Saturday, October 3, 2015

प्रेम के पाठ


आज मैं 'वागर्थ' पत्रिका के सितम्बर, २०१५ के अंक में प्रकाशित अपनी कहानी 'प्रेम के पाठ' आप सबके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ. पढ़ें और अपनी राय बतायें.


हमारे जीवन का मूल मंत्र था मजे में रहना। और इसका तरीका हमने बचपन में ही सीख लिया था : थोड़ा-सा बेवकूफ (होना नहीं) दिखना। लोग आपको थोड़ा-सा बेवकूफ समझते रहें और आप मजे में रहते रहें, इसमें क्या बुराई है?

हमारे परिवार में परीक्षाओं में प्रथम आने की परंपरा थी। पिताजी हमेशा हर कक्षा में प्रथम आये थे। भाईसाहब भी उनके नक्शे-कदम पर चलते थे और वे भी हमेशा हर कक्षा में प्रथम आते थे। हमेशा हर कक्षा का मतलब है कि क्लास टेस्ट हो, तिमाही, छमाही या सालाना इम्तिहान हो, फर्स्ट ही आना है। पिताजी अपने जमाने के फर्स्ट क्लास फर्स्ट बी.ए. पास थे। भाईसाहब भी हमेशा फर्स्ट आते थे। आगे चलकर वे एम.ए. फर्स्ट क्लास और ऊपर से गोल्ड मेडलिस्ट हुए। जाहिर है कि पिताजी और भाईसाहब ने हमारे सामने अपना-अपना आदर्श प्रस्तुत करते हुए हमसे भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कहा। लेकिन हमारी जीजी के लिए प्रथम आने की कोई शर्त नहीं थी, क्योंकि उनकी पढ़ाई हाई स्कूल तक ही होनी थी, जिसके बाद उनकी शादी कर दी जाने वाली थी।

लेकिन हमेशा फर्स्ट आने का जो तरीका पिताजी और भाईसाहब ने हमें बताया, बालबुद्धि होते हुए भी हमें काफी मूर्खतापूर्ण लगा। टाइमपीस में चार बजे का अलार्म लगाकर सोओ। घंटी बजते ही उठ बैठो। उठते ही लोटा भर पानी पियो और पाखाने जाओ। लोटा भर से जरा भी कम पिया, तो पेट साफ नहीं होगा। पेट साफ नहीं हुआ, तो नींद आयेगी या सिर में दर्द होगा या यूँ ही पढ़ाई में मन नहीं लगेगा। पाखाने से निकलते ही गर्मी हो या कड़ाके की सर्दी, ठंडे पानी से नहा डालो। नहाकर साफ धुले हुए कपड़े पहनो और पढ़ने बैठ जाओ। बिस्तर पर नहीं, बाकायदा मेज-कुर्सी पर। पिताजी कहते थे, ‘‘तुम तो बड़े खुशकिस्मत हो कि मेज-कुर्सी और बिजली की रोशनी जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। हमारे जमाने में तो किरासिन की ढिबरी या लालटेन की रोशनी में जमीन पर बोरी बिछाकर पढ़ने बैठना पड़ता था।’’

हमें आदेश था कि स्कूल जाने के समय से एक घंटा पहले तक कल का पढ़ाया गया सब कुछ इस तरह दिमाग में बैठा लो कि क्लास में जो भी पूछा जाये, फौरन बता सको। जो भी सवाल दिया जाये, फटाफट हल कर सको। अब जो एक घंटा तुम्हारे पास है, उसी में तुम्हें अपना बस्ता लगाना है, नाश्ता करना है, ब्रश करना है, यूनिफॉर्म पहननी है और स्कूल पहुँचना है। स्कूल में हर पीरियड में पूरा मन लगाकर पढ़ना है, रिसेस में टिफिन खाना है, खेल के पीरियड में खेलना है। घर आकर, कपड़े बदलकर, हाथ-मुँह धोकर, खाना खाकर एक घंटे सोना है। शाम को एक घंटा खेलने जा सकते हो, पर एक घंटे से एक मिनट भी फालतू नहीं। खेलकर आने के बाद अगर गर्मियाँ हैं तो नहाकर और सर्दियाँ हैं तो हाथ-मुँह धोकर भीगे हुए बादाम चबाते हुए एक गिलास दूध पीकर होम वर्क करने बैठ जाना है। चाहे आधी रात ही क्यों न हो जाये, उसे पूरा करके ही खाना और सोना है। वैसे मन लगाकर पढ़ोगे, तो होम वर्क फटाफट निपटा सकोगे और जल्दी से खाकर जल्दी सो सकोगे। भाईसाहब इस आदेश में अंग्रेजी की एक लाइन भी जोड़ दिया करते थे, ‘‘अर्ली टु बेड एंड अर्ली टु राइज, मेक्स अ मैन हैल्दी वैल्दी एंड वाइज।’’

भाईसाहब ने पता नहीं कैसे पिताजी के नक्शे-कदम पर चलना या उनके उपदेशों पर अमल करना सीख लिया होगा! हमें तो यह अनुशासन कड़ी सजा जैसा लगा और लगा कि ऐसी जिंदगी जीने में क्या मजा। हमेशा हर कक्षा में प्रथम आना आखिर क्यों जरूरी है? फर्स्ट क्लास फर्स्ट ही क्यों? सेकेंड क्लास फर्स्ट या फर्स्ट क्लास सेकेंड में क्या बुराई है? पिताजी पुराने जमाने के हैं, इसलिए कहते हैं, ‘‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब’’। उनके जमाने में नवाब होते होंगे, अब कहाँ होते हैं। होते भी हों, तो नवाब रामपुर या नवाब धामपुर कौन बनना चाहेगा? नवाब ही बनना है, तो क्रिकेट वाले नवाब पटौदी न बनेंगे! पढ़ेंगे-लिखेंगे, पास भी अच्छे से होंगे, लेकिन फर्स्ट क्लास फर्स्ट आने के लिए की जाने वाली कठोर तपस्या नहीं करेंगे। खेलेंगे-कूदेंगे, पर खराब नहीं होंगे। होंगे नहीं, पर थोड़े-से बेवकूफ दिखेंगे और मजे में रहेंगे। जैसा किसी लोकोक्तिकार ने कहा भी है, ‘‘जो सुख चाहे जीव को, तो हौलू बनके रह!’’

अपने इस मूल मंत्र के मुताबिक हमने तय किया कि फेल नहीं होंगे, लेकिन फर्स्ट आने के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। पहली बार सेकेंड आये, तो पिताजी ने हमारे दोनों कान उमेठकर उनमें खूब सदुपदेश भरे और भाईसाहब ने रिजल्ट देखकर हमारे गाल पर एक थप्पड़ जड़ते हुए अपना आदर्श हमारे सामने रखा। कान के दर्द और गाल की चोट के अनुपात में हम कुछ ज्यादा ही जोर से रोये, ताकि अम्मा और जीजी का कोमल नारी हृदय पसीज उठे और वे हमारी रक्षा के लिए सन्नद्ध हो उठें। वैसे भी हम अम्मा के ‘पेटपोंछना’ और जीजी के दुलारे ‘छुटकू भैया’ होने के कारण दोनों के लाड़ले थे। घर में सबसे छोटे होने के कारण सबका प्यार-दुलार पाने के न्यायोचित अधिकारी भी थे ही। अतः पिताजी और भाईसाहब ने एक लिमिट में रहकर ही हम पर सख्ती बरती।

लेकिन उन्होंने हमें यह समझाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी कि हम सेकेंड आने वालों में सबसे अधिक नंबर लाये हैं, इसलिए हम में बुद्धि और प्रतिभा कम नहीं है, केवल थोड़ी मेहनत और करने की जरूरत है; फिर हमें फर्स्ट आने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन हमने अगली दो-तीन कक्षाओं में सेकेंड आना और उन दोनों ने हल्की सजा और भारी उपदेश देना जारी रखा, तो हमने अगले साल थोड़ा प्रयास किया और थर्ड आ गये। परिणाम जो होना था, हुआ। सख्त सजा मिली और पहले से भी ज्यादा वजनी उपदेश सुनने पड़े। लेकिन भविष्य में सेकेंड आते रहने का हमारा रास्ता साफ हो गया, क्योंकि थर्ड से सेकेंड आना बेहतर समझा गया। हमारे परीक्षकों ने भी हम पर दया दिखायी कि पूरे शिक्षाकाल में हमें हमेशा फर्स्ट क्लास सेकेंड आने लायक नंबर दिये और दो बार तो गोल्ड मेडल जैसा भी दिया कि दो-दो नंबर कम देकर हमारी फर्स्ट डिवीजन रोक ली।

हमारे परिवार में सब पढ़े-लिखे थे। अम्मा अंग्रेजों के जमाने की मिडिल पास थीं, पिताजी अंग्रेजों के जमाने के बी.ए. पास। भाईसाहब और जीजी भी आजादी से पहले पैदा हुए थे। एक हम ही थे, जो उसी साल पैदा हुए, जिस साल देश आजाद हुआ। कारण यह था कि भाईसाहब और जीजी की उम्र में तो दो ही साल का अंतर था, पर हम जीजी के छह साल बाद पैदा हुए थे। इस प्रकार जब हम पाँच साल के थे और पहली में पढ़ते थे, जीजी ग्यारह साल की थीं और छठी में पढ़ती थीं, जबकि भाईसाहब तेरह साल के थे और आठवीं में पढ़ते थे। पिताजी अध्यापक थे और एक इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे।

पिताजी पढ़ाने के बड़े शौकीन थे। बाहर तो पढ़ाते ही थे, घर में भी खूब पढ़ाते। उन्होंने हमें शुरू से ही प्रेम के पाठ पढ़ाये थे। उन असंख्य पाठों में से कुछ थे: अपने परमात्मा से प्रेम करो। अपने धर्म से प्रेम करो। अपनी जाति से प्रेम करो। अपनी भाषा से प्रेम करो। अपनी सभ्यता से प्रेम करो। अपनी संस्कृति से प्रेम करो। अपनी परंपराओं से प्रेम करो। अपने परिवार से प्रेम करो। अपने पड़ोसियों से प्रेम करो। अपने देश और देशवासियों से प्रेम करो। अपनी दुनिया और दुनिया भर के लोगों से प्रेम करो।

अजीब बात थी कि जिन से प्रेम करने को कहा जाता था, वे या तो अमूर्त होते थे, या पुरुष, क्योंकि स्त्रियों से प्रेम करने का कोई पाठ हमें नहीं पढ़ाया गया। स्त्रियों को हमारे यहाँ पूज्य माना जाता था, प्रेम्य नहीं। हमें शिष्टाचार के जो पाठ पढ़ाये गये थे, उनमें से एक यह था कि गुरुजन यानी बड़े तो पितातुल्य आदरणीय होते हैं--जैसे पिताजी, भाईसाहब और तमाम तरह के दादा, बाबा, चाचा, ताऊ, मामा, मौसा, शिक्षक, साधु, संत, पुजारी इत्यादि--किंतु स्त्रियाँ बड़ी हों या छोटी, सभी माता के समान पूजनीय होती हैं। ‘‘मातृवत परदारेषु’’ का अर्थ समझाते हुए पिताजी हमसे कहा करते थे कि परायी स्त्रियों को माँ के समान मानना चाहिए, अर्थात् तुम्हारी एक संभावित पत्नी को छोड़कर संसार में जितनी भी स्त्रियाँ हैं, सब माँ के समान हैं और माँ पूजनीय होती है, इसलिए वे सब भी पूजनीय हैं। वे तुमसे उम्र में बड़ी हों या छोटी, सब माँ के समान हैं।

‘‘उम्र में छोटी भी?’’ यह पूछने पर पिताजी बताते थे, ‘‘परदारा वही नहीं है, जो विवाहित होकर परायी हो चुकी है। जो कल विवाहित होकर परायी बनने वाली है, वह भी परदारा है। इसलिए उम्र में छोटी कुँवारी लड़की भी मातृवत है और पूजनीय है। वैसे ही, जैसे छोटी बहनें, सगी छोटी बहनें और अपनी बेटियाँ भी पूज्य होती हैं। राखी बँधवाते समय छोटी बहन के भी पाँव छुए जाते हैं, बेटी के विवाह के समय उसके भी पाँव छुए जाते हैं। क्यों? इसलिए कि वे भी परदारा हैं। इसीलिए उन्हें पराया धन कहा जाता है।’’

हमें याद था कि जब तक जीजी की शादी नहीं हुई थी, हम अम्मा के साथ जीजी के भी पाँव छुआ करते थे। हमारी कोई छोटी बहन तो थी नहीं, इसलिए कानपुर में ही रहने वाले हमारे मामा की बेटी माधुरी हमें राखी बाँधती थी। राखी बँधवाते समय हम उसके भी पाँव छुआ करते थे और वह नटखट हमें बड़ी-बूढ़ियों की तरह आशीर्वाद दिया करती थी। जीजी की शादी हो गयी और भाभी आ गयीं, तो हमें उनके भी पाँव छूकर प्रणाम करने को कहा गया। समझाया भी गया, ‘‘बड़ा भाई पिता के समान होता है, तो भाभी माँ के समान हुई न!’’

किशोरावस्था से निकलकर युवावस्था में प्रवेश करते समय ही हमें फिल्में देखने के साथ-साथ ‘माया’ और ‘मनोहर कहानियाँ’ नामक पत्रिकाओं में प्रेम कहानियाँ पढ़ने का चस्का लग चुका था। संक्षेप में, हम चाहने लगे थे कि हम भी किसी से प्रेम करें। लेकिन पिताजी ने ‘‘परदारेषु मातृवत’’ का पाठ पढ़ाकर हमारे लिए मानो प्रेम के सभी मार्ग बंद कर दिये थे, क्योंकि उस पाठ के अनुसार हमारी दूर भविष्य में संभावित पत्नी के अतिरिक्त संसार की समस्त स्त्रियाँ परदारा या तो थीं या भविष्य में हो जाने वाली थीं। मुहल्ले-पड़ोस की और स्कूल में हमारे साथ पढ़ने वाली वे सुंदर-सुंदर लड़कियाँ भी, जिनसे प्रेम करने को हमारा मन मचलता था, पराया धन की श्रेणी में आती थीं और ‘‘परदारेषु मातृवत’’ वाले श्लोक में ही आगे का सूत्र था ‘‘परद्रव्येषु लोष्टवत’’ अर्थात् पराये धन को ‘लोष्ट’ यानी मिट्टी के ढेले के समान मानना चाहिए। इसके अनुसार जैसे रास्ते में पड़े ढेलों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता, वैसे ही हमें लड़कियों की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए था। आखिर हम अभी विद्यार्थी थे और पिताजी द्वारा बार-बार सुनाया हुआ ‘‘काकचेष्टा वकोध्यानम्’’ वाला वह श्लोक हमें हमेशा याद रखना था, जिसके अनुसार विद्यार्थी के पाँच लक्षणों में सबसे मुख्य लक्षण यह है कि वह अपनी पढ़ाई पर (केवल कोर्स की पढ़ाई पर) ही ध्यान केंद्रित किये रखने वाला हो। मगर हम नासमझ-से दिखते हुए भी यह समझ चुके थे कि पिताजी की बातें और उनके श्लोक-फिश्लोक ‘‘सब कहने-सुनने की बातें’’ हैं, उन पर अमल-वमल करना जरूरी नहीं है।

उदाहरण हमें अपने घर में ही मिल चुके थे। नन्हे-मुन्ने कासिद के रूप में हमने जीजी के प्रेमपत्र उनके प्रेमी तक और भाईसाहब के प्रेमपत्र उनकी प्रेमिका तक पहुँचाने का काम किया था और ऐसी होशियारी से किया था कि अम्मा और पिताजी को कभी भनक भी नहीं पड़ी थी। (हमारी सेवाओं के बदले में जीजी और भाईसाहब द्वारा इनाम या रिश्वत के रूप में जो पैसे चोरी-चोरी हमें दिये जाते थे, उनसे हम चोरी-चोरी फिल्में देखकर प्रेम के पाठ पढ़ते थे।) हालाँकि जीजी की शादी उनके प्रेमी से और भाईसाहब की शादी उनकी प्रेमिका से नहीं हुई, लेकिन दोनों ने प्रेम तो किया ही न! इसलिए हमने सोच लिया था कि हम भी प्रेम करेंगे।

प्रेम करने का निश्चय करने के बाद हमारे सामने समस्या उठी कि प्रेम किस लड़की से किया जाये। हमारी देखी हुई फिल्मों और पढ़ी हुई कहानियों के अनुसार लड़की सुंदर तो होनी ही चाहिए थी, साथ ही ऐसी भरोसेमंद भी अवश्य होनी चाहिए थी, जो प्रेम-प्रसंग में गोपनीयता के महत्त्व को समझती हो। अगर उसने स्कूल में या अपने घर जाकर हमारी शिकायत कर दी, तो पिटाई निश्चित थी। बाहर पिटकर हमारे बदनाम होने की और उस बदनामी के कारण पुनः घर में पिटने की प्रबल आशंका थी। हम जानते थे कि जब पिताजी के करकमलों से हमारी पिटाई होगी, तब भाईसाहब यह भूल जायेंगे कि वे भी कभी प्रेम करते थे और हम उनके कासिद बनकर उनकी सेवा किया करते थे।

ऐसी सुंदर और भरोसेमंद प्रेमिका खोजने के लिए हमने गली-मुहल्ले की लड़कियों से लेकर स्कूल में साथ पढ़ने वाली लड़कियों तक खूब नजर दौड़ायी, पर इन दोनों गुणों से युक्त कोई लड़की नजर न आयी। जो लड़कियाँ सुंदर थीं, वे भरोसेमंद नहीं थीं। जो भरोसेमंद हो सकती थीं, वे सुंदर नहीं थीं। अंततः हमें अपनी ममेरी बहन माधुरी याद आयी, जो बहुत सुंदर थी और अपने जेबखर्च के लिए मामा-मामी से मिले पैसे कभी-कभी चोरी से हमें सिनेमा देखने के लिए दिया करती थी। मामा-मामी सिनेमा कभी-कभार ही देखते थे और बड़ी होती इकलौती लड़की को सिनेमा के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए उसे प्रायः धार्मिक फिल्में ही दिखाते थे।

माधुरी हमें सिनेमा देखने के लिए चोरी-चोरी पैसे क्यों देती थी?

बात यह थी कि तब तक भारत में टी.वी. नहीं आया था और मनोरंजन का मुख्य साधन सिनेमा या फिर रेडियो था, जिस पर रेडियो सीलोन से प्रसारित और अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला नाम का फिल्मी गानों का कार्यक्रम लड़कियों के बीच सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम था। माधुरी फिल्मों और फिल्मी गानों की दीवानी थी। वह फिल्मी गाने सुनती थी, याद करती थी और गाती-गुनगुनाती रहती थी। उन दिनों खारी बावली दिल्ली से छपी फिल्मी गानों की किताबें एक-एक आने में बिकती थीं। तब तक दशमलव प्रणाली शुरू नहीं हुई थी और बाजार से लेकर गणित की पुस्तकों तक में रुपया-आना-पाई, मन-सेर-छटाँक और गज-फुट-इंच वाला हिसाब चलता था। एक रुपये में सोलह आने होते थे और एक आने में हर फिल्म के गानों की सोलह पेजी किताब मिलती थी। वह ‘किताब’ दरअसल किसी घटिया प्रेस में बेशुमार गलतियों के साथ सस्ते अखबारी कागज पर छपा एक सोलह पेजी फर्मा होता था, जिसे किसी प्रकार की कटिंग-बाइंडिंग के बिना सिर्फ मोड़कर ‘किताब’ बना दिया जाता था। लेकिन ये किताबें बहुत बिकती थीं और बाजार में उनकी माँग हमेशा बनी रहती थी। ब्याह-शादी में गाने-बजाने की शौकीन महिलाएँ और लड़कियाँ उन्हें खरीदती थीं और सहेजकर रखती थीं। खुद बाजार जाकर फिल्मी गानों की किताबें खरीदना उनके लिए ‘‘हाय बेहया-बेशरम’’ वाली बात थी, इसलिए वे किसी बच्चे को इकन्नी-दुअन्नी पकड़ाकर बाजार दौड़ा देती थीं कि वह जाकर ‘आन’, ‘अंदाज’, ‘दीदार’, ‘अनारकली’ या ‘नया दौर’ के गाने ले आये। लड़कियों में तो नयी से नयी फिल्मों के गाने खरीदने की होड़ भी लगी रहती थी।

हमारी ममेरी बहन माधुरी जेबखर्च के लिए रोजाना मिलने वाली इकन्नी फिल्मी गानों की किताबें खरीदने और नयी फिल्मों की स्टोरी सुनने पर खर्च किया करती थी। वह जेबखर्च के लिए प्रतिदिन मामा या मामी से मिलने वाले एक आने को चटोरी लड़कियों की तरह चाट-पकौड़ी या गोलगप्पे खाने पर खर्च नहीं करती थी। (उन दिनों अधन्ने में चाट का पूरा पत्ता या दोना आता था और एक आने के आठ गोलगप्पे मिलते थे।) वह उन पैसों को बचाती थी और एक रुपया पूरा हो जाने पर चुपके से हमें थमा देती थी। वह हमसे एकाध साल ही छोटी थी और हमसे एक ही क्लास पीछे थी, लेकिन अपने घर में उसने हमारी विद्वत्ता के झंडे गाड़ रखे थे। वह स्वयं को पढ़ाई में कमजोर बताती थी और हमारे बारे में कहती थी कि हम बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। मामा-मामी ने उसके लिए ट्यूशन लगाने के बजाय हमारी मुफ्त सेवाएँ इस प्रकार ले रखी थीं कि हम छुट्टी वाले दिन आकर घंटे-दो घंटे उसे पढ़ा दिया करें। सो जब हम उसे पढ़ाने जाते, वह चुपके से एक पुड़िया में बँधी सोलह इकन्नियाँ या आठ दुअन्नियाँ या चार चवन्नियाँ या दो अठन्नियाँ हमें पकड़ा देती। उसके दिये एक रुपये में से हम सिनेमा का सेकेंड क्लास का दस आने वाला टिकट लेकर नयी फिल्म देखते थे और बाकी छह आनों की फिल्मी गानों वाली ‘किताबें’ खरीदते थे। अगली बार जब हम उसे पढ़ाने जाते, अपनी किसी किताब में छिपाकर ले जायी गयी वे ‘किताबें’ उसे दे देते और पढ़ाने के बहाने देखी हुई फिल्म की पूरी स्टोरी उसे सुना देते। वह हमारे शब्दों के सहारे अपनी कल्पना में पूरी फिल्म देख लेती, उसके संवाद याद कर लेती, उसके गानों की सिचुएशंस अच्छी तरह समझ लेती, अगले दिन स्कूल जाकर अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों पर शान से नयी फिल्म देखने का रौब जमाती और उनके खर्चे पर चाट-पकौड़ी खाकर उसकी स्टोरी उन्हें सुनाती।

इस प्रकार हम और माधुरी ममेरे-फुफेरे भाई-बहन होते हुए भी एक-दूसरे के राजदार थे और हमें लगा कि प्रेम के लिए वह उपयुक्त पात्र है। सुंदर तो है ही, भरोसेमंद भी है। हमें भी अपने घर से जेबखर्च के लिए एक आना प्रतिदिन मिलता था। हमने पाँच दिन के पाँच आने बचाये, माधुरी के लिए फिल्मी गानों की पाँच किताबें खरीदीं और चुपके से उसके हवाले करते हुए प्रेम निवेदन कर दिया।

माधुरी पहले तो हक्की-बक्की रह गयी, फिर उसकी आँखें डबडबा गयीं। टूटे-फूटे शब्दों में उसने जो कहा, उसका सार यह था कि हम बहुत अच्छे हैं, उसे बहुत अच्छे लगते हैं, फर्क यही है कि वह जो कह नहीं पा रही थी, हमने कह दिया। और कि वह हमारे प्रेम को अपना सौभाग्य मानकर स्वीकार कर लेती, मगर क्या करे, भाई-बहन का पवित्र रिश्ता बीच में आ गया। ममेरी ही सही, वह हमारी बहन है और भाई-बहन के बीच प्रेम नहीं हो सकता। उसने यह भी कहा कि काश हम लोग मुसलमान होते, जिनमें ममेरे-फुफेरे भाई-बहन में शादी हो जाती है। हमारा (और शायद अपना भी) दिल टूटने से बचाने के लिए उसने यह भी कहा कि वह भगवान से प्रार्थना करेगी कि अगले जनम में हमें फिर मिलाये, मगर हिंदू भाई-बहन न बनाये।

दिल-विल तो हमारा नहीं टूटा, लेकिन प्रेम का पहला पाठ हमने पढ़ लिया: प्रेम करने से पहले अच्छी तरह देख-भाल लेना चाहिए कि कोई पवित्र रिश्ता तो बीच में नहीं आ रहा।

जब हम नवीं कक्षा में पढ़ते थे, एक इंग्लिश टीचर स्कूल में नयी-नयी आयी थीं। वे इतनी सुंदर थीं कि उन्हें देखते ही हमें उनसे प्रेम हो गया। कक्षा में उनके आते ही हम उन्हें देखने लगते और देखते ही रह जाते। वे क्या पढ़ाती थीं, हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़ता था। वे कई बार हमसे पूछ चुकी थीं कि हम कहाँ खोये रहते हैं। लेकिन हम उनके द्वारा पूछे जाने वाले पढ़ाई से संबंधित सवालों की तरह इस सवाल का जवाब भी नहीं दे पाते थे। हम चीजों के खो जाने या उन्हें खो देने का मतलब तो जानते थे, क्योंकि हमारी चीजें अक्सर खोती रहती थीं; एक बार हम दशहरे के मेले में खुद भी खो गये थे और बड़ी मुश्किल से पाये गये थे, इसलिए भीड़ में खो जाने का मतलब भी जानते थे; लेकिन कक्षा में अपनी जगह पर बैठा-बैठा कोई कैसे खो सकता है, यह नहीं जानते थे। हम उन्हें एकटक देखते रहकर बड़ा सुख पाते थे। लेकिन यह नहीं बता सकते थे कि हम क्या पाते हैं। जानते और बातें बनाना भी जानते होते, तो शायद उनसे कहते--मैम, यह पूछिए कि हम क्या पाये रहते हैं!

एक दिन कक्षा के बाहर कहीं जाते हुए हम उन्हें अकेले में मिल गये, तो रोककर बोलीं, ‘‘तुम क्लास में मुझे घूरते क्यों रहते हो?’’

उनका सुंदर चेहरा क्रोध में ऐसा तमतमाया हुआ था कि भयभीत होकर हमने सच बोल दिया, ‘‘मैम, आप हमें बहुत अच्छी लगती हैं।’’

‘‘मतलब, तुम्हें मुझसे प्रेम हो गया है?’’

हमने पहली बार जाना कि ‘घिग्घी बँध जाना’ और ‘सिट्टी-पिट्टी भूल जाना’ क्या होता है।

तब उन्होंने वहीं खड़े-खड़े हमें समझाया कि प्रेम हो जाने वाली बात बकवास है। प्रेम होता नहीं, किया जाता है। और वह कभी भी, कहीं भी, किसी से भी नहीं किया जाता।

‘‘अभी तुम्हारी उम्र मन लगाकर पढ़ाई करने की है। बड़े हो जाओ, पढ़-लिखकर कुछ बन जाओ, तब अपने लायक कोई लड़की देखकर उससे प्रेम और विवाह कर लेना।’’ कहकर वे मुस्करायीं और हमारी पीठ थपथपाकर आगे बढ़ गयीं।

इस प्रकार हमने प्रेम का दूसरा पाठ पढ़ा: प्रेम होता नहीं, किया जाता है, उसे करने की एक उम्र होती है, उससे पहले कुछ बनना होता है, और प्रेम जो है सो विवाह के लिए किया जाता है।

उस दिन हमने अपनी इंग्लिश टीचर को ही नहीं, किसी भी स्त्री या लड़की को घूरकर न देखने की, देखकर उसे देखते ही न रह जाने की और अपनी सुध-बुध भूलकर उसी में खोये न रह जाने की कसमें खा लीं और मन लगाकर पढ़ाई करने की, पढ़-लिखकर कुछ बन जाने की और उसके बाद अपने लायक कोई लड़की देखकर उससे प्रेम और विवाह करने की प्रतिज्ञाएँ कर लीं।

हमारी कसमें न टूटें और प्रतिज्ञाएँ पूरी हों, इसका उपाय हमें यही सूझा कि स्त्रियों या लड़कियों के सामने या तो हम नीचे देखें या इधर-उधर। मगर वास्तव में हम उनकी ओर न देखते हुए भी उन्हें बहुत ध्यान से देखते थे, क्योंकि आज नहीं तो कल, हमें प्रेम और विवाह तो करना ही था और करने से पहले इन दोनों चीजों को समझना था। ममेरी बहन माधुरी ने जो पाठ हमें पढ़ाया था, उसके अनुसार हमने ‘पवित्र रिश्तों’ वाली स्त्रियों और लड़कियों को अपने अध्ययन का विषय बनाया और यह ज्ञान पाया कि उनमें से प्रायः सभी का कभी न कभी, किसी न किसी से प्रेम रहा है, लेकिन एकाध को छोड़कर किसी का भी प्रेम विवाह के रूप में सफल नहीं हुआ है।

स्कूल की पढ़ाई पूरी करके कॉलेज में आ जाने पर भी हमने लड़कियों को देखते ही नजरें झुका लेना या इधर-उधर देखने लगना जारी रखा, तो हमारे बारे में मशहूर हो गया कि हम बहुत शरमीले हैं। हमारे सहपाठी हमें बुद्धू समझते थे और समझाते थे कि लड़कियों की तरफ देखो, उनसे आँखें मिलाकर बात करो, क्योंकि उनमें से कुछ तुमसे नैना मिलाना और अँखियाँ लड़ाना चाहती हैं। मगर हम अपनी कसमों और प्रतिज्ञाओं के चलते शरमीले बने रहे। यहाँ तक कि हम पर एक चुटकुला भी बन गया कि हम फिल्म देखते समय भी, जब कोई लड़की परदे पर आती है, नीचे या इधर-उधर देखने लगते हैं।

इस प्रकार हम न तो प्रेम में अंधे हुए न पागल। हमेशा शरमीले और शरीफ कहलाये। लेकिन हमारे आसपास--सहपाठियों और शिक्षकों के बीच, मुहल्ले और पड़ोस में, नगर और प्रदेश में, देश और विदेश में--जो प्रेमलीलाएँ होती थीं, उनके समाचार-श्रोता के रूप में प्रत्यक्ष और साहित्य-पाठक के रूप में परोक्ष साक्षी बनकर प्रेम के विविध रूपों का हमारा अध्ययन बराबर जारी रहा। हम अंतरजातीय, अंतरवर्णीय, अंतरधार्मिक, अंतरप्रांतीय तथा अंतरदेशीय प्रेम विवाहों के बारे में पढ़ने, सुनने और जानने को विशेष रूप से उत्सुक रहते थे। ज्यों-ज्यों हम इस प्रकार के प्रेम और विवाह से संबंधित विभिन्न कॉमिक, रोमांचक और मार्मिक किंतु भयानक रूप से हिंसक पक्षों से परिचित होते जा रहे थे, त्यों-त्यों प्रेम हमारे लिए बड़ी और उससे भी बड़ी गुत्थी बनता जा रहा था।

प्रेम के हिंसक पक्ष हमने फिल्मों में भी देखे थे, कहानियों और उपन्यासों में भी पढ़कर जाने थे, लेकिन समाचारों और उन पर बनी सत्यकथाओं में प्रेम से संबंधित हिंसा के जो रूप हमारे सामने आते थे, बिलकुल भिन्न होते थे। फिल्मों और कहानियों में प्रेम से जुड़ी हिंसा के तीन रूप प्रचलित थे: कॉमिक, जैसे प्रेम करने वाली लड़की के दकियानूसी बाप द्वारा की जाने वाली हल्की-सी पिटाई; रोमांचक, जैसे नायक और खलनायक के बीच लड़की को लेकर होने वाली मारामारी; या मार्मिक, जैसे प्रेम में असफल रहने पर नायक-नायिका में से किसी एक की आत्महत्या से अथवा दोनों की ‘बेदर्द जमाने’ द्वारा की जाने वाली हत्या। मगर हिंसा के ये तीनों रूप अंततः मनोरंजक होते थे। इसलिए उन्हें देख-पढ़कर हम हँसें चाहे रोयें, वे हमें अच्छे लगते थे। उनसे हमें डर नहीं लगता था, बल्कि जोश आता था कि ‘‘चाहे सिर फूटे या माथा’’ हम भी प्रेम करेंगे। लेकिन समाचारों और सत्यकथाओं में प्रेम से जुड़ी हिंसा कभी प्रेम करने वाली लड़की को उसके रूढ़िवादी माता-पिता और भाई-भाभी द्वारा ही जलाकर मार डालने या काटकर घर में ही गाड़ देने के रूप में सामने आती थी; कभी जातिवादी पंचों-सरपंचों द्वारा प्रेमी-प्रेमिका दोनों को लाठियों से पीट-पीटकर या कुल्हाड़ियों से काट-काटकर या गोलियों से भून-भूनकर मार डालने के रूप में सामने आती थी; तो कभी सांप्रदायिक नेताओं द्वारा कराये गये भयानक दंगों के रूप में सामने आती थी। तब प्रेम के ये हिंसक पक्ष हमें भयानक रूप से आतंकित करने के साथ-साथ घोर घृणा से भर देते थे।

इस प्रकार हमने प्रेम का तीसरा पाठ पढ़ा: प्रेम कहानियाँ काल्पनिक होती हैं, वे मजा तो दे सकती हैं, मार्ग नहीं दिखा सकतीं; इसलिए प्रेम के इन काल्पनिक रूपों से बचकर और हिंसक रूपों से लड़कर हमें प्रेम का मार्ग स्वयं बनाना पड़ेगा।

और हमने निश्चय किया कि हम प्रेम और विवाह तो अवश्य करेंगे, लेकिन यह देखकर करेंगे कि लड़की और उसके माता-पिता या अभिभावक रूढ़िवादी, जातिवादी और संप्रदायवादी न हों। ऐसा प्रेम और विवाह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने पर ही किया जा सकता था, इसलिए हमने निश्चय किया कि पढ़ाई करके हम भाईसाहब के साथ नहीं रहेंगे (पिताजी इस बीच गुजर चुके थे), किसी दूसरे शहर में नौकरी करेंगे और वहीं रहकर प्रेम और विवाह करेंगे।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमने कानपुर में रहते हुए प्रेम के सारे रास्ते बंद कर रखे थे। हमने अपनी तरफ से बाहर जाकर किसी से प्रेम करने का रास्ता बंद कर रखा था, लेकिन बाहर से कोई हमसे प्रेम करने आये, तो उसके आ सकने का रास्ता खुला रखा था। उस रास्ते से हमारे जीवन में तीन लड़कियाँ और दो स्त्रियाँ आयीं। अर्थात् तीन भावी परदाराएँ और दो वर्तमान परदाराएँ। पाँचों एक साथ नहीं, एक-एक करके आयीं, लेकिन पाँचों ही यह घोषणा-सी करती हुई आयीं कि उन्हें ‘‘मातृवत परदारेषु’’ वाली दृष्टि से नहीं, बल्कि ‘‘मित्रवत परदारेषु’’ वाली दृष्टि से देखा जाये। मगर उनकी मित्रता कुछ नहीं, काफी अजीब थी।

एक मामले में वह मित्रता जब तक शादी नहीं हो जाती, तब तक की वक्तकटी या मौज-मस्ती थी।

दूसरे मामले में वह मित्रता स्वयं अपना वर खोजकर स्वयंवर रचाने निकली आधुनिका की तलाश थी।

तीसरे मामले में वह मित्रता धोखा दे भागे पूर्व प्रेमी के विरुद्ध हमें सच्चा प्रेमी बनाने की चुनौती थी।

चौथे मामले में वह मित्रता परदेस में रह रहे पति के अभाव में देह की भूख मिटाने की कोशिश थी।

पाँचवें मामले में वह मित्रता पति की नपुंसकता के कारण सूनी गोद को संतान से भर देने की करुण पुकार थी।

हम तब भी नहीं जानते थे और आज भी नहीं जानते--शायद भविष्य में भी कभी नहीं जान पायेंगे--कि प्रेम वास्तव में क्या होता है। मगर यह जानने में हमने देर नहीं लगायी कि यह और जो भी हो, प्रेम नहीं है। इसलिए हम ऐसे प्रेम को हमेशा हाथ जोड़कर विदा करते रहे। इसमें हमारे हौलूपन का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

जब हम एम.ए. में पढ़ रहे थे और भाईसाहब की इच्छा के विरुद्ध अंग्रेजी भाषा और साहित्य की जगह हिंदी भाषा और साहित्य पढ़ रहे थे, तब एक दिन अचानक हमने पाया कि हम प्रेम के कवि हैं। हुआ यह कि कॉलेज की वार्षिक पत्रिका के लिए छात्रों से रचनाएँ माँगी गयीं, तो हमने ‘यह तो प्रेम नहीं’ शीर्षक से पाँच खंडों वाली एक कविता लिखी और उन प्रोफेसर साहब के पास ले गये, जो पत्रिका के हिंदी खंड के संपादक थे। वे हिंदी के प्रोफेसर ही नहीं, साहित्यकार भी थे। जिस समय हम उनके पास गये, कॉलेज में छुट्टी होने का समय था और वे स्टाफ रूम में अकेले बैठे छात्रों की रचनाएँ पढ़ रहे थे। वे हमें पढ़ाते थे, जानते थे और अच्छा विद्यार्थी मानते थे। उन्होंने सरसरी नजर से हमारी कविता देखी और कहा, ‘‘बैठो।’’

स्टाफ रूम में छात्र जा तो सकते थे, शिक्षकों से बातचीत भी कर सकते थे, लेकिन खड़े-खड़े ही। इसलिए हम बैठने का आदेश पाकर भी खड़े ही रहे। उन्होंने फिर बैठने के लिए कहा, तो हम सकुचाते हुए उनसे कुछ हटकर उसी सोफे पर बैठ गये, जिस पर वे बैठे थे। उन्हांेने हमारी कविता ध्यान से पढ़ी और पूछा, ‘‘प्रेम किया है?’’

‘‘जी, नहीं।’’ हमने दोटूक उत्तर दिया।

‘‘और प्रेम पर कविता लिखते हो!’’ उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा।

‘‘यह कविता प्रेम पर नहीं है, सर!’’ हमने विनम्र किंतु मजबूत स्वर में कहा, ‘‘इसका शीर्षक ही है ‘यह तो प्रेम नहीं’।’’

‘‘जो प्रेम नहीं है, उसे वही कहो, जो वह है।’’ हमें लगा कि हमारी कविता अस्वीकृत हो गयी, लेकिन उन्होंने कहा, ‘‘लो, इसे ले जाओ। यह एक कविता नहीं, पाँच अलग-अलग कविताएँ हैं। इनके अलग-अलग शीर्षक दो। सोचो कि जो प्रेम नहीं है, वह क्या है। उसे वही नाम दो, जो वह वास्तव में है।’’

हम कविता लेकर उठने लगे, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी ये कविताएँ तो हम कॉलेज की पत्रिका में छाप देंगे। लेकिन तुम कुछ ऐसी कविताएँ लिखो, जिनमें प्रेम हो और जिन्हें प्रेम की कविताएँ कहा जा सके। अच्छी होंगी, तो उन्हें हम किसी साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित करायेंगे।’’

हमने उस कविता की पाँच कविताएँ तो बनायीं, लेकिन शीर्षक एक ही रखा--‘प्रवंचना: पाँच कविताएँ’। उनके शीर्षक हमने अलग-अलग रखे: प्रवंचना-1, प्रवंचना-2, प्रवचंना-3 इत्यादि। यह काम आसानी से हो गया, लेकिन प्रेम कविताएँ लिखने में बड़ी मुश्किल पड़ी। अंततः हमने ‘मूर्खता-1’ और ‘मूर्खता-2’ शीर्षक से दो कविताएँ लिखीं। पहली कविता हमने अपनी ममेरी बहन से प्रेम निवेदन करने की मूर्खता पर लिखी और दूसरी अपनी इंग्लिश टीचर को सुध-बुध भूलकर एकटक देखते रहने की मूर्खता पर।

साहित्यकार प्रोफेसर हमारे दोनों कारनामों से खुश हुए। उन्होंने हमारी पहली पाँच कविताएँ कॉलेज मैगजीन में छापीं और दूसरी दो कानपुर से ही निकलने वाली एक साहित्यिक पत्रिका में छपवायीं। आश्चर्य कि उन दो कविताओं के छपते ही हम प्रेम के कवि मान लिये गये।

इस प्रकार हमने प्रेम का चौथा पाठ पढ़ा: प्रेम के नाम पर ऐसा बहुत कुछ होता है, जो प्रेम नहीं होता और प्रेम मूर्खता कहलाने पर भी प्रेम ही रहता है।

एम.ए. फाइनल में हमारे साहित्यकार प्रोफेसर हमें मध्यकालीन काव्य और उसका इतिहास पढ़ाते थे। जब से उन्होंने हमारी कविताएँ प्रकाशित करायी थीं, हम उन्हें अपना साहित्यिक गुरु मानने लगे थे। वे प्रगतिवादी माने जाते थे, लेकिन हमें वे खासे परंपरावादी लगते थे। हम से कहते थे, ‘‘अच्छे कवि बनना चाहते हो, तो मध्यकालीन काव्य को ध्यान से पढ़ो। रीतिकाल और भक्तिकाल की कविता को समझे बिना तुम न तो हिंदी कविता को समझ सकते हो, न हिंदी में अच्छी कविता लिख सकते हो--खासकर प्रेम कविता--क्योंकि प्रेम और प्रेम कविता के अच्छे-बुरे तमाम तरह के रूप तुम्हें उसी में मिलेंगे, जिनसे तुम यह सीख सकते हो कि अच्छी प्रेम कविता क्या होती है। और देखो, एम.ए. के पाठ्यक्रम में जितना रीतिकालीन और भक्तिकालीन काव्य लगा हुआ है, उतना ही पढ़ने से दूसरे छात्रों का काम शायद चल जाये, तुम्हारा चलने वाला नहीं है। इसलिए उसे विस्तार से और गहराई से पढ़ो। उसके साथ-साथ उस समय के इतिहास को भी पढ़ो। वह जिन भाषाओं में लिखा गया है, उनके विकास और ह्रास को भी पढ़ो। इसके लिए तुम्हें एक तरफ संस्कृत की तरफ जाकर हिंदी तक आना पड़ेगा और दूसरी तरफ अरबी-फारसी की तरफ जाकर उर्दू तक आना पड़ेगा। और यह काम एक-दो या दस-बीस साल का नहीं, जिंदगी भर का काम है। बड़ा काम है। बोलो, करना चाहोगे?’’

‘‘चाहें, तो क्या कर पायेंगे?’’ हमने डरते-डरते पूछा।

‘‘मन से चाहोगे, तो कर पाओगे।’’

‘‘तो बताइए, कहाँ से शुरू करें?’’

‘‘उर्दू आती है?’’ उन्होंने पूछा, लेकिन अगले ही क्षण शायद हमारी पारिवारिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर बोले, ‘‘कहाँ से आती होगी! लेकिन उर्दू सीखना ज्यादा मुश्किल नहीं है। जल्दी सीख जाओगे। हम अपने एक मित्र का पता तुमको देते हैं। उनके पास चले जाओ। वे उर्दू साहित्य के जानकार ही नहीं, खुद भी उर्दू के शायर हैं। उनको उस्ताद बनाकर उर्दू शायरी पढ़ोगे, तो हिंदी में अच्छी प्रेम कविता लिखना अपने-आप सीख जाओगे।’’

उनके दिये पते पर कॉमरेड अंसारी को खोजते हुए हम जहाँ पहुँचे, वह कानपुर का एक ऐसा इलाका था, जो हमने अभी तक नहीं देखा था। वह औद्योगिक क्षेत्र की एक मजदूर बस्ती थी।

कॉमरेड अंसारी ने हमारा परिचय पाकर स्वागत करते हुए कहा, ‘‘अहा, आ गये आप! आपके प्रोफेसर साहब ने फोन पर हमें बता दिया था कि आप आयेंगे। कहिए, पहले कभी आप इस तरफ आये हैं?’’

‘‘जी, नहीं।’’

‘‘ठीक तो है!’’ कॉमरेड अंसारी व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ बोले, ‘‘आप उस कानपुर में रहते हैं, जो इस कानपुर की तरफ कम ही आता है।’’

फिर उन्होंने बताया कि यह एक मजदूर बस्ती है, जो तब बसी थी, जब कानपुर एक बड़ा औद्योगिक शहर बना था; जब कानपुर में एक जबर्दस्त मजदूर संगठन और आंदोलन हुआ करता था; जब कानपुर में रहने वाले गरीब और दूर-पास गाँवों-कस्बों के भूमिहीन किसान और कारीगर पहली बार कारखानों के मजदूर बने थे; जब हर धर्म और हर जाति के लोगों ने मिलकर मजदूर आंदोलन खड़ा किया था और सर्वहारा वर्ग की शुरुआती लड़ाइयाँ लड़ी थीं। यों कानपुर अब भी एक औद्योगिक शहर है और यहाँ ऐसी कई मजदूर बस्तियाँ हैं, मगर वह आंदोलन इतिहास बन गया है, जो शहर के दूसरे हिस्सों को ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों को भी प्रभावित करके अपने होने का अहसास कराया करता था।

कॉमरेड अंसारी उस बस्ती के एक पुराने मगर बड़े-से मकान में रहने वाले संपन्न बुजुर्ग थे। पेशे से वकील थे और सिर्फ मजदूरों के मुकद्दमे लड़ते थे। उनकी बेटियों की शादियाँ हो चुकी थीं और बेटों ने दूसरे शहरों में अपने घर बसा लिये थे। वे खुद यहाँ अपनी बेगम, एक नौकर, एक नौकरानी और अपने दफ्तर के एक सहायक के साथ रहते थे। वकालत अब ज्यादा नहीं चलती थी, फिर भी गुजर-बसर हो रही थी। फालतू वक्त काफी बचता था, सो उसमें वे पढ़ने और लिखने का काम करते थे।

अपने बारे में विस्तार से बताकर उन्होंने हमारे बारे में, हमारी पढ़ाई-लिखाई के बारे में, हमारे घर-परिवार के बारे में और अंततः हमारे कविता लिखने के बारे में पूछा।

शायद हमारे द्वारा दी गयी जानकारी से संतुष्ट होकर उन्होंने कहा, ‘‘आप प्रेम की कविता लिखना चाहते हैं, तो प्रेम कीजिए। करते हैं? अभी नहीं? कोई बात नहीं, हम उस प्रेम की बात कर भी नहीं रहे। हम उस प्रेम की बात कर रहे हैं, जो खुद से किया जाता है; जो हमें अपनी खुदी से मिलाता है और बेखुदी तक ले जाता है। खुदी के बारे में इकबाल का शेर आपने सुना होगा--‘खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।’ खुदी को बुलंद करने का मतलब है खुद को इतना बड़ा बना लेना कि आप सारी दुनिया से, सारी कायनात से प्यार कर सकें। मगर इसका मतलब खुदा बन जाना या खुद को खुदा समझने लगना नहीं है। खुदा कौन है, क्या है, आप यह जानने के चक्कर में न पड़ें। उसे न कोई जान सका है, न जान ही सकता है। जिस चीज को आप जानते नहीं और जान भी नहीं सकते, वह चीज आप कैसे बन सकते हैं? बन नहीं सकते और फिर भी समझते हैं कि आप वह हैं, तो समझिए कि आप से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं। खुदी को बुलंद करने का मतलब अहंकार नहीं है, खुद को औरों से या सबसे बड़ा समझने लगना नहीं है; बल्कि खुद को ऐसी ऊँचाई तक ले जाना है, जहाँ से आप सारी कायनात को देख सकें, उसे बाँहों में लेकर उससे प्यार कर सकें। जो वहाँ पहुँच जाता है, वह खुद को भूल जाता है। यही बेखुदी है। और दुनिया भर की अच्छी प्रेम कविता इसी बेखुदी के आलम में लिखी गयी है।’’

इस प्रकार हमने प्रेम का पाँचवाँ पाठ पढ़ा। लेकिन वह ऐसा निकला कि खत्म ही नहीं होता। उसे हम आज तक पढ़ रहे हैं और शायद ताउम्र पढ़ते ही रहेंगे।

--रमेश उपाध्याय 

Friday, May 1, 2015

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ

'बेहतर दुनिया की तलाश' पर आज प्रस्तुत है मेरा लेख 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ'। यह लेख प्रसिद्ध पत्रिका 'नवनीत के मई, 2015  के अंक की आवरण कथा 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे' के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है, जिसमें मेरे लेख के अलावा संपादक विश्वनाथ सचदेव, प्रियंवद, न्यायमूर्ति चंद्रशेखर धर्माधिकारी और रमेश नैयर के लेख भी हैं. --रमेश उपाध्याय


मैं साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में भी सक्रिय रहा हूँ। तीनों क्षेत्रों में मैंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न का सामना किया है। आम तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ‘‘बोलने की आजादी’’ के रूप में समझा जाता है, लेकिन वह सिर्फ बोलने की आजादी नहीं, उसमें और भी कई चीजें आती हैं। भाषण या वक्तव्य देने से लेकर लिखने और पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित करने, चित्र और व्यंग्य चित्र बनाकर उन्हें प्रदर्शित और प्रकाशित करने, नाटक और नुक्कड़ नाटक लिखने-करने, डॉक्यूमेंटरी और फीचर फिल्में बनाने-दिखाने, रेडियो और टेलीविजन के कार्यक्रम प्रस्तुत करने, सार्वजनिक मंच या सोशल मीडिया पर दूसरों से सहमत-असहमत होते या मतभेद और विरोध प्रकट करते हुए अपने विचार व्यक्त करने, सड़कों पर जुलूस निकालने और नारे लगाने, धरना-प्रदर्शन और घेराव-हड़ताल करने, साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन चलाकर और सामाजिक-राजनीतिक संगठन बनाकर मनुष्य को बेहतर मनुष्य तथा दुनिया को बेहतर दुनिया बनाने तक के विभिन्न काम करने की स्वतंत्रता। 


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस व्यापक अर्थ में समझने पर ही उसके दमन या हनन और उसे प्राप्त करने के लिए किये जाने वाले संघर्ष का अर्थ समझ में आता है। 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजंेसी और सेंसरशिप लगाकर केवल प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध नहीं लगाया था। उन्होंने उसके जरिये नागरिक स्वतंत्रताओं और जनता के जनवादी अधिकारों का हनन भी किया था। वह इमरजेंसी तो 1977 में हट गयी, लेकिन एक अघोषित इमरजेंसी और सेंसरशिप अब भी लगी हुई है, जो उत्तरोत्तर सघन होती जा रही है। उसके अंतर्गत कभी कानून बनाकर और अक्सर गैर-कानूनी तरीकों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन और हनन किया जाता है।

कानून बनाकर ऐसा करने का उदाहरण है 2008 में भारत सरकार द्वारा सन् 2000 के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में धारा 66-ए को जोड़ा जाना (जिसे अभी मार्च, 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाया गया अनुचित अंकुश मानकर निरस्त किया है)। इस धारा के अनुसार पुलिस को यह अधिकार था कि वह चाहे जिस अभिव्यक्ति को अपराध मानकर दमनात्मक कार्रवाई कर सके। उदाहरण के लिए, फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखने वाली लड़की को ही नहीं, उस टिप्पणी को ‘लाइक’ करने वाली एक दूसरी लड़की को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा को निरस्त कर दिया, बहुत अच्छा किया।

लेकिन गैर-कानूनी तरीकों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो दमन और हनन किया जाता है, उसका क्या? पिछले काफी समय से धार्मिक या सांप्रदायिक आधारों पर बने विभिन्न प्रकार के लोगों के समूह और संगठन लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, अखबारों और टी.वी. चैनलों के दफ्तरों आदि पर लगातार और उत्तरोत्तर बड़ी संख्या में हमले कर रहे हैं। यह एक प्रकार की अघोषित इमरजेंसी और नितांत गैर-कानूनी, बल्कि आपराधिक किस्म की सेंसरशिप है, जिससे किसी लेखक-पत्रकार को खामोश कर दिया जाता है, किसी अखबार या टी.वी. चैनल का स्वर बदल दिया जाता है, किसी कलाकार को देश छोड़कर दूसरे देश में जा बसने को मजबूर कर दिया जाता है, किसी सामाजिक या राजनीतिक कार्यकर्ता को जान से मार दिया जाता है, तो किसी साहित्यकार को जीते-जी अपनी साहित्यिक मृत्यु की घोषणा करने के लिए बाध्य कर दिया जाता है। इस इमरजेंसी और इस सेंसरशिप के रहते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाता है?

इंदिरा गांधी द्वारा थोपी गयी इमरजेंसी का विरोध करने वाले लोगों के बीच हिंदी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ की ये पंक्तियाँ बहुत लोकप्रिय हुई थीं :

अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे।
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।

अब फिर से ये पंक्तियाँ दोहरायी जाने लगी हैं, तो एक प्रकार से यह अच्छी ही बात है। लेकिन मुझे लगता है कि इन पंक्तियों का वास्तविक अर्थ न तब समझा गया था, न अब समझा जा रहा है। मुझे याद है कि इमरजेंसी के दौरान इन पंक्तियों को अक्सर दोहराने वाले एक पत्रकार मित्र से मैंने पूछा था कि ‘‘अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने’’ और ‘‘मठ और गढ़ सब तोड़ने’’ का क्या अर्थ है। उनका उत्तर था, ‘‘प्रेस की आजादी के लिए हम सारे खतरे उठाकर भी लड़ेंगे’’ और ‘‘जिस सरकार ने यह इमरजेंसी लगायी है, उसे बदलकर रख देंगे’’। सीमित अर्थों में उनका उत्तर सही था, लेकिन मैं उससे संतुष्ट नहीं था। एक दिन मैंने उन्हें मुक्तिबोध की पूरी कविता सुनाकर पूछा कि इसमें जो ‘‘रक्तालोक स्नात-पुरुष’’ है, जिसे मुक्तिबोध ने ‘‘रहस्यमय व्यक्ति’’ कहा है, उसे ध्यान में रखते हुए बताइए कि कविता की इन पंक्तियों का क्या अर्थ है :

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है,
पूर्ण अवस्था वह
निज-संभावनाओं, निहित प्रभाओं, प्रतिभाओं की
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा।

पत्रकार मित्र बेचारे क्या बताते! मैं तीन दशकों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी का प्राध्यापक रहा हूँ और मैंने हिंदी के कई प्रख्यात प्रोफेसरों तथा अग्रणी आलोचकों को इस कविता का अनर्थ करते देखा है। यहाँ कविता की व्याख्या करने का अवकाश नहीं है, इसलिए मैं संक्षेप में और संकेत में कहना चाहता हूँ कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल ‘‘बोलने की आजादी’’ या ‘‘प्रेस की आजादी’’ नहीं, कुछ और है। उसका वास्तविक अर्थ मनुष्य को अभी तक प्राप्त अभिव्यक्ति की क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि ‘‘अब तक न पायी गयी’’ अभिव्यक्ति की क्षमता के आधार पर ही समझा जा सकता है।

मेरे विचार से मुक्तिबोध यह कहना चाहते हैं कि मनुष्य अब तक अपनी संपूर्ण प्रगति और उन्नति के बावजूद पूर्ण मनुष्य नहीं बन पाया है, जबकि उसके जीवन का उद्देश्य पूर्ण मनुष्य बनना ही है। मनुष्यता की पूर्ण अवस्था वह है, जिसमें मनुष्य की अपनी संभावनाओं का, उसमें ‘‘निहित प्रभाओं, प्रतिभाओं’’ का ‘‘परिपूर्ण आविर्भाव’’ हो। जब तक ऐसा नहीं है, तब तक मनुष्य अपूर्ण है, आधा-अधूरा है, उसकी अभिव्यक्ति भी आधी-अधूरी है; क्योंकि वह अपूर्ण मनुष्य होने के कारण अपनी मनुष्यता की पूर्ण अभिव्यक्ति में सक्षम नहीं है। वर्तमान समाज और राज्य की व्यवस्था में मनुष्य को अभिव्यक्ति की जो क्षमता प्राप्त है, वह अपूर्ण है, अविकसित है। वह भविष्य की किसी बेहतर व्यवस्था में ही पूर्ण रूप से विकसित होगी। मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति में तभी स्वतंत्र होगा, जब वह पूर्ण मनुष्य बनकर अपनी ‘‘अब तक न पायी गयी अभिव्यक्ति’’ को प्राप्त कर लेगा।

इस प्रकार देखें, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है मनुष्य का मनुष्य होना और अपनी मनुष्यता को व्यक्त करने में सक्षम होना। लेकिन जो भूखा है, बीमार है, अशिक्षित है, बेरोजगार है, हर तरह से लाचार है और पशुओं का-सा जीवन जीता है, उसे आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दे भी दें, तो वह उसका क्या करेगा? वह स्वयं को व्यक्त करना चाहे और कर भी सके, तो क्या व्यक्त करेगा? कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे आदमी को देखते हैं, जो बेघर और बेरोजगार है, जो माँगकर या चुराकर या छीनकर या कूड़े-कचरे में से कुछ बीनकर खाता है। आप उसके पास जाते हैं और कहते हैं कि ‘‘तुझे बोलने की आजादी है, बोल, क्या बोलना है तुझे’’, तो वह क्या बोलेगा? बहुत मुमकिन है कि वह आपसे भीख माँगेगा और भीख न मिलने पर गंदी गालियों से आपको नवाजेगा।

दुर्भाग्य से हमारे देश में, और आज की पूरी दुनिया में भी, ऐसे ही अमानुषिक बना दिये गये लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसी अनुपात में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या मनुष्यता की अभिव्यक्ति सबसे कम है। जो मनुष्य पशुवत जीवन जी रहा है, वह अपनी मनुष्यता की अभिव्यक्ति कैसे करेगा? वह तो पशुता को ही व्यक्त करेगा। अतः उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने का अर्थ है पहले उसे पशु से मनुष्य बनाना और फिर उसे अपनी मनुष्यता की अभिव्यक्ति में सक्षम बनाते हुए पूर्ण मनुष्यता की ओर ले जाना। यह काम आज की पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था नहीं कर सकती, क्योंकि वही तो मनुष्यों को ऐसा अमानुषिक बनाती है। अतः यह हमारी, हम सबकी, जिम्मेदारी है। भाग्य, भगवान, सरकार या खुद उस अभागे पर यह जिम्मेदारी डालकर हम अपनी अभिव्यक्ति में स्वतंत्र होकर भी वास्तव में क्या व्यक्त करते हैं? कम से कम मनुष्यता तो नहीं ही!

दूसरी तरफ उन लोगों को देखें, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सबकी नहीं, सिर्फ अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में देखते हैं। उन्हें लगता है कि जो हम जैसा नहीं है, वह मनुष्य नहीं है। जो हमारे धर्म का, हमारी जाति का, हमारी पार्टी का या हमारे विचारों का नहीं है, वह कोई मानवेतर प्राणी है, जो हमारा शत्रु है, और हमारा यह अधिकार है कि हम उसे या तो अपने वश में करके अपना गुलाम या पालतू पशु बना लें, या उसे मार डालें। आजकल अपने देश में, और दूसरे तमाम देशों में भी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यही रूप होता जा रहा है और इसकी भयानकता बढ़ती ही जा रही है। इसे हम सरेआम बरती और फैलायी जाने वाली घृणा, असहिष्णुता, हिंसा, बर्बरता, आतंकवाद आदि के विभिन्न रूपों में रोज देखते हैं। ऐसे लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समझाना और उन्हें उनकी मनुष्यता की याद दिलाकर अमानुषिक कृत्यों से विरत करना भी हमारी, हम सबकी, जिम्मेदारी है। उन्हें मनुष्य बनाने की जिम्मेदारी हम उन व्यवस्थाओं पर नहीं डाल सकते, जो खुद ही उन्हें अमानुषिक, नृशंस और बर्बर बनाने के लिए जिम्मेदार हैं।

मेरे विचार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है स्वयं अपनी मनुष्यता को बचाते और बढ़ाते हुए दूसरों को मनुष्य बनाना। यह एक आदर्श है, किंतु असंभव आदर्श नहीं। खोजने चलें, तो हमें आज की घोर अमानुषिक परिस्थितियों में भी मनुष्यता के उदाहरण मिल जायेंगे। मसलन, आप उन लोगों को देखें, जो शिक्षित हैं, सुसंस्कृत हैं, सृजनशील हैं, सभ्य और शिष्ट हैं, उदार और सहिष्णु हैं और जो घर-बाहर दोनों जगह आजादी, बराबरी और भाईचारे के जनतांत्रिक मूल्यों के अनुसार आचरण करते हैं। ऐसे लोग दुर्लभ नहीं हैं। खोजने चलेंगे, तो आप पायेंगे कि आपके आसपास ही ऐसे अनेक लोग हैं, जो आपके धर्म, आपकी जाति या आपकी-सी राजनीति वाले न होकर भी आपको मनुष्य मानते हैं। आप पायेंगे कि वे आपसे अपनी भिन्नता के आधार पर आपको अपने वश में करके अपना गुलाम या पालतू पशु बनाना अथवा ऐसा न कर पाने पर आपको मार डालना कत्तई न चाहते होंगे। वे ‘‘सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट’’ की जगह सब मनुष्यों को समान मानकर ‘‘जियो और जीने दो’’ वाली बात में, ‘‘मारो-खाओ हाथ न आओ’’ की जगह ‘‘दुनिया को बेहतर बनाओ’’ वाली बात में और ‘‘सबसे बड़ा रुपैया’’ की जगह ‘‘प्रेेम से बढ़कर कुछ नहीं’’ वाली बात में विश्वास करते होंगे। वे दूसरों में दोष और बुराइयाँ ही नहीं, गुण और अच्छाइयाँ भी देखते होंगे। हर बुराई या खराबी के लिए समाज या सरकार को जिम्मेदार ठहराने की जगह कुछ बुराइयों और खराबियों के लिए खुद को भी जिम्मेदार मानते होंगे। वे समाज या राज्य की व्यवस्था को डंडे के जोर पर ठीक कर सकने वाले किसी तानाशाह को देश का शासक बनाने वाली बात की जगह जनतंत्र को सच्चा जनतंत्र बनाने तथा उसे बचाने-बढ़ाने वाली बात में विश्वास करते होंगे।

आप पायेंगे कि आपके आसपास ऐसे लोग हैं और वे कम नहीं हैं। विश्वास न हो, तो उन लोगों को देखें, जिन्हें अपने परिजनों से स्नेह और गुरुजनों से प्रोत्साहन मिला है। जिन्हें अच्छे मित्रों का साथ और सहयोग प्राप्त है। जिन्होंने प्रेम किया है और प्रेम पाया है। जो ज्ञान-विज्ञान में निपुण और साहित्य-संगीत आदि के प्रेमी हैं। जिनके विचार ऊँचे और सामाजिक सरोकार बड़े हैं। जो स्वहित के साथ सर्वहित के लिए भी सक्रिय रहते हैं। जो अपने भविष्य के साथ-साथ अपने पड़ोसियों और देशवासियों के भविष्य के बारे में भी सोचते हैं। जो स्वयं को पूर्ण मनुष्य बनाने के साथ-साथ दुनिया के सभी मनुष्यों को पूर्ण मनुष्य बनाने का स्वप्न देखते हैं और उस स्वप्न को साकार करने के लिए अभिव्यक्ति की जो भी और जैसी भी स्वतंत्रता उन्हें प्राप्त है, उसका सदुपयोग करते हैं।

ऐसे लोग बोलेंगे, तो क्या बोलेंगे? वे एक तरफ मनुष्यों को अमानुषिक बनाने वाली व्यवस्था की आलोचना करेंगे, तो दूसरी तरफ अमानुषिक बना दिये गये लोगों को याद दिलायेंगे कि तुम्हें तुम्हारी मनुष्यता से वंचित कर दिया गया है, या पूर्ण मनुष्य बनने से रोक दिया गया है, इसलिए इस व्यवस्था को बनाये रखने के बजाय इसे बदलो। इस दुनिया को एक बेहतर दुनिया बनाओ।

लेकिन स्थापित व्यवस्थाएँ, चाहे वे किसी भी देश की हों, ऐसी स्वतंत्र अभिव्यक्ति को अपने लिए खतरनाक मानती हैं और उसका दमन करती हैं। ऐसी स्वतंत्र अभिव्यक्ति से उनके वे सब मठ और गढ़ असुरक्षित हो जाते हैं, जिनमें बैठकर वे मनुष्यों को अमानुषिक, गुलाम या पालतू पशु बनाती हैं। वे उनकी रक्षा के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन और हनन और तेजी से करती हैं। इससे अभिव्यक्ति के लिए जो खतरे पैदा होते हैं, एक नहीं अनेक होते हैं। इसीलिए मुक्तिबोध ‘‘सारे खतरे’’ उठाने की बात करते हैं। स्थापित व्यवस्था के मठ और गढ़ भी अनेक और कई प्रकार के होते हैं। इसीलिए मुक्तिबोध उन ‘‘सब’’ को तोड़ने की बात करते हैं।
इस प्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है ऐसी बात बोलना, जिससे बोलने वाले की मनुष्यता व्यक्त होती हो और उसके साथ-साथ दुनिया के सभी मनुष्यों के लिए ‘‘अब तक न पायी गयी अभिव्यक्ति’’ को पाने की संभावना पैदा होती हो।

Sunday, March 15, 2015

'परिकथा' के नवलेखन अंक (जनवरी-फरवरी, 2015) में प्रकाशित कुछ कहानियों के संदर्भ में आज की हिंदी कहानी पर कुछ विचार


हिंदी कहानी में फिर एक नया बदलाव

रमेश उपाध्याय


दस साल पहले, 2005 में, मैंने एक लेख लिखा था ‘आगे की कहानी’, जो मेरी पुस्तक ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ (2008) में संकलित है। उसमें मैंने लिखा था :

देखते-देखते कहानी क्या, दुनिया ही बदल गयी। पूँजीवादी भूमंडलीकरण की प्रचंड आँधी पहले का बहुत कुछ उड़ा ले गयी। यहाँ तक कि सोवियत संघ जैसी ‘महाशक्ति’ भी उसमें ध्वस्त हो गयी और आत्मनिर्भरता की बात करने वाले हमारे देश में निजीकरण तथा उदारीकरण की तेज धूल भरी हवाएँ चलने लगीं, जिनके कारण समाजवाद का सपना तो धूमिल हुआ ही, जनवाद को भी बेकार बताने और बनाने के सिलसिले शुरू हो गये। ‘जनवादी कहानी’ साहित्य में ‘आउट ऑफ फैशन’ हो गयी और ‘जादुई यथार्थवाद’ का नया फैशन चल पड़ा।

ऐसा लगने लगा, जैसे कल तक जो सामाजिक यथार्थ कहानी में आ रहा था, वह किसी जादू के जोर से अचानक गायब हो गया हो! जैसे भूख, गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी, शोषण, दमन, उत्पीड़न आदि की समस्याएँ छूमंतर हो गयी हों! शोषक-उत्पीड़क पूँजीपतियों और भूस्वामियों को मानो आम माफी मिल गयी हो और वामपंथी-जनवादी लोग ही कटघरे में खड़े किये जाने लायक रह गये हों! कल तक हिंदी का जो कहानीकार प्रेमचंद, निराला और मुक्तिबोध के नाम जपता हुआ दबे-कुचले, सताये हुए मजदूरों, किसानों और मध्यवर्गीय मेहनतकश स्त्री-पुरुषों को क्रांति का हिरावल दस्ता समझता था, वह मानो गरीब ‘हिंदीवाला’ से अचानक अमीर अंग्रेजी वाला हो गया और किसी ऊँचे आसन पर बैठकर हिंदी के लेखकों पर हिकारत के साथ हँसने लगा। यथार्थ को समझने और बदलने से संबंधित गंभीर चिंताएँ मानो एकाएक ही बेमानी हो गयीं और खिलंदड़ापन ही सबसे बड़ा साहित्यिक मूल्य बन गया। हिंदी के बहुत-से कहानीकार एकदम पलटकर जनोन्मुख से अभिजनोन्मुख हो गये। वे अपनी कहानियों में अभिजनों की-सी भाषा बोलने लगे तथा अभिजनों के प्रिय विषयों पर चटपटी कहानियाँ लिखने लगे।

लेकिन अब लगता है कि हिंदी कहानी में फिर एक नया बदलाव आ रहा है, फिर से एक नयापन दिखायी दे रहा है। अनुभववादी और कलावादी फैशनों से हटकर यथार्थवादी कहानियाँ लिखी जा रही हैं। उनके पात्र स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि सभी तरह के हैं, लेकिन वे विमर्शवादी कहानियाँ नहीं हैं। उनमें से ज्यादातर कहानियाँ किसी न किसी बड़ी सामाजिक समस्या को उठाती हैं और उसके कारणों को इस प्रकार सामने लाती हैं कि पाठक उसके समाधान के बारे में सोचने को प्रेरित हों। ऐसी कहानियाँ अवसरवादी किस्म के तटस्थतावाद के विरुद्ध लेखकीय पक्षधरता के साथ सामाजिक अंतर्विरोधों को सामने लाती हैं। आज के नये कहानीकार अपनी कहानियों में प्रायः जाने-पहचाने विषयों और प्रश्नों को उठाते हैं, लेकिन नये संदर्भों में उन्हें नये-नये रूपों में सामने लाते हैं।

उदाहरण के लिए, ‘परिकथा’ के नवलेखन अंक (जनवरी-फरवरी, 2015) की कुछ कहानियों को देखा जा सकता है। ‘परिकथा’ कई वर्षों से नवलेखन अंक निकालती आ रही है और प्रस्तुत अंक के संपादकीय में लिखी गयी संपादक शंकर की इन बातों से शायद ही कोई असहमत होगा कि नये लेखकों को एक साथ मंच पर लाने का यह उपक्रम ‘‘एक दौर की रचनाशीलता को समझने-पहचानने’’ का, ‘‘अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों और उनके समानांतर लेखन-सृजन में उभर रही प्रवृत्तियों को साथ-साथ देखने-परखने’’ का, ‘‘मौजूदा परिस्थितियों में लेखन की सामाजिक भूमिका को समझने’’ का और नये लेखकों के लिए ‘‘आत्म-मंथन तथा आत्म-विश्लेषण’’ का भी उपयुक्त अवसर होता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए इस अंक की कहानियों को देखा जाये, तो कहानी की रचना और आलोचना में शायद कुछ कदम आगे बढ़ा जा सकता है।

इस अंक में नये लेखकों की बीस कहानियाँ हैं। सभी पर एक लेख में विचार करना संभव नहीं, इसलिए मैं केवल पाँच कहानियों की चर्चा करूँगा और इधर हिंदी कहानी में फिर से जो एक नया बदलाव आता दिख रहा है, उसे सामने लाने का प्रयत्न करूँगा।

पूस की एक और रात : गंगा सहाय मीणा
प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कहानी

अद्भुत संयोग है कि हाल ही में ‘पूस की एक और रात’ शीर्षक से हिंदी में दो कहानियाँ लिखी गयी हैं। एक लक्ष्मी शर्मा की, जो पिछले दिनों ‘कथादेश’ में आयी थी और दूसरी गंगा सहाय मीणा की, जो ‘परिकथा’ के प्रस्तुत नवलेखन अंक में प्रकाशित हुई है। यद्यपि दोनों कहानियों के विषय भिन्न हैं और शीर्षक के सिवा कोई और समानता उनमें नहीं है, तथापि एक ही समय में एक ही शीर्षक से दो कहानियों का लिखा जाना सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि हिंदी कहानी में एक नये विकास तथा प्रेमचंद की यथार्थवादी कथा-परंपरा को एक बार फिर दृढ़तापूर्वक अपनाकर आगे बढ़ाने के नये संकल्प की सूचना है। यहाँ दोनों कहानियों को साथ रखकर उन पर विचार करने का अवकाश नहीं है, इसलिए मैं गंगा सहाय मीणा की कहानी पर ही बात करूँगा।

यह कहानी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पूस की रात’ की याद दिलाती है, लेकिन यह उससे भिन्न बिलकुल आज के (इक्कीसवीं सदी के) भारत के ग्रामीण यथार्थ और किसान जीवन की और विशेष रूप से खेती-किसानी करने वाली स्त्रियों के कठिन जीवन की कहानी है। यह राजस्थान के एक जनजाति बहुल गाँव के जनजातीय किसान परिवार की कहानी है, जिसमें पिता की मृत्यु हो चुकी है, विधवा माँ बूढ़ी है, जिसके दो बेटों में से बड़ा हरकेश गाँव से दो सौ किलोमीटर दूर एक स्कूल में ‘शिक्षामित्र’ के रूप में काम करता है और उसका छोटा भाई बी.ए. करने के बाद जयपुर में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। हरकेश की युवा पत्नी भूरी तथा बूढ़ी माँ गाँव में खेती-बाड़ी सँभालती हैं। पहले खेतों की सिंचाई गाँव के तालाब और कुओं से होती थी और किसी किसान को पानी की किल्लत नहीं होती थी। लेकिन वर्तमान पूँजीवादी प्रपंच के चलते गाँव की परस्पर सहयोग वाली सामाजिक संरचना ध्वस्त हो गयी है, स्वार्थपरता पनप गयी है, जिसके कारण प्रकृति और पर्यावरण की भारी क्षति हुई है। तालाब का भरना बंद हो गया है, कुएँ सूख गये हैं और जमीन के अंदर गहराई तक बोरिंग करके निकाले गये पानी से खेतों को सींचने का नया चलन चल निकला है।

भारतीय कृषि व्यवस्था में पूँजीवाद के प्रसार ने प्रेमचंद के समय के भारतीय गाँवों को बिलकुल बदल दिया है। जब गाँवों में हमेशा भरे रहने वाले कुएँ हमेशा के लिए सूख गये, तो ‘‘बड़े किसानों ने बोरिंग करना शुरू किया। बोरिंग से सिंचाई महँगी हुई और मुश्किल भी। एक बोर करने में तीन-चार लाख तक का खर्च सामान्य था। उस पर बोर फेल होने का खतरा अलग। परिणाम यह हुआ कि बोर मालिकों ने दूसरे किसानों के खेतों में सिंचाई कर इस खर्च को निकालना शुरू कर दिया। गाँव में कुल मिलाकर आधा दर्जन ही बोर थे, इसलिए किसानों की भी मजबूरी थी उनसे महँगी रेट पर पानी लेने की। बोर मालिक दिन में अपने खेतों को भराते थे और रात में दूसरे किसानों को पानी देते।’’

कहानी यों है कि पूस का महीना है, जब हड्डियों तक को कँपा देने वाला जाड़ा पड़ता है। हरकेश गाँव से दो सौ किलोमीटर दूर अपनी नौकरी पर है और गाँव में उसके सरसों के खेत की भराई (सिंचाई) होनी है। उसकी पत्नी भूरी हफ्ते भर से कोशिश कर रही है कि बोर का मालिक रामजीलाल पटेल, जिसके साथ चार सौ रुपये प्रति घंटे की दर से पानी लेने का सौदा तय हो चुका है, उसके खेत के लिए पानी दे दे। आखिरकार भूरी की सरसों भराने की बारी आ जाती है और रामजीलाल मोबाइल पर ‘‘मिस कॉल करके’’ हरकेश मास्टर को बताता है कि आज रात आठ बजे उसका नंबर है। हरकेश मोबाइल पर गाँव में अपनी पत्नी और माँ से बात करता है कि सरसों आज ही भरा ली जाये। सास बूढ़ी है और भूरी अकेली यह काम कर नहीं सकती, इसलिए तीन सौ रुपये में आधी रात के लिए एक मजूर तय कर लेती है। आठ बजे से पहले वह अपने दोनों बच्चों को खाना खिलाकर सुला देती है और सास तथा मजूर के साथ एक टॉर्च और गैस लेकर खेत पर चली जाती है। भयंकर शीत की रात में वह अपने खेत की सिंचाई करती है। बोर से खेत तक आने वाले पानी के पाइप के टूट जाने पर वह अपने ओढ़े हुए शॉल को ही टूटे हुए पाइप में बाँधकर उसकी मरम्मत करती है। इस प्रक्रिया में वह शीत की रात में पानी की बौछारों में भीग भी जाती है। फिर भी वह पूरे धीरज और परिश्रम के साथ अपना काम पूरा करती है।

गंगा सहाय मीणा अगर चाहते, तो विगत बीसेक वर्षों से हिंदी कहानी में चल रही चीजों की तर्ज पर इस कहानी को एक जनजाति से संबंधित और पति से दूर गाँव में अकेली रहने वाली स्त्री की कहानी के रूप में लिखकर मजे में जातिवादी या देहवादी किस्म की कहानी बना सकते थे, लेकिन उन्होंने इसे परिवार और खेती को अकेले अपने दम पर सँभालने वाली एक किसान स्त्री की कहानी के रूप में लिखकर सचेत रूप से प्रेमचंद की यथार्थवादी कथा-परंपरा को आगे बढ़ाने का नया प्रयास किया है। कहानी का शीर्षक प्रेमचंद के समय के किसान जीवन के यथार्थ की याद दिलाता है, लेकिन वे कहानी के पहले ही वाक्य में कहानी का ‘काल’ स्पष्ट रूप से बताकर (कि यह ‘‘इक्कीसवीं सदी का पहला दशक बीत जाने के बाद के एक बरस के पूस के महीने’’ की कहानी है) पाठक को सचेत कर देते हैं कि यह हमारे बिलकुल आज के समय के यथार्थ की कहानी है। यह समय निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण का समय है, जिसमें गाँव का और किसान जीवन का यथार्थ बिलकुल बदल गया है।

यह एक नया यथार्थ है। ग्रामीण जीवन और कृषि कर्म में कई नयी चीजें आ गयी हैं। जनजाति बहुल गाँव के लड़के खेती-किसानी पर निर्भर न रहकर पढ़-लिख रहे हैं और पढ़ा भी रहे हैं। वे गाँव से दूर जाकर नौकरियाँ कर रहे हैं, उच्च शिक्षा पाकर परीक्षाएँ दे रहे हैं और ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँच रहे हैं। गाँव में पीछे छूटा उनका परिवार भी अब ज्यादा दिन वहाँ नहीं रहने वाला है, क्योंकि देहाती जीवन और कृषि कर्म में उच्च तकनीक वाली बड़ी पूँजी के प्रवेश ने छोटे किसानों का खेती पर निर्भर रहना मुश्किल कर दिया है। पूँजी ने देहाती लोगों को स्वार्थी बना दिया है, जिससे प्रकृति और पर्यावरण का नाश हो गया है। प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट हो जाने से किसान नयी तकनीक से खेती करने को विवश है और नयी तकनीक के तार बड़ी भूमंडलीय पूँजी से जुड़े हैं। एक छोटे-से खेत को सींचने के लिए चार सौ रुपये प्रति घंटे की दर से पानी लेना पड़ता है और तीन सौ रुपये में आधी रात के लिए मजदूर करना पड़ता है। कहानी में मोबाइल फोन की भूमिका और ‘‘मिस कॉल’’ वाला व्यंग्य भी गौर करने लायक है। इतनी महँगी खेती के लिए जरूरी है कि किसान अपने लिए अन्न पैदा करने के बजाय बाजार के लिए नकदी फसलें उगाये। (कहानी में भूरी का खेत भी नकदी फसल सरसों का खेत है।) लेकिन जाहिर है कि यह पूँजीवादी विकास ‘सस्टेनेबल’ (टिकाऊ) नहीं है और इसमें छोटे किसान को बर्बाद होना ही है, चाहे वह कर्जदार होकर आत्महत्या करे या खेती और गाँव छोड़कर कहीं और चला जाये, कोई और पेशा अपनाये।

यह कहानी आज के इसी बदले हुए यथार्थ को सामने लाती है। लेकिन इस बदले हुए यथार्थ के दो पहलू हैं--किसानों के कष्टों और आत्महत्या के प्रयासों वाला निराशाजनक पहलू और गैर-टिकाऊ खेती से जुड़ा ग्रामीण जीवन जीते रहने के बजाय शिक्षित होकर कोई वैकल्पिक और बेहतर जीवन जीने के प्रयासों वाला आशाजनक पहलू। इस कहानी में बदलते हुए यथार्थ के आशाजनक पहलू को सामने लाया गया है। भूरी का जीवन हमेशा ऐसा ही रहने वाला नहीं है। उसका पति पढ़-लिखकर पढ़ाने लगा है, उसका देवर ऊँचे पद पर पहुँचने के लिए तैयारी कर रहा है, उसके बच्चे भी पढ़-लिख जायेंगे, तो गाँव में न रहकर बाहर चले जायेंगे। यह भी हो सकता है कि वे ‘लोकल’ न रहकर ‘ग्लोबल’ हो जायें।

इस प्रकार यह कहानी ठेठ भारतीय यथार्थ की कहानी होते हुए भी आज के भूमंडलीय यथार्थ की कहानी है और इसका यथार्थवाद प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाने वाला भूमंडलीय यथार्थवाद है।

तस्वीर के पीछे : प्रज्ञा
पितृसत्ता के पीछे छिपी अर्थव्यवस्था की कहानी

विगत बीसेक वर्षों में दलित विमर्श की भाँति स्त्री विमर्श की कहानियाँ भी हिंदी में खूब लिखी गयीं। दलित लेखन की तर्ज पर स्त्री लेखन की भी एक अलग कोटि बना ली गयी और शेष साहित्य से उसे अलगाकर देखा गया। जिस प्रकार दलित लेखन ब्राह्मणवाद के बजाय सवर्णों के विरुद्ध विद्रोह का लेखन था, उसी प्रकार स्त्री लेखन पितृसत्तावाद के बजाय पुरुषों के विरुद्ध विद्रोह का लेखन बन गया। जिस प्रकार दलित लेखन में जाति सर्वप्रमुख रही, उसी प्रकार स्त्री लेखन में देह सर्वप्रमुख रही। लेकिन दोनों प्रकार के लेखन की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि ब्राह्मणवाद और पितृसत्तावाद को सामाजिक समस्याओं के रूप में न देखकर मनोवैज्ञानिक समस्याओं के रूप में देखा गया। दलित लेखन में यह मान्यता प्रचलित रही कि जब तक सवर्णों की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक दलितों के प्रति अन्याय होता रहेगा। स्त्री लेखन में यह माना जाता रहा कि जब तक पुरुषों की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक स्त्रियों पर अत्याचार होता रहेगा।

इस मान्यता के मुताबिक मानसिकता को बदलने का उपाय यह माना गया कि दलितों के द्वारा सवर्णों के प्रति और स्त्रियों के द्वारा पुरुषों के प्रति घृणा का प्रचार किया जाये। यह नहीं देखा गया कि समाज की व्यवस्था को बदले बिना लोगों की मानसिकता को नहीं बदला जा सकता। समाज की व्यवस्था को बदलने के लिए जाति और लिंग के आधार पर किये जाने वाले शोषण को समाप्त करना, शोषण को समाप्त करने के लिए वर्गों में बँटी समाज व्यवस्था को बदलना और उसे बदलने के लिए जाति, धर्म, लिंग आदि के भेद भुलाकर वर्गीय शोषण के खिलाफ लड़ना जरूरी है। यह बात प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार शुरू से कहते आ रहे थे, लेकिन दलित और स्त्री लेखकों ने इसे अनसुना तो किया ही, इसका विरोध भी यह कहते हुए किया कि वर्गभेद को समाप्त करने से पहले जातिभेद और लिंगभेद को समाप्त करना जरूरी है और इसके लिए समाज की व्यवस्था से पहले सवर्णों तथा पुरुषों की मानसिकता को बदलना जरूरी है। इस प्रकार उनका लेखन यथार्थ को बदलने के बजाय यथास्थिति को बनाये रखने वाला लेखन बन गया।

लेकिन इधर की कहानियों में दलितों और स्त्रियों के लेखन में एक बदलाव दिखायी दे रहा है। उदाहरण के लिए, ‘परिकथा’ के प्रस्तुत अंक में प्रज्ञा की कहानी ‘तस्वीर के पीछे’ में स्त्री के प्रति होने वाले अन्याय और अत्याचार को पुरुष मानसिकता से जोड़कर नहीं, बल्कि स्त्री की कमजोर आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखा गया है। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, यह प्रत्यक्ष दिखायी देते यथार्थ के पीछे छिपे यथार्थ को सामने लाने वाली कहानी है।

प्रत्यक्ष दिखायी देता यथार्थ यह है कि कहानी की प्रमुख पात्र रानी रूप और गुणों की खान है। वह स्वयं को प्यार करने वाली चाची के परिवार और नाते-रिश्ते के लोगों के बीच सदा हँसती-खिलखिलाती और पूरी मुस्तैदी से, कुशलतापूर्वक तथा हँसते-हँसते काम में जुटी रहती है, जिससे लगता है कि वह एक सुखी और संतुष्ट स्त्री है। लेकिन उसका जीवन दुख भरी कथा है। छोटी उम्र में ही माँ का साया सिर से उठ गया था। पिता और दो अविवाहित भाइयों के खाने-पीने और घर की व्यवस्था का दायित्व उसके जिम्मे आ गया था। पिता ने उसकी पढ़ाई को व्यर्थ समझकर दसवीं के बाद ही स्कूल छुड़ा दिया, कई वर्षों तक विवाह के बाद की जिम्मेदारियों को सँभालने लायक और सिलाई-बुनाई जैसे कामों में पारंगत बनाने के नाम पर उसे घरेलू नौकरानी बनाये रखा और उसके बाद कम खर्च में उसके विवाह की जिम्मेदारी का बोझ सिर से उतारने के लिए उसका विवाह एक कम पढ़े-लिखे, काफी बड़ी उम्र के, कुरूप और क्रूर व्यक्ति से कर दिया।

शादी से पहले पिता शक करते थे कि रानी किसी के संग भाग न जाये, शादी के बाद रूप-गुण में रानी से हीन पति उस पर शक करने लगा। वह उस पर पहरा बिठाने लगा, बात-बात पर उसे नीचा दिखाने लगा, उसे मारने-पीटने लगा। एक बार मार-पीट के बाद रानी को प्यार करने वाली चाची उसके फोन करने पर उसे अपने साथ ले आयी, तो रानी के सगे भाई अपनी बहन को बहनोई के अत्याचार से बचाने के लिए स्वयं कुछ करने के बजाय चाची से ही लड़ने आ गये कि ‘‘आप क्यों हमारी बहन का घर तुड़वाने पर तुली हैं?’’ रानी कोई चारा न देख पति के पास लौट गयी और उसके सारे अत्याचार सहते हुए अपने बच्चों (एक बेटा, एक बेटी) को प्यार से पालने लगी। उसने तमाम दुखों और कष्टों में भी हँसते-हँसते जीने का पाठ पढ़ लिया कि ‘‘जब कोई रास्ता नहीं है और सब सहना ही है, तो खुश दिखकर ही सह लो सब।’’

लेकिन जब उसने देखा कि उसका पति बेटे को तो प्यार करता है, बेटी को प्यार नहीं करता, बल्कि बेटी को खिलाने-पिलाने और पढ़ाने-लिखाने पर होने वाले खर्च पर कुढ़ा करता है, तो उसने ठान लिया कि वह स्वयं अपने सपनों का जो जीवन नहीं जी पायी, वह जीवन उसकी बच्ची जिये। इसके लिए वह पति से छिपाकर भी अपनी बेटी की सारी इच्छाएँ पूरी करती है। उसका पति चाहता है कि बेटी को पढ़ाने-लिखाने के बजाय वह ‘‘उसे अपनी तरह सीना-पिरोना ही सिखा दे।’’ लेकिन रानी अपनी बच्ची को स्कूल भेजने के साथ-साथ कंप्यूटर, डांस और टाइक्वांडो भी सीखने के लिए भेजती है। बेटी रुचिका जब स्कूल में फुटबॉल टीम की कप्तान चुनी जाती है, तो रानी के पति को यह बात इतनी अखर जाती है कि वह खराब खाना बनाने का दोष मढ़कर गुस्से में थाली रानी पर दे मारता है।

ऐसे अत्याचारों को सहते-सहते रानी जब बीमार हो जाती है, तो उसका पति अपना खर्च बचाने के लिए उचित ढंग से उसका इलाज नहीं कराता। वह रानी को अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूँक करने वाले ओझा को घर बुलाकर अपना खर्च बचाने का जतन करता है। रानी की हालत बिगड़ती जाती है और एक दिन रुचिका रानी की स्नेहमयी चाची को फोन करती है, ‘‘नानी, तुरंत आ जाओ, मम्मी आपको बुला रही हैं।’’ चाची आती हैं, तो रानी अपनी बेटी रुचिका को उन्हें सौंप देती है। चाची को आश्चर्य होता है कि रानी का पति ऐसा कैसे होने देगा। लेकिन रानी बताती है कि उसके पति को बेटी की कोई परवाह नहीं है। वह तो बेटी के बारे में कहता है, ‘‘नौकरी करूँगा या लड़की जात को सँभालूँगा? और कुछ जिम्मेदारी तो तेरे घर की भी बनती है आखिर?’’ लेकिन अपने बेटे को अपने पास रखने में उसे कोई ऐतराज नहीं है, क्योंकि बेटा उसके लिए लाभदायक है।

रानी शुरू से जानती है कि पुरुषों की मानसिकता को नहीं बदला जा सकता, क्योंकि वह मानसिकता आर्थिक हानि-लाभ से जुड़ी है। बेटी को पढ़ाना-लिखाना हानिकर है, उसे मुफ्त की घरेलू नौकरानी बनाकर उससे काम लेना लाभकर। इसी तरह बेटे को अपने पास रखने में फायदा है, जबकि बेटी की जिम्मेदारी दूसरों पर डाल देने में फायदा है। रानी पहले अपने पिता और भाइयों की और बाद में अपने पति की इस अपरिवर्तनीय मानसिकता को जानने के कारण उसे बदलने का प्रयास नहीं करती, लेकिन अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनाकर पति के परिवार की व्यवस्था को ही बदल देती है।

कहने की जरूरत नहीं कि प्रज्ञा की यह कहानी एक स्त्री के द्वारा स्त्री के बारे में लिखी हुई होने पर भी चालू स्त्री विमर्श से बिलकुल हटकर लिखी गयी कहानी है। इस कहानी की नवीनता और खूबसूरती इसका यथार्थवाद है। प्रगतिशील-जनवादी कहानी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला यथार्थवाद। इसी यथार्थवाद के जरिये प्रज्ञा नितांत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शोषित-उत्पीड़ित व्यक्ति को साहसपूर्वक जीते और समझौते के बजाय संघर्ष करते हुए दिखाती हैं। कहानी की खूबी यह है कि रानी बाहर से समझौते कर चुकी स्त्री दिखती है, लेकिन भीतर से वह एक मजबूत संघर्षशील स्त्री है।

जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है : सत्यम सत्येंद्र पांडेय
दलित प्रश्न को सांप्रदायिकता से जोड़कर दिखाने वाली कहानी

सत्यम सत्येंद्र पांडेय की कहानी ‘जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है’ दलितों के अपमान की तथा उनके साथ होने वाले सामाजिक अन्याय और उनके जनतांत्रिक अधिकारों के सार्वजनिक रूप से किये जाने वाले हनन की समस्या को एक नये रूप में सामने लाती है।

कहानी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के सांप्रदायिक तनाव, दंगे और शहर में कर्फ्यू लग जाने की खबर से शुरू होती है। कॉलेज में पढ़ने वाला एक दलित युवक राजकुमार अपनी मोटरसाइकिल पर कॉलेज जाने के लिए निकलता है कि शहर की तरफ से बदहवास लौटते उसके एक पड़ोसी उसे शहर में कर्फ्यू लग जाने की खबर देते हैं। मिडिल स्कूल में उसके सहपाठी रहे उसके ये पड़ोसी, जो आठवीं में दूसरी बार फेल होने पर पढ़ाई से तौबा कर चुके थे, कई धंधे चलाकर उनमें असफल हो चुके हैं और अब धर्म रक्षा मिशन के फुलटाइम कार्यकर्ता हैं। राजकुमार उनसे दंगे का कारण पूछता है, तो पाता है कि दंगा हिंदू हुड़दंगियों की वजह से हुआ। वह हुड़दंगियों को गलत बताता है, तो धर्मरक्षक कहते हैं, ‘‘अबे, तुम जैसों के कारण ही तो इन मुसल्लों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं। साले तुम हिंदू होकर भी ऐसी बात करते हो, शर्म नहीं आती तुम्हें?’’

जवाब में दलित युवक राजकुमार कहता है, ‘‘अरे काहे का हिंदू, कैसी शर्म? अपने घर में तो पानी नहीं दे सकते, मंदिर में घुसने नहीं देते। उस समय क्यों नहीं हिंदू मानते हमको?’’

धर्मरक्षक राजकुमार को उसके जाति के नाम से गाली देते-देते रुक जाते हैं, क्योंकि ‘‘जब से हरिजन एक्ट और हरिजन थाने प्रकट हुए हैं, ये पसंदीदा शब्द मुँह से निकालने में डर लगता है।’’ तभी राजकुमार देखता है कि कॉलेज में उसकी सहपाठी दीपाली, जो उसके पड़ोसी पंडित रामधन की पाँच संतानों में सबसे छोटी है, कॉलेज जाने के लिए ऑटोरिक्शा में सवार हो रही है। राजकुमार उसे रोकता है और उससे दो मिनट बात करके उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर नर्मदा नदी के भेड़ाघाट की ओर चल देता है। धर्मरक्षक धर्म की रक्षा के लिए मोबाइल पर दीपाली के भाइयों को इसकी सूचना दे देते हैं। 

ट्रैक्टर से खेतों की जुताई करके लौटते दीपाली के तीन भाइयों को यह सूचना मिलती है, तो वे ‘‘प्रेम से परिपूर्ण सुखद भविष्य की योजनाएँ बनाते हुए’’ चले जा रहे राजकुमार और दीपाली का रास्ता रोक लेते हैं। वे अनिष्ट के भय से काँपती बहन के सामने ही राजकुमार को लात-घूँसों से पीटने लगते हैं और गालियाँ देते हुए पूछने लगते हैं, ‘‘अब मिलेगा दीपाली से? बिठायेगा कभी मोटरसाइकिल पर?’’ राजकुमार एक नजर दीपाली पर डालता है और अपने प्रेम की शक्ति को संचित करते हुए कहता है, ‘‘हाँ, मिलूँगा। जरूर मिलूँगा।’’ उससे बार-बार यही सवाल पूछा जाता है और वह बार-बार यही जवाब देता है, तो तीनों भाई उसे और पीटते हैं। लेकिन जब वे देखते हैं कि चारों तरफ भीड़ इकट्ठी हो गयी है, तो बहन की बदनामी के डर से दीपाली का नाम लेना तो बंद कर देते हैं, लेकिन राजकुमार को ट्रैक्टर से बाँधकर घसीटते हुए नर्मदा के पुल की ओर चल देते हैं। घिसटते हुए राजकुमार की मर्मांतक चीखों के साथ टैªक्टर पुल पार करता है, जिस पर उसके खून की पट्टी बन जाती है। दीपाली भाइयों की तवज्जो अपनी ओर न देख पुल पर से नदी में छलाँग लगाकर आत्महत्या कर लेती है।

यह दृश्य जितना भयानक है, उससे भी अधिक भयानक यह है कि हजारों लोगों के सामने दिनदहाड़े एक युवक को ट्रैक्टर से बाँधकर घसीटा और मार डाला जाता है, एक युवती इस अन्याय को सह न पाने के कारण आत्महत्या कर लेती है, लेकिन हजारों की वह भीड़ पूरी तरह खामोश होकर इस दृश्य को देखती रहती है, जबकि यहाँ कोई कर्फ्यू नहीं लगा है।

यह कहानी दलित प्रश्न को बड़ी शिद्दत से उठाती है, लेकिन चालू दलित विमर्श की कहानियों से भिन्न है। यह केवल सवर्णों और दलितों के बीच के अंतर्विरोध की बात नहीं करती। इसका नयापन यह है कि यह कहानी सामाजिक अन्याय को सांप्रदायिकता की समस्या से जोड़कर देखती है और इन दोनों के बने रहने तथा बढ़ते जाने के कारणों को लोगों में सामाजिक चेतना के अभाव तथा उनकी राजनीतिक हस्तक्षेप न करने वाली निष्क्रियता में खोजती है, जिसके शिकार वे दलित भी हैं, जो सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक शक्तियों से हाथ मिला लेते हैं। कहानी में जो भीड़ चुपचाप तमाशा देख रही है, क्या उसमें सब सवर्ण ही होंगे? उस नौजवान की अपनी बिरादरी के लोग न होंगे? अवश्य होंगे, लेकिन वे अन्याय होते देखकर भी मूक दर्शक बने रहते हैं, उसका विरोध और प्रतिरोध नहीं करते।

इस प्रकार यह कहानी आज के इस बृहत्तर यथार्थ की ओर संकेत करती है कि हमारे समाज में ही नहीं, समूचे देश और विश्व में हिंसा और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन में बढ़ोतरी हो रही है। युद्धों के रूप में, धर्म के नाम पर की जाने वाली आतंकवादी कार्रवाई के रूप में, राज्य द्वारा की जाने वाली जन-दमनकारी हिंसा के रूप में हम उसे नित्यप्रति देखते हैं, लेकिन चुपचाप, निष्क्रिय होकर देखते रहते हैं। जबकि हिंसा किसी के भी द्वारा किसी के भी प्रति की जा रही हो, उसके विरुद्ध नागरिक अथवा जन-हस्तक्षेप होना ही चाहिए। यह तभी हो सकता है, जब लोगों में सामाजिक चेतना हो और हिंसा के विरुद्ध राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाली सक्रियता हो। मगर वर्तमान व्यवस्था इस प्रकार की चेतना और सक्रियता को कुंद करने के लिए धर्म का सहारा लेती है और इसके लिए इस कहानी के धर्मरक्षक जैसे लोगों का इस्तेमाल करती है।

शहर में जो सांप्रदायिक दंगा हुआ है, वह धर्मरक्षक जैसे लोगों के ही कारण हुआ है। धर्मरक्षक स्वयं भी देशी कट्टा जेब में रखकर वहाँ मुसलमानों को मारने जाता है, लेकिन कर्फ्यू लग जाने के कारण पुलिस द्वारा खदेड़ दिया जाता है। राजकुमार उससे मजाक करता है, ‘‘तो टपका देते दो-तीन पुलिस वालों को ही।’’ तो वह कहता है, ‘‘पुलिस में कौन रहता है बे, सब अपनी ही तरफ के लोग न? काहे मारें उनको?’’ वही धर्मरक्षक जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है, वहाँ ब्राह्मण दीपाली से प्रेम करने वाले चमार राजकुमार को मारने के लिए दीपाली के भाइयों को बुलाता है। अर्थात् दोनों जगह हो रही हिंसा में धर्मरक्षक या उस जैसे लोगों का ही हाथ है। इस दृष्टि से देखें, तो कहानी का धर्मरक्षक नामक चरित्र बहुत महत्त्वपूर्ण और कहानी का शीर्षक बहुत अर्थपूर्ण हो जाता है।


कबीर का मोहल्ला : मज्कूर आलम
जानी-पहचानी चीजों को नये अंदाज में प्रस्तुत करने वाली कहानी

आज के नये लेखक सांप्रदायिकता की समस्या पर नये ढंग से सोचते हैं और उस पर कुछ नये ढंग की कहानी लिखने का प्रयास करते हैं। इसके चलते आज की कहानी में कई बार कुछ नये प्रयोग किये जाते दिखायी देते हैं। उदाहरण के लिए, मज्कूर आलम की कहानी ‘कबीर का मोहल्ला’ को देखा जा सकता है। यह कहानी अत्यंत जानी-पहचानी और बार-बार पढ़ी-सुनी चीजों को एक नये अंदाज में, एक नयी तरतीब देकर पेश करती है और सांप्रदायिक वैमनस्य के विरुद्ध सद्भाव का संदेश देती है।

कबीर के बारे में किंवदंती है कि हिंदू उन्हें हिंदू मानते थे और मुसलमान मुसलमान। इसलिए जब कबीर की मृत्यु हुई, तो हिंदुओं ने कहा कि वे उनकी चिता जलायेंगे और मुसलमानों ने कहा कि वे उनकी कब्र बनायेंगे। लेकिन दोनांे की मंशा पूरी न हुई, क्योंकि कबीर की लाश फूलों में बदल गयी। यह किंवदंती स्वयं ही सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है। मज्कूर आलम ने इसी का इस्तेमाल करते हुए कहानी में एक नया प्रयोग किया है।

एक मोहल्ला है, जिसमें गली की एक तरफ हिंदू रहते हैं और दूसरी तरफ मुसलमान। यह सांप्रदायिकता पर लिखी जाने वाली कहानियों की एक चिर-परिचित स्थिति है और भारत के कई शहरों-कस्बों की हकीकत भी। कहानीकार भी कहता है कि ‘‘यह जैसा मोहल्ला है, वैसे मोहल्ले गंगा-जमुनी तहजीब वाले वतन के कई शहरों में आपको देखने को मिल जायेंगे।’’ ऐसे मोहल्लों में सांप्रदायिक तनाव तो रहता ही है, इसलिए ‘‘चार-पाँच साल में यहाँ दंगे हो ही जाते हैं।’’ लेकिन ‘‘कमाल की बात है कि तमाम तनावों के बाद भी गली की दोनों तरफ के बीच रिश्ते की डोर भी उतनी ही मजबूत और यकीनी है।’’

ऐसे मोहल्ले में एक दिन एक बच्चा कहीं से चला आया। लोगों से उसका नाम पूछा, तो तोतली भाषा में उसने जो बताया, किसी की समझ में न आया। मोहल्ले के लोगों ने उसे आश्रय दे दिया और वह अलग-अलग दिन अलग-अलग परिवार के साथ रहने लगा। लोगों ने उसे छोटू कहना शुरू कर दिया। बच्चा बड़ा होता गया, लेकिन वह कौन है, कहाँ से आया है, उसकी जाति और धर्म क्या है, कुछ भी पता नहीं चला। ‘‘जब वह थोड़ा बड़ा हुआ, तो मोहल्ले वालों ने ही नीम के पेड़ के नीचे उसके रहने की व्यवस्था कर दी। उसके फूस के छप्पर के ऊपर ही मोहल्ले के नाम का बैनर भी लगा दिया--कबीरगंज।’’ उस बैनर के चलते उस लड़के का नाम कबीर पड़ गया। वह किस जात-मजहब का है, यह तो उसे तब भी नहीं पता था, जब यहाँ आया था और अब वह जानना भी नहीं चाहता था, क्योंकि वह भीख माँगकर गुजारा करता था। यदि वह किसी एक धर्म का हो जाता, तो ‘‘धर्म उसके कर्म के मार्ग की बाधा’’ बन जाता, जबकि किसी भी धर्म का न होने से उसे हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई सभी धर्मस्थलों के बाहर खड़े होकर भीख माँगने की सुविधा थी। वह किसी धर्म का नहीं था, ‘‘शायद यही वजह थी कि वह गली के दोनों तरफ दुलारा था।’’ जब कोई सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली घटना हो जाती, तो लोग एक-दूसरे पर शक करते, लेकिन कबीर पर कभी शक न करते।

कहानी उस रात की है, जब भयंकर बारिश हो रही थी और बर्फ पड़ रही थी। कबीर जिस पेड़ के नीचे सोता था, उसके नीचे एक साँड़ बारिश और बर्फ से बचने के लिए आ खड़ा हुआ। संयोग से उसी पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता था, जो बर्फबारी के कारण टूट गया और इससे गुस्सायी मधुमक्खियों ने कबीर और साँड़ दोनांे पर हमला बोल दिया। उनके हमले से बचने के लिए दोनों भागे, लेकिन अँधेरे में दोनों एक नाले में जा गिरे। साँड़ का एक सींग कबीर के पेट में घुस जाने से कबीर की और नाले में गिर जाने से साँड़ की मौत हो गयी। मरने से पहले दोनों चिल्लाये। साँड़ के रँभाने और कबीर के चीखने की दर्द भरी आवाजें मोहल्ले के लोगों ने सुनीं, तो हिंदुओं ने समझा कि मुसलमानों ने किसी गाय को मार डाला है और मुसलमानों ने समझा कि हिंदुओं ने किसी मुसलमान को। बस, अनुमान के आधार पर ही दोनों तरफ सांप्रदायिक तनाव फैल गया और एक तरफ से ‘‘हर-हर महादेव’’ के और दूसरी तरफ से ‘‘अल्लाहो अकबर’’ के नारे लगने लगे। दंगे की आशंका से पुलिस आ पहुँची। तब तक बारिश बंद हो चुकी थी और सुबह भी हो चुकी थी। पुलिस की जीप आयी देख घरों में छिपे डरे-सहमे लोग निकल पड़े। लेकिन उन्होंने देखा कि पुलिस की जीप नाले के पास खड़ी है, जहाँ कबीर और साँड़ दोनों मधुमक्खियों के काटने और उनसे बचने के प्रयास में नाले में गिर जाने के कारण मारे गये हैं।

कहानी में घटना का वर्णन इस प्रकार पूरा किया जाता है कि ‘‘लाश का पंचनामा कर इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट तैयार करने के बाद पुलिस ने लोगों से पूछा कि इसका कोई अपना है, जो अंतिम संस्कार कर सके। दोनों तरफ के लोग आगे आ गये ...हाँ, हम करेंगे इसका अंतिम संस्कार...पूरा मोहल्ला है इसका...इसके बाद दोनों तरफ के लोगों में एक बार फिर कमान खिंच गयी कि शव को दफनाया जाये कि लाश को जलाया जाये...दोनों तरफ के लोग एक बार फिर से बाँहें फड़काने लगे थे, लेकिन आज कबीर की लाश फूलों में तब्दील नहीं हुई।’’

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इसके बाद कहानी में एक ‘उत्तर कथा’ भी है, जो कहानी लेखन में एक नया प्रयोग है। यह प्रयोग आज के मीडिया और सोशल मीडिया के द्वारा बड़े पैमाने पर फैलायी जाने वाली सांप्रदायिकता का, लेकिन लोगों में मौजूद आपसी सद्भाव का यथार्थ सामने लाने के लिए किया गया है। सांप्रदायिकता की आग भड़काने वाले तत्त्व इस घटना के काल्पनिक वीडियो बनाते हैं, जिनमें दिखाया जाता है कि कैसे मुसलमानों ने एक गाय की हत्या कर दी और कैसे हिंदुओं ने एक मुसलमान लड़के को मार डाला। ये वीडियो आननफानन सोशल साइट्स पर वायरल हो जाते हैं और उन्हें देखकर देश में कई जगह सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठती है। यह सच्चाई सामने आ जाने पर भी कि साँड़ और कबीर की मौत मधुमक्खियों के काटने से हुई है, मीडिया में मनगढ़ंत ‘समाचार’ और ‘कार्यक्रम’ दिखाये जाते रहते हैं, जो देशी मीडिया से चलकर विदेशी मीडिया तक में जा पहुँचते हैं। सांप्रदायिक तनाव लंबे समय तक बना रहता है।

कहानी का अंत इस प्रकार किया जाता है कि एक साल बाद ‘‘कबीर की पुण्यतिथि पर मोहल्ले वालों ने एक बार फिर इस अहद को दोहराया कि वे हर समस्या का हल आपस में मिल-बैठकर करेंगे, किसी के बहकावे में नहीं आयेंगे।’’

मीडिया की कार्यप्रणाली को व्यंग्यात्मक रूप में दिखाते हुए जो प्रयोग कहानी में किया गया है, वह सांप्रदायिक राजनीति, बाजारवादी मीडिया तथा उसके द्वारा फैलाये जाने वाले तनावों और दंगों को रोकने में अक्षम विधि-व्यवस्था के यथार्थ को एक नये रूप में सामने लाता है।

भोला बबवा के पैर : प्रमोद राय
‘फुटलूज लेबर’ के यथार्थ को सामने लाने वाली कहानी

अनुभववादी और कलावादी किस्म की हिंदी कहानियों में चित्रित पात्र या तो केवल अपने तन, मन और निजी जीवन में व्यस्त लोग होते हैं, या ऐसे लोग, जिनकी कोई सामाजिक पहचान ही नहीं होती। या फिर वे स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि होते हैं, जिनकी पहचान केवल लिंग, जाति या धर्म से होती है। ऐसे पात्रों की कहानियाँ पढ़कर लगता है कि जैसे कहानीकारों ने अमीर-गरीब या मालिक-मजदूर जैसी वर्गीय स्थितियों वाले पात्रों के यथार्थ-चित्रण को सर्वथा अनावश्यक मान लिया हो। शायद इसका एक कारण विगत बीसेक वर्षों की कहानी समीक्षा भी है, जो अनुभववाद और कलावाद पर जोर देती है। वह कहानी में विचारधारा, पक्षधरता और प्रतिबद्धता को पुरानी और गैर-जरूरी चीज ही नहीं, बल्कि साहित्य के लिए हानिकारक चीज भी मानकर चलती है। शायद यही कारण है कि इधर की हिंदी कहानी में किसानों, मजदूरों और छोटे-मोटे काम-धंधे करने वाले गरीब श्रमजीवी लोगों के जीवन के यथार्थ को सामने लाने वाले चरित्र दुर्लभ हो गये हैं। 

इस दृष्टि से ‘परिकथा’ में प्रस्तुत अंक में प्रकाशित प्रमोद राय की ‘भोला बबवा के पैर’ एक उल्लेखनीय कहानी है। यह उन लोगों की कहानी है, जो गाँवों से शहरों में आकर असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करते हैं, घरेलू नौकर, दरबान, ड्राइवर वगैरह बनते हैं, ठेलों पर छोटी-मोटी चीजें बेचते हैं या राज-मिस्त्री, रिक्शाचालक वगैरह बनकर अपना पेट भरते हैं--बल्कि अपना पेट काटकर गाँव में पीछे छूटे अपने परिवारों को पैसा भेजकर जीवित रखते हैं। 

इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे ‘टेेमिंग दि कुली बीस्ट’, ‘बियोंड पैट्रोनेज एंड एक्सप्लॉयटेशन’, ‘वेज हंटर्स एंड गैदरर्स’ आदि पुस्तकों के लेखक जान ब्रेमन की पुस्तक ‘फुटलूज लेबर’ की याद आयी। एम्सटर्डम विश्वविद्यालय में तुलनात्मक समाजशास्त्र के प्रोफेसर जान ब्रेमन ने कई बार भारत आकर यहाँ के असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का अध्ययन किया था। उनकी पुस्तक ‘फुटलूज लेबर वर्किंग इन इंडिया’ज इनफॉर्मल इकॉनॉमी’ (भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करने वाले घुमंतू श्रमिक) के बारे में मैंने 2003 में एक लेख लिखा था, जो मेरी पुस्तक ‘भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्ठभूमि’ (2014) में संकलित है। प्रमोद राय की कहानी के संदर्भ में अपने उस लेख का प्रारंभिक अंश उद्धृत करना मुझे जरूरी लग रहा है :

भारतीय श्रम का भूमंडलीकरण एक बार औपनिवेशिक शासन काल में हुआ और दूसरी बार निजीकरण की नीति के चलते अब हो रहा है, क्योंकि यह नीति भारत पर (और लगभग सारी दुनिया में) विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी भूमंडलीय संस्थाओं द्वारा थोपी गयी है। इस नीति का संबंध पूँजीवादी भूमंडलीकरण और आज के उस पूँजीवाद से है, जो कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को त्याग चुका है और उससे जुड़ी तमाम चीजों को नष्ट करने में लगा है। अब उसे राज्य का हस्तक्षेप केवल पूँजी की रक्षा करने, पूँजीपतियों के हित में नीतियाँ बनाने और उन्हें सख्ती से लागू करने में ही चाहिए, जनहित की नीतियाँ बनाने और उन्हें लागू करने के लिए नहीं। राज्य के हस्तक्षेप से बन सकने वाली जनहित की नीतियों को न बनने देने के लिए ही मुक्त बाजार की वैश्विक नीति अपनायी गयी है, जिसके तहत श्रम के बाजार को भी राज्य के हस्तक्षेप से मुक्त रखने का आग्रह किया जा रहा है। इसी नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में विनिवेश की या उन उद्योगों को निजी क्षेत्र के हाथों बेचने की नीति अपनायी गयी है और कहा जा रहा है कि श्रमिकों को ‘औपचारिक’ तथा ‘अनौपचारिक’ दो क्षेत्रों में बाँटने के बजाय केवल अनौपचारिक क्षेत्र में रहने देना चाहिए।

व्यवहार में इस नीति का अर्थ यह है कि सरकार न तो श्रमिकों को रोजगार देने की चिंता करे और न उनके हित में कोई नियम-कानून बनाकर उन्हें लागू करे। मसलन, न्यूनतम वेतन या मजदूरी तय करने, श्रमिकों को जरूरी सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षाएँ देने-दिलाने के उन कामों से, जिनसे ‘औपचारिक अर्थव्यवस्था’ का निर्माण होता है, सरकार को अलग रहना चाहिए। उसे श्रम के बाजार को माँग और पूर्ति के अपने नियमों से ही चलने देना चाहिए और इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि श्रमिकों को स्थायी रोजगार, न्यूनतम वेतन, शिक्षा, आवास, चिकित्सा, बीमा, पेंशन आदि देने से संबंधित नियम-कायदों का पालन किया जा रहा है या नहीं। ऐसे कोई नियम-कायदे होने ही नहीं चाहिए। जो बने हुए हैं, उन्हें भी समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि उनके रहने पर श्रमिक उन्हें लागू कराने की कोशिश करते हैं और इसके लिए संगठित होकर संघर्ष करते हैं। इस चीज को रोकने के लिए श्रमिकों के संगठनों को भंग कर देना चाहिए और ऐसे कानून बना देने चाहिए कि श्रमिक संगठित न हो सकें। इसके अलावा ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करनी चाहिए कि श्रमिकों का संगठित होना स्वतः ही मुश्किल हो जाये। इसका एक कारगर तरीका यह हो सकता है कि श्रमिक किसी एक स्थान पर इकट्ठे और टिककर न रह सकें, बल्कि जहाँ उनकी जरूरत हो, वहाँ जायें और जब तक उनकी जरूरत हो, तभी तक वहाँ रहें।

‘भोला बबवा के पैर’ ऐसे ही श्रमिकों की कहानी है। यह बिहार के एक गाँव के भोलानाथ दुबे और उनके तेरह वर्षीय पुत्र गोल्डेन कुमार दुबे की कहानी है। भोलानाथ दुबे थोड़ा पढ़े-लिखे थे, पर कोई अच्छी नौकरी नहीं पा सके। जमीन-जायदाद ज्यादा थी नहीं, सो गाँव के एक धरमदेव के साथ दिल्ली चले गये, जो दिल्ली में एक सेठ के यहाँ नौकरी करता था और सेठ या उसके संबंधियों को किसी भरोसेमंद नौकर की जरूरत होने पर गाँव आकर किसी लड़के को अच्छी नौकरी दिलाने का वादा करके दिल्ली ले जाता था। उसने भोलानाथ दुबे को नौकरी दिलायी, लेकिन वे वहाँ टिके नहीं। उन्होंने दिल्ली में कई तरह के काम किये और एक दिन अचानक कहीं गायब हो गये। तीन साल बीत गये, पर न तो वे गाँव लौटे और न उनके मर जाने की खबर मिली। गाँव में उनकी पत्नी उन्हें जीवित मानती रही और इस इंतजार में कि वे पैसा कमाकर लौटेंगे, तो कर्ज चुका दिया जायेगा, खेत गिरवी रखकर लिये गये कर्ज से किसी तरह काम चलाती रही और अपने बेटे गोल्डेन कुमार को पढ़ाती रही। उधर धरमदेव के मालिक की बेटी को भरोसेमंद घरेलू नौकर की जरूरत महसूस हुई, तो वह गाँव आया और अच्छी नौकरी दिलाने का वादा करके गोल्डेन कुमार को अपने साथ दिल्ली ले गया। वह भोलानाथ दुबे को भोला बाबा कहता था (‘बाबा’ प्यार और तिरस्कार दोनों में ‘बबवा’ हो जाता है) और गोल्डेन कुमार को गोल्डेन बाबा कहता है। वही गोल्डेन को बताता है कि उसके पिता कहीं टिककर नहीं रहते थे, ‘‘उनके पैरों में चक्कर था।’’ इसीलिए कहानी का शीर्षक है ‘भोला बबवा के पैर’।

लेकिन तेरह वर्षीय गोल्डेन कुमार केवल नौकरी करने दिल्ली नहीं जाता, बल्कि दिल्ली में अपने खोये हुए पिता को खोजने जाता है। दिल्ली की खोड़ा कॉलोनी में उसके गाँव के कई लोग रहते हैं, जो तरह-तरह के छोटे-मोटे काम या नौकरी-चाकरी करते हैं। गोल्डेन वहाँ जाकर उनसे मिलता है। वे लोग उसे बताते हैं कि भोला बबवा कहीं टिककर कोई काम नहीं करते थे। कभी किसी फैक्टरी में काम किया, तो कभी किसी स्कूल में चौकीदारी की। कभी किसी सिक्योरिटी एजेंसी में भरती होकर एटीएम गार्ड बने, तो कभी दिल्ली की प्राइवेट बसों में कंडक्टर। कभी किसी ठेकेदार के नौकर रहे, तो कभी जूस बेचने की अपनी ठेली लगायी। हालाँकि नौकरी की मजबूरी में उन्होंने फैक्टरी के संगठित मजदूरों की हड़ताल तोड़ने वाले के रूप में भी काम किया, मगर अपनी ईमानदारी और गलत कामों को रोकने की प्रवृत्ति के चलते वे नौकरी से या तो खुद निकले या निकाले गये; हर जगह लड़े-भिड़े और मारे-पीटे गये। कभी चाकू से घायल होने पर अस्पताल ले जाये गये, तो कभी पुलिस को हफ्ता न देने पर पुलिस चौकी में ले जाकर पीटे गये। भोला बबवा के गायब हो जाने या मर जाने के बारे में गाँव वालों को ठीक-ठीक कुछ मालूम नहीं। केवल अटकलें हैं कि उन्हें किसी ने मारकर नाले में फेंक दिया था या उन्हें एड्स-वेड्स हो गया था। लेकिन लोगों को यह विश्वास भी है कि ‘‘सब फालतू बात है, भोला बबवा वैसा आदमी नहीं था।’’

गोल्डेन जिस कोठी में काम करता है, वहाँ से खोड़ा कॉलोनी जाकर अपने गाँव के लोगों से मिलने के बाद जब लौटता है, तो उसे तरह-तरह के काम करते लोगों में अपने पिता नजर आते हैं। इस प्रकार कहानीकार बड़ी कुशलता और कलात्मकता के साथ गाँवों से शहरों में आकर तरह-तरह के काम करने वाले लोगों के जीने और मरने का भयावह यथार्थ सामने लाता है। कहानी से पता चलता है कि चक्कर सिर्फ भोला बाबा के पैरों में नहीं था, इन तमाम लोगों के पैरों में है। ये सब एक अस्थिर और अस्थायी जीवन जी रहे हैं और भोला बाबा की तरह शहर में आकर खो गये हैं। कहानी का नयापन इसमें है कि यह भारत की उस ‘अनौपचारिक अर्थव्यवस्था’ पर हमारा ध्यान केंद्रित करती है, जो अस्थायी श्रमिकों के बल पर चलती है।

इस प्रकार आज की हिंदी कहानी में कई नये स्वर उभर रहे हैं। पिछले कुछ समय से हिंदी कहानी अपनी यथार्थवादी परंपरा से कटकर भटक-सी गयी थी। लेकिन अब वह फिर पटरी पर लौट रही है और आगे बढ़ रही है। इसमें नये कहानीकारों के साथ-साथ ‘परिकथा’ जैसी पत्रिकाओं की भी भूमिका है, जो नयी रचनाशीलता को निरंतर सामने लाने का सार्थक और जरूरी काम करती हैं।

Tuesday, April 22, 2014

कार-कथा

 रमेश उपाध्याय की कहानी

‘‘अरे, कपूर साहब, आप? नमस्ते! आइए, बैठिए, कैसे हैं?’’

‘‘अहा, नमस्ते, वर्मा जी! बस में सीट और आप जैसे सज्जन का साथ मिल जाये, तब तो सब ठीक होना ही हुआ!’’

‘‘लेकिन आज आप बस में कैसे?’’

‘‘कार पुरानी हो गयी थी, बेच दी।’’

‘‘लेकिन पिछली बार आप मिले थे, तब तो कह रहे थे कि उसकी जगह नयी खरीद ली है?’’

‘‘हाँ, खरीदी थी, लेकिन वह मैंने अपनी छोटी बहू को दे दी। क्या है कि मेरे दोनों लड़कों के पास तो अपनी-अपनी गाड़ी थी ही और बड़ी बहू अपने लिए अपने दहेज में ले आयी थी। छोटी बहू थोड़े कमजोर घर की है, वह नहीं ला सकी, तो अपनी उसे मैंने दे दी।’’

‘‘मतलब, आपके घर में चार गाड़ियाँ हैं?’’

‘‘वैसे तो पाँच होनी चाहिए। चार बेटों-बहुओं की और पाँचवीं मेरे और मेरी वाइफ के लिए। बड़ा तो कह रहा है कि आप मेरी वाली ले लो। क्या है कि उसे नये मॉडल की कारें खरीदने का खब्त है। एक पुरानी हो नहीं पाती कि तब तक उसे बेचकर नये मॉडल की दूसरी ले लेता है। कह रहा था--मुझे तो बेचनी ही है, आप ले लो।’’

‘‘तो आप ले लेते! बसों में क्यों धक्के खाते फिर रहे हैं?’’

‘‘अब क्या है कि मैं और वाइफ जब से रिटायर हुए हैं, हम दोनों की कोई पब्लिक लाइफ तो रही नहीं। वाइफ दिन-रात नौकरानी की तरह घर में खटती रहती हैं और मैं दिन भर घरेलू नौकर की तरह बाहर के कामों के लिए दौड़ता रहता हूँ। जिनको पैदा किया, पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया; जिनके लिए तमाम जायज-नाजायज तरीकों से पैसा कमाकर मकान बनवाया; जिनका कैरियर बनाने और घर बसाने के लिए दुनिया भर की भाग-दौड़ और जोड़-तोड़ की; वे आज हमारे घर के ही नहीं, हमारे भी मालिक बन बैठे हैं। मैं और वाइफ दिन-रात उनकी सेवा में लगे रहते हैं। अपने लिए कोई वक्त ही नहीं बचता। सो जब कहीं आना-जाना ही नहीं, तो गाड़ी रखकर क्या करें?’’

‘‘तो इस समय आप कहाँ जा रहे हैं?’’

‘‘क्या है कि सुबह-सुबह दूध लाने गये। फिर बच्चों के बच्चों को उनकी स्कूल बस तक छोड़ने गये। फिर सब्जियाँ, फल, अंडे, मक्खन, ब्रेड वगैरह लेने गये। नाश्ता करके बिजली का बिल जमा कराने गये। लौटकर नहाने-खाने के बाद थोड़ा आराम करने की सोच ही रहे थे कि बड़ी बहू का फोन आ गयाµमेरे लिए कनॉट प्लेस के खादी भंडार से हर्बल शैंपू ले आओ!’’

‘‘तो आप कनॉट प्लेस जा रहे हैं! मैं भी वहीं जा रहा हूँ। चलिए, अच्छा है। बहुत दिन हो गये आपसे मिल-बैठकर बातें किये। कॉफी होम चलेंगे, वहाँ बैठकर कॉफी पियेंगे, गपशप करेंगे और आपकी बहू के लिए हर्बल शैंपू लेकर साथ-साथ ही लौट आयेंगे।’’

‘‘मगर आप कनॉट प्लेस किस काम से जा रहे हैं?’’

‘‘समझिए कि आपकी बहू के लिए हर्बल शैंपू लेने।’’

‘‘मजाक मत कीजिए। वैसे आप न बताना चाहें, तो...’’

‘‘अरे, नहीं-नहीं, कपूर साहब! आप जैसे भले पड़ोसी से क्या छिपाना! बात यह है कि हमारे बच्चे तो, आप जानते हैं, दिल्ली में हैं नहीं। बेटा-बहू बंगलौर में हैं और बेटी सिंगापुर में। यहाँ हम मियाँ-बीवी दो ही हैं। भाभीजी की तरह मेरी बीवी तो नौकरी में थी नहीं। घर की मालकिन कहिए या नौकरानी, सब कुछ शुरू से वही है। लेकिन मेरी पेंशन हम दोनों के लिए काफी है। फ्लैट उस समय ले लिया था, जब मकान सस्ते थे और दफ्तर से इतना लोन मिल जाता था कि छोटा-सा फ्लैट लिया जा सके। गाड़ी-वाड़ी पहले भी कभी नहीं रखी। अपने लिए तो हमेशा दिल्ली परिवहन निगम ही जिंदाबाद रहा। अब तो अपने इलाके में मेट्रो भी आ गयी है, लेकिन मेट्रो स्टेशन हमारे लिए थोड़ा दूर पड़ता है, इसलिए ज्यादातर बस से ही आते-जाते हैं। वैसे, सीट मिल जाये, तो बस से बेहतर कोई सवारी नहीं। अंदर-बाहर के नजारे देखिए, लोगों से बातें कीजिए, आराम करना चाहें तो आँखें बंद करके एक झपकी ले लीजिए। और अब कहीं टाइम पर हाजिरी देने तो जाना नहीं। दोपहर के खाने के बाद श्रीमती जी शाम तक आराम करती हैं। मैं थोड़ा सैर-सपाटा करने और दोस्तों के साथ कॉफी पीने कनॉट प्लेस चला जाता हूँ। घंटे-डेढ़ घंटे बैठे, गपशप की, तरोताजा हुए और शाम तक वापस घर।’’

‘‘आप खुशकिस्मत हैं, वर्मा जी! बेटा-बहू बंगलौर में क्या करते हैं?’’

‘‘दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। अच्छा कमाते हैं, लेकिन घूमने-फिरने के अलावा उन्हें कोई शौक नहीं। पैसा जोड़ा, छुट्टी ली और देश या विदेश में कहीं घूम आये। दो-तीन बार हम दोनों को भी घुमा लाये हैं।’’

‘‘और आपकी लड़की?’’

‘‘वह एम.बी.ए. करके दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने लगी थी। वहीं एक लड़का मिल गया, जिससे उसने प्रेम विवाह कर लिया। शादी के बाद दोनों को सिंगापुर में बेहतर जॉब मिल गयी, तो वहाँ चले गये। इसी तरह लड़के ने भी अपने साथ काम करने वाली लड़की से प्रेम विवाह किया है और वे दोनों भी खुश हैं।’’

‘‘आप वाकई खुशकिस्मत हैं, वर्मा जी! आपके बच्चे आपकी अकेले की कमाई के बावजूद अच्छी तरह पढ़-लिखकर काबिल बन गये। इधर मैंने और मुझसे ज्यादा वाइफ ने दोनों लड़कों पर पानी की तरह पैसा बहाया। लेकिन वे पढ़ाई-लिखाई में मन लगाने की जगह मौज-मस्ती में ही डूबे रहे। हमारे यहाँ शुरू से दो गाड़ियाँ थींµएक मेरी, एक वाइफ की। लेकिन लड़कों ने कॉलेज के जमाने में ही दोनों हथिया लीं। साथ के लड़कों और लड़कियों को अपनी गाड़ियों में घुमाना, एक्सीडंेट और लड़ाई-झगड़े करना, बेकार में पेट्रोल और पैसा फूँकना। कई बार पुलिस के चक्कर में भी फँसे। ऐसे लड़कों को अच्छी जॉब कैसे मिलती? मैंने ही जैसे-तैसे जुगाड़ लगाकर उनको नौकरियाँ दिलायीं और उनकी शादियाँ करायीं। बहुएँ दोनों बेहतर पढ़ी-लिखी हैं और लड़कों से बेहतर जॉब में हैं। बड़ी बहू तो काफी पैसे वाले परिवार की है। छोटी बहू, जैसा कि मैंने आपको बताया, जरा कमजोर घर की है, लेकिन छोटे लड़के से ज्यादा पढ़ी है और ज्यादा कमाती है। मगर छोटा लड़का उसकी कद्र नहीं करता। दहेज न लाने के लिए ताने देता रहता है। सबसे बड़ा ताना यह कि वह दहेज में कार क्यों नहीं लायी। मुझे डर लगा कि यह लड़का कार के कारण कहीं बहू को मार न डाले, इसलिए अपनी नयी कार मैंने उसे दे दी।’’

‘‘अच्छा किया।’’

‘‘लेकिन, वर्मा जी, इससे एक नयी मुसीबत खड़ी हो गयी है। मैंने आपको बताया न, बड़े लड़के को नये-नये मॉडलों की कारें खरीदने का खब्त है। मुझसे कह रहा है कि मेरी पुरानी कार आप ले लो। जानते हैं, क्यों? पुरानी कार बेचने से उसे उतने पैसे नहीं मिलेंगे, जितने नयी कार के लिए चाहिए। इसलिए वह चाहता है कि मैं उसकी कार ले लूँ और उसे उतना पैसा दे दूँ, जितने में नयी गाड़ी आ जाये। मैंने कहा कि मुझे गाड़ी की जरूरत नहीं है, तो बोला कि तुमने छोटे भाई को गाड़ी दी है, तो मुझे भी दो। समझे आप? मेरे जीते जी मेरे पैसे पर अपना हक जता रहा है और मुझे नैतिकता सिखा रहा है!’’


‘‘फिर आपने क्या सोचा?’’

‘‘मैंने तो साफ कह दिया कि जब तक जिंदा हूँ, मेरी मर्जी कि मैं अपने पैसे का क्या करूँ। मुझे तेरी कार नहीं चाहिए। वैसे ही हमारे घर में चार कारें होने से पार्किंग की ऐसी प्रॉब्लम पैदा हो गयी है कि आये दिन पड़ोसियों से झगड़े होने लगे हैं। मुझे तो डर लगता है। आजकल ऐसे झगड़ों में गोलियाँ तक चल जाती हैं।’’


‘‘वैसे गाड़ी न रखना अच्छा ही है। अब दिल्ली में ड्राइव करना टेंशन और परेशानी मोल लेने के सिवा कुछ नहीं। बाहर देखिए, सड़क पर कितनी गाड़ियाँ हैं और दौड़ने के बजाय कैसे रेंग रही हैं।’’

‘‘वाकई हद हो गयी है। अब तो कारों की खरीद-बिक्री पर कोई रोक लगनी ही चाहिए।’’

‘‘जी, हाँ, अब उससे कार कंपनियों के अलावा किसी को कोई फायदा नहीं।’’

‘‘फायदा? कहिए कि नुकसान ही नुकसान है। एक तरफ तो बेशुमार पैसे और पेट्रोल की बर्बादी और दूसरी तरफ पॉल्यूशन, क्राइम और करप्शन में दिन दूनी बढ़ोतरी!’’

‘‘बिलकुल सही कहा आपने। कारों के कारण सड़कों पर क्राइम कितना बढ़ गया है!’’

‘‘सही कहने वाले तो बहुत हैं, भाई, पर सुनता कौन है?’’

‘‘क्यों? मैं सुन रहा हूँ। ये भाईसाहब सुन रहे हैं। वो बहनजी सुन रही हैं। कंडक्टर साहब भी सुन रहे हैं। क्यों, कंडक्टर साहब? सुन रहे हैं न?’’

‘‘जी, साहब जी! सब सुन रहे हैं और समझ भी रहे हैं। लेकिन बुरा न मानें तो एक बात कहें? जिनके घरों में चार-चार गाड़ियाँ हैं, पहले उनको ही कुछ सोचना और करना चाहिए।’’

Sunday, March 16, 2014

बाजारूपन के खतरों के बीच एक अलग पगडंडी की खोज : राजेश जोशी

'समावर्तन' के मार्च, 2014 के अंक में राजेश जोशी ने मेरी आत्मकथात्मक पुस्तक 'मेरा मुझ में कुछ नहीं' पर जो लिखा है, वह मैं यहाँ साझा कर रहा हूँ.--रमेश उपाध्याय 

 


'मेरा मुझ में कुछ नहीं' को पढ़ते हुए
(कुछ टूटी-बिखरी-सी टीपें)
राजेश जोशी 




‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ को पढ़ते हुए लगता है, जैसे रमेश उपाध्याय ने समानांतर चलती तीन समवर्ती प्रक्रियाओं को बिना किसी अतिरिक्त बलाघात के सहजता के साथ इसमें दर्ज कर दिया है। इस महाजीवन के बीच उम्र के फासलों को नापते हुए एक व्यक्ति के बनने की प्रक्रिया, व्यक्ति के रचनाकार बनने की प्रक्रिया और रचना के बनने की प्रक्रिया। आत्मकथात्मक अंश हों या जीवन, समाज और साहित्य के सवालों से जूझते विमर्श हों, सब एक-दूसरे से गुँथे-बुने हैं। इसलिए किसी भी एक अंश को दूसरे से अलगाकर नहीं देखा जा सकता। अक्षरों, मात्राओं, संयुक्ताक्षर, विरामचिह्न आदि से शब्द और वाक्य बनाते हुए बायें और दायें हाथ के बीच, शब्दों के बीच एक सही-सही स्पेस बनाते हुए गेज नापकर वे पेज बनाते चले गये हैं। बिना किसी प्रसंग को अलग से अंडरलाइन करते हुए भी उन्होंने सारी स्थितियों और वृत्तांतों को डोरी से बाँध दिया है। उन्होंने इसके प्रूफ पढ़कर यहाँ रख दिये हैं। जुजे सरामागु के उपन्यास ‘लिस्बन की घेराबंदी का इतिहास’ का प्रूफ रीडर जैसे अपनी ही आत्मकथा को कंपोज भी कर रहा है और उसका प्रूफ भी पढ़ रहा है। यह एक ऐसी आत्मकथा है, जो आत्मकथा नहीं है। किताब का प्रारंभ ही इस कथन से होता है कि ‘‘मुझे अपने बारे में लिखना-बोलना पसंद है, लेकिन मैं आत्मकथा नहीं लिखना चाहता’’।

आत्मकथात्मक अंशों को भी रमेश उपाध्याय कथात्मक होने से बचाते हैं। उनमें आत्म के विस्तार के कई वृत्तांत हैं, लेकिन उन्हें कथात्मक होने या बनाने से रमेश उपाध्याय बचाते-से लगते हैं। वे आत्मकथा के खतरों के प्रति भी सतर्क हैं और कथा के खतरों के प्रति भी। पहले ही अध्याय में यह आत्मस्वीकृति दर्ज है कि अपने बारे में लिखना-बोलना मुझे पसंद है, लेकिन मैं आत्मकथा नहीं लिखना चाहता। रिचर्ड सेन्नेट की पुस्तक ‘दि फॉल ऑफ पब्लिक मैन’ के एक अंश का उन्होंने हवाला दिया है, जिसमें वह कहता है कि ‘‘वर्तमान ‘पॉपुलर कल्चर’ ने आत्मकथात्मक लेखन को एक बाजारू चीज बना दिया है। इसने सार्वजनिक जीवन को नष्ट कर दिया है और निजी तथा सार्वजनिक के बीच का भेद मिटा दिया है। पहले सार्वजनिक जीवन में सभ्य और शिष्ट आचरण करने वाला व्यक्ति ‘अच्छा’ माना जाता था, जबकि इस संस्कृति के चलते ‘अच्छा’ व्यक्ति वह है, जो सार्वजनिक रूप से (मसलन, टेलीविजन के चैट शो में) सबको सब कुछ बताने को तैयार रहता है। अब लोग ‘सच्चा’ और ‘प्रामाणिक’ उसी व्यक्ति को मानते हैं, जो अंतरंग संबंधों का व्यापार करता हैµयानी अपने निजी जीवन में दूसरों को ताक-झाँक करने की खुली छूट देता है और दूसरों के निजी जीवन में ताक-झाँक करके उसकी ‘प्रामाणिक सूचना’ बाजार में बेचने का काम करता है।’’

रमेश उपाध्याय की यह एक बड़ी खूबी है कि वे अपनी दिक्कतों की बात भी एक बड़े परिप्रेक्ष्य में करते हैं। समस्या सिर्फ खुद के द्वारा आत्मकथा लिखने तक सीमित नहीं है, सवाल इस समय में आत्मकथात्मक लेखन के खतरों को समझने का है। यह खतरा सिर्फ आत्मकथा तक महदूद नहीं है, कथा पर भी यह खतरा मँडरा रहा है। कथा और बाजारवाद में टकराव की स्थिति बन रही है। ‘कथा को साहित्य बनाये रखने के लिए’ वाली टिप्पणी में भी इस खतरे की ओर संकेत करते हुए रमेश उपाध्याय ने लिखा है कि ‘‘कथासाहित्य के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ‘कथा’ को ‘साहित्य’ कैसे बनाये रखा जाये। बाजारवाद ने यों तो साहित्य की सभी विधाओं को पण्यवस्तु बना दिया है, लेकिन कहानी को (चाहे वह ‘कहानी’ के रूप में लिखी जाये, या ‘उपन्यास’ के रूप में, या फिल्म और टेलीविजन कार्यक्रमों की पटकथा के रूप में) सबसे ज्यादा बाजारू बनाया है।’’ कथा पर मँडराते इस खतरे से जूझने की एक मुसलसल कोशिश उनके लेखों और टिप्पणियों में हर जगह नजर आती है। इस समय सवाल सेलेब्रिटी बनने से इनकार करके बाजारू लेखन में शामिल होने से इनकार करने का है।

किताब की भूमिका में उन्होंने इस बात से इनकार करते हुए कि वे कोई ‘सेल्फमेड मैन’ हैं, पाओलो फ्रेरे का यह कथन उद्धृत किया है कि ‘‘दुनिया में कोई व्यक्ति अपना निर्माण स्वयं नहीं करता। शहर के जिन कोनों में ‘स्वनिर्मित’ लोग रहते हैं, वहाँ बहुत-से अनाम लोग छिपे रहते हैं।’’ इस पूरी किताब की संरचना को समझने के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना रमेश उपाध्याय के बनने की प्रक्रिया को समझने के लिए। इस किताब में ऐसे अनेक मित्रों, परिचितों और रचनाओं तथा उनके पात्रों का जिक्र आता है, जिन्होंने रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व और उनके रचनाकार के मानस को बनाने में तरह-तरह से अपनी भूमिका अदा की है। 

: दो :

मैं इस किताब का क्रम तैयार कर रहा होता, तो शायद ‘मेरे अध्ययन का विकास-क्रम’ वाले अध्याय को पहले रखना चाहता और ‘अजमेर में पहली बार’ को उसके बाद। यूँ तो जीवनानुभव और जीवन-प्रसंगों के अनेक टुकड़े यहाँ-वहाँ पूरी किताब में ही बिखरे हुए हैं, लेकिन ‘मेरे अध्ययन का विकास-क्रम’ में बचपन की और बाद के जीवन की कुछ मार्मिक छवियाँ थोड़ी कोताही बरतने के बावजूद सिलसिलेवार ढंग से मौजूद हैं। इस किताब को पढ़ते हुए कई बार लगता है कि रमेश उपाध्याय का कहानीकार रमेश और विमर्शकर्ता उपाध्याय जूझते-भिड़ते हुए एक-दूसरे से ज्यादा से ज्यादा जगह हथिया लेने पर आमादा हैं। कथाकार विमर्शकार को धकेलता है, तो विमर्शकार कथाकार की गर्दन नाप लेना चाहता है। इन दोनों की टकराहट से आत्मकथा का पारंपरिक और बाजार में चलने वाला लोकप्रिय ढाँचा जगह-जगह से टूट-फूट जाता है और एक नया स्वरूप आकार लेता दिखता है। शायद यही इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि भी है कि उसने इस समय के बाजारूपन के खतरों के बीच अपने लिए एक अलग पगडंडी खोज ली है, जिससे वह अपने समय के बाजारवाद को चुनौती भी दे सकती है, देती है।

जो हिस्से बचपन या जवानी के वृत्तांतों को सामने रखते हैं, उनमें भी अपने और अपने समय से एक बहस लगातार चलती रहती है। कंपोजीटर बनने और एक कंपोजीटर की तरह काम करने का वृत्तांत बहुत दिलचस्प है। कंप्यूटर और ऑफसेट के समय में जनमे और बड़े हुए पाठकों और लेखकों के लिए यह वृत्तांत महत्त्वपूर्ण होगा। रमेश उपाध्याय ने संक्षेप में ही सही, लेकिन उस पूरी प्रक्रिया को और उसकी पूरी टर्मिनोलॉजी को यहाँ दर्ज कर दिया है। प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में छपाई की उस पुरानी तकनीक की एक बहुत बड़ी भूमिका है। आज भी दुनिया की लाखों महान किताबें उस पुरानी तकनीक से छपी हुई हमारे पास हैं।

रमेश उपाध्याय ने अपने इस अनुभव पर ‘गलत-गलत’ शीर्षक से कहानी भी लिखी है। कहीं यह प्रश्न भी मन में उठता है कि कहानी या उपन्यास भी तो कहीं न कहीं आत्मकथात्मक ही होता है, चाहे अंशतः हो या पूर्णतः, पर होता तो है ही। बल्कि कहा जा सकता है कि पूरा लेखन कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में आत्मकथात्मक होता ही है। अगर रमेश उपाध्याय अपने उन जीवनानुभवों को अपनी कहानियों में लाते हैं, तो फिर आत्मकथा लिखने में क्या हर्ज है? उन्होंने जो खतरे गिनाये हैं, वे खतरे मौजूद हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन बाजार तो कुछ भी बेच सकता है। क्या इसलिए हमें लंबी प्रक्रियाओं से पाये गये अपने फॉर्म्स को बदल देना चाहिए? बाजार से टकराने का क्या कोई और उपाय हम नहीं ईजाद कर सकते? ऐसे कई सवाल मन में उठते हैं, उठ सकते हैं।

‘मेरे अध्ययन का विकास-क्रम’ में पिता की मृत्यु और वापस गाँव लौटने का प्रसंग बहुत मार्मिक है और उसके साथ ही रमेश उपाध्याय का जीवन-संघर्ष शुरू होता है। इस किताब में रमेश उपाध्याय को जानना, बिना किसी अतिशयोक्ति के, एक जीवन-संघर्ष की वृहत् गाथा से गुजरना है। कंपोजीटर बनने, फिर अलग-अलग पत्रिकाओं में साहित्यिक पत्राकारिता करने और वहाँ से अध्यापन की नौकरी तक आने का एक लंबा इतिहास यहाँ टुकड़ों-टुकड़ों में दर्ज है। इसी सब के बीच एक लेखक बनने की प्रक्रिया भी इसमें शामिल है। कहानी लिखने का एक दिलचस्प प्रसंग ‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’ वाले अध्याय में आया है। उनकी कहानी में अंतर्निहित आवेगµजिसकी रास वे अपनी भाषा और कथा-कौशल से एक हद तक हमेशा थामे रखते हैं या कहें कि खींचे रखते हैंµको समझने में यह प्रसंग मदद कर सकता है। इस प्रसंग का एक छोटा-सा हिस्सा है :

‘‘उस जुलूस पर कहानी लिखने के बारे में मैंने बिलकुल नहीं सोचा था। मगर उस दिन, करोल बाग के उस बस-स्टैंड पर बैठे-बैठे अचानक लगा कि उस पर कहानी लिखनी चाहिए। और कहानी लिखने की वह ‘अर्ज’ इतनी जबर्दस्त थी कि मैं उठा, स्टेशनरी की एक दुकान से एक कापी और कलम खरीदी, और वापस बस-स्टैंड पर आकर कहानी लिखने बैठ गया। गर्मियों के दिन थे। बस-स्टैंड के ऊपर एस्बेस्टस की शीट वाला शेड तप रहा था और नीचे तप रही थी सीमेंट से बनी वह पटिया, जिस पर मैं बैठा था। लेकिन परवाह नहीं। मैंने कापी खोलकर घुटनों पर रखी और लिखना शुरू कर दिया।’’

इस प्रसंग से उनकी रचना-प्रक्रिया में स्वतःस्फूर्तता और सामाजिक संघर्षों के प्रति उनके लगाव को समझा जा सकता है।

‘अजमेर में पहली बार’ में मनमोहिनी जी से एकतरफा प्रेम का एक दिलचस्प प्रसंग भी रमेश जी ने बहुत बेबाकी से लिखा है। मैंने रमेश उपाध्याय की कविताएँ कभी नहीं देखीं। जीवन के इस तरह के अनुभव कहीं न कहीं उनकी कविता में शायद ज्यादा मुलायम ढंग से आये हों। यूँ प्रेम-प्रसंग कवियों की संपत्ति नहीं है। इस प्रेम-प्रसंग में और ‘दंडद्वीप’ में क्या संबंध है, यह मुझे इस किताब को पढ़ने के बाद ही मालूम हुआ। ‘दंडद्वीप’ उपन्यास बहुत पहले पढ़ा था। शायद इस रहस्य का पता चलने के बाद उसे दोबारा पढ़ने का कुछ अलग आनंद हो सकता है। प्लेजर ऑफ रीडिंग का एक संबंध कहीं किताब में वर्णित वृत्तांत के पीछे छिपे अनुभव को वास्तविक रूप में जान लेने में भी होता है। किताब के स्रोत जान लेने से धीरे-धीरे किताब के साथ दोस्ती ज्यादा गहरी होती जाती है।

रमेश उपाध्याय की इस किताब में एक अध्याय है ‘साहित्य सृजन और चेतना के स्रोत’। यह अध्याय कई दृष्टियों से बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह अध्याय एक स्तर पर पिछले दो दशकों से चली आती कई बहसों के बारे में बहुत सारी बातों को स्पष्ट कर देता है। इतिहास का अंत, लौंग नाइनटींथ सेंचुरी और दि शॉर्ट ट्वेंटियथ संेचुरी, कींसीय अर्थशास्त्रा, जनतंत्रा को बचाने में साम्यवाद की भूमिका आदि अनेक सवालों को इस छोटे-से व्याख्यान में समेट लिया गया है। इसी अध्याय में हॉब्सबॉम को उद्धृत करते हुए रमेश उपाध्याय का मानना है कि बीसवीं सदी अतीत की दृष्टि से तो अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ही, भविष्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हॉब्सबॉम का कहना है--‘‘हम नहीं जानते कि आगे क्या होगा और तीसरी सहस्राब्दी कैसी होगी, लेकिन वह जैसी भी होगी, इस संक्षिप्त बीसवीं सदी (1914-1991) से ही अपना रूपाकार ग्रहण करेगी।’’

: तीन :

‘मेरी नाट्य-लेखन यात्रा’ में नाट्य-लेखन के क्षेत्रा में रमेश उपाध्याय के कामों का ब्यौरा मौजूद है। उनके अनेक नुक्कड़ नाटकों से मैं परिचित रहा हूँ। लेकिन रेडियो के लिए ध्वनि नाटकों के क्षेत्रा में भी उन्होंने इतना काम किया है, इसकी जानकारी मुझे इस किताब से ही मिली। उन्होंने सेमुअल बैकेट के नाटक ‘वेटिंग फॉर गोदो’ का रूपांतर ‘प्रतीक्षा और प्रतीक्षा’ के नाम से किया और दिलचस्प यह है कि इस नाटक में रमेश उपाध्याय और स्वयं प्रकाश दोनों ने अभिनय भी किया था। ‘पेपरवेट’, ‘सफाई चालू है’ और ‘भारत-भाग्य-विधाता’ नामक मौलिक नाटकों के लेखन के साथ-साथ  अनेक विश्व प्रसिद्ध कहानियों के नाट्य रूपांतर भी उन्होंने किये हैं। इस किताब की एक खूबी यह भी है कि कहीं विस्तार से और कहीं कोताही के साथ रमेश उपाध्याय के सभी पक्ष इस किताब में आ गये हैं।

रमेश उपाध्याय मनचाहे ढंग से मनचाहा काम करना चाहने वाले लेखक हैं। उन्हें अपने कमरे में, अपनी किताबों के बीच, अपनी मेज-कुर्सी पर बैठकर और कमरे का दरवाजा खुला रखकर लिखना प्रिय है। अपने कमरे में जिस कुर्सी पर बैठकर वे लिखते हैं, उसके अलावा किसी और कुर्सी का मोह या चाह उन्हें नहीं है। इस सादगी के साथ ही उनका मानना है और उनका स्वप्न भी है कि ‘‘मार्क्स ने ‘दुनिया के मजदूरो, एक हो!’ का जो नारा दिया था, उसको वास्तविकता में बदलने का समय आ गया है। पूँजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था है, तो समाजवाद भी एक वैश्विक व्यवस्था ही है। अतः स्वाभाविक तर्क यह बनता है कि जब पूँजी का भूमंडलीकरण हो सकता है, तो श्रम का भूमंडलीकरण क्यों नहीं हो सकता? पूँजीवाद सारी दुनिया में फैल सकता है, तो समाजवाद भी सारी दुनिया में फैल सकता है। अतः अब ‘एक देश में समाजवाद’ का सीमित स्वप्न देखने की जगह ‘‘सभी देशों में समाजवाद’’ का असीमित स्वप्न देखने का समय आ गया है।’’ (‘हमारे समय के स्वप्न’)