Sunday, August 16, 2009

लेखकों की नैतिकता

दलगत राजनीति साहित्यिक आलोचना की कसौटी नहीं

७ अगस्त की अपनी टिप्पणी 'निरर्थक विवादों को छोड़ सार्थक बहसें चलायें' में मैंने लिखा था कि लेखकीय नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के नैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक और मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए।

अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि दलगत राजनीति को लेखकों के नैतिक आचरण की कसौटी नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल सर्वमान्य रूप से सही या ग़लत नहीं हो सकता। मसलन, कांग्रेस की नज़र में भाजपा ग़लत हो सकती है और भाजपा की नज़र में कांग्रेस, लेकिन इन दोनों दलों के सदस्य और समर्थक स्वयं को सही समझते रह सकते हैं। यदि वे एक दूसरे को अनैतिक कहते हैं, तो यह कोई वस्तुगत सत्य नहीं, उनका अपना निजी विचार ही हो सकता है। इसे नैतिकता की कसौटी नहीं माना जा सकता। इस प्रकार किसी लेखक को किसी दल का समर्थक होने या न होने के आधार पर नैतिक या अनैतिक नहीं ठहराया जा सकता।

लेकिन हिन्दी लेखकों में दलगत आधार पर स्वयं को नैतिक और दूसरों को अनैतिक सिद्ध करने की एक सर्वथा गैर-जनतांत्रिक प्रवृत्ति पाई जाती है। यह प्रवृत्ति हिन्दी लेखकों में एक तरह के जातिवाद का रूप ले चुकी है, जिसके चलते लेखक जिस दल के सदस्य या समर्थक होते हैं, उसी को सबसे सही और सबसे नैतिक समझते हुए स्वयं को ऊँची और दूसरों को नीची जाति का समझने लगते हैं। कुछ लेखकों का व्यवहार तो ऐसा हो जाता है कि जैसे वे किसी खास दल से जुड़कर ब्राह्मण हो गए हों और बाकी लेखक अछूत। फिर, जैसे ब्राह्मणों में भी अनेक उपजातियां होती हैं, और उनमें भी ऊँच-नीच के भेद होते हैं, वैसे ही एक राजनीतिक दल के बँट जाने से बने विभिन्न दलों के लेखक एक-दूसरे को नीची नज़र से देखने लगते हैं। यह प्रवृत्ति जातिवाद का विरोध करने वाले वामपंथी लेखकों में भी पाई जाती है। उनमें भी प्रगतिशील, जनवादी और क्रांतिकारी लगभग जातिसूचक शब्द बन गए हैं। वे अपनी-अपनी जाति के आधार पर स्वयं को नैतिक और दूसरों को अनैतिक मानते हुए दूसरों की आलोचना करते हैं और स्वयं को सही तथा दूसरों को ग़लत सिद्ध करने की कोशिश किया करते हैं। यह और बात है किक्रांतिकारियों" में भी कुछ उपजातियां हों और उनमें भी ऊँच-नीच का भेद पाया जाता हो।

ज़ाहिर है, ऐसी दलगत राजनीति साहित्यिक आलोचना का आधार नहीं हो सकती। इसके आधार पर लेखकों को नैतिक या अनैतिक नहीं ठहराया जा सकता। हमें लेखकीय आचरण की कोई और ही कसौटियां बनानी होंगी। इसका मतलब यह नहीं है कि लेखकों को राजनीति से अलग रहना चाहिए या दलगत राजनीति को गंदी चीज समझते हुए उससे ऊपर उठने के नाम पर अराजनीतिक हो जाना चाहिए। मेरा कहना केवल यह है कि लेखक की आलोचना उसके लेखन के आधार पर ही की जानी चाहिए। समर्थ आलोचक लेखन में ही लेखक की राजनीति और उसकी नैतिकता खोज सकता है।

--रमेश उपाध्याय

Friday, August 7, 2009

हिन्दी में जारी निरर्थक विवाद

निरर्थक विवादों को छोड़ सार्थक बहसें चलायें

हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास न होने देना चाहने वाली शक्तियां आजकल यह देखकर परम प्रसन्न होंगी कि वे जो चाहती हैं, हिन्दी वाले स्वयं कर रहे हैं। कुछ दिन पहले वर्धा के महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की पत्रिकाओं के संपादकों की नियुक्ति का मामला विवादों में रहा। फिर दिल्ली की हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष की नियुक्ति और सञ्चालन समिति के कुछ सदस्यों के त्यागपत्र विवाद का विषय बने। गोरखपुर में एक कथाकार का एक योगी के हाथों सम्मानित होना अभी चर्चा में ही था कि रायपुर में एक सम्मान समारोह में कुछ लेखकों का भाग लेना और कुछ लेखकों द्वारा उसका बहिष्कार करना विवाद का विषय बन गया। ये विवाद पत्रिकाओं में कम, इन्टरनेट पर अधिक हो रहे हैं और उनमें व्यक्त विचारों तथा भाषा के प्रयोगों को देख कर लगता है कि हिन्दी में होने वाली चर्चाओं का स्तर कितना घटिया और शर्मनाक हो गया है। लगता है, हिन्दी के लेखक-पाठक देश, दुनिया, मानवता, समाज, साहित्य, सभ्यता और संस्कृति से सम्बंधित बृहत्तर प्रश्नों पर विचार करना छोड़ निरर्थक चर्चाओं में व्यस्त हो गए हैं, जिनका उद्देश्य येन केन प्रकारेण स्वयं को चर्चित बनाना होता है। और इसका तरीका होता है कोई ऐसा मुद्दा उछालना, जिस पर बिना किसी जिम्मेदारी या जवाबदेही के कोई भी कुछ भी कह सके। ऐसी चर्चाओं में भाग लेने के लिए न किसी विषय के गंभीर अध्ययन की आवश्यकता होती है, न चिंतन-मनन की। न भाषा पर ध्यान देने की ज़रूरत होती है, न बातचीत को विषय पर केंद्रित रखने के अनुशासन की। अतः कोई भी कितनी ही भद्दी भाषा में कुछ भी कह गुज़रता है।

इन विवादों में भाग लेने वाले लोग आजकल हिन्दी के लेखकों को अनैतिक सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि वे हिन्दी साहित्य में मौजूद गंदगी के विरुद्ध एक सफाई अभियान चला रहे हैं। वे दूसरों को अनैतिक बताते हुए स्वयं को परम नैतिकतावादी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन उनके विचारों से ही नहीं, उनकी भाषा तक से पता चल जाता है कि वे नैतिकता का 'न' भी नहीं जानते और स्वयं किसी प्रकार नैतिक अनुशासन को नहीं मानते। दूसरों पर कीचड़ उछालने को वे सफाई करना समझते हैं और यह भी नहीं देखते कि ऐसा करते समय वे स्वयं कितने और कैसे कीचड़ में सन रहे हैं। उन्हें यह भी होश नहीं रहता कि हिन्दी में जो कुछ होता है, उससे हिन्दी वाले ही नहीं, दूसरी भाषाओँ के लोग भी प्रभावित होते हैं। हिन्दी देश की इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण भाषा है कि अन्य भारतीय भाषाओँ के लेखक हिन्दी लेखकों से एक नेतृत्वकारी भूमिका तथा मार्गदर्शन की अपेक्षा करते हैं। सोचने की बात है कि हिन्दी में हो रही कुचर्चाओं से वे हिन्दी लेखकों तथा हिन्दी साहित्य के बारे में कैसी धारणाएं बनाते होंगे और कैसे निष्कर्ष निकालते होंगे।

इन्टरनेट का सदुपयोग किया जाए, तो वह अपनी भाषा और साहित्य के विकास तथा व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए बेहतरीन माध्यम हो सकता है। लेकिन बड़े खेद की बात है कि इसका दुरुपयोग अपनी भाषा और साहित्य से लोगों को विमुख करने के लिए किया जा रहा है। और यह काम हिन्दी वाले स्वयं कर रहे हैं!

नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के अनैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक तथा मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए। लेकिन हिन्दी लेखकों की अनैतिकता की जो आलोचना आजकल की जा रही है, उसमें कहीं भी यह स्पष्ट नहीं होता कि आलोचक स्वयं क्या है और क्या करना चाहता है।

लेखकों के आचरण को सम्पूर्ण साहित्यिक गतिविधि के सन्दर्भ में ही सही ढंग से समझा जा सकता है और उसके सन्दर्भ में पहला नैतिक प्रश्न आज यह उठाना चाहिए कि साहित्यिक गतिविधियों पर राज्य, राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों द्वारा जो रुपया पानी की तरह बहाया जाता है, वह कहाँ से आता है और कहाँ जाता है। एक जनतांत्रिक व्यवस्था में नैतिकता की कसौटी यह है कि जनता का पैसा जनहित में खर्च होना चाहिए। साहित्यिक गतिविधि के सन्दर्भ में इसका अर्थ यह है कि जनता का पैसा जनता की भाषा की उन्नति के लिए तथा जनता को अच्छा साहित्य सुलभ कराने के लिए खर्च होना चाहिए। यदि वह इस जनतांत्रिक उद्देश्य के लिए खर्च न होकर किन्हीं अन्य उद्देश्यों के लिए खर्च होता है, तो यह अनैतिक है। और इस कार्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जो भी शामिल है, वह अनैतिक है।

इस दृष्टि से देखें, तो साहित्यिक गतिविधि में अनैतिकता का स्रोत है वह पूंजीवादी व्यवस्था और उसमें शासकवर्ग की वह राजनीति, जो अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूपों में लेखकों को भ्रष्ट बनाने के साथ-साथ उनमें छोटे-बड़े का भेद, आपसी ईर्ष्या-द्वेष और गलाकाटू प्रतिद्वंद्विता पैदा करती है। वह साहित्य के विकास और प्रचार-प्रसार के नाम पर असंख्य सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं के जरिये भारी धनराशियाँ खर्च करती है, जिनसे विभिन्न प्रकार की साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और संस्थान बनाये-चलाये जाते हैं, उनके द्वारा हर साल काफ़ी बड़े बजट वाले कार्यक्रम किए जाते हैं, छोटे-बड़े असंख्य पुरस्कार बांटे जाते हैं, पुस्तकों और पत्रिकाओं की थोक सरकारी खरीद की जाती है, साहित्यिक पत्रिकाओं को विज्ञापन तथा आर्थिक सहायतायें दी जाती हैं और लेखकों को विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ, सहायताएं, सुविधाएं आदि उपलब्ध कराई जाती हैं। इस प्रक्रिया में जो विशाल धनराशियाँ खर्च की जाती हैं, वे नैतिकता की इस कसौटी पर कदापि जायज़ नहीं ठहराई जा सकतीं कि जनता का पैसा जनता की भाषा की उन्नति के लिए तथा जनता को अच्छा साहित्य सुलभ कराने के लिए खर्च होना चाहिए।

अतः जो लोग हिन्दी साहित्य में वाकई कोई सफाई अभियान चलाना चाहते हैं, उन्हें लेखकों की अनैतिकता के मूल स्रोत पर ध्यान देना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए कि उस स्रोत से साहित्य में गन्दगी का आना बंद हो। इस दिशा में पहला और सबसे ज़रूरी काम यह है कि यदि जनता का पैसा साहित्यिक गतिविधि में जनता के लिए खर्च न होकर किन्हीं और लोगों पर किन्हीं और उद्देश्यों के लिए खर्च हो रहा है, तो इससे सम्बंधित तमाम तथ्य और आंकडे जनता के सामने लाकर इसके विरुद्ध एक व्यापक जन-आन्दोलन चलाया जाए।

लेकिन यह गंभीरतापूर्वक मेहनत और ज़िम्मेदारी के साथ किया जाने वाला काम है और यह काम अकेले-अकेले नहीं, मिल-जुलकर ही किया जा सकता है। यह काम निरर्थक विवादों में अपना और दूसरों का समय नष्ट करके नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ सार्थक बहस चला कर ही किया जा सकता है।

--रमेश उपाध्याय

Thursday, July 9, 2009

एक ताज़ा कविता


बुढ़ऊ का पाजामा

बुढ़ऊ का तकियाकलाम था--
"बैठा मत रह कुछ किया कर
पाजामा उधेड़कर सिया कर।"
औरों को उपदेश नहीं देते थे बुढ़ऊ
ख़ुद इसका पालन करते थे
जब से सेवा मुक्त हुए वे
बैठ गए पाजामा लेकर
रोज़ उधेड़ा करते उसको
रोज़ सिया करते थे उसको
लेकिन आख़िर बोर हो गए
लगे सोचने--
"बहुत हो गई दुनियादारी
कर लो चलने की तैयारी
यह सीना-उधेड़ना आख़िर
क्यूं और कब तक?
रोज़ सुबह उठने से बेहतर
एक रात सो जाएँ सदा को शांतिपूर्वक।"
लेकिन देखा--मृत्यु सामने खड़ी हुई है
उन्हें देख मुस्करा रही है
लिए हाथ में वह पाजामा
जो उधेड़कर बुढ़ऊ ने कल
फ़ेंक दिया था, सिया नहीं था
कहा मृत्यु ने--
"यह लो, बुढ़ऊ!
अभी नहीं मरना है तुमको
कई साल का जीवन बाकी बचा तुम्हारा
कर लो जो करना है तुमको
अपना काम अधूरा क्यों छोड़ो?
पूरा कर जाओ
यह उधडा पाजामा अपना सीकर जाओ।"

--रमेश उपाध्याय

Tuesday, June 2, 2009

लोकसभा चुनावों में

जनता की राजनीतिक समझदारी

भारतीय जनतंत्र में--एक आदर्श जनतंत्र की दृष्टि से--चाहे जितने दोष हों, चुनावों में जनता के विवेक और राजनीतिक समझदारी का परिचय हर बार मिलता है। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भी उसकी यह समझदारी प्रकट हुई। मसलन
१- जनता ने राजनीति में युवाओं को समर्थन दिया है, लेकिन स्पष्ट कर दिया है कि वह राहुल गाँधी जैसे युवाओं को पसंद करती है, वरुण गाँधी जैसे युवाओं को नहीं।
२- उसे बूढे-पुराने राजनीतिज्ञों से भी परहेज़ नहीं, लेकिन वे मनमोहन सिंह जैसे हों, लालकृष्ण अडवानी जैसे नहीं।
३- भाजपा ने भावी प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी को पेश किया, जबकि कांग्रेस ने राहुल गाँधी को। जनता ने नरेन्द्र मोदी को खारिज करके राहुल गाँधी को चुना।
४- सोनिया गाँधी, राहुल और प्रियंका का चुनाव प्रचार दूसरी पार्टियों के चुनाव प्रचार से भिन्न था। उसमें शालीनता और गंभीरता के साथ-साथ एक प्रकार के निस्स्वार्थ भाव का प्रदर्शन भी था, जैसे वे कह रहे हों कि हमें राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की कोई जल्दी नहीं है। जनता ने इन बातों को पसंद किया।
५- जनता ने वाम दलों की 'गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा' वाली राजनीति को खारिज कर दिया है, क्योंकि यह नकारात्मक राजनीति है। वाम दल बहुत समय से विकल्प के नाम पर यही कहते आ रहे हैं कि यह नहीं चाहिए-वह नहीं चाहिए। वे यह नहीं बताते कि क्या चाहिए। जनता ने उन्हें बता दिया है कि सकारात्मक राजनीति करो और साफ़-साफ़ बताओ कि हम यह चाहते हैं, हम यह कर सकते हैं, और हम यह करेंगे। इससे उन्हें अपनी ताकत का सही अंदाजा रहेगा और वे 'तीसरा मोर्चा' जैसा भानमती का कुनबा जोड़कर सत्ता में पहुँचने की खामखयाली से मुक्त रह सकेंगे।

--रमेश उपाध्याय

Sunday, May 10, 2009

मल्लिका साराभाई

हमें इसी को बदलना है
(३ मई, २००९ को लिखी गई डायरी)

इस बार के आम चुनावों में जिस व्यक्ति ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है, वह है मल्लिका साराभाई। प्रसिद्द नृत्यांगना, जो गुजरात में गांधीनगर से प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक लालकृष्ण आडवाणी के विरूद्ध चुनाव लड़ रही है। कहाँ शास्त्रीय नृत्य और कहाँ ऐसी भीषण गर्मी में गाँव-गाँव और घर-घर जाकर किया जाने वाला चुनाव प्रचार! कहाँ कला की साधना और कहाँ राजनीतिक संघर्ष! गुजरात में भाजपा का शासन है और वहां का मीडिया ज़्यादातर भाजपा का ही प्रचारक है। इसलिए वह मल्लका के विचारों और उसके चुनाव प्रचार से सम्बंधित समाचारों को दबा देता है, उसके विरुद्ध प्रचार करता है, उसकी हँसी उड़ाता है--कि देखो, यह औरत उस लौह पुरूष को टक्कर देने चली है, जो इस सीट से भारी बहुमत के साथ चुना जाता रहा है और इस बार का चुनाव जीत कर देश का प्रधानमन्त्री बनने वाला है!

मल्लिका को भी मालूम है कि वह जीतेगी नहीं। उसने यह जानते हुए ही चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। वह मौजूदा राजनीति को एक नए ढंग की राजनीति के ज़रिये चुनौती देने के लिए यह चुनाव लड़ रही है। वह एक नैतिक, सांस्कृतिक और सौन्दर्यात्मक मूल्यों वाली राजनीति की संभावनाओं को सामने लाने के लिए राजनीतिक रणक्षेत्र में उतरी है। वह किसी राजनीतिक दल के टिकट पर नहीं, स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही है, क्योंकि मुख्यधारा के सभी दलों ने चुनावी राजनीति को भ्रष्टाचार और अपराधीकरण की राजनीति बना दिया है। उनके लिए यह केवल बहुमत पाने का गणित रह गया है, चाहे वह किसी भी तरीके से पाया जाए। अपने इस 'खेल' में उन्होंने देश के नागरिक को बिलकुल भुला दिया है। यही कारण है कि २००४ से २००९ तक की पिछली लोकसभा में ५३४ सांसदों में से १२८ सांसदों पर विभिन्न अपराधों के आरोप थे। मल्लिका पूछती है--"क्या यह शर्मनाक नहीं? हमें इसी को बदलना है।"

शाबाश, मल्लिका!

--रमेश उपाध्याय

आज के हालात पर एक कविता

अँधेरा गहरा रहा है

अँधेरा गहरा रहा है
रास्ते सब खो गए हैं
दिशाएं अंधी हुई हैं
और बढ़ती जा रही है भीड़ उनकी
जो न जाने कहाँ जायेंगे
न जाने क्या करेंगे
क्योंकि अपने रास्तों, अपनी दिशाओं
और अपनी मंजिलों को
ख़ुद नहीं वे जानते हैं
साथ चलते दूसरों को जो नहीं पहचानते हैं
साथ हैं पर चल रहे हैं अजनबी-से
उन सभी से घृणा करते जो कि आगे बढ़ गए हैं
या कि पीछे रह गए हैं
भीड़ में जो ख़ुद धकेले जा रहे हैं
सोचते फिर भी कि निर्जन में अकेले जा रहे हैं
इसलिए उन सभी से उनको शिकायत है--
कि ये क्यों साथ हैं अपने
कि ये क्यों बढ़ गए आगे
कि ये क्यों रह गए पीछे
और वे जो आ रहे हैं सामने से और
दायें या कि बाएँ से
कि जो टकरा रहे हैं--सामने से दे रहे टक्कर
कि जो धकिया रहे हैं उन्हें दायें या कि बाएँ से
सभी उनके शत्रु हैं जो रोकते हैं रास्ता उनका
कि जो चलने नहीं देते उन्हें बढ़ने नहीं देते
उन्हें इन शत्रुओं को ख़त्म करना है
अतः सब लड़ रहे हैं एक-दूजे से
बिना जाने कि यह कैसी लड़ाई है
कहाँ से शुरू होती है
कहाँ पर ख़त्म होती है
कि आख़िर लक्ष्य क्या इसका
कि आख़िर अर्थ क्या इसका?

--रमेश उपाध्याय

Wednesday, April 22, 2009

मुद्दे की बात

क्या सचमुच कोई मुद्दा नहीं है?

कहा जा रहा है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में किसी दल के पास कोई मुद्दा नहीं है। यह बड़ी विचित्र बात है। क्या भूख कोई मुद्दा नहीं है? क्या कुपोषण कोई मुद्दा नहीं है? क्या रोटी, कपड़ा और मकान अब कोई मुद्दे नहीं हैं? क्या जनता के एक बहुत बड़े भाग को पीने का साफ़ पानी तक न मिलना कोई मुद्दा नहीं है? क्या करोड़ों लोगों तक स्वास्थ्य सेवाओं का न पहुँच पाना और विशेष रूप से स्त्रियों और बच्चों का लाइलाज मर जाना कोई मुद्दा नहीं है? क्या गरीबों के बच्चों का अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाना कोई मुद्दा नहीं है? क्या नौकरियों का तेज़ी से लगातार कम होते जाना और बेरोज़गारी का बढ़ते जाना कोई मुद्दा नहीं है? क्या कृषि का संकट और उसके कारण लाखों किसानों द्बारा की जा रही आत्महत्याएं कोई मुद्दा नहीं हैं?

और तो और आज की वैश्विक मंदी से उत्पन्न आर्थिक संकट भी इस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है, जबकि यह संकट तो केवल गरीब लोगों का नहीं, संपन्न लोगों और उनकी व्यवस्था का संकट भी है। उत्पादन और निर्यात का घटना, उसके कारण उद्योग-धंधों का बंद होना और उस से सम्बंधित तरह-तरह की समस्याओं का पैदा होना भी क्या कोई मुद्दा नहीं है?

सबसे ज़्यादा हैरानी की बात तो यह है कि मीडिया और राजनीतिक दलों को ही नहीं, हिन्दी के समकालीन लेखकों को भी आज के यथार्थ में मौजूद ये ज्वलंत मुद्दे भी कोई मुद्दे नहीं लग रहे। वे इन मुद्दों पर अपनी रचनाओं में चुप या उदासीन क्यों दिखाई दे रहे हैं?

--रमेश उपाध्याय