Wednesday, January 14, 2009

नमस्कार!

नमस्कार मित्रो!
नया वर्ष आपको मुबारक हो! इस नए वर्ष में मैंने एक नया काम किया है। वह यह कि मैंने 'कथन' के सम्पादन से संन्यास लेकर उसका सम्पादन अपनी बेटी संज्ञा उपाध्याय को सौंप दिया है। आपसे गुजारिश है कि 'कथन' को अपना स्नेह और सहयोग पहले की तरह देते रहें।
यह तो आप जानते ही होंगे कि कुछ दिन पहले ज्ञानरंजन ने अपनी पत्रिका 'पहल' बंद करने की घोषणा की है। लघु पत्रिकाएँ निकलती हैं और बंद हो जाती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि यदि संभव हो, तो लघु पत्रिका को शुरू करने वाले सम्पादक की कोई ख़ास ही मजबूरी न हो, तो पत्रिका को जीवित रखने के लिए उसे किसी दूसरे योग्य सम्पादक को सौंप देना चाहिए। 'पहल' हिन्दी की एक महत्त्वपूर्ण पत्रिका थी। उसे जीवित रहना चाहिए था। अपनी इसी मान्यता के कारण मैंने सोचा कि मैं सम्पादक रहूँ या न रहूँ, 'कथन' को जीवित रहना चाहिए। आप इस विषय में क्या सोचते हैं, मुझे बताएँ।
शुभकामनाओं के साथ
आपका
रमेश उपाध्याय

15 comments:

  1. aadrniy sir
    sarvpratham blog shuru karne ke liye badhai. ummeed karte hain ki kathan ke saath saath blog par bhi aap ke vichhar padhne ko milenge. Aur kathan ko sangya ko saunp kar aapne uchit kiya hai . rakesh pragya akshitara

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  2. हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है.
    नववर्ष की आपको भी बहुत शुभकामनाऎं
    खूब लिखें, अच्छा लिखें

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  3. aap theek kahte hain, laghu patrika ko band karne ki bajay naye sampadak ko dena chahiye,pallav

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  4. रमेश भाई,
    आज ही कथन का अंक मिला और आज ही पल्लव ने आपके इस ब्लॉग की सूचना भी दी. सबसे पहले तो ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत. उम्मीद करता हूं कि यहां भी आपकी सक्रियता झण्डे गाड़ेगी.

    आज जब लोग किसी भी कीमत पर कुर्सी नहीं छोड़ना चाहते,आपने कथन की सम्पादकी छोड़ कर एक मिसाल कायम की है.लेकिन रमेश भाई, मैं इस बात को बहुत दिलचस्पी से देखूंगा कि बेटी संज्ञा कथन को कब और कैसे अपने सांचे में ढालती है. अगर उसका कथन भी रमेश का ही कथन बना रहता है तो फिर आपके सम्पादकी छोड़ने का कोई अर्थ नहीं होगा. वैसे उसने ले आउट में जो बदलाव किया है उससे परिवर्तन की आहट तो सुनाई देती है. मेरी शुभकामनाएं, और आपका हम उम्र होने के नाते आशीर्वाद भी.

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  5. हिंदी लिखाडि़यों की दुनिया में आपका स्वागत। खूब लिखे। अच्छा लिखे। हजारों शुभकामंनाएं

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  6. बहुत सुंदर...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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    1. han jee aapane thi hi kahaa hai, behatara duniya ki talash hara ek ko hopti hai. SHAYAD DUSARE GRAH PAR TO AISA HO.
      Dr. SUNIL PARIT
      KARNATAKA 08867417505

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  7. Bahut Thik likha hai aapne...aake lekhan se to mein prabhavit hoon...aapke vichar bhi saamayik hain...hindi jagat ko aise hi logon ki jaroorat hai !
    veena

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  8. ब्लाग जगत में सुंदर लेखन के साथ आपका स्वागत है। जिंदगी के किसी मोड़ पर कोई सच्चा साथी मिले, तो खुशी होती है। आपको भी इस विशाल सागर में आपकी भावनाओं को समझने वाले मित्र मिलेंगे।
    नववर्ष की आपको भी बहुत शुभकामनाऎं

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  9. माननीय रमेश जी
    नमस्‍कार
    जानकर बेहद सकून मिला कि आपने कथन की बागडौर साहित्‍य की नई पीढी को सौप दी है और आपने कथन का संपादन कर लधु पत्रिकाओं के आंदोलन को एक नई और ठोस आधारभूमि प्रदान की है. संज्ञा उसी परम्‍परा को आगे बढ़ाते हुए कथन की सार्थकता को लगातार सिद्व करती रहेगी.
    वैसे ज्ञानरंजन जी को भी ऐसा ही कुछ करना चाहिए था क्‍योंकि पहल केवल पत्रिका ही नहीं वरन एक स्‍ंस्‍थान बन चुका था और किसी भी गतिशील संस्‍थान का धूमिल होना अखरता है.
    मुझे यह भी लगता है कि कथन से मुक्‍त होकर आप रचनात्‍मक स्‍तर पर कोई बढ़ा काम करेंगें.

    नए वर्ष की शुभकामनाओं सहित

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  10. आदरणीय रमेश जी
    आपके निर्णय का स्वागत है।
    दरअसल पत्रिका को बचाये रखने के लिये ज़रूरी है कि उसके सक्रियता काल मे ही उसे व्यक्तिगत से सामूहिक मे बदल दिया जाये तभी वह दीर्घायु भी हो सकती है और गतिशील भी।
    आप ख़ुशक़िस्मत हैं कि संज्ञा साहित्य के क्षेत्र मे सक्रिय हैं । ऐसा हर एक के साथ तो सम्भव नहीं ।अगर पत्रिका व्यक्तिगत है तो उसे चलाने की तरह बन्द करने का निर्णय भी व्यक्तिगत ही होगा।
    संज्ञा पहले भी आपका सहयोग कर ही रही थीं उम्मीद है आगे भी पत्रिका को गतिमान रखने मे सफल होंगी । शुभकामनाये

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  11. रमेश उपाध्याय का चिट्ठाजगत मे स्वागत है। आप के इस मत से सहमत हूँ कि पत्रिका को बंद करने के स्थान पर उसे किसी अन्य संपादक को सोंप देना चाहिए बिना यह विचार किए कि वह उस के स्वरूप को बरकरार रख पाएगा या नहीं। पत्रिका संपादक का माध्यम है तो रूप बदलना तो निश्चित ही है।

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  12. माननीय श्री उपाध्याय जी
    सादर अभिवादन
    कथन की विस्तृत समीक्षा अब इंटरनेट पर उपलब्ध है। कृपया आपकी प्रतिक्रया से अवश्य अवगत कराएं। बेहतर दुनिया की तलाश में की समीक्षा मैंने कथा चक्र के पिछले अंकों में दी है। आपने उससे संबंधित पत्र भी दिया था। ब्लागवाणी के जिस पृष्ठ पर आपकी यह पोस्ट है उसी पर कथन के समीक्षा का विवरण भी है। भविष्य में भी पत्रिका समीक्षा के लिए इसी प्रकार भेजते रहें।
    यह ब्लाग कथा चक्र पत्रिका का पत्रिका समीक्षा खण्ड है जिसपर दुनिया भर की हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं की समीक्षा प्रकाशित करने का प्रयास कर रहा हूं आशा है आपका आत्मीय स्नेह वह सहयोग मिलता रहेगा।
    विनीत
    अखिलेश शुक्ल
    संपादक कथा चक्र
    please visit us
    http://katha-chakra.blogspot.com

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  13. युवा पर भरोसा करने के लिए शुक्रिया

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  14. I feel that every magazine like Kathan or Pahal starts with a vision which is the vision of an individual. In the course of its publication the editor tries to get the co-operation of like-minded people who can carry his vision forward.But human life has its constraints and after a certain time it does't remain possible for the editor to look after all his editorial responsibilities . Depending on the circumstances the editor may then choose to hand over the magazine to someone else or just to stop publishing it. In both the cases he has called it a day. SADASHIV SHROTRIYA

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