Wednesday, October 20, 2010

नये कहानीकार एक नया कहानी आंदोलन चलायें

‘परिकथा’ के सितंबर-अक्टूबर, 2010 के अंक में
रमेश उपाध्याय से अशोक कुमार पांडेय की बातचीत के कुछ चुने हुए अंश

अशोक कुमार पांडेय : रमेश जी, यह बताइए कि 1980 के दशक के बाद के कालखंड में हिंदी कविता और हिंदी कहानी, दोनों में किसी आंदोलन का जो अभाव दिखता है, उसके क्या कारण हैं?

रमेश उपाध्याय : अशोक जी, इस प्रश्न पर सही ढंग से विचार करने के लिए साहित्यिक आंदोलन और साहित्यिक फैशन में फर्क करना चाहिए। साहित्यिक आंदोलन--जैसे भक्ति आंदोलन या आधुनिक युग में प्रगतिशील और जनवादी आंदोलन--हमेशा अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलनों से सार्थक और सोद्देश्य रूप में जुड़े होते हैं, जबकि साहित्यिक फैशन ‘कला के लिए कला’ के सिद्धांत पर चलते हैं और अंततः उनका संबंध साहित्य के बाजार और व्यापार से जुड़ता है। आपने 1980 के दशक के बाद के कालखंड की बात की। अर्थात् आप 1991 से 2010 तक के बीस वर्षों में हिंदी साहित्य में किसी आंदोलन को अनुपस्थित पाते हैं। तो आप यह देखें कि आजादी के बाद से 1980 के दशक तक हिंदी साहित्य मुख्य रूप से दो बड़े आंदोलनों से जुड़ा हुआ था। एक राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से और दूसरे प्रगतिशील-जनवादी आंदोलन से । और यह दोनों ही प्रकार का साहित्य अपने-अपने ढंग से सार्थक और सोद्देश्य साहित्य था। लेकिन आजादी के बाद जो साहित्यिक आंदोलन चले, वे आंदोलन कम और साहित्य के नये फैशन ज्यादा थे।

अशोक कुमार पांडेय : आपके विचार से आज की कहानी की मुख्य प्रवृत्ति कौन-सी है?

रमेश उपाध्याय : आज के ज्यादातर लेखक वर्तमान में जीते हैं और वर्तमान में उन्हें सिर्फ बाजार दिखता है--एक भूमंडलीय बाजार--जिसमें अपनी जगह बनाना, अपना बाजार बनाना, उस बाजार में टिके रहना और ऊँची कीमत पर बिकना ही उन्हें अपना और अपने लेखन का एकमात्र उद्देश्य दिखता है। इस प्रवृत्ति को आप बाजारोन्मुखी प्रवृत्ति कह सकते हैं और आज की मुख्य प्रवृत्ति यही है।

अशोक कुमार पांडेय : मैं जानता हूँ कि आप बाजारवाद के विरोधी हैं, इसलिए आप इस बाजारोन्मुखी प्रवृत्ति के समर्थक नहीं हो सकते। तो आज की कहानी की वह कौन-सी प्रवृत्ति है, जिसे आप सही मानते हैं?

रमेश उपाध्याय : भविष्योन्मुखी प्रवृत्ति। कहानीकार किसी भी पीढ़ी का हो, आज उसमें भविष्योन्मुखी दृष्टि से भूमंडलीय यथार्थ को समझने की और उसे प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता होनी चाहिए।

अशोक कुमार पांडेय : हिंदी कहानी की आलोचना की अब क्या भूमिका है? क्या वह वास्तव में नये रचनाकारों की परख कर पा रही है?

रमेश उपाध्याय : आपके प्रश्न में ही उसका उत्तर निहित है। लेकिन यह देखना चाहिए कि इसका कारण क्या है। मुझे लगता है कि हिंदी कहानी और कहानी की आलोचना दोनों को बाजारवाद बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। बाजारोन्मुख कहानीकार और आलोचक यह मानकर चल रहें हैं कि पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं है, इसलिए यह दुनिया अब हमेशा ऐसे ही चलेगी। इसे बदलना, सुधरना, सँवारना, बेहतर बनाना संभव नहीं है। साहित्य से और कहानी जैसी विधा से तो बिलकुल नहीं। वे कहानी को बाजार में बिकने वाली वस्तु मानते हैं। कहानीकार आलोचकों से अपेक्षा करते हैं कि वे उनकी कहानी को--और उनको भी--बाजार में ऊँचे दामों में बिकने लायक बनायें। अर्थात् उनका विज्ञापन करें, बाजार में उनकी जगह बनायें, उनकी कीमत बढ़ायें। दुर्भाग्य से आलोचक स्वयं भी यही चाहते हैं कि वे लेखकों का बाजार बना और बिगाड़ सकने की भूमिका में बने रहें, ताकि वे स्वयं भी बाजार में टिके रहें और उनकी अपनी कीमत भी बढ़ती रहे। ऐसे लेखक और ऐसे आलोचक दुनिया के भविष्य के बारे में नहीं, केवल अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं।

अशोक कुमार पांडेय : लेकिन ऐसे कहानीकार और ऐसे आलोचक भी तो हैं, जो अपना भविष्य दुनिया के भविष्य के साथ जोड़कर देखते हैं?

रमेश उपाध्याय : निश्चित रूप से हैं। मगर उन्हें आपस में जोड़ने वाला कोई आंदोलन न होने के कारण वे बिखरे हुए हैं, अलग-थलग पड़े हुए हैं। जरूरत है कि वे निकट आयें और मिल-जुलकर एक आंदोलन चलायें। एक नया कहानी आंदोलन। समाज को, समय को ऐसे ही कहानीकारों और आलोचकों की जरूरत है।
अशोक कुमार पांडेय : आपके विचार से उस नये आंदोलन का नाम और रूप?

रमेश उपाध्याय : रूप तो आंदोलन चलाने वाले लेखक ही उसे देंगे, पर मैं एक नाम सुझा सकता हूँ। हमारी इस बातचीत में अभी-अभी दो शब्द आये--बाजारोन्मुखी और भविष्योन्मुखी। तो हम बाजारोन्मुखी कहानी के बरक्स भविष्योन्मुखी कहानी का आंदोलन ही क्यों न चलायें?

Wednesday, September 29, 2010

कहाँ है वह शानदार अनिश्चितताओं का खेल?

क्रिकेट को ‘ग्लोरियस अनसर्टेन्टीज़’ (शानदार अनिश्चितताओं) का खेल कहा जाता है। पूरी मेहनत, पूरी तैयारी और पूरी कुशलता से खेलने पर भी इसमें कब क्या हो जाये, कोई नहीं जानता। इसमें कोई भी टीम जीतते-जीतते हार सकती है और हारते-हारते जीत सकती है। यह अनिश्चितता ही इस खेल को इतना रोचक, रोमांचक और लोकप्रिय बनाती है।

खेल के मैदान में जाकर या अपने घर में टी।वी. के सामने बैठकर क्रिकेट मैच देखने के शौकीन दर्शकों को इसकी अनिश्चितता में ही आनंद आता है। यदि वन डे में अंत के पहले मैच एकतरफा हो जाने से एक टीम की जीत निश्चित हो जाये, या टैस्ट में हार-जीत के फैसले की जगह मैच ड्रॉ की ओर बढ़ने लगे, तो दर्शकों की उत्सुकता खत्म हो जाती है। मैदान में बैठे दर्शक उठकर चल देते हैं, घर में देख रहे दर्शक टी.वी. बंद कर देते हैं। सबसे दिलचस्प खेल वह होता है, जिसमें दोनों टीमों के बीच काँटे का मुकाबला हो और ज्यों-ज्यों मैच अंत की ओर बढ़े, दर्शकों की उत्सुकता, चिंता और दिल की धड़कन बढ़ती जाये। कितने ही दर्शक अपने वांछित परिणाम के लिए प्रार्थना करने लगते हैं। अवांछित परिणाम निकलने पर किसी-किसी का हार्टफेल भी हो जाता है।

हमारा जीवन भी शानदार अनिश्चितताओं का खेल है। इसमें भी कोई नहीं जानता कि कब क्या हो जायेगा। लेकिन इस अनिश्चितता में ही आशा है और सही दिशा में उचित प्रयास करने की प्रेरणा भी। उतार-चढ़ाव और सफलता-विफलता के अवसर आते रहते हैं, लेकिन जीवन में उत्सुकता, उम्मीद और उमंग बनी रहती है। अनिश्चितता ही जीवन को दिलचस्प और अच्छे ढंग से जीने लायक बनाती है।

लेकिन जब से ‘मैच फिक्सिंग’ का सिलसिला शुरू हुआ है (और अब तो ‘स्पॉट फिक्सिंग' भी होने लगी है, जैसी पिछले दिनों इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच खेले गये एक मैच में पहले से तयशुदा तीन ‘नो बॉल’ फेंके जाने के रूप में सामने आयी), तब से क्रिकेट का खेल देखने का मजा ही जाता रहा। यह भरोसा ही नहीं रहा कि जो हम देख रहे हैं, वह वास्तव में हो रहा है या पहले से कहीं और, किसी और के द्वारा ‘फिक्स्ड’ होकर तयशुदा तरीके से किया जा रहा है!

यही हाल हमारे जीवन का हो गया है। पहले भी धाँधलियाँ होती थीं, फिर भी कहीं न कहीं न्याय और ‘फेयरनेस’ में विश्वास बना रहता था। योग्यता के आधार पर कहीं चुने जा सकने की उम्मीद बनी रहती थी। लेकिन अब तो ऐसा लगता है, जैसे जीवन में भी हर चीज़ पहले से ‘फिक्स्ड’ है--परीक्षा में, इंटरव्यू में, प्रतियोगिता में, हर तरह के चयन और नामांकन में। और तो और, जनतंत्र के नाम पर लड़े जाने वाले चुनावों में, जनहित के नाम पर बनायी जाने वाली नीतियों में, शासन और प्रशासन के कार्यों में, यहाँ तक कि न्यायालयों के निर्णयों में भी! ऐसी स्थिति में आशा कहाँ से पैदा हो? प्रयास की प्रेरणा कैसे मिले? जीवन में रुचि कैसे बनी रहे? आनंद कहाँ से आये?

जब पहले से ही मालूम हो कि ‘वे’ ही जीतेंगे और ‘हम’ ही हारेंगे, तो जीवन में क्या रुचि रहेगी? क्या आशा और क्या प्रेरणा?

--रमेश उपाध्याय

Saturday, September 25, 2010

कहाँ है जनता जनार्दन?

कल (24 सितंबर, 2010) के दैनिक ‘जनसत्ता’ में अरुण कुमार पानीबाबा का लेख छपा है, ‘खेल-कूद और नौकरशाह’, जिसमें बताया गया है कि दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में एक लाख करोड़ रुपये का घोटाला हो चुका है। लिखा है--‘‘आम सूचनाओं के मुताबिक 2002 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने खेल समारोह की स्वीकृति दी, तब 617.5 करोड़ रुपये खर्च का अनुमान था। 2004 से अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए महँगाई में दुगनी-तिगुनी वृद्धि की, तो लागत बढ़कर दो हजार करोड़ तक हो जाना लाजमी था। फिर पता चला कि 2008 में संशोधित अनुमान सात हजार करोड़ का हो गया था। अगले बरस 2009 में प्रमुख लेखाकार के हिसाब से तेरह हजार करोड़ रुपये का प्रावधान हो गया था। अब दो शोधकर्ताओं ने विभिन्न सूत्रों से विविध आँकड़े जुटाकर सत्तर हजार छह सौ आठ करोड़ का आँकड़ा नाप-तोलकर प्रस्तुत कर दिया।’’

आगे लिखा है--‘‘हमारे संकुचित विवेक की समस्या यह है कि इन आँकड़ों पर विश्वास कर लें, तो यह कैसे बूझें कि इतनी बड़ी रकम बिना ‘बजट’ आयी कहाँ से? और अगर प्रावधान करके खर्च की गयी है, तो क्या बजट सत्र में पूरी संसद सो रही थी? और किन्हीं अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से ऋण लिया गया, तो यह काम गुपचुप कैसे होता रहा? यह विश्वास भी नहीं होता कि भारत सरकार ने सब कुछ अनधिकृत तौर पर कर लिया होगा।’’

इसके पहले एक जगह लिखा है--‘‘जनता दल (एकीकृत) के अध्यक्ष शरद यादव ने लोकसभा में डंके की चोट पर चुनौती दे दी कि खेल समारोह के नाम पर घोटाला एक लाख करोड़ रुपये का हो चुका है। हम हतप्रभ थे, चकित भाव से सोच रहे थे कि ‘अतिशयोक्ति’ पर नाप और नियंत्रण लागू होगा। मगर किसी सरकारी बाबू ने आज तक चूँ भी नहीं की।’’

लिखा है--‘‘भारत सरकार ने ‘आश्वासन’ दिया है कि पैसे-पैसे का हिसाब होगा और चोरों को कड़ी सजा दी जायेगी। लेकिन सभी जानते हैं, आम नागरिक भी अवगत है कि पिछले पाँच-छह दशक में जो शासन-प्रशासन विकसित हुआ है, उसमें भ्रष्ट नौकरशाह या नेता की धींगाधींगी को नियंत्रित करने का हाल-फिलहाल कोई तरीका नहीं है।’’ अतः ‘‘किसी के मन में कोई डर नहीं है। तमाम दोषी अफसर-नेता आश्वस्त हैं। प्रजातंत्र के फसाद में ऐसा कौन है, जिसके हाथ मल में नहीं सने, और मुख पर कालिख नहीं लगी है?’’

लेख के अंत में लिखा है--‘‘हमारी समझ से, प्रजातंत्र में जनता को स्वयं जनार्दन की भूमिका का निर्वहन करना होता है। क्या इस एक लाख करोड़ रुपये के घोटाले के बाद भी देश सोता रहेगा?’’

मेरा प्रश्न है: कहाँ है जनता जनार्दन?

--रमेश उपाध्याय

Friday, September 3, 2010

रचनाशीलता को बचाने और बढ़ाने के लिए एक पहल

‘‘आज के समय में यह भी एक बड़ा भारी काम है कि अपनी और दूसरों की रचनाशीलता को बचाने और बढ़ाने का प्रयास किया जाये। उसे आज के रचना-विरोधी माहौल में असंभव न होने दिया जाये। क्या इसके लिए कोई सकारात्मक पहल की जा सकती है? यदि हाँ, तो कैसे? इस पर रचनाकारों को मिल-बैठकर, आपस में, छोटी-बड़ी गोष्ठियों और सम्मेलनों में विचार करना चाहिए। लेकिन इंटरनेट भी एक मंच है, इस पर भी इस सवाल पर बात होनी चाहिए। नहीं?’’

फेसबुक पर मेरे इस विचार का जो व्यापक स्वागत हुआ है, उससे मैं बहुत प्रसन्न और उत्साहित हूँ। लगता है कि हिंदी के अनेक लेखक, पाठक, पत्रकार, प्राध्यापक आदि ऐसी पहल के विचार से सहमत ही नहीं, बल्कि उसे तुरंत शुरू करने के लिए तैयार भी हैं। उनमें से कुछ मित्रों ने सुझाव दिया है कि मैं इस पहल की एक रूपरेखा प्रस्तावित करूँ, जिस पर विचार-विमर्श के बाद एक न्यूनतम सहमति बने और काम शुरू हो।

तो, मित्रो, ऐसी कोई रूपरेखा प्रस्तुत करने के बजाय मैं उससे पहले की कुछ बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। मैं कोई नया मंच या संगठन बनाने की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि इंटरनेट के रूप में जो एक बहुत बड़ा, व्यापक और प्रभावशाली मंच पहले से ही मौजूद है, उसी पर एक नयी पहल की जरूरत की बात कर रहा हूँ। हम लोग, जो इस मंच पर उपस्थित हैं, कुछ काम पहले से ही कर रहे हैं। मसलन, हम एक-दूसरे को अपनी तथा दूसरों की रचनाओं की जानकारी दे रहे हैं, अपनी तथा दूसरों की रचनाशीलता से संबंधित समस्याओं को सामने ला रहे हैं, अपने साहित्यिक अनुभवों और सामाजिक तथा सांस्कृतिक सरोकारों को साझा कर रहे हैं और इस प्रकार दूर-दूर बैठे होने पर भी एक-दूसरे के निकट आकर एक साहित्यिक वातावरण बना रहे हैं। मगर मुझे लगता है कि इस माध्यम की अपार संभावनाओं के शतांश, बल्कि सहस्रांश का भी उपयोग अभी हम नहीं कर पा रहे हैं।

मैं केवल ब्लॉग और फेसबुक की बात नहीं, पूरे इंटरनेट की बात कर रहा हूँ। मुझे लगता है कि यह हमारी रचनाशीलता को बचाने और बढ़ाने के लिए एक अत्यंत उपयोगी और प्रभावशाली माध्यम है, जो हमें व्यक्तिगत और सामाजिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक, स्थानीय और भूमंडलीय सभी स्तरों पर एक साथ सोचने और सक्रिय होने में समर्थ बना सकता है। लेकिन फिलहाल मैं इतने विस्तार में न जाकर केवल लेखकों से अपनी और दूसरों की रचनाशीलता को बचाने और बढ़ाने के माध्यम के रूप में इसके उपयोग की बात करना चाहता हूँ।

शायद आपको याद हो, मैंने 12 जुलाई, 2010 की अपनी पोस्ट में ‘सोशल नेटवर्किंग’ के बारे में लिखते हुए यह सवाल उठया था कि हम इंटरनेट की आभासी दुनिया का रिश्ता वास्तविक दुनिया से कैसे जोड़ें। मैंने लिखा था--‘‘क्या हम इस माध्यम का उपयोग वास्तविक दुनिया के उन जीते-जागते लोगों तक पहुँचने के लिए कर सकते हैं, जिनके पास जाकर हम उनसे हाथ मिला सकें, गले मिल सकें, आमने-सामने बैठकर चाय-कॉफी पीते हुए बात कर सकें, हँसी-मजाक और धौल-धप्पा कर सकें, लड़-झगड़ सकें और मिल-जुलकर कोई सार्थक काम करने की सोच सकें?’’

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं कहना चाहता हूँ: क्या हम लेखकों के रूप में अपनी और दूसरों की रचनाशीलता को बचाने और बढ़ाने के लिए इस माध्यम का उपयोग कर सकते हैं? ‘दूसरों’ से मेरा अभिप्राय दूसरे लेखकों से नहीं, बल्कि पाठकों से है; क्योंकि मैं यह मानता हूँ कि पाठक भी रचनाशील होते हैं और इस नाते वे लेखक के साथी-सहयोगी रचनाकार होते हैं। मैं यह भी मानता हूँ कि पाठकों की रचनाशीलता को बचाये-बढ़ाये बिना हम अपनी रचनाशीलता को भी नहीं बचा-बढ़ा सकते। लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य है--और दुर्भाग्य का कारण भी--कि हम अपने पाठकों की परवाह नहीं करते। हम न तो उन्हें जानते हैं, न उनके लिए लिखते हैं। हम लिखते हैं संपादकों, प्रकाशकों, आलोचकों, पुरस्कारदाताओं या किसी अन्य प्रकार से बाजार में हमारी जगह बना सकने वालों के लिए; जबकि हमारी रचनाशीलता को बचाने और बढ़ाने वाले होते हैं हमारे पाठक। पत्रिकाओं और पुस्तकों के माध्यम से पाठकों तक हमारी सीधी पहुँच नहीं होती, लेकिन इंटरनेट के माध्यम से हम उन तक सीधे पहुँच सकते हैं।

कारण यह कि हमारे लिए इंटरनेट एक ऐसा मंच है, जो सार्वजनिक और सार्वदेशिक होते हुए भी हमें अपनी बात अपने ढंग से कहने की पूरी आज़ादी देता है। यहाँ हम किसी और संस्था या संगठन के सदस्य नहीं, बल्कि स्वयं ही एक संस्था या संगठन हैं। किसी और नेता के अनुयायी नहीं, स्वयं ही अपने नेता और मार्गदर्शक हैं। किसी और संपादक या प्रकाशक के मोहताज नहीं, स्वयं ही अपने संपादक और प्रकाशक हैं। लेकिन इस स्वतंत्रता और स्वायत्तता का उपयोग हम अपनी और अपने पाठकों की रचनाशीलता को बचाने-बढ़ाने के लिए बहुत ही कम कर पा रहे हैं।

मेरी मूल चिंता यह है कि यह काम कैसे किया जाये। मगर, मित्रो, मैं अकेला इस समस्या का समाधान खोज पाने में असमर्थ हूँ और मुझे लगता है कि यह काम हम सब रचनाकारों को मिल-जुलकर ही करना पड़ेगा। मगर कैसे? इस पर आप सोचें और मुझे बतायें। मिलकर न बताना चाहें, तो इंटरनेट के जरिये ही बतायें, पर बतायें जरूर; क्योंकि यह काम अत्यंत आवश्यक होने के साथ-साथ आपका भी उतना ही है, जितना कि मेरा।

--रमेश उपाध्याय

Sunday, August 22, 2010

यह केवल लेखिकाओं की लड़ाई नहीं है

कभी-कभी ‘बाँटो और राज करो’ के सिद्धांत पर चलने वाली व्यवस्था के विरुद्ध जनतांत्रिक शक्तियों को एकजुट होने के अवसर अनायास मिल जाते हैं। लेकिन अपने ही भीतर की नासमझी के चलते वे उन अवसरों को गँवा देती हैं। राय-कालिया प्रसंग में कुछ ऐसी ही दुर्घटना घटित होती दिखायी पड़ रही है।

‘नया ज्ञानोदय’ में छपे विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में लेखिकाओं के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किये जाने से लेखिकाओं ने ही नहीं, बहुत-से लेखकों ने भी स्वयं को आहत-अपमानित अनुभव किया और राय के साथ-साथ संपादक रवींद्र कालिया के विरुद्ध भी आवाज उठायी। जबसे हिंदी में ‘स्त्री विमर्श’ चला है, कई लेखिकाएँ पुरुष मात्र को स्त्री-विरोधी या शत्रु मानने वाला स्त्रीवाद चलाती आ रही हैं, जिससे उन्हें साहित्य में एक पहचान मिली है, लेकिन स्त्रीवादी और आम जनवादी साहित्य कमजोर हुआ है। राय-कालिया प्रसंग में यह बात उभरकर सामने आयी कि पुरुष भी स्त्रीवादी हो सकते हैं और स्त्रियों के अपमान के विरोध में उनके साथ खड़े होकर न केवल स्त्री आंदोलन को, बल्कि जनवादी आंदोलन को भी मजबूत बनाने वाली एकजुटता कायम कर सकते हैं।

हम सभी को इस एकजुटता को बनाये रखने तथा बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि कुछ लेखिकाओं ने इस महत्त्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान ही नहीं दिया है। ऐसा भी हो सकता है कि उन्होंने या तो इसका महत्त्व ही न समझा हो, या इससे अपने ‘स्त्री विमर्श’ और उसके कारण साहित्य में बनी अपनी विशिष्ट स्थिति को खतरे में पड़ते समझकर इसकी उपेक्षा करते हुए अपना पुरुष मात्र का विरोधी ‘‘एकला चलो रे’’ वाला राग अलापना शुरू कर दिया हो। 19 अगस्त के ‘दि हिंदू’ नामक अंग्रेजी दैनिक में मृणाल पांडे ने और 20 अगस्त के हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ में अनामिका ने जो लिखा है, उससे ऐसा ही लगता है। दोनों के लेख पढ़कर लगता है कि जैसे उन्हें इस पूरे प्रकरण में पुरुष लेखकों की भूमिका का या तो पता ही नहीं है, या फिर वे उसे एकदम नगण्य और उपेक्षणीय मानकर चल रही हैं।

निंदनीय राय-कालिया प्रसंग में, मेरे विचार से, सबसे अच्छी बात यह हुई है कि लेखिकाओं के अपमान के विरुद्ध बहुत-से लेखकों ने भी आवाज उठायी। यह उस ‘स्त्री विमर्श’ से आगे की चीज है, जिसमें पुरुष मात्र को स्त्रियों का शत्रु माना जाता है। यह पितृसत्ता, राज्यसत्ता और पूंजी की सत्ता के विरुद्ध स्त्री-पुरुष एकजुटता की दिशा में उठा एक स्वागतयोग्य कदम है। अब हमारा प्रयास होना चाहिए कि यह एकजुटता बनी रहे और बढ़ती रहे।

--रमेश उपाध्याय

Wednesday, August 4, 2010

एक कविता

इतिहास-बाहर

यह तब की बात है
जब समय बे-लाइसेंसी हथियार या जाली पासपोर्ट की तरह
गैर-कानूनी था और जिनके पास वह पाया जाता,
वे अपराधी माने जाते थे
सारी घड़ियाँ जब्त कर ली गयी थीं
कैलेंडर और तारीखों वाली डायरी रखने पर पाबंदी थी
पत्र-पत्रिकाओं पर दिन-तारीख छापना
दंडनीय अपराध घोषित किया जा चुका था
मोबाइलों और कंप्यूटरों में से समय बताने वाले
सारे प्रोग्राम निकाले जा चुके थे
दिन-तारीख और सन्-संवत् बोलना कानून का उल्लंघन करना था
आज, कल, परसों जैसे शब्दों को देशनिकाला दिया जा चुका था

जैसे मद्य-निषेध हो जाने पर नशे के आदी
विकल्प के रूप में भाँग वगैरह पीते हैं
समय के आदी कुछ लोग चोरी-छिपे
धूप-घड़ी, रेत-घड़ी आदि बनाया करते थे
लेकिन वे देर-सवेर पकड़े जाते थे और मार डाले जाते थे

दुनिया को एक अदृश्य मशीन चलाती थी
जिसे बार-बार बिगड़ जाने की आदत थी
फिर भी वह चलती रहती थी, कभी बंद नहीं होती थी और कहते हैं--
बिगड़ जाने पर वह खुद ही खुद को सुधार लेती थी

अतः दुनिया समय की पाबंदी होने के बावजूद चल रही थी
अलबत्ता यह कोई नहीं जानता था
कि वह जा कहाँ रही थी और कर क्या रही थी

अखिल भूमंडल को नियंत्रित करती
वह अदृश्य मशीन मनुष्यों को ऐसे चलाती थी
जैसे वे स्वचालित यंत्र नहीं, मनुष्य ही हों
स्वायत्त, स्वाधीन, स्वतंत्र
वे उस मशीन का ऐसे गुणगान करते
जैसे कभी किया जाता होगा ईश्वर का
कि वह सर्वज्ञ है, सर्वव्यापी है, सर्वशक्तिमान है और निर्विकल्प
उसका कोई विकल्प न तो कभी था, न है, न होगा

यही था समय को गायब कर देने का मूलमंत्र
जिसे वह अदृश्य मशीन अहर्निश उच्चारती थी
यह बताने को कि लोग रहें निश्चिन्त
उनकी चिंता कर रही है वह अदृश्य मशीन!

--रमेश उपाध्याय

Friday, July 23, 2010

यथास्थितिवाद का आधार

सफल लोगों के लिए यथास्थिति ही ठीक है!

जब आसपास के ज़्यादातर लोग खुद को दुनिया के मुताबिक ढालने में लगे हों, तब आपका यह कहना कि इस दुनिया को बदलकर बेहतर बनाना चाहिए, किसे और क्यों अच्छा लगेगा? ऐसा कहकर आप उनको कटघरे में खड़ा कर रहे होते हैं। और यह कोई पसंद नहीं करता।

आज के समय में किसी से यह कहना कि दुनिया बद से बदतर होती जा रही है, आइए, इसे बेहतर बनायें, उसे नाराज़ कर देने के लिए काफी है। वह ‘गरीब’ कितनी मुश्किल से इस मुकाम पर पहुँचा है कि उसे दुनिया को बेहतर बनाने के काबिल समझा जाये! यहाँ तक पहुँचने के लिए उसने कितनी जद्दोजहद की है! दुनिया में अपनी एक जगह बनायी है! यहाँ तक पहुँचने पर स्वभावतः उसे गर्व है। आखिर वह लाखों लोगों को पीछे छोड़कर इस मुकाम तक पहुँचा है। उसके हिसाब से तो यह दुनिया बहुत अच्छी है कि वह इसमें सफल हो सका! वह क्यों चाहेगा कि यह दुनिया बदले? वह तो यही चाहेगा कि दुनिया ऐसी ही बनी रहे और उसे दूसरों से आगे निकलने, सफल होने और स्वयं से संतुष्ट रहने के अवसर देती रहे!

लेकिन आप उससे कहते हैं कि यह दुनिया बुरी है, इसे बदलना चाहिए। सोचिए, उसे यह सुनकर कैसा लगता होगा! उसे लगता होगा कि आप उसके दुश्मन हैं। उसकी सफलता से जलते हैं, क्योंकि आप उसकी तरह सफल नहीं हो सके। अन्यथा दुनिया को क्या हुआ है? अच्छी-भली तो चल रही है!

इस तरह वह ‘गरीब’ फनफनाकर आपके विरुद्ध और दुनिया की यथास्थिति के पक्ष में खड़ा हो जाता है। कहने लगता है कि आप दुनिया को बदलने की बात कहकर राजनीति कर रहे हैं। इसमें आपका कोई निजी स्वार्थ है। दरअसल दुनिया बुरी नहीं है, उसे देखने की आपकी दृष्टि ही गलत है। इसलिए दुनिया को बदलने की बात करना छोड़ आप अपने-आप को बदलिए। अपने-आप को बेहतर बनाइए।...नहीं तो जहन्नुम में जाइए। जाइए, हमें आपकी कोई बात नहीं सुननी!

--रमेश उपाध्याय