Sunday, August 22, 2010

यह केवल लेखिकाओं की लड़ाई नहीं है

कभी-कभी ‘बाँटो और राज करो’ के सिद्धांत पर चलने वाली व्यवस्था के विरुद्ध जनतांत्रिक शक्तियों को एकजुट होने के अवसर अनायास मिल जाते हैं। लेकिन अपने ही भीतर की नासमझी के चलते वे उन अवसरों को गँवा देती हैं। राय-कालिया प्रसंग में कुछ ऐसी ही दुर्घटना घटित होती दिखायी पड़ रही है।

‘नया ज्ञानोदय’ में छपे विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में लेखिकाओं के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किये जाने से लेखिकाओं ने ही नहीं, बहुत-से लेखकों ने भी स्वयं को आहत-अपमानित अनुभव किया और राय के साथ-साथ संपादक रवींद्र कालिया के विरुद्ध भी आवाज उठायी। जबसे हिंदी में ‘स्त्री विमर्श’ चला है, कई लेखिकाएँ पुरुष मात्र को स्त्री-विरोधी या शत्रु मानने वाला स्त्रीवाद चलाती आ रही हैं, जिससे उन्हें साहित्य में एक पहचान मिली है, लेकिन स्त्रीवादी और आम जनवादी साहित्य कमजोर हुआ है। राय-कालिया प्रसंग में यह बात उभरकर सामने आयी कि पुरुष भी स्त्रीवादी हो सकते हैं और स्त्रियों के अपमान के विरोध में उनके साथ खड़े होकर न केवल स्त्री आंदोलन को, बल्कि जनवादी आंदोलन को भी मजबूत बनाने वाली एकजुटता कायम कर सकते हैं।

हम सभी को इस एकजुटता को बनाये रखने तथा बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि कुछ लेखिकाओं ने इस महत्त्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान ही नहीं दिया है। ऐसा भी हो सकता है कि उन्होंने या तो इसका महत्त्व ही न समझा हो, या इससे अपने ‘स्त्री विमर्श’ और उसके कारण साहित्य में बनी अपनी विशिष्ट स्थिति को खतरे में पड़ते समझकर इसकी उपेक्षा करते हुए अपना पुरुष मात्र का विरोधी ‘‘एकला चलो रे’’ वाला राग अलापना शुरू कर दिया हो। 19 अगस्त के ‘दि हिंदू’ नामक अंग्रेजी दैनिक में मृणाल पांडे ने और 20 अगस्त के हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ में अनामिका ने जो लिखा है, उससे ऐसा ही लगता है। दोनों के लेख पढ़कर लगता है कि जैसे उन्हें इस पूरे प्रकरण में पुरुष लेखकों की भूमिका का या तो पता ही नहीं है, या फिर वे उसे एकदम नगण्य और उपेक्षणीय मानकर चल रही हैं।

निंदनीय राय-कालिया प्रसंग में, मेरे विचार से, सबसे अच्छी बात यह हुई है कि लेखिकाओं के अपमान के विरुद्ध बहुत-से लेखकों ने भी आवाज उठायी। यह उस ‘स्त्री विमर्श’ से आगे की चीज है, जिसमें पुरुष मात्र को स्त्रियों का शत्रु माना जाता है। यह पितृसत्ता, राज्यसत्ता और पूंजी की सत्ता के विरुद्ध स्त्री-पुरुष एकजुटता की दिशा में उठा एक स्वागतयोग्य कदम है। अब हमारा प्रयास होना चाहिए कि यह एकजुटता बनी रहे और बढ़ती रहे।

--रमेश उपाध्याय

Wednesday, August 4, 2010

एक कविता

इतिहास-बाहर

यह तब की बात है
जब समय बे-लाइसेंसी हथियार या जाली पासपोर्ट की तरह
गैर-कानूनी था और जिनके पास वह पाया जाता,
वे अपराधी माने जाते थे
सारी घड़ियाँ जब्त कर ली गयी थीं
कैलेंडर और तारीखों वाली डायरी रखने पर पाबंदी थी
पत्र-पत्रिकाओं पर दिन-तारीख छापना
दंडनीय अपराध घोषित किया जा चुका था
मोबाइलों और कंप्यूटरों में से समय बताने वाले
सारे प्रोग्राम निकाले जा चुके थे
दिन-तारीख और सन्-संवत् बोलना कानून का उल्लंघन करना था
आज, कल, परसों जैसे शब्दों को देशनिकाला दिया जा चुका था

जैसे मद्य-निषेध हो जाने पर नशे के आदी
विकल्प के रूप में भाँग वगैरह पीते हैं
समय के आदी कुछ लोग चोरी-छिपे
धूप-घड़ी, रेत-घड़ी आदि बनाया करते थे
लेकिन वे देर-सवेर पकड़े जाते थे और मार डाले जाते थे

दुनिया को एक अदृश्य मशीन चलाती थी
जिसे बार-बार बिगड़ जाने की आदत थी
फिर भी वह चलती रहती थी, कभी बंद नहीं होती थी और कहते हैं--
बिगड़ जाने पर वह खुद ही खुद को सुधार लेती थी

अतः दुनिया समय की पाबंदी होने के बावजूद चल रही थी
अलबत्ता यह कोई नहीं जानता था
कि वह जा कहाँ रही थी और कर क्या रही थी

अखिल भूमंडल को नियंत्रित करती
वह अदृश्य मशीन मनुष्यों को ऐसे चलाती थी
जैसे वे स्वचालित यंत्र नहीं, मनुष्य ही हों
स्वायत्त, स्वाधीन, स्वतंत्र
वे उस मशीन का ऐसे गुणगान करते
जैसे कभी किया जाता होगा ईश्वर का
कि वह सर्वज्ञ है, सर्वव्यापी है, सर्वशक्तिमान है और निर्विकल्प
उसका कोई विकल्प न तो कभी था, न है, न होगा

यही था समय को गायब कर देने का मूलमंत्र
जिसे वह अदृश्य मशीन अहर्निश उच्चारती थी
यह बताने को कि लोग रहें निश्चिन्त
उनकी चिंता कर रही है वह अदृश्य मशीन!

--रमेश उपाध्याय

Friday, July 23, 2010

यथास्थितिवाद का आधार

सफल लोगों के लिए यथास्थिति ही ठीक है!

जब आसपास के ज़्यादातर लोग खुद को दुनिया के मुताबिक ढालने में लगे हों, तब आपका यह कहना कि इस दुनिया को बदलकर बेहतर बनाना चाहिए, किसे और क्यों अच्छा लगेगा? ऐसा कहकर आप उनको कटघरे में खड़ा कर रहे होते हैं। और यह कोई पसंद नहीं करता।

आज के समय में किसी से यह कहना कि दुनिया बद से बदतर होती जा रही है, आइए, इसे बेहतर बनायें, उसे नाराज़ कर देने के लिए काफी है। वह ‘गरीब’ कितनी मुश्किल से इस मुकाम पर पहुँचा है कि उसे दुनिया को बेहतर बनाने के काबिल समझा जाये! यहाँ तक पहुँचने के लिए उसने कितनी जद्दोजहद की है! दुनिया में अपनी एक जगह बनायी है! यहाँ तक पहुँचने पर स्वभावतः उसे गर्व है। आखिर वह लाखों लोगों को पीछे छोड़कर इस मुकाम तक पहुँचा है। उसके हिसाब से तो यह दुनिया बहुत अच्छी है कि वह इसमें सफल हो सका! वह क्यों चाहेगा कि यह दुनिया बदले? वह तो यही चाहेगा कि दुनिया ऐसी ही बनी रहे और उसे दूसरों से आगे निकलने, सफल होने और स्वयं से संतुष्ट रहने के अवसर देती रहे!

लेकिन आप उससे कहते हैं कि यह दुनिया बुरी है, इसे बदलना चाहिए। सोचिए, उसे यह सुनकर कैसा लगता होगा! उसे लगता होगा कि आप उसके दुश्मन हैं। उसकी सफलता से जलते हैं, क्योंकि आप उसकी तरह सफल नहीं हो सके। अन्यथा दुनिया को क्या हुआ है? अच्छी-भली तो चल रही है!

इस तरह वह ‘गरीब’ फनफनाकर आपके विरुद्ध और दुनिया की यथास्थिति के पक्ष में खड़ा हो जाता है। कहने लगता है कि आप दुनिया को बदलने की बात कहकर राजनीति कर रहे हैं। इसमें आपका कोई निजी स्वार्थ है। दरअसल दुनिया बुरी नहीं है, उसे देखने की आपकी दृष्टि ही गलत है। इसलिए दुनिया को बदलने की बात करना छोड़ आप अपने-आप को बदलिए। अपने-आप को बेहतर बनाइए।...नहीं तो जहन्नुम में जाइए। जाइए, हमें आपकी कोई बात नहीं सुननी!

--रमेश उपाध्याय

Monday, July 12, 2010

सोशल नेटवर्किंग

आभासी दुनिया का रिश्ता वास्तविक दुनिया से कैसे जोड़ें?

चंद रोज़ ही हुए हैं मुझे फेसबुक पर आये हुए, मगर लगता है कि हम जो यह सोशल नेटवर्किंग कर रहे हैं, शायद इस मुगालते में कर रहे हैं कि इससे हमारी दुनिया बड़ी हो रही है; जबकि वास्तव में वह सिकुड़ रही है या सिकुड़ चुकी है। हम वास्तविक दुनिया से, जीते-जागते लोगों से और प्रकृति में सर्वत्र व्याप्त जीवन की धड़कनों से दूर एक आभासी दुनिया में कैद हो गये हैं। और हम कर क्या रहे हैं? अभी हाल ही में मैंने कहीं पढ़ा कि social networking is "the intersection of narcissism, attention deficit disorder and stalking"

क्या हम इस माध्यम का उपयोग वास्तविक दुनिया के उन जीते-जागते लोगों तक पहुँचने के लिए कर सकते हैं, जिनके पास जाकर हम उनसे हाथ मिला सकें, गले मिल सकें, आमने-सामने बैठकर चाय-कॉफी पीते हुए बातचीत कर सकें, हँसी-मज़ाक और धौल-धप्पा कर सकें, लड़-झगड़ सकें और मिल-जुलकर कोई सार्थक काम करने की सोच सकें?

--रमेश उपाध्याय

Wednesday, July 7, 2010

पीढ़ी-विवाद पर

‘युवा पीढ़ी’ के लेखकों से

वर्षों पहले, जब मेरी गिनती नयी पीढ़ी के लेखकों में होती थी, मैंने ‘पहल’ में एक लेख लिखा था ‘हिंदी की कहानी समीक्षा: घपलों का इतिहास’। उसमें मैंने हिंदी कहानी को नयी, पुरानी, युवा आदि विशेषणों वाली पीढ़ियों में बाँटकर देखने की प्रवृत्ति का विश्लेषण किया था। इस प्रवृत्ति से दो भ्रांत धारणाएँ पैदा हुईं, जो कमोबेश आज तक भी चली आ रही हैं।

एक: हिंदी कहानी बीसवीं सदी के प्रत्येक दशक में उत्तरोत्तर अपना विकास करती गयी है, अतः उसके विकास-क्रम को दशकों में देखा जाना चाहिए।

दो: कहानीकारों की प्रत्येक नयी पीढ़ी पूर्ववर्ती पीढ़ियों से बेहतर कहानी लिखती है, अतः नयी पीढ़ी की कहानी को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

आज वही पीढ़ीवादी प्रवृत्ति पुनः प्रबल होती दिखायी पड़ रही है, इसलिए मुझे अपने उस लेख की कुछ बातें आज की नयी पीढ़ी के लेखकों के विचारार्थ प्रस्तुत करना प्रासंगिक लग रहा है। मैंने लिखा था:

‘‘नयी पीढ़ी के नाम पर किये गये घपले में निहित आत्मप्रचारात्मक व्यावसायिकता की गंध आगे आने वाले लेखकों को भी मिल गयी। उनमें से भी कुछ लोगों ने खुद को जमाने के लिए अपने से पहले वालों को उखाड़ने का वही तरीका अपनाया, जिसे ‘नयी कहानी’ वाले कुछ लोग आजमा चुके थे। पीढ़ीवाद का यह घटिया खेल आज भी जारी है और इसे कुछ नयी उम्र के लोग ही नहीं, बल्कि कुछ साठे-पाठे भी खेलते दिखायी दे सकते हैं। बदनाम भी होंगे, तो क्या नाम न होगा!

‘‘लेकिन यह खेल कितना वाहियात और मूर्खतापूर्ण है, इसका अंदाजा आपको ‘युवा पीढ़ी’ पद से लग सकता है। इसे ‘नयी पीढ़ी’ की तर्ज पर चलाया गया और इसकी कहानी को ‘नयी कहानी’ की तर्ज पर ‘युवा कहानी’ कहा गया। कई पत्रिकाओं के ‘युवा कहानी विशेषांक’ निकले। ‘युवा कहानी’ (नरेंद्र मोहन) जैसे लेख लिखे गये। ‘युवा कथाकार’ (सं। कुलदीप बग्गा और तारकेश्वरनाथ) जैसे कहानी संकलन निकाले गये। मेरी आदत है कि पत्रिका या संकलन के लिए कोई मेरी कहानी माँगता है, तो मैं आम तौर पर मना नहीं करता। इसलिए आप देखेंगे कि मेरी कहानियाँ साठोत्तरी कहानी, पैंसठोत्तरी कहानी, सातवें दशक की कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी, समांतर कहानी, स्वातंत्र्योत्तर कहानी, अमुक-तमुक वर्ष की श्रेष्ठ कहानी, प्रगतिशील कहानी, जनवादी कहानी आदि से संबंधित पत्रिकाओं और संकलनों में छपी हुई हैं। ‘युवा कथाकार’ नामक संकलन में भी मेरी कहानी छपी है। लेकिन मैं कभी नहीं समझ पाया कि ‘युवा कहानी’ क्या होती है। किसी को युवा कहने से उसकी उम्र के अलावा क्या पता चलता है? ‘युवा वर्ग’ कहने से किस वर्ग का बोध होता है? युवक तो शोषक और शोषित दोनों वर्गों में होते हैं। इसी तरह युवकों में सच्चे और झूठे, शरीफ और बदमाश, बुद्धिमान और मूर्ख, शक्तिशाली और दुर्बल, प्रगतिशील और दकियानूस--सभी तरह के लोग हो सकते हैं। तब ‘युवा कहानी’ का क्या मतलब? यह किस काल से किस काल तक की कहानी है? यह किस उम्र से किस उम्र तक के लेखकों की कहानी है?

‘‘मुझे ऐसा लगता है कि आंदोलनधर्मी लोग अपने-आप को आगे बढ़ाने के लिए कुछ लोगों की भीड़ जुटाने भर के लिए नये लेखकों को पकड़ते हैं। इन नये लेखकों की कहानियों की प्रकृति क्या है, गुणवत्ता और मूल्यवत्ता क्या है, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं। उन्हें मतलब है लेखक की उम्र से। तुम आजादी के बाद पैदा हुए? आओ, स्वातंत्र्योत्तर कहानी की छतरी के नीचे आ जाओ। तुम साठ के बाद पैदा हुए? आओ, साठोत्तरी कहानी की छतरी के नीचे आओ। तुम सत्तर के बाद? चलो, आठवें दशक की कहानी की छतरी के नीचे। तुम उम्र नहीं बताना चाहते? कोई बात नहीं, तुम युवा हो, क्योंकि हिंदुस्तान में तो साठा भी पाठा होता है!

‘‘इस तरह कुछ लोगों को जुटाकर अपनी छतरी को कोई ऐसा नाम दे दिया जाता है, जिसके नीचे विभिन्न प्रकार की और परस्पर-विरोधी प्रवृत्तियों को भी खड़ा किया जा सके। नयी, पुरानी, अगली, पिछली, युवा, युवतर, वयस्क, अग्रज, सशक्त, जीवंत, थकी हुई, चुकी हुई आदि-आदि न जाने कितने विशेषण कहानीकारों की पीढ़ियों के साथ जोड़े जा चुके हैं। और हमारी कहानी-समीक्षा है कि इन विशेषणों की निरर्थकता को समझने के बजाय धड़ल्ले से इनका प्रयोग करती है।

‘‘कहानी को किसी दशक या पीढ़ी की छतरी के नीचे ले आने से कहानी की किसी प्रवृत्ति का पता नहीं चलता। हिंदी कहानी के दशक उसके विकास के सूचक नहीं हैं। विकास की गति सदा इकसार और कालक्रमानुसार नहीं होती, क्योंकि विकास हमेशा अंतर्विरोधों के बीच होता है। साहित्य में यह अंतर्विरोध दशकों और पीढ़ियों के बीच न होकर सामाजिक यथार्थ के प्रति अपनाये जाने वाले दृष्टिकोणों के बीच और रचना में अपनाये जाने वाले कला-सिद्धांतों के बीच होते हैं।’’

मुझे आशा है, आज की ‘युवा पीढ़ी’ के कहानीकार वर्षों पहले लिखी गयी मेरी इन पंक्तियों को प्रासंगिक पायेंगे और पीढ़ीवाद की निरर्थकता से बचकर सामाजिक यथार्थ के प्रति अपनाये जाने वाले दृष्टिकोणों तथा रचना में अपनाये जाने वाले कला-सिद्धांतों पर सार्थक बहस चलायेंगे।

--रमेश उपाध्याय

Tuesday, July 6, 2010

नए-पुराने की निरर्थक बहस पर

लेखकों के मुंह में चांदी की चम्मच!?

हिंदी साहित्य में एक नयी पीढ़ी को ले आने का श्रेय स्वयं ही लेने को आतुर श्री रवींद्र कालिया ने ‘नया ज्ञानोदय’ के जून, 2010 के संपादकीय में लिखा है कि ‘‘आज की युवा पीढ़ी उन खुशकिस्मत पीढ़ियों में है, जिन्हें मुँह में चाँदी का चम्मच थामे पैदा होने का अवसर मिलता है।’’

यह वाक्य एक अंग्रेजी मुहावरे का हिंदी अनुवाद करके बनाया गया है--‘‘born with a silver spoon in one's mouth", जिसका अर्थ होता है "born to affluence", यानी वह, जो किसी धनाढ्य के यहाँ पैदा हुआ हो।

इस पर अंग्रेजी के ही एक और मुहावरे का इस्तेमाल करते हुए कहा जा सकता है कि कालिया जी के इन शब्दों से ‘‘बिल्ली बस्ते से बाहर आ गयी है’’! भावार्थ यह कि कालिया जी ने अपने द्वारा हिंदी साहित्य में लायी गयी नयी पीढ़ी का वर्ग-चरित्र स्वयं ही बता दिया है!

वैसे यह कोई रहस्य नहीं था कि सेठों के संस्थानों से निकलने वाली पत्रिकाओं से (पहले भारतीय भाषा परिषद् की पत्रिका ‘वागर्थ’ से और फिर भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ से) पैदा हुई नयी पीढ़ी ही नयी पीढ़ी के रूप में क्यों और कैसे प्रतिष्ठित हुई! अन्यथा उसी समय में ‘परिकथा’ जैसी कई और पत्रिकाएँ ‘नवलेखन’ पर अंक निकालकर जिस नयी पीढ़ी को सामने लायीं, उसके लेखक इतने खुशकिस्मत क्यों न निकले? जाहिर है, वे ‘लघु’ पत्रिकाएँ थीं और ‘वागर्थ’ तथा ‘नया ज्ञानोदय’ तथाकथित ‘बड़ी’ पत्रिकाएँ! और ‘नया ज्ञानोदय’ तो भारतीय ज्ञानपीठ जैसे बड़े प्रकाशन संस्थान की ही पत्रिका थी, जिसका संपादक उस प्रकाशन संस्थान का निदेशक होने के नाते अपने द्वारा सामने लायी गयी पीढ़ी के मुँह में चाँदी का चम्मच दे सकता था!

अतः बहस नयी-पुरानी पीढ़ी के बजाय लेखकों और संपादकों के वर्ग-चरित्र पर होनी चाहिए।

--रमेश उपाध्याय

Tuesday, June 1, 2010

डायरी का एक पन्ना (24 मई, 2010)


‘आलोचना’ में अरुण कमल का संपादकीय

सब कुछ न तो पूरी तरह नष्ट होता है, न पूरी तरह बदलता है। बहुत-सी अच्छी चीजें नष्ट या विकृत हो रही हैं, फिर भी उनमें से कुछ बच रही हैं और पहले से बेहतर नयी चीजों को जन्म दे रही हैं। उन्हीं में जीवन है, उन्हीं में आशा।

आज 'आलोचना' का अप्रैल-जून, 2010 का अंक मिला। इस अंक का संपादकीय बहुत ही अच्छा लगा। अरुण कमल ने अपने संपादकीय में लिखा है:

‘‘प्रचलित पत्र-पत्रिकाओं को देखने से लगता है कि हिंदी का साहित्यकार केवल पुरस्कारों-सम्मानों को लेकर चिंतित है। ...भंगुर प्रसिद्धि या पद या पैसा किसी भी साहित्य या साहित्यकार का इष्ट नहीं होता। फिर भी इसी को लेकर उद्वेग दिखलाता है कि हमारी आलोचना अपना काम ठीक से नहीं कर रही है। यह भी कि बतौर लेखक शायद हमारी चिंताएँ कुछ बदल गयी हैं। दिलचस्प यह है कि सत्ता से सारे लाभ प्राप्त करने वाले, स्वयं सत्ता केंद्रों पर काबिज लोग और साहित्य को दुहकर अपनी बाल्टी भरने वाले सबसे ज्यादा उद्विग्न दिखते हैं। क्या हम सत्ता-विमुख, सत्ता-निरपेक्ष नहीं रह सकते, यदि सत्ता-विरोधी न हो सकें तो? यहाँ सत्ता का अर्थ केवल सरकार नहीं, बल्कि धन या बाजार भी है। ऐसे समय में जब देश की आधी आबादी भूखे सोती हो, जहाँ लगातार बढ़ती छँटनी और बेरोजगारी हो, सत्ता-पोषित-संचालित बेदखली हो और हर तरह के लोकतांत्रिक प्रतिरोध का हिंस्र दमन हो--उस समय बतौर लेखक हमारी मुख्य चिंता क्या हो? हाल के दिनों में मेरे जानते इन मुद्दों पर न तो लेखकों ने कोई सामूहिक विचार-विमर्श किया, न प्रदर्शन, न विरोध। वामपंथी लेखक संगठनों ने भी कोई तत्परता न दिखायी।...हमारा औसत हिंदी लेखक आज पहले से कहीं ज्यादा सुखी-संपन्न है। लेकिन उसकी आत्मा में घुन लग गया है। कभी-कभी तो इच्छा होती है, पूछा जाये, पार्टनर तुम्हारी संपत्ति कितनी है, तुम भी घोषणा करो। यह ठीक है कि इसके आधार पर मूल्य-निर्णय न हुए हैं न होंगे न होने चाहिए, लेकिन इससे पाखंड और फरेब का तो पता चलेगा। जो साहित्य को भी जन और जीवन के पक्ष में मोड़ना चाहते हैं, उनका पक्ष तो मजबूत होगा। और इस तरह हम वापिस साहित्य के वास्तविक प्रश्नों की ओर लौट सकेंगे।’’

इस संपादकीय में लेखकों के मूल्यांकन के बारे में भी बहुत अच्छी बात कही गयी है:

‘‘कोई लेखक अच्छा है या बुरा, महत्त्वपूर्ण है या महत्त्वहीन, इसका निर्णय न तो हाथ उठाकर होगा न प्रस्ताव पारित करके। इसका निर्णय कभी अंतिम भी नहीं होगा। यह हमेशा एक तदर्थ, औपबंधिक निर्णय होगा। लगातार पिटते, मार खाते, बहिष्कृत होते और लहूलुहान होकर ही कोई यहाँ टिकता है। वे सारी लड़ाइयाँ, जो जीवन और समाज में लड़ी जाती हैं, वे एक बार फिर हर श्रेष्ठ रचना में और हर श्रेष्ठ आलोचना में भी लड़ी जाती हैं। और यह लड़ाई हजारों साल तक चलती रहती है। ऐसी स्थिति में सार्वजनिक प्रतिष्ठा यानी पुरस्कार या सम्मान संध्या के युद्ध-विराम से अधिक नहीं। बेहतर हो कि हम ‘हिंस्र पशुओं भरी’ शर्वरी से जूझें और कल के संग्राम की रणनीति तय करें। साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध यह संग्राम हमारी महान साहित्य-परंपरा का ही प्रसाद है। हम शहीद हों तो इसी मोर्चे पर।’’

साधुवाद, भाई अरुण कमल, इतने अच्छे संपादकीय के लिए!

--रमेश उपाध्याय