Tuesday, June 1, 2010

डायरी का एक पन्ना (24 मई, 2010)


‘आलोचना’ में अरुण कमल का संपादकीय

सब कुछ न तो पूरी तरह नष्ट होता है, न पूरी तरह बदलता है। बहुत-सी अच्छी चीजें नष्ट या विकृत हो रही हैं, फिर भी उनमें से कुछ बच रही हैं और पहले से बेहतर नयी चीजों को जन्म दे रही हैं। उन्हीं में जीवन है, उन्हीं में आशा।

आज 'आलोचना' का अप्रैल-जून, 2010 का अंक मिला। इस अंक का संपादकीय बहुत ही अच्छा लगा। अरुण कमल ने अपने संपादकीय में लिखा है:

‘‘प्रचलित पत्र-पत्रिकाओं को देखने से लगता है कि हिंदी का साहित्यकार केवल पुरस्कारों-सम्मानों को लेकर चिंतित है। ...भंगुर प्रसिद्धि या पद या पैसा किसी भी साहित्य या साहित्यकार का इष्ट नहीं होता। फिर भी इसी को लेकर उद्वेग दिखलाता है कि हमारी आलोचना अपना काम ठीक से नहीं कर रही है। यह भी कि बतौर लेखक शायद हमारी चिंताएँ कुछ बदल गयी हैं। दिलचस्प यह है कि सत्ता से सारे लाभ प्राप्त करने वाले, स्वयं सत्ता केंद्रों पर काबिज लोग और साहित्य को दुहकर अपनी बाल्टी भरने वाले सबसे ज्यादा उद्विग्न दिखते हैं। क्या हम सत्ता-विमुख, सत्ता-निरपेक्ष नहीं रह सकते, यदि सत्ता-विरोधी न हो सकें तो? यहाँ सत्ता का अर्थ केवल सरकार नहीं, बल्कि धन या बाजार भी है। ऐसे समय में जब देश की आधी आबादी भूखे सोती हो, जहाँ लगातार बढ़ती छँटनी और बेरोजगारी हो, सत्ता-पोषित-संचालित बेदखली हो और हर तरह के लोकतांत्रिक प्रतिरोध का हिंस्र दमन हो--उस समय बतौर लेखक हमारी मुख्य चिंता क्या हो? हाल के दिनों में मेरे जानते इन मुद्दों पर न तो लेखकों ने कोई सामूहिक विचार-विमर्श किया, न प्रदर्शन, न विरोध। वामपंथी लेखक संगठनों ने भी कोई तत्परता न दिखायी।...हमारा औसत हिंदी लेखक आज पहले से कहीं ज्यादा सुखी-संपन्न है। लेकिन उसकी आत्मा में घुन लग गया है। कभी-कभी तो इच्छा होती है, पूछा जाये, पार्टनर तुम्हारी संपत्ति कितनी है, तुम भी घोषणा करो। यह ठीक है कि इसके आधार पर मूल्य-निर्णय न हुए हैं न होंगे न होने चाहिए, लेकिन इससे पाखंड और फरेब का तो पता चलेगा। जो साहित्य को भी जन और जीवन के पक्ष में मोड़ना चाहते हैं, उनका पक्ष तो मजबूत होगा। और इस तरह हम वापिस साहित्य के वास्तविक प्रश्नों की ओर लौट सकेंगे।’’

इस संपादकीय में लेखकों के मूल्यांकन के बारे में भी बहुत अच्छी बात कही गयी है:

‘‘कोई लेखक अच्छा है या बुरा, महत्त्वपूर्ण है या महत्त्वहीन, इसका निर्णय न तो हाथ उठाकर होगा न प्रस्ताव पारित करके। इसका निर्णय कभी अंतिम भी नहीं होगा। यह हमेशा एक तदर्थ, औपबंधिक निर्णय होगा। लगातार पिटते, मार खाते, बहिष्कृत होते और लहूलुहान होकर ही कोई यहाँ टिकता है। वे सारी लड़ाइयाँ, जो जीवन और समाज में लड़ी जाती हैं, वे एक बार फिर हर श्रेष्ठ रचना में और हर श्रेष्ठ आलोचना में भी लड़ी जाती हैं। और यह लड़ाई हजारों साल तक चलती रहती है। ऐसी स्थिति में सार्वजनिक प्रतिष्ठा यानी पुरस्कार या सम्मान संध्या के युद्ध-विराम से अधिक नहीं। बेहतर हो कि हम ‘हिंस्र पशुओं भरी’ शर्वरी से जूझें और कल के संग्राम की रणनीति तय करें। साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध यह संग्राम हमारी महान साहित्य-परंपरा का ही प्रसाद है। हम शहीद हों तो इसी मोर्चे पर।’’

साधुवाद, भाई अरुण कमल, इतने अच्छे संपादकीय के लिए!

--रमेश उपाध्याय


Saturday, May 1, 2010

पढ़ना-लिखना

बहुत शोर सुनते थे...

मैंने जे डी सेलिंगर को पहले कभी नहीं पढ़ा था, लेकिन उनके उपन्यास 'The Catcher in the Rye' का नाम सुना था। जब मैंने लिखना शुरू किया था, 1960 के दशक में, तब इसकी काफी चर्चा थी। पिछले दिनों सेलिंगर की मृत्यु के समय उनके बारे में लिखे गये लेखों में पुनः इस उपन्यास के बारे में पढ़ा, तो इच्छा हुई कि इसे पढ़ा जाये। खोजकर पढ़ा। यह ज्यादा बड़ा नहीं, केवल 218 पृष्ठों का उपन्यास है और बोलचाल वाली अंग्रेजी में रोचक ढंग से लिखा गया है, इसलिए पढ़ने में ज्यादा समय नहीं लगा। इसमें होल्डेन कॉलफील्ड नामक एक अमरीकी किशोर की कहानी है, जिसे फेल हो जाने पर स्कूल से निकाल दिया जाता है। स्कूल से अपने घर पहुँचने के बीच के तीन दिनों में वह क्या-क्या करता है और उसके साथ क्या-क्या होता है, इसका बयान वह स्वयं करता है। इस क्षीण-से कथा-सूत्र पर टँगी छोटी-छोटी असंबद्ध-सी घटनाओं के वर्णन के ज़रिये लेखक ने अमरीकी जीवन का एक चित्र प्रस्तुत किया है।

यह उपन्यास पहली बार 1951 में हैमिश हैमिल्टन से ग्रेट ब्रिटेन में प्रकाशित हुआ था। पेंगुइन बुक्स में यह पहली बार 1958 में आया और तब से यह लगातार पुनर्मुद्रित होता रहा है। कई बार तो एक वर्ष में दो-दो बार भी। लेकिन इस अतिप्रसिद्ध उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे ऐसा क्यों लगा कि यह एक साधारण-सा उपन्यास है, जिसे विश्व की महान कृतियों के समकक्ष तो क्या, उनके पासंग में भी नहीं रखा जा सकता? आखिर इसमें ऐसी क्या बात थी कि यह इतना चर्चित और प्रसिद्ध हुआ?

मन में उठे इन सवालों के जवाब पाने के लिए मैंने इस उपन्यास के बारे में आलोचकों के विचार पढ़े, तो पता चला कि यह उपन्यास अपने कथ्य के कारण उतना नहीं, जितना अपने शिल्प के नयेपन के कारण सराहा गया था। लेकिन कोई साहित्यिक रचना केवल शिल्प के बल पर इतनी चर्चित और प्रसिद्ध नहीं हो सकती। इसमें कथ्य का भी कुछ नयापन था।

उस समय पश्चिमी देशों के साहित्य में, शीतयुद्ध के संदर्भ में, यथार्थवाद के विरुद्ध एक अभियान-सा चलाया जा रहा था, जो आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद और नकारवाद की विचारधाराओं के साथ किये जाने वाले ‘नवलेखन’ (नयी कविता, नयी कहानी, नयी आलोचना) के रूप में तथा ‘एंटी’ और ‘एब्सर्ड’ जैसे उपसर्गों वाली विधाओं (एंटी-स्टोरी, एंटी-नॉवेल, एब्सर्ड ड्रामा आदि) के रूप में सामने आ रहा था। हिंदी साहित्य में यह ‘नयी कविता’ और ‘नयी कहानी’ का और कुछ आगे चलकर ‘अकविता’ और ‘अकहानी’ का समय था। निस्संदेह इस ‘नवलेखन’ में शिल्प के स्तर पर ही नहीं, कथ्य के स्तर पर भी कुछ नया था। इसमें पुरानी आदर्शवादी भावुकता और परंपरागत नैतिकता का निषेध था, लेकिन साथ-साथ उस यथार्थवाद का भी निषेध था, जो आधुनिक साहित्य की एक मुख्य विशेषता बनकर विश्व साहित्य में अपनी एक प्रभुत्वशाली जगह बना चुका था।

यथार्थवाद किसी कला-रूप, कला-सिद्धांत या रचना-पद्धति के रूप में नहीं, बल्कि पूँजीवाद के उदय के साथ उसकी विश्वदृष्टि के रूप में सामने आया था। साहित्य और कलाओं में वह यथार्थ को सार्थक और सोद्देश्य रूप में चित्रित करने की कला के रूप में विकसित हुआ था। शुरू से ही उसकी विशेषता यह रही है कि यथार्थ के बदलने के साथ वह स्वयं को भी बदलता है। उसके इस प्रकार बदलते रहने के कारण ही उसके विकासमान स्वरूप का संकेत करने वाले उसके विभिन्न नामकरण होते रहते हैं, जैसे--प्रकृतवाद, आलोचनात्मक यथार्थवाद, आदर्शोन्मुख यथार्थवाद, समाजवादी यथार्थवाद और अब भूमंडलीय यथार्थवाद। उन्नीसवीं शताब्दी तक यथार्थवाद काफी प्रौढ़ और परिपक्व हो चुका था, जिसे हम मुख्यतः फ्रांस, रूस और इंग्लैंड के तत्कालीन कथासाहित्य में देख सकते हैं।

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में उपनिवेशवाद-विरोधी स्वाधीनता आंदोलनों तथा समाजवादी क्रांतियों के साथ-साथ एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमरीका के विभिन्न देशों के साहित्य में यथार्थवाद का विकास अपने-अपने ढंग से हुआ। लेकिन इस नयी परिस्थिति में पूँजीवाद को यथार्थवाद खटकने लगा था, क्योंकि वह साहित्य और कलाओं में उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों तथा समाजवादी क्रांतियों के पक्ष से पूँजीवाद और साम्राज्यवाद की आलोचना का औजार बन गया था। इसी कारण उसका नामकरण हुआ आलोचनात्मक यथार्थवाद। उसके बाद जब से समाजवादी देशों में उसके नये रूप समाजवादी यथार्थवाद की चर्चा होने लगी, तब से तो पूँजीवादी देशों में यथार्थवाद को शत्रुवत ही माना जाने लगा। शीतयुद्ध के दौरान साहित्य और कलाओं में यथार्थवाद-विरोधी प्रवृत्तियों को खूब उभारा गया तथा व्यापक प्रचार के बल पर उन्हें एक तरफ ‘लोकप्रिय’ बनाया गया, तो दूसरी तरफ प्रतिष्ठित और पुरस्कृत भी किया गया।

'The Catcher in the Rye' उसी दौर की रचना है और इसके वास्तविक मूल्य और महत्त्व को यथार्थवाद-विरोधी अभियान के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। लेकिन यह काम मेरे बस का नहीं, क्योंकि मैं कोई आलोचक नहीं हूँ। मैंने यह उपन्यास एक पाठक के रूप में पढ़ा है और यहाँ जो मैं लिख रहा हूँ, वह इस उपन्यास की आलोचना नहीं, केवल मेरी पाठकीय प्रतिक्रिया है। लेकिन इस प्रश्न का उत्तर तो मुझे खोजना ही होगा कि मुझे यह अतिप्रसिद्ध उपन्यास क्यों एक साधारण-सा उपन्यास लगा? क्यों यह मुझे ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाया?

मुझे लगता है कि यह उपन्यास यथार्थवाद-विरोधी रचना है। जिस समय यह लिखा गया था, सारी दुनिया का यथार्थ कई बुनियादी रूपों में बदल रहा था। मसलन, उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की विश्व-व्यवस्था एक नया रूप ले रही थी। पूँजीवाद एक नये चरण में प्रवेश कर चुका था। समाजवाद--चाहे वह जैसा भी था--अस्तित्व में आ चुका था और पूँजीवाद को चुनौती भी दे रहा था। उपनिवेशवाद का अंत हो रहा था, लेकिन साम्राज्यवाद--खास तौर से अमरीकी साम्राज्यवाद--पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया के रूप में तीसरी दुनिया में फैलकर एक नया रूप धारण कर रहा था। अमरीका उस समय एक समृद्ध और शक्तिशाली देश के रूप में अपने प्रभुत्व का विस्तार कर रहा था, पर शेष विश्व के साथ के अंतर्विरोधों के साथ-साथ उसे अपने आंतरिक अंतर्विरोधों का भी सामना करना पड़ रहा था। लेकिन इस उपन्यास में उस समय के इस यथार्थ को सामने लाने के बजाय दबाने, छिपाने, उसकी उपेक्षा करने या उसकी तरफ से पाठकों का ध्यान हटाने का काम किया गया है।

साहित्य में सामाजिक अंतर्विरोधों को दबाने और उनकी तरफ से लोगों का ध्यान हटाने का एक तरीका है नैतिक किस्म के मानसिक द्वंद्वों को प्रमुखता प्रदान करना और उन्हीं को सबसे अहम समस्याओं के रूप में प्रस्तुत करना। जिस समय 'The Catcher in the Rye' लिखा गया था, साहित्य में यथार्थवाद-विरोधी लोग ‘प्रामाणिकता’ पर बड़ा जोर दिया करते थे। पश्चिम की देखादेखी यह प्रवृत्ति हमारे साहित्य में भी आयी। उसी के चलते यहाँ ‘अनुभव की प्रामाणिकता’ और ‘जिये-भोगे यथार्थ के चित्रण’ पर जोर देते हुए यथार्थवाद के विरुद्ध अनुभववाद को खड़ा किया गया।

'The Catcher in the Rye' में भी नैतिक किस्म का एक मानसिक द्वंद्व खड़ा किया गया है, जो इसके किशोर नायक की मनोदशा का चित्रण करते हुए 'phoney' और 'genuine' के द्वंद्व के रूप में उभारा गया है। उपन्यास के नायक को सारी दुनिया 'phoney' लगती है, जबकि वह एक 'genuine' जिंदगी जीना चाहता है। उपन्यास में 'phoney' शब्द इतनी बार आया है कि मानो यह उपन्यास की थीम बताने वाला key-word हो। लेकिन अपने लिखे जाने के समय यह उपन्यास और इसका नायक पाठकों और आलोचकों को चाहे जितने 'genuine' लगते हों, आज दोनों ही 'phoney' लगते हैं!

उदाहरण के लिए, उपन्यास का नायक अपनी छोटी बहन के द्वारा यह पूछे जाने पर कि वह क्या बनना चाहता है, कहता है:

"I keep picturing all these little kids playing some game in this big field of rye and all. Thousands of little kids, and nobody's around--nobody big, I mean--except me. And I'm standing on the edge of some crazy cliff. What I have to do, I have to catch everybody if they start to go over the cliff--I mean if they're running and they don't look where they're going I have to come out from somewhere and catch them. That's all I'd do all day. I'd just be the catcher in the rye and all. I know it's crazy, but that's the only thing I'd really like to be."

यही है इस उपन्यास की थीम। लेकिन यह जिस भावुकतापूर्ण आदर्शवाद को सामने लाती है, वह 1950 और 1960 के दशकों में साहित्य के पाठकों और आलोचकों को चाहे जितना 'genuine' लगता रहा हो, आज बिलकुल 'phoney' लगता है।

उपर्युक्त उद्धरण का सीधा संबंध उपन्यास के नामकरण से जुड़ता है। लेकिन राई के खेत की यह कल्पना लेखक की अपनी नहीं है। उसने स्वयं स्वीकार किया है कि यह शीर्षक रॉबर्ट बर्न्स की एक कविता की पंक्ति से लिया गया है। रॉबर्ट बर्न्स (1759-1796) अठारहवीं शताब्दी के कवि हैं, जो स्कॉटलैंड के महानतम कवि माने जाते हैं। उनकी कविता की पंक्ति है--"If a body meet a body comming through the Rye"। सेलिंगर ने 'meet' की जगह 'catch' कर दिया है और अपने उपन्यास के नायक को 'Catcher in the Rye' बना दिया है।

बहरहाल, मुझे उपन्यास पढ़ने के बाद रॉबर्ट बर्न्स की वह कविता पढ़ने की इच्छा हुई, जिसकी पंक्ति के आधार पर उपन्यास का नामकरण किया गया है। मैंने बहुत पहले इस कवि की कुछ कविताएँ 'The Golden Treasury of the Best Songs and Lyrical Poems in the English Language' में पढ़ी थीं। सौभाग्य से मेरे द्वारा 22 मई, 1961 के दिन खरीदी गयी यह पुस्तक आज भी मेरे पास है। मैंने उसे खोजकर उलटा-पलटा और उसमें संकलित रॉबर्ट बर्न्स की तमाम कविताएँ पढ़ डालीं। वह कविता तो मुझे नहीं मिली, जिसकी पंक्ति के आधार पर उपन्यास का नामकरण किया गया है, लेकिन उनमें से एक कविता में अपनी ये प्रिय पंक्तियाँ मुझे पुनः पढ़ने को मिल गयीं:

To see her is to love her,
And love but her for ever;
For nature made her what she is,
And never made anither!

मुझे लगता है कि महान साहित्यिक रचनाएँ ऐसी ही होती हैं या होनी चाहिए। यह नहीं कि अपने लिखे जाने के समय तो उनका बड़ा शोर हो और कालान्तर में उनकी प्रशंसाएं बढ़ा-चढ़ाकर की गयी लगने लगें।

--रमेश उपाध्याय

Tuesday, April 6, 2010

एक पेड़ का आत्मकथ्य

आम रास्ते से कुछ हटकर खड़ा हूँ मैं

मैं आम रास्ते से कुछ हटकर खड़ा एक फलदार पेड़ हूँ, जो रास्ते पर आते-जाते हर किसी को दिखाई नहीं देता। लेकिन मैं यहाँ एकाकी या सबसे अलग-थलग नहीं खड़ा हूँ। मेरे आसपास तरह-तरह के कई पेड़ हैं और मेरी देखभाल करने वाले यहाँ कई मनुष्य हैं। मैं उन्हीं का पेड़ हूँ और वे मुझे प्यार करते हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं उन्हें फल देता हूँ, बल्कि इसलिए भी कि मैं उन्हें अच्छा लगता हूँ। वे भी मुझे अच्छे लगते हैं और मैं भी उन्हें प्यार करता हूँ, क्योंकि मैं उन्हीं का उगाया हुआ पेड़ हूँ। वे जानते हैं कि फल से फल पैदा नहीं होता। बीज बोने से पेड़ उगता है और पेड़ बड़ा होकर फल देता है। बीज से पेड़ उगाने, उसे पूरा पेड़ बनाने और तब उससे वांछित फल प्राप्त करने की एक प्रक्रिया होती है, जो समय मांगती है, धैर्यपूर्वक अनवरत किया गया श्रम मांगती है, पेड़ उगाने और फल पैदा करने के ज्ञान-विज्ञान की समझ मांगती है, पेड़ को स्वस्थ और फलों को सुरक्षित रखने के लिए की जाने वाली चिंता और तत्परता मांगती है और मांगती है ऐसी मानवीय उदारता तथा वैचारिक प्रतिबद्धता, जो सिखाती है कि अपने पेड़ के फल केवल अपने लिए नहीं होते, बल्कि स्वयं से अधिक दूसरों के लिए होते हैं; अतः फल ऐसे होने चाहिए कि उन्हें खाकर दूसरे खुश हों और स्वस्थ रहें।

लेकिन मैं आम रास्ते से कुछ हटकर खड़ा एक फलदार पेड़ हूँ, जो रास्ते पर आते-जाते हर किसी को दिखाई नहीं देता। मेरे पास वे ही आते हैं, जो या तो यह जानते हैं कि मैं यहाँ हूँ और यहाँ आने पर उन्हें फल मिलेंगे, या वे आते हैं, जो अकारण या किसी भी कारण से इधर चले आते हैं और मुझे अचानक पा जाते हैं। मैं किसी को बुलाने नहीं जाता, लेकिन कोई मेरे पास आता है, तो मैं प्रसन्न होता हूँ। मुझसे फल पाने के लिए कोई मुझ पर पत्थर मारता है, या मेरे ऊपर चढ़ जाता है, तो मुझे बुरा नहीं लगता।

लोग मेरे फलों का क्या करते हैं--खुद खाते हैं, दूसरों को खिलाते हैं, बाज़ार में बेचते हैं, दान में देते हैं या फ़ेंक देते हैं--मैं इसकी परवाह नहीं करता। हाँ, मैं यह कल्पना अवश्य करता हूँ कि मेरे फल खाकर उनकी गुठलियों को लोग नया पेड़ उगने के लिए ज़मीन में बो देंगे, या उनके द्वारा यों ही इधर-उधर फ़ेंक दिए जाने के बावजूद मेरे बीज अपने-आप उग आयेंगे और पेड़ बन जायेंगे। न जाने कहाँ-कहाँ! न जाने कितने-कितने! और वे भी मेरी तरह फूलेंगे-फलेंगे!

कभी-कभी मेरे पास ऐसे लोग भी आ निकलते हैं, जो मेरी स्थिति पर विचार करते हुए कहते हैं--हाय, बेचारा! इतना अच्छा पेड़ यहाँ सबकी नज़रों से ओझल, उपेक्षित खड़ा है! रास्ते पर होता, तो इसे सब देखते, सब इसके पास रूककर इसकी छाया में बैठते और सब इसके मीठे फल खाते!

कोई-कोई ऐसी बातों का प्रतिवाद भी करते हैं। कहते हैं--अच्छा ही हुआ कि यह पेड़ आम रास्ते पर न हुआ। वहाँ होता, तो दिन-रात रास्ते पर से गुज़रते वाहनों से उड़ती धूल खाता और उनसे निकलने वाला धुआँ पीता। रास्ते से गुजरने वालों की नज़र में यह हमेशा रहता, तो वे इस पर लगने वाले फलों के पकने का इंतज़ार न करते, कच्चे ही तोड़ ले जाते। तब यह इतने सारे पके हुए मीठे फल कहाँ दे पाता !

मैं दोनों तरह की बातें चुपचाप सुनता हूँ। न दुखी होता हूँ न सुखी। हाँ, चलकर मेरे पास आने वालों और चले जाने वालों को देखकर कभी-कभी यह ज़रूर लगता है कि काश, मेरे भी पाँव होते, मैं भी चल सकता, कहीं भी जा सकता।

लेकिन मैं शिकायत नहीं करता। मैं जो हूँ, सो हूँ। जहां हूँ, वहां हूँ। और चलता तो मैं भी हूँ--क्षैतिज रूप में नहीं, तो ऊर्ध्वाधर रूप में। मेरी जड़ें पाताल की तरफ जाती हैं और फुनगियाँ आकाश की तरफ। और मेरे फल? मैं रास्ते से कुछ हटकर खडा हूँ, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता कि मेरे फल मेरी डालियों पर ही लगे-लगे सूख जाएँ या नीचे गिरकर सड़ जाएँ। सबको नहीं, पर कुछ लोगों को पता है कि मैं यहाँ हूँ। वे आते हैं और मेरे फल खाते हैं। अपने साथ ले भी जाते हैं। मैं यहीं खडा रहता हूँ, लेकिन मेरे फल न जाने कहाँ-कहाँ पहुँच जाते हैं। और उनके बीज न जाने कहाँ-कहाँ उगकर पेड़ बन जाते हैं।

--रमेश उपाध्याय

Sunday, February 28, 2010

राष्ट्रीय साहित्य

साहित्य राष्ट्रीय होकर ही भूमंडलीय होगा

हमारे देश में राष्ट्रवाद के दो रूप रहे हैं। एक वह, जो देश को जोड़ता है और दूसरा वह, जो तोड़ता है। आज की परिस्थिति में साहित्य का कर्त्तव्य है कि वह जोड़ने वाले राष्ट्रवाद को अपनाए और तोड़ने वाले राष्ट्रवाद से सचेत रहे। तोड़ने वाले राष्ट्रवाद को आज के पूंजीवादी भूमंडलीकरण के सन्दर्भ में देखना चाहिए, जो यह भ्रम फैला रहा है कि दुनिया एक हो गयी है और अब अलग-अलग राष्ट्रों की कोई ज़रुरत नहीं रह गयी है। वास्तविकता यह है कि भूमंडलीकरण राष्ट्र-राज्यों के आधार पर ही हो रहा है और उनके ख़त्म हो जाने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है। इसलिए भारतीय साहित्य स्वयं को चाहे जितना वैश्विक समझे, उसे राष्ट्रीय होना ही होगा। यदि वह देश को जोड़ने वाले राष्ट्रवाद को अपनाये, तो उसमें एक नयी जान आ सकती है और इसके सुन्दर परिणाम महान कृतियों के रूप में प्राप्त हो सकते हैं।

कुछ सम्प्रदायवादी दल और संगठन स्वयं को देशभक्त और राष्ट्रवादी कहते हुए ऐसा प्रभाव पैदा करने की कोशिश करते हैं कि जो लोग उनसे सहमत नहीं, वे मानो देशद्रोही और राष्ट्र-विरोधी हों। अतः बहुत-से साहित्यकार सोचते हैं कि यदि हमने देशभक्ति या राष्ट्रवाद की बात की, तो हमें भी सम्प्रदायवादी समझ लिया जाएगा। मगर आज की परिस्थिति में साहित्यकारों को ऐसी सोच से उबरकर यह समझना होगा कि देशभक्त और राष्ट्रवादी कोई भी हो सकता है, किन्हीं ख़ास दलों और संगठनों ने ही देशभक्त और राष्ट्रवादी होने का ठेका नहीं ले रखा है।

आज हमारा देश एक नए ढंग से पराधीन हो रहा है। इसलिए अपनी स्वाधीनता की रक्षा करने और उसे शोषण, दमन, उत्पीडन की शिकार भारतीय जनता की सच्ची स्वाधीनता में बदलने के लिए हमें एक नए ढंग से राष्ट्रीय मुक्ति और स्वाधीनता की लड़ाई लड़नी है। यह एक लम्बी लड़ाई होगी और उसमें देश की समूची जनता को एकजुट होकर लड़ना होगा। इसलिए जनता को बांटने और आपस में लड़ाने के प्रयासों का विरोध तथा उसे सचेत और संगठित बनाने के प्रयासों का समर्थन करने वाला साहित्य ही सच्चा राष्ट्रवादी साहित्य होगा।

आज की दुनिया को एक व्यापक विश्व-दृष्टि से देखना और वैश्विक परिस्थिति के सन्दर्भ में अपनी राष्ट्रीय परिस्थिति को समझना आज के प्रत्येक साहित्यकार के लिए आवश्यक है। अतः साहित्यकारों को व्यक्तिवादी, कलावादी, अभिजनवादी प्रवृत्तियों से बचते हुए उन विभ्रमों से मुक्त होना होगा, जो साहित्य की स्वायत्तता , समाज-निरपेक्षता के कला-सिद्धांतों के ज़रिये फैलाए जाते हैं। आज के साहित्यकार को साहित्य से साहित्य पैदा करने का प्रयास करने के बजाय ज्ञान के सभी अनुशासनों से प्राप्त वैश्विक बोध से अपने राष्ट्रीय साहित्य का निर्माण करना होगा।

मनुष्य की अन्य तमाम गतिविधियों की भाँति लेखन को भी आज बाज़ार के अधीन करने तथा साहित्य को पण्य वस्तु बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं। विभिन्न उपायों से लेखकों के मन में यह भावना पैदा की जा रही है कि अपनी भाषा में लिखना व्यर्थ है, अंग्रेजी में लिखना और विश्व-बाज़ार में बिकना आज के लेखकों के लिए अनिवार्य हो गया है। इससे राष्ट्रीय भाषाओं में लिखने वाले लेखक अपनी भाषा में लिखने और अपने देश का साहित्य पढ़ने के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। सच्चा राष्ट्रवादी साहित्य इस उदासीनता को दूर कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम साहित्य में भी 'स्वदेशी' की बात करते हुए दूसरे देशों के साहित्य से विमुख हो जाएँ या उससे घृणा करने लगें। आज के साहित्यकार को न केवल अपनी भाषा के, न केवल भारतीय भाषाओं के, बल्कि विश्व की सभी भाषाओं के साहित्य की थोड़ी-बहुत समझ और जानकारी रखनी होगी। अंग्रेजी में लिखना और विश्व-बाज़ार में बिकना भी कोई पाप नहीं है। ध्यान रखने की बात केवल यह है कि साहित्य पण्य वस्तु बनकर न रह जाए, बल्कि अपने समय और समाज में अपनी ज़रूरी भूमिका निबाहे।

यह तभी हो सकता है, जब साहित्य अपने देश की जनता की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर लिखा जाये। संसार की वे सभी महान साहित्यिक कृतियाँ, जो विश्व-साहित्य की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं, अपने देश की होकर ही सारी दुनिया की हुई हैं।

--रमेश उपाध्याय

Monday, October 19, 2009

हिन्दी प्रकाशन की दिशा

हिन्दी का पुस्तक प्रकाशन भी 'सेलेब्रिटीज' की ओर?

दिवाली के त्यौहार के लिए घर की सफाई करते समय मुझे अपने कुछ पुराने नोट्स मिले। कुछ कागजों पर मैंने आधा-अधूरा-सा कुछ लिख रखा था। कुछ उद्धरण थे, लेकिन उनके सन्दर्भ नहीं थे। ऐसे कागजों को फाड़कर फेंकते समय एक कागज़ पर नज़र पड़ी, जिस पर लिखा था :

"सुबह अखबार में पढा लेख याद आ गया--'बियोंड लेफ्ट एंड राइट'। उसमें लिखा था कि परिस्थिति बदल जाने से बहुत-से वामपंथी मार्क्स, माओ, मंडेला को छोड़कर मैनेजमेंट, मार्केटिंग और मीडिया की तरफ़ चले गए हैं। वाम और दक्षिण का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। बहुत-से लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने दलगत राजनीति और उससे सम्बद्ध विचारधाराओं से ही नहीं, बल्कि राजनीति मात्र से ही पल्ला झाड़ लिया है। लेकिन सभी ऐसा नहीं कर रहे हैं। जाक दरीदा मार्क्सवाद के अंत पर पुनर्विचार कर रहा है। ल्योतार उत्तर-आधुनिक नैतिकता पर किताब लिख रहा है। फ्रांस्वा फ्यूरे कम्युनिज्म का अध्ययन कर रहा है। लेकिन तीन-चार दिन पहले मैंने एक और लेख पढा था--'सेलेब्रिटी नोवेल्स'। उसमें लिखा था--'बुक पब्लिशिंग नाउ रिज़म्बल्स हॉलीवुड एंड दि फ़िल्म इंडस्ट्री। इट हैज़ दि सेम रिलेंटलेस सेलेब्रिटी पफ्स, सिनिकल मार्केटिंग प्लोयज़ एंड रूथलेस टैक्टिक्स...'। तभी तो पश्चिम के प्रकाशक एक लेखक की पुस्तकों की चार करोड़ प्रतियाँ तक बेच लेते हैं। इतना बिकने वाला एक लेखक है कैन फालेट, जिसे ब्रिटेन के आलोचक 'शैम्पेन सोशलिस्ट' कहते हैं..."

ये बातें शायद मैंने कोई लेख लिखने की तैयारी करते समय नोट की होंगी। लेकिन कब? याद नहीं। जिन लेखों का यहाँ ज़िक्र है, वे किनके थे, कब और कहाँ छपे थे, यह भी याद नहीं। लेकिन इन बातों को फिर से पढ़ा, तो लगा कि अब हिन्दी का पुस्तक प्रकाशन भी सेलेब्रिटीज की तरफ़ जा रहा है। उसकी शक्ल भी फ़िल्म उद्योग से मिलने लगी है। उसमें भी मार्केटिंग के सिनिकल तौर-तरीके अपनाए जाने लगे हैं और अपनाई जाने लगी हैं 'रूथलेस टैक्टिक्स'। और आज नहीं तो कल, हिन्दी के भी अपने कैन फालेट होंगे! हिन्दी के भी अपने 'शैम्पेन सोशलिस्ट' होंगे!

--रमेश उपाध्याय

Wednesday, October 7, 2009

साहित्य में संबोधन

संबोधन बदलेगा तो संवाद भी बदल जाएगा

साहित्य सबसे पहले एक संवाद है। लेखक का अपने पाठक, श्रोता या दर्शक से होने वाला संवाद। रचना को ध्यान से पढ़ें, तो उसमें दोनों परस्पर संवाद करते दिख जायेंगे और उन्हें सुनकर पता चल जाएगा कि लेखक क्या, क्यों और कैसे कह रहा है।

नन्द भारद्वाज का उपन्यास 'आगे खुलता रास्ता' पढ़ते हुए मुझे लगा कि जब यह उपन्यास राजस्थानी में लिखा गया था, तब यह राजस्थानी पाठक को संबोधित था और अब जब लेखक ने स्वयं इसका हिन्दी में "अनुवाद और पुनर्सृजन" किया है, इसका पाठक बदल गया है। यह आसान नहीं होता कि आप एक व्यक्ति से एक भाषा में कही गई बात दूसरे व्यक्ति से दूसरी भाषा में ज्यों की त्यों कह सकें। ऊपरी तौर पर लग सकता है--जैसा कि अनुवादकों को लगता है--कि एक भाषा में कही गई बात दूसरी भाषा में यथावत कह दी गई है, लेकिन मैं अंग्रेज़ी, गुजराती और पंजाबी से किए गए अनुवादों के अपने अनुभव से जानता हूँ कि हर अनुवाद एक "पुनर्सृजन" ही होता है, क्योंकि रचना मूलतः जिस पाठक को संबोधित होती है, उसके अनुवाद का पाठक उससे भिन्न होता है। अनूदित रचना में लेखक एक दुभाषिये के माध्यम से दूसरी भाषा के पाठक को संबोधित करता है। अब यह दुभाषिये पर निर्भर करता है कि वह लेखक की भाषा में कही हुई बात दूसरी भाषा के पाठक तक कैसे पहुंचाता है। वह उस बात को ज्यों की त्यों दूसरी भाषा में नहीं कह सकता, इसलिए अच्छे से अच्छा अनुवाद भी मूल का लगभग सही रूप ही होता है। अर्थात्, लगभग सदृश, ज्यों का त्यों नहीं। लेखक यदि स्वयं दूसरी भाषा में अनुवाद करता है, तो वह मूल लेखक होने के नाते अपनी रचना का "पुनर्सृजन" करने की--अर्थात् जहाँ ज़रूरत हो, वहाँ उसे फिर से या दूसरे रूप में लिखने की--छूट ले सकता है और अक्सर लेता ही है। नन्द भारद्वाज ने अपने राजस्थानी उपन्यास का हिन्दी अनुवाद करते समय यह छूट इस प्रकार ली है :

"जब इसके अनुवाद का काम हाथ में लिया, तो आरम्भ से ही यह अनुभव करने लगा कि इसके राजस्थानी पाठ में कुछ अंश ऐसे हैं, जिन्हें दुबारा से लिखने की ज़रूरत है। इसके आरम्भ और अंत से भी मैं संतुष्ट नहीं था। पाठ में कसावट की कमी बराबर खलती रही। इस पुनर्सृजन के दौरान मुझे यह भी लगा कि इसकी मूल भाषा और अनुवाद की भाषा की प्रकृति एक-सरीखी नहीं है। जो वाक्य अपनी मूल भाषा में बेहद व्यंजनापरक और असरदार लगता है, उसके यथावत शाब्दिक अनुवाद में वह सारी व्यंजना और चमक खो जाती है। ऐसी सूरत में उस प्रसंग के पूरे वाक्य-विन्यास और अभिव्यक्ति को हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप रखने की दृष्टि से मुझे इसका पुनर्सृजन करना बेहतर लगा।"

यह पढ़ते हुए मुझे लगा कि साहित्य को देखने-परखने का एक अच्छा तरीका यह देखना हो सकता है कि रचना में लेखक किस प्रकार के पाठक को संबोधित कर रहा है। इससे लेखक का भाषा-व्यवहार ही नहीं, समाज और जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण भी सामने आ जाता है।

नन्द भारद्वाज ने जो कठिनाई महसूस की, उसका कारण यही था कि उपन्यास को राजस्थानी से हिन्दी में लाने की प्रक्रिया में उनका पाठक बदल गया। हिन्दी के पाठक को वे उसी तरह संबोधित नहीं कर सकते थे, जिस तरह उन्होंने राजस्थानी के पाठक को संबोधित किया था। संबोधन बदला, तो लेखक-पाठक संवाद की, अर्थात् रचना की प्रकृति भी बदल गई।

--रमेश उपाध्याय

Friday, September 18, 2009

पुरस्कारों की निरर्थकता

अब हकीकत सामने आने लगी है

पुरस्कारों की निरर्थकता अब सामने आने लगी है। वे किन आधारों पर दिए जाते रहे हैं, लोग जानते तो पहले भी थे, पर अब खुलकर बताने भी लगे हैं। और वे ही लोग, जो उनके निर्णायक रहे हैं!

इस बार का भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार 'कथन' में प्रकाशित मनोज कुमार झा की कविता 'स्थगन' को मिला है। लेकिन जिस दिन दिल्ली में यह पुरस्कार दिया गया, उसी दिन से पुरस्कार पर प्रश्नचिन्ह भी लगने शुरू हो गए। उसी दिन पुरस्कार पर केंद्रित पुस्तक 'उर्वर प्रदेश-३' का लोकार्पण किया गया, जिसमें इस पुरस्कार से पुरस्कृत कवियों की कविताएँ संकलित हैं। मैंने वह संकलन देखा नहीं है, लेकिन १५ सितम्बर, २००९ के 'जनसत्ता' दैनिक में पढ़ा कि संकलन की भूमिका विष्णु खरे ने लिखी है, जो स्वयं पुरस्कार के निर्णायकों में से एक रहे हैं। भूमिका का शीर्षक है 'एक पुरस्कार के तीन दशक : एक विवादास्पद जायजा'। 'जनसत्ता' के अनुसार भूमिका में लिखा है--"अन्य पुरस्कारों सहित भारत भूषण पुरस्कार पर भी हर वर्ष जाति, क्षेत्र, बोली, आस्था, विभिन्न किस्मों के अन्तरंग संबंधों, रसूख, विनिमय आदि के सच्चे-झूठे संदेह किए जाते रहे हैं।"

इस पुरस्कार के निर्णायकों में विष्णु खरे के अलावा नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी और अरुण कमल शामिल हैं। 'जनसत्ता' लिखता है--"विष्णु खरे ने अपनी भूमिका में जहाँ दूसरे निर्णायकों के निर्णय पर संदेह किया है, वहीं कई कवियों की कविताओं को लेकर भी संदेह खड़े किए हैं और कइयों के उम्मीद पर खरा नहीं उतरने की बात कही है। उन्होंने तमाम पुरस्कृत कवियों की कविता (जिस पर पुरस्कार दिया गया) का जमकर पोस्टमार्टम किया है। खरे की टिप्पणी पर कवियों के बीच भी उतनी ही तीखी प्रतिक्रिया हुई है। कुछ कवि काफी नाराज़ बताये जाते हैं।"

१९८६ में पुरस्कृत कवि विमल कुमार को पुरस्कार देने का निर्णय ख़ुद खरे ने किया था, लेकिन अब उन्होंने लिखा है--"मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि विमल कुमार ने जो उम्मीदें 'सपने में एक औरत से बातचीत' में जगाईं थीं, वे उन्हें, मेरे विचार से, अपनी बाद की अधिकांश कविताओं में निभा नहीं पा रहे है।"

उदय प्रकाश के बारे में विष्णु खरे का कहना है--"कहानी लेखन में असाधारण ख्याति और सफलता कमाने के बावजूद कवि के रूप में भी स्वीकृत होने की उनकी त्रासद महत्वाकांक्षा उनसे कविता में अतिलेखन करवा रही है।"

विष्णु खरे की इस आलोचना से पुरस्कृत कवि ही नहीं, पुरस्कार देने वाले भी आहत हैं। अब बेचारे पुरस्कृत कवि तो विमल कुमार की तरह पुरस्कार लौटाने और विष्णु खरे की "आलोचना की तानाशाही" की आलोचना ही कर सकते हैं, पर पुरस्कार देने वाले खरी-खरी कहने वाले खरे को निर्णायक मंडल से निकाल देने का दंड देने में समर्थ हैं! और मंडल के पुनर्गठन के नाम पर खरे को निकालने का फ़ैसला उन्होंने शायद कर भी लिया है!

जो भी हो, इससे हिन्दी आलोचना, मूल्यांकन, सम्मानों और पुरस्कारों के बारे में कुछ सच्चाई तो खुलकर सामने आई ही है!

--रमेश उपाध्याय