हिन्दी साहित्य में आज एक बार फिर युवा पीढ़ी और नवलेखन चर्चा में है। मुझे अपनी युवावस्था याद आती है। मेरी पहली कहानी 'एक घर की डायरी' अजमेर से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका 'लहर' के सितम्बर, १९६२ के अंक में छपी थी। उसी के जुलाई, १९६१ के अंक में प्रसिद्ध आलोचक शिवदान सिंह चौहान ने लिखा था :
"हमारे कुछ नए आलोचक, और उनकी देखा-देखी विचारहीन अध्यापक, नयी और पुरानी पीढ़ी की चर्चा करने लगे हैं। कुछ इस खतरनाक अंदाज़ में, मानो पुरानी पीढ़ी के लेखक सारे के सारे दकियानूसी नज़रिए के हों और नए लेखक सारे के सारे युग की नवीनतम चेतना के वाहक हों।...मुझसे पूछिए, तो मैं साहित्य में नई या पुरानी किसी भी पीढ़ी का न कायल हूँ, न हमदर्द और न मुरीद। मैं सिर्फ़ प्रतिभा का कायल हूँ, चाहे लेखक नई पीढ़ी का हो या पुरानी। और जीवन के प्रति व्यापक मानववादी प्रगतिशील दृष्टिकोण का हामी हूँ, इसलिए ऐसा दृष्टिकोण अगर पुरानी पीढ़ी के लेखन में मिले तो, और नई पीढ़ी के लेखन में मिले तो, मैं उसका दोस्त, हमदर्द और हमनवा हूँ।...नई और पुरानी दोनों पीढ़ियों में कुछ प्रतिभावान हैं, तो अधिकतर प्रतिभाहीन लेखक हैं, जैसा कि हर ज़माने में रहा है, और दोनों पीढ़ियों में कुछ उदार और व्यापक मानवीय दृष्टिकोण वाले हैं, तो कुछ संकीर्ण- हृदय और मानवद्रोही दृष्टि वाले लेखक हैं। नए 'शिल्प-सौंदर्य', 'कथन-वैचित्र्य' आदि का इजारा न नई पीढ़ी के लेखकों के पास है और न पुरानी पीढ़ी के लेखकों के पास, न मानववादी दृष्टिकोण वालों के पास है और न मानवद्रोही दृष्टिकोण वालों के पास। इसलिए आप ख़ुद देख सकते हैं कि ऐसे समष्टि-सूचक शब्दों (नई कहानी या नई पीढ़ी) के प्रयोग, जिनका कोई तात्विक आधार नहीं है, कितना बड़ा घपला पैदा कर देते हैं।"
क्या ये बातें आज के नए पीढ़ीवाद के सन्दर्भ में सहसा पुनः प्रासंगिक नहीं हो उठी हैं?
--रमेश उपाध्याय