Monday, May 20, 2013

आगे की कहानी



अंग्रेजी में होने वाली आख्यान-चर्चा में ‘नैरेटिव’ (आख्यान) के साथ-साथ ‘स्यूडो-नैरेटिव’ (छद्म-आख्यान) की चर्चा भी होती है, जिसका संबंध प्रायः सोवियत संघ की समाजवादी व्यवस्था का गुणगान करने के लिए लिखी या लिखवायी गयी प्रचारात्मक कहानियों से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि ‘समाजवादी यथार्थवाद’ के नाम पर लिखी या लिखवायी गयी ऐसी कहानियाँ झूठी या गढ़ी हुई कहानियाँ थीं, जिनसे आख्यान का नाम बदनाम हुआ। लेकिन उस चर्चा में उन कहानियों का जिक्र कहीं नहीं होता, जो धर्म, नैतिकता, सदाचार, शिष्टाचार या व्यापार की शिक्षा देने के नाम पर अथवा जनता का मनोरंजन करने के नाम पर लिखी या लिखवायी जाती हैं। ऐसी कहानियाँ रूस की समाजवादी व्यवस्था के जन्म से पहले भी लिखी-लिखवायी जाती थीं और आज भी दुनिया भर में लिखी-लिखवायी जाती हैं, जबकि सोवियत संघ का नाम ही दुनिया के नक्शे से मिट चुका है।

लेखक को थोड़े-से पैसे या कोई प्रलोभन देकर किसी भी विषय पर कैसी भी कहानी लिखवा लेने वाले लोग केवल फिल्मी दुनिया में नहीं होते, वे पत्रकारिता, पुस्तक-प्रकाशन, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और धर्म तथा राजनीति के क्षेत्रों में भी होते हैं। मगर आख्यानशास्त्रियों का ध्यान या तो इस तरफ जाता ही नहीं, या वे ऐसी कहानियों को ‘छद्म-आख्यान’ की कोटि में नहीं रखते। आजकल मिथकों पर बच्चों और बड़ों के लिए कहानियाँ लिखवाने, चित्रमालाएँ बनवाने, फिल्मों और टी.वी. सीरियलों के लिए मिथक-आधारित कथाएँ-पटकथाएँ लिखवाने का धंधा दुनिया भर में खूब चल रहा है। लेकिन मिथकों को कोई आख्यानशास्त्री ‘छद्म-आख्यान’ नहीं कहता। उलटे, उन्हें ‘पवित्र आख्यान’ कहकर महिमामंडित किया जाता है। उदाहरण के लिए, 1984 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले) से प्रकाशित पुस्तक ‘सेक्रेड नैरेटिव: रीडिंग्स इन दि थियरी ऑफ मिथ’ को देखा जा सकता है, जो संपादक एलन डंडास के इस वक्तव्य से शुरू होती है कि ‘‘मिथक पवित्र आख्यान हैं’’ और पुस्तक में शामिल इक्कीस टिप्पणीकार इसका समर्थन करते हैं!

आख्यानशास्त्री जानते और मानते हैं कि टी.वी. पर दिखाये जाने वाले प्रायः सभी विज्ञापनों में एक आख्यान होता है--कुछ सेकेंड जितनी छोटी ही सही, एक कहानी होती है--और विज्ञापन का दूसरा नाम प्रचार है। लेकिन इन आख्यानों को न तो कोई छद्म-आख्यान कहता है और न प्रचारात्मक कहानियाँ। इसी तरह धर्म, सभ्यता, संस्कृति, नैतिकता, सदाचार, देशभक्ति या राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीतिक प्रचार करने वाली कहानियों को भी कोई प्रचारात्मक नहीं कहता। मगर जनहित, जनवाद, समाजवाद इत्यादि की बात करने वाली कहानियों पर तुरंत ‘प्रचारात्मक’ का ठप्पा लगा दिया जाता है और उन्हें ‘छद्म-आख्यान’ की कोटि में डाल दिया जाता है।

यह सब देखकर लगता है कि पिछले कुछ वर्षों में पूँजीवादी भूमंडलीकरण के साथ-साथ जिस आख्यानशास्त्र का बोलबाला हुआ है, वह शायद स्वयं ही एक जबर्दस्त प्रचार और छद्म-आख्यान है। ‘महा-आख्यानों’ के अंत की घोषणा करने वाले उत्तर-आधुनिकतावाद से आख्यानशास्त्र का क्या संबंध है, यह जगजाहिर है। और अब यह भी कोई छिपी हुई बात नहीं रह गयी कि उत्तर-आधुनिकतावाद आज के भूमंडलीय पूँजीवाद की विचारधारा है। अतः जब ‘आख्यान’ के आगे ‘छद्म’ और ‘पवित्र’ जैसे विशेषण लगाये जायें, तो इसमें निहित राजनीति और प्रचारात्मकता को समझना कुछ मुश्किल नहीं रहता।

लेकिन हमारा वर्तमान समय कुछ ऐसा है कि इसमें सच और झूठ या ‘फैक्ट’ और ‘फिक्शन’ में फर्क कर पाना बहुत मुश्किल हो गया है। कारण यह है कि घर में माता-पिता और स्कूल में अपने शिक्षकों से झूठ बोलने वाले बच्चों से लेकर अपने देश की जनता और शेष सारी दुनिया से झूठ बोलने वाले राष्ट्राध्यक्षों तक तमाम लोग झूठी कहानियाँ गढ़ते हैं और मीडिया तो छोटे-छोटे विज्ञापनों से लेकर बड़ी-बड़ी खबरों तक में प्रायः झूठी ही कहानियों (‘स्टोरीज’) का कारोबार करता है।

उदाहरण के लिए, अमरीका ने इराक में व्यापक विनाशकारी हथियारों के होने की झूठी कहानी गढ़ी और उसके आधार पर किये गये आक्रमण से लाखों लोगों को तबाह करके उस देश पर कब्जा कर लिया। लेकिन इस महा छद्म-आख्यान का विरोध कितने आख्यानशास्त्रियों और उत्तर-आधुनिकतावादियों ने किया? और इस सबमें मीडिया की भूमिका क्या रही, जिसने असंख्य छोटे-छोटे छद्म-आख्यान समाचारों के नाम पर सारी दुनिया में फैलाये?

साहित्य के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि सच कहने के लिए यही एक जगह बची है। लेकिन क्या यह भी सच है? शायद नहीं। साहित्य में भी खूब झूठ बोला जाता है और, बकौल रामविलास शर्मा, कुछ लोग तो झूठ इतनी सफाई और खूबसूरती से बोलते हैं कि उसे सच से भी ज्यादा सुंदर, आकर्षक और प्रभावशाली बना देते हैं। यह चीज आज हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में ही नहीं, सभी देशों की सभी भाषाओं के जन-विरोधी या मानव-विरोधी साहित्य में देखी जा सकती है।

ऐसी स्थिति में अगर कोई यह कहे कि वह यथार्थवादी है या यथार्थवादी कहानी लिखता है, तो सयाने लोग उससे शायद यही पूछेंगे कि यथार्थवाद क्या होता है। और निश्चित है कि आज बड़े से बड़े यथार्थवादी के लिए यह बताना मुश्किल हो जायेगा कि यथार्थवाद क्या है। यथार्थवाद के कुछ भिन्न और परस्पर-विरोधी रूप तो पहले के साहित्य में भी देखे जा सकते थे--मसलन, ‘नेचुरलिस्ट’ लोगों का यथार्थवाद, ‘रोमेंटिक रिवोल्यूशनरी’ लोगों का यथार्थवाद, ‘बुर्जुआ क्रिटिकल रियलिज्म’ या ‘सोशलिस्ट रियलिज्म’ में यकीन करने वालों का यथार्थवाद और हम हिंदी वालों का ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’। इन विभिन्न प्रकार के यथार्थवादों के बीच चाहे जितना फर्क, अंतराल या अंतर्विरोध रहा हो, एक चीज समान थी: सच के पक्ष में खड़े होकर झूठ से लड़ना। ज्यादातर मामलों में सबके ‘सच’ और ‘झूठ’ अलग-अलग होते थे, फिर भी एक चीज सबमें समान रहती थी: असत्य के विरुद्ध सत्य के लिए लड़ना, अन्याय के विरुद्ध न्याय के लिए लड़ना, बुराई के विरुद्ध अच्छाई के लिए लड़ना, अनैतिकता के विरुद्ध नैतिकता के लिए लड़ना, भदेसपन के विरुद्ध उदात्तता के लिए लड़ना, कुरूपता के विरुद्ध सुंदरता के लिए लड़ना और बर्बरता के विरुद्ध मनुष्यता के लिए लड़ना। यथार्थवाद वास्तव में यही था, चाहे उसका नाम और रूप कुछ भी हो।

मगर आज? उत्तर-आधुनिकतावाद ने सारे यथार्थवादों की छुट्टी कर दी है। उसमें सत्य और असत्य के बीच, न्याय और अन्याय के बीच, अच्छे और बुरे के बीच, नैतिक और अनैतिक के बीच, उदात्त और भदेस के बीच, सुंदर और असुंदर के बीच, मनुष्यता और बर्बरता के बीच कोई फर्क ही नहीं किया जाता। उसमें तमाम परस्पर-विरोधी यथार्थ कथाकार के खिलंदड़ेपन या मसखरेपन और हर चीज को तुच्छ तथा हास्यास्पद बताकर खारिज कर देने वाले बड़प्पन के चलते एक जैसे हो जाते हैं! उत्तर-आधुनिकतावादी साहित्यिक सिद्धांत लेखकों को यही सिखाते हैं और उनके अनुसार लिखने वाले लेखक अपनी कहानियों में यही दिखाते हैं!

शायद इसीलिए आज के अधिकांश फैशनेबल कथा-लेखन को देखकर तरह-तरह के संदेह मन में उठते हैं, जैसेµक्या हम एक विश्वव्यापी विराट् विभ्रम में जी रहे हैं, जहाँ सच, यथार्थ या वास्तविकता को पकड़ पाना और उसे समझकर उसकी कहानी कह पाना असंभव हो गया है? क्या कहानी लिखना ही व्यर्थ हो गया है? क्या इसीलिए बहुत-से कहानीकारों ने कहानी लिखना बंद कर दिया है? क्या इसीलिए नये कहानीकार भी कहानी में कुछ खास नया नहीं कर पा रहे हैं? क्या इसीलिए ऐसा लग रहा है कि कहानी ठहर-सी गयी है और आगे नहीं बढ़ पा रही है?

लेकिन कहानी हमारे जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है। मानवीय जीवन जीने के लिए हमें बहुत सारी अमानवीयता से लड़ते-भिड़ते आगे बढ़ना होता है। उस लड़ाई में कहानियाँ कदम-कदम पर हमारा साथ देती हैं। इसीलिए हम कहानियाँ कहते-सुनते हैं, पुरानी कहानियों को नये रूप तथा नये अर्थ देते हैं (तथाकथित पवित्र आख्यानों को भी नयी व्याख्याएँ देकर फिर-फिर रचते हैं) और नयी जरूरतों के मुताबिक नयी कहानियाँ गढ़ते हैं। इसी तरह जिंदगी आगे बढ़ती है, इसी तरह कहानी आगे बढ़ती है।

1960 के आसपास सारी दुनिया में यह महसूस किया जाने लगा था कि आधुनिकतावाद कहानी का दुश्मन है, क्योंकि वह कहानी को मनुष्य के उपयोग की वस्तु नहीं रहने देना चाहता, बल्कि एक शुद्ध कलात्मक या सौंदर्यशास्त्रीय वस्तु बनाना चाहता है। इसके लिए आधुनिकतावादियों ने कहानी में से आख्यान को निकालने की कोशिश की, जिससे कहानी का कहानीपन खत्म हुआ और वह कहानी ही नहीं रही, ‘एंटी-स्टोरी’ (या हिंदी की ‘अकहानी’) बन गयी। उन्होंने कहानी के जो सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिमान बनाये, वे कहानी के ही विरुद्ध थे। इसीलिए उन प्रतिमानों के आधार पर की गयी कहानी-समीक्षा में यह प्रश्न कभी नहीं उठाया गया कि कहानीकार को अपनी कहानी की अंतर्वस्तु जिस समाज से मिलती है, उस समाज के प्रति और जिस भाषा में वह कहानी लिखता है, उस भाषा के प्रति और स्वयं कहानी की साहित्यिक विधा के प्रति भी उसका कोई दायित्व होता है या नहीं!

हिंदी में ‘जनवादी कहानी’ ने आधुनिकतावादी ‘नयी कहानी’ और ‘अकहानी’ के आंदोलनों की कमियों, कमजोरियों और गलतियों से काफी कुछ सीखा। उसने स्वयं को जनता और जन-आंदोलनों से जोड़ा। कहानी को सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बनाने का प्रयास किया। हिंदी कहानी की समृद्ध परंपरा को पहचाना और उसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया। उसी के जरिये हिंदी कहानी, जो एकदम सपाट चेहरे वाले ‘वह’ की बकवास हो गयी थी, ऐसे जीते-जागते लोगों की कहानी बनी, जो अपने नाम-धाम और काम से पहचाने जा सकते थे। और उसी के जरिये कहानी में वह कहानीपन वापस आया, जो ‘नयी कहानी’ और ‘अकहानी’ के आधुनिकतावादियों ने लगभग गायब कर दिया था।

लेकिन देखते-देखते कहानी क्या, दुनिया ही बदल गयी। पूँजीवादी भूमंडलीकरण की प्रचंड आँधी पहले का बहुत कुछ उड़ा ले गयी। यहाँ तक कि सोवियत संघ जैसी ‘महाशक्ति’ भी उसमें ध्वस्त हो गयी और आत्मनिर्भरता की बात करने वाले हमारे देश में निजीकरण तथा उदारीकरण की तेज धूल भरी हवाएँ चलने लगीं, जिनके कारण समाजवाद का सपना तो धूमिल हुआ ही, जनवाद को भी बेकार बताने और बनाने के सिलसिले शुरू हो गये। ‘जनवादी कहानी’ साहित्य में ‘आउट ऑफ फैशन’ हो गयी और ‘जादुई यथार्थवाद’ का नया फैशन चल पड़ा।

ऐसा लगने लगा, जैसे कल तक जो सामाजिक यथार्थ कहानी में आ रहा था, वह किसी जादू के जोर से अचानक गायब हो गया हो! जैसे भूख, गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी, शोषण, दमन, उत्पीड़न आदि की समस्याएँ छूमंतर हो गयी हों! शोषक-उत्पीड़क पूँजीपतियों और भूस्वामियों को मानो आम माफी मिल गयी हो और वामपंथी-जनवादी लोग ही कटघरे में खड़े किये जाने लायक रह गये हों! कल तक हिंदी का जो कहानीकार प्रेमचंद, निराला और मुक्तिबोध के नाम जपता हुआ दबे-कुचले, सताये हुए मजदूरों, किसानों और मध्यवर्गीय मेहनतकश स्त्री-पुरुषों को क्रांति का हिरावल दस्ता समझता था, वह मानो गरीब ‘हिंदीवाला’ से अचानक अमीर अंग्रेजी वाला हो गया और किसी ऊँचे आसन पर बैठकर हिंदी के लेखकों पर हिकारत के साथ हँसने लगा। यथार्थ को समझने और बदलने से संबंधित गंभीर चिंताएँ मानो एकाएक ही बेमानी हो गयीं और खिलंदड़ापन ही सबसे बड़ा साहित्यिक मूल्य बन गया। हिंदी के बहुत-से कहानीकार एकदम पलटकर जनोन्मुख से अभिजनोन्मुख हो गये। वे अपनी कहानियों में अभिजनों की-सी भाषा बोलने लगे तथा अभिजनों के प्रिय विषयों पर चटपटी कहानियाँ लिखने लगे।

इसी दौरान यह भी हुआ कि हिंदी के ऐसे बहुत-से लेखक, जो अपसंस्कृति, उपभोक्तावाद और बाजारवाद को तथा इन चीजों से समाज को प्रदूषित करने वाले मीडिया को कोसा करते थे, अचानक मीडिया में छाये रहने में ही अपनी कुशलता और सफलता समझने लगे। वे ‘‘जन-जन तक अपनी बात पहुँचाने’’ के लिए ‘‘बड़े संचार माध्यमों का इस्तेमाल’’ करने की बातें करने लगे और लघु पत्रिकाओं के बारे में कहने लगे कि ये लेखकों द्वारा और लेखकों के लिए ही निकाली जाती हैं, आम जनता तक तो पहुँचती नहीं, इसलिए इनमें लिखना व्यर्थ है! अब यह तो वे ही जानें कि मीडिया का इस्तेमाल उन्होंने किया अथवा मीडिया ने उनका, लेकिन उनके द्वारा लिखी जा रही कहानियों पर मीडिया का असर साफ दिखायी पड़ रहा है। मीडिया हर चीज को सनसनीखेज बनाता है, चाहे वह समाचार हो या विचार, लोगों की जिंदगी हो या उनकी कहानी। वह कहानी को सेक्स, हिंसा और स्केंडलबाजी से ही सनसनीखेज बना सकता था और यही उसने किया। विडंबना यह कि कुछ ही हजार छपने वाली कुछ साहित्यिक पत्रिकाएँ भी बड़े संचार माध्यमों की-सी सनसनीखेज पत्रकारिता करने लगीं। उनमें ऐसी कहानियाँ छपने लगीं, जिनकी साहित्यिक गुणवत्ता या मूल्यवत्ता चाहे अत्यंत संदिग्ध हो, पर उनसे किसी तरह की सनसनी पैदा होती हो!

यहाँ कहानी-समीक्षा एक सार्थक हस्तक्षेप कर सकती थी। लेकिन हिंदी में कहानी की समीक्षा नहीं, सिर्फ चर्चा होती है और चर्चित कहानी को ही अच्छी, श्रेष्ठ, महत्त्वपूर्ण और प्रतिनिधि कहानी मान लिया जाता है। इसलिए हिंदी के कहानीकार चर्चित हो जाने में ही अपनी सफलता समझने लगते हैं। उन्हें कहानी का सार्थक, सोद्देश्य, प्रासंगिक, कलात्मक आदि होना महत्त्वपूर्ण नहीं लगता, महत्त्वपूर्ण लगता है चर्चित होना। और चतुर कहानीकार जानते हैं कि चर्चा कैसी कहानियों की होती है तथा किस प्रकार करायी जाती है। लेकिन ऐसी प्रायोजित चर्चाओं से न तो कहानी आगे बढ़ती है, न कहानी-समीक्षा। आगे बढ़ने के लिए बदलती हुई वर्तमान परिस्थितियों को अतीत और भविष्य के संदर्भ में समझना तथा उनके बीच से आगे जाने का रास्ता निकालना जरूरी है।

आज के हिंदी साहित्य में परिवर्तन तो बहुत हो रहे हैं, लेकिन हर तरह के परिवर्तन विकास और प्रगति के सूचक नहीं होते। अतः उनकी गंभीर समीक्षा अत्यंत आवश्यक है। उदाहरण के लिए, पिछले कुछ ही वर्षों में हमारी साहित्यिक शब्दावली में जो परिवर्तन आये हैं, उन पर विचार करें। साहित्य में तो कोई आंदोलन रहा ही नहीं, जन-आंदोलनों या सामाजिक आंदोलनों के प्रति भी हमारा रवैया किस तरह बदल गया है, इसे हम अपनी साहित्यिक शब्दावली के स्तर पर स्पष्ट देख सकते हैं। ‘आंदोलन’ देखते-देखते ‘विमर्श’ बन गये हैं। स्त्री आंदोलन की जगह स्त्री विमर्श! दलित आंदोलन की जगह दलित विमर्श! आंदोलन की कहानी लिखने के लिए लेखक को आंदोलनकारियों के बीच जाना पड़ता था, उनके सुख-दुख और संघर्ष में शामिल होना पड़ता था, कुछ कष्ट उठाने पड़ते थे, कुछ त्याग और बलिदान करने के लिए भी तैयार रहना पड़ता था; जबकि विमर्श मंचों पर बोलकर या घर में अकेले बैठकर लिखते हुए भी किया जा सकता है। अतः विमर्शों वाली कहानी जन-आंदोलनों से ही नहीं, जन-जीवन से भी कटती जा रही है।

इसी तरह ‘वर्ग’ की जगह ‘जाति’ की बात होने लगी है। ‘जनता’ की जगह ‘अस्मिता’ की बात होने लगी है। ‘सामाजिक संघर्ष’ की जगह ‘पहचान के संकट’ की बात होने लगी है। ‘मुक्ति’ की जगह ‘मान’ की बात होने लगी है। लेकिन इन परिवर्तनों से हासिल क्या हो रहा है? क्या वर्ग को भुलाकर जाति की बात करने से गरीब दलितों का शोषण, दमन और उत्पीड़न बंद हो जायेगा? क्या अलग-अलग अस्मिताओं की बात करने से जनता की समस्याएँ हल हो जायेंगी? क्या अपनी अस्तित्व-रक्षा के लिए सामाजिक संघर्ष करने वालों का अस्तित्व अपनी कोई अलग पहचान बना लेने से बच जायेगा? क्या ‘मुक्ति’ के लिए संघर्ष करने की जगह ‘मान’ की माँग करने से स्त्रियों और दलितों को समाज में आजादी और बराबरी के अधिकार मिल जायेंगे?

यदि नहीं, तो हिंदी कहानी और कहानी-समीक्षा में कहीं कोई ऐसी रचनात्मक या आलोचनात्मक पहल क्यों नहीं हुई, जिससे पता चलता कि सामाजिक समस्याओं के प्रति हमारे दृष्टिकोण में यह भारी परिवर्तन अचानक कैसे और क्यों हो गया? मसलन, क्या स्त्रियों और दलितों की शोषण, दमन और उत्पीड़न से मुक्ति हो चुकी थी कि अब सिर्फ उनके मान-सम्मान का सवाल हल करना ही बाकी रह गया था? यदि नहीं, तो क्या उनकी रोजी-रोटी के सवाल से ज्यादा जरूरी उनके मान-सम्मान का सवाल था? समझ में नहीं आता कि हिंदी की कहानी और कहानी-समीक्षा ने इन बेहद जरूरी सवालों के जवाब खोजने की कोई कोशिश किये बगैर इन परिवर्तनों को क्यों और किस आधार पर स्वीकार कर लिया!

बीसवीं सदी के आठवें दशक में जब हिंदी में प्रगतिशील और जनवादी कहानी का एक नया दौर शुरू हुआ था, ऐसे सवालों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ था, जिससे कहानी-लेखन पर छायी हुई बहुत-सी वैचारिक धुंध साफ हुई थी और नयी सृजनशीलता की दिशाएँ स्पष्ट हुई थीं। उस समय की कहानी ‘नयी कहानी’, ‘अकहानी’, ‘समांतर कहानी’ आदि के नारों और फार्मूलों में कैद थी और कहानीकार ‘अपने जिये-भोगे’ को ‘स्वानुभूत सत्य’ के रूप में व्यक्त करने को ही कहानी लिखना समझते थे। ये नारे और फार्मूले अब बेकार हो चुके थे, अतः उस समय की कहानी से आगे की कहानी की बातें होने लगी थीं। उदाहरण के लिए, 1976 में हिंदी कहानी का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए दिल्ली में आयोजित एक संगोष्ठी में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने आगे की कहानी के लिए एक पंचसूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया था :

1. पश्चिमी फैशनपरस्त अंधानुकरण से बचो।
2. शिल्प को आतंक मत बनाओ।
3. उनके लिए भी लिखो जो अर्द्धशिक्षित हैं और उनके लिए भी जो अशिक्षित हैं, जिन्हें तुम्हारी कहानी पढ़कर सुनायी जा सके।
4. इस देश की तीन-चौथाई जनता की सोच-समझ को वाणी दो, जो वह खुद नहीं कह सकती। और,
5. कहानी को लोककथाओं और ‘फेबल्स’ की सादगी की ओर मोड़ो, उनके विन्यास से सीखो, और उसे आम आदमी के मन से जोड़ो।

जाहिर है, ये बातें इसीलिए कही गयी थीं कि उस समय की हिंदी कहानी में पश्चिमी फैशनपरस्त अंधानुकरण हो रहा था, शिल्प को आतंक बनाया जा रहा था, कहानी केवल शिक्षितों के लिए लिखी जा रही थी, उसमें देश की तीन-चौथाई जनता की सोच-समझ को वाणी नहीं दी जा रही थी और कहानी ऐसे जटिल विन्यास वाली कहानी बनती जा रही थी कि वह आम आदमी के मन से नहीं जुड़ पा रही थी। इन्हीं चीजों के विरुद्ध ‘जनवादी कहानी’ का आंदोलन शुरू हुआ था, जो उस समय के हिसाब से ‘आगे की कहानी’ थी।

क्या आज की हिंदी कहानी में, कुछ बदले हुए रूपों में, कमोबेश यही सब फिर से नहीं हो रहा है? ध्यान से देखें, तो लगेगा कि न केवल हो रहा है, बल्कि और ज्यादा बुरे तथा विकृत रूपों में हो रहा है।

जाहिर है कि ‘जनवादी कहानी’ के बाद हिंदी कहानी उस कार्यक्रम के अनुसार आगे नहीं बढ़ी। इसके विपरीत वह आगे बढ़ी ऐसी दो दिशाओं में, जो इस कार्यक्रम से कहानी को दूर ले जाने वाली थीं। एक दिशा थी ‘‘पश्चिमी फैशनपरस्त अंधानुकरण’’ तथा ‘‘शिल्प को आतंक बनाने’’ वाले कहानी-लेखन की दिशा, जिसमें आगे बढ़कर हिंदी कहानी जादुई यथार्थवादी और उत्तर-आधुनिकतावादी हुई। इस दिशा में जाकर हिंदी कहानी जनोन्मुख होने के बजाय बड़ी बेशर्मी से अभिजनोन्मुख हुई और ‘‘आम आदमी के मन से जुड़ने’’ के बजाय खास आदमियों के मन को मोहने की आकांक्षा से किये जाने वाले बौद्धिकता के व्यापार में बदल गयी। दूसरी दिशा ऊपरी तौर पर हिंदी कहानी को जनोन्मुख बनाने वाली लगती थी, जिसमें आगे बढ़कर हिंदी कहानी स्त्रीवादी और दलितवादी विमर्शों की कहानी बनी। लेकिन वास्तव में यह दिशा कहानी को सेक्स, हिंसा और जातिवादी लेखन के फार्मूलों की ओर ले गयी और कहानी जनोन्मुख होने के बजाय बाजारोन्मुख हो गयी।

‘जनवादी कहानी’ से पहले के फैशनपरस्त कहानीकार पश्चिमी फैशनों का अनुकरण करते थे, तो कम से कम पश्चिम की चीजों को पढ़ते तो थे। आगे चलकर यह हुआ कि उस अनुकरण का ही अनुकरण करते हुए बहुत-सी कहानियाँ लिखी जाने लगीं। ‘जनवादी कहानी’ के बाद शिल्प को पुनः आतंक बनाया जाने लगा। अशिक्षितों और अर्द्धशिक्षितों की तो बात ही क्या, शिक्षितों में भी केवल कुछ प्रभुत्वशाली संपादकों तथा आलोचकों को ध्यान में रखकर कहानियाँ लिखी जाने लगीं। जनता की सोच-समझ को वाणी देने की बात दूर, बहुत-से कहानीकार तो जन, जनता, जनवाद, समाजवाद आदि के नाम से ही बिदकने लगे और स्वयं ‘जन’ होकर भी ‘अभिजनों’ की-सी सोच-समझ के साथ और उन्हीं के लिए कहानी लिखने लगे। ‘सादगी’ या ‘आम आदमी के मन’ से तो कहानी का मानो कोई संबंध ही नहीं रहा। आयातित उच्च प्रौद्योगिकी के साथ आयी और अंधानुकरण के रूप में अपना ली गयी पश्चिमी जीवन-शैली में सादगी कहाँ?

ऐसी स्थिति में आगे बढ़ने के लिए कहानीकारों को यह सोचना होगा कि आज के पूँजीवाद का विकल्प क्या हो सकता है। आज के वैश्विक पूँजीवाद का विकल्प वैश्विक समाजवाद ही हो सकता है। अतः सोचना यह है कि हम उसकी दिशा में कैसे आगे बढ़ें।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने आगे की कहानी का जो पंचसूत्री कार्यक्रम दिया था, वह अभी अप्रासंगिक नहीं हुआ है। लेकिन आज की नयी परिस्थितियों में वह अपर्याप्त अवश्य लगता है। इसलिए मैं उसमें अपनी तरफ से पाँच सूत्र और जोड़ना चाहता हूँ :

1. चालू विमर्शों की कहानी लिखने से बचो।
2. बदलते हुए यथार्थ को देखो और यथार्थ को बदलने के लिए लिखो।
3. दुनिया भर के उत्कृष्ट कहानी-लेखन से सीखो, पर अपनी कथा परंपरा में और अपनी जनता के लिए लिखो।
4. साहित्य की बदली हुई शब्दावली को आँख मूँदकर मत अपनाओ।
5. वैश्विक पूँजीवाद के विरुद्ध वैश्विक समाजवाद का स्वप्न साकार करने के लिए अच्छी कहानियाँ बेखटके गढ़ो।

--रमेश उपाध्याय



Friday, March 29, 2013

रमेश उपाध्याय की नयी किताब ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ पर विचार-गोष्ठी


‘‘नये लेखकों के लिए तो ‘राइटर्स कंपेनियन’ या लेखक-सचहर की तरह की किताब है यह--पठनीय, संग्रहणी और बहुत दूर तक आचरणीय भी।’’--विश्वनाथ त्रिपाठी

बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा तथा बहुआयामी व्यक्तित्व वाले लेखक और ‘कथन’ के संस्थापक संपादक रमेश उपाध्याय के 71वें जन्मदिन पर उनकी नयी किताब ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ का लोकार्पण 1 मार्च, 2013 को नयी दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में संपन्न हुआ। इस अवसर पर ‘कथन’ पत्रिका और शब्दसंधान प्रकाशन के संयुक्त प्रयास से एक विचार-गोष्ठी का आयोजन भी किया गया, जिसमें सुप्रसिद्ध साहित्यकारों ने किताब पर तथा उसके बहाने रमेश उपाध्याय के कृतित्व एवं व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर अपने विचार व्यक्त किये।


समारोह के अध्यक्ष थे विश्वनाथ त्रिपाठी और मुख्य अतिथि मैनेजर पांडेय। वक्ता थे कवि लीलाधर मंडलोई, कथाकार अल्पना मिश्र, व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय, युवा आलोचक राकेश कुमार और विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी। ‘कथन’ की संपादक संज्ञा उपाध्याय ने स्वागत वक्तव्य दिया और कार्यक्रम का संचालन युवा आलोचक और ‘बनास जन’ के संपादक पल्लव ने किया। 
 
पल्लव

पल्लव ने रमेश उपाध्याय को जन्मदिन की बधाई देते हुए कहा कि ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ आत्मकथा नहीं है, किंतु ऐसी आत्मकथात्मक कृति है, जिसे पढ़कर हम रमेश उपाध्याय के विपुल, वैविध्यपूर्ण और विचारोत्तेजक लेखन, ‘कथन’ जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका तथा ‘आज के सवाल’ जैसी अद्भुत पुस्तक शृंखला के संपादन की विशिष्टता के साथ-साथ उनके अध्ययन, अध्यापन, साहित्यिक आंदोलन, लेखक-संगठन आदि विभिन्न क्षेत्रों में संलग्न रहने के दौरान किये गये गंभीर मनन और चिंतन की व्यापकता को समझ सकते हैं।

पुस्तक पर हुई विचार-गोष्ठी से पहले रमेश उपाध्याय के दो मित्रों ने आत्मीयतापूर्ण संस्मरण सुनाते हुए उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं की चर्चा की।

प्रेम जनमेजय
व्यंग्यकार तथा ‘व्यंग्य यात्रा’ के संपादक प्रेम जनमेजय रमेश उपाध्याय के पड़ोसी हैं और 1973 से लेकर 2004 में रमेश उपाध्याय के रिटायर होने तक दिल्ली विश्वविद्यालय में उनके साथी प्राध्यापक रहे हैं। उन्होंने अनेक उदाहरण देते हुए बताया कि रमेश उपाध्याय अच्छे मित्र, अच्छे इंसान, अच्छे लेखक, अच्छे संपादक इत्यादि होने के साथ-साथ बहुत अच्छे शिक्षक भी हैं, जिन्होंने न केवल अपने छात्रों को, बल्कि साथ के शिक्षकों को भी कई प्रकार से शिक्षित किया है। 

देवेन्द्र मेवाड़ी

प्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी ने उस समय के संस्मरण सुनाये, जब 1965 में रमेश उपाध्याय दिल्ली में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादकीय विभाग में थे और जब 1969 में उन्होंने अजमेर से ‘ऊर्जा’ नामक विज्ञान पत्रिका निकालने की योजना बनायी। उन्होंने उस समय का रमेश उपाध्याय का लिखा एक पत्र भी पढ़कर सुनाया।


इसके बाद पुस्तक पर विचार-गोष्ठी हुई। उसमें दिये गये वक्तव्य क्रमशः किंचित् संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं।  

लीलाधर मंडलोई
लीलाधर मंडलोई
रमेश जी मेरे अग्रज हैं और बहुत बड़े साहित्यकार हैं। आज उनकी इकहत्तरवीं सालगिरह है। इसलिए सबसे पहले रमेश जी को बहुत-बहुत मुबारकबाद। इन्होंने जो एक भरा-पूरा साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन जिया है, उस पर हर किसी को रश्क होना चाहिए। इन्होंने जो जीवन जिया है, अपने दम पर जिया है; जो काम किया है, अपनी शर्तों पर किया है। यही वजह है कि इनका जीवन और इनका काम अपने-आप में एकदम अलग है। आज इनकी जिस किताब पर यहाँ चर्चा होने जा रही है, उससे इनका जीवन और इनका काम, दोनों एक अलग ही अंदाज में, एक अलग ही तेवर के साथ सामने आते हैं। इस किताब में एक अध्याय है ‘मनचाहे ढंग से मनचाहा काम’। मुझे लगता है कि यह इस किताब का नाम भी हो सकता था, क्योंकि यह किताब भी इनका मनचाहे ढंग से किया गया मनचाहा काम है।

इस किताब को पढ़कर मन में प्रश्न उठता है कि इसकी विधा या इसका रूपबंध क्या है? यह आत्मकथा नहीं है और क्यों नहीं है, इसका कारण किताब की भूमिका में बताया गया है। इसमें कुछ आत्मकथात्मक लेख हैं, कुछ संस्मरण हैं, कुछ साहित्यिक निबंध हैं और कुछ समय-समय पर दिये गये रमेश जी के व्याख्यान भी हैं। लेखक की ओर से इन सब चीजों को ‘आत्मकथात्मक एवं साहित्यिक विमर्श’ कहा गया है। लेकिन इस किताब का कोई मुकम्मल रूपबंध नहीं है। इसमें एक तरह की आजादखयाली है, जिसके चलते यह किताब दूसरी किताबों से अलग है। इसमें संकलित सब तरह की रचनाओं में लेखक ‘मैं’ के रूप में उपस्थित है और ऐसा लगता है कि उनमें लेखक ने स्वयं को तरह-तरह से ‘इनवेंट’ किया है और अपने पचास वर्षों के लेखकीय जीवन में रचनात्मक और वैचारिक स्तर पर जो अर्जित किया है, वह सरमाया इस किताब में रख दिया है।

लेकिन मेरे विचार से इस किताब के आत्मकथात्मक हिस्से ज्यादा मानीखेज हैं। उदाहरण के लिए, पुस्तक का पहला ही अध्याय, जिसका शीर्षक है ‘अजमेर में पहली बार’, बहुत ही मार्मिक है, बहुत ही अर्थ भरा है। अगर यह पूरी पुस्तक इसी रूप में लिखी गयी होती, तो यह एक ‘एपिकल’ पुस्तक होती। जब मैं पहले अध्याय पर ही निसार हो गया, तो पूरी पुस्तक अगर इसी तरह लिखी गयी होती, तो कितना अच्छा होता। मेरे विचार से तब यह एक अद्भुत पुस्तक होती। इसका अंतिम अध्याय है ‘अजमेर में दूसरी बार’। पहला अध्याय पढ़कर मेरी उत्कंठा जागी और मैं सीधे अंतिम अध्याय पर चला गया। लेकिन वह आत्मकथात्मक रूप में नहीं, पल्लव से की गयी बातचीत या साक्षात्कार के रूप में है। साक्षात्कार की अपनी एक सीमा होती है। उसमें निजता, आत्मीयता, लेखक का जीवन-संघर्ष, उसके लेखकीय व्यक्तित्व का निर्माण वगैरह उस तरह नहीं आ सकता था, जिस तरह पहले अध्याय वाले आत्मकथात्मक रूप में आया है। पहले अध्याय के रूपबंध में एक जादू है, एक तिलिस्म है, जिसमें आप खो जाते हैं। वह जादू व्याख्यान, साक्षात्कार, निबंध और आलोचना जैसे रूपबंधों में पैदा नहीं हो पाता। मगर क्या किया जाये, रमेश जी का अपना तेवर है, मनचाहे ढंग से मनचाहा काम करने की उनकी अपनी एक खास अदा है!

फिर भी, ध्यान से देखें, तो दूसरी तरह के रूपबंधों वाले अध्यायों में भी उनका ‘मैं’ बोलता है। वे आत्मकथात्मक न होकर भी आत्मकथात्मक हैं और उनमें उनके ‘मैं’ का होना कोई दोष नहीं, बल्कि बहुत बड़ा गुण है। हरिशंकर परसाई की बहुत-सी रचनाएँ ‘मैं’ वाले रूप में लिखी गयी हैं, लेकिन वे सारे ‘मैं’ अलग हैं और उन सबको इकट्ठा कर दिया जाये, तो उनका लेखन आजादी के बाद के समय का एक पूरा ‘एपिक’ बन जाता है। अगर इस किताब की गैर-आत्मकथात्मक रचनाओं में मौजूद सारे ‘मैं’ मिला दिये जायें, तो तकरीबन ऐसा ही कुछ हो जायेगा।

उदाहरण के लिए, इस किताब का एक अध्याय है ‘ईश्वर के बिना जीना’। उसमें आस्तिकता, नास्तिकता, धर्म और नैतिकता पर एक लंबी वैचारिक बहस है। फिर भी उसमें लेखक का अपना जीवन-संघर्ष और वैचारिक संघर्ष दिखायी देता रहता है। इसी तरह एक अध्याय है ‘मेरी नाट्यलेखन यात्रा’ और एक अध्याय है ‘प्रेमचंद को हम बार-बार पहली बार पढ़ते हैं’। इन तीनों अध्यायों में जो ‘मैं’ है, वह कमाल का ‘मैं’ है। वह बात शुरू करता है प्रथम पुरुष के रूप में, लेकिन चला जाता है अन्य पुरुष की तरफ और रचना आत्मकथात्मक होकर भी कुछ और बन जाती है या कुछ और होकर भी आत्मकथात्मक बनी रहती है। यहाँ रमेश जी दूसरे लेखकों से एकदम अलग दिखायी देते हैं और मुझ जैसा उनका पाठक उनका सहयात्री होकर उनके साथ-साथ चलने लगता है।

यह शायद आज के साहित्य की विशेषता है कि रचना के रूपबंध में अनेक विधाओं की बहुत तीव्र आवाजाही हो रही है। आत्मकथा, संस्मरण और डायरी जैसे आत्मकथात्मक रूपों में निबंध, आलोचना, बहस, व्याख्यान और यात्रा-आख्यान, स्मृति-व्याख्यान जैसे रूप घुल-मिल जाते हैं। मतलब यह कि साहित्यिक विधाओं की सीमाएँ बहुत अशांत हो गयी हैं। इतनी अशांत कि मानो किसी एक विधा में लिखना संभव ही नहीं रहा।

रमेश जी की इस किताब को पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसमें एक ही रचना में अनेक विधाएँ मौजूद हैं। परसाई के लेखन में यह विशेषता थी और रमेश जी के लेखन में परसाई से इनकी निकटता इस रूप में भी दिखायी पड़ती है कि ये बीच-बीच में बड़ा बढ़िया व्यंग्य भी करते चलते हैं। गंभीर विचार और बहस करते हुए रमेश जी बीच- बीच में हास्यजनक उक्तियों या लतीफों का प्रयोग भी करते हैं। आलोचना करने या दूसरों की खबर लेने का उनका अपना तेवर है, चाहे वह ‘सवाल मुकम्मल कहानी का’ में नामवर जी की आलोचना करने का हो, या ‘प्रेमचंद को लाठी बनाना’ में गिरीश मिश्र की खबर लेने का। यह चीज पुस्तक के पाठ को रोचक बनाती है। 

राकेश कुमार
राकेश कुमार
मैं इस किताब के शिल्प या रूपबंध की बात नहीं करूँगा, क्योंकि इस पर काफी चर्चा हो चुकी है। लेकिन मेरा मानना है कि यह किताब आत्मकथा नहीं, आत्मकथात्मक है, तो यह इसकी बहुत बड़ी विशेषता है। इसमें जो ‘आत्मकथात्मक एवं साहित्यिक विमर्श’ हैं, उन्हें ‘आत्मकथात्मक’ और ‘साहित्यिक’ दो भिन्न वर्गों में बाँटकर नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें संकलित सभी रचनाएँ आत्मकथात्मक हैं और साथ ही साहित्यिक भी। इसके साहित्यिक विमर्श भी आत्मकथात्मक विमर्शों के ही विस्तार हैं। उनमें उपाध्याय जी अपने अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैंµएक संघर्षशील युवा से लेकर एक स्थापित लेखक, आलोचक, संपादक आदि विभिन्न रूपों मेंµऔर इनके इन विभिन्न व्यक्तित्वों से साक्षात्कार करते समय किताब का शीर्षक ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ बराबर याद आता रहता है, जिसमें अहंकार नहीं, बल्कि विनम्र स्वीकार है। आत्मकथाओं में जाने-अनजाने एक अहंकार का भाव प्रायः आ ही जाता है। इस किताब में वह नहीं है। इस किताब का समर्पण हैµ‘‘उन सबके नाम, जिन्होंने मुझे वह बनाया, जो मैं हूँ’’ और भूमिका में लेखक ने लिखा है :

‘‘मुझे जानने वाले कुछ लोग मुझे ‘सेल्फमेड मैन’ कहते हैं। मैं इससे इनकार करता हूँ। मैंने महान शिक्षाशास्त्री पाओलो फ्रेरे की एक किताब का अनुवाद किया है ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’। किताब की भूमिका लिखते समय मैंने उनका एक कथन उद्धृत किया था कि ‘‘दुनिया में कोई व्यक्ति अपना निर्माण स्वयं नहीं करता। शहर के जिन कोनों में ‘स्वनिर्मित’ लोग रहते हैं, वहाँ बहुत-से अनाम लोग छिपे रहते हैं।’’ मेरा निर्माण प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से दुनिया के उन असंख्य लोगों ने किया है, जिन्होंने मुझे जिंदगी दी है, जिंदगी से प्यार करना सिखाया है, दुनिया को बेहतर और खूबसूरत बनाने के रास्ते पर चलना सिखाया है और इस रास्ते की प्रतिकूलताओं से लड़ने में मेरा साथ निभाया है। उन्होंने ही मुझे वह बनाया है, जो मैं हूँ। इसलिए मैं यह किताब उन सबको कबीर के शब्दों में यह कहते हुए समर्पित करता हूँ कि ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सब तेरा। तेरा तुझको सौंपते, क्या लागै है मेरा।’ ’’

इस किताब की भूमिका में ‘निजी’ और ‘सार्वजनिक’ में भेद करते हुए और केवल ‘निजी’ पर जोर देकर लिखी जाने वाली आत्मकथा लिखने से इनकार किया गया है। उपाध्याय जी दोनों में भेद नहीं करते। इस किताब को पढ़ते हुए हम पाते हैं कि उपाध्याय जी का ‘निजी’ इनके ‘सार्वजनिक’ को शर्मिंदा नहीं करता, बल्कि उसे गौरवान्वित करता है। यहाँ इनके जीवन के निजी और सार्वजनिक दोनों पक्ष मानो धूप में चमकते दिखायी देते हैं। एक ऐसी धूप में, जो इनके निजी को उद्भासित करती है और सार्वजनिक को आत्मीयता की ऊष्मा प्रदान करती है।

उदाहरण के लिए, पुस्तक का पहला अध्याय ‘अजमेर में पहली बार’ आत्मकथात्मक है, जबकि ‘ईश्वर के बिना जीना’ शीर्षक अध्याय ईश्वर के अस्तित्व, आस्तिकता और नास्तिकता के सवाल, धर्म और नैतिकता के संबंध इत्यादि को सामने लाने वाला गंभीर वैचारिक विमर्श है। लेकिन दोनों में एक संबंध-सूत्र है, जो उपाध्याय जी के ‘निजी’ को इनके ‘सार्वजनिक’ से जोड़ता है। पहले अध्याय में इन्होंने अपने बारे में लिखा है :

‘‘1960 के अप्रैल महीने की एक सुहावनी सुबह है। अजमेर के रेलवे स्टेशन पर अठारह साल का एक लड़का गाड़ी से उतरता है। शर्ट-पैंट और चप्पलें पहने हुए। साथ में सिर्फ एक झोला है, जिसमें उसके एक जोड़ी कपड़े हैं और कुछ कागज। लड़का स्टेशन से बाहर आता है। सामने ही घंटाघर है, जिसकी घड़ी में लगभग साढ़े आठ बजे हैं। वहीं कुछ हलवाइयों, चाय वालों, पनवाड़ियों आदि की दुकानें हैं। लड़का जबसे यात्रा पर निकला है, उसने कुछ नहीं खाया है। उसे जोर की भूख लगी है। वह सिर्फ दस रुपये लेकर चला था, जिनमें से रेल का टिकट और सिगरेट का पैकेट खरीदने के बाद अब उसकी जेब में इतने ही पैसे बचे हैं कि वह नाश्ता कर सके और सिगरेट खरीद सके। ‘जो होगा, देखा जायेगा’ के भाव से सिर झटककर लड़का आगे बढ़ता है। सड़क पार करके एक हलवाई की दुकान पर पहुँचता है। दुकान के सामने पड़ी बेंच पर बैठकर मजे से नाश्ता करता है। पनवाड़ी से सिगरेट खरीदता है और बिलकुल खाली जेब हो जाता है।’’

यह खाली जेब हो जाना उपाध्याय जी के आत्मविश्वास का सूचक तो है ही कि ये अपनी मेहनत और अपनी प्रतिभा से एक नितांत अजनबी शहर में भी अपनी जगह बना लेंगे, दूसरे मनुष्यों पर विश्वास का सूचक भी है। यही आत्मविश्वास और दूसरे मनुष्यों पर विश्वास ‘ईश्वर के बिना जीना’ में इस प्रकार सामने आता है :

‘‘लेकिन मैं उस समय एक नौजवान लड़का था, जिसके सामने जिंदा रहने, कमाने-खाने, अपने परिवार का सहारा बनने और अपना भविष्य बनाने के लिए काम करने के साथ-साथ अपने दम पर अपनी पढ़ाई जारी रखने की इतनी सारी समस्याएँ थीं कि मुझे इस दिशा में निश्ंिचत होकर आगे बढ़ने की सुविधा और फुर्सत ही नहीं थी। फिर, वह मेरी प्रेम करने और अपने भविष्य के स्वप्न देखने की उम्र थी। लेकिन मेरे मन में कहीं गहराई तक यह बात पैठ चुकी थी कि मुझे अच्छा मनुष्य तो बनना है, पर ईश्वर के बिना ही जीना है। भाग्य और भगवान के भरोसे बैठे रहने के बजाय अपना भविष्य अपने हाथों बनाना है। इससे एक तरफ मुझमें आत्मविश्वास पैदा हुआ, दूसरी तरफ रूढ़ियों और अंधविश्वासों से बचे रहने की दृढ़ता पैदा हुई और तीसरी तरफ एक प्रकार की वैज्ञानिक मानसिकता के साथ सृजनशील कल्पनाएँ करने और उन्हें कागज पर उतारने की इच्छा पैदा हुई। शायद इन्हीं सब चीजों ने मुझे एक प्रकार का सदाचारी, विद्रोही, दुस्साहसी, स्वप्नदर्शी और लेखक बनाया।’’

इस प्रकार देखें, तो ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ एक ऐसी किताब है, जिसमें एक लेखक और विचारक के व्यक्तित्व का विकास और उसके निर्माण की प्रक्रिया सामने आती है और फिर उसका परिपक्व रूप उद्घाटित होता है, जिसे इस किताब के कई अध्यायों में देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, ‘साहित्य-सृजन और चेतना के स्रोत’ में, या ‘हमारे समय के स्वप्न’ में, या ‘भूमंडलीय यथार्थ और साहित्यकार की प्रतिबद्धता’ में।

अपने इस व्यक्तित्व के कारण ही रमेश उपाध्याय एक विश्वसनीय रचनाकार हैं। रचना में विश्वसनीयता पैदा होती है यथार्थवाद से, मानवीय मूल्यों से, आदर्शों से और जन-पक्षधरता से। और ये सब चीजें उपाध्याय जी के लेखन में स्पष्ट दिखायी पड़ती हैं। चाहे ‘डॉक्यूड्रामा’, ‘अर्थतंत्र’ और ‘त्रासदी...माइ फुट!’ जैसी कहानियाँ हों या ‘दंडद्वीप’ और ‘हरे फूल की खुशबू’ जैसे उपन्यास, या ‘पेपरवेट’ और ‘भारत-भाग्य-विधाता’ जैसे नाटक, या ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ नामक पुस्तक में संकलित साहित्यिक निबंध। यथार्थवाद और आदर्शवाद का जैसा ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवादी’ मेल प्रेमचंद में है, वैसा ही उपाध्याय जी में है। यही कारण है कि उपाध्याय जी एक ओर आज के समय में ‘भूमंडलीय यथार्थवाद’ की नयी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं, तो दूसरी ओर ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की जरूरत’ पर जोर देने वाला निबंध भी लिखते हैं।

हालाँकि आज का समय इन्हीं के शब्दों में ‘‘मानवता द्वारा देखे गये अब तक के सारे सुंदर स्वप्नों को मिटाकर दुनिया के यथार्थ को भयानकतम दुःस्वप्नों में बदल देने वाले’’ एक नये ढंग के साम्राज्यवाद का समय है, फिर भी इस किताब में शामिल एक रचना ‘हमारे समय के स्वप्न’ में इन्होंने लिखा हैµ‘‘मनुष्य ऐसा प्राणी है, जो सुंदर स्वप्न देखना बंद नहीं करता। वर्तमान चाहे जितना भीषण हो, मनुष्य बेहतर भविष्य की आशा नहीं छोड़ता, उसके लिए प्रयत्न जारी रखता है।’’ उपाध्याय जी के ये शब्द इनके अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को परिभाषित करते हुए लगते हैं।

मैं उपाध्याय जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। इनके पारिवारिक और साहित्यिक जीवन को मैंने निकट से देखा है। इनके चिंतन और कर्म में, कथनी और करनी में, जीवन और लेखन में कोई द्वैत नहीं है। इनको हमेशा एक खुली किताब की तरह पाया और पढ़ा जा सकता है। ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ किताब को पढ़ते हुए भी ऐसा ही लगता है कि उपाध्याय जी सामने बैठे हैं और जो कह रहे हैं, उसमें पूरी सादगी है, सच्चाई है, ईमानदारी है। ये जिन मूल्यों में विश्वास करते हैं, उन्हीं के अनुसार आचरण भी करते हैं। इस किताब में संकलित रचना ‘ईश्वर के बिना जीना’ में इन्होंने उन मूल्यों के बारे में लिखा हैµ‘‘ये जीवन-मूल्य प्रेम के हैं, सहयोग के हैं, मित्रता के हैं, वात्सल्य के हैं, अपने प्राकृतिक परिवेश की रक्षा करने के हैं और अपनी सांस्कृतिक निधियों को सँभालकर रखने के भी हैं।’’

यह किताब इन्हीं मूल्यों को सामने लाती है। मैं इस किताब के प्रकाशन पर और उपाध्याय जी के जन्मदिन पर इन्हें हार्दिक बधाई देता हूँ। 
अल्पना मिश्र

अल्पना मिश्र
आज उपाध्याय जी का जन्मदिन है और इनकी नयी किताब का लोकार्पण भी हुआ है। मैं भी इस मुबारक मौके पर इन्हें बधाई और शुभकामनाएँ देती हूँ। लेकिन मैं इनसे बहुत छोटी हूँ, इसलिए प्रणाम भी करती हूँ। इन्हें प्रणाम करके मैं इनके प्रति आदर के साथ-साथ इनके परिवार के प्रति आभार भी व्यक्त कर रही हूँ, जहाँ से मुझे सदा स्नेह और आत्मीयतापूर्ण व्यवहार प्राप्त होता है।

उपाध्याय जी से मेरी पहली मुलाकात 2006 में हुई, जब ये सपरिवार देहरादून आये थे और मैं वहीं रहती थी। वहाँ इनके सम्मान में आयोजित साहित्यिक गोष्ठी में मैं भी शामिल हुई थी। मैं बहुत समय से इनकी पाठक और प्रशंसक थी, लेकिन पहले कभी मिली नहीं थी, इसलिए सोच रही थी कि इतने बड़े लेखक से मिलने जा रही हूँ। मुझे उम्मीद नहीं थी कि ये मुझ जैसे नये लेखकों को भी पढ़ते होंगे। लेकिन उपाध्याय जी ने मुझे पहचाना, बहुत अच्छे ढंग से मिले और मेरी कहानियों पर बात की, तो मुझे बहुत सुखद आश्चर्य हुआ। इनके परिवार से मिलकर भी मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। अभी श्रीमती उपाध्याय मिलीं, तो उन्होंने बहुत प्यार से उस समय को याद किया। फिर मैंने देखा कि ‘कथन’ में लगातार नये लेखकों को जगह मिलती रही है और उपाध्याय जी उन्हें खूब प्रोत्साहित करते हैं। अब यही काम इनकी बेटी संज्ञा ‘कथन’ की संपादक बनकर कर रही है। उस पहली मुलाकात के बाद उपाध्याय जी से जब भी मिलना हुआ है, और जब से मैं दिल्ली आ गयी हूँ, तब से तो अक्सर मिलना हुआ है, मैंने इन्हें हमेशा सक्रिय और उत्साह से भरा हुआ पाया है। आज इस अवसर पर मैं इन्हें प्रणाम करती हूँ और कामना करती हूँ कि ये हमेशा हमें इसी रूप में मिलते रहें।

किताब पर बहुत सारी बातें हो गयी हैं। बहुत अच्छी बातें कही गयी हैं। कई ऐसी बातें, जो मैं भी कहना चाहती थी, पहले ही कह दी गयी हैं। इसलिए मैं केवल तीन रचनाओं पर बात करूँगी, जिन पर बात नहीं हुई है। ये रचनाएँ हैं ‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’, ‘जो घर फूँके आपना...’ और ‘मनचाहे ढंग से मनचाहा काम’। इनमें से पहली रचना में उपाध्याय जी एक रचनाकार के रूप में सामने आते हैं और बड़े ही रोचक तथा प्रेरक ढंग से अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। दूसरी रचना में ये ‘कथन’ के संपादक के रूप में और अपनी पत्रिका के लिए किये गये अथक संघर्ष के साथ सामने आते हैं। तीसरी रचना में हम इन्हें एक पारिवारिक व्यक्ति के रूप में पाते हैं। मुझे उपाध्याय जी के इन तीनों रूपों ने बहुत प्रभावित किया।

‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’ में पहले एक विदेशी लेखिका की रचना-प्रक्रिया का और फिर एक विदेशी लेखक की उससे बिलकुल भिन्न रचना-प्रक्रिया का उदाहरण बड़े रोचक रूप में प्रस्तुत करते हुए उपाध्याय जी अपनी रचना-प्रक्रिया की भिन्नता स्पष्ट करते हैं और निष्कर्ष के रूप में कहते हैं कि ‘‘प्रत्येक लेखक की अपनी एक अलग ही रचना-प्रक्रिया होती है। अद्वितीय, अतुलनीय। रचना की नकल शायद की जा सके, रचना-प्रक्रिया की नकल नहीं की जा सकती।’’ इसके बाद उपाध्याय जी अपनी रचना-प्रक्रिया बताते हैं कि ‘जुलूस’, ‘कामधेनु’, ‘डॉक्यूड्रामा’, ‘माटीमिली’, ‘अर्थतंत्र’ और ‘दूसरा दरवाजा’ कहानियाँ इन्होंने कैसे लिखीं। रचना-प्रक्रिया का यह वर्णन इतना रोचक और प्रेरणाप्रद है कि कोई लेखक पढ़े, तो अपनी रचना-प्रक्रिया पर अवश्य विचार करे। मुझे इसको पढ़ते हुए अपनी कहानियों की रचना-प्रक्रिया याद आयी और मैं उस पर विचार करने को प्रेरित हुई।

उपाध्याय जी साहित्य में व्यावसायिकता के विरोधी रहे हैं। व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरुद्ध अव्यावसायिक साहित्यिक पत्रिकाओं का आंदोलन चलाना, स्वयं ‘कथन’ जैसी अव्यावसायिक साहित्यिक पत्रिका निकालना, लघु पत्रिकाओं के लेखकों और संपादकों को संगठित करना वगैरह इनके व्यावसायिकता-विरोध के बाहरी पहलू हैं। भीतरी पहलू इनकी अपनी रचना-प्रक्रिया से सामने आता है। तब हमारे सामने स्पष्ट होता है कि व्यावसायिकता एक कैद है और रचना उससे निकलने की कोशिश। उपाध्याय जी लिखते हैं--‘‘व्यावसायिकता की कैद से बाहर निकलने की कोशिश में ही आप अपनी रचना-प्रक्रिया में स्वतंत्र हो सकते हैं। लेकिन इस स्वतंत्रता का कोई फार्मूला नहीं हो सकता। इसकी तलाश प्रत्येक लेखक को स्वयं ही करनी पड़ती है। यहाँ तक कि एक ही लेखक को अपनी प्रत्येक रचना में इसकी तलाश एक अलग ही ढंग से करनी पड़ती है।’’

‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ किताब में उपाध्याय जी ने कई जगह हिंदी की लघु पत्रिकाओं के बारे में, उनके आंदोलन और संगठन के बारे में लिखा है। उसमें अपनी पत्रिका ‘कथन’ के बारे में भी लिखा है। इस लिहाज से इस किताब में ‘स्वायत्तता के साथ सहयात्रा’, ‘भूमंडलीय यथार्थ और साहित्यकार की प्रतिबद्धता’ और ‘यह जनोन्मुख पत्रकारिता का सम्मान है’ शीर्षक रचनाएँ विशेष रूप से पठनीय हैं। लेकिन मुझे इस तरह की रचनाओं में सबसे अच्छी लगी ‘जो घर फूँके आपना...’। इसमें ‘कथन’ पत्रिका निकालने के लिए किया गया संघर्ष तो सामने आता ही है, इस काम में उपाध्याय जी को अपने परिवार से जो सहयोग मिला और वह सहयोग इन्होंने कैसे प्राप्त किया, यह भी सामने आता है। लिखते हैं :

‘‘लिखने-पढ़ने और लघु पत्रिका निकालने जैसे सर्जनात्मक कार्यों के लिए घर ही सर्वोत्तम कार्यक्षेत्र है, अतः साहित्यकार तथा साहित्यिक पत्रकार को सबसे पहले अपने घर-परिवार को ऐसा बनाने का प्रयास करना चाहिए कि वह न केवल अपना काम शांतिपूर्वक कर सके, बल्कि परिवार के सदस्यों में भी अपने काम के प्रति भरोसा और उत्साह पैदा करके उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त कर सके। लेकिन इसके लिए परिवार के सदस्यों में यह भावना और चेतना उत्पन्न करना आवश्यक है कि सर्जनात्मक लेखन और साहित्यिक पत्रकारिता सांसारिक दृष्टि से भले ही मूर्खता, पागलपन या घाटे का सौदा हो, अपने बौद्धिक तथा सर्जनात्मक व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है। परिवार में जब यह भावना और चेतना उत्पन्न हो जाती है, तो परिवार में--विशेष रूप से युवाओं में--बौद्धिक तथा सर्जनात्मक कार्यों के प्रति एक उत्साह उत्पन्न होता है। लघु पत्रिका के लिए ऐसे युवाओं की टीम सर्वोत्तम होती है।’’

मैं इस किताब में जिस रचना को पढ़कर सबसे ज्यादा प्रभावित हुई, वह है ‘मनचाहे ढंग से मनचाहा काम’। हालाँकि पूरी किताब में उपाध्याय जी के सामाजिक सरोकार, उनके जनतांत्रिक मूल्य, उनकी जन-पक्षधरता और प्रखर वैचारिकता के विभिन्न रूप सामने आते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित करता है इनका पारिवारिक प्राणी वाला रूप। साहित्य और साहित्यकारों की चर्चा में प्रायः घर-परिवार को उपेक्षित कर दिया जाता है। कई लेखकों को लगता है कि लेखन में परिवार एक बहुत बड़ी बाधा है और वे परिवार की उपेक्षा करते हैं, परिवार से अलग रहते हैं या परिवार को तोड़ ही देते हैं।

लेकिन उपाध्याय जी मानते हैं कि अगर साहित्य में वाकई आपको मनचाहा काम करना है, तो अपने घर-परिवार पर ध्यान देना होगा और उसे एक स्वतंत्र, सर्जनात्मक, जनतांत्रिक परिवार बनाना होगा। यह बहुत बड़ा मूल्य है और उपाध्याय जी ने इस मूल्य को अपने जीवन में उतारकर अपने परिवार का निर्माण किया है। मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि स्त्री लेखन में भी परिवार या पारिवारिकता के मूल्य पर ध्यान नहीं दिया जाता। कई क्रांतिकारी लेखक भी उस पर ध्यान नहीं देते। लेकिन मैं पूछती हूँ, अगर आप अपना एक बेहतर परिवार नहीं बना पा रहे, तो पूरी दुनिया को बेहतर बनाने का सपना कैसे देख रहे हैं?

उपाध्याय जी कहते हैंµ‘‘मेरे विचार से ऐसे ही परिवार में लेखक अपने लिए वह जगह बना सकता है, जहाँ उसे मनचाहे ढंग से मनचाहा काम करने की आजादी हो। लेकिन ऐसी आजादी अपने-आप नहीं मिलती, आपको संघर्ष करके हासिल करनी पड़ती है। ऐसी जगह कोई और बनाकर नहीं दे सकता, आपको प्रयासपूर्वक स्वयं ही बनानी पड़ती है। ऐसा परिवार भी कहीं बना-बनाया नहीं मिलता, आपको स्वयं ही बनाना पड़ता है। और यह लेखन से कम सर्जनात्मक काम नहीं है। यह काम उतना ही कठिन और कष्टदायक है, लेकिन उतना ही सुखद और सार्थक भी।’’

अंत में इस पूरी पुस्तक के बारे में एक बात मैं यह कहना चाहूँगी कि इसमें उपाध्याय जी ने अपने संघर्षों के बारे में खूब लिखा है, लेकिन कहीं भी हाय-हाय करते हुए उसका रोना नहीं रोया है। उन्होंने अपने संघर्ष को बहुत दृढ़ता के साथ, बहुत आत्मविश्वास के साथ बहुत सकारात्मक रूप में देखा है। यह सकारात्मकता बहुत ही सुंदर और प्रेरक है। मैं इसके लिए उपाध्याय जी को विशेष रूप से बधाई देती हूँ।
 
मैनेजर पाण्डेय
मैनेजर पांडेय
मैं रमेश जी से साल भर बड़ा हूँ, इसलिए इनके जन्मदिन पर बड़े भाई की हैसियत से बधाई देता हूँ। यह जानते हुए भी कि मेरे बाद विश्वनाथ जी बोलेंगे, जो मुझसे भी बहुत बड़े हैं। रमेश जी की इस किताब पर कुछ कहने से पहले मैं यह कहना चाहता हूँ कि यद्यपि इसका शीर्षक है ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’, पर इस किताब में रमेश जी का बहुत कुछ है। किताब का यह शीर्षक क्यों रखा गया है, यह इसकी भूमिका में बता दिया गया है। लेकिन मुझे यह इसलिए अच्छा लगा कि आजकल साहित्य में ‘मैं’ की भरमार हो गयी है। वह भी ऐसे ‘मैं’ की, जिसके पास ‘पर’ या ‘अन्य’ फटकता तक नहीं। इसलिए बहुत सारे कहानीकार आत्मसंघर्ष की कहानियाँ लिख रहे हैं। मेरा कहना है कि आत्मसंघर्ष तो सबका होता ही है, साहित्यकार को थोड़ा वह संघर्ष भी देखना चाहिए, जो समाज में मौजूद है। रमेश जी की यह किताब शुरू से आखिर तक आत्मकथात्मक है, लेकिन उन्होंने इसे ‘आत्मकथा’ नहीं बनाया है और इसका कारण भूमिका में बताया है। उनका यह कहना सही है कि हाल के दिनों में हिंदी में आत्मकथा काफी बिकाऊ विधा बन गयी है। ‘बिकाऊ’ की जगह ‘व्यावसायिक’ कहूँगा, तो आत्मकथाओं के लेखक नाराज हो जायेंगे, लेकिन दोनों शब्दों का मतलब एक ही है।

आत्मकथा लिखना या अपने बारे में लिखना अपने-आप में कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन इधर जो आत्मकथाएँ लिखी जा रही हैं, उनमें से ज्यादातर के लेखक यह भूल गये लगते हैं कि मनुष्य का ‘स्व’ तब तक बनता ही नहीं, जब तक ‘पर’ उसके साथ उपस्थित न हो। आप सब ने वह कहानी पढ़ी होगी, जिसमें मनुष्य का बच्चा भेड़ियों के बीच रहकर भेड़िया ही बन जाता है। मनुष्य के सामने दूसरा मनुष्य नहीं होगा, तो वह मनुष्य नहीं, अमानुष ही बनेगा। इसीलिए साहित्य ‘पर’ की चिंता से संचालित होता है।

हमारे सबसे बड़े कथाकार हैं प्रेमचंद। उनके मित्रों ने बताया है कि उनकी अमुक-अमुक कहानी आत्मकथात्मक है या उनके अपने जीवन से जुड़ी हुई है। लेकिन क्या मजाल कि उन प्रसंगों से अपरिचित पाठक उन कहानियों से उनका जीवन जान ले। उनकी सभी कहानियों और सारे उपन्यासों में ‘स्व’ के साथ ‘पर’ है और ‘पर’ के माध्यम से पूरा समाज है। इसलिए रमेश जी ने अपनी किताब पर जो शीर्षक दिया है, उसका अलग महत्त्व है। इस किताब में इनके अपने तरह-तरह के अनुभवों का भी ब्यौरा है, इसलिए जिसकी इच्छा हो, इस में इनकी आत्मकथा खोजे, लेकिन मुख्य बात यह है कि इनका ‘मैं’ कहीं पर भी ‘पर’ के बिना, दूसरों के बिना, व्यापक समाज के बिना सामने नहीं आता। वह आपबीती के साथ-साथ जगबीती भी कहता चलता है।

यहाँ मैं चलते-चलते यह भी कहूँगा कि रमेश जी काफी लड़ाकू मिजाज के लेखक हैं। मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि ‘‘तुम्हीं से मुहब्बत तुम्हीं से लड़ाई’’। यह उनकी पद्धति है। जिससे प्रेम करते हैं, उसी से बहस भी करते हैं, उसी से लड़ते भी हैं। और यह हिंदी साहित्य की परंपरा है। दोबारा मुझे प्रेमचंद ही याद आ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अगर कोई मूर्खतापूर्ण प्रश्न करे, तो उसका जवाब किसी को जरूर देना चाहिए। रमेश जी की इस किताब में एक लेख है ‘प्रेमचंद को लाठी बनाना’। यह लेख ‘जनसत्ता’ में छपा था और गिरीश मिश्र नामक एक सज्जन के द्वारा हिंदी के लेखकों पर लगाये गये इस आरोप के जवाब में छपा था कि सब ‘बाजारवाद’ के पीछे पड़े हैं, जबकि अंग्रेजी में ‘मार्केटिज्म’ जैसा कोई शब्द नहीं होता। उन्होंने लिखा कि ‘‘हिंदी के पत्रकार और साहित्यकार ‘बाजारवाद’ के रूप में एक काल्पनिक शैतान पैदा कर उसे लगातार पत्थर मार अपनी क्रांतिकारिता दिखा रहे हैं। प्रेमचंद ऐसा कतई न करते।’’ रमेश जी ने बाजारवाद की पूरी अवधारणा को तर्कों और उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया और लिखा कि ‘‘प्रेमचंद ने अपना निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ आज लिखा होता, तो वे भी ‘बाजारवाद’ का प्रयोग धड़ल्ले से करते और यह शब्द गढ़ने के लिए खुश होकर हिंदी वालों की पीठ ठोकते।’’

रमेश जी का आग्रह यह है कि हम अंग्रेजी से ही अनुवाद काहे करें? कोई नयी चीज आयी है, कोई नयी अवधारणा आयी है, तो उसके लिए हिंदी का ही कोई शब्द क्यों न गढ़ें? मैं समझता हूँ कि किसी भी भाषा की प्रतिष्ठा ऐसे लेखन से बनती है। एक जमाना था, जब ‘आज’ के संपादक पराड़कर जी थे। उनके संपादकीय इतने महत्त्वपूर्ण होते थे कि अंग्रेज अधिकारी उनके अनुवाद अंग्रेजी में करवाकर पढ़ते थे। रमेश जी उसी परंपरा के लेखक और संपादक हैं। इन्होंने बाजारवाद संबंधी बहस में जो दखल दिया, उससे हिंदी की प्रतिष्ठा और ताकत का पता चलता है।

दूसरी बात यह कि रमेश जी स्वयं मार्क्सवादी होते हुए भी मार्क्सवादियों की आलोचना करने और उनसे बहस चलाने में नहीं हिचकते। अभी कुछ समय पहले टेरी ईगल्टन की एक किताब आयी थी ‘दि ईविल’। दस साल पहले तक कोई सोच भी नहीं सकता था कि ‘ईविल’ पर कोई मार्क्सवादी लिखेगा। उसमें ईगल्टन ने कम्युनिस्ट नैतिकता का सवाल उठाया है। हिंदी में यह सवाल रमेश जी 1974 में ही उठा चुके थे। तब तो मैं व्यक्तिगत रूप से इनको जानता भी नहीं था। जब इनकी पुस्तिका ‘कम्युनिस्ट नैतिकता’ आयी, मैं बनारस में था। कुछ ही दिनों बाद मैं बरेली में अध्यापक हो गया। वहाँ सी.पी.आइ. के एक पुराने नेता थे, जिनसे मिलना-जुलना होता था और मैं उनसे बहुत सीखता था। एक दिन मैंने उनसे पूछा कि तिवारी जी, यह कम्युनिस्ट नैतिकता क्या होती है? तिवारी जी हँसकर बोले कि आपके सामने यह सवाल कहाँ पैदा हो गया? मैंने कहा कि हिंदी के लेखक हैं रमेश उपाध्याय जी, उन्होंने इसी नाम की पुस्तिका लिखी है। तिवारी जी ने तब तक वह पुस्तिका पढ़ी नहीं थी, लेकिन मेरे प्रश्न का एक सामान्य उत्तर देते हुए कहा कि कम्युनिस्ट नैतिकता वही है, जिसे जनता स्वीकार करे। उदाहरण के लिए, अगर आप आदिवासियों के क्षेत्र में काम करने जा रहे हैं और आप केवल गंगाजल पीते हैं, तो तीन दिन में आदिवासी आपको भगा देंगे। वहाँ रहे भी, तो आपकी बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा। आपको उनके साथ बैठकर दारू पीना पड़ेगा, क्योंकि यह उनके जीवन का हिस्सा है। और अगर आप किसी ऐसी जगह चले जायें, जहाँ लोग शराब पीने को पाप समझते हों और आप वहाँ बैठकर शराब पीने लगें, तो जो देखेगा, चार गालियाँ देकर आपके पास से भाग जायेगा। आश्चर्य की बात कि ठीक इन्हीं शब्दों में तो नहीं, पर ऐसे ही विचार रमेश जी ने अपनी उस पुस्तिका में व्यक्त किये थे।

‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ में रमेश जी का एक लेख है ‘ईश्वर के बिना जीना’। उसमें रमेश जी ने ‘कम्युनिस्ट नैतिकता’ का एक अंश दिया है, जिसका शीर्षक है ‘नैतिकता और धर्म’। धर्म के मामले में कम्युनिस्ट लोग अक्सर मार्क्स का एक कथन उद्धृत किया करते हैं कि धर्म जनता के लिए अफीम है। रमेश जी ने ऐसे कम्युनिस्टों की आलोचना करते हुए लिखा हैµ‘‘मार्क्स ने धर्म को सिर्फ अफीम नहीं, कुछ और भी कहा है। उन्होंने धर्म को अत्यंत कठिन जीवन जीने वाले लोगों के लिए सुकून की एक साँस भी कहा है, हृदयहीन संसार का हृदय भी कहा है, अनात्मिक परिस्थितियों की आत्मा भी कहा है। और यह सब कहने के बाद ही कहा है कि धर्म जनता के लिए अफीम है।’’

रमेश जी की एक और विशेषता है कि लाभ-हानि का हिसाब लगाकर आलोचकों को खुश रखने के लिए उनकी खुशामद ये नहीं करते, बल्कि उनकी गलत बातों की खुलकर आलोचना करते हैं। इस किताब में इस प्रकार के दो लेख हैं। ‘साहित्य और साधारण पाठक’ और ‘सवाल मुकम्मल कहानी का’। इनमें से पहले लेख में उन्होंने हिंदी के उन आलोचकों की आलोचना की है, जो पाठकों में साहित्य की समझ पैदा करने के बजाय लेखकों को लिखना सिखाने की कोशिश करते हैं। रमेश जी उन आलोचकों को अच्छा आलोचक नहीं मानते, जो किसी लेखक के लेखन को उसके संदर्भों के साथ समग्रता में समझने के बजाय उसकी किसी एक रचना को ‘राजनीतिक रूप से सही’ न पाकर उसकी आलोचना करते हैं और लेखक को ‘सही ढंग से लिखना’ सिखाने की कोशिश करते हैं। लेख के अंत में रमेश जी कहते हैं :

‘‘मैं अच्छा आलोचक उसे मानता हूँ, जो रचना की किसी ऐसी खूबसूरती पर उँगली रख सके, जिसे साधारण पाठक गूँगे के गुड़ की तरह महसूस तो करते हों, पर लिख-बोलकर बता न सकते हों। जो आलोचक यह काम कर सकता है, वह रचना में लाखों कमियाँ बता सकने वाले आलोचक से बड़ा आलोचक है। ऐसा आलोचक लेखकों को लिखना तथा पाठकों को पढ़ना भी सिखा सकता है।’’

इसी तरह ‘सवाल मुकम्मल कहानी का’ शीर्षक लेख में रमेश जी ने नामवर जी की कहानी समीक्षा की आलोचना की है और खास तौर से उनकी कथानक संबंधी बातों पर तीखे प्रश्न उठाये हैं। कुछ और लेख भी हैं इस किताब में, जिनमें रमेश जी ने कहानी के रूप, उसकी अंतर्वस्तु, उसकी रचना-प्रक्रिया पर विचार किया है। इन लेखों से उनकी अपनी रचना-प्रक्रिया भी सामने आती है और उनकी कहानियों को समझने में मदद मिलती है। लेकिन कहानी समीक्षा के संदर्भ में रमेश जी ने भूमंडलीय यथार्थवाद का प्रश्न उठाकर उसकी जो एक नयी अवधारणा निर्मित की है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने जब पहली बार मुझसे इसकी चर्चा की थी, मुझे थोड़ी परेशानी हुई थी। थोड़ा असमंजस हुआ था। लेकिन इस किताब में शामिल कुछ लेखों में भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा स्पष्ट होकर सामने आयी है और वह हमारी समझ को विकसित करती है। रमेश जी पक्के यथार्थवादी हैं। पहले भी थे, इस किताब में भी हैं। लेकिन यथार्थवाद की उनकी समझ समय के साथ-साथ बदलती और विकसित होती रही है। उसका विकसित रूप भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा में दिखायी पड़ता है।

यथार्थवाद के संदर्भ में रमेश जी ने अनुभव और अनुभववाद में जो बारीक फर्क किया है, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। अनुभव और अनुभववाद में अंतर होता है। अनुभव के बिना रचना पैदा नहीं होती, लेकिन अनुभववाद रचना की सीमा बन जाता है। इस पर रमेश जी ने विस्तार से विचार किया है। रमेश जी मानते हैं कि रचना हमेशा यथार्थ के अन्वेषण और रूप के आविष्कार के सहारे चलती है। हर रचनाकार को यह अन्वेषण और आविष्कार करना पड़ता है।

रमेश जी की अपनी कहानियों में यह चीज स्पष्ट दिखायी पड़ती है। इसका एक कारण यह भी है कि ये कहानी लिखने के साथ-साथ कहानी लिखने की प्रक्रिया पर भी विचार करते हैं। इस सिलसिले में इस किताब में संकलित इनके तीन लेख विशेष रूप से पढ़ने लायक हैंµ‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’, ‘सवाल मुकम्मल कहानी का’ और ‘यथार्थवादोत्तर/मार्क्सवादोत्तर?’। इनमें रमेश जी ने हिंदी आलोचना पर, खास तौर से कहानी की वर्तमान आलोचना पर, जो विचार किया है, उससे हिंदी आलोचना की संस्कृति और विकृति दोनों सामने आती हैं। इसलिए अंत में मैं यह कहूँगा कि हिंदी साहित्य की प्रकृति, संस्कृति और लगे हाथ उसकी विकृति--सब को एक साथ देखना हो, तो मेरा निवेदन है कि आप रमेश जी का यह ग्रन्थ जरूर पढ़ें। 


विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी
सबसे पहले मैं एक रहस्य की बात कहना चाहता हूँ। बहुत नाटकीय ढंग से नहीं कहना चाहता, लेकिन यह अवसर ऐसा है--रमेश उपाध्याय का जन्मदिन और इस अवसर पर इनकी पुस्तक ‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ का प्रकाशन--कि उस बात को कहना जरूरी है। वह बात यह है कि मैं चुपके-चुपके रमेश उपाध्याय से प्रेरणा लेता रहा हूँ। इनको लगातार इतना कर्मठ और सक्रिय देखना सचमुच प्रेरक है। कई बार मैंने कहा है कि मैं रमेश उपाध्याय को संपादक के रूप में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में रखता हूँ। यह बात पहली बार मैंने आज से दस-पंद्रह साल पहले कही थी और आज फिर दोहराता हूँ। लेकिन प्रेरणा मैं इनके एक और रूप से लेता हूँ। इनके पारिवारिक रूप से, जिसका जिक्र अभी अल्पना मिश्र ने किया। एक यशस्वी लेखक और प्राध्यापक के लिए अपने परिवार को सँभाले रखना मुश्किल होता है। उसमें एक प्रकार का आर्थिक और भौतिक संकट तो होता ही है, कभी-कभी बड़ा मानसिक संकट भी होता है। मैं इस मामले में अपना विचलन देखता था, अपनी कमजोरियाँ देखता था, लेकिन देखता था कि यह आदमी कभी विचलित नहीं हुआ। इसमें अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में कभी कोई कमजोरी दिखायी नहीं दी। इस बात ने मुझे हमेशा प्रभावित और प्रेरित किया।

मैं एक लेखक के रूप में भी इनसे प्रेरणा लेता रहा हूँ। सबसे पहले रमेश उपाध्याय की जिस चीज ने मुझे प्रभावित किया, वह थी इनकी भाषा, इनका गद्य। और इनकी भाषा की प्रशंसा मैंने लिखित रूप में की। यह 1974 के आसपास की बात है, जब इन्होंने आनंद प्रकाश और राजकुमार शर्मा के साथ मिलकर ‘युग-परिबोध’ नामक पत्रिका निकाली थी। इनके ये दोनों मित्र मॉडल टाउन में रहते थे। मैं भी वहीं रहता था। और भी कई पुराने साहित्यकारों और नये लेखकों ने वहाँ मकान ले रखे थे। रमेश उपाध्याय मॉडल टाउन से कुछ दूर राणा प्रताप बाग में रहते थे, लेकिन हमारा एक-दूसरे के घर आना-जाना और मिलना-जुलना होता रहता था। इनके साथियों में उन दिनों सुधीश पचौरी और कर्णसिंह चौहान भी हुआ करते थे। तब मैंने शायद ‘जनयुग’ में किसी प्रसंग में लिखा था कि ये लोग रमेश उपाध्याय से गद्य लिखना सीखें।

अभी तक भी गद्य में मेरा मिजाज बहुत मिलता है रमेश जी के साथ। इनके गद्य की विशेषता है अभिधा में लिखना और अपनी बात सूत्रों और सूक्तियों के रूप में कहना। अभिधा में लिखा गया एक सीधा-सादा वाक्य जितना कह सकता है, उतना प्रतीक, फैंटेसी वगैरह की तिकड़म-विकड़म से नहीं कहा जा सकता। अनंत अर्थ का समुद्र होता है एक सीधा-सादा वाक्य। एक बड़ा नाम लेकर कहना चाहूँ, तो कह सकता हूँ कि यह बात नोम चॉम्स्की ने भी भाषा के बारे में कही है। हमारे भारतीय साहित्य और भाषा-चिंतन में भी अभिधा की बड़ी महिमा है। आज भी अभिधा में एक स्पष्ट वाक्य लिखना लेखन का गुण माना जाता है। रमेश जी की भाषा में यह गुण है।

दूसरी विशेषता इनकी भाषा की यह है कि इनके लेखन में बातें अक्सर सूत्रों और सूक्तियों के रूप में कही जाती हैं। सूत्र निकालना और सूक्तियाँ कहना मामूली बात नहीं है। सरल रेखा खींचना बड़ा टेढ़ा काम है। बड़े लेखक सूक्तियाँ निकालते हैं। यह काम मध्यकालीन संत करते थे। हिंदी में यह काम प्रेमचंद ने किया है। प्रेमचंद का एक वाक्य है--‘‘प्रेम ने बड़ी तपस्या करके घर का वरदान पाया है।’’ या एक और वाक्य है--‘‘बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है।’’ बिलकुल सीधे-सादे वाक्य हैं, लेकिन इनके पीछे पूरा इतिहास है, व्यापक सामाजिक अनुभव है, लेखक का अपना अनुभव और चिंतन-मनन है, जिससे ये सीधे-सादे वाक्य सूक्ति बनते हैं। रमेश जी की इसी किताब में आपको बहुत-सी सूक्तियाँ मिल जायेंगी। जैसे--‘‘मनुष्य ऐसा प्राणी है, जो सुंदर स्वप्न देखना बंद नहीं करता।’’ या ‘‘साधारण पाठक एक जनतांत्रिक अवधारणा है।’’ या ‘‘नवीनता और मौलिकता में कोई अंतर्विरोध नहीं है, बल्कि सच्ची नवीनता तो मौलिकता में से ही आती है।’’

रमेश उपाध्याय की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि ये बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर असहमत होने पर बहस ही नहीं, आप से झगड़ा भी कर लेंगे। मेरे साथ भी एकाध बार हुआ है। बड़ा भीषण झगड़ा हुआ है। लेकिन जैसा कि पांडेय जी ने कहा कि ‘‘तुम्हीं से मुहब्बत तुम्हीं से लड़ाई’’, रमेश उपाध्याय झगड़ चाहे जितना लें, मुहब्बत करते रहते हैं, मित्रता बनाये रखते हैं। बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर हुई तीखी बहसों और झगड़ों के बावजूद मैं इनकी साहित्यधर्मिता से हमेशा प्रभावित रहा हूँ। अच्छे लेखक होने के साथ-साथ ये बहुत पढ़े-लिखे आदमी हैं। बहुत पढ़ाकू हैं। इन्होंने गंभीरता से, योजना बनाकर, बहुत-से देशी-विदेशी लेखकों को पढ़ा है और ये बहुत अच्छे अनुवादक हैं। अंर्स्ट फिशर की किताब का अनुवाद ‘कला की जरूरत’ आप पढ़ें। बहुत अच्छा, बल्कि अद्भुत अनुवाद है। आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकतावाद और यथार्थवाद का जैसा अध्ययन इन्होंने किया है, इन चीजों पर जैसा इन्होंने लिखा है, इनके साथ के कितने लेखकों ने ऐसा काम किया है? ये आधुनिक हैं, लेकिन अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे आधुनिक नहीं; बल्कि नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे आधुनिक हैं।

पांडेय जी ने गिरीश मिश्र का जिक्र किया। गिरीश मिश्र खुद को बड़ा अंग्रेजीदाँ और पाश्चात्य साहित्य का अध्येता समझते हैं। हिंदी वालों के बारे में अंट-शंट बोलते रहते हैं। हम लोग उनकी खबर लेना चाहते हुए भी चुप रहते थे। रमेश उपाध्याय चुप नहीं रहे। इन्होंने उनको जवाब दिया। वह लेख इस किताब में मौजूद हैµ‘प्रेमचंद को लाठी बनाना’। इन्होंने जमकर उनको जवाब दिया और बताया कि गिरीश मिश्र को हिंदी का ही नहीं, अंग्रेजी भाषा का भी और यहाँ तक कि अपने विषय अर्थशास्त्र का भी कितना कम ज्ञान है। इसी तरह इन्होंने कई उत्तर-आधुनिकतावादियों की खबर ली है, यथार्थवाद और मार्क्सवाद के विरोधियों की भी खबर ली है। ये बहसें भी इनकी इस किताब में हैं।

इस किताब के शीर्षक के बारे में भी मैं एक बात कहना चाहता हूँ। यह शीर्षक इन्होंने कबीर से लिया है। कबीर का-सा अक्खड़पन इनमें भी है, लेकिन ‘‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’’ कहने में जो विनम्रता है, जो समर्पण और साधना है, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। समर्पण और साधना के लिए साधक का कोई इष्ट होना चाहिए। रमेश उपाध्याय के लेखन में भी एक समर्पण और साधना है और इनका भी एक इष्ट है। वह है जन। लेकिन रमेश उपाध्याय रहस्यवादी नहीं हैं, यथार्थवादी हैं और मार्क्सवादी हैं। इनका चिंतन डायलेक्टिकल है और डायलेक्टिक्स में ‘वाद’ का एक ‘प्रतिवाद’ भी होता है। सो रमेश उपाध्याय के लेखन में ‘जन’ का प्रतिवादी है ‘अभिजन’। एक जन है और एक अभिजन। सौंदर्यबोध में अगर विवादी स्वर नहीं बोल रहा है, तो समझिए कि सौंदर्यबोध कच्चा है। सौंदर्य अच्छा लगता है, इसका मतलब ही यह है कि आपको कुरूपता बुरी लगती है। अगर आप अच्छे के पक्ष में हैं, तो अच्छे पर बल देंगे और बुरे को बुरा कहेंगे, उसका विरोध करेंगे। इसलिए रमेश उपाध्याय के यहाँ एक जन है, दूसरा अभिजन है; एक तरफ जनवादी साहित्य है, तो दूसरी तरफ अभिजनवादी साहित्य है।

इसमें एक बात यह भी है कि जन, जनता, जनवाद इनके यहाँ सिर्फ नाम लेने के लिए नहीं हैं। ये इन चीजों में विश्वास करते हैं। बल्कि स्वयं जन हैं और बने रहने का प्रयास करते हैं। इसीलिए इनकी कथनी और करनी में हम लोगों की अपेक्षा अंतर कम है। यह बहुत बड़ी बात है और मुझे बहुत प्रभावित करती है। हमने मजदूरों को दूर से देखा है, स्वयं मजदूर नहीं रहे हैं। इन्होंने मजदूरी की है, स्वयं मजदूर का जीवन जिया है। इस किताब का जो पहला अध्याय है, आत्मकथात्मक है। उसमें इन्होंने प्रेस में काम करने के अपने अनुभव का अद्भुत वर्णन किया है। कंप्यूटर पर किये जाने वाले कामों से पुराने प्रेसों में किये जाने वाले कामों की तुलना करते हुए इन्होंने लिखा है :

‘‘पुराने प्रेसों में इस तरह के सारे काम सीसे के टाइपों, लकड़ी के केसों, पीतल की स्टिकों, लोहे की गैलियों, केस और गैलियाँ रखने की ऊँची-ऊँची रैकों, पू्रफ उठाने के हैंड-प्रेसों आदि के साथ बड़ी मेहनत-मशक्कत से होते थे। हर भाषा के हर फौंट के हर साइज के टाइप के लिए अलग-अलग केस। अंग्रेजी के दो, हिंदी के तीन या चार। उन केसों के छोटे-छोटे खानों में भरे हुए सीसे के टाइप। अंग्रेजी में अपर-लोअर अलग, हिंदी में अक्षर, मात्राएँ, संयुक्ताक्षर, विरामचिह्न आदि अलग। किस खाने में क्या है, याद रखिए। सामने रखी ‘कॉपी’ को देख-देखकर बायें हाथ में पकड़ी ‘स्टिक’ में दायें हाथ से एक-एक टाइप उठाकर रखते जाइए। लाइन को ‘जस्टीफाई’ करने के लिए शब्दों के बीच स्पेस घटाइए-बढ़ाइए। स्पेस यथासंभव बराबर रहे, इसका ध्यान रखिए। लाइन पूरी हो जाने पर ‘लेड’ डालकर अगली लाइन कंपोज कीजिए। लाइन लंबी है, तो ध्यान रखिए कि टूटकर बिखर न जाये। बिखर जाये, तो फिर से कंपोज कीजिए। बीच में किसी और टाइप में कंपोज करना हो, तो उठकर जाइए, रैक में से उस टाइप के भारी-भारी केस खींचकर बाहर निकालिए और काम करने के बाद उन्हें उठाकर यथास्थान लगाइए। कोई शब्द बोल्ड या इटैलिक करना हो, तो भी यही सब कीजिए। मैटर को अंडरलाइन करना हो, तो रेखांकित शब्दों के बराबर की ‘रूल’ खोजिए और न मिले, तो पीतल की सख्त ‘रूल’ को कतिया से काटकर लगाइए। ‘गेज’ से नाप-नापकर पेज बनाइए, उन्हें डोरी से बाँधिए, सीसे के भारी-भारी पेजों को टूटने-बिखरने से बचाते हुए ‘गैली’ में रखिए, उस भारी ‘गैली’ को उठाकर पू्रफ उठाने की मशीन तक ले जाइए, ‘इंक-प्लेट’ पर स्याही लगाकर ‘रोलर’ से उसे इकसार कीजिए, पेजों पर स्याही लगाइए, कागज को गीला करके उचित ‘दाब’ देकर पू्रफ उठाइए। पू्रफ पढ़कर दे दिये जायें, तो सीसे के टाइपों की उलटी लिखाई पढ़ते हुए चिमटी से गलत टाइप निकालकर उनकी जगह सही टाइप बिठाइए। ‘डबल कंपोजिंग’ या ‘सी कॉपी’ के कारण मैटर घट-बढ़ जाये, तो मैटर को ‘चलाइए’। लाइनें घट-बढ़ जायें, तो बाद के सारे पेज खोल-खोलकर फिर से सबका मेकअप कीजिए, उन्हें बाँधिए और फिर से प्रूफ उठाइए।’’

लंबा उद्धरण है, लेकिन यह मैंने अपने मन की एक रोचक बात बताने के लिए आपके सामने पढ़ा है। जब मैं किताब में इसे पढ़ रहा था, मुझे विष्णु खरे की कविता ‘लालटेन’ याद आ रही थी, जिसमें विस्तार से बताया गया है कि लालटेन कैसे जलायी जाती थी। यहाँ रमेश उपाध्याय विस्तार से बता रहे हैं कि पुराने प्रेसों में काम कैसे किया जाता था। यह अनुभव बहुतों को हुआ होगा, ऐसा संघर्ष बहुतों ने किया होगा, लेकिन इस अनुभव और संघर्ष को चित्रित करना बड़ी बात होती है। खास तौर से तब, जब आप उस अनुभव और संघर्ष से आगे बहुत दूर निकल आये हों। यानी प्रेस में काम करने वाले मजदूर की जगह आप लेखक, पत्रकार, प्राध्यापक और संपादक बन गये हैं, फिर भी आपका मजदूर और मजदूर वाला तेवर आपके भीतर मौजूद है। यही कारण है कि रमेश उपाध्याय के ऊपर बुर्जुआ बुद्धिजीवियों का या आलोचकों का आतंक नहीं है। जो बात कहनी होती है, साफ-साफ कहते हैं, कबीराना अक्खड़पन के साथ कहते हैं, लेकिन उसके पीछे ठोस अध्ययन, मनन और चिंतन होता है। हवाई बातें रमेश उपाध्याय नहीं करते हैं। चाहे वह कम्युनिस्ट नैतिकता का सवाल हो, या धर्म और ईश्वर का सवाल हो, या यथार्थवाद और भूमंडलीकरण का सवाल हो, या इनकी अपनी भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा का सवाल हो--किसी भी सवाल पर जब ये लिखते हैं, पूरी तैयारी के साथ लिखते हैं।

इस किताब के बारे में मंडलोई जी ने कहा कि यह पूरी किताब आत्मकथात्मक होती तो अच्छा रहता। इसका पहला अध्याय ‘अजमेर में पहली बार’ पढ़कर किसी को भी ऐसा लग सकता है। मुझे भी लगा, क्योंकि वह इतना रोचक और मार्मिक हैµऔर उसमें इनके प्रेम का जो प्रसंग है, वह तो इतनी शिद्दत से लिखा गया है कि उस प्रेम को मैंने भी महसूस किया। वह प्रेम प्रसंग बड़े संयम से लिखा गया है, लेकिन बहुत प्रभावित करता है। उस अध्याय को पढ़कर मुझे भी लगा कि रमेश उपाध्याय आत्मकथा ही लिखते, तो अच्छा रहता। लेकिन जब मैंने पूरी पुस्तक पर विचार किया, तो पाया कि नहीं, यह इसी रूप में ठीक है। इसमें रमेश उपाध्याय का जो चिंतन है, दूसरों से की गयी जो बहसें हैं, विभिन्न विषयों पर लिखे गये जो लेख हैं, उनसे भी तो इनका जीवन, व्यक्तित्व और संघर्ष सामने आता है। वह आत्मकथात्मक ढाँचे में नहीं आ सकता था। ये गंभीर लेख हैं। रोशनी देने वाले लेख हैं। इनसे पता चलता है कि रमेश उपाध्याय अपने लेखन और चिंतन की किस प्रक्रिया से गुजरे हैं। ये एक ‘प्रैक्टिसिंग राइटर’ के लेख हैं, जो अपने लेखन के साथ-साथ अपने समकालीन साहित्य की समस्याओं पर भी सोचता- विचारता है और उनसे सर्जनात्मक स्तर पर ही नहीं, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी जूझता है। इसीलिए जो लेख आत्मकथात्मक नहीं हैं, वे भी प्रासंगिक और पठनीय हैं। उनका इस किताब में रहना जरूरी था। 

इस किताब की एक और विशेषता है। यह किताब रमेश उपाध्याय के बारे में बने हुए या मार्क्सवाद, यथार्थवाद, प्रगतिशीलता और जनवाद के विरोधियों के द्वारा गढ़े गये इस मिथक को तोड़ती है कि ये हमेशा क्रांति की बातें करते हैं या अपने लेखन में सिर्फ नारेबाजी करते हैं। इस संदर्भ में इसी किताब से एक उद्धरण और देकर मैं अपनी बात समाप्त करूँगा। इन्होंने लिखा है :

‘‘आज की दुनिया में मार्क्सवादी कथाकार होने का मतलब है वर्तमान पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था की जगह समाजवादी विश्व-व्यवस्था के निर्माण के लिए संघर्षरत शक्तियों के साथ खड़े होना। कथा में यह काम वर्ग-संघर्ष या क्रांति के बारे में लिखकर ही नहीं, बल्कि सच्चाई और अच्छाई जैसी ‘मामूली’ चीजों के बारे में लिखकर भी किया जा सकता है। हिंदी कथा का सार्थक विकास इसी प्रकार होता आया है और आगे भी किया जा सकता है।’’

मैं अंत में केवल यह कहना चाहता हूँ कि मुझे बहुत अच्छी लगी यह किताब। इसको पढ़कर मुझे बड़ा फायदा हुआ। नये लेखकों के लिए तो ‘राइटर्स कंपेनियन’ या लेखक-सहचर की तरह की किताब है यह--पठनीय, संग्रहणीय और बहुत दूर तक आचरणीय भी। इन्हीं शब्दों के साथ मैं रमेश जी को इस किताब के लिए बधाई देता हूँ। मैं इनसे उम्र में बहुत बड़ा हूँ, इसलिए इनके जन्मदिन पर इनके सुदीर्घ जीवन की कामना करता हूँ। मुझे विश्वास है कि ये बहुत दिनों तक स्वस्थ और सक्रिय रहेंगे और मेरे लिए बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।

प्रस्तुति : संज्ञा उपाध्याय

Tuesday, December 11, 2012

माध्यमों के ध्वस्त पुल और पुरस्कारों की बाढ़

यह लेख 'समकालीन सरोकार' के दिसंबर, 2012 के अंक में 'पुरस्कारों की बाढ़ में फेंके गये लेखक की मजबूरी' शीर्षक से छपा है. लेकिन मेरे द्वारा दिया गया शीर्षक 'माध्यमों के ध्वस्त पुल और पुरस्कारों की बाढ़' ही था. 

साहित्य और संस्कृति से संबंधित संस्थाओं की दशा या दुर्दशा पर विचार करते हुए हम प्रायः साहित्य और संस्कृति को ही भूल जाते हैं। हम उनकी ढाँचागत कमियों और कमजोरियों की आलोचना करते हैं। हम उनकी नीतियों और गतिविधियों की आलोचना करते हैं। हम उनकी कार्यशैलियों और कार्यप्रणालियों की आलोचना करते हैं। हम उनके पदाधिकारियों की गलत नियुक्तियों और पदोन्नतियों की आलोचना करते हैं। हम उनकी फिजूलखर्चियों और बदइंतजामियों की आलोचना करते हैं। हम उनके अंदर चलने वाली स्वार्थजन्य गुटबंदियों और राजनीतिक दलबंदियों की आलोचना करते हैं। हम उनके द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कारों में की गयी मनमानियों और बेईमानियों की आलोचना करते हैं। हम उनके द्वारा पुरस्कृत और उपकृत होने वाले व्यक्तियों की अयोग्यताओं और अपात्रताओं की आलोचना करते हैं। हम उनकी स्वतंत्रता और स्वायत्तता को कम या खत्म करने वाली शक्तियों और प्रवृत्तियों की आलोचना करते हैं। और हम उनमें सुधार या बदलाव की जरूरत बताते हुए उनके अंदर स्वतंत्रता, स्वायत्तता, जनतांत्रिकता, नैतिकता, निष्पक्षता और पारदर्शिता की माँग करते हैं। लेकिन यह नहीं देखते कि यहाँ साहित्य और संस्कृति का क्या हाल है, जिसके विकास और प्रचार-प्रसार के लिए ये संस्थाएँ बनायी गयी हैं।

शायद हम यह मानकर चलते हैं कि ये संस्थाएँ तो ठीक हैं, अच्छे उद्देश्यों से बनायी गयी हैं, इनमें कोई खराबी नहीं है। खराबी है इनमें काम करने वाले व्यक्तियों और उन्हें ऊपर से या पीछे से संचालित करने वाली शक्तियों में, जिन्हें यदि बदल दिया जाये, तो सब ठीक हो जाये। लेकिन हम शायद यह देखते हुए भी नहीं देखते कि इन संस्थाओं को चलाने वाले व्यक्तियों और उन्हें संचालित करने वाली शक्तियों के बदल जाने पर भी ये संस्थाएँ नहीं बदलतीं। वैसे ही, जैसे देश में सरकारें बदलती रहती हैं, देश की व्यवस्था नहीं बदलती, जिसके कारण बदली हुई सरकारें भी वही सब करती हैं, जो पिछली सरकारें करती रही होती हैं। साहित्य और संस्कृति से संबंधित संस्थाओं के कटु-कठोर आलोचक जब स्वयं उन पर काबिज हो जाते हैं, तो वही करते हैं, जो उनसे पहले वाले लोग करते थे। नये आने वाले कई लोग तो इसमें कोई बुराई भी नहीं समझते, बल्कि खुल्लमखुल्ला डंके की चोट पर कहते हैं--हम से पहले वाले लोगों ने अपने लोगों को पुरस्कृत-उपकृत किया, अब हम अपने लोगों को पुरस्कृत-उपकृत कर रहे हैं। 

साहित्यकार सबसे अधिक आलोचना साहित्यिक पुरस्कार देने वाली संस्थाओं की करते हैं, लेकिन उनसे पुरस्कृत होने के लिए लालायित भी रहते हैं। उनकी ज्यादातर आलोचनाएँ इस प्रकार की होती हैं कि पुरस्कार इस लेखक को दिया गया, उस लेखक को क्यों नहीं दिया गया। इस विधा पर दिया गया, उस विधा पर क्यों नहीं दिया गया। इस किताब पर दिया गया, उस किताब पर क्यों नहीं दिया गया। ऐसी आलोचनाएँ पढ़-सुनकर लगता है कि मानो इन लोगों के पसंदीदा लेखक को, इनकी पसंदीदा विधा को और इनकी पसंदीदा किताब को पुरस्कार दे दिया गया होता, तो सब ठीक हो जाता! वे जब स्वयं पुरस्कार पा जाते हैं, तो प्रसन्न और संतुष्ट होकर शांत हो जाते हैं। मानो अब साहित्य जगत में सब कुछ ठीक हो गया हो!

लेकिन साहित्य जगत में कुछ भी ठीक नहीं है। साहित्य आम जनता के बल पर ही जीवित और जीवंत रह सकता है। इसके लिए जरूरी है कि वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे। लोग उसे पढ़ें या दृश्य-श्रव्य रूपों में देखें-सुनें और साहित्यकारों को उससे अपने जीवनयापन के साधनों के साथ-साथ जनता से जरूरी ‘रेस्पांस’ और ‘फीडबैक’ भी मिलता रहे। और इसके लिए यह जरूरी है कि साहित्य के प्रकाशन, प्रसारण, अनुवाद और दृश्य-श्रव्य रूपों में रूपांतरण की एक समुचित व्यवस्था समाज में हो। इतिहास से पता चलता है कि प्रत्येक समाज अपने साहित्य के लिए ऐसी व्यवस्था किसी न किसी रूप में करता रहा है। आधुनिक युग में यह व्यवस्था मुख्यतः तीन प्रकार से होती है--साहित्य को सीधे जनता तक पहुँचाने वाली सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संस्थाओं के द्वारा; पत्रकारिता और पुस्तक प्रकाशन के द्वारा; और रंगमंच, रेडियो, टेलीविजन और सिनेमा जैसे माध्यमों के द्वारा। 

भारत में आजादी से पहले और आजादी के कुछ समय बाद तक भी यह व्यवस्था कायम थी। (आजादी से पहले टेलीविजन नहीं था, लेकिन बाद में जब आया, तो उसके जरिये साहित्य का काफी प्रसारण हुआ।) मगर धीरे-धीरे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संस्थाओं से साहित्य दूर होता गया और उसका सीधे आम जनता तक पहुँचना कम होता गया। पत्रकारिता और साहित्य का जो घनिष्ठ संबंध पहले से चला आ रहा था, वह भी धीरे-धीरे क्षीण होता गया। पहले के पत्रकार प्रायः ‘साहित्यकार ही’ या ‘साहित्यकार भी’ हुआ करते थे और पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य के लिए काफी जगह रहती थी। अब उनकी जगह ऐसे पत्रकारों ने ले ली है, जिनका प्रायः साहित्य से कोई संबंध नहीं होता और पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य की जगह कम होते-होते खत्म-सी हो गयी है। रंगमंच, रेडियो, टेलीविजन और सिनेमा का भी साहित्य से अब पहले जैसा संबंध नहीं रहा। रहा पुस्तक प्रकाशन, सो उस पर सरकार और बाजार का ऐसा हमला हुआ है कि साहित्य को जनता तक पहुँचाने वाला यह पुल भी ध्वस्त हो गया है।

पुस्तक प्रकाशन (बड़े संचार माध्यमों और अब इंटरनेट के बावजूद) आज भी साहित्य को जनता तक पहुँचाने का मुख्य माध्यम है। लेकिन अब वह जमाना नहीं रहा, जब प्रकाशक दूसरी तरह की पुस्तकों के साथ-साथ साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन भी करते थे और कोशिश करते थे कि साहित्यिक पुस्तकें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचें। इसके लिए वे पुस्तकों की कीमत कम रखते थे और बुकसेलरों को कमीशन देकर खुश रखते थे। हर शहर और हर कस्बे में मौजूद बुकसेलर साहित्यिक पुस्तकें रखते थे और आम पाठकों को बेचते थे। (मेरी कहानी ‘लाला बुकसेलर’ के लाला जैसे चरित्र हर जगह देखने को मिलते थे।) बुकसेलर अपने-आप में एक संस्था होते थे। यह संस्था प्रकाशक और पाठक के बीच एक पुल बनाने का काम करती थी। लेकिन सरकारी संस्थाओं ने थोक में किताबें खरीदना शुरू किया, तो बुकसेलर नामक संस्था ही समाप्त हो गयी। छोटे शहरों और कस्बों की तो बात ही क्या, महानगरों में भी, जहाँ अब हर सड़क और हर गली बाजार है, साहित्यिक पुस्तकों की कोई दुकान ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलेगी।

किताबों की सरकारी थोक खरीद होने लगी, तो प्रकाशकों को आम पाठक की चिंता नहीं रही। थोक में किताबें खरीदने वाले अधिकारी को घूस देकर जब एक बार में ही एक हजार किताबें खपायी जा सकती हों, तो एक हजार खुदरा पाठकों तक पहुँचने की, उनकी क्रयशक्ति का खयाल करके किताबों की कीमत कम रखने की, बुकसेलरों तक किताबें पहुँचाने और उन्हें कमीशन देकर खुश रखने के लंबे झंझट में पड़ने की क्या जरूरत? रद्दी-सद्दी किताबें भी--अनाप-शनाप दाम रखकर भी--अगर घूस के बल पर थोक सरकारी खरीद में खपायी जा सकती हों, तो प्रकाशक पाठकों की परवाह क्यों करे? अच्छे लेखकों से अच्छी किताबें लिखवाने और उन्हें समय से सम्मानपूर्वक रॉयल्टी देने की अब क्या जरूरत, जबकि घटिया से घटिया लेखकों की घटिया से घटिया किताबें भी थोक खरीद में खपायी जा सकती हों?

अतः अब कुछ ‘सेलेब्रिटी’ बन चुके और पाठ्यक्रमों में लग चुके चंद साहित्यकारों को छोड़कर बाकी साहित्यकारों की चिंता प्रकाशक नहीं करते। ‘‘साहित्यिक पुस्तकें बिकती नहीं’’ के तकियाकलाम के साथ वे साहित्यकारों से ऐसे बात करते हैं, जैसे उनकी किताब छापकर उन पर कोई कृपा कर रहे हों। और कृपा भी इस शर्त के साथ कि रॉयल्टी वगैरह तो आप भूल ही जायें, अपने संबंधों और संपर्कों के बल पर अपनी किताब (और हो सके, तो हमारी दूसरी किताबें भी) बिकवाने में हमारी मदद करें! और ऐसे ‘मददगार साहित्यकार’ आला अफसरों, राजनीतिक नेताओं, मंत्रियों आदि के रूप में उन्हें आजकल बहुतायत में मिल जाते हैं। वे साहित्यकार न हों, तो भी उनकी लिखी या किसी गरीब लेखक से लिखवायी गयी किताब प्रकाशक बढ़िया ढंग से छापते हैं और धूमधाम से किसी बड़े साहित्यकार के हाथों उसका लोकार्पण कराकर उन ‘मददगारों’ को रातोंरात बड़ा साहित्यकार बना देते हैं।

बाकी साहित्यकारों से--खास तौर से नये लेखकों से--वे कहते हैं कि ‘‘आपकी पुस्तकें बिकती नहीं, आप छपाई का खर्च दे दें, हम आपकी पुस्तक प्रकाशित कर देंगे।’’ साथ में सलाह भी देते हैं--‘‘साहित्य पर दिये जाने वाले ढेरों पुरस्कार हैं, एकाध झटक लीजिए, सारा खर्चा निकल आयेगा।’’ लेखक सोचता है कि यह तरीका अच्छा है। झटपट किताब छप जायेगी और पुरस्कार मिलने से कुछ ख्याति तो मिलेगी ही, किताब छपवाने में लगी लागत भी निकल आयेगी। सो वह प्रकाशक को पैसा देकर अपनी किताब छपवा लेता है और उससे मिली सौ या पचास प्रतियाँ लेकर समीक्षकों और संपादकों को पटाने निकल पड़ता है कि उसकी किताब की कुछ चर्चा हो जाये, तो उस पर कोई पुरस्कार उसे मिल जाये। अगर बीस हजार देकर छपवायी गयी किताब पर दस हजार का पुरस्कार भी मिल गया, तो गनीमत है। गाँठ से गयी आधी रकम वापस मिल गयी और आधी से जो नाम कमाया, वह एक तरह का सांस्कृतिक पूँजी निवेश हुआ, जो आगे चलकर कोई बड़ा पुरस्कार दिलवायेगा!

और सरकार तथा बाजार की कृपा से लेखकों को दिये जाने वाले पुरस्कारों की बाढ़-सी आ गयी है। विभिन्न प्रकार की छोटी और बड़ी, सरकारी और अर्धसरकारी, गैर-सरकारी और निजी, देशी और विदेशी संस्थाएँ भारतीय लेखकों को विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े पुरस्कार बाँटने लगी हैं। इनमें हजारों रुपयों से लेकर लाखों रुपयों तक के पुरस्कार शामिल हैं। इस प्रकार के कुल पुरस्कार कितने हैं और कुल मिलाकर कितनी धनराशि के हैं, इसके आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन मोटे अनुमान के तौर पर इनकी संख्या हजारों की और इनके जरिये लेखकों को दी जाने वाली धनराशि करोड़ों रुपयों की मानी जा सकती है। इन पुरस्कारों को प्रदान करने के लिए आयोजित कार्यक्रमों पर पुरस्कारों में दी जाने वाली राशि से कई गुना ज्यादा खर्च आता है। एक अनुमान के अनुसार पुरस्कार की राशि और पुरस्कार समारोह पर होने वाले खर्च का अनुपात 1 : 5 का होता है। अर्थात् बीस हजार रुपये का पुरस्कार देने के लिए आयोजित समारोह पर एक लाख रुपये खर्च होते हैं।

इस प्रकार यदि प्रति वर्ष दिये जाने वाले साहित्यिक पुरस्कारों और उनको देने पर हुए कुल खर्चों को जोड़ें, तो मोटे तौर पर भी अनुमानित आँकड़े अंग्रेजी मुहावरे में ‘माइंड बौगलिंग’ होंगे और हिंदी मुहावरे में लगेगा कि भारतीय साहित्य और साहित्यकारों के लिए यह ‘स्वर्णयुग’ है; भारतीय साहित्य खूब फल-फूल रहा है।

लेकिन वास्तविकता यह है कि पुरस्कारों की इस बाढ़ ने साहित्यकारों को समृद्ध नहीं, विपन्न और बेचारा बना दिया है। इस बाढ़ में बहता हुआ लेखक समझ ही नहीं पाता कि उसे जाना कहाँ था और वह जा कहाँ रहा है। उसे प्रकाशक के माध्यम से अपने पाठक तक पहुँचना था। इसके लिए उसे मालिक-मजदूर वाला ही सही, एक ठोस संबंध प्रकाशक के साथ बनाना था, जिसकी शर्त यह होती कि प्रकाशक चाहे अपने मुनाफे के लिए उसका शोषण कर ले, पर उसे उसके पाठक तक पहुँचा दे। फिर पाठक उसे अपनाये या दुतकारे, पुरस्कृत करे या प्रताड़ित करे, लेखक जाने और उसका काम जाने। मगर किताबों की थोक सरकारी खरीद के जरिये भ्रष्ट और बेईमान बना दिया गया प्रकाशक उसे पाठक तक पहुँचाने का झाँसा देकर अपनी नाव में बिठाता है और मँझधार में पहुँचाकर उस नदी में फेंक देता है, जिसमें पुरस्कारों की बाढ़ आयी हुई है। लेखक से मानो वह कहता है--‘‘पाठक को भूल जाओ। लेखन के पारिश्रमिक को भूल जाओ। तुमने किताब लिखने और छपवाने में जो मेहनत और लागत लगायी है, उसके बदले में जो वसूल कर सकते हो, पुरस्कार देने वालों से वसूल करो। मैं चला, अब मेरा-तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं।’’ और पुरस्कारों की बाढ़ में बहता लेखक पाता है कि वह इस नदी से निकल भी नहीं पा रहा है, क्योंकि उसे एक ऐसे मायाजाल में बाँधकर यहाँ फेंका गया है, जिसमें बँधा वह छटपटा तो सकता है, पर निकल नहीं सकता।

साहित्यिक पुरस्कारों पर जितना धन लुटाया जाता है, उतने से ऐसी व्यवस्था मजे में की जा सकती है कि साहित्य सस्ता और सुलभ हो जाये, उसके पाठकों की संख्या बढ़े, अन्य भाषाओं में उसके अनुवाद और अन्य माध्यमों के लिए उसके रूपांतरण की व्यवस्थाएँ बनें और साहित्य जनता से जुड़कर जीवित और जीवंत बना रहे। लेकिन हर साल करोड़ों किताबों की सरकारी खरीद के बावजूद, और इतने अधिक बड़े-बड़े पुरस्कारों के बावजूद, साहित्यकार अपने साहित्य के बल पर जीवित नहीं रह सकता। वह अपनी आजीविका के लिए कोई साहित्येतर काम करने पर मजबूर होता है। वह समाज में साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि उसी काम को करने वाले बाबू, अफसर, अध्यापक आदि के रूप में जाना जाता है। उसकी हालत इतनी खराब है कि वह या तो पुरस्कारों का ‘दान’ पाने के लिए ‘दाताओं’ के सामने याचक की तरह खड़ा होता है या तरह-तरह की तिकड़में करके उनसे पुरस्कार ‘झटक लेने’ की अपसंस्कृति का शिकार होने को मजबूर होता है।

प्रश्न यह है कि साहित्य और साहित्यकार इस मायाजाल से कैसे निकलें? इसका उत्तर साहित्य और संस्कृति से संबंधित संस्थाओं की आलोचना करते रहने से नहीं मिलेगा। सरकार और बाजार इस समस्या को हल कर  देंगे, यह सोचना तो और भी आत्मघाती होगा, क्योंकि यह समस्या तो उन्हीं की पैदा की हुई है। उनकी रुचि इसे हल करने में नहीं, बढ़ाने में ही हो सकती है। अतः इस समस्या का हल स्वयं साहित्यकारों को ही करना होगा। और इसके लिए सबसे पहला काम होगा पुरस्कारों को ‘न’ कहना और स्वयं को तथा अपने साहित्य को पाठकों तक ले जाना। इसके तरीके क्या-क्या हो सकते हैं, यह साहित्यकारों को मिल-जुलकर सोचना होगा।

--रमेश उपाध्याय

Wednesday, October 24, 2012

बहस के लिए


'तद्भव'  के आख्यान पर एकाग्र अंक (अक्टूबर, 2011) में पिछले पच्चीस वर्षों की हिंदी कहानी पर एक लंबा लेख प्रकाशित हुआ था. मैंने उस पर एक टिप्पणी 'तद्भव' के नये अंक (अक्टूबर, 2012) में लिखी है. यह टिप्पणी 'बहस' के अंतर्गत छापी गयी है, लेकिन मेरी टिप्पणी के साथ ही उस लेख के लेखक का 'जवाब' (?) प्रकाशित करते हुए सम्पादकीय टिप्पणी में अखिलेश ने "इस बहस को अब यहीं विराम दिया जा रहा है" लिख कर बहस को बंद कर दिया है, जबकि बहस तो अब शुरू होनी चाहिए थी. मेरी टिप्पणी यहाँ प्रस्तुत है. आप चाहें, तो यहाँ या अन्यत्र इस बहस को आगे बढ़ा सकते हैं. 

यथार्थवाद और मार्क्सवाद को विकसित करें


Capitalism is a world system. Its victims can effectively face its challenges only if they are also organized at the global level.
--Samir Amin 
The World We Wish To See (2008)

हिंदी की कथा-समीक्षा में नवीनता पर जितना ज्यादा जोर दिया जाता है, उतना मौलिकता पर दिया गया होता, तो उसका बेहतर विकास होता। नवीनता और मौलिकता में कोई अंतर्विरोध नहीं है, बल्कि सच्ची नवीनता तो मौलिकता में से ही आती है, लेकिन मौलिकता उत्पन्न करना मुश्किल काम है, जबकि नवीनता नये फैशन के कपड़े पहन लेने की तरह आसानी से प्रदर्शित की जा सकती है। मसलन, जब तक आधुनिकतावाद का फैशन रहे, आप आधुनिकतावादी बने रहें, और जब उत्तर-आधुनिकतावाद का नया फैशन आये, तो आप उत्तर-आधुनिकतावादी हो जायें! लेकिन फैशन में तमाम खूबियों के बावजूद यह एक बड़ी खामी होती है कि उसमें मौलिकता नहीं, नकल होती है। विडंबना यह है कि हिंदी का कथा-समीक्षक, जो ‘भूमंडलीय दक्षिण’ का होने के नाते ‘भूमंडलीय उत्तर’ के वर्चस्व का विरोधी होना चाहिए, फैशनेबल नवीनता के चक्कर में फँसकर उसका अनुयायी बन जाता है। उदाहरण के लिए, यदि ‘वहाँ’ यह घोषणा कर दी जाती है कि साहित्य में यथार्थवाद और मार्क्सवाद का अंत हो चुका है, तो वह अपनी स्थिति और परिस्थिति की वास्तविकता की ओर से आँख मूँदकर ‘यहाँ’ भी उस घोषणा को दोहराने लगता है!

‘तद्भव’ के ‘आख्यान पर एकाग्र’ अंक (अक्टूबर, 2011) में प्रोफेसर राजकुमार ने पिछले पच्चीस वर्षों की हिंदी कहानी पर एक लंबा लेख लिखा है, जिसमें उनका कहना है कि ‘‘यथार्थवादोत्तर/मार्क्सवादोत्तर ज्ञान और आख्यान कला से रचनात्मक संवाद किये बगैर हिंदी कथा का सार्थक विकास असंभव है।’’

अंग्रेजी के ‘पोस्ट’ का हिंदी अनुवाद ‘उत्तर’ उस चीज के अंत का सूचक होता है, जिसके पहले (जैसे ‘उत्तर-आधुनिकता’ में) या पीछे (जैसे ‘साम्यवादोत्तर’ में) इसे लगा दिया जाता है। इस प्रकार बनाये गये शब्द पुरानी चीजों के खत्म हो जाने के बाद आयी नयी चीजों के सूचक भी होते हैं। अतः ऊपर उद्धृत वाक्य का अर्थ यह हुआ कि यथार्थवाद और मार्क्सवाद नामक पुरानी चीजें खत्म हुईं, उनके बाद नया ज्ञान आ गया है, नयी आख्यान कला आ गयी है और ये दोनों नयी चीजें हिंदी कथा के लिए इतनी जरूरी हैं कि इनके बिना उसका सार्थक विकास नहीं हो सकता।

‘‘यथार्थवादोत्तर/मार्क्सवादोत्तर’’ का यह अर्थ तो स्पष्ट है कि इन दोनों का वैसा ही उत्तर-आधुनिकतावादी अंत हो चुका है, जैसा आधुनिकता का अंत, इतिहास का अंत, विचारधारा का अंत इत्यादि, लेकिन ‘‘हिंदी कथा का सार्थक विकास’’ में ‘सार्थक’ शब्द कुछ चक्कर में डालने वाला है, क्योंकि उत्तर-आधुनिकतावाद तो ‘अर्थ’ और ‘सार्थकता’ का भी अंत कर चुका है। फिर, ‘‘यथार्थवादोत्तर/मार्क्सवादोत्तर’’ में बीच की तिरछी रेखा का क्या मतलब है, जो प्रायः ‘अथवा’ की सूचक होती है? क्या यथार्थवाद और मार्क्सवाद समानार्थक हैं? एक-दूसरे के पर्यायवाची या स्थानापन्न हैं? या अभिन्न? अगर ऐसा है, तो मार्क्सवादियों के लिए यह प्रसन्नता की बात होनी चाहिए, क्योंकि वे तो यह मानते ही हैं कि यथार्थवादी ही सच्चा मार्क्सवादी हो सकता है, और जो यथार्थवादी है, वह घोषित रूप से मार्क्सवादी न होने पर भी मार्क्सवादी हो सकता है। यथार्थवाद के लिए ही मार्क्स-एंगेल्स बाल्जाक के प्रशंसक थे और लेनिन तोल्सतोय के!

खैर, इन बारीकियों में न जायें, उत्तर-आधुनिकतावादी ‘अंतों’ की ही बात करें, तो यदि यथार्थवाद और मार्क्सवाद का अंत हो चुका है, तो प्रश्न उठता है: इनके बाद जो ‘ज्ञान’ आया है और जो ‘आख्यान कला’ आयी है, वह क्या है? मैंने अपनी पुस्तक ‘आज का पूँजीवाद और उसका उत्तर-आधुनिकतावाद’ (1999) में इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया था और पाया था कि उत्तर-आधुनिकतावाद आज के पूँजीवाद की विचारधारा है, जो ज्ञान की जगह अज्ञान का, तर्क की जगह तर्कहीनता का और विवेक की जगह विवेकहीनता का प्रचार-प्रसार करती है। इसका उद्देश्य लोगों को समाजवाद और साम्यवाद की दिशा में जाने से रोकना तो है ही, पूँजीवादी जनवाद को समाप्त करना भी है। 

उत्तर-आधुनिकतावाद का सबसे प्रमुख तत्त्व है ‘एलीटिज्म’ (अभिजनवाद), जिसके द्वारा विशिष्ट और सामान्य लोगों में भेद किया जाता है और सामान्य लोगों को--अर्थात् गरीब, शोषित, उत्पीड़ित जनता और उसके पक्षधरों को नीची नजर से देखा जाता है। रिचर्ड रोर्टी, जो उत्तर-आधुनिकतावाद के एक प्रमुख चिंतक माने जाते हैं, अपनी पुस्तक ‘कंटिंजेंसी, आयरनी एंड सॉलिडैरिटी’ (1989) में बौद्धिक और सामान्य लोगों में यह भेद बताते हैं कि बौद्धिक लोग ‘आयरनिस्ट’ (विडंबनावादी) होते हैं, जबकि सामान्य लोग जीवन को गंभीरता से लेते हैं। अर्थात् सामाजिक यथार्थ को ध्यान से देखना, जीवन की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करना और उनके समाधान के लिए प्रयत्नशील होना जीवन को गंभीरता से लेना है, और यह सामान्य लोगों का काम है, जबकि विशिष्ट बौद्धिक व्यक्ति जीवन को गंभीरता से नहीं लेते, उस पर हँसते हैं। 


इस ‘मार्क्सवादोत्तर ज्ञान’ के साथ आयी ‘यथार्थवादोत्तर आख्यान कला’ के बारे में मैंने लिखा था :

आजकल हिंदी के लेखकों को यह अभिजनवाद खूब प्रभावित कर रहा है। गंभीर लेखन उत्तर-आधुनिकतावादी लोगों की नजर में पुराना, पिछड़ा हुआ और उपेक्षणीय लेखन है। साधारण पाठकों की समझ में आने वाला लेखन घटिया है। श्रेष्ठ लेखन वह है, जो विशिष्ट पाठकों के लिए किया जाये, मगर हल्का-फुल्का हो; जिसमें व्यंग्य, विडंबना, भदेस और आत्मोपहास का मिश्रण हो! उसकी तुलना में गंभीर सामाजिक समस्याएँ उठाने वाला लेखन बेकार है! ऐसा लेखन घटिया और छोटे लेखक करते हैं! 

लेकिन हिंदी साहित्य का सौभाग्य है कि उत्तर-आधुनिकतावादियों की तमाम कोशिशों के बावजूद इस ‘मार्क्सवादोत्तर ज्ञान’ और इस ‘यथार्थवादोत्तर आख्यान कला’ को थोड़े-से फैशनपरस्त लेखकों ने ही अपनाया। फैशनपरस्त लेखकों के लिए विचार भी फैशन की तरह अपनायी और त्याग दी जाने वाली चीजों की तरह होते हैं। उनके लिए अस्तित्ववाद हो या मार्क्सवाद या उत्तर-आधुनिकतावाद--सब साहित्यिक फैशन हैं। और फैशन तो बदलते ही रहते हैं। कल मार्क्सवाद का फैशन था, आज ‘मार्क्सवादोत्तर’ का फैशन है। मैंने अपने निबंध ‘साहित्य में फैशन और नवोन्मेष’ (2000) में लिखा था :

साहित्य में भी फैशन चलते हैं। उदाहरण के लिए, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के हिंदी साहित्य को देखें। एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक सार्त्र, कामू, काफ्का आदि की चर्चा करते हुए ऊब, कुंठा, अकेलेपन, अजनबीपन आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं। फिर एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक मार्क्स, लेनिन, माओ आदि की चर्चा करते हुए वर्ग-संघर्ष, क्रांति, पक्षधरता, प्रतिबद्धता आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं। इसी तरह फिर एक समय आता है, जब बहुत-से लेखक ल्योतार, फूको, दरीदा आदि की चर्चा करते हुए आख्यान, पाठ, अंत, विमर्श आदि पर लिखने-बोलने लगते हैं। 

लेकिन फैशनपरस्त लेखकों की दिक्कत यह होती है कि वे उन चीजों का भी अंत हुआ मान लेते हैं, जिनका वास्तव में अंत हुआ नहीं होता। उदाहरण के लिए, उन्होंने उत्तर-आधुनिकतावादियों की बातों पर भरोसा करके यह मान लिया कि आधुनिकता का अंत हो गया और उसके साथ-साथ मार्क्सवाद तथा यथार्थवाद का अंत भी हो गया। उन्होंने यह नहीं सोचा कि साहित्य में आधुनिकता, मार्क्सवाद और यथार्थवाद का आगमन दुनिया में पूँजीवाद के आगमन के साथ-साथ हुआ है और पूँजीवाद का अंत अभी नहीं हुआ है। अपने भीतर हुए तमाम परिवर्तनों के बाद भी पूँजीवाद पूँजीवाद ही है और शीत युद्ध की समाप्ति के बाद नव-उदारवाद या बाजारवाद के रूप में तो वह अपनी सारी प्रगतिशीलता खोकर पुराने पूँजीवाद की ही ओर लौट गया है। अतः जब पूँजीवाद का ही अंत नहीं हुआ, तो आधुनिकता का अंत कब और कैसे हो गया? पूँजीवाद का प्रतिपक्ष और विकल्प समाजवाद तथा उसकी विश्व-दृष्टि मार्क्सवाद भी आधुनिकता की ही देन है। सो जब तक आधुनिकता का अंत नहीं होता, समाजवाद और मार्क्सवाद का अंत कैसे हो जायेगा?

हाँ, लेकिन जिस तरह पूँजीवाद अपने उदयकाल के समय का पूँजीवाद नहीं रह गया है--व्यापारिक पूँजीवाद, औद्योगिक पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, एकाधिकारी पूँजीवाद जैसे उसके विभिन्न रूप रहे हैं और आज वह नव-उदारवाद या बाजारवाद के नये रूप में मौजूद है--उसी तरह समाजवाद और मार्क्सवाद के भी विभिन्न रूप रहे हैं। आज का मार्क्सवाद मार्क्स-एंगेल्स के जमाने का मार्क्सवाद नहीं है। वह भी बदलता और विकसित होता रहा है--रूस में एक ढंग से, चीन में दूसरे ढंग से, पूर्वी यूरोप में तीसरे ढंग से और तीसरी दुनिया के विभिन्न देशों में अपने-अपने अलग ढंग से। भारत में भी उसका कोई एक ही रूप नहीं है। यहाँ भी वह विभिन्न रूपों में मौजूद है और विभिन्न प्रकार से विकसित हो रहा है। वैश्विक स्तर पर वह राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों, जनता की जनवादी क्रांतियों और समाजवादी क्रांतियों में विकसित होता रहा है। आज भी वह विभिन्न देशों की विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में कहीं सामंतवाद के विरुद्ध, कहीं पूँजीवाद के विरुद्ध, कहीं अधिनायकवाद के विरुद्ध, कहीं फासीवाद के विरुद्ध, कहीं रंगभेदवाद के विरुद्ध, कहीं मर्दवाद के विरुद्ध, कहीं जातिवाद के विरुद्ध, कहीं संप्रदायवाद के विरुद्ध, कहीं बाजारवाद के विरुद्ध और कहीं प्रकृति एवं पर्यावरण का नाश करने वाली शक्तियों के विरुद्ध जारी जन-आंदोलनों में सतत विकासमान है। इस प्रकार वह कोई जड़ या मृत सिद्धांत अथवा पुराने फैशन की चीज नहीं है, जिसका अंत हो चुका हो।

इसी तरह यथार्थवाद के रूप भी बदलते रहे हैं। अपने प्रारंभिक रूप यथातथ्यवाद या प्रकृतवाद से आगे विकसित होता हुआ वह आलोचनात्मक यथार्थवाद और समाजवादी यथार्थवाद के बाद अब भूमंडलीकरण के दौर में एक नये ढंग के यथार्थवाद तक आ पहुँचा है। उसके विभिन्न रूप बदलते हुए यथार्थ और उसको देखने की बदलती हुई जीवन-दृष्टि से संबंधित हैं। पूँजीवादी व्यवस्था को अपनी सहजात आधुनिकता से उत्पन्न यथार्थवाद का आज का बदला हुआ रूप  रास नहीं आता, क्योंकि उसके जरिये पूँजीवाद की आलोचना और समाजवाद की माँग की जाती है। अतः आज के पूँजीवाद की विचारधारा उत्तर-आधुनिकतावाद से प्रभावित विद्वान तरह-तरह से यथार्थवाद का विरोध करते हैं। वे कभी यथार्थवाद को यथातथ्यवाद तक, कभी अनुभववाद तक और कभी लेखन की एक पद्धति या फैशन तक सीमित कर देते हैं। यही कारण है कि उन्हें साहित्य में अनुभववाद (‘‘लेखक के अपने जिये-भोगे यथार्थ’’ के रूप में) और जादुई यथार्थवाद (यथार्थ को देखने की जीवन-दृष्टि के रूप में नहीं, बल्कि लेखन की एक विशेष पद्धति या फैशन के रूप में) तो पसंद आते हैं और वे इस प्रकार की रचनाओं का ऊँचा मूल्य आँककर उसका प्रचार करते हैं, जबकि यथार्थवाद को पुराना बताकर खारिज करते हैं।

प्रोफेसर राजकुमार ने पिछले पच्चीस साल की हिंदी कहानी पर लिखते हुए एक स्पष्टीकरण दिया है कि ‘‘हमारा उद्देश्य इस दौर का सांगोपांग इतिहास लिखना नहीं, बल्कि इस दौर में लिखी गयी कुछ बेहतरीन कहानियों का चयन करना है।’’ सब जानते हैं कि साहित्य में चुनने और छोड़ने की प्रक्रिया निरंतर और हर स्तर पर चलती है। रचनाकार दुनिया में मौजूद असंख्य विषयों में से कुछ ही विषय चुनकर उन पर लिखता है, संपादक असंख्य रचनाओं में से कुछ ही चुनकर प्रकाशित करता है, समीक्षक असंख्य रचनाओं में से कुछ ही चुनकर उनकी समीक्षा करता है और पाठक भी असंख्य रचनाओं और समीक्षाओं में से कुछ ही चुनकर पढ़ता है। फिर भी प्रोफेसर राजकुमार ने न जाने किन संभावित आपत्तियों से आशंकित होकर यह सफाई दी है कि ‘‘शायद ही कोई ऐसा लेखन हो, जो चयनधर्मी न हो। यह लेख भी चयनधर्मी है।’’ बेशक ऐसा ही है, लेकिन हर चयन के पीछे चयनकर्ता की एक दृष्टि होती है। अब चयनकर्ता की दृष्टि अगर ‘‘यथार्थवादोत्तर/मार्क्सवादोत्तर’’ दृष्टि है, तो कम से कम वे कहानियाँ तो उसके चयन से बाहर रह ही जायेंगी, जो घोषित रूप से यथार्थवादी और मार्क्सवादी लेखकों द्वारा लिखी गयी हों!

मुझे अपना ही उदाहरण देने के लिए क्षमा किया जाये, लेकिन बात को स्पष्ट करने के लिए यह जरूरी है। पिछले पच्चीस वर्षों में मेरे पाँच (यदि ‘चर्चित कहानियाँ’ और ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ भी जोड़ लें, तो सात) कहानी संग्रह आये हैं--‘किसी देश के किसी शहर में’ (1987), ‘कहाँ हो प्यारेलाल!’ (1991), ‘अर्थतंत्र तथा अन्य कहानियाँ’ (1996), ‘डॉक्यूड्रामा तथा अन्य कहानियाँ’ (2006) और ‘एक घर की डायरी’ (2009)। इनमें शामिल मेरी कई कहानियाँ, जैसे ‘मिट्टी’, ‘दिशा’, ‘लाइ लो’, ‘सफाइयाँ’, ‘रात अब भी उतनी ही काली है’, ‘डेल्टा’, ‘अर्थतंत्र’, ‘स्पंदन’, ‘फासी-फंतासी’, ‘डॉक्यूड्रामा’, ‘आप जानते हैं’ आदि और इन संग्रहों के बाद लिखी गयी ‘त्रासदी...माइ फुट!’, ‘प्राइवेट पब्लिक’, ‘ग्लोबल गाँव के अकेले’ आदि कई कहानियाँ काफी चर्चित हुई हैं। इनमें से एक ‘आप जानते हैं’ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा रूपांतरित नाटक के रूप में मंचित हुई है और दो कहानियाँ ‘लाइ लो’ और ‘सफाइयाँ’ दूरदर्शन द्वारा निर्मित टेलीफिल्मों के रूप में प्रसारित हुई हैं। इनमें से कुछ कहानियाँ भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित भी हुई हैं तथा भाँति-भाँति के संकलनों में शामिल की गयी हैं। ताजा उदाहरण है अभी-अभी यतीश अग्रवाल द्वारा संपादित और रूपा से अंग्रेजी में प्रकाशित संकलन ‘। 'A Hundred Lamps' (2012), जिसमें मेरी कहानी ‘स्पंदन’ प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, अवधेश प्रीत और रेखा अग्रवाल की कहानियों के साथ शामिल की गयी है। लेकिन प्रोफेसर राजकुमार ने मेरी किसी कहानी का उल्लेख करना उचित या आवश्यक नहीं समझा।

खैर, मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। मैं उनकी चयनधर्मिता वाले स्पष्टीकरण से संतुष्ट हूँ। समीक्षक क्या चुने और क्या छोड़े, यह उसके चयन के निजी अधिकार तथा अपने मत को व्यक्त करने के स्वातंत्रय का मामला है। लेकिन आलोचना में अपनायी जाने वाली चयन-दृष्टि प्रवृत्तिगत होने के कारण किसी एक व्यक्ति की नहीं होती। वह एक प्रवृत्ति के रूप में साहित्य के विकास या ह्रास का कारण बन सकती है। अतः उस पर विचार करना आवश्यक है।

हिंदी की कथा-समीक्षा में नवीनतम कहानी को मूल्यवान मानकर चुनने और उसकी पूर्ववर्ती कहानी को महत्त्वहीन समझकर छोड़ देने की एक परिपाटी चली आ रही है, जिसके तहत ‘नये’ को उभारने के लिए ‘पुराने’ को बेकार या गैर-जरूरी मानकर चलना तथा उसे ‘नये’ के विकास में बाधक बताना जरूरी माना जाता है। इसी का एक रूप है यथार्थवादी और मार्क्सवादी लेखकों द्वारा लिखे गये कथासाहित्य को पुराना घोषित करते हुए उसे हिंदी कथा के सार्थक विकास में बाधक बताना।
हिंदी की कहानी समीक्षा में अक्सर यह हुआ है कि कहानी को दशकों और पीढ़ियों में बाँटकर देखा गया है और पूर्ववर्ती कहानी को ‘पुरानी’ तथा परवर्ती कहानी को ‘नयी’ बताते हुए ‘कहानी के विकास’ को समझने-समझाने की कोशिशें की गयी हैं। यह सिलसिला ‘नयी कहानी’ के दौर से शुरू होता है, जब बीसवीं सदी के पाँचवें दशक वाली पीढ़ी की ‘पुरानी’ कहानी के मुकाबले छठे दशक वाली पीढ़ी की ‘नयी’ कहानी में हिंदी कहानी का विकास देखा गया। इसी तर्ज पर आगे चलकर छठे दशक वाली पीढ़ी की ‘नयी कहानी’ के मुकाबले सातवें दशक की पीढ़ी की ‘अकहानी’ को हिंदी कहानी का विकास माना गया। इसके बाद लगभग यही सिलसिला ‘अकहानी’ के विरुद्ध ‘समांतर कहानी’ को, ‘समांतर कहानी’ के विरुद्ध ‘जनवादी कहानी’ को, ‘जनवादी कहानी’ के विरुद्ध ‘जादुई यथार्थवादी’ कहानी को नयी कहानी मानते हुए जारी रहा। इसी सिलसिले की अगली कड़ी है यथार्थवादी और मार्क्सवादी कहानी को पुरानी मानकर उत्तर-आधुनिकतावादी कहानी को नयी बताना।

हालाँकि ज्ञान जहाँ से भी मिले, ले लेना चाहिए; कला जहाँ से भी सीखने को मिले, सीख लेनी चाहिए; फिर भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि हम कोई नयी चीज कहीं से लेकर अपनायें, तो अपनी परिस्थितियों में अपनी जरूरतों के मुताबिक और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक होने पर अपनायें। वैसे नहीं, जैसे हमारे किसान आजकल खेती की नयी तकनीक अपनाते हैं। मसलन, एक बहुराष्ट्रीय कंपनी अपने मुनाफे के लिए खेती की कोई नयी तकनीक लेकर आती है और भारतीय किसान से कहती है कि खेती की तुम्हारी अपनी तकनीक पुरानी और बेकार हो चुकी है, हमारी यह नयी तकनीक लो, इससे अधिक लाभदायक खेती करो और अपने खेतों में वह पैदा करो, जिसकी तुम्हें जरूरत हो या न हो, हमें जरूरत है! किसान तो अपनी गरीबी, अशिक्षा, राज्य और समाज द्वारा की जाने वाली उपेक्षा और बाजार की ताकतों का संगठित प्रतिरोध करने में अक्षम होने के कारण मजबूरी में उसके झाँसे में आकर अपनी खेती की बर्बादी के साथ खुद को भी तबाह करके आत्महत्या कर लेता है; लेकिन हिंदी लेखकों की ऐसी क्या मजबूरी है कि वे अपने साहित्य के विकास के लिए निहायत जरूरी यथार्थवाद और मार्क्सवाद को त्यागकर नवीनता के नाम पर लेखन के उत्तर-आधुनिकतावादी तौर-तरीके अपनाने का आत्मघाती कदम उठायें?

आज का साहित्यकार, चाहे वह घोषित रूप से यथार्थवादी और मार्क्सवादी न भी हो, वर्तमान पूँजीवादी विश्व व्यवस्था के यथार्थ को समझे बिना, जनतांत्रिक और मानवीय मूल्यों के आधार पर उसकी आलोचना किये बिना, और इस व्यवस्था के बदले जाने तथा एक बेहतर व्यवस्था के बनाये जाने की जरूरत पर जोर दिये बिना एक भी सार्थक पंक्ति नहीं लिख सकता। आज जनतांत्रिक मूल्यों--समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों--पर ही नहीं, बल्कि सच्चाई, अच्छाई, न्याय, नैतिकता, प्रेम, सहिष्णुता, सहयोग, सहानुभूति, करुणा, परदुखकातरता जैसे मानवीय मूल्यों पर भी संकट छाया हुआ है। इन मूल्यों को बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी जितनी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक संस्थाओं तथा संगठनों की है, उतनी ही साहित्यकारों की। आज के साहित्यकारों का यथार्थवादी और मार्क्सवादी होना प्रासंगिक बने रहने के लिए ही नहीं, अपनी मनुष्यता को बचाये रखने के लिए भी आवश्यक है। अलबत्ता यथार्थवाद और मार्क्सवाद के बारे में किये जाने वाले दुष्प्रचार से बचने के लिए आज के यथार्थवाद और आज के मार्क्सवाद को समझना तथा रचना एवं आलोचना में उसको विकसित करना आवश्यक है।

यथार्थवाद का मतलब यथातथ्यवाद--अथवा यथास्थिति का चित्रण करने जैसा काम--नहीं है। यथार्थवाद का मतलब है अतीत और भविष्य के संदर्भ में वर्तमान को देखना और ‘जो है’ उसके बारे में ही नहीं, बल्कि ‘जो होना चाहिए’ उसके बारे में भी लिखना। इसी तरह मार्क्सवादी कथा-लेखन का मतलब कथा में किसी मार्क्सवादी दल या संगठन का प्रवक्ता होकर उसकी राजनीति का प्रचार करना या केवल किसानों-मजदूरों के संघर्ष और क्रांति को ही विषय बनाकर लिखना नहीं है। आज की दुनिया में मार्क्सवादी कथाकार होने का मतलब है वर्तमान पूँजीवादी विश्व-व्यवस्था की जगह समाजवादी विश्व-व्यवस्था के निर्माण के लिए संघर्षरत शक्तियों के साथ खड़े होना। कथा में यह काम वर्ग-संघर्ष या क्रांति के बारे में लिखकर ही नहीं, बल्कि सच्चाई और अच्छाई जैसी ‘मामूली’ चीजों के बारे में लिखकर भी किया जा सकता है। हिंदी कथा का सार्थक विकास इसी प्रकार होता आया है और आगे भी किया जा सकता है।

सौभाग्य से हिंदी कथाकारों में से ज्यादातर ‘सफलता’ को उतना बड़ा मूल्य नहीं मानते, जितना ‘सार्थकता’ को। यही कारण है कि थोड़े-से फैशनपरस्त लोगों को छोड़कर हिंदी के प्रायः सभी कथाकार किसी न किसी रूप में यथार्थवादी हैं और उनमें से जो घोषित रूप से मार्क्सवादी नहीं हैं, वे भी अपनी रचनाओं में लगभग वही काम करते नजर आते हैं, जो मार्क्सवादी लेखक करते हैं या उन्हें करना चाहिए।

‘तद्भव’ के इस अंक में प्रकाशित कहानियों को देखें, तो उनमें से किसी में भी ‘‘यथार्थवादोत्तर/मार्क्सवादोत्तर ज्ञान और आख्यान कला’’ के दर्शन नहीं होते। ये सभी कहानियाँ आज के बदलते हुए यथार्थ को नये यथार्थवादी रूप-शिल्प में सामने लाने वाली यथार्थवादी कहानियाँ हैं। इनमें यथार्थवाद का निषेध नहीं, बल्कि उसका विकास किया जाता दिखायी पड़ता है। लेकिन इस विकास को हम तभी देख सकते हैं, जब हम यथार्थवाद को महज एक ‘साहित्यिक पद्धति’ न मानें, बल्कि एक जीवन-दृष्टि मानकर चलें--हालाँकि इन कहानियों को पढ़ने पर पता चलता है कि एक साहित्यिक पद्धति के रूप में भी यथार्थवाद की उपयोगिता अभी समाप्त नहीं हुई है, जैसा कि शिवमूर्ति, सारा राय और मनोज कुमार पांडेय की कहानियों में तो स्पष्ट ही देखा जा सकता है, अन्य कहानियों में भी थोड़े बौद्धिक आयास के जरिये उसे समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए, काशीनाथ सिंह की कहानी में जहाँ-तहाँ गद्य को कविता की पंक्तियों की तरह लिखते हुए, राजेश जोशी की कहानी में ‘पूर्वकथा’, ‘विष्कंभक’ और ‘डायरी’ के शिल्प में किस्से को आगे-पीछे घुमाते हुए, योगेंद्र आहूजा की कहानी में एक ही कहानी को अनेक पात्रों के दृष्टिकोण से कहते हुए और नीलाक्षी सिंह की कहानी में एक ठेठ ग्रामीण यथार्थ की कहानी को उच्च शिक्षा प्राप्त शहरी बौद्धिकों वाली भाषा में सुनाते हुए कथा-लेखन के जो नये प्रयोग किये गये हैं, वे कोई ‘‘यथार्थवादोत्तर आख्यान कला’’ के नमूने नहीं, बल्कि यथार्थवादी कथा-लेखन के ही विविध रूप हैं। यथार्थवादी कथा-लेखन में इस प्रकार के नये प्रयोगों की गुंजाइश और जरूरत हमेशा रही है, आज भी है और आगे भी रहेगी।

जहाँ तक ‘‘मार्क्सवादोत्तर ज्ञान और आख्यान कला’’ का प्रश्न है, यह सही है कि प्रगतिशील और जनवादी कहानी के आंदोलनों के दौरान मार्क्सवाद या क्रांति का प्रचार करने वाली जो कहानियाँ लिखी गयी थीं, वैसी कहानियाँ लिखने का दौर बीत चुका है, और यह अच्छा ही हुआ है, लेकिन इससे मार्क्सवाद की जरूरत या अहमियत कम नहीं हुई, बल्कि बढ़ी है। आज मार्क्सवाद कहानी की विषयवस्तु के रूप में नहीं, बल्कि कहानीकार की विश्व-दृष्टि के रूप में कहानी में अनुस्यूत रहता है। वह कहानी में उन मूल्यों के रूप में गुँथा रहता है, जो मानवीय, जनतांत्रिक और अंततः समाजवाद की ओर ले जाने वाले मूल्य हैं।

इस दृष्टि से देखें, तो ‘तद्भव’ के इस अंक में प्रकाशित सातों कहानियाँ यथार्थवादी जीवन-दृष्टि तथा मार्क्सवादी विश्व-दृष्टि से लिखी गयी कहानियाँ हैं, चाहे इनके लेखक स्वयं को यथार्थवादी और मार्क्सवादी मानते हों या न मानते हों। पहली बात तो यह है कि इनमें से कोई भी कहानी वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के औचित्य का प्रतिपादन नहीं करती, बल्कि सभी कहानियाँ किसी न किसी रूप में उसके यथार्थ को सामने लाकर उसकी निंदा या आलोचना ही करती हैं। दूसरी बात यह कि इनके लेखक जिन मूल्यों को बचाने और बढ़ाने के उद्देश्य से कहानी लिख रहे हैं, वे सभी मूल्य आज की दुनिया की जगह एक बेहतर दुनिया की जरूरत बताने वाले मूल्य हैं। तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन कहानियों के पात्रों के प्रति लेखकीय सहानुभूति आम तौर पर वर्गीय सहानुभूति है।

कहानीकार अपनी कहानी के लिए कौन-सा विषय चुने, कौन-सी समस्या उठाये, उस विषय या समस्या को कहानी में उठाने के लिए कैसे पात्र चुने, उनके भीतरी-बाहरी संघर्षों को कैसे सामने लाये और कहानी को एक तार्किक परिणति वाले कलात्मक अंत तक कैसे पहुँचाये--कहानी की रचना-प्रक्रिया से संबंधित ये तमाम प्रश्न निरे साहित्यिक प्रश्न नहीं, बल्कि बड़े गहरे अर्थों में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रश्न हैं और आज की दुनिया का राजनीतिक अर्थशास्त्र तब तक हमारी समझ में नहीं आ सकता, जब तक हम उसे मार्क्सवादी विश्व-दृष्टि से न देखें। मार्क्सवादी विश्व-दृष्टि की एक अनन्य विशेषता है वर्गीय पक्षधरता, जो कथासाहित्य में कथा-पात्रों के प्रति लेखकीय सहानुभूति के रूप में व्यक्त होती है। लेकिन यह विशेषता बहुत-से गैर-मार्क्सवादी लेखकों के कथा-लेखन में भी पायी जाती है। अतः कथाकार की विश्व-दृष्टि क्या है, यह हम तभी जान सकते हैं, जब यह देखें कि कथाकार की सहानुभूति किन पात्रों के प्रति है और उस सहानुभूति का वह--जाहिर है, कहानी के माध्यम से--करना क्या चाहता है। कहानी की रचना-प्रक्रिया का यह प्रश्न लेखन की पद्धति का प्रश्न नहीं, बल्कि लेखक की विश्व-दृष्टि का प्रश्न है, जिससे वह देखता है कि जिन पात्रों को वह अपनी सहानुभूति दे रहा है, उनकी वास्तविक दशा और दिशा क्या है; उनका अतीत क्या रहा है और वर्तमान में निहित उनके भविष्य की संभावनाएँ क्या हैं।

इस दृष्टि से ‘तद्भव’ के इस अंक में प्रकाशित सातों कहानियों को देखें, तो पायेंगे कि इन कहानियों के लेखक मार्क्सवादी हों या न हों, उनकी लेखकीय सहानुभूति कहानी में ताकतवर के खिलाफ कमजोर के साथ है और वह उसके पक्ष में स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है। उदाहरण के लिए, काशीनाथ सिंह की कहानी ‘महुआचरित’ में महुआ के प्रति, राजेश जोशी की कहानी ‘गाइबबाज’ में कप्पू के प्रति, शिवमूर्ति की कहानी ‘ख्वाजा, ओ मेरे पीर!’ में बूढ़े मामा-मामी के प्रति, सारा राय की कहानी ‘अपराध’ में बड़ी मम्मी के प्रति, योगेंद्र आहूजा की कहानी ‘एक्यूरेट पैथोलॉजी’ में गनपत, रोशनलाल, कवि, ज्योतिर्मयी और पेशे से पेशाब विश्लेषक लेखक के प्रति, नीलाक्षी सिंह की कहानी ‘साया कोई’ में किरण और मुसमातिन के प्रति और मनोज कुमार पांडेय की कहानी ‘पुरोहित जिसने मछलियाँ पालीं’ में पार्वती, मैना और रामदत्त के प्रति। इन सब कहानियों में लेखकीय सहानुभूति ही वह आधार है, जिस पर इनकी समूची मूल्य-संरचना खड़ी होती है और लेखक की रचना-प्रक्रिया पक्षधरता और प्रतिबद्धता के ही नहीं, बल्कि संप्रेषण और कलात्मकता के प्रश्नों को भी हल करती हुई एक तार्किक परिणति वाले कलात्मक अंत तक पहुँचकर कहानी को एक मुकम्मल कहानी बनाती है।

भाषा, शिल्प और शैली का नयापन इन कहानियों में भी है, लेकिन वह दिखावटी नयापन नहीं है। ‘तद्भव’ के संपादक अखिलेश ने, जो स्वयं आज के एक महत्त्वपूर्ण कथाकार हैं, इस अंक के संपादकीय में दिखावटी नयेपन की ओर ध्यान दिलाते हुए यह चौकसी बरतने की सलाह ठीक ही दी है कि ‘‘कहीं यह ‘नया दिखना’ महज दिखावा न हो।’’ लेकिन उन्होंने उत्तर-आधुनिकतावादी भाषा में आज की हिंदी कहानी में जिस ‘नवोन्मेष’ के होने पर प्रसन्नता प्रकट की है, वह विचारणीय है। वे इस ‘नवोन्मेष’ का एक कारण यह बताते हैं कि हिंदी के कथाकार आधुनिकता और मार्क्सवाद ‘‘दोनों की महान परंपराओं और महावृत्तांतों के प्रति सतर्क दृष्टिकोण रखते हुए अपने समय की मीमांसा कर रहे हैं’’। यदि वे ऐसा कहते हुए प्रोफेसर राजकुमार के ‘‘यथार्थवादोत्तर/मार्क्सवादोत्तर ज्ञान और आख्यान’’ से अपनी सहमति जता रहे हैं, तो यह चिंता का विषय है।

यह सही है कि हिंदी कहानी में एक नवोन्मेष की आवश्यकता है और उस दिशा में कुछ प्रयास भी हो रहा है, लेकिन वह हो चुका है, ऐसा मानना शायद जल्दबाजी है। और वह नवोन्मेष यथार्थवाद और मार्क्सवाद को त्यागकर उत्तर-आधुनिकतावाद को अपनाने से होगा, यह मानकर चलना तो बहुत ही चिंताजनक है। मैंने अपने निबंध ‘साहित्य में फैशन और नवोन्मेष’ (2000) में लिखा था : 

आज के हिंदी साहित्य को देखकर लगता है कि उसमें किसी मौलिक नवोन्मेष की सख्त जरूरत है। इस जरूरत को आज बहुत-से लेखक महसूस कर रहे हैं। इसीलिए ऐसी बहुत-सी रचनाएँ सामने आ रही हैं, जिनमें कुछ अलग ढंग से कोई नयी बात कहने की कोशिश दिखायी पड़ती है और एक सामूहिक इच्छा का पता चलता है कि साहित्य आज जहाँ है, वहाँ से आगे बढ़ना चाहिए। मगर कोई लक्ष्य और दिशा स्पष्ट न होने से एक विभ्रम-सा फैला हुआ है, जिसमें ऐसे प्रयास व्यक्तिगत प्रयास बनकर रह जाते हैं, साहित्य को ऊर्जा, गति और दिशा देने वाला कोई नवोन्मेष नहीं बन पाते।

साहित्यिक नवोन्मेष के लिए आवश्यक है कि रचना और आलोचना के वर्तमान तौर-तरीकों को बदला जाये। लेकिन यह काम न तो उन लेखकों से हो सकता है, जो कुछ भी नया करके तत्काल प्रतिष्ठा, पुरस्कार आदि प्राप्त कर लेना चाहते हैं और न उन लेखकों से, जो किसी दल या संगठन की नित्य बदलने वाली ‘लाइन’ के अनुसार अपनी रचनाशीलता को ‘राजनीतिक रूप से सही’ रखने की कोशिशों में लगे रहते हैं। यह काम वे ही कर सकते हैं, जो सिर्फ आज के नहीं, बल्कि भविष्य के पाठकों को भी ध्यान में रखकर लिखते हैं और ‘आज का लेखन’ करने के बजाय ‘आगे का लेखन’ करते हैं; जो परिवर्तन और निरंतरता को समझते हुए परंपरा को आगे बढ़ाने में विश्वास करते हैं; जो ‘पुराने’ का पूर्ण निषेध करने के बजाय उसे समझते हैं और उसमें निहित जड़ एवं मृत को त्यागकर उसमें जो जीवंत है, उसे अपनाकर आगे बढ़ते हैं। ऐसे लेखक ही आगे का साहित्य रच सकते हैं।

‘आगे के साहित्य’ की अपनी परिकल्पना को मैंने पाँच वर्ष बाद लिखे गये अपने एक अन्य निबंध ‘आगे की कहानी’ (2005) में सामने लाने की कोशिश की थी। मैंने महाआख्यानों के अंत की घोषणा करने वाले उत्तर-आधुनिकतावाद को आज के भूमंडलीय पूँजीवाद की विचारधारा बताते हुए लिखा था :

आगे बढ़ने के लिए कहानीकारों को यह सोचना होगा कि आज के पूँजीवाद का विकल्प क्या हो सकता है। आज के वैश्विक पूँजीवाद का विकल्प वैश्विक समाजवाद ही हो सकता है। अतः सोचना यह है कि हम उसकी दिशा में कैसे आगे बढ़ें।

इस निबंध में मैंने लिखा था कि ‘आगे की कहानी’ की बात बीसवीं सदी के आठवें दशक में ही होने लगी थी। 1976 में हिंदी कहानी का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए दिल्ली में आयोजित एक संगोष्ठी में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने ‘आगे की कहानी’ के लिए एक पंचसूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया था, जो इस प्रकार था :

1. पश्चिमी फैशनपरस्त अंधानुकरण से बचो।
2. शिल्प को आतंक मत बनाओ।
3. उनके लिए भी लिखो जो अर्द्धशिक्षित हैं और उनके लिए भी जो अशिक्षित हैं, जिन्हें तुम्हारी कहानी पढ़कर सुनायी जा सके।
4. इस देश की तीन-चौथाई जनता की सोच-समझ को वाणी दो, जो वह खुद नहीं कह सकती। और,
5. कहानी को लोककथाओं और ‘फेबल्स’ की सादगी की ओर मोड़ो, उनके विन्यास से सीखो, और उसे आम आदमी के मन से जोड़ो।


इस पंचसूत्री कार्यक्रम को उद्धृत करते हुए मैंने अपने निबंध में लिखा था :

जाहिर है, ये बातें इसीलिए कही गयी थीं कि उस समय की हिंदी कहानी में पश्चिमी फैशनपरस्त अंधानुकरण हो रहा था, शिल्प को आतंक बनाया जा रहा था, कहानी केवल शिक्षितों के लिए लिखी जा रही थी, उसमें देश की तीन-चौथाई जनता की सोच-समझ को वाणी नहीं दी जा रही थी और कहानी ऐसे जटिल विन्यास वाली कहानी बनती जा रही थी कि वह आम आदमी के मन से नहीं जुड़ पा रही थी। इन्हीं चीजों के विरुद्ध ‘जनवादी कहानी’ का आंदोलन शुरू हुआ था, जो उस समय के हिसाब से ‘आगे की कहानी’ थी।

लेकिन

‘जनवादी कहानी’ के बाद हिंदी कहानी उस कार्यक्रम के अनुसार आगे नहीं बढ़ी। इसके विपरीत वह आगे बढ़ी ऐसी दो दिशाओं में, जो इस कार्यक्रम से कहानी को दूर ले जाने वाली थीं। एक दिशा थी ‘‘पश्चिमी फैशनपरस्त अंधानुकरण’’ तथा ‘‘शिल्प को आतंक बनाने’’ वाले कहानी-लेखन की दिशा, जिसमें आगे बढ़कर हिंदी कहानी जादुई यथार्थवादी और उत्तर-आधुनिकतावादी हुई। इस दिशा में जाकर हिंदी कहानी जनोन्मुख होने के बजाय बड़ी बेशर्मी से अभिजनोन्मुख हुई और ‘‘आम आदमी के मन से जुड़ने’’ के बजाय खास आदमियों के मन को मोहने की आकांक्षा से किये जाने वाले बौद्धिकता के व्यापार में बदल गयी। दूसरी दिशा ऊपरी तौर पर हिंदी कहानी को जनोन्मुख बनाने वाली लगती थी, जिसमें आगे बढ़कर हिंदी कहानी स्त्रीवादी और दलितवादी विमर्शों की कहानी बनी। लेकिन वास्तव में यह दिशा कहानी को सेक्स, हिंसा और जातिवादी लेखन के फार्मूलों की ओर ले गयी और कहानी जनोन्मुख होने के बजाय बाजारोन्मुख हो गयी।

‘जनवादी कहानी’ से पहले के फैशनपरस्त कहानीकार पश्चिमी फैशनों का अनुकरण करते थे, तो कम से कम पश्चिम की चीजों को पढ़ते तो थे। आगे चलकर यह हुआ कि उस अनुकरण का ही अनुकरण करते हुए बहुत-सी कहानियाँ लिखी जाने लगीं। ‘जनवादी कहानी’ के बाद शिल्प को पुनः आतंक बनाया जाने लगा। अशिक्षितों और अर्द्धशिक्षितों की तो बात ही क्या, शिक्षितों में भी केवल कुछ प्रभुत्वशाली संपादकों तथा आलोचकों को ध्यान में रखकर कहानियाँ लिखी जाने लगीं। जनता की सोच-समझ को वाणी देने की बात दूर, बहुत-से कहानीकार तो जन, जनता, जनवाद, समाजवाद आदि के नाम से ही बिदकने लगे और स्वयं ‘जन’ होकर भी ‘अभिजनों’ की-सी सोच-समझ के साथ और उन्हीं के लिए कहानी लिखने लगे। ‘सादगी’ या ‘आम आदमी के मन’ से तो कहानी का मानो कोई संबंध ही नहीं रहा। आयातित उच्च प्रौद्योगिकी के साथ आयी और अंधानुकरण के रूप में अपना ली गयी पश्चिमी जीवन-शैली में सादगी कहाँ?

मेरे विचार से हिंदी कहानी में नवोन्मेष के लिए आवश्यक था कि बीसवीं सदी के अंतिम दशक में सोवियत संघ के विघटन, शीतयुद्ध की समाप्ति और पूँजीवादी भूमंडलीकरण के साथ तेजी से बदले और बदलते यथार्थ की कहानी लिखी जाती। लेकिन उस यथार्थ की कहानी लिखने के उस समय जो यत्किंचित प्रयास हुए, उन्हें उस समय के चालू फैशनों के चलते ‘काल्पनिक’ और ‘गढ़ी हुई’ कहानियाँ कहा गया। अतः मैंने लिखा :

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने आगे की कहानी का जो पंचसूत्री कार्यक्रम दिया था, वह अभी अप्रासंगिक नहीं हुआ है। लेकिन आज की नयी परिस्थितियों में वह अपर्याप्त अवश्य लगता है। इसलिए मैं उसमें अपनी तरफ से पाँच सूत्र और जोड़ना चाहता हूँ :
1. चालू विमर्शों की कहानी लिखने से बचो।
2. बदलते हुए यथार्थ को देखो और यथार्थ को बदलने के लिए लिखो।
3. दुनिया भर के उत्कृष्ट कहानी-लेखन से सीखो, पर अपनी कथा परंपरा में और अपनी जनता के लिए लिखो।
4. साहित्य की बदली हुई शब्दावली को आँख मूँदकर मत अपनाओ।
5. वैश्विक पूँजीवाद के विरुद्ध वैश्विक समाजवाद का स्वप्न साकार करने के लिए अच्छी कहानियाँ बेखटके गढ़ो।


मेरा यह पंचसूत्री कार्यक्रम दूसरों से ज्यादा खुद अपने लिए था। मैंने इसी को ध्यान में रखकर अपनी कहानियाँ लिखीं और साथ-साथ भूमंडलीय यथार्थवाद की अपनी अवधारणा को विकसित करते हुए एक निबंध लिखा ‘भूमंडलीय यथार्थवाद’ (2008)। इस निबंध की अंतिम पंक्तियाँ हैं :

आज की दुनिया का सबसे अहम प्रश्न है: क्या पूँजीवाद की वैश्विक व्यवस्था की जगह कोई और वैश्विक किंतु बेहतर व्यवस्था संभव है? यदि हाँ, तो उसकी रूपरेखा क्या है और वह व्यवस्था किन आधारों पर, किन शक्तियों के द्वारा और किन तरीकों से बनायी जा सकती है? इस प्रश्न का उत्तर भूमंडलीय यथार्थवाद के आधार पर ही दिया जा सकता है, क्योंकि इसका उत्तर देने के लिए यह आवश्यक है कि आज की दुनिया के यथार्थ को भौगोलिक के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी देखा जाये और ऐतिहासिक दृष्टि को केवल अतीत को देखने वाली दृष्टि नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी देखने वाली ऐसी सर्जनात्मक दृष्टि मानकर चला जाये, जो आने वाले कल की बेहतर दुनिया बनाने के लिए हमें आज ही प्रेरित और सक्रिय कर सके।

संयोग से यह निबंध जिस साल लिखा गया, उसी साल से वैश्विक पूँजीवाद का वर्तमान संकट शुरू हुआ है। इस संकट ने बाजारवाद की कलई खोल दी है तथा उत्तर-आधुनिकतावाद का मुलम्मा भी उतार दिया है। आज का भूमंडलीय यथार्थ मार्क्सवाद की मदद के बिना समझ में नहीं आ सकता। और इस यथार्थ की कहानी लिखने के लिए कथाकार को सचेत अथवा असचेत रूप से यथार्थवादी और मार्क्सवादी होना ही पड़ेगा। अतः आज के हिंदी कथाकारों के लिए आवश्यक है कि वे यथार्थवाद और मार्क्सवाद को फैशन की तरह अपनाने और त्यागने के बजाय अपनी जीवन-दृष्टि तथा विश्व-दृष्टि के रूप में विकसित करें।

अंततः भूमंडलीय यथार्थवादी कथा-लेखन के बारे में दो बातें :

एक : भूमंडलीय यथार्थवाद का मतलब यह नहीं है कि हम अपने देश, अपने समाज या अपने निजी जीवन की कहानी कहना बंद कर देंगे। कहानी तो हम अपने देश, अपने समाज और अपने जीवन की ही कहेंगे, लेकिन अपने यथार्थ को देखने का हमारा परिप्रेक्ष्य भूमंडलीय होगा। कारण यह है कि अब हम इस परिप्रेक्ष्य के बिना अपने यथार्थ को समझ ही नहीं सकते।

दो : किसी साहित्यिक रचना में व्यापक और जटिल भूमंडलीय यथार्थ को किस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है, इस प्रश्न का उत्तर खोजने में मुक्तिबोध हमारी सहायता कर सकते हैं। भूमंडलीय यथार्थ को आत्मसात् करने के मामले में उनकी ‘ज्ञानात्मक संवेदन’ और ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ की अवधारणाएँ उपयोगी हो सकती हैं, तो उस यथार्थ का चित्रण करने के मामले में उनका निबंध ‘डबरे पर सूरज का बिंब’ हमें उचित प्रेरणा दे सकता है। इस निबंध में मुक्तिबोध ने यही समस्या उठायी थी कि एक बड़े और व्यापक यथार्थ को साहित्यिक रचना में कैसे लायें। और समाधान यह सुझाया था कि जैसे पानी के एक छोटे-से डबरे पर भी सूरज का पूरा बिंब दिखायी देता है, वैसे ही छोटी-सी साहित्यिक रचना में बड़े और व्यापक यथार्थ का चित्रण किया जा सकता है।

नोट : लेख में मेरे जिन निबंधों का उल्लेख है, वे मेरे साहित्यिक निबंधों के संग्रह ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ (2008) में संकलित हैं।

--रमेश उपाध्याय