Sunday, March 15, 2015

'परिकथा' के नवलेखन अंक (जनवरी-फरवरी, 2015) में प्रकाशित कुछ कहानियों के संदर्भ में आज की हिंदी कहानी पर कुछ विचार


हिंदी कहानी में फिर एक नया बदलाव

रमेश उपाध्याय


दस साल पहले, 2005 में, मैंने एक लेख लिखा था ‘आगे की कहानी’, जो मेरी पुस्तक ‘साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ’ (2008) में संकलित है। उसमें मैंने लिखा था :

देखते-देखते कहानी क्या, दुनिया ही बदल गयी। पूँजीवादी भूमंडलीकरण की प्रचंड आँधी पहले का बहुत कुछ उड़ा ले गयी। यहाँ तक कि सोवियत संघ जैसी ‘महाशक्ति’ भी उसमें ध्वस्त हो गयी और आत्मनिर्भरता की बात करने वाले हमारे देश में निजीकरण तथा उदारीकरण की तेज धूल भरी हवाएँ चलने लगीं, जिनके कारण समाजवाद का सपना तो धूमिल हुआ ही, जनवाद को भी बेकार बताने और बनाने के सिलसिले शुरू हो गये। ‘जनवादी कहानी’ साहित्य में ‘आउट ऑफ फैशन’ हो गयी और ‘जादुई यथार्थवाद’ का नया फैशन चल पड़ा।

ऐसा लगने लगा, जैसे कल तक जो सामाजिक यथार्थ कहानी में आ रहा था, वह किसी जादू के जोर से अचानक गायब हो गया हो! जैसे भूख, गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी, शोषण, दमन, उत्पीड़न आदि की समस्याएँ छूमंतर हो गयी हों! शोषक-उत्पीड़क पूँजीपतियों और भूस्वामियों को मानो आम माफी मिल गयी हो और वामपंथी-जनवादी लोग ही कटघरे में खड़े किये जाने लायक रह गये हों! कल तक हिंदी का जो कहानीकार प्रेमचंद, निराला और मुक्तिबोध के नाम जपता हुआ दबे-कुचले, सताये हुए मजदूरों, किसानों और मध्यवर्गीय मेहनतकश स्त्री-पुरुषों को क्रांति का हिरावल दस्ता समझता था, वह मानो गरीब ‘हिंदीवाला’ से अचानक अमीर अंग्रेजी वाला हो गया और किसी ऊँचे आसन पर बैठकर हिंदी के लेखकों पर हिकारत के साथ हँसने लगा। यथार्थ को समझने और बदलने से संबंधित गंभीर चिंताएँ मानो एकाएक ही बेमानी हो गयीं और खिलंदड़ापन ही सबसे बड़ा साहित्यिक मूल्य बन गया। हिंदी के बहुत-से कहानीकार एकदम पलटकर जनोन्मुख से अभिजनोन्मुख हो गये। वे अपनी कहानियों में अभिजनों की-सी भाषा बोलने लगे तथा अभिजनों के प्रिय विषयों पर चटपटी कहानियाँ लिखने लगे।

लेकिन अब लगता है कि हिंदी कहानी में फिर एक नया बदलाव आ रहा है, फिर से एक नयापन दिखायी दे रहा है। अनुभववादी और कलावादी फैशनों से हटकर यथार्थवादी कहानियाँ लिखी जा रही हैं। उनके पात्र स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि सभी तरह के हैं, लेकिन वे विमर्शवादी कहानियाँ नहीं हैं। उनमें से ज्यादातर कहानियाँ किसी न किसी बड़ी सामाजिक समस्या को उठाती हैं और उसके कारणों को इस प्रकार सामने लाती हैं कि पाठक उसके समाधान के बारे में सोचने को प्रेरित हों। ऐसी कहानियाँ अवसरवादी किस्म के तटस्थतावाद के विरुद्ध लेखकीय पक्षधरता के साथ सामाजिक अंतर्विरोधों को सामने लाती हैं। आज के नये कहानीकार अपनी कहानियों में प्रायः जाने-पहचाने विषयों और प्रश्नों को उठाते हैं, लेकिन नये संदर्भों में उन्हें नये-नये रूपों में सामने लाते हैं।

उदाहरण के लिए, ‘परिकथा’ के नवलेखन अंक (जनवरी-फरवरी, 2015) की कुछ कहानियों को देखा जा सकता है। ‘परिकथा’ कई वर्षों से नवलेखन अंक निकालती आ रही है और प्रस्तुत अंक के संपादकीय में लिखी गयी संपादक शंकर की इन बातों से शायद ही कोई असहमत होगा कि नये लेखकों को एक साथ मंच पर लाने का यह उपक्रम ‘‘एक दौर की रचनाशीलता को समझने-पहचानने’’ का, ‘‘अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों और उनके समानांतर लेखन-सृजन में उभर रही प्रवृत्तियों को साथ-साथ देखने-परखने’’ का, ‘‘मौजूदा परिस्थितियों में लेखन की सामाजिक भूमिका को समझने’’ का और नये लेखकों के लिए ‘‘आत्म-मंथन तथा आत्म-विश्लेषण’’ का भी उपयुक्त अवसर होता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए इस अंक की कहानियों को देखा जाये, तो कहानी की रचना और आलोचना में शायद कुछ कदम आगे बढ़ा जा सकता है।

इस अंक में नये लेखकों की बीस कहानियाँ हैं। सभी पर एक लेख में विचार करना संभव नहीं, इसलिए मैं केवल पाँच कहानियों की चर्चा करूँगा और इधर हिंदी कहानी में फिर से जो एक नया बदलाव आता दिख रहा है, उसे सामने लाने का प्रयत्न करूँगा।

पूस की एक और रात : गंगा सहाय मीणा
प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कहानी

अद्भुत संयोग है कि हाल ही में ‘पूस की एक और रात’ शीर्षक से हिंदी में दो कहानियाँ लिखी गयी हैं। एक लक्ष्मी शर्मा की, जो पिछले दिनों ‘कथादेश’ में आयी थी और दूसरी गंगा सहाय मीणा की, जो ‘परिकथा’ के प्रस्तुत नवलेखन अंक में प्रकाशित हुई है। यद्यपि दोनों कहानियों के विषय भिन्न हैं और शीर्षक के सिवा कोई और समानता उनमें नहीं है, तथापि एक ही समय में एक ही शीर्षक से दो कहानियों का लिखा जाना सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि हिंदी कहानी में एक नये विकास तथा प्रेमचंद की यथार्थवादी कथा-परंपरा को एक बार फिर दृढ़तापूर्वक अपनाकर आगे बढ़ाने के नये संकल्प की सूचना है। यहाँ दोनों कहानियों को साथ रखकर उन पर विचार करने का अवकाश नहीं है, इसलिए मैं गंगा सहाय मीणा की कहानी पर ही बात करूँगा।

यह कहानी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पूस की रात’ की याद दिलाती है, लेकिन यह उससे भिन्न बिलकुल आज के (इक्कीसवीं सदी के) भारत के ग्रामीण यथार्थ और किसान जीवन की और विशेष रूप से खेती-किसानी करने वाली स्त्रियों के कठिन जीवन की कहानी है। यह राजस्थान के एक जनजाति बहुल गाँव के जनजातीय किसान परिवार की कहानी है, जिसमें पिता की मृत्यु हो चुकी है, विधवा माँ बूढ़ी है, जिसके दो बेटों में से बड़ा हरकेश गाँव से दो सौ किलोमीटर दूर एक स्कूल में ‘शिक्षामित्र’ के रूप में काम करता है और उसका छोटा भाई बी.ए. करने के बाद जयपुर में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। हरकेश की युवा पत्नी भूरी तथा बूढ़ी माँ गाँव में खेती-बाड़ी सँभालती हैं। पहले खेतों की सिंचाई गाँव के तालाब और कुओं से होती थी और किसी किसान को पानी की किल्लत नहीं होती थी। लेकिन वर्तमान पूँजीवादी प्रपंच के चलते गाँव की परस्पर सहयोग वाली सामाजिक संरचना ध्वस्त हो गयी है, स्वार्थपरता पनप गयी है, जिसके कारण प्रकृति और पर्यावरण की भारी क्षति हुई है। तालाब का भरना बंद हो गया है, कुएँ सूख गये हैं और जमीन के अंदर गहराई तक बोरिंग करके निकाले गये पानी से खेतों को सींचने का नया चलन चल निकला है।

भारतीय कृषि व्यवस्था में पूँजीवाद के प्रसार ने प्रेमचंद के समय के भारतीय गाँवों को बिलकुल बदल दिया है। जब गाँवों में हमेशा भरे रहने वाले कुएँ हमेशा के लिए सूख गये, तो ‘‘बड़े किसानों ने बोरिंग करना शुरू किया। बोरिंग से सिंचाई महँगी हुई और मुश्किल भी। एक बोर करने में तीन-चार लाख तक का खर्च सामान्य था। उस पर बोर फेल होने का खतरा अलग। परिणाम यह हुआ कि बोर मालिकों ने दूसरे किसानों के खेतों में सिंचाई कर इस खर्च को निकालना शुरू कर दिया। गाँव में कुल मिलाकर आधा दर्जन ही बोर थे, इसलिए किसानों की भी मजबूरी थी उनसे महँगी रेट पर पानी लेने की। बोर मालिक दिन में अपने खेतों को भराते थे और रात में दूसरे किसानों को पानी देते।’’

कहानी यों है कि पूस का महीना है, जब हड्डियों तक को कँपा देने वाला जाड़ा पड़ता है। हरकेश गाँव से दो सौ किलोमीटर दूर अपनी नौकरी पर है और गाँव में उसके सरसों के खेत की भराई (सिंचाई) होनी है। उसकी पत्नी भूरी हफ्ते भर से कोशिश कर रही है कि बोर का मालिक रामजीलाल पटेल, जिसके साथ चार सौ रुपये प्रति घंटे की दर से पानी लेने का सौदा तय हो चुका है, उसके खेत के लिए पानी दे दे। आखिरकार भूरी की सरसों भराने की बारी आ जाती है और रामजीलाल मोबाइल पर ‘‘मिस कॉल करके’’ हरकेश मास्टर को बताता है कि आज रात आठ बजे उसका नंबर है। हरकेश मोबाइल पर गाँव में अपनी पत्नी और माँ से बात करता है कि सरसों आज ही भरा ली जाये। सास बूढ़ी है और भूरी अकेली यह काम कर नहीं सकती, इसलिए तीन सौ रुपये में आधी रात के लिए एक मजूर तय कर लेती है। आठ बजे से पहले वह अपने दोनों बच्चों को खाना खिलाकर सुला देती है और सास तथा मजूर के साथ एक टॉर्च और गैस लेकर खेत पर चली जाती है। भयंकर शीत की रात में वह अपने खेत की सिंचाई करती है। बोर से खेत तक आने वाले पानी के पाइप के टूट जाने पर वह अपने ओढ़े हुए शॉल को ही टूटे हुए पाइप में बाँधकर उसकी मरम्मत करती है। इस प्रक्रिया में वह शीत की रात में पानी की बौछारों में भीग भी जाती है। फिर भी वह पूरे धीरज और परिश्रम के साथ अपना काम पूरा करती है।

गंगा सहाय मीणा अगर चाहते, तो विगत बीसेक वर्षों से हिंदी कहानी में चल रही चीजों की तर्ज पर इस कहानी को एक जनजाति से संबंधित और पति से दूर गाँव में अकेली रहने वाली स्त्री की कहानी के रूप में लिखकर मजे में जातिवादी या देहवादी किस्म की कहानी बना सकते थे, लेकिन उन्होंने इसे परिवार और खेती को अकेले अपने दम पर सँभालने वाली एक किसान स्त्री की कहानी के रूप में लिखकर सचेत रूप से प्रेमचंद की यथार्थवादी कथा-परंपरा को आगे बढ़ाने का नया प्रयास किया है। कहानी का शीर्षक प्रेमचंद के समय के किसान जीवन के यथार्थ की याद दिलाता है, लेकिन वे कहानी के पहले ही वाक्य में कहानी का ‘काल’ स्पष्ट रूप से बताकर (कि यह ‘‘इक्कीसवीं सदी का पहला दशक बीत जाने के बाद के एक बरस के पूस के महीने’’ की कहानी है) पाठक को सचेत कर देते हैं कि यह हमारे बिलकुल आज के समय के यथार्थ की कहानी है। यह समय निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण का समय है, जिसमें गाँव का और किसान जीवन का यथार्थ बिलकुल बदल गया है।

यह एक नया यथार्थ है। ग्रामीण जीवन और कृषि कर्म में कई नयी चीजें आ गयी हैं। जनजाति बहुल गाँव के लड़के खेती-किसानी पर निर्भर न रहकर पढ़-लिख रहे हैं और पढ़ा भी रहे हैं। वे गाँव से दूर जाकर नौकरियाँ कर रहे हैं, उच्च शिक्षा पाकर परीक्षाएँ दे रहे हैं और ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँच रहे हैं। गाँव में पीछे छूटा उनका परिवार भी अब ज्यादा दिन वहाँ नहीं रहने वाला है, क्योंकि देहाती जीवन और कृषि कर्म में उच्च तकनीक वाली बड़ी पूँजी के प्रवेश ने छोटे किसानों का खेती पर निर्भर रहना मुश्किल कर दिया है। पूँजी ने देहाती लोगों को स्वार्थी बना दिया है, जिससे प्रकृति और पर्यावरण का नाश हो गया है। प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट हो जाने से किसान नयी तकनीक से खेती करने को विवश है और नयी तकनीक के तार बड़ी भूमंडलीय पूँजी से जुड़े हैं। एक छोटे-से खेत को सींचने के लिए चार सौ रुपये प्रति घंटे की दर से पानी लेना पड़ता है और तीन सौ रुपये में आधी रात के लिए मजदूर करना पड़ता है। कहानी में मोबाइल फोन की भूमिका और ‘‘मिस कॉल’’ वाला व्यंग्य भी गौर करने लायक है। इतनी महँगी खेती के लिए जरूरी है कि किसान अपने लिए अन्न पैदा करने के बजाय बाजार के लिए नकदी फसलें उगाये। (कहानी में भूरी का खेत भी नकदी फसल सरसों का खेत है।) लेकिन जाहिर है कि यह पूँजीवादी विकास ‘सस्टेनेबल’ (टिकाऊ) नहीं है और इसमें छोटे किसान को बर्बाद होना ही है, चाहे वह कर्जदार होकर आत्महत्या करे या खेती और गाँव छोड़कर कहीं और चला जाये, कोई और पेशा अपनाये।

यह कहानी आज के इसी बदले हुए यथार्थ को सामने लाती है। लेकिन इस बदले हुए यथार्थ के दो पहलू हैं--किसानों के कष्टों और आत्महत्या के प्रयासों वाला निराशाजनक पहलू और गैर-टिकाऊ खेती से जुड़ा ग्रामीण जीवन जीते रहने के बजाय शिक्षित होकर कोई वैकल्पिक और बेहतर जीवन जीने के प्रयासों वाला आशाजनक पहलू। इस कहानी में बदलते हुए यथार्थ के आशाजनक पहलू को सामने लाया गया है। भूरी का जीवन हमेशा ऐसा ही रहने वाला नहीं है। उसका पति पढ़-लिखकर पढ़ाने लगा है, उसका देवर ऊँचे पद पर पहुँचने के लिए तैयारी कर रहा है, उसके बच्चे भी पढ़-लिख जायेंगे, तो गाँव में न रहकर बाहर चले जायेंगे। यह भी हो सकता है कि वे ‘लोकल’ न रहकर ‘ग्लोबल’ हो जायें।

इस प्रकार यह कहानी ठेठ भारतीय यथार्थ की कहानी होते हुए भी आज के भूमंडलीय यथार्थ की कहानी है और इसका यथार्थवाद प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाने वाला भूमंडलीय यथार्थवाद है।

तस्वीर के पीछे : प्रज्ञा
पितृसत्ता के पीछे छिपी अर्थव्यवस्था की कहानी

विगत बीसेक वर्षों में दलित विमर्श की भाँति स्त्री विमर्श की कहानियाँ भी हिंदी में खूब लिखी गयीं। दलित लेखन की तर्ज पर स्त्री लेखन की भी एक अलग कोटि बना ली गयी और शेष साहित्य से उसे अलगाकर देखा गया। जिस प्रकार दलित लेखन ब्राह्मणवाद के बजाय सवर्णों के विरुद्ध विद्रोह का लेखन था, उसी प्रकार स्त्री लेखन पितृसत्तावाद के बजाय पुरुषों के विरुद्ध विद्रोह का लेखन बन गया। जिस प्रकार दलित लेखन में जाति सर्वप्रमुख रही, उसी प्रकार स्त्री लेखन में देह सर्वप्रमुख रही। लेकिन दोनों प्रकार के लेखन की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि ब्राह्मणवाद और पितृसत्तावाद को सामाजिक समस्याओं के रूप में न देखकर मनोवैज्ञानिक समस्याओं के रूप में देखा गया। दलित लेखन में यह मान्यता प्रचलित रही कि जब तक सवर्णों की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक दलितों के प्रति अन्याय होता रहेगा। स्त्री लेखन में यह माना जाता रहा कि जब तक पुरुषों की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक स्त्रियों पर अत्याचार होता रहेगा।

इस मान्यता के मुताबिक मानसिकता को बदलने का उपाय यह माना गया कि दलितों के द्वारा सवर्णों के प्रति और स्त्रियों के द्वारा पुरुषों के प्रति घृणा का प्रचार किया जाये। यह नहीं देखा गया कि समाज की व्यवस्था को बदले बिना लोगों की मानसिकता को नहीं बदला जा सकता। समाज की व्यवस्था को बदलने के लिए जाति और लिंग के आधार पर किये जाने वाले शोषण को समाप्त करना, शोषण को समाप्त करने के लिए वर्गों में बँटी समाज व्यवस्था को बदलना और उसे बदलने के लिए जाति, धर्म, लिंग आदि के भेद भुलाकर वर्गीय शोषण के खिलाफ लड़ना जरूरी है। यह बात प्रगतिशील-जनवादी साहित्यकार शुरू से कहते आ रहे थे, लेकिन दलित और स्त्री लेखकों ने इसे अनसुना तो किया ही, इसका विरोध भी यह कहते हुए किया कि वर्गभेद को समाप्त करने से पहले जातिभेद और लिंगभेद को समाप्त करना जरूरी है और इसके लिए समाज की व्यवस्था से पहले सवर्णों तथा पुरुषों की मानसिकता को बदलना जरूरी है। इस प्रकार उनका लेखन यथार्थ को बदलने के बजाय यथास्थिति को बनाये रखने वाला लेखन बन गया।

लेकिन इधर की कहानियों में दलितों और स्त्रियों के लेखन में एक बदलाव दिखायी दे रहा है। उदाहरण के लिए, ‘परिकथा’ के प्रस्तुत अंक में प्रज्ञा की कहानी ‘तस्वीर के पीछे’ में स्त्री के प्रति होने वाले अन्याय और अत्याचार को पुरुष मानसिकता से जोड़कर नहीं, बल्कि स्त्री की कमजोर आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखा गया है। जैसा कि शीर्षक से ही जाहिर है, यह प्रत्यक्ष दिखायी देते यथार्थ के पीछे छिपे यथार्थ को सामने लाने वाली कहानी है।

प्रत्यक्ष दिखायी देता यथार्थ यह है कि कहानी की प्रमुख पात्र रानी रूप और गुणों की खान है। वह स्वयं को प्यार करने वाली चाची के परिवार और नाते-रिश्ते के लोगों के बीच सदा हँसती-खिलखिलाती और पूरी मुस्तैदी से, कुशलतापूर्वक तथा हँसते-हँसते काम में जुटी रहती है, जिससे लगता है कि वह एक सुखी और संतुष्ट स्त्री है। लेकिन उसका जीवन दुख भरी कथा है। छोटी उम्र में ही माँ का साया सिर से उठ गया था। पिता और दो अविवाहित भाइयों के खाने-पीने और घर की व्यवस्था का दायित्व उसके जिम्मे आ गया था। पिता ने उसकी पढ़ाई को व्यर्थ समझकर दसवीं के बाद ही स्कूल छुड़ा दिया, कई वर्षों तक विवाह के बाद की जिम्मेदारियों को सँभालने लायक और सिलाई-बुनाई जैसे कामों में पारंगत बनाने के नाम पर उसे घरेलू नौकरानी बनाये रखा और उसके बाद कम खर्च में उसके विवाह की जिम्मेदारी का बोझ सिर से उतारने के लिए उसका विवाह एक कम पढ़े-लिखे, काफी बड़ी उम्र के, कुरूप और क्रूर व्यक्ति से कर दिया।

शादी से पहले पिता शक करते थे कि रानी किसी के संग भाग न जाये, शादी के बाद रूप-गुण में रानी से हीन पति उस पर शक करने लगा। वह उस पर पहरा बिठाने लगा, बात-बात पर उसे नीचा दिखाने लगा, उसे मारने-पीटने लगा। एक बार मार-पीट के बाद रानी को प्यार करने वाली चाची उसके फोन करने पर उसे अपने साथ ले आयी, तो रानी के सगे भाई अपनी बहन को बहनोई के अत्याचार से बचाने के लिए स्वयं कुछ करने के बजाय चाची से ही लड़ने आ गये कि ‘‘आप क्यों हमारी बहन का घर तुड़वाने पर तुली हैं?’’ रानी कोई चारा न देख पति के पास लौट गयी और उसके सारे अत्याचार सहते हुए अपने बच्चों (एक बेटा, एक बेटी) को प्यार से पालने लगी। उसने तमाम दुखों और कष्टों में भी हँसते-हँसते जीने का पाठ पढ़ लिया कि ‘‘जब कोई रास्ता नहीं है और सब सहना ही है, तो खुश दिखकर ही सह लो सब।’’

लेकिन जब उसने देखा कि उसका पति बेटे को तो प्यार करता है, बेटी को प्यार नहीं करता, बल्कि बेटी को खिलाने-पिलाने और पढ़ाने-लिखाने पर होने वाले खर्च पर कुढ़ा करता है, तो उसने ठान लिया कि वह स्वयं अपने सपनों का जो जीवन नहीं जी पायी, वह जीवन उसकी बच्ची जिये। इसके लिए वह पति से छिपाकर भी अपनी बेटी की सारी इच्छाएँ पूरी करती है। उसका पति चाहता है कि बेटी को पढ़ाने-लिखाने के बजाय वह ‘‘उसे अपनी तरह सीना-पिरोना ही सिखा दे।’’ लेकिन रानी अपनी बच्ची को स्कूल भेजने के साथ-साथ कंप्यूटर, डांस और टाइक्वांडो भी सीखने के लिए भेजती है। बेटी रुचिका जब स्कूल में फुटबॉल टीम की कप्तान चुनी जाती है, तो रानी के पति को यह बात इतनी अखर जाती है कि वह खराब खाना बनाने का दोष मढ़कर गुस्से में थाली रानी पर दे मारता है।

ऐसे अत्याचारों को सहते-सहते रानी जब बीमार हो जाती है, तो उसका पति अपना खर्च बचाने के लिए उचित ढंग से उसका इलाज नहीं कराता। वह रानी को अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूँक करने वाले ओझा को घर बुलाकर अपना खर्च बचाने का जतन करता है। रानी की हालत बिगड़ती जाती है और एक दिन रुचिका रानी की स्नेहमयी चाची को फोन करती है, ‘‘नानी, तुरंत आ जाओ, मम्मी आपको बुला रही हैं।’’ चाची आती हैं, तो रानी अपनी बेटी रुचिका को उन्हें सौंप देती है। चाची को आश्चर्य होता है कि रानी का पति ऐसा कैसे होने देगा। लेकिन रानी बताती है कि उसके पति को बेटी की कोई परवाह नहीं है। वह तो बेटी के बारे में कहता है, ‘‘नौकरी करूँगा या लड़की जात को सँभालूँगा? और कुछ जिम्मेदारी तो तेरे घर की भी बनती है आखिर?’’ लेकिन अपने बेटे को अपने पास रखने में उसे कोई ऐतराज नहीं है, क्योंकि बेटा उसके लिए लाभदायक है।

रानी शुरू से जानती है कि पुरुषों की मानसिकता को नहीं बदला जा सकता, क्योंकि वह मानसिकता आर्थिक हानि-लाभ से जुड़ी है। बेटी को पढ़ाना-लिखाना हानिकर है, उसे मुफ्त की घरेलू नौकरानी बनाकर उससे काम लेना लाभकर। इसी तरह बेटे को अपने पास रखने में फायदा है, जबकि बेटी की जिम्मेदारी दूसरों पर डाल देने में फायदा है। रानी पहले अपने पिता और भाइयों की और बाद में अपने पति की इस अपरिवर्तनीय मानसिकता को जानने के कारण उसे बदलने का प्रयास नहीं करती, लेकिन अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनाकर पति के परिवार की व्यवस्था को ही बदल देती है।

कहने की जरूरत नहीं कि प्रज्ञा की यह कहानी एक स्त्री के द्वारा स्त्री के बारे में लिखी हुई होने पर भी चालू स्त्री विमर्श से बिलकुल हटकर लिखी गयी कहानी है। इस कहानी की नवीनता और खूबसूरती इसका यथार्थवाद है। प्रगतिशील-जनवादी कहानी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला यथार्थवाद। इसी यथार्थवाद के जरिये प्रज्ञा नितांत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शोषित-उत्पीड़ित व्यक्ति को साहसपूर्वक जीते और समझौते के बजाय संघर्ष करते हुए दिखाती हैं। कहानी की खूबी यह है कि रानी बाहर से समझौते कर चुकी स्त्री दिखती है, लेकिन भीतर से वह एक मजबूत संघर्षशील स्त्री है।

जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है : सत्यम सत्येंद्र पांडेय
दलित प्रश्न को सांप्रदायिकता से जोड़कर दिखाने वाली कहानी

सत्यम सत्येंद्र पांडेय की कहानी ‘जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है’ दलितों के अपमान की तथा उनके साथ होने वाले सामाजिक अन्याय और उनके जनतांत्रिक अधिकारों के सार्वजनिक रूप से किये जाने वाले हनन की समस्या को एक नये रूप में सामने लाती है।

कहानी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के सांप्रदायिक तनाव, दंगे और शहर में कर्फ्यू लग जाने की खबर से शुरू होती है। कॉलेज में पढ़ने वाला एक दलित युवक राजकुमार अपनी मोटरसाइकिल पर कॉलेज जाने के लिए निकलता है कि शहर की तरफ से बदहवास लौटते उसके एक पड़ोसी उसे शहर में कर्फ्यू लग जाने की खबर देते हैं। मिडिल स्कूल में उसके सहपाठी रहे उसके ये पड़ोसी, जो आठवीं में दूसरी बार फेल होने पर पढ़ाई से तौबा कर चुके थे, कई धंधे चलाकर उनमें असफल हो चुके हैं और अब धर्म रक्षा मिशन के फुलटाइम कार्यकर्ता हैं। राजकुमार उनसे दंगे का कारण पूछता है, तो पाता है कि दंगा हिंदू हुड़दंगियों की वजह से हुआ। वह हुड़दंगियों को गलत बताता है, तो धर्मरक्षक कहते हैं, ‘‘अबे, तुम जैसों के कारण ही तो इन मुसल्लों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं। साले तुम हिंदू होकर भी ऐसी बात करते हो, शर्म नहीं आती तुम्हें?’’

जवाब में दलित युवक राजकुमार कहता है, ‘‘अरे काहे का हिंदू, कैसी शर्म? अपने घर में तो पानी नहीं दे सकते, मंदिर में घुसने नहीं देते। उस समय क्यों नहीं हिंदू मानते हमको?’’

धर्मरक्षक राजकुमार को उसके जाति के नाम से गाली देते-देते रुक जाते हैं, क्योंकि ‘‘जब से हरिजन एक्ट और हरिजन थाने प्रकट हुए हैं, ये पसंदीदा शब्द मुँह से निकालने में डर लगता है।’’ तभी राजकुमार देखता है कि कॉलेज में उसकी सहपाठी दीपाली, जो उसके पड़ोसी पंडित रामधन की पाँच संतानों में सबसे छोटी है, कॉलेज जाने के लिए ऑटोरिक्शा में सवार हो रही है। राजकुमार उसे रोकता है और उससे दो मिनट बात करके उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर नर्मदा नदी के भेड़ाघाट की ओर चल देता है। धर्मरक्षक धर्म की रक्षा के लिए मोबाइल पर दीपाली के भाइयों को इसकी सूचना दे देते हैं। 

ट्रैक्टर से खेतों की जुताई करके लौटते दीपाली के तीन भाइयों को यह सूचना मिलती है, तो वे ‘‘प्रेम से परिपूर्ण सुखद भविष्य की योजनाएँ बनाते हुए’’ चले जा रहे राजकुमार और दीपाली का रास्ता रोक लेते हैं। वे अनिष्ट के भय से काँपती बहन के सामने ही राजकुमार को लात-घूँसों से पीटने लगते हैं और गालियाँ देते हुए पूछने लगते हैं, ‘‘अब मिलेगा दीपाली से? बिठायेगा कभी मोटरसाइकिल पर?’’ राजकुमार एक नजर दीपाली पर डालता है और अपने प्रेम की शक्ति को संचित करते हुए कहता है, ‘‘हाँ, मिलूँगा। जरूर मिलूँगा।’’ उससे बार-बार यही सवाल पूछा जाता है और वह बार-बार यही जवाब देता है, तो तीनों भाई उसे और पीटते हैं। लेकिन जब वे देखते हैं कि चारों तरफ भीड़ इकट्ठी हो गयी है, तो बहन की बदनामी के डर से दीपाली का नाम लेना तो बंद कर देते हैं, लेकिन राजकुमार को ट्रैक्टर से बाँधकर घसीटते हुए नर्मदा के पुल की ओर चल देते हैं। घिसटते हुए राजकुमार की मर्मांतक चीखों के साथ टैªक्टर पुल पार करता है, जिस पर उसके खून की पट्टी बन जाती है। दीपाली भाइयों की तवज्जो अपनी ओर न देख पुल पर से नदी में छलाँग लगाकर आत्महत्या कर लेती है।

यह दृश्य जितना भयानक है, उससे भी अधिक भयानक यह है कि हजारों लोगों के सामने दिनदहाड़े एक युवक को ट्रैक्टर से बाँधकर घसीटा और मार डाला जाता है, एक युवती इस अन्याय को सह न पाने के कारण आत्महत्या कर लेती है, लेकिन हजारों की वह भीड़ पूरी तरह खामोश होकर इस दृश्य को देखती रहती है, जबकि यहाँ कोई कर्फ्यू नहीं लगा है।

यह कहानी दलित प्रश्न को बड़ी शिद्दत से उठाती है, लेकिन चालू दलित विमर्श की कहानियों से भिन्न है। यह केवल सवर्णों और दलितों के बीच के अंतर्विरोध की बात नहीं करती। इसका नयापन यह है कि यह कहानी सामाजिक अन्याय को सांप्रदायिकता की समस्या से जोड़कर देखती है और इन दोनों के बने रहने तथा बढ़ते जाने के कारणों को लोगों में सामाजिक चेतना के अभाव तथा उनकी राजनीतिक हस्तक्षेप न करने वाली निष्क्रियता में खोजती है, जिसके शिकार वे दलित भी हैं, जो सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक शक्तियों से हाथ मिला लेते हैं। कहानी में जो भीड़ चुपचाप तमाशा देख रही है, क्या उसमें सब सवर्ण ही होंगे? उस नौजवान की अपनी बिरादरी के लोग न होंगे? अवश्य होंगे, लेकिन वे अन्याय होते देखकर भी मूक दर्शक बने रहते हैं, उसका विरोध और प्रतिरोध नहीं करते।

इस प्रकार यह कहानी आज के इस बृहत्तर यथार्थ की ओर संकेत करती है कि हमारे समाज में ही नहीं, समूचे देश और विश्व में हिंसा और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन में बढ़ोतरी हो रही है। युद्धों के रूप में, धर्म के नाम पर की जाने वाली आतंकवादी कार्रवाई के रूप में, राज्य द्वारा की जाने वाली जन-दमनकारी हिंसा के रूप में हम उसे नित्यप्रति देखते हैं, लेकिन चुपचाप, निष्क्रिय होकर देखते रहते हैं। जबकि हिंसा किसी के भी द्वारा किसी के भी प्रति की जा रही हो, उसके विरुद्ध नागरिक अथवा जन-हस्तक्षेप होना ही चाहिए। यह तभी हो सकता है, जब लोगों में सामाजिक चेतना हो और हिंसा के विरुद्ध राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाली सक्रियता हो। मगर वर्तमान व्यवस्था इस प्रकार की चेतना और सक्रियता को कुंद करने के लिए धर्म का सहारा लेती है और इसके लिए इस कहानी के धर्मरक्षक जैसे लोगों का इस्तेमाल करती है।

शहर में जो सांप्रदायिक दंगा हुआ है, वह धर्मरक्षक जैसे लोगों के ही कारण हुआ है। धर्मरक्षक स्वयं भी देशी कट्टा जेब में रखकर वहाँ मुसलमानों को मारने जाता है, लेकिन कर्फ्यू लग जाने के कारण पुलिस द्वारा खदेड़ दिया जाता है। राजकुमार उससे मजाक करता है, ‘‘तो टपका देते दो-तीन पुलिस वालों को ही।’’ तो वह कहता है, ‘‘पुलिस में कौन रहता है बे, सब अपनी ही तरफ के लोग न? काहे मारें उनको?’’ वही धर्मरक्षक जहाँ कर्फ्यू नहीं लगा है, वहाँ ब्राह्मण दीपाली से प्रेम करने वाले चमार राजकुमार को मारने के लिए दीपाली के भाइयों को बुलाता है। अर्थात् दोनों जगह हो रही हिंसा में धर्मरक्षक या उस जैसे लोगों का ही हाथ है। इस दृष्टि से देखें, तो कहानी का धर्मरक्षक नामक चरित्र बहुत महत्त्वपूर्ण और कहानी का शीर्षक बहुत अर्थपूर्ण हो जाता है।


कबीर का मोहल्ला : मज्कूर आलम
जानी-पहचानी चीजों को नये अंदाज में प्रस्तुत करने वाली कहानी

आज के नये लेखक सांप्रदायिकता की समस्या पर नये ढंग से सोचते हैं और उस पर कुछ नये ढंग की कहानी लिखने का प्रयास करते हैं। इसके चलते आज की कहानी में कई बार कुछ नये प्रयोग किये जाते दिखायी देते हैं। उदाहरण के लिए, मज्कूर आलम की कहानी ‘कबीर का मोहल्ला’ को देखा जा सकता है। यह कहानी अत्यंत जानी-पहचानी और बार-बार पढ़ी-सुनी चीजों को एक नये अंदाज में, एक नयी तरतीब देकर पेश करती है और सांप्रदायिक वैमनस्य के विरुद्ध सद्भाव का संदेश देती है।

कबीर के बारे में किंवदंती है कि हिंदू उन्हें हिंदू मानते थे और मुसलमान मुसलमान। इसलिए जब कबीर की मृत्यु हुई, तो हिंदुओं ने कहा कि वे उनकी चिता जलायेंगे और मुसलमानों ने कहा कि वे उनकी कब्र बनायेंगे। लेकिन दोनांे की मंशा पूरी न हुई, क्योंकि कबीर की लाश फूलों में बदल गयी। यह किंवदंती स्वयं ही सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है। मज्कूर आलम ने इसी का इस्तेमाल करते हुए कहानी में एक नया प्रयोग किया है।

एक मोहल्ला है, जिसमें गली की एक तरफ हिंदू रहते हैं और दूसरी तरफ मुसलमान। यह सांप्रदायिकता पर लिखी जाने वाली कहानियों की एक चिर-परिचित स्थिति है और भारत के कई शहरों-कस्बों की हकीकत भी। कहानीकार भी कहता है कि ‘‘यह जैसा मोहल्ला है, वैसे मोहल्ले गंगा-जमुनी तहजीब वाले वतन के कई शहरों में आपको देखने को मिल जायेंगे।’’ ऐसे मोहल्लों में सांप्रदायिक तनाव तो रहता ही है, इसलिए ‘‘चार-पाँच साल में यहाँ दंगे हो ही जाते हैं।’’ लेकिन ‘‘कमाल की बात है कि तमाम तनावों के बाद भी गली की दोनों तरफ के बीच रिश्ते की डोर भी उतनी ही मजबूत और यकीनी है।’’

ऐसे मोहल्ले में एक दिन एक बच्चा कहीं से चला आया। लोगों से उसका नाम पूछा, तो तोतली भाषा में उसने जो बताया, किसी की समझ में न आया। मोहल्ले के लोगों ने उसे आश्रय दे दिया और वह अलग-अलग दिन अलग-अलग परिवार के साथ रहने लगा। लोगों ने उसे छोटू कहना शुरू कर दिया। बच्चा बड़ा होता गया, लेकिन वह कौन है, कहाँ से आया है, उसकी जाति और धर्म क्या है, कुछ भी पता नहीं चला। ‘‘जब वह थोड़ा बड़ा हुआ, तो मोहल्ले वालों ने ही नीम के पेड़ के नीचे उसके रहने की व्यवस्था कर दी। उसके फूस के छप्पर के ऊपर ही मोहल्ले के नाम का बैनर भी लगा दिया--कबीरगंज।’’ उस बैनर के चलते उस लड़के का नाम कबीर पड़ गया। वह किस जात-मजहब का है, यह तो उसे तब भी नहीं पता था, जब यहाँ आया था और अब वह जानना भी नहीं चाहता था, क्योंकि वह भीख माँगकर गुजारा करता था। यदि वह किसी एक धर्म का हो जाता, तो ‘‘धर्म उसके कर्म के मार्ग की बाधा’’ बन जाता, जबकि किसी भी धर्म का न होने से उसे हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई सभी धर्मस्थलों के बाहर खड़े होकर भीख माँगने की सुविधा थी। वह किसी धर्म का नहीं था, ‘‘शायद यही वजह थी कि वह गली के दोनों तरफ दुलारा था।’’ जब कोई सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली घटना हो जाती, तो लोग एक-दूसरे पर शक करते, लेकिन कबीर पर कभी शक न करते।

कहानी उस रात की है, जब भयंकर बारिश हो रही थी और बर्फ पड़ रही थी। कबीर जिस पेड़ के नीचे सोता था, उसके नीचे एक साँड़ बारिश और बर्फ से बचने के लिए आ खड़ा हुआ। संयोग से उसी पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता था, जो बर्फबारी के कारण टूट गया और इससे गुस्सायी मधुमक्खियों ने कबीर और साँड़ दोनांे पर हमला बोल दिया। उनके हमले से बचने के लिए दोनों भागे, लेकिन अँधेरे में दोनों एक नाले में जा गिरे। साँड़ का एक सींग कबीर के पेट में घुस जाने से कबीर की और नाले में गिर जाने से साँड़ की मौत हो गयी। मरने से पहले दोनों चिल्लाये। साँड़ के रँभाने और कबीर के चीखने की दर्द भरी आवाजें मोहल्ले के लोगों ने सुनीं, तो हिंदुओं ने समझा कि मुसलमानों ने किसी गाय को मार डाला है और मुसलमानों ने समझा कि हिंदुओं ने किसी मुसलमान को। बस, अनुमान के आधार पर ही दोनों तरफ सांप्रदायिक तनाव फैल गया और एक तरफ से ‘‘हर-हर महादेव’’ के और दूसरी तरफ से ‘‘अल्लाहो अकबर’’ के नारे लगने लगे। दंगे की आशंका से पुलिस आ पहुँची। तब तक बारिश बंद हो चुकी थी और सुबह भी हो चुकी थी। पुलिस की जीप आयी देख घरों में छिपे डरे-सहमे लोग निकल पड़े। लेकिन उन्होंने देखा कि पुलिस की जीप नाले के पास खड़ी है, जहाँ कबीर और साँड़ दोनों मधुमक्खियों के काटने और उनसे बचने के प्रयास में नाले में गिर जाने के कारण मारे गये हैं।

कहानी में घटना का वर्णन इस प्रकार पूरा किया जाता है कि ‘‘लाश का पंचनामा कर इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट तैयार करने के बाद पुलिस ने लोगों से पूछा कि इसका कोई अपना है, जो अंतिम संस्कार कर सके। दोनों तरफ के लोग आगे आ गये ...हाँ, हम करेंगे इसका अंतिम संस्कार...पूरा मोहल्ला है इसका...इसके बाद दोनों तरफ के लोगों में एक बार फिर कमान खिंच गयी कि शव को दफनाया जाये कि लाश को जलाया जाये...दोनों तरफ के लोग एक बार फिर से बाँहें फड़काने लगे थे, लेकिन आज कबीर की लाश फूलों में तब्दील नहीं हुई।’’

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इसके बाद कहानी में एक ‘उत्तर कथा’ भी है, जो कहानी लेखन में एक नया प्रयोग है। यह प्रयोग आज के मीडिया और सोशल मीडिया के द्वारा बड़े पैमाने पर फैलायी जाने वाली सांप्रदायिकता का, लेकिन लोगों में मौजूद आपसी सद्भाव का यथार्थ सामने लाने के लिए किया गया है। सांप्रदायिकता की आग भड़काने वाले तत्त्व इस घटना के काल्पनिक वीडियो बनाते हैं, जिनमें दिखाया जाता है कि कैसे मुसलमानों ने एक गाय की हत्या कर दी और कैसे हिंदुओं ने एक मुसलमान लड़के को मार डाला। ये वीडियो आननफानन सोशल साइट्स पर वायरल हो जाते हैं और उन्हें देखकर देश में कई जगह सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठती है। यह सच्चाई सामने आ जाने पर भी कि साँड़ और कबीर की मौत मधुमक्खियों के काटने से हुई है, मीडिया में मनगढ़ंत ‘समाचार’ और ‘कार्यक्रम’ दिखाये जाते रहते हैं, जो देशी मीडिया से चलकर विदेशी मीडिया तक में जा पहुँचते हैं। सांप्रदायिक तनाव लंबे समय तक बना रहता है।

कहानी का अंत इस प्रकार किया जाता है कि एक साल बाद ‘‘कबीर की पुण्यतिथि पर मोहल्ले वालों ने एक बार फिर इस अहद को दोहराया कि वे हर समस्या का हल आपस में मिल-बैठकर करेंगे, किसी के बहकावे में नहीं आयेंगे।’’

मीडिया की कार्यप्रणाली को व्यंग्यात्मक रूप में दिखाते हुए जो प्रयोग कहानी में किया गया है, वह सांप्रदायिक राजनीति, बाजारवादी मीडिया तथा उसके द्वारा फैलाये जाने वाले तनावों और दंगों को रोकने में अक्षम विधि-व्यवस्था के यथार्थ को एक नये रूप में सामने लाता है।

भोला बबवा के पैर : प्रमोद राय
‘फुटलूज लेबर’ के यथार्थ को सामने लाने वाली कहानी

अनुभववादी और कलावादी किस्म की हिंदी कहानियों में चित्रित पात्र या तो केवल अपने तन, मन और निजी जीवन में व्यस्त लोग होते हैं, या ऐसे लोग, जिनकी कोई सामाजिक पहचान ही नहीं होती। या फिर वे स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक आदि होते हैं, जिनकी पहचान केवल लिंग, जाति या धर्म से होती है। ऐसे पात्रों की कहानियाँ पढ़कर लगता है कि जैसे कहानीकारों ने अमीर-गरीब या मालिक-मजदूर जैसी वर्गीय स्थितियों वाले पात्रों के यथार्थ-चित्रण को सर्वथा अनावश्यक मान लिया हो। शायद इसका एक कारण विगत बीसेक वर्षों की कहानी समीक्षा भी है, जो अनुभववाद और कलावाद पर जोर देती है। वह कहानी में विचारधारा, पक्षधरता और प्रतिबद्धता को पुरानी और गैर-जरूरी चीज ही नहीं, बल्कि साहित्य के लिए हानिकारक चीज भी मानकर चलती है। शायद यही कारण है कि इधर की हिंदी कहानी में किसानों, मजदूरों और छोटे-मोटे काम-धंधे करने वाले गरीब श्रमजीवी लोगों के जीवन के यथार्थ को सामने लाने वाले चरित्र दुर्लभ हो गये हैं। 

इस दृष्टि से ‘परिकथा’ में प्रस्तुत अंक में प्रकाशित प्रमोद राय की ‘भोला बबवा के पैर’ एक उल्लेखनीय कहानी है। यह उन लोगों की कहानी है, जो गाँवों से शहरों में आकर असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करते हैं, घरेलू नौकर, दरबान, ड्राइवर वगैरह बनते हैं, ठेलों पर छोटी-मोटी चीजें बेचते हैं या राज-मिस्त्री, रिक्शाचालक वगैरह बनकर अपना पेट भरते हैं--बल्कि अपना पेट काटकर गाँव में पीछे छूटे अपने परिवारों को पैसा भेजकर जीवित रखते हैं। 

इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे ‘टेेमिंग दि कुली बीस्ट’, ‘बियोंड पैट्रोनेज एंड एक्सप्लॉयटेशन’, ‘वेज हंटर्स एंड गैदरर्स’ आदि पुस्तकों के लेखक जान ब्रेमन की पुस्तक ‘फुटलूज लेबर’ की याद आयी। एम्सटर्डम विश्वविद्यालय में तुलनात्मक समाजशास्त्र के प्रोफेसर जान ब्रेमन ने कई बार भारत आकर यहाँ के असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का अध्ययन किया था। उनकी पुस्तक ‘फुटलूज लेबर वर्किंग इन इंडिया’ज इनफॉर्मल इकॉनॉमी’ (भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करने वाले घुमंतू श्रमिक) के बारे में मैंने 2003 में एक लेख लिखा था, जो मेरी पुस्तक ‘भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्ठभूमि’ (2014) में संकलित है। प्रमोद राय की कहानी के संदर्भ में अपने उस लेख का प्रारंभिक अंश उद्धृत करना मुझे जरूरी लग रहा है :

भारतीय श्रम का भूमंडलीकरण एक बार औपनिवेशिक शासन काल में हुआ और दूसरी बार निजीकरण की नीति के चलते अब हो रहा है, क्योंकि यह नीति भारत पर (और लगभग सारी दुनिया में) विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी भूमंडलीय संस्थाओं द्वारा थोपी गयी है। इस नीति का संबंध पूँजीवादी भूमंडलीकरण और आज के उस पूँजीवाद से है, जो कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को त्याग चुका है और उससे जुड़ी तमाम चीजों को नष्ट करने में लगा है। अब उसे राज्य का हस्तक्षेप केवल पूँजी की रक्षा करने, पूँजीपतियों के हित में नीतियाँ बनाने और उन्हें सख्ती से लागू करने में ही चाहिए, जनहित की नीतियाँ बनाने और उन्हें लागू करने के लिए नहीं। राज्य के हस्तक्षेप से बन सकने वाली जनहित की नीतियों को न बनने देने के लिए ही मुक्त बाजार की वैश्विक नीति अपनायी गयी है, जिसके तहत श्रम के बाजार को भी राज्य के हस्तक्षेप से मुक्त रखने का आग्रह किया जा रहा है। इसी नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में विनिवेश की या उन उद्योगों को निजी क्षेत्र के हाथों बेचने की नीति अपनायी गयी है और कहा जा रहा है कि श्रमिकों को ‘औपचारिक’ तथा ‘अनौपचारिक’ दो क्षेत्रों में बाँटने के बजाय केवल अनौपचारिक क्षेत्र में रहने देना चाहिए।

व्यवहार में इस नीति का अर्थ यह है कि सरकार न तो श्रमिकों को रोजगार देने की चिंता करे और न उनके हित में कोई नियम-कानून बनाकर उन्हें लागू करे। मसलन, न्यूनतम वेतन या मजदूरी तय करने, श्रमिकों को जरूरी सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षाएँ देने-दिलाने के उन कामों से, जिनसे ‘औपचारिक अर्थव्यवस्था’ का निर्माण होता है, सरकार को अलग रहना चाहिए। उसे श्रम के बाजार को माँग और पूर्ति के अपने नियमों से ही चलने देना चाहिए और इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि श्रमिकों को स्थायी रोजगार, न्यूनतम वेतन, शिक्षा, आवास, चिकित्सा, बीमा, पेंशन आदि देने से संबंधित नियम-कायदों का पालन किया जा रहा है या नहीं। ऐसे कोई नियम-कायदे होने ही नहीं चाहिए। जो बने हुए हैं, उन्हें भी समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि उनके रहने पर श्रमिक उन्हें लागू कराने की कोशिश करते हैं और इसके लिए संगठित होकर संघर्ष करते हैं। इस चीज को रोकने के लिए श्रमिकों के संगठनों को भंग कर देना चाहिए और ऐसे कानून बना देने चाहिए कि श्रमिक संगठित न हो सकें। इसके अलावा ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करनी चाहिए कि श्रमिकों का संगठित होना स्वतः ही मुश्किल हो जाये। इसका एक कारगर तरीका यह हो सकता है कि श्रमिक किसी एक स्थान पर इकट्ठे और टिककर न रह सकें, बल्कि जहाँ उनकी जरूरत हो, वहाँ जायें और जब तक उनकी जरूरत हो, तभी तक वहाँ रहें।

‘भोला बबवा के पैर’ ऐसे ही श्रमिकों की कहानी है। यह बिहार के एक गाँव के भोलानाथ दुबे और उनके तेरह वर्षीय पुत्र गोल्डेन कुमार दुबे की कहानी है। भोलानाथ दुबे थोड़ा पढ़े-लिखे थे, पर कोई अच्छी नौकरी नहीं पा सके। जमीन-जायदाद ज्यादा थी नहीं, सो गाँव के एक धरमदेव के साथ दिल्ली चले गये, जो दिल्ली में एक सेठ के यहाँ नौकरी करता था और सेठ या उसके संबंधियों को किसी भरोसेमंद नौकर की जरूरत होने पर गाँव आकर किसी लड़के को अच्छी नौकरी दिलाने का वादा करके दिल्ली ले जाता था। उसने भोलानाथ दुबे को नौकरी दिलायी, लेकिन वे वहाँ टिके नहीं। उन्होंने दिल्ली में कई तरह के काम किये और एक दिन अचानक कहीं गायब हो गये। तीन साल बीत गये, पर न तो वे गाँव लौटे और न उनके मर जाने की खबर मिली। गाँव में उनकी पत्नी उन्हें जीवित मानती रही और इस इंतजार में कि वे पैसा कमाकर लौटेंगे, तो कर्ज चुका दिया जायेगा, खेत गिरवी रखकर लिये गये कर्ज से किसी तरह काम चलाती रही और अपने बेटे गोल्डेन कुमार को पढ़ाती रही। उधर धरमदेव के मालिक की बेटी को भरोसेमंद घरेलू नौकर की जरूरत महसूस हुई, तो वह गाँव आया और अच्छी नौकरी दिलाने का वादा करके गोल्डेन कुमार को अपने साथ दिल्ली ले गया। वह भोलानाथ दुबे को भोला बाबा कहता था (‘बाबा’ प्यार और तिरस्कार दोनों में ‘बबवा’ हो जाता है) और गोल्डेन कुमार को गोल्डेन बाबा कहता है। वही गोल्डेन को बताता है कि उसके पिता कहीं टिककर नहीं रहते थे, ‘‘उनके पैरों में चक्कर था।’’ इसीलिए कहानी का शीर्षक है ‘भोला बबवा के पैर’।

लेकिन तेरह वर्षीय गोल्डेन कुमार केवल नौकरी करने दिल्ली नहीं जाता, बल्कि दिल्ली में अपने खोये हुए पिता को खोजने जाता है। दिल्ली की खोड़ा कॉलोनी में उसके गाँव के कई लोग रहते हैं, जो तरह-तरह के छोटे-मोटे काम या नौकरी-चाकरी करते हैं। गोल्डेन वहाँ जाकर उनसे मिलता है। वे लोग उसे बताते हैं कि भोला बबवा कहीं टिककर कोई काम नहीं करते थे। कभी किसी फैक्टरी में काम किया, तो कभी किसी स्कूल में चौकीदारी की। कभी किसी सिक्योरिटी एजेंसी में भरती होकर एटीएम गार्ड बने, तो कभी दिल्ली की प्राइवेट बसों में कंडक्टर। कभी किसी ठेकेदार के नौकर रहे, तो कभी जूस बेचने की अपनी ठेली लगायी। हालाँकि नौकरी की मजबूरी में उन्होंने फैक्टरी के संगठित मजदूरों की हड़ताल तोड़ने वाले के रूप में भी काम किया, मगर अपनी ईमानदारी और गलत कामों को रोकने की प्रवृत्ति के चलते वे नौकरी से या तो खुद निकले या निकाले गये; हर जगह लड़े-भिड़े और मारे-पीटे गये। कभी चाकू से घायल होने पर अस्पताल ले जाये गये, तो कभी पुलिस को हफ्ता न देने पर पुलिस चौकी में ले जाकर पीटे गये। भोला बबवा के गायब हो जाने या मर जाने के बारे में गाँव वालों को ठीक-ठीक कुछ मालूम नहीं। केवल अटकलें हैं कि उन्हें किसी ने मारकर नाले में फेंक दिया था या उन्हें एड्स-वेड्स हो गया था। लेकिन लोगों को यह विश्वास भी है कि ‘‘सब फालतू बात है, भोला बबवा वैसा आदमी नहीं था।’’

गोल्डेन जिस कोठी में काम करता है, वहाँ से खोड़ा कॉलोनी जाकर अपने गाँव के लोगों से मिलने के बाद जब लौटता है, तो उसे तरह-तरह के काम करते लोगों में अपने पिता नजर आते हैं। इस प्रकार कहानीकार बड़ी कुशलता और कलात्मकता के साथ गाँवों से शहरों में आकर तरह-तरह के काम करने वाले लोगों के जीने और मरने का भयावह यथार्थ सामने लाता है। कहानी से पता चलता है कि चक्कर सिर्फ भोला बाबा के पैरों में नहीं था, इन तमाम लोगों के पैरों में है। ये सब एक अस्थिर और अस्थायी जीवन जी रहे हैं और भोला बाबा की तरह शहर में आकर खो गये हैं। कहानी का नयापन इसमें है कि यह भारत की उस ‘अनौपचारिक अर्थव्यवस्था’ पर हमारा ध्यान केंद्रित करती है, जो अस्थायी श्रमिकों के बल पर चलती है।

इस प्रकार आज की हिंदी कहानी में कई नये स्वर उभर रहे हैं। पिछले कुछ समय से हिंदी कहानी अपनी यथार्थवादी परंपरा से कटकर भटक-सी गयी थी। लेकिन अब वह फिर पटरी पर लौट रही है और आगे बढ़ रही है। इसमें नये कहानीकारों के साथ-साथ ‘परिकथा’ जैसी पत्रिकाओं की भी भूमिका है, जो नयी रचनाशीलता को निरंतर सामने लाने का सार्थक और जरूरी काम करती हैं।

Tuesday, April 22, 2014

कार-कथा

 रमेश उपाध्याय की कहानी

‘‘अरे, कपूर साहब, आप? नमस्ते! आइए, बैठिए, कैसे हैं?’’

‘‘अहा, नमस्ते, वर्मा जी! बस में सीट और आप जैसे सज्जन का साथ मिल जाये, तब तो सब ठीक होना ही हुआ!’’

‘‘लेकिन आज आप बस में कैसे?’’

‘‘कार पुरानी हो गयी थी, बेच दी।’’

‘‘लेकिन पिछली बार आप मिले थे, तब तो कह रहे थे कि उसकी जगह नयी खरीद ली है?’’

‘‘हाँ, खरीदी थी, लेकिन वह मैंने अपनी छोटी बहू को दे दी। क्या है कि मेरे दोनों लड़कों के पास तो अपनी-अपनी गाड़ी थी ही और बड़ी बहू अपने लिए अपने दहेज में ले आयी थी। छोटी बहू थोड़े कमजोर घर की है, वह नहीं ला सकी, तो अपनी उसे मैंने दे दी।’’

‘‘मतलब, आपके घर में चार गाड़ियाँ हैं?’’

‘‘वैसे तो पाँच होनी चाहिए। चार बेटों-बहुओं की और पाँचवीं मेरे और मेरी वाइफ के लिए। बड़ा तो कह रहा है कि आप मेरी वाली ले लो। क्या है कि उसे नये मॉडल की कारें खरीदने का खब्त है। एक पुरानी हो नहीं पाती कि तब तक उसे बेचकर नये मॉडल की दूसरी ले लेता है। कह रहा था--मुझे तो बेचनी ही है, आप ले लो।’’

‘‘तो आप ले लेते! बसों में क्यों धक्के खाते फिर रहे हैं?’’

‘‘अब क्या है कि मैं और वाइफ जब से रिटायर हुए हैं, हम दोनों की कोई पब्लिक लाइफ तो रही नहीं। वाइफ दिन-रात नौकरानी की तरह घर में खटती रहती हैं और मैं दिन भर घरेलू नौकर की तरह बाहर के कामों के लिए दौड़ता रहता हूँ। जिनको पैदा किया, पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया; जिनके लिए तमाम जायज-नाजायज तरीकों से पैसा कमाकर मकान बनवाया; जिनका कैरियर बनाने और घर बसाने के लिए दुनिया भर की भाग-दौड़ और जोड़-तोड़ की; वे आज हमारे घर के ही नहीं, हमारे भी मालिक बन बैठे हैं। मैं और वाइफ दिन-रात उनकी सेवा में लगे रहते हैं। अपने लिए कोई वक्त ही नहीं बचता। सो जब कहीं आना-जाना ही नहीं, तो गाड़ी रखकर क्या करें?’’

‘‘तो इस समय आप कहाँ जा रहे हैं?’’

‘‘क्या है कि सुबह-सुबह दूध लाने गये। फिर बच्चों के बच्चों को उनकी स्कूल बस तक छोड़ने गये। फिर सब्जियाँ, फल, अंडे, मक्खन, ब्रेड वगैरह लेने गये। नाश्ता करके बिजली का बिल जमा कराने गये। लौटकर नहाने-खाने के बाद थोड़ा आराम करने की सोच ही रहे थे कि बड़ी बहू का फोन आ गयाµमेरे लिए कनॉट प्लेस के खादी भंडार से हर्बल शैंपू ले आओ!’’

‘‘तो आप कनॉट प्लेस जा रहे हैं! मैं भी वहीं जा रहा हूँ। चलिए, अच्छा है। बहुत दिन हो गये आपसे मिल-बैठकर बातें किये। कॉफी होम चलेंगे, वहाँ बैठकर कॉफी पियेंगे, गपशप करेंगे और आपकी बहू के लिए हर्बल शैंपू लेकर साथ-साथ ही लौट आयेंगे।’’

‘‘मगर आप कनॉट प्लेस किस काम से जा रहे हैं?’’

‘‘समझिए कि आपकी बहू के लिए हर्बल शैंपू लेने।’’

‘‘मजाक मत कीजिए। वैसे आप न बताना चाहें, तो...’’

‘‘अरे, नहीं-नहीं, कपूर साहब! आप जैसे भले पड़ोसी से क्या छिपाना! बात यह है कि हमारे बच्चे तो, आप जानते हैं, दिल्ली में हैं नहीं। बेटा-बहू बंगलौर में हैं और बेटी सिंगापुर में। यहाँ हम मियाँ-बीवी दो ही हैं। भाभीजी की तरह मेरी बीवी तो नौकरी में थी नहीं। घर की मालकिन कहिए या नौकरानी, सब कुछ शुरू से वही है। लेकिन मेरी पेंशन हम दोनों के लिए काफी है। फ्लैट उस समय ले लिया था, जब मकान सस्ते थे और दफ्तर से इतना लोन मिल जाता था कि छोटा-सा फ्लैट लिया जा सके। गाड़ी-वाड़ी पहले भी कभी नहीं रखी। अपने लिए तो हमेशा दिल्ली परिवहन निगम ही जिंदाबाद रहा। अब तो अपने इलाके में मेट्रो भी आ गयी है, लेकिन मेट्रो स्टेशन हमारे लिए थोड़ा दूर पड़ता है, इसलिए ज्यादातर बस से ही आते-जाते हैं। वैसे, सीट मिल जाये, तो बस से बेहतर कोई सवारी नहीं। अंदर-बाहर के नजारे देखिए, लोगों से बातें कीजिए, आराम करना चाहें तो आँखें बंद करके एक झपकी ले लीजिए। और अब कहीं टाइम पर हाजिरी देने तो जाना नहीं। दोपहर के खाने के बाद श्रीमती जी शाम तक आराम करती हैं। मैं थोड़ा सैर-सपाटा करने और दोस्तों के साथ कॉफी पीने कनॉट प्लेस चला जाता हूँ। घंटे-डेढ़ घंटे बैठे, गपशप की, तरोताजा हुए और शाम तक वापस घर।’’

‘‘आप खुशकिस्मत हैं, वर्मा जी! बेटा-बहू बंगलौर में क्या करते हैं?’’

‘‘दोनों सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। अच्छा कमाते हैं, लेकिन घूमने-फिरने के अलावा उन्हें कोई शौक नहीं। पैसा जोड़ा, छुट्टी ली और देश या विदेश में कहीं घूम आये। दो-तीन बार हम दोनों को भी घुमा लाये हैं।’’

‘‘और आपकी लड़की?’’

‘‘वह एम.बी.ए. करके दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने लगी थी। वहीं एक लड़का मिल गया, जिससे उसने प्रेम विवाह कर लिया। शादी के बाद दोनों को सिंगापुर में बेहतर जॉब मिल गयी, तो वहाँ चले गये। इसी तरह लड़के ने भी अपने साथ काम करने वाली लड़की से प्रेम विवाह किया है और वे दोनों भी खुश हैं।’’

‘‘आप वाकई खुशकिस्मत हैं, वर्मा जी! आपके बच्चे आपकी अकेले की कमाई के बावजूद अच्छी तरह पढ़-लिखकर काबिल बन गये। इधर मैंने और मुझसे ज्यादा वाइफ ने दोनों लड़कों पर पानी की तरह पैसा बहाया। लेकिन वे पढ़ाई-लिखाई में मन लगाने की जगह मौज-मस्ती में ही डूबे रहे। हमारे यहाँ शुरू से दो गाड़ियाँ थींµएक मेरी, एक वाइफ की। लेकिन लड़कों ने कॉलेज के जमाने में ही दोनों हथिया लीं। साथ के लड़कों और लड़कियों को अपनी गाड़ियों में घुमाना, एक्सीडंेट और लड़ाई-झगड़े करना, बेकार में पेट्रोल और पैसा फूँकना। कई बार पुलिस के चक्कर में भी फँसे। ऐसे लड़कों को अच्छी जॉब कैसे मिलती? मैंने ही जैसे-तैसे जुगाड़ लगाकर उनको नौकरियाँ दिलायीं और उनकी शादियाँ करायीं। बहुएँ दोनों बेहतर पढ़ी-लिखी हैं और लड़कों से बेहतर जॉब में हैं। बड़ी बहू तो काफी पैसे वाले परिवार की है। छोटी बहू, जैसा कि मैंने आपको बताया, जरा कमजोर घर की है, लेकिन छोटे लड़के से ज्यादा पढ़ी है और ज्यादा कमाती है। मगर छोटा लड़का उसकी कद्र नहीं करता। दहेज न लाने के लिए ताने देता रहता है। सबसे बड़ा ताना यह कि वह दहेज में कार क्यों नहीं लायी। मुझे डर लगा कि यह लड़का कार के कारण कहीं बहू को मार न डाले, इसलिए अपनी नयी कार मैंने उसे दे दी।’’

‘‘अच्छा किया।’’

‘‘लेकिन, वर्मा जी, इससे एक नयी मुसीबत खड़ी हो गयी है। मैंने आपको बताया न, बड़े लड़के को नये-नये मॉडलों की कारें खरीदने का खब्त है। मुझसे कह रहा है कि मेरी पुरानी कार आप ले लो। जानते हैं, क्यों? पुरानी कार बेचने से उसे उतने पैसे नहीं मिलेंगे, जितने नयी कार के लिए चाहिए। इसलिए वह चाहता है कि मैं उसकी कार ले लूँ और उसे उतना पैसा दे दूँ, जितने में नयी गाड़ी आ जाये। मैंने कहा कि मुझे गाड़ी की जरूरत नहीं है, तो बोला कि तुमने छोटे भाई को गाड़ी दी है, तो मुझे भी दो। समझे आप? मेरे जीते जी मेरे पैसे पर अपना हक जता रहा है और मुझे नैतिकता सिखा रहा है!’’


‘‘फिर आपने क्या सोचा?’’

‘‘मैंने तो साफ कह दिया कि जब तक जिंदा हूँ, मेरी मर्जी कि मैं अपने पैसे का क्या करूँ। मुझे तेरी कार नहीं चाहिए। वैसे ही हमारे घर में चार कारें होने से पार्किंग की ऐसी प्रॉब्लम पैदा हो गयी है कि आये दिन पड़ोसियों से झगड़े होने लगे हैं। मुझे तो डर लगता है। आजकल ऐसे झगड़ों में गोलियाँ तक चल जाती हैं।’’


‘‘वैसे गाड़ी न रखना अच्छा ही है। अब दिल्ली में ड्राइव करना टेंशन और परेशानी मोल लेने के सिवा कुछ नहीं। बाहर देखिए, सड़क पर कितनी गाड़ियाँ हैं और दौड़ने के बजाय कैसे रेंग रही हैं।’’

‘‘वाकई हद हो गयी है। अब तो कारों की खरीद-बिक्री पर कोई रोक लगनी ही चाहिए।’’

‘‘जी, हाँ, अब उससे कार कंपनियों के अलावा किसी को कोई फायदा नहीं।’’

‘‘फायदा? कहिए कि नुकसान ही नुकसान है। एक तरफ तो बेशुमार पैसे और पेट्रोल की बर्बादी और दूसरी तरफ पॉल्यूशन, क्राइम और करप्शन में दिन दूनी बढ़ोतरी!’’

‘‘बिलकुल सही कहा आपने। कारों के कारण सड़कों पर क्राइम कितना बढ़ गया है!’’

‘‘सही कहने वाले तो बहुत हैं, भाई, पर सुनता कौन है?’’

‘‘क्यों? मैं सुन रहा हूँ। ये भाईसाहब सुन रहे हैं। वो बहनजी सुन रही हैं। कंडक्टर साहब भी सुन रहे हैं। क्यों, कंडक्टर साहब? सुन रहे हैं न?’’

‘‘जी, साहब जी! सब सुन रहे हैं और समझ भी रहे हैं। लेकिन बुरा न मानें तो एक बात कहें? जिनके घरों में चार-चार गाड़ियाँ हैं, पहले उनको ही कुछ सोचना और करना चाहिए।’’

Sunday, March 16, 2014

बाजारूपन के खतरों के बीच एक अलग पगडंडी की खोज : राजेश जोशी

'समावर्तन' के मार्च, 2014 के अंक में राजेश जोशी ने मेरी आत्मकथात्मक पुस्तक 'मेरा मुझ में कुछ नहीं' पर जो लिखा है, वह मैं यहाँ साझा कर रहा हूँ.--रमेश उपाध्याय 

 


'मेरा मुझ में कुछ नहीं' को पढ़ते हुए
(कुछ टूटी-बिखरी-सी टीपें)
राजेश जोशी 




‘मेरा मुझ में कुछ नहीं’ को पढ़ते हुए लगता है, जैसे रमेश उपाध्याय ने समानांतर चलती तीन समवर्ती प्रक्रियाओं को बिना किसी अतिरिक्त बलाघात के सहजता के साथ इसमें दर्ज कर दिया है। इस महाजीवन के बीच उम्र के फासलों को नापते हुए एक व्यक्ति के बनने की प्रक्रिया, व्यक्ति के रचनाकार बनने की प्रक्रिया और रचना के बनने की प्रक्रिया। आत्मकथात्मक अंश हों या जीवन, समाज और साहित्य के सवालों से जूझते विमर्श हों, सब एक-दूसरे से गुँथे-बुने हैं। इसलिए किसी भी एक अंश को दूसरे से अलगाकर नहीं देखा जा सकता। अक्षरों, मात्राओं, संयुक्ताक्षर, विरामचिह्न आदि से शब्द और वाक्य बनाते हुए बायें और दायें हाथ के बीच, शब्दों के बीच एक सही-सही स्पेस बनाते हुए गेज नापकर वे पेज बनाते चले गये हैं। बिना किसी प्रसंग को अलग से अंडरलाइन करते हुए भी उन्होंने सारी स्थितियों और वृत्तांतों को डोरी से बाँध दिया है। उन्होंने इसके प्रूफ पढ़कर यहाँ रख दिये हैं। जुजे सरामागु के उपन्यास ‘लिस्बन की घेराबंदी का इतिहास’ का प्रूफ रीडर जैसे अपनी ही आत्मकथा को कंपोज भी कर रहा है और उसका प्रूफ भी पढ़ रहा है। यह एक ऐसी आत्मकथा है, जो आत्मकथा नहीं है। किताब का प्रारंभ ही इस कथन से होता है कि ‘‘मुझे अपने बारे में लिखना-बोलना पसंद है, लेकिन मैं आत्मकथा नहीं लिखना चाहता’’।

आत्मकथात्मक अंशों को भी रमेश उपाध्याय कथात्मक होने से बचाते हैं। उनमें आत्म के विस्तार के कई वृत्तांत हैं, लेकिन उन्हें कथात्मक होने या बनाने से रमेश उपाध्याय बचाते-से लगते हैं। वे आत्मकथा के खतरों के प्रति भी सतर्क हैं और कथा के खतरों के प्रति भी। पहले ही अध्याय में यह आत्मस्वीकृति दर्ज है कि अपने बारे में लिखना-बोलना मुझे पसंद है, लेकिन मैं आत्मकथा नहीं लिखना चाहता। रिचर्ड सेन्नेट की पुस्तक ‘दि फॉल ऑफ पब्लिक मैन’ के एक अंश का उन्होंने हवाला दिया है, जिसमें वह कहता है कि ‘‘वर्तमान ‘पॉपुलर कल्चर’ ने आत्मकथात्मक लेखन को एक बाजारू चीज बना दिया है। इसने सार्वजनिक जीवन को नष्ट कर दिया है और निजी तथा सार्वजनिक के बीच का भेद मिटा दिया है। पहले सार्वजनिक जीवन में सभ्य और शिष्ट आचरण करने वाला व्यक्ति ‘अच्छा’ माना जाता था, जबकि इस संस्कृति के चलते ‘अच्छा’ व्यक्ति वह है, जो सार्वजनिक रूप से (मसलन, टेलीविजन के चैट शो में) सबको सब कुछ बताने को तैयार रहता है। अब लोग ‘सच्चा’ और ‘प्रामाणिक’ उसी व्यक्ति को मानते हैं, जो अंतरंग संबंधों का व्यापार करता हैµयानी अपने निजी जीवन में दूसरों को ताक-झाँक करने की खुली छूट देता है और दूसरों के निजी जीवन में ताक-झाँक करके उसकी ‘प्रामाणिक सूचना’ बाजार में बेचने का काम करता है।’’

रमेश उपाध्याय की यह एक बड़ी खूबी है कि वे अपनी दिक्कतों की बात भी एक बड़े परिप्रेक्ष्य में करते हैं। समस्या सिर्फ खुद के द्वारा आत्मकथा लिखने तक सीमित नहीं है, सवाल इस समय में आत्मकथात्मक लेखन के खतरों को समझने का है। यह खतरा सिर्फ आत्मकथा तक महदूद नहीं है, कथा पर भी यह खतरा मँडरा रहा है। कथा और बाजारवाद में टकराव की स्थिति बन रही है। ‘कथा को साहित्य बनाये रखने के लिए’ वाली टिप्पणी में भी इस खतरे की ओर संकेत करते हुए रमेश उपाध्याय ने लिखा है कि ‘‘कथासाहित्य के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ‘कथा’ को ‘साहित्य’ कैसे बनाये रखा जाये। बाजारवाद ने यों तो साहित्य की सभी विधाओं को पण्यवस्तु बना दिया है, लेकिन कहानी को (चाहे वह ‘कहानी’ के रूप में लिखी जाये, या ‘उपन्यास’ के रूप में, या फिल्म और टेलीविजन कार्यक्रमों की पटकथा के रूप में) सबसे ज्यादा बाजारू बनाया है।’’ कथा पर मँडराते इस खतरे से जूझने की एक मुसलसल कोशिश उनके लेखों और टिप्पणियों में हर जगह नजर आती है। इस समय सवाल सेलेब्रिटी बनने से इनकार करके बाजारू लेखन में शामिल होने से इनकार करने का है।

किताब की भूमिका में उन्होंने इस बात से इनकार करते हुए कि वे कोई ‘सेल्फमेड मैन’ हैं, पाओलो फ्रेरे का यह कथन उद्धृत किया है कि ‘‘दुनिया में कोई व्यक्ति अपना निर्माण स्वयं नहीं करता। शहर के जिन कोनों में ‘स्वनिर्मित’ लोग रहते हैं, वहाँ बहुत-से अनाम लोग छिपे रहते हैं।’’ इस पूरी किताब की संरचना को समझने के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना रमेश उपाध्याय के बनने की प्रक्रिया को समझने के लिए। इस किताब में ऐसे अनेक मित्रों, परिचितों और रचनाओं तथा उनके पात्रों का जिक्र आता है, जिन्होंने रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व और उनके रचनाकार के मानस को बनाने में तरह-तरह से अपनी भूमिका अदा की है। 

: दो :

मैं इस किताब का क्रम तैयार कर रहा होता, तो शायद ‘मेरे अध्ययन का विकास-क्रम’ वाले अध्याय को पहले रखना चाहता और ‘अजमेर में पहली बार’ को उसके बाद। यूँ तो जीवनानुभव और जीवन-प्रसंगों के अनेक टुकड़े यहाँ-वहाँ पूरी किताब में ही बिखरे हुए हैं, लेकिन ‘मेरे अध्ययन का विकास-क्रम’ में बचपन की और बाद के जीवन की कुछ मार्मिक छवियाँ थोड़ी कोताही बरतने के बावजूद सिलसिलेवार ढंग से मौजूद हैं। इस किताब को पढ़ते हुए कई बार लगता है कि रमेश उपाध्याय का कहानीकार रमेश और विमर्शकर्ता उपाध्याय जूझते-भिड़ते हुए एक-दूसरे से ज्यादा से ज्यादा जगह हथिया लेने पर आमादा हैं। कथाकार विमर्शकार को धकेलता है, तो विमर्शकार कथाकार की गर्दन नाप लेना चाहता है। इन दोनों की टकराहट से आत्मकथा का पारंपरिक और बाजार में चलने वाला लोकप्रिय ढाँचा जगह-जगह से टूट-फूट जाता है और एक नया स्वरूप आकार लेता दिखता है। शायद यही इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि भी है कि उसने इस समय के बाजारूपन के खतरों के बीच अपने लिए एक अलग पगडंडी खोज ली है, जिससे वह अपने समय के बाजारवाद को चुनौती भी दे सकती है, देती है।

जो हिस्से बचपन या जवानी के वृत्तांतों को सामने रखते हैं, उनमें भी अपने और अपने समय से एक बहस लगातार चलती रहती है। कंपोजीटर बनने और एक कंपोजीटर की तरह काम करने का वृत्तांत बहुत दिलचस्प है। कंप्यूटर और ऑफसेट के समय में जनमे और बड़े हुए पाठकों और लेखकों के लिए यह वृत्तांत महत्त्वपूर्ण होगा। रमेश उपाध्याय ने संक्षेप में ही सही, लेकिन उस पूरी प्रक्रिया को और उसकी पूरी टर्मिनोलॉजी को यहाँ दर्ज कर दिया है। प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में छपाई की उस पुरानी तकनीक की एक बहुत बड़ी भूमिका है। आज भी दुनिया की लाखों महान किताबें उस पुरानी तकनीक से छपी हुई हमारे पास हैं।

रमेश उपाध्याय ने अपने इस अनुभव पर ‘गलत-गलत’ शीर्षक से कहानी भी लिखी है। कहीं यह प्रश्न भी मन में उठता है कि कहानी या उपन्यास भी तो कहीं न कहीं आत्मकथात्मक ही होता है, चाहे अंशतः हो या पूर्णतः, पर होता तो है ही। बल्कि कहा जा सकता है कि पूरा लेखन कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में आत्मकथात्मक होता ही है। अगर रमेश उपाध्याय अपने उन जीवनानुभवों को अपनी कहानियों में लाते हैं, तो फिर आत्मकथा लिखने में क्या हर्ज है? उन्होंने जो खतरे गिनाये हैं, वे खतरे मौजूद हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन बाजार तो कुछ भी बेच सकता है। क्या इसलिए हमें लंबी प्रक्रियाओं से पाये गये अपने फॉर्म्स को बदल देना चाहिए? बाजार से टकराने का क्या कोई और उपाय हम नहीं ईजाद कर सकते? ऐसे कई सवाल मन में उठते हैं, उठ सकते हैं।

‘मेरे अध्ययन का विकास-क्रम’ में पिता की मृत्यु और वापस गाँव लौटने का प्रसंग बहुत मार्मिक है और उसके साथ ही रमेश उपाध्याय का जीवन-संघर्ष शुरू होता है। इस किताब में रमेश उपाध्याय को जानना, बिना किसी अतिशयोक्ति के, एक जीवन-संघर्ष की वृहत् गाथा से गुजरना है। कंपोजीटर बनने, फिर अलग-अलग पत्रिकाओं में साहित्यिक पत्राकारिता करने और वहाँ से अध्यापन की नौकरी तक आने का एक लंबा इतिहास यहाँ टुकड़ों-टुकड़ों में दर्ज है। इसी सब के बीच एक लेखक बनने की प्रक्रिया भी इसमें शामिल है। कहानी लिखने का एक दिलचस्प प्रसंग ‘कैद से निकलने की कोशिश है रचना’ वाले अध्याय में आया है। उनकी कहानी में अंतर्निहित आवेगµजिसकी रास वे अपनी भाषा और कथा-कौशल से एक हद तक हमेशा थामे रखते हैं या कहें कि खींचे रखते हैंµको समझने में यह प्रसंग मदद कर सकता है। इस प्रसंग का एक छोटा-सा हिस्सा है :

‘‘उस जुलूस पर कहानी लिखने के बारे में मैंने बिलकुल नहीं सोचा था। मगर उस दिन, करोल बाग के उस बस-स्टैंड पर बैठे-बैठे अचानक लगा कि उस पर कहानी लिखनी चाहिए। और कहानी लिखने की वह ‘अर्ज’ इतनी जबर्दस्त थी कि मैं उठा, स्टेशनरी की एक दुकान से एक कापी और कलम खरीदी, और वापस बस-स्टैंड पर आकर कहानी लिखने बैठ गया। गर्मियों के दिन थे। बस-स्टैंड के ऊपर एस्बेस्टस की शीट वाला शेड तप रहा था और नीचे तप रही थी सीमेंट से बनी वह पटिया, जिस पर मैं बैठा था। लेकिन परवाह नहीं। मैंने कापी खोलकर घुटनों पर रखी और लिखना शुरू कर दिया।’’

इस प्रसंग से उनकी रचना-प्रक्रिया में स्वतःस्फूर्तता और सामाजिक संघर्षों के प्रति उनके लगाव को समझा जा सकता है।

‘अजमेर में पहली बार’ में मनमोहिनी जी से एकतरफा प्रेम का एक दिलचस्प प्रसंग भी रमेश जी ने बहुत बेबाकी से लिखा है। मैंने रमेश उपाध्याय की कविताएँ कभी नहीं देखीं। जीवन के इस तरह के अनुभव कहीं न कहीं उनकी कविता में शायद ज्यादा मुलायम ढंग से आये हों। यूँ प्रेम-प्रसंग कवियों की संपत्ति नहीं है। इस प्रेम-प्रसंग में और ‘दंडद्वीप’ में क्या संबंध है, यह मुझे इस किताब को पढ़ने के बाद ही मालूम हुआ। ‘दंडद्वीप’ उपन्यास बहुत पहले पढ़ा था। शायद इस रहस्य का पता चलने के बाद उसे दोबारा पढ़ने का कुछ अलग आनंद हो सकता है। प्लेजर ऑफ रीडिंग का एक संबंध कहीं किताब में वर्णित वृत्तांत के पीछे छिपे अनुभव को वास्तविक रूप में जान लेने में भी होता है। किताब के स्रोत जान लेने से धीरे-धीरे किताब के साथ दोस्ती ज्यादा गहरी होती जाती है।

रमेश उपाध्याय की इस किताब में एक अध्याय है ‘साहित्य सृजन और चेतना के स्रोत’। यह अध्याय कई दृष्टियों से बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह अध्याय एक स्तर पर पिछले दो दशकों से चली आती कई बहसों के बारे में बहुत सारी बातों को स्पष्ट कर देता है। इतिहास का अंत, लौंग नाइनटींथ सेंचुरी और दि शॉर्ट ट्वेंटियथ संेचुरी, कींसीय अर्थशास्त्रा, जनतंत्रा को बचाने में साम्यवाद की भूमिका आदि अनेक सवालों को इस छोटे-से व्याख्यान में समेट लिया गया है। इसी अध्याय में हॉब्सबॉम को उद्धृत करते हुए रमेश उपाध्याय का मानना है कि बीसवीं सदी अतीत की दृष्टि से तो अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ही, भविष्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हॉब्सबॉम का कहना है--‘‘हम नहीं जानते कि आगे क्या होगा और तीसरी सहस्राब्दी कैसी होगी, लेकिन वह जैसी भी होगी, इस संक्षिप्त बीसवीं सदी (1914-1991) से ही अपना रूपाकार ग्रहण करेगी।’’

: तीन :

‘मेरी नाट्य-लेखन यात्रा’ में नाट्य-लेखन के क्षेत्रा में रमेश उपाध्याय के कामों का ब्यौरा मौजूद है। उनके अनेक नुक्कड़ नाटकों से मैं परिचित रहा हूँ। लेकिन रेडियो के लिए ध्वनि नाटकों के क्षेत्रा में भी उन्होंने इतना काम किया है, इसकी जानकारी मुझे इस किताब से ही मिली। उन्होंने सेमुअल बैकेट के नाटक ‘वेटिंग फॉर गोदो’ का रूपांतर ‘प्रतीक्षा और प्रतीक्षा’ के नाम से किया और दिलचस्प यह है कि इस नाटक में रमेश उपाध्याय और स्वयं प्रकाश दोनों ने अभिनय भी किया था। ‘पेपरवेट’, ‘सफाई चालू है’ और ‘भारत-भाग्य-विधाता’ नामक मौलिक नाटकों के लेखन के साथ-साथ  अनेक विश्व प्रसिद्ध कहानियों के नाट्य रूपांतर भी उन्होंने किये हैं। इस किताब की एक खूबी यह भी है कि कहीं विस्तार से और कहीं कोताही के साथ रमेश उपाध्याय के सभी पक्ष इस किताब में आ गये हैं।

रमेश उपाध्याय मनचाहे ढंग से मनचाहा काम करना चाहने वाले लेखक हैं। उन्हें अपने कमरे में, अपनी किताबों के बीच, अपनी मेज-कुर्सी पर बैठकर और कमरे का दरवाजा खुला रखकर लिखना प्रिय है। अपने कमरे में जिस कुर्सी पर बैठकर वे लिखते हैं, उसके अलावा किसी और कुर्सी का मोह या चाह उन्हें नहीं है। इस सादगी के साथ ही उनका मानना है और उनका स्वप्न भी है कि ‘‘मार्क्स ने ‘दुनिया के मजदूरो, एक हो!’ का जो नारा दिया था, उसको वास्तविकता में बदलने का समय आ गया है। पूँजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था है, तो समाजवाद भी एक वैश्विक व्यवस्था ही है। अतः स्वाभाविक तर्क यह बनता है कि जब पूँजी का भूमंडलीकरण हो सकता है, तो श्रम का भूमंडलीकरण क्यों नहीं हो सकता? पूँजीवाद सारी दुनिया में फैल सकता है, तो समाजवाद भी सारी दुनिया में फैल सकता है। अतः अब ‘एक देश में समाजवाद’ का सीमित स्वप्न देखने की जगह ‘‘सभी देशों में समाजवाद’’ का असीमित स्वप्न देखने का समय आ गया है।’’ (‘हमारे समय के स्वप्न’)

Wednesday, December 18, 2013

प्रतिसृष्टि

रमेश उपाध्याय की नयी कहानी 

शिखर सुकुमार के नाटक ‘असत्य हरिश्चंद्र’ का विरोध। विरोधियों ने प्रेक्षागृह में घुसकर नारेबाजी, हाथापाई और कुछ तोड़-फोड़ भी की। पुलिस बुलानी पड़ी। गिरफ्तार किये गये लोगों के नेता ने कहा कि इस नाटक में सत्यवादी हरिश्चंद्र का मजाक उड़ाकर भारतीय संस्कृति का अपमान किया गया है। सरकार को इस नाटक पर अविलंब प्रतिबंध लगाना चाहिए।

कल इसी अखबार में नाटक की समीक्षा छपी थी, जिसमें नाटक को ‘‘पौराणिक कथा के ढाँचे में वर्तमान के यथार्थ को हास्य-व्यंग्य की शैली में मनोरंजक ढंग से सामने लाने वाला नाटक’’ बताते हुए लेखक की प्रशंसा की गयी थी कि ‘‘शिखर सुकुमार एक दलित लेखक होने के बावजूद वेदों और पुराणों के अध्येता तथा संस्कृत नाटकों और महाकाव्यों के मर्मज्ञ हैं’’। लेकिन आज उस पर ‘‘अविलंब प्रतिबंध’’ लगाने की माँग करने वाले समाचार के साथ-साथ ‘बॉक्स आइटम’ बनाकर बड़े ध्यानाकर्षक ढंग से यह भी छापा गया था कि ‘‘दलित लेखकों ने पल्ला झाड़ा: शिखर सुकुमार को ब्राह्मणवादी लेखक बताया’’।

रविवार की छुट्टी का दिन था। सुबह के आठ बज चुके थे, लेकिन जय और विजय अभी तक अपने कमरे में सोये पड़े थे। मैं और प्रभा सुबह की ताजी हवा और खुशनुमा धूप का आनंद लेते हुए बालकनी में बैठे चाय पी रहे थे और अखबार पढ़ रहे थे। मैंने हिंदी अखबार में छपा समाचार पढ़कर प्रभा से कहा, ‘‘देखना, सुकुमार जी के नाटक के बारे में अंग्रेजी में भी कुछ छपा है क्या?’’

‘‘क्यों, क्या हो गया?’’ पूछकर प्रभा अंग्रेजी अखबार के पन्ने पलटने लगी और अगले ही क्षण चौंककर बोली, ‘‘हें, यह क्या?’’

अंग्रेजी अखबार में भी प्रदर्शनकारियों को पकड़कर ले जाती पुलिस का वैसा ही चित्र छपा था, लेकिन समाचार कुछ भिन्न था। विरोध-प्रदर्शन करने वालों के द्वारा नाटक पर प्रतिबंध लगाने की माँग की खबर तो थी, लेकिन दलित लेखकों द्वारा शिखर सुकुमार को ब्राह्मणवादी लेखक बताये जाने की खबर उसमें नहीं थी। हाँ, उसमें नाटक की सराहना उसे ‘‘पुरानी कहानी का नया कॉमिक रूप’’ और ‘‘हिलेरियस कॉमेडी’’ बताते हुए अलग से की गयी थी।

मैंने शिखर सुकुमार को फोन करने के लिए मोबाइल उठाया, लेकिन नंबर मिलाने के पहले ही वह बजने लगा।
रामाधार ठाकुर का फोन था। एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित पत्रिका के प्रधान संपादक रामाधार ठाकुर का, जो पत्रकार ही नहीं, प्रसिद्ध साहित्यकार भी हैं।

‘‘अहा, रामाधार जी, नमस्कार! कहिए, सुबह-सुबह कैसे याद किया?’’

‘‘चंडीप्रसाद जी, आपसे एक निवेदन करना था।’’

‘‘आज्ञा कीजिए।’’

‘‘क्या बात करते हैं! आप इतने बड़े लेखक हैं, उम्र में भी मुझसे बड़े हैं, मैं आपको आज्ञा दूँगा?’’

‘‘फिर भी। आप संपादक ठहरे और मैं लेखक!’’ मैंने हँसते हुए कहा।

लेकिन रामाधार ठाकुर विनम्रता के साथ बोले, ‘‘आपको पता नहीं, चंडीप्रसाद जी, मैं आपका पुराना पाठक और प्रशंसक हूँ। आपकी पुस्तक ‘शिखर सुकुमार: एक औघड़ साहित्यकार’ मैंने खरीदकर पढ़ी थी और वह आज भी मेरे पास है। सुकुमार जी मेरे प्रिय लेखक हैं और आपने उन पर इतनी अच्छी किताब लिखी है, इसलिए आप भी मेरे प्रिय लेखक हैं...’’

‘‘मैं भी आपका प्रशंसक हूँ, रामाधार जी! आपके पत्रकार और साहित्यकार दोनों रूपों का। खैर, बताइए, क्या बात है?’’

‘‘सुकुमार जी का नया नाटक ‘असत्य हरिश्चंद्र’ आपने देख लिया होगा...?’’

‘‘अभी नहीं देखा, लेकिन देखना है।’’

‘‘तब तो मेरा निवेदन है कि आप उसे आज ही देख लें। उस पर कुछ विवाद छिड़ गया है।’’

‘‘हाँ, मैंने अभी-अभी अखबार में पढ़ा...लेकिन कारण समझ में नहीं आया। किस्सा क्या है?’’

‘‘कल का किस्सा तो इतना ही है कि शाम के शो में कुछ उपद्रवी लोगों ने हॉल में घुसकर नाटक बंद कराने की कोशिश की। मौके पर पहुँची पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। दर्शकों के हित में अच्छी बात यह रही कि तकरीबन आधे घंटे के इस व्यवधान के बावजूद वे पूरा नाटक देख पाये। लेकिन आज क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। हो सकता है, आज और आगे के शो कैंसिल हो जायें, या नाटक पर प्रतिबंध ही लग जाये। इसलिए मेरा निवेदन है कि आप आज ही और पहला ही शो देख लें और हमारी पत्रिका के लिए उसकी समीक्षा लिख दें।’’

‘‘ठीक है, मैं आज ही देख लूँगा।’’ मैंने कहा, ‘‘समीक्षा कब तक लिखकर देनी होगी?’’

‘‘पत्रिका, आप जानते हैं, पाक्षिक है। अगला अंक आने में अभी दस दिन हैं। इसलिए आप आराम से एक सप्ताह का समय ले सकते हैं। बाकी टिकट वगैरह की चिंता आप न करें। दफ्तर की गाड़ी आपको लेने आ जायेगी और शो के बाद आपको वापस घर पहुँचा देगी। गाड़ी में ड्राइवर के अलावा दो लोग और रहेंगेµएक रिपोर्टर, एक फोटोग्राफर। अगर कोई गड़बड़ी हुई, तो वे एक तरह से आपके अंगरक्षक भी होंगे।’’

‘‘क्या इतना खतरा है?’’

‘‘घबराइए नहीं। मजाक कर रहा हूँ। मामला मीडिया में उछल गया है, इसलिए फुटेज चाहने वाले नेता लोग विरोध-प्रदर्शन तो जरूर करेंगे। लेकिन पुलिस का बंदोबस्त भी तगड़ा होगा। लगता तो नहीं कि कोई गड़बड़ी होगी, फिर भी सावधानी तो हमें बरतनी ही चाहिए। आप नि¯श्चत रहें, आपकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है। बस, दुआ करें कि आज का पहला शो कैंसिल न हो। छुट्टी का दिन है। आप घर पर ही रहें। शो तीन बजे शुरू होगा, गाड़ी दो बजे आपके घर पहुँच जायेगी। ठीक है?’’

‘‘जी, रामाधार जी, ठीक है। मैं दो बजे तैयार मिलूँगा।’’

खतरे वाली बात सुनकर प्रभा चौकन्नी हो गयी थी। मैंने ज्यों ही फोन रखा, उसने पूछा, ‘‘क्या बात है? कहाँ जाना है?’’

मैंने पूरी बात उसे बता दी। उपद्रव की आशंका और अंगरक्षकों वाली बात सुनकर वह डर गयी। बोली, ‘‘कोई जरूरत नहीं इस तरह जान जोखिम में डालने की! फौरन फोन उठाओ और मना कर दो।’’

मैंने चाय की एक चुस्की ली, प्याला नीचे रखा और फोन उठा लिया। प्रभा मुझे अपने आदेश का पालन करते देख संतुष्ट-सी होकर बच्चों को जगाने चली गयी। लेकिन मैंने रामाधार ठाकुर का नहीं, शिखर सुकुमार का नंबर मिलाया।

अपने फोन पर मेरा नंबर देखते ही उन्होंने कहा, ‘‘हाँ, चंडीप्रसाद! कैसे हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूँ, गुरुजी, लेकिन आपने यह क्या बवाल खड़ा कर दिया?’’

‘‘सवाल उठेंगे, तो बवाल भी खड़े होंगे।’’ कहकर उन्होंने ठहाका लगाया।

‘‘ऐसा क्या सवाल उठा दिया आपने?’’

‘‘इसका मतलब है, तुमने नाटक अभी तक देखा नहीं है!’’

‘‘आज जा रहा हूँ देखने। पहला ही शो।’’

‘‘तो ठीक है, नाटक देखने के बाद बात करना। मैं वहीं मिलूँगा।’’ कहकर उन्होंने फोन काट दिया।

प्रभा बच्चों के कमरे से निकलकर रसोईघर की तरफ जा रही थी, लेकिन उसके कान शायद मेरी तरफ ही लगे हुए थे। शिखर सुकुमार से बात करके ज्यों ही मैंने फोन रखा, उसने ठिठककर पूछा, ‘‘मना कर दिया न?’’

मैंने झूठ बोला, ‘‘वे नहीं मान रहे। नाटक देखने जाना ही पड़ेगा।’’

प्रभा कुछ और कहे, इसके पहले ही मैंने कहा, ‘‘डरो मत। दो अंगरक्षक मेरे साथ रहेंगे। मामला मीडिया में उछल गया है, इसलिए प्रशासन भी चुस्त हो गया होगा। वहाँ पुलिस का अच्छा बंदोबस्त होगा। डरने की कोई बात नहीं है।’’

‘‘मेरी कोई बात मत सुनना!’’ प्रभा ने गुस्से में पैर पटककर जाते हुए कहा, ‘‘हमेशा अपने ही मन की करना!’’

उसके जाते ही बड़े बेटे जय ने आकर मुझसे पूछा, ‘‘पापा, आप हमारे साथ टी.वी. देखेंगे या घूमने जायेंगे?’’

रविवार की सुबह जय और विजय दोनों नियम से टी.वी. देखते हैं। प्रभा नाश्ते और दोपहर के खाने की तैयारी में लगती है और मैं कभी बाहर घूमने चला जाता हूँ, कभी बच्चों के साथ टी.वी. देखने बैठ जाता हूँ।

‘‘तुम लोग देखो, मैं तो आज घूमने जाऊँगा।’’ मैंने अपनी चाय खत्म की और अपने ही बनाये नियम के अनुसार अपना जूठा प्याला स्वयं धोकर रखने के लिए रसोईघर में जा पहुँचा।

प्रभा की नाराजगी दूर करने के लिए मैंने कहा, ‘‘घूमने जा रहा हूँ। बाजार से कुछ लाना है?’’

प्रभा ने उत्तर नहीं दिया, तो मैंने पीछे से उसके कंधों पर दोनों हाथ रखते हुए कहा, ‘‘गुस्सा मत करो। नि¯श्चत रहो, मुझे कुछ नहीं होगा। यह सोचो कि तुम्हारा पति अचानक कैसा वी.आइ.पी. बन गया है! इतना बड़ा संपादक खुद फोन करके अपनी पत्रिका में लिखने के लिए कह रहा है। आने-जाने के लिए गाड़ी भेज रहा है। साथ में दो अंगरक्षक भी। कभी सुने हैं किसी हिंदी लेखक के ऐसे ठाठ? फिर, शिखर सुकुमार के नाटक पर लिखने का अवसर मिल रहा है। सो भी एक विवादास्पद नाटक पर लिखने का अवसर। नाटक तो चर्चित होगा ही, लगे हाथ नाट्य समीक्षक के भी चर्चित हो जाने का अच्छा अवसर है!’’

‘‘तो ठीक है! जाओ, बनो अवसरवादी, हमें क्या!’’ प्रभा ने अपने कंधों पर से मेरे हाथ हटाते हुए कहा। उसके स्वर और स्पर्श से मैं समझ गया कि उसकी नाराजगी दूर हो गयी है।




पब्लिक पार्क में घूमते समय मैं सोचता रहा कि शिखर सुकुमार ने आखिर ऐसा क्या लिख दिया होगा, जिस पर इतना बखेड़ा खड़ा हो गया है। अचानक मुझे उनकी एक बात और उनसे अपनी पहली मुलाकात याद आ गयी।

यह तब की बात है, जब मैंने पीएच.डी. के लिए अपना शोधकार्य शिखर सुकुमार के नाटकों पर करने का निश्चय किया था। संयोग से मेरे शोध निर्देशक प्रोफेसर डी.के. राय भी शिखर सुकुमार के मित्र और प्रशंसक थे। उन्होंने मुझसे कहा कि काम शुरू करने से पहले उनके नाटकों को अच्छी तरह पढ़ लो और एक बार उनसे मिल भी लो। मैंने प्रोफेसर राय को बताया कि सुकुमार जी के तीनों नाटक मैं पढ़ चुका हूँ और पढ़कर बहुत प्रभावित हुआ हूँ, तो उन्होंने प्रसन्न होकर अपने मित्र का फोन मिलाकर कहा, ‘‘सुुकुमार, मेरे एक शोधछात्र चंडीप्रसाद तुम्हारे नाटकों पर काम कर रहे हैं। वे तुमसे मिलना चाहते हैं। उन्हें तुम्हारे पास कब भेजूँ?’’

निर्धारित तिथि और समय पर मैं सुकुमार से मिलने गया, तो मन में एक भय-सा था। इतने बड़े साहित्यकार हैं, मुझसे उन्होंने कुछ पूछा और मैं जवाब न दे पाया, तो? कहीं मुझे डाँटकर भगा न दें। इसलिए जब मैंने उनके दरवाजे की घंटी बजायी, तो घंटी के स्विच पर मेरी उँगली काँप रही थी।

एक अधेड़ आदमी ने दरवाजा खोला, जो नीले चारखाने की लुंगी और सफेद बनियान पहने हुए था। साँवले रंग के, स्वस्थ शरीर वाले, लंबे कद के उस आदमी के सिर के खिचड़ी बालों में से गंजापन दिख रहा था। मुझे उसका चौड़ा माथा गंजेपन में जा मिलने से कुछ ज्यादा ही चौड़ा लगा। ठक् से मेरी चेतना में कहीं पढ़ा हुआ एक शब्द आ टकरायाµप्रशस्त ललाट! मैंने देखा, उस आदमी की दाढ़ी-मूँछ सफाचट थीं और काले रंग के मोटे फ्रेम के चश्मे में से उसकी छोटी-छोटी पैनी आँखें मुझसे पूछ रही थीं--कहिए?

‘‘सर, मैं चंडीप्रसाद पंडित, मुझे...’’

‘‘आइए, आइए। देवेंद्र ने, मतलब आपके प्रोफेसर डी.के. राय ने आपको भेजा है न?’’

‘‘जी, सर!’’ कहते हुए मैं उनके पैर छूने के लिए झुका।

‘‘नहीं-नहीं।’’ कहते हुए शिखर सुकुमार पीछे हट गये, ‘‘मैं पैर छूना-छुआना पसंद नहीं करता।’’ फिर मुझे सोफे पर बैठने के लिए कहकर मेरे सामने बैठते हुए उन्होंने व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ कहा, ‘‘वैसे भी मैं शूद्र, आप ब्राह्मण। आप से पैर छुआकर मैं नरक में जाऊँ न जाऊँ, आपका धर्म तो भ्रष्ट हो ही जायेगा न!’’

‘‘क्षमा करें, सर, आपके नाटकों को पढ़कर तो लगता है कि आप जात-पाँत और छुआछूत कुछ नहीं मानते। आप साहित्यकार हैं, मेरे गुरुजी के मित्र हैं, गुरु समान हैं, आपके पैर छूना मेरा धर्म है। और जहाँ तक स्वर्ग और नरक में जाने की बात है, आपने अपने नाटक ‘देवासुर संग्राम’ में लिखा है कि ये तो कपोल कल्पनाएँ हैं। स्वर्ग राजा द्वारा प्रजा को लुभाने के लिए दिखाये जाने वाले सब्जबाग की कल्पना है और नरक उसे डराने के लिए दिखाये जाने वाले यातनागृह की कल्पना!’’

‘‘अरे वाह! लगता है, आप खासी तैयारी करके मुझसे मिलने आये हैं!’’ सुकुमार प्रसन्न होकर हँसते हुए बोले, ‘‘देवेंद्र ने मुझे बता दिया था कि आप वामपंथी छात्र संगठन में सक्रिय रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि वामपंथी लोग जात-पाँत नहीं मानते। लेकिन मैं ऐसे कई वामपंथियों को जानता हूँ, जो बातों में मार्क्सवादी और व्यवहार में ब्राह्मणवादी होते हैं। इसलिए मैंने सोचा कि पानी पिलाने से पहले आपको अपनी जात बता दूँ!’’

‘‘तो पहले पानी ही पिला दीजिए, सर! बस स्टैंड से आपके घर का पता पूछता पैदल चला आ रहा हूँ और बाहर बड़ी तेज धूप और गर्मी पड़ रही है।’’

‘‘अभी लाया।’’ कहकर सुकुमार घर के अंदर चले गये।

जब तक वे पानी लेकर आये, मैं उनकी बैठक को देखता रहा। एक तरफ सोफा सेट। दूसरी तरफ डाइनिंग टेबल। एक कोने में टेलीफोन। दूसरे कोने में टेलीविजन। एक दीवार में बनी बड़ी खिड़की के बंद शीशों के पार धूप में चमकते नीम और जामुन के पेड़। दूसरी लंबी दीवार पर लेटे हुए बुद्ध की विशाल प्रतिमा का बहुत बड़ा फोटोग्राफ। सोफों के बीच छोटी मेज की शीशे वाली टॉप पर खुली हुई मगर औंधाकर रखी हुई एक पुस्तक, जिसके नीले आवरण पर छपा नाम पढ़ने में आ रहा था--‘सोशल मूवमेंट्स इन इंडिया’। कमरे में ए.सी. की ठंडक थी, लेकिन ए.सी. कहीं दिखायी नहीं दे रहा था।

थोड़ी देर बाद सुकुमार अंदर आये। उनके एक हाथ में पानी का गिलास था और दूसरे में फ्रिज से निकाली गयी ठंडे पानी की बोतल। पीछे-पीछे एक ट्रे में लाल शर्बत के चार गिलास लिये उनकी पत्नी दमयंती जी आयीं और उनके पीछे मिठाई और नमकीन की ट्रे उठाये उनका युवा बेटा अतुल।

बातों-बातों में पता चला कि दमयंती जी एक सरकारी दफ्तर में बड़ी अधिकारी हैं और अतुल दिल्ली विश्वविद्यालय में एम.ए. मनोविज्ञान का छात्र। सुकुमार कोई नौकरी नहीं करते, ‘शिखर’ नामक अपनी एक नाट्य संस्था चलाते हैं और उसकी गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। आज छुट्टी का दिन होने से तीनों एक साथ दोपहर के समय घर में हैं, अन्यथा इस समय घर अक्सर बंद ही रहता है।

फिर जब बातों का सिलसिला शुरू हुआ, तो दोपहर के भोजन के समय तक चलता चला गया। मेरे बहुत ना-ना करने पर भी सुकुमार ने, और उनसे भी अधिक दमयंती जी ने, आग्रहपूर्वक मुझे अपने साथ बिठाकर भोजन कराया। भोजन करते समय मैंने मजाक में कहा, ‘‘आज तो आप लोगों ने एक ब्राह्मण का धर्म पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया!’’

‘‘लेकिन सावधान!’’ दमयंती जी ने अपने पति की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘‘ये कहीं आपकी बुद्धि भी भ्रष्ट न कर दें! ये अपने ढंग के एक ही हैं। जहाँ लाभ की संभावना हो, वहाँ नहीं जायेंगे; लेकिन जहाँ हानि की आशंका हो, वहाँ जरूर जायेंगे! दलित हैं, लेकिन आरक्षण के विरोधी हैं। खुद तो आरक्षण का कभी कोई लाभ नहीं ही उठाया, अतुल को भी नहीं उठाने दिया। अपनी तरह इसे भी जनरल कैटेगरी में डाल रखा है। मेरी पढ़ाई, नौकरी और पदोन्नति आरक्षण के आधार पर हुई है, सो मुझे कोटे वाली कहकर चिढ़ाते रहते हैं। नाटक ऐसे लिखते हैं कि विरोध हो, बवाल मचे, प्रशंसा की जगह इनकी पिटाई हो! दूसरे लोग पैसा कमाने और पुरस्कार वगैरह पाने के लिए थियेटर करते हैं। इन्होंने अपनी संस्था के लिए किसी भी तरह की फंडिंग लेने से इनकार कर रखा है!’’

सुकुमार ने उनकी बात का उत्तर एक हल्की हँसी से देकर मुझसे कहा, ‘‘निंदक नियरे राखिए!’’

हँसी-खुशी भोजन समाप्त हुआ, तो दमयंती जी और अतुल अपने-अपने कमरे में आराम करने चले गये। बैठक में सुकुमार और मैं ही रह गये, तो उन्होंने हिंदी में होने वाले शोधकार्यों का मजाक-सा उड़ाते हुए कहा, ‘‘हाँ, भई, अब बताइए, क्या खोजना चाहते हैं आप मेरे नाटकों में?’’

‘‘सर, मेरे शोध का विषय है ‘शिखर सुकुमार के नाटकों में पौराणिक मिथकों का उपयोग’।’’

‘‘सिरे से गलत!’’ उन्होंने हँसते हुए कहा। लेकिन अगले ही क्षण गंभीर होकर बोले, ‘‘मैं अपने नाटकों में मिथकों का उपयोग नहीं करता, बल्कि उन्हें तोड़ने का काम करता हूँ। मिथक समाज की किसी व्यवस्था को बनाये रखने के लिए गढ़े और बनाये रखे जाते हैं। यथास्थितिवादी साहित्य में मिथकों का उपयोग इसी उद्देश्य से किया जाता है। लेकिन समाज की व्यवस्था में बदलाव चाहने वाले यथार्थवादी साहित्य में बने-बनाये मिथकों को तोड़ा जाता है। मसलन, अपने नाटक ‘आरण्यक’ में मैंने राम के ईश्वरीय मिथक को तोड़ा है। मैंने राम को साधारण मनुष्य बना दिया है। राम उसमें जंगलों को जलाकर कृषि योग्य भूमि पाना चाहने वाली कृषि-आधारित सामाजिक व्यवस्था का नायक है, जबकि रावण जंगलों में रहने वाली आदिवासी जनजातियों का नायक। एक पक्ष को जंगल जलाकर खेती के लिए जमीन चाहिए, तो दूसरे पक्ष के लिए जंगल ही जीवन का आधार है। यही है राम-रावण युद्ध का कारण। राम का पक्ष प्रबल है, क्योंकि उसमें जंगल में रहने वाली जनजातियों को ही नहीं, रावण के भाई विभीषण तक को अपने पक्ष में मिला लेने की और शत्रु पक्ष को कमजोर कर देने की क्षमता है। राम के पास अपनी कोई सेना नहीं थी। जंगल के मूल निवासियों को संगठित करके उसने अपनी सेना बनायी, जो रावण की सेना पर भारी पड़ी। इस प्रकार मैंने राम-रावण युद्ध को पौराणिक संदर्भ से निकालकर ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ दिया है।’’

‘‘ऐतिहासिक संदर्भ?’’ मैंने चकित होकर पूछा।

‘‘कैसे वामपंथी हो, भाई? मोड ऑफ प्रोडक्शन जानते हो न? उत्पादन का तरीका! राम-रावण का युद्ध उत्पादन के दो तरीकों की लड़ाई है। पुराना तरीका है जंगलों में रहकर शिकार और आहार संग्रह करना। नया तरीका है जंगल जलाकर खेती करना। पुराने तरीके पर नये तरीके की विजय होती है। यह ऐतिहासिक संदर्भ है। समझे?’’

मेरे लिए यह व्याख्या बिलकुल नयी थी, जिसे मैं समझ नहीं पाया था, इसलिए मैंने नासमझी के साथ कहा, ‘‘जी!’’

सुकुमार हँस पड़े, ‘‘वाह! जो बात मेरी समझ में दसियों साल इतिहास-पुराण खँगालने पर आयी, उसे आप दो मिनट में समझ गये? घर जाइए, मेरे नाटक को फिर से पढ़िए, नये सिरे से उस पर सोचिए, तब फिर आकर बताइए कि क्या समझे!’’

मैं उठ खड़ा हुआ, लेकिन चलते-चलते ठिठककर मैंने पूछा, ‘‘मगर, सर, मेरे शोध का विषय तो आपके नाटकों में पौराणिक मिथकों का ‘उपयोग’ है। उसमें मिथकों को ‘तोड़ने’ की बात कैसे...?’’

‘‘यह आपकी समस्या है। एक लेखक के रूप में मेरा कहना यह है कि अगर आप किसी नये या पुराने मिथक को ध्वस्त नहीं कर सकते, तो आप सृजनशील लेखक नहीं हैं; क्योंकि सृजन का तो अर्थ ही है पुराने का ध्वंस और नये का निर्माण!’’



धूप तेज होने लगी थी। मैंने पब्लिक पार्क से निकलकर घर की ओर कदम बढ़ाये ही थे कि सड़क पर पत्रकार प्रभात अपनी कार में जाते दिखायी दिये। उन्होंने शायद मुझे नहीं देखा और मैं उनकी ओर अभिवादन में हाथ हिलाता रह गया।

उन्हें देखकर मुझे सुकुमार के नाटक ‘आरण्यक’ पर हुए हिंसक विवाद की याद आ गयी। ‘आरण्यक’ के प्रदर्शन बरसों से होते आ रहे थे, लेकिन उस बार उसके शो फिर से शुरू किये गये, तो न जाने कैसे भारतीय संस्कृति की रक्षा के कुछ ठेकेदारों की भावनाएँ भड़क गयी थीं और उन्होंने सुकुमार पर लगभग जानलेवा हमला करके उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया था। इलाज कराने के लिए सुकुमार को कई दिन तक एक अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में कमरा लेकर रहना पड़ा था। जब अतुल को कॉलेज और दमयंती जी को अपने दफ्तर जाना होता, तो मैं अस्पताल जाकर उनकी देखभाल किया करता था।

एक दिन प्रभात सुकुमार का साक्षात्कार लेने आये थे। सुकुमार के शरीर पर पट्टियाँ बँधी हुई थीं। वे बिस्तर पर तकियों के सहारे अधलेटे-से बैठे थे। उनके सिरहाने की तरफ रखी कुर्सी पर बैठे प्रभात ने टेपरिकॉर्डर चालू करके अपने और उनके बीच रख दिया था। बातचीत कुछ-कुछ इस तरह हुई थी :

प्रभात: लोग कह रहे हैं कि आप पर जो हमला हुआ, उसके लिए आप स्वयं ही जिम्मेदार हैं।

सुकुमार: जाहिर है कि मैं ही जिम्मेदार हूँ।

प्रभात: यानी हमला हुआ तो ठीक हुआ? हमलावर सही थे?

सुकुमार: मैं ठीक-बेठीक और सही-गलत की बात नहीं कर रहा हूँ। इसका फैसला तो मेरे नाटक के दर्शकों, समीक्षकों और आप पत्रकार लोगों को करना है। या फिर कोर्ट-कचहरी वालों को। मैं केवल यह कह रहा हूँ कि मैंने नाटक में जो लिखा है, पूरे होशो-हवास में और अपने विचार से बिलकुल ठीक मानते हुए लिखा है। हमले से डरकर मैं उसे बदलने वाला या उसके लिए पछताने वाला नहीं हूँ।

प्रभात: लेकिन आप पर आरोप है कि ‘आरण्यक’ में आपने रामकथा को बिलकुल बदल दिया है। राम को ईश्वर से साधारण मनुष्य बना दिया है।

सुकुमार: इसमें आरोप क्या है? यह तो सच है। मैंने ऐसा ही किया है और जान-बूझकर किया है।

प्रभात: लेकिन अगर इससे राम को भगवान मानने वालों की भावनाएँ आहत होती हैं, तो?

सुकुमार: तो क्या? उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति को आप मेरे शरीर पर लगी चोटों के रूप में देख ही रहे हैं।

प्रभात: अर्थात् जन-भावनाओं का आदर करते हुए आप अपने नाटक में कोई परिवर्तन करने को तैयार नहीं हैं?

सुकुमार: जी, नहीं। राम हजारों साल से साहित्य में चित्रित होते आ रहे एक चरित्र हैं। हर साहित्यकार उन्हें अपने ढंग से चित्रित करता है। मैंने भी यही किया है। और यह मेरा अधिकार है। आपको शायद मालूम होगा कि रामकथा कोई एक ही या एक-सी चीज नहीं है। उसके विभिन्न रूप हैं और उसमें रामकथा की घटनाएँ और पात्र विभिन्न रूपों में चित्रित हुए हैं।

प्रभात: अच्छा, आप दलित होते हुए भी पौराणिक विषयों पर क्यों लिखते हैं?

सुकुमार: क्या किसी दलित को पौराणिक विषयों पर लिखने का अधिकार नहीं है?

प्रभात: इन विषयों पर लिखने के कारण दलित लेखक आपको दलित नहीं, ब्राह्मणवादी लेखक मानते हैं।

सुकुमार: यह उनकी समस्या है।

प्रभात: आप पर इतना भयानक हमला हुआ और दलित लेखक आपके समर्थन में खड़े नहीं हुए, इसकी वजह क्या आपका ब्राह्मणवादी होना नहीं है?

सुकुमार: मैं नहीं जानता।

प्रभात: लेकिन जो लोग आपको अच्छी तरह जानते हैं...

सुकुमार: वे कौन हैं, जो मुझे अच्छी तरह जानते हैं? अच्छी तरह जानने का मतलब होता है पूरी तरह जानना। किसी को अच्छी तरह जानने का दावा करने वालों के पास उसके बारे में अक्सर बहुत कम और आधी-अधूरी जानकारी होती है। अब, अगर कोई गीली मिट्टी हाथों में लेकर उसका एक गोला बनाये और आपसे कहे कि यह पृथ्वी है और मैं इसे अच्छी तरह जानता या जानती हूँ, तो क्या आप मान लेंगे कि मिट्टी का वह गोला सचमुच पृथ्वी है और उस व्यक्ति का उसे जानने का दावा सही है?

प्रभात: आप तो बाल की खाल निकालने लगे!

सुकुमार: नहीं, मैं आपसे एक ठोस प्रश्न पूछ रहा हूँ। अपने हाथों बनाये मिट्टी के गोले को पृथ्वी बताने वाला आदमी क्या सचमुच पृथ्वी को जानता है? क्या बड़े से बड़ा भूगोलवेत्ता, खगोलवेत्ता और भूगर्भवेत्ता भी यह दावा कर सकता है कि वह पृथ्वी को पूरी तरह जानता है? पृथ्वी की बात छोड़िए, आप अपने हाथों बनाये मिट्टी के गोले के बारे में ही कितना जानते हैं? उसमें कौन-सी मिट्टी है और किस प्रकार की? उसमें कितने कण हैं और कितने अणु-परमाणु? उसमें कितने ठोस, द्रव और गैसीय तत्त्व हैं? उसमें कौन-कौन-से भौतिक, जैविक और रासायनिक पदार्थ हैं?

प्रभात: यह कुतर्क है, जिसके सहारे आप बातचीत से बचना या साक्षात्कार से इनकार करना चाह रहे हैं। आपके इस कुतर्क को ही आगे बढ़ाते हुए कहूँ, तो क्या पृथ्वी स्वयं को जानती है? या मिट्टी का एक गोला ही स्वयं को जानता है?

सुकुमार: पता नहीं, लेकिन मैंने पृथ्वी को या मिट्टी के किसी गोले को स्वयं को अच्छी तरह जानने का दावा करते नहीं देखा। हम पृथ्वी को पृथ्वी और ढेले को ढेला कहते हैं। लेकिन क्या हम जानते हैं कि पृथ्वी स्वयं को पृथ्वी मानती है या ढेला स्वयं को ढेला मानता है?

प्रभात: अच्छा, आप बताइए, आप खुद को क्या मानते हैं?

सुकुमार: एक लेखक, एक नाटककार।

प्रभात: सफल या असफल?

सुकुमार: पता नहीं।

प्रभात: आप स्वयं को किसी भी प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ से बाहर क्यों कहते हैं?

सुकुमार: इसलिए कि मैं सचमुच किसी दौड़ में शामिल नहीं हूँ।

प्रभात: अच्छा, आपके प्रशंसक भी आपको औघड़ साहित्यकार कहते हैं। क्या यह आपको ठीक लगता है?

सुकुमार: ठीक? मैं तो यह भी नहीं जानता कि औघड़ शब्द का अर्थ क्या होता है!

मेरे सामने हुई इस बातचीत के वर्षों बाद जब मैं अपनी पहली पुस्तक ‘शिखर सुकुमार : एक औघड़ साहित्यकार’ की पहली प्रति भेंट करने गया था, तब मुझसे भी उन्होंने व्यंग्यपूर्वक मुस्कराते हुए पूछा था, ‘‘औघड़ का क्या अर्थ होता है?’’

और मैंने उनसे पूछा था, ‘‘सर, धृष्टता क्षमा करें, कई बार जी में आया कि आपसे आपके नाम के बारे में पूछूँ। यह नाम आपने स्वयं रखा है या...?’’

‘‘पहला आधा मेरे पिता का रखा हुआ है और दूसरा आधा मैंने खुद रखा है। वैसे मेरा नाम था शिखर दुसाध। दुसाध जाति का होने के कारण। लेकिन वेद, पुराण और संस्कृत साहित्य के आधुनिक व्याख्याकार मेरे गुरु कमलाकर जी ने मुझे पढ़ाना शुरू करते ही मेरा नाम बदल दिया। दुसाध की जगह दुस्साध्य। मुझे न दुसाध पसंद था न दुस्साध्य। किसी ने उसके बदले सुसाध्य सुझाया, लेकिन वह तो मुझे और भी खराब लगा। आखिरकार मैंने खुद ही अपना नाम शिखर सुकुमार रख लिया।’’

मैं यह तो समझ गया था कि दुसाध उनकी जाति है, लेकिन यह शब्द मैंने पहली बार सुना था। मेरे चेहरे पर अचरज या जिज्ञासा जैसा कुछ रहा होगा, जिसे पढ़कर उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पिता कबीर को बहुत मानते थे। कबीर की यह बात उन्होंने बचपन में ही जिंदगी भर के लिए गाँठ बाँध ली थी कि ‘जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान; मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान’। वे देहाती दुसाधों में पैदा हुए थे। सूअर पालना और बेचना उनका पुश्तैनी पेशा था। दुसाध बहुत नीची जाति मानी जाती थी। मेरे पिता ने प्रतिज्ञा की कि दुसाध नहीं रहेंगे, साधु बनेंगे। लेकिन दुनिया से संन्यास लेकर भीख माँगने निकल पड़ने वाले साधु-संन्यासी नहीं, बल्कि सच्चे साधु। सच्चे, सज्जन, चतुर, निपुण, योग्य और प्रशंसनीय वाले अर्थ में साधु। दुनिया से भागंेगे नहीं, दुनिया को बदलेंगे। कोई गुरु भी उन्हें अच्छा मिल गया था। उसने मेरे पिता को किसी अंग्रेज अफसर से मिलवा दिया, जिसने उन्हें सेना को सूअर सप्लाई करने की सलाह दी। शायद कुछ पैसा भी दिया, जिससे वे बड़े पैमाने पर सूअर पाल सकें। काम अच्छा चलने लगा। फौजी अफसरों से बात करने के लिए मेरे पिता ने कामचलाऊ अंग्रेजी सीख ली और कोट-पैंट वाली वेश-भूषा भी अपना ली। गाँव छोड़ शहर में रहने लगे। उन्होंने मुझे अंग्रेजी शिक्षा दिलायी। वे चाहते, तो स्कूल में मेरी जाति कुछ और भी लिखवा सकते थे। कौन पूछने वाला था? मगर उनका कहना था कि जन्म से दुसाध हो तो क्या हुआ? कर्म से साधु बनो। सो मैं जाति से आज भी दुसाध हूँ, बाकी तुम देख ही रहे हो!’’

पूछते संकोच हुआ, मगर फिर भी मैंने पूछ लिया, ‘‘और आपके पिताजी का व्यवसाय? उसका क्या हुआ?’’

सुकुमार जी मुस्कराते हुए बोले, ‘‘तुम्हें पता है, विश्वामित्र एक प्रतिसृष्टि करने या दूसरी दुनिया बनाने चला था और देवताओं के भेजे ब्रह्मा ने उसे समझा-बुझाकर ऐसा करने से रोक दिया था? मेरे पिता को भी मिल गये एक ब्रह्मा जी! उन्होंने कहाµ‘यह क्या कर रहे हो? हम देश की आजादी के लिए जिन अंग्रेजों से लड़ रहे हैं, तुम उन्हीं अंग्रेजों को खाने के लिए सूअर सप्लाई कर रहे हो? बंद करो यह धंधा और चलो हमारे साथ।’ मेरे पिता ने उनकी न सुनी होती, तो दूसरे विश्वयुद्ध में सेना को सामान सप्लाई करने वाले कई ठेकेदारों की तरह मालामाल होकर शायद बड़े पूँजीपति बन गये होते। लेकिन उन्होंने अपना धंधा बंद कर दिया और देश की सेवा करने चल दिये। आजादी के आंदोलन में शामिल हुए और जेल चले गये। आजादी मिलने पर जेल से छूटे, तो देखा कि दुनिया बदली नहीं, बल्कि बेहतर होने की जगह और बदतर हो गयी है। देश बँट गया है, लाखों लोग मारे जा रहे हैं, इधर से उधर और उधर से इधर विस्थापित हो रहे हैं। शरणार्थी कैंपों में स्वयंसेवक बनकर काम करते समय उन्होंने इतना दुख देखा कि विक्षिप्त-से हो गये। सबसे ज्यादा गुस्सा उन्हें उन लोगों पर आया, जो आजादी के आंदोलन में शामिल होने की कीमत वसूल करते हुए नेता और मंत्री बन बैठे थे। मेरे पिता को तो स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण मिल सकने वाले लाभ उठाने वालों से भी सख्त नफरत थी। वे तो आरक्षण के भी सख्त खिलाफ थे।’’

‘‘अच्छा? क्यों?’’

‘‘वे कहते थे, जाति के नाम पर जो भी कोई लाभ उठाता है, चाहे वह सवर्ण हो या शूद्र, ऊँची जाति का हो या नीची जाति का, जात-पाँत की व्यवस्था को मजबूत बनाता है। तुम्हें जातिवाद को बढ़ाना नहीं है, खत्म करना है।’’



दोपहर के भोजन के समय खाने की मेज पर एक तरफ मैं और प्रभा बैठे थे, दूसरी तरफ जय और विजय। अचानक प्रभा ने शिखर सुकुमार के नये नाटक की बात छेड़ दी।

‘‘अब यह ‘असत्य हरिश्चंद्र’ क्या है?’’ प्रभा ने झुँझलाहट भरे स्वर में कहा, ‘‘दलित लेखक होने का मतलब यह तो नहीं कि आप पूरी भारतीय संस्कृति को ब्राह्मणवादी हथकंडा बतायें और उसके उजले पक्षों पर भी कालिख पोतने लगें! सत्यवादी हरिश्चंद्र तो एक नैतिक आदर्श है। राजा हरिश्चंद्र का आदर्श सामने रखकर हम अपने बच्चों को सत्यवादी बनने के लिए प्रेरित करते हैं। इसमें क्या बुराई है? उसे असत्यवादी बना-दिखाकर सुकुमार जी को क्या मिलेगा?’’

‘‘नाटक देखे बिना तुम यह कैसे कह सकती हो कि उसमें सत्यवादी हरिश्चंद्र को असत्यवादी बनाया गया होगा? यह भी तो हो सकता है कि सुकुमार जी हरिश्चंद्र को एक फेक कैरेक्टर मानते हों और उसकी जगह एक जेनुइन कैरेक्टर की रचना करना चाहते हों?’’

‘‘पर मैं कहती हूँ कि बुराइयों का विरोध करो, अच्छी बात है। असत्य, अन्याय, अत्याचार का विरोध करो, अच्छी बात है। लेकिन लीक से हटकर चलने के नाम पर या ब्राह्मणवाद का विरोध करने के नाम पर अपने आदर्शों को नष्ट करना क्या अच्छी बात है?’’

मैं प्रभा की बातें सुन रहा था, लेकिन मेरे कान जय-विजय की बातचीत पर भी लगे थे। बड़ा भाई जय अपने छोटे भाई विजय को हरिश्चंद्र की कहानी सुना रहा था, ‘‘सत्यवादी मींस कि वो कब्भी झूठ नहीं बोलता था। जो कहता था, वो ही करता था। एक दिन देवताओं के राजा इंद्रा को लगा कि उसका सिंहासन हिल रहा है। मींस कि कोई और उसका सिंहासन छीनकर स्वर्ग का राजा बनना चाहता है...’’

इधर प्रभा मुझसे कह रही थी, ‘‘सुकुमार जी क्या आसमान से टपके हैं या आसमान में रहते हैं? यह देश उनका नहीं है? इस देश का साहित्य, इस देश की सभ्यता और संस्कृति उनकी नहीं है? क्या उसकी रक्षा करना उनका काम नहीं है? दलित होने का यह मतलब है कि ब्राह्मणवाद का विरोध करने के नाम पर अपने वेद-पुराण वगैरह सब नष्ट कर दो?’’

‘‘नहीं, वेदों-पुराणों की नयी व्याख्याएँ करना उन्हें नष्ट करना नहीं है। और पौराणिक साहित्य में अगर झूठी बातें भरी हुई हैं, तो उनके झूठ को झूठ कहना और सच को सामने लाना दलित लेखकों का ही नहीं, किसी भी लेखक का कर्तव्य है। अधिकार भी है। फिर, सुकुमार जी कोई सामान्य दलित लेखक नहीं हैं। पौराणिक साहित्य के अध्ययन और विश्लेषण के मामले में वे पंडितों के भी पंडित हैं। एक दिन मैंने उनसे पूछा कि आपने पौराणिक मिथकों को अपने लेखन का विषय क्यों बनाया, तो जानती हो, उन्होंने क्या कहा? उन्होंने कहा--चंडीप्रसाद, हर व्यवस्था का अपना एक तर्क होता है। उस तर्क से वह अपनी सुरक्षा का एक मजबूत परकोटा बनाती है। इतना मजबूत कि उसे तोड़ा न जा सके, कोई उसमें सेंध न लगा सके। लेकिन यह उसकी इच्छा और कोशिश ही होती है। ऐसी कोई अभेद्य प्राचीर बनाना उसके वश में नहीं होता। परम अभेद्य प्रतीत होने वाली प्राचीर में भी कहीं न कहीं कोई कमजोर जगह छूट ही गयी होती है। तुम्हारा काम होता है उस कमजोर जगह को ढूँढ़ निकालना और वहाँ से उस प्राचीर को तोड़ना शुरू करना। मैं यही काम करता हूँ।’’

‘‘यानी हमारे पुरखों की बनायी वर्ण-व्यवस्था, जो इतनी मजबूत है कि हजारों साल से चली आ रही है, उसमें दोष देखना, कमियाँ और कमजोरियाँ ढूँढ़ना और तरह-तरह के तर्कों से उसका खंडन करनाµयही है उनका काम?’’

प्रभा आज न जाने क्यों सुकुमार के प्रति असहिष्णु हो उठी थी, जबकि वह उनका आदर करती थी। हमारी शादी के समय से ही हम उनसे मिलने उनके घर जाते हैं, वे हमसे मिलने हमारे घर आते हैं। उनके यहाँ खाते और उन्हें अपने यहाँ खिलाते समय प्रभा के व्यवहार से कभी यह नहीं लगा कि वह वर्ण या जाति को लेकर कोई भेदभाव बरतती है।

शादी के बाद उन लोगों के बारे में बताते समय ही मैंने उससे कह दिया था, ‘‘सुकुमार जी मेरे गुरु होने के नाते पिता समान हैं और दमयंती जी को मैं गुरु-पत्नी होने के नाते माताजी कहता हूँ। वे भी मुझे अपना बेटा ही मानती हैं, अपने बेटे अतुल का बड़ा भाई। लेकिन सोच लो, तुम पंडितानी हो, उस दलित परिवार के साथ यह रिश्ता निभा लोगी? अगर तुम्हें मंजूर नहीं, तो मैं तुम्हें जबर्दस्ती मजबूर नहीं करूँगा। लेकिन मैं उनसे अपना संबंध बनाये रखूँ, इसकी इजाजत तुम्हें देनी होगी।’’

प्रभा ने कहा था, ‘‘पहले उनसे मिलवाओ तो!’’ और जब मैं उसे साथ लेकर सुकुमार के घर गया था, तो उसने बड़ी खूबसूरती से उन लोगों के साथ अपना रिश्ता जोड़ा था। दमयंती जी से उसने कहा था, ‘‘माताजी, मेरे सास-ससुर नहीं हैं। क्या आप लोग मेरे सास-ससुर बनना पसंद करेंगे?’’ और दमयंती जी ने कहा था, ‘‘हमारी भी अभी तक कोई बहू नहीं है। सो आज से तुम हमारी बहू हुईं।’’

यह रिश्ता तब से अब तक दोनों तरफ से बड़े प्रेम से निभाया जाता रहा है। तो आज प्रभा को क्या हो गया है? सीधे पूछना मैंने उचित नहीं समझा, इसलिए थोड़ा घुमा-फिराकर पूछा, ‘‘नाटक देखे बिना ही तुम उसकी इतनी कटु आलोचक क्यों बन बैठी हो?’’

‘‘बात नाटक की नहीं, सुकुमार जी के पूरे एटीट्यूड की है। दलित हैं तो दलितों वाला लेखन करें। दलित साहित्य तो आधुनिक, बल्कि उत्तर-आधुनिक साहित्य है। उसमें वेदों-पुराणों वाले विषय उठाने का क्या मतलब? ऐसा करके क्या वे सवर्ण साहित्यकार बनना चाहते हैं? क्या उन्हें पता नहीं है कि इंसान अपना धर्म वगैरह चाहे बदल ले, अपनी जाति कभी नहीं बदल सकता? आज के अखबार में जब से मैंने पढ़ा है कि दलित लेखक भी सुकुमार जी का साथ नहीं दे रहे हैं, तभी से सोच रही हूँ कि सुकुमार जी अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी क्यों मार रहे हैं?’’

‘‘यह काम वे आज से नहीं, शुरू से कर रहे हैं। लेकिन यह काम वे ब्राह्मण या ब्राह्मणवादी बनने के लिए नहीं कर रहे हैं। यह काम वे साहित्यिक मान्यता प्राप्त करने के लिए भी नहीं कर रहे हैं। लिखना उनके लिए व्यवस्था को बदलने का काम है। बड़े-बड़े विद्वान, इतिहासकार और समाजशास्त्री यह मानते हैंµऔर जातिवादी राजनीति करने वाले लोग तो हजारों तरह से रोजाना कहते ही हैंµकि जाति की व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता। लेकिन सुकुमार जी अपने हर नाटक में यह दिखाते हैं कि जाति-व्यवस्था बदलती रही है और उसे बदला जा सकता है।’’

‘‘लेकिन क्या सफेद पर काला पोतने से यह काम हो जायेगा?’’ प्रभा ने अपने गुस्से का सुराग-सा देते हुए कहा, ‘‘सत्य को असत्य कहने से क्या वह असत्य हो जायेगा? सत्यवादी हरिश्चंद्र लोगों के मन में बैठे हुए हैं, कोई लाख कोशिश कर ले, उन्हें असत्यवादी बताकर वहाँ से हिला नहीं सकता।’’

‘‘तो यह सुकुमार जी की समस्या है, तुम क्यों नाराज हो रही हो?’’

‘‘क्योंकि तुम उस नाटक की समीक्षा लिखने जा रहे हो। वे तुम्हारे गुरु हैं, पिता समान हैं, उनकी आलोचना तो तुम कर नहीं सकते। नाटक की प्रशंसा ही करोगे। नतीजा क्या होगा? दलित और गैर-दलित दोनों तुम्हारे भी पीछे पड़ जायेंगे। दो पाटों के बीच में गेहूँ के साथ-साथ घुन भी पिस जायेगा।’’

‘‘ओ, अच्छा! अब समझा! तुम मेरे साहित्यिक भविष्य को लेकर चिंतित हो!’’ मैंने हँसते हुए कहा।
प्रभा ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो मैंने खाने की प्लेट से ध्यान हटाकर उसकी तरफ देखा। वह मेरी नहीं, अपने बेटों की बातें सुन रही थी।

विजय को राजा हरिश्चंद्र की कहानी सुनाते हुए जय कह रहा था, ‘‘तो इंद्रा ने उसका टेस्ट लेने के लिए रिशी विश्वामित्रा को बैगर बनाके उसके पास भेजा। विश्वामित्रा बैगर बनके गया, तो हरिश्चंद्रा ने पूछाµबोल, क्या माँगता है? विश्वामित्रा बोलाµआइ वांट योर होल किंगडम...’’

‘‘जय!’’ अचानक प्रभा जोर से चिल्लायी, ‘‘यह क्या हो रहा है? इंद्रा, विश्वामित्रा, हरिश्चंद्रा--यह क्या है?’’

‘ममा, मैंने अपनी इंग्लिश की बुक में जो स्टोरी पढ़ी है, वो ही सुना रहा हूँ।’’

‘‘हाँ, लेकिन यह इंद्रा-विंद्रा क्या है? इंद्र, विश्वामित्र और हरिश्चंद्र नहीं बोल सकते तुम?’’

‘‘ममा, मैंने जो पढ़ा है, वही बोल रहा हूँ। आइ एन डी आर एµइंद्रा। स्कूल में सब ऐसे ही बोलते हैं। टीचर्स भी।’’

‘‘वहाँ सब होंगे अंग्रेज! पर अपने घर में तो तुम इंद्र को इंद्र बोल सकते हो? कोई सुनेगा, तो क्या कहेगा कि हिंदी के प्रोफेसर और राइटर चंडीप्रसाद पंडित के बेटों को इंद्र बोलना भी नहीं आता!’’

मैंने देखा कि लड़के खाना खत्म कर चुके हैं और प्रभा उन्हें लेक्चर पिलाने के मूड में है, तो लड़कों को इशारा किया कि ‘सॉरी’ बोलकर दोनों अपने कमरे में जायें। लड़कों ने इशारा समझा, झटपट यही किया और चले गये।

प्रभा ने मेरी तरफ देखा, ‘‘सत्यानाश हो इंग्लिश मीडियम की इस पढ़ाई का! बच्चे अपने देवताओं, ऋषि-मुनियों और महापुरुषों के नामों का सही उच्चारण तक नहीं कर सकते!’’

‘‘और यह नहीं सुना कि ‘विश्वामित्रा को बैगर बनाके भेजा’? बैगर!’’ कहते-कहते मुझे हँसी आ गयी और मैं जोर से हँस पड़ा।

प्रभा ने जलती आँखों से मेरी तरफ देखा और मेज पर से बर्तन समेटने लगी। उसके गुस्से से बचने के लिए मैंने अपने जूठे बर्तन उठाये और रसोईघर में जाकर सिंक में रख दिये। अपनी स्टडी की तरफ जाते हुए मैं बच्चों के कमरे के सामने से गुजरा, तो पाया कि दरवाजा खुला है, दोनांे लड़के पलंग पर लेटे-बैठे हैं और राजा हरिश्चंद्र की कहानी जारी है।

‘‘वो रियल राजा नहीं है, बुद्धू! वो तो एक कैरेक्टर है!’’ जय कह रहा था।

मेरी इच्छा हुई कि जाकर प्रभा से कहूँ--लड़के जैसे भी हैं, काफी समझदार हैं। लेकिन मैं मुस्कराता हुआ अपनी स्टडी की ओर बढ़ गया।



मैंने घड़ी देखी। एक बजा था। रामाधार ठाकुर के दफ्तर की गाड़ी मुझे दो बजे लेने आने वाली थी। मैंने सोचा, ‘असत्य हरिश्चंद्र’ देखने जाने से पहले भारतेंदु हरिश्चंद का लिखा नाटक ‘सत्य हरिश्चंद्र’ एक बार उलट-पलटकर देख लेना ठीक रहेगा। सो मैंने अपनी किताबों में से ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक निकाला और पढ़ने बैठ गया। ‘उपक्रम’ शीर्षक से लिखी गयी भूमिका में भारतेंदु ने लिखा थाµ‘‘जब हरिश्चंद्र के पिता त्रिशंकु ने इसी शरीर से स्वर्ग जाने के हेतु वशिष्ठ जी से कहा तो उन्होंने उत्तर दिया कि यह अशक्य काम हमसे न होगा...’’
मैंने भारतेंदु की भूल पकड़ी। उन्होंने ‘वसिष्ठ’ को ‘वशिष्ठ’ लिखा था और उसके आगे ‘जी’ भी लगाया था, जबकि उनसे कहीं ज्यादा बड़े और बेहतर ऋषि विश्वामित्र को अनादर के साथ केवल विश्वामित्र लिखा था!
भारतेंदु की भूल पकड़ने के चक्कर में मैं नाटक पढ़ना भूल गया और उन दिनों को याद करने लगा, जब अपने शोधकार्य के सिलसिले में शिखर सुकुमार के घर मेरा आना-जाना बहुत बढ़ गया था। मैं उनके परिवार के सदस्य जैसा हो गया था। यों विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त मेरे शोध निर्देशक प्रोफेसर डी.के. राय थे, लेकिन वास्तव में मेरा निर्देशन शिखर सुकुमार ही कर रहे थे। मैं उन्हें ‘सर’ कहना छोड़ ‘गुरुजी’ कहने लगा था और गुरु पत्नी के नाते दमयंती जी को माताजी। वे भी मुझे पुत्रवत मानने लगी थीं। एक दिन जब मैं उनके घर की बैठक में बैठा सुकुमार से कुछ चर्चा कर रहा था, वे एक अधबुना स्वेटर, सलाइयाँ और ऊन का गोला लिये हुए आयीं और सामने बैठकर स्वेटर बुनने लगीं।

बातों-बातों में दमयंती जी ने कहा, ‘‘चंडी मेरा बड़ा बेटा है, अतुल छोटा।’’

‘‘आप अद्भुत माँ हैं!’’ सुकुमार ने हँसकर कहा, ‘‘पहले आपको छोटा बेटा होता है, बाद में बड़ा!’’

फिर उसी विनोद भाव से उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘तुम भी बड़े अजीब द्विज हो, चंडीप्रसाद! तुम्हारा पहला जन्म ब्राह्मणों में हुआ है, दूसरा शूद्रों में!’’

‘‘अच्छा ही है न, गुरुजी!’’ मैंने भी हँसते हुए कहा, ‘‘साहित्य में ब्राह्मणों की संख्या बहुत बड़ी है। इसलिए प्रतिस्पर्धा भी बहुत कड़ी है। पता नहीं, कब मान्यता मिले! दूसरी तरफ दलित साहित्य नया है, दलित लेखक भी कम ही हैं, सो दलित लेखक के रूप में मुझे मान्यता जल्दी मिल जायेगी! वाल्मीकि पहले दलित लेखक थे, उन्हें झटपट मान्यता मिल गयी होगी!’’

सुकुमार मुस्कराये, ‘‘वाल्मीकि का उदाहरण सही नहीं है, चंडीप्रसाद! वाल्मीकि शूद्र थे, लेकिन उनकी ‘रामायण’ दलित साहित्य नहीं है। वह ब्राह्मणवादी साहित्य ही है। वह वर्ण-व्यवस्था को चुनौती देने वाला साहित्य नहीं, बल्कि उसको मजबूत बनाने वाला साहित्य है। वाल्मीकि ने यह तो सिद्ध कर दिखाया कि शूद्र भी श्रेष्ठ साहित्यकार हो सकते हैं, लेकिन अनजाने ही उन्होंने अपने उदाहरण से यह भी सिद्ध किया कि इसके लिए उनका ब्राह्मणवादी होना जरूरी है, उसी वर्ण-व्यवस्था को मजबूत बनाना जरूरी है, जिसने उन्हें व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर रख छोड़ा है! वाल्मीकि की जाति आसानी से दिख जाती है, लेकिन उनकी रचना में मौजूद ब्राह्मणवाद आसानी से नहीं दिखता।’’

मैंने पूछा, ‘‘उसे कैसे देखा जा सकता है, गुरुजी?’’

‘‘उसे देखने के लिए समाज में होने वाले संघर्षों को देखो। देखो कि वह संघर्ष क्या है, क्यों है, किनके बीच है और किसलिए है। मैं अपने नाटकों में बार-बार युद्ध की थीम क्यों लेता हूँ? अपने पहले नाटक में मैंने राम-रावण युद्ध को लिया। दूसरे नाटक में कौरवों-पांडवों के युद्ध को लिया। तीसरे नाटक में वैदिक काल के देवासुर संग्राम को लिया। अपना अगला नाटक मैं वसिष्ठ और विश्वामित्र के बीच के संघर्ष पर लिखने की सोच रहा हूँ। तुमने वसिष्ठ और विश्वामित्र के संघर्ष पर कभी गौर किया है? उन दोनों के बीच का संघर्ष क्या है?’’

मैंने संकोचपूर्वक उत्तर दिया, ‘‘गुरुजी, मैं ज्यादा नहीं जानता। इतना ही जानता हूँ कि वसिष्ठ ब्राह्मण ऋषि थे और विश्वामित्र क्षत्रिय राजा। वसिष्ठ के पास एक गाय थी कामधेनु, जिससे जो चाहो मिल जाता था। ऐसी गाय जिसके पास हो, उसे और क्या चाहिए? विश्वामित्र ने वसिष्ठ के पास वह गाय देखी, तो बोले कि यह गाय हमें दे दो। वसिष्ठ ने नहीं दी, तो कहा कि इसे हमें बेच दो और बदले में जो चाहो, कीमत हमसे ले लो। वसिष्ठ ने गाय बेचने से भी इनकार कर दिया, तो विश्वामित्र ने उसे जबर्दस्ती ले जाने के लिए वसिष्ठ के आश्रम पर अपनी सेना के साथ आक्रमण कर दिया। लेकिन कामधेनु ने वसिष्ठ के कहने पर अपनी एक हुंकार से वीरों की ऐसी सेना पैदा कर दी कि विश्वामित्र की सेना उससे हार गयी। इससे विश्वामित्र को लगा कि असली शक्ति क्षत्रिय राजाओं के पास नहीं, ब्राह्मण ऋषियों के पास है। हम तो केवल राजर्षि हैं। वसिष्ठ ब्रह्मर्षि हैं। सो विश्वामित्र ने ब्रह्मर्षि बनने की ठान ली। इसके लिए उन्होंने घोर तपस्या की और आखिरकार ब्रह्मर्षि बन गये।’’

‘‘बस?’’ दमयंती जी ने कहा, ‘‘चंडी, तुम्हें कहानी सुनाना नहीं आता। इतनी बड़ी कथा दो मिनट में सुना दी। कोई कथावाचक पंडित होता, तो रस ले-लेकर दो घंटे में सुनाता।’’

‘‘दो घंटे में?’’ सुकुमार मुस्कराये, ‘‘वसिष्ठ-विश्वामित्र के संघर्ष की पूरी कहानी तो दो सौ साल में भी नहीं सुनायी जा सकती। पहली बात तो यह कि उनकी पूरी कहानी जान पाना ही मुश्किल है। फिर उसमें एक सिलसिला बिठा पाना तो और भी मुश्किल। मैं कई साल से इसी कोशिश में लगा हूँ। ऋग्वेद से लेकर तमाम पौराणिक गं्रथों, महाकाव्यों, नाटकों और दूसरे कई रूपों में कहीं न कहीं इन दोनों के आपसी संघर्ष की कथा मिल जायेगी। कामधेनु वाला प्रसंग तो उस कथा का एक बहुत छोटा-सा अंश है।’’

दमयंती जी ने उनसे पूछा, ‘‘तो तुम्हारे हिसाब से वह संघर्ष क्या है?’’

सुकुमार ने उत्तर दिया, ‘‘सत्ता का संघर्ष। कहीं सीधे-सीधे राज्यसत्ता के लिए संघर्ष, तो कहीं सामाजिक शक्ति या ज्ञान-विज्ञान की शक्ति के जरिये राज्यसत्ता पर परोक्ष नियंत्रण के लिए संघर्ष। मतलब, राजा कोई और है, लेकिन राजा का गुरु या पुरोहित कोई और है, जो परोक्ष रूप में राज्यसत्ता को नियंत्रित करता है। सीधे-सीधे राज्यसत्ता के लिए संघर्ष इस रूप में होता है कि राज्यसत्ता कभी क्षत्रियों के पास रहती है, तो कभी ब्राह्मणों के पास। इसलिए राजा हमेशा क्षत्रिय ही नहीं हुए हैं। राजा ब्राह्मण भी हुए हैं। एक-दूसरे का राज्य छीनने के लिए उनमें लड़ाइयाँ भी हुई हैं, जिनमें कभी क्षत्रिय जीते हैं, तो कभी ब्राह्मण जीते हैं। लेकिन अक्सर दोनों के बीच यह समझौता रहा है कि आओ, दोनों मिलकर राज करें और अपने-अपने काम बाँट लें। क्षत्रियों के पास बल है, तो ब्राह्मणों के पास बुद्धि। सो क्षत्रिय राजा रहें और ब्राह्मण उनके गुरु या पुरोहित। यानी राज्य की नीतियाँ और कानून ब्राह्मण बनायेंगे और उन्हें लागू करेंगे क्षत्रिय!’’

‘‘लेकिन विश्वामित्र तो क्षत्रिय था और बड़ा शक्तिशाली राजा भी। उसे वसिष्ठ की तरह ब्राह्मण या ब्रह्मर्षि बनने की क्या पड़ी थी?’’ दमयंती जी ने पूछा।

‘‘विश्वामित्र ने शायद देख लिया था कि राजा के पास वह ताकत नहीं, जो उसके पुरोहित के पास है। लेकिन यह देखो कि महाकाव्यों का--यानी रामायण और महाभारत काµसमय तो ऋग्वेद की तुलना में बहुत बाद का है, जबकि वसिष्ठ और विश्वामित्र ऋग्वेद में भी मौजूद हैं। राजा सुदास का पुरोहित पहले विश्वामित्र था। फिर उसे हटाकर वसिष्ठ बन गया। इस तरह विश्वामित्र के हाथ से सत्ता छिन गयी, तो वह सुदास का शत्रु हो गया और दाशराज्ञ युद्ध में सुदास के विरुद्ध लड़ा। इतना ही नहीं, सुदास की मृत्यु के बाद सौदासों का, यानी सुदास के वंशजों का पुरोहित फिर से विश्वामित्र बना।’’

मैंने चकित होकर पूछा, ‘‘गुरुजी, राजा बदलते रहते हैं, लेकिन उनके पुरोहित कभी वसिष्ठ और कभी विश्वामित्र ही कैसे रहते हैं? ये दोनों क्या अजर-अमर थे?’’

‘‘नहीं, भाई! ये व्यक्तियों के नहीं, वंशों के नाम लगते हैं। जैसे राजवंश पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते थे, वैसे ही ऋषियों के वंश भी चलते होंगे। जिस तरह राजवंशों में आपसी संघर्ष होते थे, वैसे ही ऋषिवंशों में भी आपसी संघर्ष होते होंगे। लेकिन एक मजेदार बात बताऊँ? यह जो विश्वामित्र है, चाहे वह एक व्यक्ति हो या एक परंपरा, मुझे बड़ा क्रांतिकारी चरित्र लगता है। वसिष्ठ बहुत शक्तिशाली है, लेकिन विश्वामित्र के मुकाबले वह काफी रूढ़िवादी, पुरातनपंथी और षड्यंत्रकारी लगता है; जबकि विश्वामित्र काफी प्रगतिशील, नयी सोच वाला और क्रांतिकारी।’’

"क्यों?"

‘‘त्रिशंकु की कहानी याद करो!’’ सुकुमार ने कहा और स्वयं ही कहानी सुनाना शुरू कर दिया, ‘‘त्रिशंकु अयोध्या पर राज करने वाले उसी इक्ष्वाकु वंश का एक राजा था, जिसमें तीस-पैंतीस पीढ़ियों के बाद दशरथ और राम पैदा हुए। वसिष्ठ दशरथ और राम के समय में भी अयोध्या का राजपुरोहित था और उनसे कई पीढ़ियों पहले त्रिशंकु के समय में भी। त्रिशंकु का पिता अरुण एक कमजोर-सा राजा था। त्रिशंकु उसका बिगड़ैल बेटा था। त्रिशंकु अपनी जवानी के दिनों में कहीं से एक विवाहित ब्राह्मण स्त्री को उड़ा लाया। वसिष्ठ को यह बात बहुत बुरी लगी। ब्राह्मणों की बनायी वर्ण-व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण तो शेष तीनों वर्णों की स्त्रियों को भोग सकते थे, लेकिन उनकी स्त्रियों को किसी और वर्ण का व्यक्ति भोगे, यह उन्हें मंजूर नहीं था। सो वसिष्ठ ने राजा को आज्ञा दी कि त्रिशंकु को घर से और राज्य से निकाल दो। राजा था कमजोर, उसने अपने इकलौते बेटे त्रिशंकु को जंगल में हँकाल दिया। उसके बाद वह खुद भी रोता-धोता जंगल में चला गया। या क्या पता, वसिष्ठ ने ही उसे राज्य से निकाल दिया हो, क्योंकि उसके जाने के बाद वसिष्ठ खुद अयोध्या का राजा बन बैठा। लेकिन राजा का पुरोहित होने और खुद राजा बनकर राजकाज करने में फर्क है। वसिष्ठ ने नौ साल अयोध्या पर राज किया और सब चौपट कर डाला। आखिर त्रिशंकु ने ही जंगल से आकर अपना राजपाट सँभाला और वसिष्ठ को हटाकर विश्वामित्र को अपना पुरोहित बनाया।’’

दमयंती जी ने कहा, ‘‘वसिष्ठ क्या इतना कमजोर था कि त्रिशंकु ने उसे उसके पद से हटाया और वह हट गया?’’

‘‘नहीं, वसिष्ठ कमजोर नहीं था। उसकी पहुँच ऊपर स्वर्ग तक थी। वह देवताओं की बनायी व्यवस्था को बनाये रखने का काम करता था, इसलिए बड़ा शक्तिशाली था। स्वर्ग की व्यवस्था यह थी कि पृथ्वी के कुछ खास ब्राह्मण और क्षत्रिय ही जीते जी स्वर्ग जा सकते हैं। सो भी ब्राह्मणों के भेजने पर ही। वसिष्ठ एक तरह से स्वर्ग का वीजा-पासपोर्ट देने वाला ब्राह्मण था। त्रिशंकु को पता था कि वसिष्ठ मुझसे खार खाता है, मुझे सशरीर स्वर्ग जाने की अनुमति कभी नहीं देगा। तब मैं उससे कहूँगा कि विश्वामित्र मेरा यह काम कर सकते हैं, इसलिए आप हटिए, मैं आपकी जगह उनको अपना पुरोहित बनाऊँगा।’’

‘‘और जैसा उसने सोचा था, वैसा ही हुआ?’’

‘‘हाँ, वैसा ही हुआ। त्रिशंकु ने वसिष्ठ से कहा कि मुझे सशरीर स्वर्ग भेजो। वसिष्ठ ने कहा कि यह असंभव है। तब त्रिशंकु वसिष्ठ के बेटों के पास गया और उसने उनसे कहा कि तुम्हारा बाप तो मेरा यह काम कर नहीं रहा, तुम करो। बेटों ने भी मना कर दिया, तो त्रिशंकु ने कहा तुम लोग मेरा यह काम नहीं कर सकते, लेकिन विश्वामित्र कर सकता है। अब मैं उसी को अपना पुरोहित बनाऊँगा। इस पर वसिष्ठ के बेटों ने कुपित होकर उसे शाप दे दिया कि जा, तू चांडाल हो जा!’’

‘‘और एक क्षत्रिय चांडाल बन गया?’’

‘‘इसी से तो पता चलता है कि वर्ण और जाति अपरिवर्तनीय नहीं हैं। वाल्मीकि ने रामायण में इसका अच्छा चित्र खींचा है। उन्होंने त्रिशंकु के रूपांतरण का वर्णन इस प्रकार किया हैµनीलवस्त्रधरो नीलः पुरुषो ध्वस्तमूर्धजः। चित्यमाल्यांगरागश्च आयसाभरणोऽभवत्। अर्थात् चांडाल हो जाने पर त्रिशंकु के शरीर का रंग नीला हो गया, कपड़े भी नीले हो गये, सारा शरीर रूखा-सूखा हो गया, सिर के बाल छोटे हो गये, सारे शरीर में चिता की राख-सी लिपट गयी और यथास्थान लोहे के गहने पड़ गये। इसी रूप में वह विश्वामित्र के पास गया और उसे चांडाल के रूप में देखकर विश्वामित्र के हृदय में करुणा भर आयी। उन्होंने ठान लिया कि वे लोग इसे शाप देकर नीचतम जाति का चांडाल बना सकते हैं, तो मैं अपने ज्ञान-विज्ञान से इसे सर्वोच्च स्वर्ग में पहुँचा सकता हूँ। इस प्रकार यह कथा बताती है कि वर्ण और जाति का ऊपर से नीचे की तरफ और नीचे से ऊपर की तरफ बदलना संभव है।’’

‘‘लेकिन त्रिशंकु स्वर्ग पहुँचा कहाँ?’’

‘‘कैसे पहुँचता? वसिष्ठ की विश्वामित्र से पुरानी दुश्मनी थी और स्वर्ग के राजा इंद्र से पुरानी दोस्ती। सो वसिष्ठ ने इंद्र से कहा कि विश्वामित्र त्रिशंकु को स्वर्ग भेजेगा और वह स्वर्ग में आ गया, तो तुम्हारी जगह वही स्वर्ग का राजा होगा। इंद्र वैसे काफी शक्तिशाली थाµसबसे अच्छे, सबसे सुंदर, सबसे बड़े, सबसे समृद्ध, सबसे शक्तिशाली और सर्वोच्च राज्य का राजाµलेकिन उसे अपना राजसिंहासन छिन जाने का डर लगा रहता था। किसी और राज्य में अगर कोई बंदा त्याग, तपस्या, वीरता वगैरह के बल पर उन्नति करने और प्रसिद्धि पाने लगता, तो उसे लगने लगता कि उसका सिंहासन डोल रहा है और वह उस बंदे की तपस्या भंग करा देता या छल-बल से उसे स्वर्ग आने से रोक देता। यही उसने त्रिशंकु के साथ किया। विश्वामित्र ने उसे जीते जी स्वर्ग भेजा, इंद्र ने उसे बीच में ही रोक दिया। त्रिशंकु बेचारा बीच में ही लटका रह गया। लेकिन विश्वामित्र यों हार मानकर बैठ जाने वाला नहीं था। उसने कहाµइस दुनिया में लोगों को जीते जी स्वर्ग नहीं मिल सकता, तो मैं दूसरी दुनिया बनाऊँगा। सृष्टि की प्रतिसृष्टि। और उसने अपनी दूसरी दुनिया बनाना शुरू कर दिया। यह देखकर दुनिया पर शासन करने वाले देवता घबरा गये। उन्होंने अपने सबसे बड़े देवता ब्रह्मा को भेजा और ब्रह्मा ने किसी तरह समझा-बुझाकर विश्वामित्र को दूसरी दुनिया बनाने से रोका।’’

‘‘यह दूसरी दुनिया वाला आइडिया जोरदार है।’’ दमयंती जी ने कहा, ‘‘आजकल वर्ल्ड सोशल फोरम वाले यही नारा तो दे रहे हैंµ‘एनअदर वर्ल्ड इज पॉसिबल! दूसरी दुनिया संभव है!’ तुम इसी पर अपना नया नाटक लिखो।’’

‘‘विश्वामित्र पर नाटक लिखने का विचार मेरे मन में पहले से ही है। दरअसल उसी के लिए मैं तमाम पुराने ग्रंथों की खाक छान रहा हूँ। लेकिन वसिष्ठ और विश्वामित्र की कथा की बुनावट दो सलाइयों से आप जो एक उलटे और एक सीधे फंदे वाली सादा बुनाई कर रही हैं, वैसी नहीं है। लगता है, जैसे उसे चार-चार सलाइयों से कुछ अजीब-से फंदे डालकर बुना गया है।’’



अपनी लिखने-पढ़ने की मेज पर बैठे-बैठे न जाने कब मेरी आँख लग गयी थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक ‘सत्य हरिश्चंद्र’ मेरे सामने खुला हुआ था और मैं वसिष्ठ-विश्वामित्र की कहानी में खोया हुआ था। अचानक प्रभा मेरे कमरे में आयी और बोली, ‘‘बैठे-बैठे सो रहे हो?’’

‘‘नहीं, पढ़ रहा हूँ। पढ़ते-पढ़ते कुछ सोचने लगा था।’’

‘‘क्या पढ़ रहे हो?’’ उसने मेरी आरामकुर्सी पर बैठते हुए कहा।

‘‘भारतेंदु हरिश्चंद्र का लिखा नाटक ‘सत्य हरिश्चंद्र’। तुमने पढ़ा है?’’

‘‘नहीं। कैसा है?’’

‘‘हिंदी के आरंभिक नाटकों में से है। 1876 में छपा था। इसके पहले राजा हरिश्चंद्र की कथा पर संस्कृत में दो नाटक लिखे गये थेµएक क्षेमेश्वर का ‘चंडकौशिक’ और दूसरा रामचंद्र का ‘सत्य हरिश्चंद्र’। भारतेंदु का ‘सत्य हरिश्चंद्र’ क्षेमेश्वर के ‘चंडकौशिक’ पर आधारित है।’’

‘‘तुमने संस्कृत के ये नाटक पढ़े हैं?’’

‘‘नहीं, लेकिन सुकुमार जी के पास जरूर होंगे। उनसे लेकर पढ़ लूँगा।’’

‘‘वैसे अपने भारतंेदु जी थे बड़े साहसी! एक नाटक का नाम उड़ा लिया और दूसरे का प्लॉट!’’ प्रभा ने हँसते हुए कहा। लेकिन अगले ही क्षण गंभीर होकर बोली, ‘‘चंडकौशिक माने?’’

‘‘विश्वामित्र को चंडकौशिक भी कहते हैं। ‘चंड’ इसलिए कि उनके विरोधी उन्हें बहुत उग्र, उद्धत या क्रोधी मानते थे और ‘कौशिक’ इसलिए कि वे कुशिक नामक क्षत्रिय वंश में पैदा हुए थे। वैसे पॉजिटिव सेंस में ‘चंड’ का अर्थ होता हैµतेज, प्रखर, प्रबल या बलवान। और ये सारे गुण विश्वामित्र में थे। ‘चंडकौशिक’ नाटक में शायद उनका नेगेटिव रूप उभारा गया होगा। भारतेंदु ने भी विश्वामित्र को सत्यवादी हरिश्चंद्र को तमाम दुख देने वाले दुष्टात्मा के रूप में दिखाया है।’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘ऐसे कि सत्यवादी हरिश्चंद्र का यश दुनिया भर में फैलने लगता है, तो इंद्र को अपना सिंहासन डोलता महसूस होने लगता है। वह हरिश्चंद्र को सत्य से डिगाने के लिए विश्वामित्र को उसकी परीक्षा लेने के लिए प्रेरित करता है। विश्वामित्र एक क्रोधी ब्राह्मण बनकर आते हैं और हरिश्चंद्र का सारा राज्य दान में लेकर ऊपर से दक्षिणा के रूप में एक हजार स्वर्णमुद्राएँ माँगते हैं...’’

‘‘अच्छा-अच्छा, मैं समझ गयी। यह तो बहुत बार सुनी हुई कहानी है। फिल्मों और टी.वी. सीरियलों में भी आ चुकी है। राजा हरिश्चंद्र विश्वामित्र को दक्षिणा देने के लिए खुद को काशी के एक डोम के हाथ बेच देता है और डोम की सेवा में सच्चा रहने के लिए अपने बेटे रोहिताश्व का दाह-संस्कार करने श्मशान में आयी अपनी पत्नी शैव्या तारामती से भी आधा कफन माँगता है।’’

‘‘हाँ, लेकिन मुझे लगता है, सुकुमार जी ने अपने नाटक में विश्वामित्र को दुष्ट खलनायक नहीं, बल्कि पॉजिटिव हीरो बनाया होगा।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘एक बार उन्होंने बताया था कि वे वसिष्ठ और विश्वामित्र के संघर्ष पर नाटक लिखना चाहते हैं। उनके विचार से वसिष्ठ स्वार्थी, धूर्त, षड्यंत्रकारी और यथास्थितिवादी है, जबकि विश्वामित्र त्यागी, तपस्वी, परोपकारी और क्रांतिकारी।’’

‘‘अच्छा, तो यह बताओ कि विश्वामित्र का नाम विश्वामित्र क्यों है? नाम से क्या यह नहीं लगता कि वह खुद पूरी दुनिया का दुश्मन है या पूरी दुनिया उसे अपना दुश्मन समझती है?’’

‘‘नहीं, विश्वामित्र का अर्थ विश्व का अमित्र या दुनिया का दुश्मन नहीं होता। हालाँकि हमारे भारतेंदु जी ने अपने नाटक में इसका अर्थ ‘विश्व का अमित्र’ ही किया हैµनारद के मुँह से यही कहलाया हैµलेकिन वास्तव में विश्वामित्र का अर्थ होता है विश्व का मित्र। संस्कृत व्याकरण में एक नियम हैµ‘पूर्वपदस्याकारस्य दीर्घः’। इस नियम के अनुसार ‘विश्व’ का ‘विश्वा’ हो जाता है। लेकिन विश्वामित्र का अर्थ विश्व का मित्र ही होता हैµ‘विश्वमेव मित्रं यस्य’--यानी संपूर्ण विश्व ही जिसका मित्र है! सुकुमार जी ने अपने नाटक में विश्वामित्र का यही अर्थ किया होगा और...’’

‘‘संस्कृत व्याकरण मैंने नहीं पढ़ा, लेकिन यह बताओ कि सुकुमार जी को वसिष्ठ और विश्वामित्र के झगड़े में पड़ने की और उसमें विश्वामित्र के पक्ष से बोलने की क्या पड़ी है?’’

‘‘ठीक-ठीक तो मुझे भी नहीं मालूम, लेकिन वर्षों से जो बातचीत उनसे होती रही हैµऔर उनके प्रति लोगों का जो रुख-रवैया मैं देखता रहा हूँµउससे ऐसा लगता है, जैसे सुकुमार जी स्वयं को कहीं न कहीं विश्वामित्र से आइडेंटिफाइ करते हैं।’’

‘‘कैसे?’’

‘‘देखो, दलित होकर भी उन्होंने आरक्षण का लाभ नहीं उठाया। दुसाध होकर भी उन्होंने वेदों, पुराणों और संस्कृत साहित्य का बाकायदा अध्ययन किया। एक्सीलेंट एकेडेमिक कैरियर था उनका। चाहते, तो आइ.ए.एस. वगैरह बन सकते थे। मगर उन्होंने लेखक बनने का फैसला किया। वे अंग्रेजी इतनी अच्छी लिखते-बोलते हैं कि मजे में ‘अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखक’ बन सकते थे। जिन विषयों पर वे लिखते हैं, उन पर लिखी चीजों की पश्चिमी देशों में भारी माँग है। वे चाहते, तो उस माँग की पूर्ति करने वाली चीजें लिखकर विश्वस्तरीय लेखक बन सकते थे। यूरोप या अमरीका में जाकर बस सकते थे। ये सारी संभावनाएँ होने के बावजूद उन्होंने अपने देश में ही रहने का, अपनी भाषा में ही लिखने का और अपने लोगों के लिए ही लिखने का फैसला किया...’’

‘‘अपने ही लोगों के लिए...?’’

‘‘दलित, पिछड़े, गरीब लोगों के लिए। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आपने साहित्य की दूसरी विधाओं में न लिखकर केवल नाटक ही लिखने का फैसला क्यों किया, तो उन्होंने बताया कि नाटक को पाँचवाँ वेद कहते हैं और यह पाँचवाँ वेद उनके लिए बनाया गया है, जो वेद-पुराण पढ़ नहीं सकते या जिनके लिए उनका पढ़ना निषिद्ध है। और अपने देश में आज ऐसे लोग कौन हैं? वे ही, जो गरीब हैं और गरीबी की वजह से शिक्षा और साहित्य से वंचित हैं। ये ही सुकुमार जी के अपने लोग हैं।’’

‘‘हाँ, यह तो मैं समझ गयी, लेकिन इसमें विश्वामित्र से आइडेंटिफाइ करने वाली क्या बात है?’’

‘‘विश्वामित्र ने अपनी एक अलग दुनिया बनायी थी। सुकुमार जी ने भी अपनी एक अलग नाट्य संस्था बनायी है। उसके नाटककार, निर्देशक और व्यवस्थापक वे ही हैं। उसकी एक अलग ही पहचान है--शिखर थियेटर, शिखर रंगमंच। वे अपने नाटक बिना किसी तामझाम के कम से कम खर्च में और सबसे सस्ते टिकट लगाकर करते हैं। कहीं से फंडिंग कराये बिना सिर्फ दर्शकों के बलबूते पर इतने अच्छे, इतने सफल और लगातार नाटक करने वाली संस्था शहर में एक ही है--‘शिखर’!’’

‘‘हाँ, इस लिहाज से तो वे वाकई सबसे अलग और अनोखे हैं।’’

‘‘विश्वामित्र भी ऐसे ही सबसे अलग और अनोखे चरित्र हैं। उन्होंने अपने समय के विश्व की व्यवस्था को अच्छी तरह समझ लिया था और उसे वे बदलना चाहते थे। सुकुमार जी ने एक बार मुझे विस्तार से बताया था कि वर्ण और जाति की व्यवस्था कोई प्राकृतिक, शाश्वत और अपरिवर्तनीय व्यवस्था नहीं है। यह बनायी गयी है। यह व्यवस्था उन देवताओं ने बनायी है, जो स्वर्ग में रहते हैं। स्वर्ग में देखो, तो छोटे-बड़े देवता तो मिलेंगे, लेकिन उनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसे भेद नहीं मिलेंगे। क्यों? इसलिए कि स्वर्ग का मतलब है शासक वर्ग...’’ कहते-कहते मुझे हँसी आ गयी।

प्रभा ने पूछा, ‘‘हँस क्यों पड़े?’’

मैंने कहा, ‘‘एक मजेदार बात याद आ गयी। एक दिन मैं सुकुमार जी के घर बैठा था और वे स्वर्ग की अपनी यह व्याख्या मुझे बता रहे थे। अतुल भी पास बैठा हमारी बातचीत सुन रहा था। बोला, ‘स्वर्ग को रोमन में लिखिए और ‘एस’ को अलग करके  उसके आगे फुलस्टॉप लगा दीजिए। हो गया एस. वर्ग। एस वर्ग यानी शासक वर्ग। यानी स्वर्ग। अतुल की इस अनोखी व्याख्या पर सुकुमार जी ने हँसते हुए उसे शाबाशी दी। तब से जब भी मैं स्वर्ग के बारे में पढ़ता-सुनता या कुछ कहता हूँ, मुझे इस बात को याद करके हँसी आ जाती है।’’

‘‘बात में दम तो है।’’ प्रभा ने कहा, ‘‘आज की दुनिया का असली शासक वर्ग कौन है? कॉरपोरेट सेक्टर। उसमें छोटे और बड़े तो हैं, लेकिन उनमें कौन किस जाति का, किस धर्म का या किस देश का है, इस सबको लेकर कोई भेदभाव नहीं है। सब कॉरपोरेट हैं। सब मल्टीनेशनल हैं। सब ग्लोबल हैं।’’

‘‘वाह! तुमने तो सुकुमार जी की व्याख्या को और विस्तार दे दिया!’’

‘‘लेकिन अभी भी मेरी समझ में यह नहीं आया कि सुकुमार जी विश्वामित्र से खुद को आइडेंटिफाइ क्यों और कैसे करते हैं?’’

‘‘सुकुमार जी का कहना है कि वर्णों और जातियों की व्यवस्था स्वर्ग में रहने वाले देवताओं ने बनायी है। लेकिन अपने लिए नहीं, बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले लोगों के लिए। पृथ्वी यानी हमारा समाज। और देवता यानी शासक वर्ग। ‘डिवाइड एंड रूल’ की नीति आज की या सिर्फ अंग्रेजों के जमाने की नहीं है। यह तो हमेशा से शासक वर्ग की नीति रही है। प्राचीन काल के शासक वर्ग ने हमारे समाज को वर्णों और जातियों में बाँट दिया और यह बात लोगों के मन में भर दी कि यह व्यवस्था शाश्वत है--हमेशा से ऐसी ही रही है और हमेशा ऐसी ही रहेगी। विश्वामित्र ने इस व्यवस्था को चुनौती दी। कहा कि यह व्यवस्था शाश्वत नहीं है। बदलती रही है और बदली जा सकती है। उन्होंने खुद राजर्षि से ब्रह्मर्षि बनकर अपनी बात को सही साबित कर दिखाया।’’

‘‘ओ, अच्छा! अब समझी! शिखर दुसाध से शिखर सुकुमार बनने की कहानी भी तो यही है कि दुसाधों में भी कोई पंडितों का पंडित हो सकता है!’’

‘‘विश्वामित्र के चरित्र का एक और पक्ष देखो। उन्होंने जिस त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजा, वह क्षत्रिय राजा त्रिशंकु नहीं, ब्राह्मणवादी वसिष्ठ के पुत्रों द्वारा चांडाल बना दिया गया त्रिशंकु था। विश्वामित्र ने इससे यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि पृथ्वी के देवता कहलाने वाले ब्राह्मणों के पास इतनी शक्ति है कि वे शाप देकर एक क्षत्रिय राजा को नीच जाति का चांडाल बना सकते हैं, तो इस व्यवस्था को उचित न मानने वाले लोग एक चांडाल को स्वर्ग में या शासक वर्ग में पहुँचा सकते हैं। विश्वामित्र त्रिशंकु को स्वर्ग में नहीं भेज पाते, क्योंकि देवताओं के पास ताकत ज्यादा है। लेकिन विश्वामित्र ने त्रिशंकु के उदाहरण से यह तो सिद्ध कर ही दिया कि देवताओं की व्यवस्था शाश्वत नहीं है, तथाकथित नीची जातियों के लोग भी शासक बन सकते हैं। वे त्रिशंकु को ऊपर नहीं उठा सके, लेकिन उन्होंने उसे नीचे भी नहीं गिरने दिया। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी प्रतिसृष्टि में उसे हमेशा चमकता रहने वाला एक नक्षत्र बनाकर स्थापित कर दिया। इस प्रकार उन्होंने जो किया, वह उनकी असफलता नहीं, बल्कि एक उज्ज्वल संभावना है।’’

‘‘वाह! यह तो बहुत ही बढ़िया व्याख्या है! एकदम नयी!’’

‘‘अब समझीं कि विश्वामित्र विश्व के मित्र क्यों हैं?’’

‘‘हाँ, और यह भी समझी कि वे किनके लिए विश्व के मित्र हैं और किनके लिए विश्व के अमित्र!’’

‘‘तो यह भी समझ लो कि शिखर सुकुमार आज के विश्वामित्र हैं। वे अपने नाटकों के जरिये बार-बार यही सिद्ध कर रहे हैं कि समाज की व्यवस्था शाश्वत नहीं है। वह बदली जानी चाहिए और बदल सकती है।’’

नाटकों की बात सुनते ही प्रभा ने घड़ी की तरफ देखा और बोली, ‘‘अरे, दो बजने वाले हैं! नाटक देखने जाना है या नहीं?’’  



ठीक दो बजे रामाधार ठाकुर द्वारा भेजी गयी गाड़ी मुझे लेने आ गयी। उसमें ड्राइवर के अलावा एक रिपोर्टर और एक फोटोग्राफर पहले से मौजूद थे। उन्होंने गाड़ी से उतरकर मेरा अभिवादन किया, अपना परिचय दिया और पीछे की सीट पर मुझे बीच में बिठाकर मेरे अगल-बगल बैठ गये। मैं समझ गयाµओह! मेरे अंगरक्षक!

लेकिन जहाँ नाटक होने वाला था, वहाँ पुलिस के साधारण और सशस्त्र लोग इतनी भारी संख्या में तैनात थे कि दर्शकों की भीड़ के बावजूद गड़बड़ी की कोई आशंका नजर नहीं आ रही थी। मैं प्रेक्षागृह के बाहरी दरवाजे के पास पहुँचा ही था कि भीतरी दरवाजे के पास एक ओर अलग हटकर खड़े सुकुमार किसी से हाथ मिलाते दिखायी पड़े। मैंने उनके पास पहुँचकर अभिवादन किया और पूछा, ‘‘माताजी और अतुल कहाँ हैं?’’

‘‘वे दोनों कल देख चुके।’’ कहते हुए सुकुमार ने मेरे अंगरक्षकों के बारे में पूछा, ‘‘ये लोग?’’

मैंने रामाधार ठाकुर से हुई सुबह वाली बात बताते हुए कहा, ‘‘वे बहुत आतंकित लग रहे थे, पर यहाँ तो सब ठीक लग रहा है।’’

‘‘मीडिया की मेहरबानी है!’’ सुकुमार ने व्यंग्यपूर्वक कहा, ‘‘तुमने शायद देखा नहीं, ज्यादातर खबरों में कल की गड़बड़ी के जिम्मेदार लोगों को नासमझ बताते हुए नाटक को ‘पुरानी कहानी का नया कॉमिक रूप’ और ‘हिलेरियस कॉमेडी’ बताया गया है। मीडिया जिस चीज को नयी और कॉमिक बता दे, वह खतरनाक नहीं रहती। बाजार और सरकार दोनों को स्वीकार्य हो जाती है। और जनता के जीवन में हँसी इतनी कम रह गयी है कि वह कॉमेडी सुनकर कुछ भी देखने को टूट पड़ती है। फिर, ‘शिखर’ के नाटकों के जो स्थायी दर्शक हैं, उन्हें तो आना ही है।’’

मैंने देखा, सचमुच दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। हॉल के दरवाजे अभी खुले भी नहीं थे, जबकि टिकट खिड़की पर ‘हाउस फुल’ की तख्ती लगा दी गयी थी।

मेरे साथ आये रिपोर्टर ने सुकुमार से कुछ बातचीत की और फोटोग्राफर ने उनके कुछ फोटो खींचे। इतने में हॉल का दरवाजा खुल गया और दर्शक भीतर जाने लगे। हम भी सुकुमार से विदा लेकर अंदर जा बैठे।

नाटक की संकल्पना कुछ विचित्र किंतु नयी, आकर्षक और प्रभावशाली थी। पात्र पौराणिक थे, किंतु आधुनिक वेशभूषा में थे। नाटक में नाटक की रिहर्सल हो रही थी। नाटक भी चल रहा था और साथ-साथ अभिनेताओं का आपसी हँसी-मजाक भी। पौराणिक काल के संवादों के साथ-साथ वर्तमान यथार्थ को उजागर करती हुई हास्य-व्यंग्यपूर्ण उक्तियाँ, फब्तियाँ और आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी चल रही थीं।

एक सर्वथा नया प्रयोग यह था कि कौन-सी बात किस आधार पर कही जा रही है, यह दिखाने के लिए नाटक का सूत्रधार प्रसंग से संबंधित किसी प्राचीन ग्रन्थ के नाम वाली तख्ती दर्शकों को दिखाता हुआ मंच के अग्रभाग में एक से दूसरी ओर आता-जाता रहता था। किसी पर लिखा होता ‘ऋग्वेद’, किसी पर ‘महाभारत’, किसी पर ‘रामायण’, किसी पर ‘भागवत’, किसी पर ‘मार्कंडेयपुराण’, तो किसी पर ‘ऐतरेय ब्राह्मण’।

नाटक में इतिहास और पुराण, वर्तमान और भविष्य, यथार्थ और फैंटेसी को कुछ इस प्रकार मिलाया गया था कि नाटक एक स्तर पर बड़े गंभीर अर्थ देता था, तो दूसरे स्तर पर दर्शकों का मनोरंजन करते हुए उन्हें हँसाता था। प्रेक्षागृह में कभी गहरा सन्नाटा छा जाता, तो कभी दर्शकों के ठहाके गूँजने लगते।

‘‘पुरानी कहानी का नया कॉमिक रूप’’ यह था कि अयोध्या के राजा अरुण का युवा पुत्र त्रिशंकु एक विवाहिता ब्राह्मणी से प्रेम कर बैठा और उसे अपने घर ले आया। राजपुरोहित वसिष्ठ को बहुत बुरा लगा। उसने राजा अरुण से कहा कि यह त्रिशंकु तो हमारी वर्ण और जाति की व्यवस्था का विरोधी है। इसे घर से ही नहीं, राज्य से भी निकाल दो। अरुण बड़ा कमजोर राजा था। वह वसिष्ठ से डरता भी था, क्योंकि वसिष्ठ की पहुँच ऊपर स्वर्ग के देवताओं तक थी। उसने अपने पुत्र त्रिशंकु को निकाल तो दिया, लेकिन चुपके से उसके कान में कह दिया कि वह जंगल में विश्वामित्र के आश्रम में चला जाये, जो उसे शस्त्र और शास्त्र दोनों की अच्छी शिक्षा दे सकता है। त्रिशंकु ने विश्वामित्र के आश्रम में जाकर उसे अपना गुरु बना लिया। इधर वसिष्ठ अरुण को हटाकर खुद अयोध्या पर शासन करने लगा। लेकिन वह इतना भ्रष्ट और अकुशल शासक था कि राज्य की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी, अकाल पड़ने लगे और जनता त्राहि-त्राहि करने लगी।

अरुण तो न जाने कहाँ मर-खप गया, लेकिन त्रिशंकु अपने गुरु विश्वामित्र से राजनीति और युद्ध-विद्या की शिक्षा पाकर अयोध्या लौट आया। उसने अपना राजपाट तो वापस पा लिया, लेकिन वसिष्ठ को राजपुरोहित के पद से नहीं हटा सका, क्योंकि वसिष्ठ की पीठ पर स्वर्ग के देवताओं का हाथ था। त्रिशंकु ने विश्वामित्र की शिक्षा के अनुसार पृथ्वी को ही स्वर्ग बनाने की ठानी और पुरानी व्यवस्था को बदलने लगा। वसिष्ठ उसके काम में टाँग अड़ाने लगा, तो उसने विश्वामित्र को बुला लिया और वसिष्ठ की जगह उसी को अपना पुरोहित बना लिया। अब त्रिशंकु और विश्वामित्र मिलकर पृथ्वी को स्वर्ग बनाने में जुट गये।

स्वर्ग के देवताओं ने पृथ्वी पर स्वर्ग की प्रतिसृष्टि होते देखी, तो उनमें खलबली मच गयी। उन्होंने वसिष्ठ से कहा कि त्रिशंकु को रोको और ब्रह्मा से कहा कि विश्वामित्र को रोको। वसिष्ठ ने त्रिशंकु को दरिद्र चांडाल बना दिया, जिससे वह पृथ्वी पर स्वर्ग का निर्माता तो क्या बनता, अपने राज्य का राजा भी नहीं रहा। उधर ब्रह्मा ने विश्वामित्र को प्रतिसृष्टि से विरत करने के लिए पहले तो उसकी प्रशंसा की कि तुम तो मंत्र-द्रष्टा कवि हो, तुम्हारी रचनाएँ तो ऋग्वेद में संकलित होती हैं, तुम्हारा रचा हुआ गायत्री मंत्र तो समस्त संसार में लोकप्रिय हो गया है। फिर उसे समझाया कि तुम अपने आश्रम में लोगों को राजनीति और युद्ध-विद्या की शिक्षा देकर बहुत बड़ा काम कर रहे हो, इसलिए पृथ्वी पर स्वर्ग की प्रतिसृष्टि करने का पागलपन छोड़ो और अपने आश्रम में जाकर अपना अध्ययन-अध्यापन और मंत्रों का सृजन करो। विश्वामित्र ने ब्रह्मा की बात मान ली और अयोध्या छोड़कर जंगल में अपने आश्रम में चला गया। इस प्रकार पृथ्वी पर स्वर्ग की प्रतिसृष्टि रुकवाकर देवताओं ने त्रिशंकु के पुत्र हरिश्चंद्र को अयोध्या का राजा और वसिष्ठ को उसका पुरोहित बना दिया।

अब, राजा हरिश्चंद था तो बड़ा अय्याश, उसने सौ शादियाँ की थीं, मगर वह नपुंसक था। सौ रानियों के रहते भी वह निपूता था। जब बूढ़ा होने लगा, तो उसे दो चिंताएँ सताने लगीं। एक यह कि पुत्र का मुख देखे बिना वह स्वर्ग नहीं जा पायेगा और दूसरी यह कि उत्तराधिकारी के बिना उसके मरने के बाद अयोध्या का राजपाट कौन सँभालेगा। वसिष्ठ ने उसे सलाह दी कि तुम वही करो, जो नपुंसक राजा करते आये हैं। अपनी किसी रानी का किसी देवता, ऋषि या मुनि से नियोग करा दो और पुत्र उत्पन्न करा लो। हरिश्चंद्र अपनी रानी शैव्या तारामती को वरुण देवता के पास ले गया और बोलाµ‘‘मैं पुत्र का मुख देखे बिना स्वर्ग नहीं जा सकता और...’’

वरुण ने उसकी पूरी बात सुने बिना ही कहा, ‘‘पुत्र तो पैदा कर दूँगा, लेकिन इस शर्त पर कि उसके युवा होते ही तुम मेरे नाम पर उसकी बलि चढ़ा दोगे। तब तक तुम उसका मुख देख-देखकर स्वर्ग में अपना स्थान आरक्षित करा लेना।’’

हरिश्चंद्र ने सोचा कि अभी शर्त मान लेता हूँ, आगे की आगे देखी जायेगी। आखिरकार मैं राजा हूँ और वसिष्ठ जैसा घाघ ब्राह्मण मेरा पुरोहित है। शर्त से बचने या मुकरने की कोई न कोई तरकीब निकल ही आयेगी। उसने वरुण को वचन दे दिया कि ठीक है, पुत्र के युवा होते ही मैं तुम्हारे नाम पर उसकी बलि चढ़ा दूँगा।

लेकिन पुत्र रोहित या रोहिताश्व जब युवा हो गया और वरुण को दिये हुए वचन के मुताबिक उसकी बलि देने का समय आया, तो हरिश्चंद्र टालमटोल करने लगा। बहाने बनाने लगा। तरह-तरह के झूठ बोलने लगा।

आखिरकार वरुण को गुस्सा आ गया। उसने हरिश्चंद्र को झूठा, मक्कार और बेईमान बताते हुए फटकारा और रोहित की बलि का एक दिन निश्चित कर दिया। हरिश्चंद्र ने वसिष्ठ से रोहित को बचाने का कोई उपाय बताने को कहा, तो वसिष्ठ ने कहा, ‘‘यदि विश्वामित्र रोहित को शरण देकर अपने आश्रम में छिपाकर रख ले, तो रोहित बच सकता है; क्योंकि विश्वामित्र के पास ऐसी शक्तियाँ हैं कि देवता भी उससे डरते हैं।’’ हरिश्चंद्र को यह उपाय अच्छा लगा। वह वसिष्ठ को साथ लेकर विश्वामित्र के आश्रम में गया।

जिस समय ये दोनों वहाँ पहुँचे, विश्वामित्र के कई शिष्य शस्त्रों और शास्त्रों का अभ्यास कर रहे थे और विश्वामित्र के सामने बैठा एक युवक उसे अपनी कविता सुना रहा था। पास पहुँचकर दोनों ने विश्वामित्र को युवक की प्रशंसा करते सुना, ‘‘साधु, वत्स, साधु! तुम तो युवावस्था में ही मंत्र-द्रष्टा कवि बन गये हो। मैं तुम्हारी रचनाएँ ऋग्वेद में संकलित कराऊँगा।’’

निकट आकर वसिष्ठ ने व्यंग्यपूर्वक कहा, ‘‘अरे, भाई विश्वामित्र, मैंने भी कुछ मंत्र रचे हैं। मेरे मंत्र भी ऋग्वेद में संकलित करा दो!’’

विश्वामित्र ने उठकर वसिष्ठ और हरिश्चंद्र का स्वागत किया और उन्हें बिठाकर उस युवक के बारे में बताया कि ‘‘यह मेरे मित्र अजीगर्त का पुत्र शुनःशेप है। बड़ा प्रतिभाशाली है। इसकी माता मुझे भाई मानती है, इसलिए यह मुझे मामा कहता है। यहीं पास में इसका घर है। कुछ रच लेता है, तो मुझे सुनाने चला आता है।’’

शुनःशेप ने दोनों आगंतुकों को प्रणाम किया और विश्वामित्र से घर जाने की आज्ञा लेकर चला गया। वसिष्ठ ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, ‘‘यह अजीगर्त का पुत्र है? उस दरिद्र ब्राह्मण अजीगर्त का, जो आजकल भूखों मर रहा है?’’

‘‘एक भाई के रहते बहन का परिवार भूखों नहीं मर सकता।’’ विश्वामित्र ने कहा, ‘‘हाँ, बुरा समय किसी पर भी आ सकता है। अजीगर्त पर आजकल बुरा समय आया हुआ है। लेकिन यह शुनःशेप बड़ा होनहार है। यह जल्दी ही अपने परिवार का भार उठाने में समर्थ हो जायेगा। खैर, तुम सुनाओ, आज इधर कैसे?’’

वसिष्ठ ने हरिश्चंद्र के साथ आने का कारण बताया और हरिश्चंद्र हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा कि ‘‘आप रोहित को अपने आश्रम में छिपा लें।’’

विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र को फटकारते हुए कहा, ‘‘वचन देकर उसका पालन न करने वाले असत्यवादी हरिश्चंद्र, तूने वरुण को जो वचन दिया है, उसका पालन कर। मैं तेरे पुत्र को अपने आश्रम में छिपाकर तेरे मिथ्याचार में शामिल नहीं हो सकता।’’ फिर उसने वसिष्ठ को भी आड़े हाथों लिया, ‘‘और वसिष्ठ, तुम कैसे गुरु और पुरोहित हो? तुम्हें तो इस हरिश्चंद्र को प्रेरित करना चाहिए था कि यह पृथ्वी को ही स्वर्ग बनाने का अपने पिता त्रिशंकु का अधूरा काम पूरा करे। इसके विपरीत तुमने इसे पुराने अंधविश्वास में फँसा दिया कि निपूता आदमी मरने के बाद स्वर्ग नहीं जा सकता। मरने के बाद कौन कहाँ जाता है, कौन जानता है? लेकिन लोग इस अंधविश्वास में फँसकर अपनी पत्नी को व्यभिचार के लिए भी विवश कर देते हैं। पूछो इस हरिश्चंद्र से, जब यह अपनी पत्नी को नियोग के लिए वरुण के पास ले गया था, क्या इसने अपनी पत्नी की इच्छा-अनिच्छा पूछी थी? फिर, पुत्र की बलि से संबंधित वरुण की शर्त इसने क्यों मान ली? इसने तभी सोच लिया था कि यह शर्त के अनुसार दिये गये वचन का पालन नहीं करेगा। तो फिर इसने झूठा वचन क्यों दिया?’’

वसिष्ठ ने हरिश्चंद्र का बचाव करते हुए कहा, ‘‘यह रोहित की बलि चढ़ा देगा, तो इसके राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा?’’

विश्वामित्र ने कहा, ‘‘राज्य का उत्तराधिकारी राजा का पुत्र या कोई पुरुष ही क्यों होना चाहिए? हरिश्चंद्र की सौ रानियाँ हैं। उनमें से कोई एक या वे सब मिलकर राज्य नहीं कर सकतीं?’’

‘‘कैसी नीति-विरोधी बातें करते हो, विश्वामित्र! भला स्त्रियाँ भी कहीं...’’

‘‘तुम मेरे सामने नैतिकता की बात मत करो, वसिष्ठ! इस नपुसंक राजा हरिश्चंद्र ने सौ विवाह किये, क्या यह नैतिक था? पुत्र प्राप्त करने के लिए यह अपनी पत्नी को स्वयं व्यभिचार के लिए ले गया, क्या यह नैतिक था? इसने जान-बूझकर वरुण को झूठा वचन दिया, क्या यह नैतिक था? और अब तुम दोनों मेरे पास जो प्रस्ताव लेकर आये हो, क्या वह नैतिक है?’’

काम बनता न देख वसिष्ठ उठ खड़ा हुआ और बेशर्म हँसी के साथ हरिश्चंद्र से बोला, ‘‘चलो, राजा हरिश्चंद्र! यह निष्ठुर विश्वामित्र तुम पर दया नहीं करेगा।’’ लेकिन आश्रम से बाहर आते ही उसने खलनायकों वाली क्रुद्ध और कुटिल हँसी के साथ घोषणा की, ‘‘मेरे रचे मंत्रों की उपेक्षा करने वाला यह विश्वामित्र अपने जैसा एक और मंत्र-द्रष्टा कवि बनाना चाहता है! मैं ऐसा कदापि नहीं होने दूँगा! कदापि नहीं!’’

वसिष्ठ के साथ चलते हरिश्चंद्र ने पूछा कि अब क्या किया जाये, तो वसिष्ठ ने कहा, ‘‘मैं वरुण को समझा-बुझाकर इसके लिए राजी कर लूँगा कि वह रोहित की जगह उसी की उम्र के किसी और युवक की बलि ले ले।’’
‘‘लेकिन ऐसा युवक मिलेगा कहाँ, जिसके माता-पिता उसे बेचने को तैयार हों और जो स्वयं भी बिकने को तैयार हो?’’ हरिश्चंद्र ने पूछा। वसिष्ठ ने दूसरी दिशा में शुनःशेप को जाते देख कहा, ‘‘देखो, वह रहा ऐसा युवक।  वह अपने घर ही जा रहा है। चलो, हम भी उसके घर चलते हैं और उसके पिता अजीगर्त को मुँहमाँगा मूल्य देकर इसे खरीद लेते हैं।’’

और वे अपने उद्देश्य में सफल हुए। अजीगर्त अपनी घोर गरीबी के कारण पुत्र शुनःशेप को बेचने के लिए और शुनःशेप अपने निर्धन परिवार के प्रति कर्तव्य पालन करने के उद्देश्य से बिकने को राजी हो गया। हरिश्चंद्र ने सौ गायों के बदले में शुनःशेप को खरीद लिया।

नाटक का अंतिम दृश्य इस प्रकार था :

हरिश्चंद्र, वसिष्ठ, वरुण आदि कई लोगों के बीच शुनःशेप बलि के लिए गाड़े जाने वाले खंभे से बँधा खड़ा है। एक जल्लाद नंगी तलवार लिये उसके निकट खड़ा है और एक ब्राह्मण बलि के समय पढ़े जाने वाले मंत्र पढ़ रहा है। बलि का समय आने ही वाला है कि विश्वामित्र आ जाता है और ऊँचे स्वर में सबको सुनाते हुए कहता है, ‘‘धिक्कार है! धिक्कार है इस नपुंसक, स्वार्थी और मिथ्यावादी हरिश्चंद्र को! धिक्कार है इर क्रूर, कुटिल और पाखंडी वसिष्ठ को! धिक्कार है देवता कहलाने वाले इस व्यभिचारी और नरभक्षी वरुण को! और धिक्कार है यहाँ उपस्थित उन सब लोगों को, जो मनुष्य की बलि को खेल-तमाशा समझकर देखने के लिए यहाँ एकत्र हुए हैं! मैं विश्वामित्र घोषणा करता हूँ कि एक गरीब पिता की मजबूरी का और परिवार के प्रति उत्तरदायी एक पुत्र की कर्तव्यनिष्ठा का लाभ उठाकर, राजा हरिश्चंद्र ने सौ गायों के बदले में शुनःशेप को खरीदकर, बलि के नाम पर उसकी हत्या करने का यह जो आयोजन किया है, वह सर्वथा अनुचित, अनैतिक और निंदनीय है। मैं उन सौ गायों को ले आया हूँ, जिनके बदले इस नीच ने शुनःशेप को खरीदा है। गायें उधर खड़ी हैं, हरिश्चंद्र चाहे तो जाकर उन्हें गिन ले। मैं शुनःशेप को ले जा रहा हूँ।’’

विश्वामित्र बलि-पशु की तरह बाँधे गये शुनःशेप को मुक्त करता है और जाते-जाते कहता है, ‘‘राजा, ब्राह्मण, देवता और नागरिक सब देख लें कि मैं शुनःशेप को ले जा रहा हूँ। किसी में हिम्मत और ताकत हो तो मुझे रोक ले। मैं इसे अपना पुत्र, शिष्य और ऋषि बनाऊँगा। इसके रचे मंत्रांे को ऋग्वेद में संकलित कराऊँगा, जिनसे इसका यश दुनिया भर में फैलेगा और इसकी कीर्ति अनंत काल तक कायम रहेगी।’’

विश्वामित्र चला जाता है। मंच पर सब स्तब्ध खड़े रह जाते हैं। कुछ देर बाद वसिष्ठ आगे आता है और व्यंग्यपूर्वक बोलता है, ‘‘यह विश्वामित्र महाज्ञानी है, किंतु बहुत भोला है! यह समझता है कि यश और कीर्ति का आधार ज्ञान है। यह नहीं जानता कि यश और कीर्ति का वास्तविक आधार धन और राज्य के बल पर किया जाने वाला प्रचार है। मैं इस आधार पर ऐसा चमत्कार कर दिखाऊँगा कि राजा हरिश्चंद्र युगों-युगों तक सत्यवादी कहलायेगा, विश्वामित्र एक क्रोधी और दुष्ट ऋषि के रूप में जाना जायेगा और शुनःशेप को कोई नहीं जानेगा। उसकी कथा केवल किताबों में बंद होकर रह जायेगी!’’

अचानक सूत्रधार, मंच के अग्रभाग में दर्शकों के ठीक सामने आकर कहता है, ‘‘वसिष्ठों को हमेशा यह भ्रम रहा है कि वे असत्य को सत्य के रूप में प्रचारित करके उसे सदा के लिए सत्य बना देंगे। लेकिन वे भूल जाते हैं कि विश्वामित्रों ने उन्हें हमेशा चुनौतियाँ दी हैं और देते रहेंगे। विश्वामित्रों ने वसिष्ठों को ही नहीं, ब्रह्माओं तक को चुनौतियाँ दी हैं और देते रहेंगे। विश्वामित्रों ने उनकी बनायी मिथ्या सृष्टियों के विरुद्ध सच्ची प्रतिसृष्टियाँ की हैं और करते रहेंगे।’’



नाटक समाप्त हुआ, तो प्रेक्षागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। दर्शक खड़े होकर देर तक तालियाँ बजाते रहे। अंततः जब पटाक्षेप हुआ, तो मैंने बाहर आकर अपने ‘अंगरक्षकों’ से विदा ली और सुकुमार से मिलने, उनको बधाई देने, नेपथ्य की ओर चल दिया। लेकिन वहाँ मैं यह देखकर हैरान रह गया कि सुकुमार, दमयंती जी, अतुल, प्रभा, जय और विजय सब एक साथ खड़े हैं और हँस-हँसकर बातें कर रहे हैं।

मुझे देखते ही दमयंती जी स्नेहपूर्वक डाँटते हुए बोलीं, ‘‘तुम तो बड़े स्वार्थी हो, चंडी! अपनी सृष्टि को घर छोड़कर यहाँ दूसरों की प्रतिसृष्टि देखने चले आये? प्रभा और बच्चों को साथ नहीं ला सकते थे? प्रभा ने मुझे फोन करके बताया, तो मैं तुरंत अतुल के साथ तुम्हारे घर गयी और इन लोगों को ले आयी।’’

मैं कुछ कह पाता, इसके पहले ही विजय ने मुझसे कहा, ‘‘पापा, हमने हॉल के अंदर आपको देख लिया था, आपने हमें नहीं देखा!’’

प्रभा ने ताना मारा, ‘‘वी.आइ.पी. लोग इधर-उधर नहीं देखते, बेटा! सीधे सामने ही देखते हैं!’’

मैंने हाथ जोड़कर संकेतों में उससे क्षमा माँगी और सुकुमार को बधाई देकर नाटक की प्रशंसा करने लगा। तभी जय ने सुकुमार से पूछा, ‘‘दादू जी, राजा हरिश्चंद्र इतना झूठा था, तो हमारे स्कूल की किताब उसे सत्यवादी क्यों बताती है?’’

सुकुमार ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘जैसे लोग सच्चे और झूठे होते हैं, बेटा, उसी तरह किताबें भी सच्ची और झूठी होती हैं।’’