूर्ण, ईमानदार प्रयासों को उत्साहित करने के लिए मैंने तत्काल बतौर चंदा उन्हें 8 रुपये भेज दिये थे। मैं सोच रहा हूँ, मैंने गलती कर दी है। खैर छोड़ो, कोई बात नहीं।
‘समांतर’ को लेकर तुम्हारी सोच मिली। ठीक है। रमेश, मैं अब भी तहे दिल से चाहता हूँ कि समांतर हम लोगों का ठीक मंच बने। उसके जरिये हम लोग महत्त्वपूर्ण काम करें। देखो क्या होता है। मैं चाह रहा हूँ कि संभव हुआ, तो एक बार बंबई हो आऊँ। कमलेश्वर जी से, जितेंद्र से और लोगों से मिलकर बात तो करें। देखें, कौन क्या सोच रहा है। जहाँ तक जितेंद्र की बात है, उसे कोई क्या कह सकता है। वह खुद समझदार है। खुद सोच सकता है कि उसके लेखक और व्यक्ति की अधिक से अधिक रक्षा के लिए उसे कौन-सा रास्ता अपनाना चाहिए। हम कुछ कहें, तो हो सकता है, उससे कई जगहों में कई तरह की गलतफहमी सिर उठाये।
रमेश, मैं बेहद अजीब-सी स्थिति से गुजर रहा हूँ। मैं बहुत अकेला हो गया हूँ, रमेश, हर दृष्टि से। इस नौकरी से भी तंग आ गया हूँ। किसी भी वक्त छोड़ दूँ। मगर, मेरे यार, यह बताओ, उसके बाद बीवी-बच्चों को कैसे पालूँ? क्या तुम कोई रास्ता दिखा सकोगे? दिखा सको, तो लिखो। मेरा लिखना-पढ़ना सब समाप्त होता जा रहा है इस माहौल में रहकर।
सारी बातें विस्तार से लिखो।
भाभीजी को प्रणाम। अरे, मैं अपनी बहूरानी को कैसे भूल सकता हूँ। जब राहुल तंग करता है, तो उसकी माँ कहती रहती है कि तुझे अपनी बीवी के पास दिल्ली भेज दूँगी, जो तुझे सुधार लेगी। मैं अगले पत्र के साथ तुम्हारे दामाद का चित्र भेजूँगा।
 तुम्हारा
 शरीफ


इसके बाद हमारा पत्राचार दो-चार संक्षिप्त पत्रों से अधिक आगे नहीं बढ़ सका। वह फिर कभी दिल्ली भी नहीं आया। यदि आया भी होगा, तो मुझसे मिला नहीं। सुधीर चौहान और जे.एल. रेड्डी जैसे अपने पुराने मित्रों से भी उसने लगभग नाता तोड़ लिया था। उसके जीवन के अंतिम चार वर्ष किस अवस्था में गुजरे, हम में से कोई नहीं जान सका। 1977 में हुई उसकी असामयिक मृत्यु पर सुधीर और रेड्डी मद्रास गये थे और उसके परिवार से मिलकर आये थे। मगर वे भी मुझे इतना ही बता सके कि शरीफ के अंतिम दिन बड़े आर्थिक कष्ट में गुजरे। वह बहुत अकेला और शायद अवसादग्रस्त भी हो गया था। शायद यही चीज उसकी अचानक हुई असामयिक मृत्यु का कारण बनी। 



Monday, August 8, 2016

निरंतर विकासमान यथार्थवाद

पिछले साल 8 अगस्त, 2105 को भीष्म साहनी जन्मशती के अवसर पर दिया गया मेरा एक व्याख्यान 'निरंतर विकासमान यथार्थवाद के रचनाकार भीष्म साहनी' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था. उसमें मैंने कहा था कि हमें भीष्म साहनी की जन्मशतवार्षिकी यथार्थवादी साहित्य की प्रकृति और परंपरा पर एक राष्ट्रीय बहस चलाकर मनानी चाहिए. कई लेखकों और पाठकों ने मेरे इस विचार का स्वागत करते हुए मुझे सुझाव दिया कि मैं 'निरंतर विकासमान यथार्थवाद' को स्पष्ट करते हुए एक लेख लिखूँ. उनके सुझाव के लिए आभार सहित प्रस्तुत है यह लेख. --रमेश उपाध्याय

निरंतर विकासमान यथार्थवाद


यथार्थवाद के पक्ष में उतना नहीं लिखा गया है, जितना उसके विरोध में। और विरोध भी कैसा? निराधार लांछन लगाने जैसा। उस पर तरह-तरह के इतने अधिक लांछन लगा दिये गये हैं कि उसका नाम लेने पर उसकी अपनी शक्ल-सूरत की जगह उस पर लगे लांछन ही नजर आते हैं। मसलन, यथार्थवाद कल्पनाशून्य होता है; वह सुंदरता को न देख कुरूपता को ही देखता है; वह जीवन की जटिलता में न जाकर उसका सरलीकरण करता है; वह महान और उदात्त को छोड़ साधारण और भदेस को अपनाता है; वह नये प्रयोग करने के बजाय पुरानी परिपाटियों पर चलता है; नये रास्ते खोजने और बनाने का कठिन काम करने के बजाय बने-बनाये रास्तों पर चलने का आसान तरीका अपनाता है; वह ऐसी सरलीकृत, घिसी-पिटी, फार्मूलाबद्ध और ‘पे्रडिक्टेबल’ रचनाओं की ओर ले जाता है, जिनके आरंभ में ही पता चल जाता है कि अंत क्या होगा...इत्यादि-इत्यादि।
यथार्थवाद पर लगाये जाने वाले इस प्रकार के सरासर गलत और निराधार लांछनों की जाँच-पड़ताल करने और उनका वास्तविक अर्थ स्पष्ट करने का काम यथार्थवादियों का है, जिसे वे बहुत कम कर पाये हैं। इसलिए विरोधियों ने यथार्थवाद के विरुद्ध ऐसा वातावरण बना दिया है कि साहित्यकार या कलाकार का यथार्थवादी होना मानो उसका गुण नहीं, दोष हो; विश्वविद्यालयों में उसका अध्ययन और अनुसंधान करना-कराना मानो समय तथा संसाधनों को बेकार ही बर्बाद करना हो। 

स्वच्छंदतावादियों और आधुनिकतावादियों से लेकर उत्तर-आधुनिकतावादियों तक बेशुमार लोगों ने यथार्थवाद का विरोध किया है। साहित्य और कला में इसके विरुद्ध कई आंदोलन चलाये गये हैं। ‘इतिहास का अंत’ की भाँति ‘यथार्थवाद का अंत’ की घोषणाएँ भी की जा चुकी हैं। लेकिन जीवन के लिए जरूरी चीजें कभी खत्म नहीं होतीं। बलपूर्वक दबा दी जाने पर भी वे उभर आती हैं। 

यथार्थवाद एक अंतरराष्ट्रीय कला आंदोलन के रूप में उन्नीसवीं सदी के मध्य में यूरोप में उभरा था। इस शब्द का पहला प्रयोग फ्रांसीसी भाषा में 1826 में हुआ, लेकिन जल्दी ही यह सर्वत्र चर्चा का विषय बन गया। चित्रकारों, उपन्यासकारों और हर प्रकार के आलोचकों के बीच इस पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों प्रकार की जोरदार बहसें छिड़ीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में इसका स्वरूप भी बदला और कटु-कठोर तथा नग्न यथार्थ को चित्रित करने वाला ‘प्रकृतवाद’ सामने आया। इसके बाद अनेक प्रकार के ‘वाद’ आकर यथार्थवाद को चुनौती देने लगे। उनमें से सबसे बड़ी टक्कर दी आधुनिकतावाद ने, जिसने यथार्थवाद के ‘‘दिखाओ और बताओ’’ के रचना-सिद्धांत की जगह ‘‘नया बनाओ!’’ का रचना-सिद्धांत चलाया और आधुनिकतावादी आलोचक यथार्थवाद को पुराना तथा बेकार घोषित करने लगे। हिंदी में ‘नयी कविता’ और ‘नयी कहानी’ के आंदोलन इसी यथार्थवाद-विरोधी आधुनिकतावाद से प्रेरित-प्रभावित थे। यह और बात है कि इन आंदोलनों में अनेक यथार्थवादी रचनाकार भी शामिल थे। 

हिंदी साहित्य में, खास तौर से 1970 और 1980 के दशकों में, ‘प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा’ का जाप तो बहुत हुआ, लेकिन उसे समझने और आगे बढ़ाने के प्रयास कम ही हुए। यदि आधुनिकतावादी लेखकों तथा आलोचकों ने उसका मजाक उड़ाया, तो कई प्रगतिशील-जनवादी कहलाने वाले लेखकों तथा आलोचकों ने उस पर तरह-तरह के सवाल उठाकर उसे खारिज करने के प्रयास किये। मसलन, किसी ने कहा कि प्रेमचंद ग्रामीण यथार्थ के लेखक थे, आज के महानगरीय यथार्थ का चित्रण उनकी परंपरा में नहीं किया जा सकता; किसी ने कहा कि प्रेमचंद का समय और था, हमारा समय और है और इस बदले हुए समय में प्रेमचंद का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद संभव नहीं है; तो किसी ने कहा कि प्रेमचंद आदर्शवादी थे, यथार्थवादी तो वे अपनी अंतिम कुछ रचनाओं में ही हुए थे!  

दूसरी तरफ उत्तर-आधुनिकतावादियों ने अपने विखंडनवाद से यथार्थवाद के मूल आधार समग्रता का ही खंडन किया, तो जादुई यथार्थवादियों ने यथार्थवाद के सभी पुराने रूपों को वर्तमान समय के लिए बेकार हो चुका बताया और उत्तर-आधुनिकतावादियों के ‘माक्र्सवादोत्तर’ और ‘यथार्थवादोत्तर’ के नारों से उसका तालमेल बिठाकर वर्तमान में (अर्थात् सोवियत संघ के विघटन के बाद और पूँजीवादी भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में) उसी को एकमात्र सही और संभव यथार्थवाद बताया। 

आश्चर्य की बात यह है कि हिंदी साहित्य में वामपंथी लेखकों और लेखक संगठनों की संख्या कम न होने पर भी यथार्थवाद पर कोई बड़ी बहस नहीं चली, जबकि उनको ही साहित्य में यथार्थवाद की जरूरत सबसे ज्यादा थी। उत्तर-आधुनिकतावाद के संदर्भ में फ्रेडरिक जेमेसन का नाम अवश्य लिया जाता रहा, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया कि उन्होंने आज के पूँजीवाद के दौर में यथार्थवाद के नये रूपों के आविष्कार की जरूरत के बारे में क्या कुछ कहा था। 

पश्चिम के साहित्य में यथार्थवाद का विरोध आधुनिकतावाद के दौर में ही होने लगा था। आधुनिकतावाद की यथार्थवाद-विरोधी प्रवृत्ति को उत्तर-आधुनिकतावाद ने विभिन्न प्रकार की नयी रणनीतियों से आगे बढ़ाया। उनमें सबसे बड़ी रणनीति थी समग्रता का विरोध, जिसे उत्तर-आधुनिकतावाद के जनक जैसे माने जाने वाले ल्योतार ने ‘‘वार अगेंस्ट टोटैलिटी’’ (समग्रता के विरुद्ध युद्ध) कहा। इस युद्ध में जिस ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया गया, वह था विखंडन। 

लेकिन 1990 के बाद से ‘लेट कैपिटलिज्म’ (आज के पूँजीवाद) ने भूमंडलीकरण के रूप में एक ऐसी आर्थिक-राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की, जिससे एक नये ढंग के साम्राज्यवाद की वापसी हुई और उसके साथ ही एक नयी बात यह हुई कि सारी दुनिया को एक नये ढंग की गुलामी का अहसास होने लगा, जिससे वह एक नये रूप में मुक्ति के लिए छटपटाने लगी। इस छटपटाहट को व्यक्त करने वाली किताबें आने लगीं, जैसे डेविड हार्वी की ‘दि न्यू इंपीरियलिज्म’ (2003), गोपाल बालकृष्णन द्वारा संपादित ‘डिबेटिंग एंपायर’ (2003) और एलेक्स कोलिनिकाॅस की ‘दि न्यू मैंडेरिंस आॅफ अमेरिकन पाॅवर’ (2005)। उत्तर-आधुनिकतावाद ने माक्र्सवाद और यथार्थवाद के अंत की ही नहीं, इतिहास के अंत की भी घोषणा कर दी थी। मगर अब उन घोषणाओं को गलत साबित करने वाली किताबें भी आने लगीं, जैसे अंस्र्ट ब्रायसाख की ‘आॅन दि फ्यूचर आॅफ हिस्टरी: दि पोस्टमाॅडर्न चैलेंज एंड इट्स आफ्टरमैथ’ (2003), डेविड हार्वी की ‘स्पेसेज आॅफ होप’ (2003), फ्रेडरिक जेमेसन की ‘आर्कियोलाॅजीज आॅफ दि फ्यूचर: दि डिजायर काॅल्ड यूटोपिया एंड अदर साइंस फिक्शंस’ (2005), मैथ्यू बोमों द्वारा संपादित ‘एडवेंचर्स इन रियलिज्म’ (2007) इत्यादि। 

सोवियत संघ के विघटन और शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद पूँजीवाद की ओर से बड़ी विजयोल्लसित घोषणाएँ की गयीं कि पूँजीवाद जीत गया, समाजवाद हार गया, अब सारी दुनिया में और हमेशा पूँजीवाद ही चलेगा। उत्तर-आधुनिकतावादियों ने तो पहले ही कला, साहित्य और सौंदर्यशास्त्र में एक नये युग के आगमन की घोषणा कर रखी थी--मार्क्सवादोत्तर युग! यथार्थवादोत्तर युग! 

एक यथार्थवादी लेखक के रूप में मुझे लगा कि अब एक नये यथार्थवाद के लिए संघर्ष करना जरूरी है। मैं एक रचनाकार के रूप में तो यह संघर्ष अपनी कहानियों में नये यथार्थ को नये यथार्थवादी रूपों में सामने लाकर कर ही रहा था, अब मैं एक लेखक, प्राध्यापक और पत्रकार के रूप में भी यह संघर्ष अपने लेखों, व्याख्यानों और अपनी पत्रिका ‘कथन’ के अंकों के जरिये करने लगा। मैंने कुछ नये प्रश्न उठाने शुरू किये, जैसे--यदि पूँजीवाद एक विश्व-व्यवस्था है, तो क्या समाजवाद भी एक विश्व-व्यवस्था नहीं है? यदि पूँजी का भूमंडलीकरण संभव है, तो श्रम का क्यों नहीं? जब पूँजीवादी भूमंडलीकरण हो सकता है, तो समाजवादी भूमंडलीकरण क्यों नहीं हो सकता? 

इन प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जब तक समाजवाद एक संभावना है, तब तक माक्र्सवाद भी जरूरी है, यथार्थवाद भी जरूरी है। अलबत्ता यह एक नया मार्क्सवाद होगा, एक नया यथार्थवाद होगा। ऐतिहासिक परिस्थितियों के बदलने के साथ-साथ इतिहास के नये बोध के साथ बदलता और विकसित होता मार्क्सवाद और यथार्थवाद। 

1930 के दशक में जर्मनी में यथार्थवाद संबंधी एक ‘‘महान बहस’’ चली थी, जिसमें अर्न्स्ट ब्लाॅख, जाॅर्ज लुकाच, बर्टोल्ट ब्रेष्ट, वाल्टर बेंजामिन और थियोडोर एडोर्नो ने भाग लिया था। यह बहस 1980 में ‘एस्थेटिक्स एंड पाॅलिटिक्स’ नामक संकलन में प्रकाशित हुई थी। उसका ‘उपसंहार’ फ्रेडरिक जेमेसन ने लिखा था, जिसमें उन्होंने ‘‘उत्तर-मार्क्सवादों’’ की चर्चा करते हुए कहा था कि इतिहास की उपेक्षा करने वाले ही उसे दोहराने के लिए अभिशप्त नहीं होते, पिछले दिनों जो तरह-तरह के ‘‘उत्तर-मार्क्सवाद’’ सामने आये हैं, वे भी इसी सत्य को सामने लाते हैं। ‘‘माक्र्सवाद के परे’’ जाने के प्रयासों का अंत ‘‘मार्क्सवाद के पहले’’ की स्थितियों में लौट जाने के रूप में सामने आ रहा है। ‘‘दबा दी गयी चीजों की वापसी’’ का जैसा नाटकीय रूप यथार्थवाद और आधुनिकतावाद के झगड़े की वापसी के रूप में दिख रहा है, अन्यत्र कहीं नहीं दिखता। लेकिन उस झगड़े में पड़े बिना हम नहीं रह सकते, चाहे आज हमें उसमें शामिल दोनों पक्षों में से एक भी पूरी तरह स्वीकार्य न लगता हो। 

जेमेसन ने यह भी कहा था कि यथार्थवाद चीजों को समग्रता में देखता था, जबकि आधुनिकतावाद चीजों को विखंडित करके उन्हें ‘‘अपरिचित’’ बनाकर ‘‘नयी’’ बनाता था। मगर नयापन पैदा करने की यह आधुनिकतावादी तकनीक आज उपभोक्ताओं को पूँजीवाद से तालमेल बिठाकर चलना सिखाने की जानी-पहचानी तकनीक बन गयी है। उसमें कोई नयापन नहीं रहा। इसलिए अब नया कुछ करने के लिए विखंडन को भी ‘‘अपरिचित’’ बनाने का प्रयास किया जा रहा है। लगता है, अमूर्तन का एक चक्र पूरा हो चुका है और उसकी जगह यथार्थवाद की वापसी का समय आ गया है। मगर यथार्थवाद का भी ऐतिहासिक आधार संदिग्ध हो गया है, क्योंकि आधारभूत अंतर्विरोध स्वयं इतिहास के भीतर है और उसकी वास्तविकताओं को समझने के लिए हम जिन अवधारणाओं से काम लेते हैं, वे चिंतन के लिए एक पहेली बन जाती हैं। इससे जो संदेह पैदा होता है, बहुत मूल्यवान है। हमें उसी को पकड़ना चाहिए, क्योंकि उसी की संरचना में इतिहास का वह मर्म छिपा है, जिसे हम अभी तक समझ नहीं पाये हैं। जाहिर है, यह संदेह हमें यह नहीं बता सकता कि यथार्थवाद की हमारी अवधारणा क्या होनी चाहिए; फिर भी इसका अध्ययन हमारे ऊपर यह जिम्मेदारी अवश्य डालता है कि हम यथार्थवाद की एक नयी अवधारणा का आविष्कार करें। आज इस जिम्मेदारी को महसूस न करना असंभव है। 

जेमेसन जिस नये यथार्थवाद की जरूरत पर जोर दे रहे थे, वह उनके विचार से उपभोक्ता समाज की उस शक्ति का प्रतिरोध करने वाला यथार्थवाद होना चाहिए था, जो मनुष्य और उसकी पूरी दुनिया को वस्तुओं में बदल देती है। उपभोक्ता समाज में यह शक्ति होती है कि वह मनुष्य के शारीरिक और मानसिक श्रम से उत्पन्न तमाम चीजों के साथ-साथ मनुष्य के विचारों, भावनाओं तथा संपूर्ण जड़ और चेतन जगत से उसके संबंधों को भी बेची और खरीदी जाने वाली चीजें बना दे। इस शक्ति का प्रतिरोध समग्रता में ही किया जा सकता है। आज के मानवीय जीवन तथा सामाजिक संगठन के सभी स्तरों पर चल रहे विखंडन को व्यवस्थित रूप से समाप्त करने के लिए चीजों को समग्रता में देखना और उन्हें समग्र रूप से बदलना आवश्यक है। नये यथार्थवाद की अवधारणा समग्रता की कोटि के आधार पर ही की जा सकती है; क्योंकि यही वह चीज है, जो वर्गों के बीच के संरचनात्मक संबंधों को सामने ला सकती है। 

लगभग दो दशकों के बाद जेमेसन ने अपनी पुस्तक ‘अ सिंग्यूलर माॅडर्निटी: एस्से आॅन ओंटोलाॅजी आॅफ प्रेजेंट’ (2002) में पुनः लिखा कि ‘‘प्रत्येक यथार्थवाद नया ही होता है...और यही कारण है कि समूचे आधुनिकतावादी युग में और उसके बाद भी दुनिया के कई हिस्सों तथा सामाजिक समग्रता के कई अंशों में नये और जीवंत यथार्थवादों की आहटें सुनायी पड़ती रही हैं, जिन्हें सुनना और पहचानना जरूरी रहा है।...प्रत्येक नया यथार्थवाद न केवल अपने से पहले के यथार्थवादों की सीमाओं से असंतोष होने के कारण उत्पन्न होता है, बल्कि इस कारण भी, तथा अधिक आधारभूत रूप में इसी कारण से ही, उभरकर सामने आता है कि आम तौर पर यथार्थवाद स्वयं आधुनिकता की ठीक वही गतिशील नवीनता लिये रहता है, जिसे हम आधुनिकतावाद की अद्वितीय विशेषता मानते आये हैं।’’ 

इसके बाद ‘आर्कियोलाॅजीज आॅफ दि फ्यूचर: दि डिजायर काॅल्ड यूटोपिया एंड अदर साइंस फिक्शंस’ (2005) में उन्होंने ‘‘भूमंडलीकरण के बाद के नयी पीढ़ी के तमाम वामपंथियों’’ को संबोधित करते हुए यथार्थवाद की उन समस्याओं को उठाया, जो नये सिरे से उठ खड़ी हुई थीं और जिन पर तुरंत ध्यान दिया जाना जरूरी था।
भूमंडलीकरण का वर्तमान दौर शुरू होते ही उत्तर-आधुनिकतावाद अपनी फैशनेबल चमक-दमक खोने लगा था और एक नये यथार्थवाद की जरूरत महसूस की जाने लगी थी। देखते-देखते यथार्थवाद संबंधी नयी पुस्तकें सामने आने लगीं, जैसे पीटर ब्रुक्स की ‘रियलिस्ट विजंस’ (2005) और मैथ्यू बोमों द्वारा संपादित ‘एडवंेंचर्स इन रियलिज्म’ (2007)। यथार्थवाद की इस वापसी में समकालीन पूँजीवाद की बदलती संरचना से उत्पन्न समस्याओं का बड़ा हाथ था, जिन्होंने यथार्थ को समझने तथा उसे कला और साहित्य में चित्रित करने के नये तरीके निकालने के लिए एक तरफ चिंतकों तथा आलोचकों को और दूसरी तरफ कलाकारों और साहित्यकारों को प्रेरित किया। पूँजीवाद में आये बदलाव का ही शायद यह नतीजा था कि जहाँ पहले यथार्थवाद की चर्चा में इतिहास पर जोर दिया जाता था, अब राजनीतिक अर्थशास्त्र पर जोर दिया जाने लगा। भूमंडलीकरण ने इतिहास को नये ढंग से पढ़ना जरूरी बनाया, जिससे ‘‘इतिहास का भूमंडलीकरण’’ हुआ और ‘‘भूमंडलीकरण का इतिहास’’ सामने आया। इन दोनों चीजों का असर साहित्य पर और उसमें किये जाने वाले यथार्थ-चित्रण तथा आलोचनात्मक विवेचन पर पड़ना स्वाभाविक था। 

उत्तर-आधुनिकतावादियों का सबसे ज्यादा जोर विखंडन पर रहा। उन्होंने जीवन, समाज और दुनिया को समग्रता में देखने, समझने और साहित्य में चित्रित करने के यथार्थवादी प्रयासों को इस आधार पर गलत, अनुचित और अवांछित बताया कि ऐसा करना असंभव है। उन्होंने कहा कि जीवन, समाज और दुनिया को ही नहीं, जिस कला और साहित्य में ये चित्रित या प्रतिबिंबित होते हैं, उसे भी विखंडन से या खंड-खंड करके ही समझा जा सकता है। 

मार्क्सवादी रचनाकारों, आलोचकों तथा सिद्धांतकारों ने विखंडनवाद का खंडन करते हुए बार-बार कहा है कि द्वंद्ववाद के अनुसार एक समग्रता के भीतर जो अंतर्विरोध होते हैं, वे ही उस समग्रता को बनाते और बदलते हैं। माक्र्स ने समाज और विश्व की कल्पना एक ऐसी समग्रता के रूप में की थी, जिसमें मुख्य और ऐतिहासिक अंतर्विरोध शोषक और शोषित वर्गों के बीच है, इन वर्गों के बीच संघर्ष है और वह संघर्ष समाज और विश्व को बदल रहा है। अंततः यह बदलाव वहाँ तक जा सकता है, जहाँ समाज या विश्व नामक समग्रता में न वर्ग होंगे, न वर्ग-संघर्ष। फिर वह एक नयी ही समग्रता होगी, जिसके अपने नये अंतर्विरोध और संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन वे वर्तमान पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था के आमूलचूल बदल जाने के बाद के नये ही अंतर्विरोध और संघर्ष होंगे। 

वर्तमान पूँजीवादी भूमंडलीकरण ने ज्यों ही यह संभावना दुनिया के लोगों के सामने रखी कि पूँजीवाद की ही तरह समाजवाद भी एक विश्व-व्यवस्था है और उसका भी भूमंडलीकरण हो सकता है, पूँजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों ने एक तरफ समाजवाद के अंत, माक्र्सवाद के अंत, यथार्थवाद के अंत आदि की अलग-अलग घोषणाओं के साथ-साथ समग्र रूप में ‘‘इतिहास के अंत’’ की घोषणा कर दी, तो दूसरी तरफ समग्रता के विचार के ही विरुद्ध जंग छेड़ दी। 

लेकिन 1990 के बाद से, जब से भूमंडलीकरण की प्रक्रिया और उसके आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि तमाम पक्षों पर ध्यान दिया जाने लगा, विभिन्न देशों के वामपंथी विद्वान भूमंडलीय यथार्थ को समग्रता में समझने की जरूरत पर जोर देने लगे। इससे पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के बारे में नया विचार-मंथन शुरू हुआ और एक ‘‘बेहतर दुनिया की तलाश’’ के प्रयासों के साथ-साथ यह आशाजनक नारा भी सामने आया कि ‘‘दूसरी और बेहतर दुनिया मुमकिन है’’। इससे यथार्थवाद को, जिसे उत्तर-आधुनिकतावादियों ने मृत घोषित कर दिया था, फिर से जीवंत और विचारणीय माना जाने लगा। यह विचार जोर पकड़ने लगा कि पूँजीवाद भूमंडलीय है, तो समाजवाद भी भूमंडलीय है। और अब ‘‘एक देश में समाजवाद’’ की जगह ‘‘संपूर्ण विश्व में समाजवाद’’ के बारे में सोचा जाना चाहिए तथा उसके लिए यथार्थवादी रणनीतियाँ बनायी जानी चाहिए। 

आकस्मिक नहीं था कि माक्र्सवाद में लोगों की रुचि नये सिरे से पैदा होने लगी, सोवियत संघ के विघटन के संदर्भ में समाजवाद पर पुनर्विचार होने लगा, सोवियत समाजवाद की ऐतिहासिक भूलों और गलतियों से सबक लेते हुए सच्चे समाजवाद की दिशा में आगे बढ़ने की बातें होने लगीं और यथार्थवाद पुनः चर्चा का विषय बन गया। यथार्थवादी लेखकों का ध्यान स्थानीय यथार्थ के साथ-साथ भूमंडलीय यथार्थ पर भी गया और जब यह स्पष्ट दिखने लगा कि स्थानीय यथार्थ भूमंडलीय यथार्थ का ही अंग है, तो समग्रता के विचार ने जोर पकड़ा और उत्तर-आधुनिकतावादी विखंडनवाद की माक्र्सवादी आलोचना ने उसकी सीमाएँ और असंगतियाँ उजाकर करना शुरू कर दिया। 

समग्रता की अवधारणा में भी इस बीच काफी बदलाव और विकास हुआ था। हालाँकि माक्र्सवादी चिंतन में पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था की जगह भविष्य की समाजवादी विश्व-व्यवस्था का विचार पहले से मौजूद था (जिसकी अभिव्यक्ति सर्वहारा अंतरराष्ट्रीयतावाद के सिद्धांत और ‘‘दुनिया के मजदूरो एक हो’’ के नारे में होती थी), लेकिन सोवियत शासन के दौरान ‘‘एक देश में समाजवाद’’ के विचार ने अंतरराष्ट्रीयतावाद की जगह राष्ट्रवाद पर अनावश्यक और ऐतिहासिक रूप से गलत जोर डालकर समग्रता की अवधारणा को सीमित कर दिया था। सोवियत संघ के विघटन और वर्तमान पूँजीवादी भूमंडलीकरण ने समग्रता की सीमित (राष्ट्रीय अथवा ‘स्थानीय’) अवधारणा को पुनः व्यापक (अंतरराष्ट्रीय अथवा ‘भूमंडलीय’) बना दिया। इस प्रकार यथार्थ को ‘स्थानीय’ से आगे बढ़ाकर ‘भूमंडलीय’ के रूप में देखना जरूरी और संभव हो गया। 

फ्रेडरिक जेमेसन ने समग्रता की ‘‘वापसी’’ के साथ-साथ यथार्थ की ‘‘व्याप्ति’’ का विचार भी फिर से प्रस्तुत किया, जिसे वे ‘माकर््िसज्म एंड फाॅर्म’ (1971) में पहले ही व्यक्त कर चुके थे। उनका कहना था कि ‘‘यथार्थवाद इतिहास के किसी खास क्षण में परिवर्तन की शक्तियों तक पहुँचने की संभावना पर निर्भर करता है।’’ हालाँकि वे भूमंडलीकरण को एक ऐसी स्थिति मानते हैं, जो इस संभावना को बाधित करती है, लेकिन उनके विचार से आज नहीं तो कल यह संभावना साकार हो सकती है। 

इसका अर्थ यह हुआ कि पूँजीवादी भूमंडलीकरण ही यथार्थ नहीं है, एक संभावना के रूप में समाजवादी भूमंडलीकरण भी यथार्थ है। यथार्थवाद की इस समझ से साहित्य की रचना में ‘‘यथार्थवादी पद्धति’’ को ही अपनाना (अर्थात् यूटोपिया, डिस्टोपिया, रूपक, फैंटेसी वगैरह को यथार्थवादी रचना के लिए त्याज्य समझना) आवश्यक नहीं रहता और यथार्थवादी रचना उन रूपों में भी की जा सकती है, जो आधुनिकतावादी माने जाने के कारण यथार्थवादियों के लिए त्याज्य समझे जाते थे। जेमेसन ने ‘‘समकालीन विश्व के थके हुए यथार्थवाद’’ की तुलना में ‘साइंस फिक्शन’ (विज्ञान कथाओं) को ‘‘अधिक विश्वसनीय सूचना लौटाकर लाने वाला’’ बताकर रचना के रूप के स्तर पर नये यथार्थवाद की संभावनाओं की ओर संकेत किया। मगर इसका मतलब न तो यह था कि वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में यथार्थवाद के सभी पुराने रूप ‘‘थके हुए यथार्थवाद’’ के रूप हो चुके हैं और न यह कि आधुनिकतावादी सभी रूप यथार्थवादी रचना के लिए स्वीकार्य हो गये हैं। हाँ, इसका यह मतलब जरूर था कि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में यथार्थवाद पुराने ढंग का यथार्थवाद नहीं, एक नये ही ढंग का यथार्थवाद होगा और होना भी चाहिए। 

जेमेसन ने यथार्थवाद पर अलग से कोई विशेष अध्ययन प्रस्तुत नहीं किया, लेकिन लगभग तीन दशकों तक अपने लेखन में जगह-जगह यथार्थवाद से संबंधित सवालों से जूझते हुए उसकी नयी संभावनाओं का पता लगाया। इसके लिए वे बार-बार जाॅर्ज लुकाच के पास गये, उनसे प्रेरित हुए, उनसे सीखा और उनसे टकराये भी; क्योंकि लुकाच ने साहित्य के रूपों और ऐतिहासिक शक्तियों के संबंध को समग्रता में देखा था और यथार्थवाद का एक सामान्य सिद्धांत निर्मित करने का प्रयास किया था। जेमेसन समग्रता की अवधारणा को जाँचने-परखने और विकसित करने के लिए रह-रहकर उसकी ओर लौटे और उन्होंने पाया कि समग्रता के आधार पर ही रचना और आलोचना में यथार्थवादी होना संभव है। 

समग्रता का अर्थ यह नहीं है कि यथार्थ में जो कुछ है, या जितना दिखता है, वह सब चित्रित कर दिया जाये। यह असंभव है और आवश्यक भी नहीं। अतः समग्रता यथार्थवादी रचना के रूप या उसकी शैली (अथवा चित्रण की पद्धति) में नहीं, बल्कि रचनाकार की दृष्टि में होती है। वह यथार्थ का चाहे एक छोटा-सा अंश ही प्रस्तुत करे--जैसे किसी एक चरित्र के रूप में--लेकिन उसकी नजर उसे समग्रता में देखने वाली होनी चाहिए। अर्थात् रचना में चित्रित यथार्थ का एक अंश संपूर्ण यथार्थ के अंश के रूप में चित्रित होना चाहिए, न कि उस संपूर्णता को खंडित करके पाये गये उसके एक अंश को ही संपूर्ण मानकर। 

उदाहरण के लिए, वर्तमान समाज या उसके किसी प्रातिनिधिक चरित्र को चित्रित करते समय रचनाकार उसके वर्तमान को तो देखता ही है, ऐतिहासिक दृष्टि से उसके अतीत और भविष्य को भी देखता है। आधुनिकतावादी तथा उत्तर-आधुनिकतावादी लोगों के लिए उस चरित्र के अतीत का कुछ अर्थ भले ही हो, उसके भविष्य का कोई अर्थ नहीं होता; क्योंकि उनके लिए भविष्य तो अनागत है और जो अभी आया ही नहीं है, जिसका अस्तित्व ही नहीं है, वह यथार्थ कैसे हो सकता है! भविष्य के बारे में सोचने, उसकी कल्पना करने, उसका कोई आदर्श सामने रखकर उसकी प्राप्ति के प्रयास करने या साहित्य में उसे चित्रित करने को वे एक ‘यूटोपिया’ (अयथार्थ, कल्पनालोक या असंभव आदर्श) मानते हैं। लेकिन लुकाच और जेमेसन दोनों यथार्थवाद को समग्रता में अर्थात् अतीत-वर्तमान-भविष्य को एक साथ ध्यान में रखने से बनी दृष्टि के रूप में देखते हैं। लुकाच ने यथार्थ के चित्रण में ‘‘समग्रता के प्रश्न की निर्णायक भूमिका’’ बतायी थी। जेमेसन ने उसमें एक नैतिक आयाम भी जोड़ा और ‘यूटोपिया’ को अयथार्थ नहीं, बल्कि यथार्थ ही मानते हुए ‘मार्क्सिज्म एंड फाॅर्म’ में कहा : 

‘‘मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य तो उस ‘यूटोपिया’ तक ही पहुँचना है, जहाँ जीवन और उसका अर्थ पुनः अविभाज्य हो जायेंगे, इसमें मनुष्य और विश्व एकमत हो जायेंगे। लेकिन यह भाषा अमूर्त है और ‘यूटोपिया’ कोई विचार नहीं, बल्कि एक ‘विजन’ (दृष्टि) है। अतः वह अमूर्त चिंतन नहीं, बल्कि स्वयं आख्यान ही है, जो समस्त ‘यूटोपियाई’ गतिविधि को प्रमाणित करने का आधार है, और महान उपन्यासकार ‘यूटोपिया’ की समस्याओं का ठोस निरूपण प्रस्तुत करते हैं।’’ 

लुकाच ने आख्यान और समग्रता के बीच का संबंध खोजा था। जेमेसन ने उस खोज को आगे बढ़ाते हुए ‘यूटोपिया’ को भावी समाजवादी विश्व-व्यवस्था के रूप में देखा और बताया कि आज जो ‘यूटोपिया’ अयथार्थ, कल्पनालोक या असंभव आदर्श लगता है, उसके भविष्य में साकार होने की संभावना को यथार्थ मानकर चलना यथार्थवादी लेखकों का एक राजनीतिक कार्यभार ही नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। 

जेमेसन ने काल की अवधारणा से जुड़े यथार्थवाद को ‘‘ऐतिहासिक यथार्थवाद’’ कहा है। इससे उनका आशय उन्नीसवीं सदी के बाल्जाक, स्काॅट, डिकेंस आदि के कथासाहित्य में पाये जाने वाले यथार्थवाद से है। जेमेसन के सामने ही नहीं, पश्चिम के प्रायः सभी माक्र्सवादी आलोचकों के सामने यह समस्या रही है कि बुर्जुआ वर्ग के सत्तारोहण के समय की क्रांतिकारी परिस्थिति में उदित हुए उस यथार्थवाद की परंपरा को वर्तमान समय में कैसे आगे बढ़ाया जाये। ‘‘ऐतिहासिक यथार्थवाद’’ के उदय के पहले तक यह माना जाता था कि सामाजिक यथार्थ का चित्रण करने वाले साहित्य का संबंध ज्ञानमीमांसा से तो है, किंतु सौंदर्यशास्त्र से नहीं। दूसरे शब्दों में, यथार्थवादी साहित्य ‘ज्ञान’ तो दे सकता है, ‘आनंद’ नहीं दे सकता। ‘‘ऐतिहासिक यथार्थवाद’’ ने दावा किया, जिसे बाल्जाक, स्काॅट, डिकेंस आदि के साहित्य ने सत्य भी सिद्ध किया कि वह निरा ज्ञानात्मक नहीं, सौंदर्यात्मक भी है। 

हिंदी में प्रेमचंद ने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की अवधारणा के जरिये तथा मुक्तिबोध ने ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान की अपनी कोटियों के जरिये यही दावा पेश किया था और अपनी रचनाओं में चरितार्थ भी किया था।

जेमेसन ने ‘दि पाॅलिटिकल अनकांशस: नैरेटिव ऐज अ सोशली सिंबाॅलिक एक्ट’ (2002) में यथार्थवाद की ज्ञानात्मक और सौंदर्यात्मक दोनों तरह की उपलब्धियों को देखा। यह मानते हुए भी कि उन्नीसवीं सदी का-सा ‘‘ऐतिहासिक यथार्थवाद’’ बीसवीं सदी के पूँजीवाद के अंतर्गत संभव नहीं है, उन्होंने उसकी परंपरा को नये रूप में आगे बढ़ाना संभव, उचित और आवश्यक बताया। उन्होंने नये यथार्थवादों के पैदा होने की संभावना बताते हुए अपने आशावाद का परिचय तो दिया ही, उत्तर-आधुनिकतावादी विखंडन के विरुद्ध समग्रता की अवधारणा में विश्वास भी व्यक्त किया। उन्होंने नये यथार्थवादों की संभावना ही नहीं, आवश्यकता भी बतायी और कहा कि आज के पूँजीवादी भूमंडलीकरण के दौर में यथार्थवाद को एक राजनीतिक लक्ष्य और कार्यक्रम के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने यथार्थवाद के नवीनीकरण की बात की और कहा कि आज का यथार्थवाद अपनी पुरानी परंपरा से बहुत कुछ ग्रहण करते हुए भी एक नया यथार्थवाद होगा। बल्कि एक नहीं, अनेक यथार्थवाद होंगे, जिनका आविष्कार किया जाना है। 

मैंने भूमंडलीय यथार्थ के बारे में तभी से सोचना शुरू कर दिया था, जब अपनी पुस्तक ‘आज का पूँजीवाद और उसका उत्तर-आधुनिकतावाद’ (1999) में संकलित निबंध लिखे थे। उसके बाद लिखे गये मेरे निबंध जैसे ‘साहित्य में फैशन और नवोन्मेष’, ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की जरूरत’, ‘रूढ़ सोच के साँचों को तोड़ना जरूरी’, ‘आगे की कहानी’, ‘हिंदी में विज्ञान कथाएँ क्यों नहीं हैं?’ इत्यादि भूमंडलीय यथार्थ को ही ध्यान में रखकर लिखे गये थे। अंततः ‘भूमंडलीय यथार्थवाद’ नामक निबंध में भूमंडलीय यथार्थवाद की मेरी अवधारणा विकसित होकर सामने आयी। (ये सभी निबंध 2008 में प्रकाशित मेरे साहित्यिक निबंधों के संग्रह ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ में संकलित हैं।) भूमंडलीय यथार्थवाद की मेरी अवधारणा संक्षेप में यह है : 

आज की दुनिया का सबसे अहम प्रश्न है: क्या पूँजीवाद की वैश्विक व्यवस्था की जगह कोई और वैश्विक किंतु बेहतर व्यवस्था संभव है? यदि हाँ, तो उसकी रूपरेखा क्या है और वह व्यवस्था किन आधारों पर, किन शक्तियों के द्वारा और किन तरीकों से बनायी जा सकती है? इस प्रश्न का उत्तर भूमंडलीय यथार्थवाद के आधार पर ही दिया जा सकता है, क्योंकि इसका उत्तर देने के लिए यह आवश्यक है कि आज की दुनिया के यथार्थ को भौगोलिक के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी देखा जाये और ऐतिहासिक दृष्टि को केवल अतीत को देखने वाली दृष्टि नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी देखने वाली ऐसी सर्जनात्मक दृष्टि मानकर चला जाये, जो आने वाले कल की बेहतर दुनिया बनाने के लिए हमें आज ही प्रेरित और सक्रिय कर सके। 

हिंदी साहित्य में यह मान्यता न जाने कब से और क्यों चली आ रही है कि यथार्थ और कल्पना परस्पर-विरोधी हैं। मेरा कहना यह है कि यथार्थवाद कल्पना का निषेध नहीं करता। सृजनशील कल्पना तो यथार्थवादी रचना के लिए अपरिहार्य है, क्योंकि वह जिस ‘यूटोपिया’ अथवा भविष्य के स्वप्न को साकार करने के लिए की जाती है, वह सृजनशील कल्पना के बिना साकार हो ही नहीं सकता--न रचना में, न यथार्थ में। कारण यह है कि यथार्थवादी रचना के लिए इतिहास का बोध, वर्तमान का अनुभव और भविष्य का स्वप्न आवश्यक है। और आवश्यक है वह परिप्रेक्ष्य, जो इन तीनों के मेल से बनता है। जाहिर है कि ऐसा यथार्थवाद--रचनाकार के जाने या अनजाने, चाहे या अनचाहे--एक समाजवादी परियोजना है, क्योंकि भविष्य का स्वप्न पूँजीवादी व्यवस्था में समाजवाद ही हो सकता है। चाहे भविष्य में उसका नाम और रूप कुछ और ही हो जाये, आज वह पूँजीवाद का निषेध है और उसके परे जाने का प्रयत्न। 

ठीक इसी कारण आज का पूँजीवाद यथार्थवाद का विरोधी है। यथार्थवाद के विकास को तरह-तरह से बाधित करना, उसे तरह-तरह से बदनाम करना, यथार्थवादियों को उपेक्षित या दंडित करना तथा तमाम प्रत्यक्ष और परोक्ष तरीकों से उनका दमन करना पूँजीवादी राजनीति का आवश्यक अंग है। 

मगर यह राजनीति अक्सर अराजनीतिक प्रतीत होने वाले रूपों में की जाती है। मसलन, यथार्थवाद की जगह अनुभववाद पर जोर देना, यूटोपिया का मजाक उड़ाना, उसे असंभव बताकर खारिज करना, भविष्य के स्वप्न देखने-दिखाने वाले यथार्थवादियों को स्वप्नजीवी, आदर्शवादी या गैर-यथार्थवादी सिद्ध करना, साहित्य को ‘‘वादमुक्त’’ तथा ‘‘राजनीति से दूर’’ रखने की सलाहें देना इत्यादि। साहित्यिक आलोचना में अराजनीति की राजनीति का सबसे घातक किंतु सबसे प्रभावशाली रूप है रचना का उत्तर-आधुनिकतावादी अथवा उत्तर-संरचनावादी पाठ। सारी दुनिया में इसका प्रचार इतने जोर-शोर से और इतने बड़े पैमाने पर किया गया है कि बहुत-से आलोचकों ने इसे सर्वथा सही मानकर अपना लिया है। लेकिन इसके विरुद्ध विवेकपूर्ण स्वर भी निरंतर सुनायी देते रहे हैं, जिन्हें ध्यान से सुना जाये, तो पता चलता है कि आज दुनिया भर में ऐसे यथार्थवादी साहित्य की जरूरत महसूस की जा रही है, जो आज के भूमंडलीय यथार्थ को समझने में ही नहीं, बल्कि बदलने में भी लोगों की मदद करे। 
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